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संतति शास्त्र

Santati Shastra

by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव

Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)

Devanagarihipublished302 pages
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सन्तति-शास्त्र ।

और गौरीमें वीर्य गिरनेसे कन्या और पुत्र उत्पन्न होते हैं । भावमिश्र जहाँ इस प्रकारणको अपने ग्रन्थ भाव-प्रकाशमें लिखते हैं, वहाँ यों लिखा है कि “ स्त्रियों के काम मन्दिरके मुखमें समीरणा, चन्द्रमसी और गौरी तीन नाडियाँ होती हैं । काममन्दिर क्या है ? इस विषयमें एक विद्वानकी राय है कि काममन्दिर गर्भाशयको कहते हैं । (रतिशास्त्र )

अब यह सिद्ध हुआ कि गर्भाशयके मुखमें तीन नाडियाँ होती हैं । इतमें समीरणा वह भाग है जो गर्भाशयके मुखके बीचमें होता है । इस स्थानपर वीर्य गिरनेसे बाहर निकल आता है । चन्द्रमसी गर्भाशयकी बाई ओर है । इस रास्तेसे वीर्य जाकर स्त्रीके वार्प अण्डके निकले हुए रजसे मिलता है । इस मार्गसे गया हुआ वीर्य कन्या उत्पन्न करता है । इसी प्रकार गौरी गर्भाशयके दहिनी ओर है, इस रास्तेसे वीर्य जाकर स्त्रीके दहिने अण्डके निकले हुए रजसे मिलता है, इस मार्गसे गया हुआ वीर्य पुत्र उत्पन्न करता है । गर्भाशयके दहिने वार्प दो अण्ड होते हैं । इन्हीं अण्डोंसे गर्भाशयमें रज पहुँचता है । इधरसे चन्द्रमसी रास्तेसे बाई ओर होकर वीर्य पहुँचता है और वार्प अण्डके निकले रजसे मिलकर कन्या उत्पन्न करता है । जब वीर्य गर्भाशयके दहिने ओर गौरीके रास्तेमें पहुँचता है तब दहिने अण्डके रजसे मिलकर पुत्र उत्पन्न करता है । अतएव यह सिद्धान्त हमारे माने हुए मतसे पूरा पूरा मिलता है ।

६. एक डाकूका मन है कि शत्रुदर्शनमें ७-८-१० दिन बाद सयोग करनेसे पुत्र और ज्ञान करके दूसरे तीसरे दिनोंके गर्भ पड़नेसे कन्या उत्पन्न होती है । इसका कारण

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कन्या या पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके अधीन है। १४०

यह कहा जाता है कि श्रीराममें स्त्रीको संयोगकी बहुत इच्छा रहती है, अतएव कन्या और ७-८-१० दिनोंके बाद संयोग करनेसे पुत्र होता है। कारण यह कि उस समय स्त्रीको संयोगकी विशेष इच्छा नहीं रहती। यह सिद्धान्त निर्मूल है। क्योंकि बहुतसे बच्चे ऐसे मौजूद हैं कि जिनका गर्भाधान इस मनुष्यके विरुद्ध हुआ है। मेरे एक मित्रके यहाँ स्नानके दूसरे दिन अर्थात् छठे दिनोंके गर्भाधानसे पुत्र और स्नानसे ग्यारह दिन बादके गर्भाधानसे कन्या उत्पन्न हुई। अतएव ऐसे सिद्धान्त पर विश्वास नहीं किया जा सकता। हमारा माना हुआ मत इसके विरुद्ध है और वही ठीक है।

हमारे पाठकोंने इस विषयमें अनेक भेद देखे हैं, परन्तु प्रायः जितने मत हैं उन सबका सिद्धान्त यही है कि पुरुषके दहिने अण्डसे निकला हुआ वीर्य जब स्त्रीके दहिने अण्डसे निकले रजके साथ मिलता है, तो पुत्र और जब स्त्रीके बाएँ अण्डसे निकला रज पुरुषके बाएँ अण्डसे निकले वीर्यके साथ मिलता है, तो कन्या उत्पन्न होती है।

