संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
14. संयोगमें त्याज्य स्त्री और पुरुष
७०
सन्तति-शास्त्र ।
गर्भ रह गया। लड़का अपने मामाकी शकल सूतका उत्पन्न हुआ।
(२) एक सज्जनके यहाँ एक काला कलूटा कहार नौकर था। भाग्यवश वहूजीने स्नान करके कहारके ही दर्शन पाये। उसी रजोदर्शनसे गर्भ रह गया। पुत्र उत्पन्न हुआ, जो ठीक उसी कहारके रंग रूपका था।
इन प्रत्यक्ष प्रमाणोंसे सिद्ध है कि इस विषयमें जो कुछ शास्त्रका मत है वह अक्षर-अक्षर-सत्य है। अतएव स्नान करके अत्यन्त सावधानीके साथ पति अथवा देवर, पुत्र इत्यादि जो मिय और सुन्दर हो, उसीका दर्शन करना चाहिये।
(१४) संयोगमें त्याज्य स्त्री और पुरुष ।
संयोग कोई मामूली बात नहीं है। यह किसी समय बहुत बड़े विचार और विधि-विधानके साथ किया जाता था। परन्तु आजकल इसकी दशा शोचनीय हो रही है। सबसे बड़ा कारण तो स्त्री और पुरुषोंकी अयोग्यता है। प्रायः देखा जाता कि स्त्री अथवा पुरुष रोगी हैं या भोजन किये थोड़ी ही देर हुई है, ऐसी दशाओंमें संयोग कर लिया जाता है। ऐसी असावधानियोंसे अनेक हानियाँ होती हैं कि जिनके अनेक कारण हैं। वैद्यकका मत है कि—
(१) रजस्वला होनेके पहले और उसके पीछे भी कम अवस्था वाली स्त्रीसे संयोग न करना चाहिं। क्योंकि ऐसे समयोंमें भीतरी अवयव पुष्ट नहीं होते, जिससे आगे होनेवाली सन्तान उत्पन्न होनेमें अनेक बाधाएँ पड़ती हैं। (श० क०)
(२) जिन्होंने अधिक भोजन किया हो, जो तुरन्त ही खा चुके हों, जिनका भोजन पचा न हो, प्यास लगी हो, जो शोक
15. वन्ध्या रोग
वन्द्या रोग ।
७१०
चिन्तामें व्याकुल हों, जो बूढ़े या बूढ़ी हों, जो रोगी हों, जिनको पाखाने पेशाबकी हाजत हो, जो रजवती और पुरुषसे उमरमें बड़ी, तपेदिक, स्वास प्रमेह, प्रदर, गरमी, सूजाक का रोगी हों, जिनके कामदेव न जगा हों, शृङ्गार-रहित, नशेवाज, उन्मत्त और अति दुर्बल हों, उनसे संयोग न करना चाहिये। ( १० क० )
(३) जो अपनेको मिय न हो, जिसके देखनेसे चित्त बिगड़ जाय, जिससे अनवन रहें, विरक्त, जो गुरुके खानदानकी हो दुष्ट योनिवाली और वन्दचलन हो, इनसे संयोग न करना चाहिये। ( १० क० )
इस प्रकारके स्त्री और पुरुषोंसे संयोग न होना चाहिये; क्योंकि इससे अनेक रोग उत्पन्न होकर हानि पहुँचाते हैं।
(१५) वन्द्या रोग ।
हमारे देशमें वन्द्याओंके लिये लोगोंका अनोखा विचार है। जहाँ चार छः वर्ष वच्चा न हुआ तुरन्त स्त्रीको वन्द्या मान बैठते हैं और भाग्य भगवान्के भरोसे पड़े रहकर कुछ यल नहीं करते वैद्यकमें जितनी वन्द्याओंका जिक्र किया गया है, उनमेंसे कुछ ही ऐसी हैं कि जिनके सन्तान नहीं हो सकती, किन्तु औषधि करनेपर वन्द्याएँ निरोग हो सकती हैं। प्रायः लोग यही समझते हैं कि वन्द्याएँ आठ प्रकार की होती हैं और यही बात प्रसिद्ध भी है, परन्तु और दूसरे ग्रन्थोंके देखनेसे पता चलता है कि वन्द्याएँ अठारह प्रकारकी होती हैं। इनकी व्याख्या पृथक् पृथक् की जाती है। [ रतिशात्र ]
(१) जन्मवन्द्या—उसको कहते हैं जो गर्भ ही धारण न कर सके। जाँच करनेपर मालूम हुआ है कि ऐसी स्त्रियोंके
७२
सन्तति-शान्त ।
गर्भाशय ही नहीं होता । अतएव इसका इलाज नहीं हो सकता । क्योंकि इस रोग का सामान जन्म ही से रहता है । इस को पएडी भी कहते हैं ।
(२) काकवन्था—उसको कहते हैं कि जिसके एक ही सन्तान उत्पन्न होकर रह जाय, दूसरी न हो । जाँच करने पर यह मालूम हुआ है कि ऐसी स्त्रियोंमें पहला बच्चा होनेके समय गर्भाशय नष्ट हो जाता है । इस कारण दूसरी सन्तान नहीं होती । इसमें औषधि करना व्यर्थ है ।