हम इस बातको पहले कह आये हैं कि कन्या वा पुत्र पैदा करना मनुष्यके आधीन है, इस लिये यह बतलाना आवश्यक है कि स्त्री वा पुरुष अपने अण्डोंसे रज-वीर्य कैसे निकाल सकते हैं, क्योंकि जबतक यह न मालूम होगा उस समय तक यह बात नहीं कही जा सकती कि कन्या या पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके आधीन है।

यह प्रकृतिका नियम है कि जिस समय रज-वीर्य निकलने लगता है उस समय अण्डकोष कुछ ऊपरको चढ़ जाते हैं।

28. संयोग-विधि

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संनतति-शास्त्र ।

स्त्रियोंमें ढके होनेके कारण दिखलाई नहीं देते, परंतु पुरुषोंमें ऊपर चढ़ते साफ दिखलाई पड़ते हैं। इतना ही नहीं, हर समय स्त्री या पुरुषोंका एक अंड ऊपरको चढ़ा रहताहै और उस ऊपर चढ़े हुए अण्डसे ही रज-वीर्य निकल पड़ता है।

अब प्रश्न यह होता है कि अण्ड ऊपरको चढ़ते कैसे हैं? इस विषयमें यह ईश्वरीय नियम है कि दहिनी या बाई जिस ओरकी नाकसे श्वास निकलती हो उसी ओरका अण्ड ऊपरको चढ़ जायगा। अब यहाँपर यह शंका होती है कि दहिनी या बाई नाकसे श्वासका निकलना अपने अधीन है या नहीं? हाँ यह भी हमारे हाथमें है। जब चाहें दहिनी नाकसे श्वास निकाले वा जब चाहें बाईसे। इसमें कुछ किया करनी पड़ती है, यह यह है कि—बाई करवट लेटने से दहिने नाकसे और दहिनी करवट लेटनेसे बाई नाकसे श्वास निकलने लगती है और किसी तरहकी कोई बाधा नहीं होती। (रति-शास्त्र)

पाठकोंको कन्या और पुत्र पैदा करनेके सारे हाल मालूम हो चुके हैं। इन सबका खुलासा यह है कि जब पुत्र पैदा करनेकी इच्छा हो तो रजस्वला होनेके दिनोंसे ४-६-८-१०-१२-१४ और १६ वीं रात्रिको और जब कन्या उत्पन्न करनी हो तो रजस्वला होने से ५-७-९-११-१३ और १५ वीं रात्रिको संयोग करना चाहिये।

दोनोंके दहिने नाकसे श्वास निकलनी चाहिये। इससे दोनों स्त्री और पुरुषका दहिना अण्ड ऊपरको चढ़ जायगा और इसीसे रज वीर्य निकलकर पुरुषके दहिने अंगका वीर्य लीके दहिने अंगके रजसे मिलकर पुत्र उत्पन्न करेगा। इसी भाँति जब कन्या उत्पन्न करनी हो तब स्त्री और पुरुष दोनोंके बाएँ नाकसे श्वास निकलनी चाहिये। इससे

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संयोग-विधि ।

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दोनों स्त्री और पुरुष का वार्या अरुड ऊपरको चढ़ जायगा और उसीसे रज वीर्य निकलकर स्त्रीके बाएँ अरुडसे निकला रज पुरुषके बाएँ अरुडके निकले वीर्यसे मिलकर कन्या उत्पन्न करेगा परन्तु यह विचार रहे कि यह क्रिया पुत्र के लिये रजो रजोधर्म से ४-६-८-१०-१२-१४ और १६ वीं रात्रि और कन्याके लिये रजोधर्मसे ५-७-९-११-१३ और १५वीं रात्रिसँ कीजावे । इन क्रियाओंसे हम अपनी इच्छाके अनुसार मन चाही कन्या और पुत्र उत्पन्न कर सकते हैं, परन्तु यह तभी भला जब स्त्री पुरुष दोनोंमें अरुडे अच्छी तरह हों और किसी प्रकार का रोग न हो ।

गर्भाशय और योनि विकारयुक्त न हो, पुरुषोंमें वीर्य दोष इत्यादि न हो, ऐसा होने पर इसी रीतिके अनुसार कन्या और पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके आश्रीन है ।

( २८ ) संयोग-विधि

स्त्री और पुरुषके संयोग होनेपर ही गर्भाधान हो जाता है लोग इसको बहुत मामूली बात समझते हैं, पर यह बहुत बड़े गौरव का विषय है । इस काम में स्त्री और पुरुषों की कितनी बड़ी जिम्मेदारी होती है, पर वे जरा भी विचार नहीं करते । यह कार्य बड़ी प्रसन्नता और उत्साहके साथ होना चाहिये । परन्तु यह उसी समय हो सकता है जब कि दोनोंमें प्रेम हो । प्रेमका प्रवाह जिन स्त्री-पुरुषोंमें अथाह होकर बहता है, वेही योग्य सन्तान उत्पन्न कर सकते हैं ।

दोनोंका शृंगार भी जरूरी है । जिस प्रकार हवन करनेके लिये शीकी जरूरत होती है उसी प्रकार गर्भाधानमें एक

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सन्तति-शास्त्र ।

दूसरेके चित्तको अपनी और खाँचने के लिए २७ गारकी जहरत है । (रतिशास्त्र)

कैसी ही कुरुपा स्त्री क्यों न हो, २७ गारयुक्ता होनेपर वह भली मालूम होती है । इसी प्रकार रूपवती विना २७ गारके अपना विकास नहीं फैला सकती । इसका तात्पर्य यह है कि २७ गार एकमात्र चित्त वशीभूत करके कामोद्दीपन करता और संयोग शक्तिको बढ़ाता है । (रतिशास्त्र)

पुरुष ही नहीं, स्त्रियाँ भी २७ गारयुक्त पुरुषको देख कर मोहित हो जाती हैं । अतएव दोनोंका २७ गार गर्भाधानके समय जरूरी है ।

कितने शोककी बात है कि आज हम अपने नये जवानों-को प्रकृतिके विरुद्ध सीधे रास्ते को छोड़ कर निकम्मे मार्गका अवलम्ब करते हुए देखते हैं ।

लोग यह समझते हैं कि चाहे जिस प्रकारसे संयोग करलें किसी प्रकारसे बाधा नहीं है, क्यों किहर तरहके संयोग ही से सन्तान तो होती ही है । यदि ऐसा न होता तो कोकशास्त्र से चौरासी प्रकारके आसनों का विधान क्यों किया जाता ? इस विषयमें वैद्यकका मत है कि—

१. कुबडी होकर संयोग करानेसे वायु प्रवल होकर योनि बाधा को प्रकट करती है । यदि दहिने करवट होकर संयोग हो, तो कफ गिर कर गर्भाशयको ढक लेता है । बाईं करवट होकर संयोग होने से पित्त गर्भके रक्त और धीर्य को नष्ट कर देता है । इस कारण चित्त करके संयोग करना उत्तम है, क्यों कि चित्त होकर संयोग करने से बात, पित्त और कफ सब अपने अपने

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गर्भ कैसे रहता है ?