(३) सूतवत्सा—उसको कहते हैं कि जिसके सन्तान उत्पन्न होती हो, परन्तु मर जाया करे । इस विषयमें धर्म-शास्त्रने यह माना है कि स्त्री पूर्व जन्मके पापोंसे सूतवत्सा होती है । यह बात गीता और वेदान्त-शास्त्रसे सिद्ध है कि मनुष्यको पूर्वजन्मका कर्म इस जन्ममें अवश्य भोगना पड़ता है । परन्तु इस विषयमें डाक्टोंका मत यह है कि जिस स्त्रीके बच्चे वारंवार मर जाते हैं, उसके दूध में एक प्रकारका विष होता है । मेरे एक मित्रके तीन बच्चे मर गए । चौथेको पैदा होते ही गायका दूध दिया गया, वह जिन्दा है; परन्तु पाचवाँ गायका दूध पिलाने पर भी मर गया । इसमें औषधि करना व्यर्थ है ।
(४) गर्भध्रावी—उसको कहते हैं कि जिसके गर्भ धारण होकर गिर जाया करे । जाँच करनेसे मालूम हुआ है कि यह रोग गर्भाशय के निकम्मे होनेसे होता है । यदि गर्भाशयमें थोड़ा विकार हो तो इसकी औषधि हो सकती है, परन्तु रोग अधिक होनेपर औषधि भी व्यर्थ होती है । धर्म-शास्त्रने इस रोगको भी पूर्व जन्मके पापोंका फल माना है ।
बन्ध्या रोग ।
७३
(५) गल्हगर्भा—उसको कहते हैं कि जिसके गर्भ रहकर गल्ह जावे और बढ़ न सके। इस विषयमें जाँच करने से मालूम हुआ है कि यह रोग गर्भाशयके विकार से होता है। खास कर उस स्त्री को कि जिसको 'सरतान रहम' अर्थात् गर्भाशय में कीड़े पैदा हो गए हों। 'सरतान रहमका' मत हकीमाका है अथवा उस स्त्री को होता है, जिस स्त्री की योनि अचरणा हो। अचरणा योनि उसको कहते हैं कि जिस में साफ न करने के कारण छोटे छोटे कीड़े पड़ गए हों और खुजली उत्पन्न होती हो। (च० चि० ३० ३७ श्लो० ११) ऐसे रोगी के होने पर गर्भाशय नष्ट होकर गर्भ गल्हकर गिर जाया करता है। इस रोग का दूसरा कारण गर्भाशयकी गर्मी है। गर्भाशय की बढ़ी हुई गर्मी गर्भ को गला देती है। तीसरा कारण अत्यन्त बढ़ा हुआ गर्मी और सूजाक का प्रकोप है कि जिस से बच्चे का रक्त विगड़ जाता है और गल्ह कर गिर पड़ता है। बड़े हुए कारणोंमें औषधि व्यर्थ होती है।
(६) कन्यापत्या—उसको कहते हैं कि जिस के कन्याएँ ही उत्पन्न हों। जाँच करने से मालूम हुआ है ऐसी स्त्रियाँ वही होती हैं कि जिनके दहिने और का अरुड नहीं होता या निकम्मा हो जाता है। क्यों कि स्त्री के दहिने अरुड से निकले हुए रज द्वारा पुत्र होता है। जब दहिना अरुड ही नहीं है तो पुत्र हो कैसे? अतएव ऐसी दशा में भी औषधि व्यर्थ है।
(७) भूठगर्भा—उसको कहते हैं कि गर्भ रह कर उस की बुद्धि न हो, वैसा ही रह जावे और दूसरा गर्भ भी न रहे। भूठगर्भ वह है कि जिस में बच्चे के स्थान में माँस का लोथड़ा हो। इसका कारण यह है कि जब
७४
सन्तति-शास्त्र ।
चौथे दिन स्नान करके स्त्री स्पर्श में पुत्र्य संयोग करे या दो स्त्रियाँ आपस में स्त्री पुत्र्य की भाँति संयोग करें तो एककी योनि से वीर्य निकल कर जब दूसरी की योनि में पहुँच जाय तो वह रज से मिलकर गर्भ में पिंड बना देता है । इसे गर्भाका मांस-पिंड कहते हैं ।
( सु० श० अ० २ श्लोक ५१ मे ५३ )
इस विषय में एक विद्वान् की राय है कि सृष्टगर्भ गृहने पर फिर अस्ली गर्भ नहीं रहता । ( श० क० )
डाक्टर लोग उसको ( Falsc pregnancy ) कहते हैं और इसका कारण रज-विकार मानते हैं । डाक्टरी मत के अनुसार उपचार हो सकता है ।
(८) रजोहीना—उसको कहते हैं कि जो रजस्वला हो न हो । इस विषय में जांच करने से मालूम हुआ है कि ऐसी स्त्रियोंके गर्भ-अण्ड ही नहीं होते । ऐसी दशा में सन्तान भला कैसे हो सकता है । अतएव औषधि करना व्यर्थ है ।