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स्थानपर ठीक रीतिसे रहते हैं । किसी प्रकारका विनाङ्ग उत्पन्न नहीं होता । ( ३० अ० अ० ८ श्लो० ७ से ८ )

(२) बड़े होकर संयोग करनेसे शुक्राश्रमी रोग हो जाता है । ( भा० प्र० )

(३) सिवाय चित्त होकर संयोग करनेके जितने तरह से किया जाता है, सबमें वात पित्त और कफ उत्पन्न होकर वाधा पहुँचती है । ( अ० क० )

शरीरका संचालन एकमात्र वात, पित्त और कफसे ही होता है । इनमेंसे यदि एक भी विनाङ्ग जाय तो शरीरका दर्जा किनी तरह नहीं चल सकता । ऐसी अनुचित क्रियाओंसे सहज हीमें अनेकों रोग खड़े हो जाने हैं जिनसे गर्भाशय नष्ट हो जाता है । अतएव सर्वसम्भूतिये यही निश्चय होता है कि स्त्रीको चित्त होकर संयोग करना अति उत्तम है और किसी दूसरी रीतिसे कभी संयोग न होना चाहिये ।

(२६) गर्भ कैसे रहता है ?

रज और वीर्य ही गर्भके कारण हैं। रजस्वला होनेसे सौलह दिनतक गर्भाशयका मुत्र खुला रहता है । यही गर्भ-धारण होनेका समय है । ( रतिगान्ध )

संयोग समयमें सहवासकी गरमीसे वीर्य पतला होकर वायुसे लिंग द्वारा गर्भाशयकी गरदनपर, जो सुराहीदार योनिके सिरेसे गर्भाशयतक होती है, पहुँचता है और रजसे मिलकर गर्भ बनाता है । इस विषयमें कड़े मत हैं ।

१; ढाकटोंका मत ।

१. इसके अनुसार यह माना गया है कि आगेकी ओरसे वीर्यके साथ जो कोई उसमें होते हैं, गर्भाशयकी

29. गर्भ कैसे रहता है ?

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सन्तति-शास्त्र ।

गरदनके उस सिरेपर पहुँचते हैं जो गर्भाशयसे मिली रहती है । और उधरसे रजके साथ कीड़े जो कि उसमें होते हैं, अरुडवाही नलियोंके छेदोंसे गर्भाशयमें पहुँचते हैं । जब ये दोनों रज वीर्यके कीड़े आपसमें गर्भाशयसे मिली हुई गरदनके सिरेपर पहुँच कर मिलते हैं, तब वीर्यका कीड़ा जो रजके कीड़ेसे छोटा होता है, तुरन्त रजके कीड़ेमें घुस जाता है; घुसते ही उसकी पूँछ कट जाती है और अगला भाग जिसको सर कहते हैं वह रजके कीड़ेमें मिल जाता है तथा गर्भाशयकी गरदनके सिरेसे दोनों कीड़ोंका मिला हुआ पदार्थ गर्भाशयमें पहुँचकर बढता है । यही वध्मेका पहिला स्वरूप है । परन्तु सबसे बड़ी बात इसमें यह है कि वीर्यका कीड़ा रजके कीड़ेमें कुदकर घुसता है । उसलिये वीर्यके कीड़ेमें चंचलता और कुदनेकी शक्ति जरूर होनी चाहिये । यदि ऐसा न हो, तो गर्भास्थापित होनेमें बाधा पड़ती है ।

२; वैयकका मत ।

१. संयोग होनेसे शरीरमें गरमी उत्पन्न होती है । इससे वायु उत्कट होकर गरमीके संबंधसे पुरुषका वीर्य निकलता है और योनिमें पहुँचकर रजसे मिल जाता है । इन दोनोंसे मिला हुआ पदार्थ गर्भाशयमें पहुँचता है । और वायुसे तत्काल घेरला किया हुआ जीवात्मा गर्भाशयमें प्रवेश होकर स्थित होता है । (सू० श० ३० ३ श्लो० २ व ३)

२. रज और वीर्य जैसे ही गर्भाशयमें मिलते हैं उसी समय जीवात्माका संयोग होकर गर्भ रहता है । (श० का०)

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गर्भ स्थित होनेके तात्कालिक लक्षण ।

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३. स्त्री और पुरुष जब दोनों एक ही साथ स्वलित होते हैं, तब उधरसे रज आता है और इधरसे वीर्य पहुंचता है और दोनों गर्भाशयमें मिलकर गर्भ बनाते हैं । यदि स्त्री और पुरुष दोनों एक साथ स्वलित न हों, तो गर्भ नहीं बनता । (रति शास्त्र)

डाक्टरों मतसे यह बात सिद्ध होती है कि रज और वीर्य-के कड़े दोनों आपसमें मिलकर गर्भ उत्पन्न करते हैं । वैद्यक-का मत यह कहता है कि रजवीर्यके मिलनेपर जब जीवात्मा इनमें प्रवेश करता है, तब गर्भ रहता है । जीवात्माके प्रवेश होनेसे सतलव यह है कि रजवीर्यसे मिला हुआ पदार्थ सजीव हो जाता है डाक्टरों रीतिसे कौड़ों द्वारा और वैदिक रीतिसे रज-वीर्य मिले हुए पदार्थसे जीवात्मा द्वारा गर्भका स्थित होना सिद्ध है ।

(३०) गर्भ स्थित होनेके तात्कालिक लक्षण ।

प्रायः यह सन्देह ही रहा करता है कि अमुक समयके गर्भाधानसे गर्भ स्थित हुआ या नहीं ? इस विषयमें आचार्यों-के अनेक मत हैं ।

१. वैद्यक का मत ।

१. तात्काल गर्भधारण करनेवाली स्त्रीको थकावट, ग्लानि, प्यास साथलौका थक जाना, योनिका फरकना, और रज-वीर्यका बाहर न निकलना इत्यादि लक्षण होते हैं । (सु० श० अ० १२ श्लो० १२)

२. गर्भ धारण समयमें स्त्रीकी चेष्टा अत्यन्त मनोहर हो जाती है और लावण्यता अधिक बढ़ जाती है । (श० क०)

30. गर्भ स्थिति होनेका तत्कालिक लक्षण

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सन्तति-शास्त्र ।

२. विद्वानोंकी राय ।

१. जब गर्भ धारण होता है तब ज्योंही रज-वीर्य मिलकर गर्भाशयमें पहुँचता है त्यों ही खींची नाभिके नीचे थोडासा मीठा मीठा दर्द होता है । (रति शास्त्र )

१. गर्भ धारण समयमें वीर्य योनिसे बाहर नहीं निकलता और गर्भ धारण होते ही संयोगकी चाह जाती रहती है । (चक्रपाणि )

जब ऐसे लक्षण हों, तो समझ लेना चाहिये कि गर्भ धारण हो गया । ये लक्षण गर्भ धारण होनेके साथ ही साथ मालूम होते हैं ।

(३१) जीव गर्भमें कब आता है ?

इस विषयमें कि गर्भ समयमें वचोमें जीव कब आता है अनेक विवाद हैं । कोई गर्भ धारण होनेके साथ ही, कोई चार मास के बाद, कोई चैतन्यता उत्पन्न होनेपर जीवका गर्भमें आना मानते हैं । इसी प्रकार अनेक मत हैं, परन्तु यदि यह बात मान ली जाय कि गर्भ धारण होनेके साथ ही साथ जीव नहीं आता, तो यहाँ एक बहुत बड़ी शंका यह होगी कि गर्भ फिर बढ़ता कैसे है ? क्योंकि निर्जीव पदार्थका वृद्धि-क्रम नहीं होता इसलिये यह बात माननी पड़ेगी कि सजीव गर्भाधान होता है या गर्भाधान होनेके साथ ही साथ गर्भ सजीव हो जाता है ।

१. वैदिक मत

१. गर्भाधानसे लेकर दस मास अर्थात् पैदा होनेतक गर्भ सजीव रहता है और सजीव ही उत्पन्न होता है ।

(क० म० ५ सू० ७८ म० ९ )

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जीव गर्भमे कब आता है ?