(९) मेही—उस को कहते हैं कि जिसके शरीर में चरवी अत्यन्त बढ़ गई हो । ऐसी स्त्री के सन्तान इस कारण नहीं हो सकती कि चरवी बढ़ने से गर्भाशय निकम्मा हो जाता है । चरवी गर्भकोष को विगाड़ देती है और मुख सकुचित हो जाता है । इसकी औषधि हो सकती है ।
(१०) अतिसूला—उसको कहते हैं जो अत्यन्त मोटी हो । ऐसी स्त्री के सन्तान इस कारण नहीं होती कि उनका गर्भ-अण्ड विगाड़ जाता है और मोटाई के कारण लिंगेंद्रिय गर्भाशय के मुख तक न पहुँच कर वीच में ही रह जाती है । अतएव वीर्य भी वहाँ तक नहीं पहुँच सकता । इसकी औषधि हो सकती है ।
(११) नष्ट कोष्ठी—उसको कहते हैं कि जिसका कोष्ठ अर्थात्
वन्द्या रोग ।
७५
गर्भाशय नष्ट हो गया हो और इस कारण गर्भ न रहता हो । इसके तीन भेद हैं—
(१) स्त्री का थोड़ी अवस्था में पुरुष से संयोग हो जाना । ऐसा होने पर गर्भाशय नष्ट और धातु क्षीण हो जाती है । एक विद्वान् की राय है ऐसा होने पर गर्भाशय दग्ध हो जाता है। (श० क०)
इसमें सन्देह नहीं कि थोड़ी अवस्था में संयोग हो जाने से गर्भाशय और गर्भश्राव इतने निर्बल और निकम्मे होजाते हैं कि वे अपना काम नहीं कर सकते । इसकी औषधि हो सकती है, परन्तु इसे लग भग असाध्य ही समझना चाहिये ।
२. यह कि अनेक रोगोंके कारण गर्भाशय का नष्ट हो जाना, इसमें बहुत से रोगों की औषधि हो सकती है और बहुतों की नहीं ।
३. योनि-रोग कि जिससे गर्भाशय नष्ट हो जाता है । इसमें भी कुछ रोगों की औषधि हो सकती है, कुछ की नहीं । जब योनिरोग से गर्भाशय नष्ट हुआ हो, तो योनि और गर्भाशय दोनों की चिकित्सा होनी चाहिये ।
(१२) बलधर्मी—उसको कहते हैं कि जिसको निर्बलताके कारण गर्भ न रहता हो । ऐसी स्त्रियाँ बही होती हैं कि जो अत्यन्त मैथुनप्रिय हैं और जिनके शरीर में रक्त नहीं है । इनकी औषधि हो सकती है, परन्तु बहुत कठिनाई से ।
(१३) शकसयोगिता—उसको कहते हैं कि रजस्वला होने के पहले ही जिसका पुरुष से संयोग हो गया हो । ऐसी स्त्री का गर्भाशय दग्ध होकर सिकुड़ जाता है और फिर गर्भ नहीं रहता । इसी कारण सुधरने लिखा है कि
७६
सन्तति-शास्त्र ।
सोलह वर्ष से पहले पुरुष से संयोग न होना चाहिये । ऐसी दशा में श्रोवधियां प्रायः व्यर्थ होती हैं, परन्तु डाकुर लोग साहस रखते हैं ।
(१४) वामिनी—उसको कहते हैं कि जिसके गर्भाशय में पड़ुचा हुआ वीर्य छू या सात दिनों में बाहर निकल आचे । यह रोग गर्भाशय के विकार से होता है, खास कर उस समय में जब कि गर्भाशय का मुख चौड़ा हो गया हो, अथवा गर्भाशय के दूसरे रोगों से । इसकी श्रोवधि हो सकती है ।
(१५) सूचीमुखी—उसको कहते हैं कि जिसके गर्भाशयका मुख बहुत छोटा हो, जिससे वीर्य भीतर न जा सके । यह रोग जन्म से होता है । इसकी श्रोवधि करना व्यर्थ है ।
(१६) रक्तवावी—उसको कहते हैं कि जिसके हमेशा रक्तगिरा करता हो । ऐसी दशामें गर्भ नहीं रहता । यह कई प्रकार से होता है ।
१. रक्त और पिस्त के विगड़ जाने से ।
२. छोटी अवस्थावाली स्त्रीका पूरे जवान पुरुष के समागमके कारण गर्भाशय और फलवाहिनी नली की किसी रगके फट जानेसे ।
यह रोग कठिनाई से अच्छा हो सकता है परन्तु अच्छे होने पर सन्तान होने की वाबत ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता । होना और न होना दोनों समभव है । श्रोवधि का प्रयोग कठिन ही है ।
(१७) स्त्री—उसको कहते हैं कि जिसके योनिसे सफेद या रगतदार पतला या लुवाबदार पदार्थ निकला करे यह कई कारणों से होता है ।