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२. धर्मशास्त्रका मत ।

१. स्त्री और पुरुषके संयोगसे पुरुषका शुद्ध वीर्य योनिमें जाकर स्त्रीके शुद्ध रजसे मिलता है। उसी समय भूतात्मा, आप ही आकाश वायु जल पृथिवी और अग्नि अर्थात् पंच महाभूतोंके साथ गर्भाशयमें स्थित होता है ।

( या० य० ध० प्र० ७२ )

३. वैद्यकका मत ।

१. जब गर्भाशयमें रज-वीर्य और जीव इन तीनोंका संयोग ( मेल ) हो जाता है, तो उसको गर्भ कहते हैं; अर्थात् रज-वीर्य और जीव इनके मिलनेपर ही गर्भ स्थित होता है । ( च० श० अ० ४ श्लो० ३ )

२. जिस समय गर्भाशयमें रजवीर्यका मिश्रण होता है । उसी समय जीव उनके साथ उसमें प्रवेश करता है । जिस प्रकार सूर्यकी किरण और मणिके संयोगसे अग्नि प्रकट होती है, इसी प्रकार रज-वीर्यके मिलनेसे जीव प्रगट होता है । ( भा० प्र० ग० प्र० ३२ ३३ )

६. डाक्टरोंका मत ।

१. रज-वीर्यके कीड़े आपसमें मिलकर गर्भ उत्पन्न करते हैं, बिना इन जीवोंके मिले गर्भ नहीं रहता अर्थात् प्रारम्भसे ही गर्भ सजीव होता है ।

धर्मशास्त्र और वैद्यकसे यह बात मालूम होती है कि जब गर्भाशयमें रज-वीर्य मिलता है उस समय उनमें जीव आ जाता है । वेदसे भी यही स्पष्ट है कि गर्भ प्रारम्भ से ही सजीव होता है । डाकुरी मतका भी अभिप्राय यही है कि गर्भ सजीव स्थित होता है । अतएव सर्वसम्मतसे यह बात निश्चय है कि

31. गर्भमें जीव कवतक आता है ?

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सन्ततिशास्त्र ।

रज-चीर्थ्य मिलते ही जीवका संयोग मिले हुए पदार्थमें हो जाता है या यों कहो कि गर्भ सजीव ही स्थित होता है ।

(३२) प्रेम द्वारा उत्तम सन्तानकी उत्पत्ति ।

प्रेम ईश्वरका दिया हुआ एक उत्तम पदार्थ है । संसारी जीव प्रेमके फन्देमें फंसे दिखलाई पड़ते हैं, कारण यह है कि ईश्वरकी स्मृतिही प्रेममय है । अतएव विना प्रेमके निवाँह होता कठिन है । प्रेम मनसे उत्पन्न होता है, इसलिये मनको जो वस्तु मिय होती है उसीसे प्रेम होता है । सारे सम्बन्ध प्रेमके सामने भूटे हैं । इसलिये प्रेमका सम्बन्ध सबसे बलिष्ठ है । हर एक मनुष्य हर एक बातसे प्रेम नहीं रखता । एक जिससे प्रेम रखता है दूसरा उसको बुरा बतलाता है । इसका कारण मन ही है । प्रेम दो तरफ़का होता है ।

(१) वह जो थोड़ी देर तक रहे । इसको 'चर' प्रेम कहते हैं ।

(२) वह जो बराबर बना रहता है और बढ़ता जाता है जिसको 'अखण्ड' या 'अटल' प्रेम कहते हैं । किसी वस्तु-को देखकर प्रसन्न हो जाना और फिर उसकी परवाह न रखना या उससे अच्छी वस्तु पाकर भूल जाना, ऐसे प्रेमका सम्बन्ध हृदयसे अधिक और मस्तकसे कम रहता है । इसीको चर प्रेम कहते हैं । अखण्ड या अटल प्रेम वह है जो सौते, जागते एक समान रहता है, कभी कम नहीं होता, किन्तु बढ़ता ही जाता है । अच्छीसे अच्छी वस्तु प्रेमीके हृदयसे प्रेमको अपनी ओर नहीं खींच सकती । ऐसे प्रेमका सम्बन्ध मस्तकसे अधिक और हृदयसे कम होता है । चर प्रेममें स्वार्थ होता है, परन्तु अटल प्रेममें स्वार्थ नहीं होता । जहाँ सच्चा प्रेम है वहाँ स्वार्थ कहाँ ? प्रेम भी एक प्रकारका नहीं होता । प्रेमके अनेक प्रकार

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प्रेम द्वारा उत्तम सन्तानकी उत्पत्ति ।

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है। जब हम प्रेमको मनकी शक्ति मानेंगे तो इसपर भी विचार करना होगा कि मनुष्यको हर बातका प्रेमी होना चाहिये। क्योंकि मन प्रत्येक बात पर जाता है। इसमें सन्देह नहीं कि मन हर एक बातोंपर अवश्य जाता है, परन्तु वह सबका प्रेमी नहीं बनता। उसको अपनी इच्छाके अनुसार खास खास बातोंका प्रेम होना पड़ता है, जैसे माताका प्रेमी, जातिका प्रेमी, देशका प्रेमी, ईश्वरका प्रेमी और स्त्रीका प्रेमी इत्यादि।

शरीर-रचना-शास्त्रसे पता चलता है कि प्रेमका स्थान, सर है। जितने तरहके प्रेम हैं सबका स्थान सरमें अलग अलग बना हुआ है। जिसका जितना जिस प्रकारके प्रेमका स्थान बली है, मनुष्य उसका उतना ही प्रेम होता है। सरमें प्रेमके जितने स्थान हैं सब बली क्यों नहीं होते? इस विषयमें वैद्यक-का मत है कि गर्भाधान समयमें जिस बातसे माता पिता दोनोंको प्रेम होता है, सन्तान उस बातकी श्रद्धल प्रेमी हो जाती है। जिस बातमें उस समय केवल माता पिताको प्रेम होता है, सन्तानका अधूरा प्रेम उस बातसे रहता है। जिस बातसे उस समय मातापिता दोनोंका प्रेम नहीं होता, सन्तान उसकी कट्टर विरोधी हो जाती है। जिस बातसे उस समय केवल माता या पिताको प्रेम नहीं होता, सन्तानको उसमें विशेष रुचि नहीं होती। (रतिशास्त्र)

इससे स्पष्ट है कि गर्भाधान समयमें मातापिताका प्रेम जिस बातमें जितना होता है, वृत्तके सरमें उस प्रेमका स्थान उतना ही प्रबल और निर्बल होता है। इस कारण हर मनुष्य हर बातका प्रेमी नहीं होता।

एक बात सारे मनुष्य क्या, जीवमात्रमें दिखलाई पड़ती है कि सब लोग स्त्री-जातिके प्रेमी होते हैं और स्त्री-जाति पुरुष

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सन्तति-शास्त्र ।

जातिकी प्रेमी होती है। इसका कारण यह है कि गर्भाधान समयमें स्त्री जातिको पुरुष जाति और पुरुष जातिको स्त्री जातिसे प्रेम अवश्य होता है और इसी प्रेमके कारण सन्तानमें पैसे प्रेमका स्थान प्रबल हो जाता है। इसलिये हर स्त्री जाति पुरुष जाति और हर पुरुष जाति स्त्री जातिसे प्रेम करती है और दोनों एक दूसरेके प्रेमी होते हैं। सच्चा प्रेम विजलीसे भी अधिक वलवान् है। जब स्त्री-पुरुष एक दूसरेके प्रेमी होते हैं, तो उनमें कुछ प्रेमकी गहराई मालूम होती है। दोनोंमें एक दूसरेके चित्तको खींचनेकी शक्ति इतनी प्रबल होती है कि दोनोंकी आत्मा एक हो जाती है, इसीलिये 'दो शरीर और एक प्राणकी' कहावत प्रसिद्ध है।