वन्ध्या रोग ।
७५
१. वात, पित्त और कफके प्रकोपसे ।
२. प्रदर रोगसे ।
३. गर्भाशयके अनेक रोगोंसे ।
इसकी औपधि हो सकती है, परन्तु कव, जबकि केवल साव ही हो। जब गर्भाशयमें मस्ते और गाँठसवन्धी रोग होगा, तब प्रारम्भमें कुछ कठिनाई और रोग बढ़नेमें अत्यन्त कठिनाता होगी। इसे प्रायः असाध्य ही जानना चाहिये।
( १८ ) शृण्वी—इस प्रकारकी वन्ध्याके दो भेद होते हैं।
१. वह कि जिसके गर्भाशयमें वीर्य पहुँचकर जल जावे।
ऐसी दशामें रज निकलनेमें अत्यन्त जलन जान पड़ती है। रज काला और गाढ़ा होता है। गर्मी बहुत मालूम होती है। यह रोग उस समय होता है जब कि गर्भाशयकी गर्मी अत्यन्त बढ़ गई हो। इसकी औपधि हो सकती है।
२. वह कि जब गर्भाशयमें वीर्य सूख जावे। ऐसी दशामें गर्मी अधिक जान पड़ती है। योनि और गर्भाशय सूखे रहते हैं। जलन और गर्मी अधिक होती है। यह भी अत्यन्त गर्मीके बढ़नेसे होता है। इसकी औपधि हो सकती है।
इन प्रकार अटारह तरहकी वन्ध्याओंमें सबको पूर्ण वन्ध्या न समझना चाहिये। जिनका वन्ध्यत्व औपधिसे छूट सकता है, उनके लिये औपधि अवश्य करनी चाहिये। विद्वान् लोग प्रायः उन्हीं स्त्रियोंको वन्ध्या मानते हैं कि जिनके गर्भ उत्पन्न करनेका अवयव ही न हो। इस प्रकार जाँच करके यल्ल करना आवश्यक है।
१८
सन्तति-शास्त्र ।
(१६) मेद-वृद्धि अर्थात् शरीरमें
चरबीका बढ़ना ।
शरीरमें चर्बीके बढ़नेको मेद वृद्धि कहते हैं। यह रोग स्त्रियोंको विशेष रीतिसे होता है, खासकर उनको जो वैठी रहती हैं। और कुछ काम नहीं करतीं या जिन्हें उत्तमोत्तम भोजन मिलता है। वैद्यकका मत है कि दिनोंमें सोनेसे, कफ उत्पन्न करनेवाले चिकने मोटे पदार्थों के सेवन करनेसे, भोजनका रस मधुर होकर मेदको बढ़ाता है। बढ़ती हुई चर्बीका असर शरीरमें हर जगह होता है। इस कारण रसवाही शिराओंका रास्ता बंद हो जाता है। ऐसी दशामें हड्डी, मज्जा और चीन्य पुष्ट न होकर फेंचल चर्बी ही बढ़ती है। अतएव मनुष्य सुकुमार और आलसी होकर सच कामोंमें पीछपहीन हो जाता है।
( श० क० )
स्वर्वास रोग, व्यास, निद्रा, आलस्य, भूख, पसीना और दुर्गंध ये बातें चर्बी बढे हुए मनुष्यमें अवश्य होती हैं। प्रायः देखा गया है कि ऐसे रोगी खाते बहुत हैं। शरीरके सच स्थानों में तो चर्बी बढ़ती ही है, परन्तु पेट, नितम्ब, छाती और पिंड-लियोंमें अधिक, किन्तु ताकत कम हो जाती है। स्त्रियोंमें गर्भाशयका मुँह मोटा पड जाता है और चर्बीसे मिश्रित कोई पदार्थ उस जगह रहता है। चर्बीके कारण योनि संकुचित अर्थात् सक्की पड जाती है ऐसी स्त्रियोंमें स्नान ठीक ठीक नहीं बनता। यही कारण है कि सबसे पहले रजका चिगाड होता है। जब स्त्रुय अच्छी तरह चर्बी बढ़नेमें छा जाती है, तो
16. मेंद-बुद्धि अर्थात् शरीर में चरबी का बढ़ना
मेद-वृद्धि अर्थात् शरीरमें चरबीका बढ़ना ।
७६
रज वन्द हो जाता है । कभी कभी निकल भी आता है । कभी दो दो तीन तीन मास तक नहीं होता । अतएव गर्भ का सन्देह हो जाता है । इसका कारण गर्भाशय के मुखकी संकीर्णता भी है । प्रायः ऐसी दशामें गर्भाशय में रक्त जम भी जाता है, जिस से अनेक रोग उत्पन्न होजाते हैं । गर्भाशय में रज-एकत्र होने और चर्बी के प्रकोप से दूषित होने के कारण रज-जन्तुओं को हानि पहुँचती है । ऐसे स्त्री और पुरुष संयोग नहीं कर सकते । मैथुन में इनका ढम उखड़ जाता है, देह शिथिल हो जाती है, पसीना निकलने लगता है, ब्रह्मराहट् प्रारम्भ हो जाती है, स्वार्स चलने लगता है, व्यास लग आनी है और उठना बैठना कठिन हो जाता है ।
लोग इसको अच्छा समझते हैं कि शरीर मोटा रहे, परन्तु यह बहुत बुरा रोग है । ऐसे स्त्री पुरुष कि जिनका शरीर चर्बी का स्थान हो रहा है, कभी सन्तान उत्पन्न नहीं कर सकते । क्यों कि गर्भाशय चर्बी के विकार से चिंकना होने पर वीर्य ग्रहण नहीं करता और पुरुष के मोटे होने पर इन्द्रिय निश्चित स्थान पर वीर्य नहीं पहुँचा सकती । दोनों में मेद-वृद्धि होनेसे सन्तान नहीं होती, लेकिन उन मोटे स्त्री पुरुषों से सन्तान होती है कि जिनका शरीर रक्त से मोटा हो गया है और रजो-धर्म में विगाड़ और गर्भाशय में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं हुआ है । (रतिशास्त्र)
मोटापन प्रारम्भ होते ही यह निश्चय करना चाहिये कि शरीर रक्त के कारण मोटा हो रहा है या चर्बी से । यदि चर्बी से हो रहा हो, तो ऐसे पदार्थ, जो चर्बी बढ़ाने में सहायक हों, तुरन्त छोड़ देने चाहिये । ऐसी अवस्था में किसी प्रकार का परिश्रम प्रारम्भ करके आराम छोड़ देना परम हितकर है ।
८०
सन्तति-शास्त्र ।
(१७) योनिरोग ।
योनि उस स्थान को कहते हैं कि जहां से वच्चा निकलता है और यही संयोग स्थान है । इसका और गर्भाशयका बहुत बड़ा संबंध है । इसके रोगों से गर्भाशय में और गर्भाशय के रोगोंसे इसमें अनेक रोग उत्पन्न होजाते हैं । योनि कई प्रकार की होती है । इस के विगड़ने के मुख्य चार कारण होते हैं । (१) वुरा भोजन, (२) दूषित रज, (३) वीर्य दोष, (४) दैवका प्रकोप । इनके अनेक भेद हैं । (श० क०)
१—अनेक प्रकार की विगड़ी हुई योनि के भेद ।
( ३० वि० ३७ ३० श्लोक ५ मे २७ तक )
(१) वातल योनि—उस को कहते हैं कि जिसमें वायु पैदा करने वाले आहार-विहार और चेशे से वायु विगड़कर योनिमें मुड़े छेदने की सी पीड़ा और चाँटी चलनेका सा मालम हो । कर्कशता, सुख, आयाम और दूसरे वायु से पैदा होने वाले रोग हों तथा वायु के कारण थोड़ा सा पतला, रूखा, आवाज करता हुआ भागदार रक्त निकला करे ।
(२) पित्तल योनि उसको कहते हैं कि जिस में खटाई, नमक, खार इत्यादि मिले पदार्थों को अधिक खाने से पित्त द्वारा योनिरोग होता है । ऐसी योनिमें दाह, पाक ज्वर-सुक गर्मी से व्यास नीला, पीला और काला खून निकलता है । इसमें मुड़े कीसी अधिक दुर्गन्ध आती है ।
(३) शैलिक योनि—उसको कहते हैं कि जिस में अभिप्यन्दी आहार खाने से कफ बढ़ कर स्त्री की योनिमें कफज रोग उत्पन्न करता है । इसके कारण योनि में शीतलता, चिप-
योनिरोग ।
८६
चिपापन, खुजली, दर्द और पाएडुता होती है और उससे पीला, गिलगिला रक्त निकलता रहता है ।
(४) सन्निपातिकयोनि—उसको कहते हैं कि जिसमें वात, पित्त और कफ पैदा करनेवाले आहारके सेवनसे योनि और गर्भाशयमें भिन्न भिन्न वायु कुपित होकर अपने अपने लक्षण उत्पन्न करें और उन रोगोंके होनेसे दाह, शूल और पीड़ा अधिक हो । योनिसे सफेद और गिलगिला रज निकला करे ।
(५) रक्तपित्तज योनि—उसको कहते हैं कि रक्त पित्त उत्पन्न करनेवाले आहारसे योनि दूषित होकर रक्त अधिक निकलने लगता है और वीर्य ग्रहण करने पर भी सन्तान नहीं होती ।
(६) अरजस्का योनि—उसको कहते हैं कि योनि और गर्भाशयमें रहा हुआ पित्त जब रक्तको बिगाड़ देता है तब रजस्वला होना बन्द हो जाता है और स्त्री अत्यन्त दुर्बल हो जाती है ।
(७) अचरणा योनि—उसको कहते हैं कि जिसमें साफ न रखनेके कारण छोटे छोटे कीड़े पड़ जावें और खुजलीके कारण पुरुष-सयोगकी बहुत इच्छा हो ।
(८) अतिचरणा योनि—उसको कहते हैं जो अति मैथुन करनेके कारण वायु बिगाड़कर योनिमें सूजन, सुख और दर्द उत्पन्न कर देती है ।
(९) प्राक्चरणा योनि—उसको कहते हैं कि थोड़ी अवस्थाकी स्त्रीके साथ सयोग करनेसे स्त्रीकी पीठ, जाँघ, ऊरु और वक्षमें दर्द पैदाकर वायु योनि को दूषित कर देती है । (इसी कारण अत्यन्त कम अवस्थामें संयोग मना किया
६
17. योनि-रोग
८२
सन्ततिशास्त्र ।
गया है, भोलह वर्षसे कम अयस्थाधाली स्त्रीसे संयोग न करना चाहिये ।)
(१०) ऋतुला योनि—उसको कहते हैं जो कफ पैदा करनेवाले अधिक आहारके खाने तथा कै स्वाँसाठिको रोकनेसे दूषित वायु कफको योनिमें पहुँचाकर योनिको दूषित कर देती है। उस समय योनिमें सूर्य गड़ानेके समान दर्द होता है। पीला वा सफेद रंगका स्त्राव होता है या सफेद कफ सरीखा स्त्राव निकलता है।
(११) परिष्कृता योनि—उसको कहते हैं जब पित्तम क्षतिवाली स्त्री संयोगके समय लौक और डकारको रोक लेवे तो पित्तके साथ वायु विगड़कर स्त्रीकी योनि विगड़ जाती है। उस समय योनिसे स्पर्श नहीं किया जाता। दर्दके साथ नीले, पीले रंगका स्त्राव होने लगता है। स्त्रीकी कमर, पीठ और वक्षस्थलमें दर्द और ज्वर होता है।
(१२) स्वावृत्ता योनि—उसको कहते हैं जो अधोवेग अर्थात् नीचेकी हवाको रोकनेसे हो। वायुके कारण योनिका वेग ऊपरको होता है, इससे कफके साथ रज निकलता है।
(१३) कर्णिका योनि—उसको कहते हैं कि छोटी उम्रमें गर्भ रह जानेसे आच्छादित वायु, कफ और रक्तसे मिली हुई योनिमें एक तरहकी कर्णिका उत्पन्न कर देती है। इससे रक्तका रास्ता रुक जाता है।
(१४) युष्मो योनि—उसको कहते हैं कि जब गर्भ स्त्रीके दूषित रक्तसे उत्पन्न होता है। तब वायु सूखेपनके कारण जरा गर्भको बार बार नष्ट कर दिया करती है।
(१५) द्वादशतिनी योनि—उसको कहते हैं कि जिस योनिमें रक्तके
योनिरोग ।
८३
निकलनेपर तुरंत चैन पड़ जावे। रज ऊपर जानेसे इसे उदावर्तिनी योनि कहते हैं।
(१६) अंतर्मुखी योनि—उसको कहते हैं जब खूब भोजन करनेके पीछे स्त्री उलटे और टेढ़े इत्यादि होकर संयोग करे तो अन्दरकी वायु योनिमें आकर योनि मुखको देहा कर देती है। इससे मांस और हड्डियाँमें पीड़ा होती है। ऐसे समयमें स्त्रीके साथ मैथुन नहीं किया जा सकता।
(१७) सूचीमुखी योनि—उसको कहते हैं किमाताके दोषके कारण वायु सूखापन लेकर गर्भकी कन्याके योनिको दूषित करके योनिस्त्राको छोटा कर देती है।
(१८) शुष्का योनि—उसको कहते हैं कि मैथुन समयमें जब स्त्री पाखाना और पेशाबके वेगोंको रोक लेती है तो उसके मल और मूत्रके रुकनेसे योनि सूखी हो जाती है।
(१९) वामिनी योनि—उसको कहते हैं कि गर्भाशयमें पहुँचा हुआ वीर्य दृढ़के साथ या बिना दृढ़के ही छू या सात दिनके अन्दर गर्भाशयसे निकल जाता है।
(२०) पण्डी—उसको कहते हैं कि जिसके जीज-दोषके कारण गर्भस्थ कन्याका गर्भाशय नष्ट हो जावे। उसको पुष्प-समागमकी इच्छा नहीं होती और न छाती निकलती है। ऐसी स्त्री हिजड़ी होती है। इसका इलाज नहीं हो सकता।
(२१) महा योनि—उसको कहते हैं कि दुःख पहुँचानेवाली दूदी चारपाई पर सोकर उलटी रीतिसे संयोग करनेपर वायु बिगड़ कर गर्भाशय और योनि मुखको रोक देती है। इससे योनि अस्वच्छमुखा, दूरयुक्त रूखा और भाग दार रज निकलनेवाली होती है और योनिमुखका मांस उंचा
८४
सन्ततिशास्त्र ।
उठ जाता है। ऐसी स्त्रीके जोड़ और पेड़में शूल होने लगता है।
इन इकीस प्रकारके योनि-रोगों के उपद्रवोंसे योनि और्यको ग्रहण नहीं करती और न ऐसी स्त्रीको गर्भ ही रहता है, अनेक प्रकारके रोग, गुल्म, अर्श और प्रदर इत्यादि उत्पन्न होते हैं। इन रोगोंमें हमेशा स्त्रीको वायुका दोष होता है। इन इकीस प्रकारके योनि-रोगोंमें वातज, पित्तज कफज और त्रिदोषज इनमें मामूली दोष होता है। रक्त पित्तज और त्ररजस्का पित्तजन्य है, परिप्लुता और वामिनी वातपित्तज त्मक, कर्णिनी और उपप्लुता वात-कफज और वाकी सब वातज हैं। वातादि दोष सारे रोगोंमें अपने अपने लक्षण प्रकाश करके जोड़ों उत्पन्न करते हैं।
२. बाहरी योनिकी मामूली सूजन।
इसके कई कारण हैं।
(५७० क०)
१. वह कारण जब कि वह रोग रुदकिशोरों में हो।
१. सफाईका न होना और रोगोंकी छूत पहुँचनेसे।
२. चोट लगनेसे।
२ वह कारण जब कि वह रोग जवान स्त्रियोंमें हो।
१. अतिमैथुन और सफाईका न होना।
२. प्रदर और बाहरी चोट लगने से।
३. वदद्वार चीज या छूतदार रोगोंकी छूतसे।
इस रोगमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं।
१. पीड़ा—जहाँ सूजन हो।
२. कमर, पैड़ और जाँघमें दर्द।
३. पेशाब जलनेके साथ होना।
४. मैथुनमें अत्यन्त कष्ट होता है।
योनिरोग ।
८५
५. कभी कभी जब योनिसे घर्दवृ आती है तब सूजन से मवाद पड़ जानेका सन्देह होता है ।
पीड़ाके अनुसार सूजनका अनुमान करना चाहिये । जैसी कम ज्यादा सूजन होती है कष्ट उतना ही कम ज्यादा होता है । घर्दवृ रोगमें गर्भ नहीं रहता ।
३. योनीकी सङ्गन ।
इसके अनेक कारण होते हैं ।
१. सूजनके पक जानेपर जब छूत या गन्द्गीका असर पहुंच जावे ।
२. शीतला रोगके पीछे जब कि घाव हो जावे और किसी तरह की गन्द्गी पहुँचे, या गरमी संजाकके अत्यन्त प्रकोपसे ।
३. बालके उखड़ जानेसे जब किसी तरह की गन्द्गी पहुँचे ।
४. योनिके घावमें पानी या श्वेत प्रदरके चिकने पदार्थोंके लगनेसे ।
इसमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१. जलन और दर्द ।
२. योनि मुखपर यदि सङ्गन है तो सामनेसे साफ़ दिख-लाई पड़ेगी । यदि अन्दर है तो योनिके ओठोंको उलट कर देखनेसे साफ़ पता चलेगा ।
३. कुछ ज्वर अवश्य आ जाता है ।
यह रोग लड़कियोंमें पाया जाता है और जवान स्त्रियों को भी होता है ।
८६
सन्तति शास्त्र ।
योनिकन्द ।
इसके अनेक कारण हैं। (रतिशास्त्र)
१. अतिमैथुन और रजका विगाड ।
२. योनिमें नाखून लगाने, घाव और जखम हो जाने से ।
३. वायुके विगड जानेसे ।
४. पीप पड जाने और रक्तके दूषित होनेसे ।
इसमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१. योनिमें पीडा और भारीपन मालूम होना ।
२. चलने, फिरने और उठने बैठनेमें पीडा होना ।
३. यदि योनिकन्द रुखा, खुरखुरा और फटा हुआ मालूम हो तो वातजन्य समभन्ना चाहिये ।
४. यदि नीले फूलके समान हो और खजली आती हो तो कफजन्य समभन्ना चाहिये ।
५. यदि उसमें वह और काला रंग हो और ज्वर आवे तो पित्तज समभन्ना चाहिये ।
६. यदि वात, पित्त और कफ तीनोंके लक्षण मिलें तो त्रिदोषज समभन्ना चाहिये ।
यह एक विचित्र रोग है । इसमें योनिके अन्दर बड़हल के फल के समान एक गाँठ होती है । इसीको योनिकन्द कहते हैं ।
५. योनिका घाव ।
इसके कई कारण हैं ।
(श क )
१. रज और योनिके विकारसे ।
२. उपदंश और गर्भाशयके अनेक क्षतदार रोगोंसे ।
३. रक्तविकार और सूजनके उपद्रवोंसे ।
इसमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
योतिरोग ।
८७
- १. सूर्य चुभोनेके समान पीड़ा होती है ।
- २. घाव जल्दी बढ़ता है ।
- ३. घाव उभरा नहीं होता, बराबर रहता है ।
- ४. निर्बलता बढ़ जाती है और शरीर दुर्बल होता चला जाता है ।
५. रक्ता बहाव बराबर जारी रहता है । यह एक बड़ा कठिन रोग है । रक्तमें बड़ी बढ़त आती है । पेशा जल्म बढ़ा और दो तरहसे होता है । पहले एक दाना पड़ता है और वह फूटकर फैलने लगता है । दूसरा इस तरह होता है कि एक गाँठ सरीखी पड़कर पक जाती है और बाव फैलता चला जाता है । प्रायः काले रंगकी अग्नेड खियोंमें, जिनकी अवस्था ४० वर्षसे कुछ कमवेश हो, यह रोग अधिक होता है ।
६. योनिभ्रंश ।
इसके कई कारण हैं ।
(१० क्र०) ।
- १. गर्भाशयके आगे दल जानेसे ।
- २. कूदने, दौड़ने और ऊँचे नीचे चढ़नेसे ।
- ३. मुख या पीठके बल गिर पड़नेसे ।
- ४. गर्भाशयके दल जानेके अनेक कारणोंसे । (इस विषयमें पहले लिख चुके हैं ।)
इस रोगमें अनेक लक्षण प्रकट होते हैं ।
- १. मैथुनमें अत्यन्त कष्ट ।
- २. लसदार पतला पदार्थ योनिसे गिरना ।
- ३. पेशाब, पाखानेमें कष्ट होता है ।
- ४. आगे वजन मालूम होता है ।
- ५. पैड़में मरोडके समान दर्द होता है ।
८८
सन्तति-शास्त्र ।
योनि दो तरहसे भ्रंश होती है। आगे और पीछे। जब योनि आगेकी ओर उतरती है तब उसके साथ मुत्राशय भी उतर जाता है और साथ ही साथ धातु जाने लगती है। जब योनिके पीछेका भाग उतरता है तब उसके साथ गुदाका कुछ भाग भी उतर जाता है। यह दशा कठिन है।
७. योनिकी गहरी सूजन।
इसके अनेक कारण हैं। ( श० क० )
१. मूत्रके रास्तेकी सूजनसे।
२. श्रन्दर घाव हो जाने से।
३. सर्दी लगने और जहरीले जन्तुके काटनेसे।
४. योनि साफ न रहने और आस पासमें सूजन होनेसे।
इस रोगमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं।
१. खाजका होना और जलन मालूम होना।
२. पेशाब होते समय अत्यन्त कष्ट होना और चिकने पदार्थका गिरना।
३. मैथुनमें पीड़ा और कुछ ज्वरका रहना।
इस प्रकारकी गहरी सूजन दूर तक होती है। जब कभी गरमी सूजकके कारण छूत पहुँचती है तो पाक भी हो जाता है। इसमें उमरका नियम नहीं। हर उमरमें यह रोग होता है; परन्तु खासकर उन स्त्रियोंको कि जिनके कई बच्चे हो चुके हों, या जो अत्यन्त निर्बल हों।
८. योनिकी खुजली।
इसके अनेक कारण होते हैं। ( श० क० )
१. मसानेकी खुजलीकी छूतसे।
२. बाहरसे अनेक प्रकारकी छूत पहुँचनेसे।
योनिरोग ।
८९
३. रक्तके दूषित हो जानेसे ।
४. योनिमें दांतोंके पड़ जानेसे ।
५. योनिकी गन्धगी और उपर्दशके विकारसे ।
६. ऋतुधर्मके विगाड़से ।
७. प्रेन्दर और मूत्राशयके शोथसे ।
८. योनिके भीतर और योनि-मुखके शोथसे ।
९. योनिके मुखसे छोटे छोटे कीड़ोंके पैदा हो जानेसे ।
१०. योनिकी गन्धगीसे जब कि अन्दर सफाई न की जावे ।
११. अन्दर मैल और पसीनेके जम जानेसे ।
इस रोगमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१. पहले खाज कम होती है । ज्यों ज्यों खुजलाया जाता है, जलन अधिक होती है ।
२. खाजकी जलन सहन नहीं होती ।
३. योनिका रस्ता कुछ सकरा पड़ जाता है ।
४. रोग बढ़नेपर बढ़ बढ़ता आती है ।
पेसी खुजली कफके विगाड़से होती है । यह योनिके अन्दर हर जगह पर हो सकती है । जरा जरासे ढोढ़े भी पड़ जाते हैं ।
६. योनिकी फुंसियाँ ।
इसके कई कारण हैं । ( १० को )
१. रज विकार और छूतका बाहर या भीतरसे पहुँचना ।
२. योनिकी गन्धगी और रक्त निकलनेसे ।
इस रोगमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं ।
१. जलन, दर्द कुछ सज़नका होना और मैथुनन हो सकता ।
२. ज्वर और खाजका आना, उठने बैठनेमें कष्ट ।
यह रोग योनिके हर स्थानपर हो सकता है । रोग बढ़नेपर योनिके छूनमें भी अधिक पीड़ा होती है ।