प्रेमसे शरीरमें एक प्रकारकी शक्ति पैदा होती है। जिस प्रकार विजलीके नारको हाथमें लेनेसे उसकी शक्तिका कुछ ज्ञान होता है, इसी प्रकार प्रेमके फलसे जकड़े हुए प्रेमियोंके शरीरमें प्रेमकी शक्तिका प्रवाह चिन्तवन मावसे ही उमड़ पड़ता है। एक दूसरेकी प्रेममर्तिको देखते ही शरीरमें प्रेम-शक्तिका सञ्चार हो जाता है। एक दूसरेके प्रेममें लीन हुए स्त्री पुरुषोंके देखनेसे प्रेम और प्रेमीकी मर्यादा मालूम होती है। सच्चा प्रेम उनके हृदयको इतना कोमल बना देता है कि एक दूसरेके प्रति पात्र हो जाते हैं और प्रेमशक्ति उनके हृदयको पवित्र बना देती है। प्रेमीको प्रेमानन्दके सामने स्वर्गके सुख और रंजा महाराजोंके महलोंके वैभव तिनके समान जान पड़ते हैं।

प्रेम केवल प्रेम हीके लिये किया जाता है, इसका और कोई मतलब नहीं है। सच्चा प्रेम स्त्री और पुरुषके मनको एक कर देता है, विचारोंको मिला देता है और भावोंको एक करनेके

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प्रेम द्वारा उत्तम सन्तानकी उत्पत्ति ।

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प्रयत्न करता है । जब दोनों के चित्तपर प्रेम अपना अधिकार इस प्रकार जमा लेता है तभी स्त्री पुरुष रूपवान और गुणवान सन्तान उत्पन्न करनेमें समर्थ होते हैं । प्रेमका कैसा महत्व है कि यदि स्त्री पुरुष के परस्पर प्रेमसे गर्भाधान हो तो सन्तान हर प्रकार से सुन्दर, गुणवान, सुशील निद्रोग और बुद्धिमान उत्पन्न होती है । कारण यह है कि गर्भाधानके समय रजवीर्य पर प्रेमका प्रभाव पड़ता है और यही प्रेम रूपवान और गुणवान सन्तान उत्पन्न करने का कारण है । प्रेमही से माता-पिता के गुण वच्चोंमें आते हैं । प्रेम ही प्रत्येक गुणों को उत्तेजितकर संजीवनी शक्ति उत्पन्न करता है । प्रेमही से वच्चोंमें मानसिक और शारीरिक शक्तियोंका विकास उत्तमतासे होता है इतना ही नहीं प्रेम वच्चे के शरीर को भी बढ़ाता है जिस प्रकार माता और गर्भका संवन्ध है इसी प्रकार प्रेम और गुणका संवन्ध है । अतएव जहाँ माता पिता प्रेमी होते हैं वहीं सर्व-गुण-संपन्न सन्तान उत्पन्न होती हैं । जहाँ स्त्री पतिसे प्रेम करती है और पति स्त्रीसे प्रेम नहीं करता या पति स्त्रीसे प्रेम करता है और स्त्री पतिसे प्रेम नहीं करती, वहाँका तो कहना ही क्या है । काली, कुवडी और कुरुप अनेक प्रकारकी सन्तान उत्पन्न होती है । जहाँ पुरुषकी ओरसे प्रेम होता है तो बच्चे के चेही अंग सुडौल होते हैं कि जो पिताके वीर्यसे बनते हैं । जहाँ स्त्रीकी ओरसे प्रेम होता है वहाँ चेही अंग सुडौल होंगे कि जो स्त्रीके रजसे बनेंगे । अतएव सारे अङ्गोंको सुन्दर, सुडौल बनानेके लिये माता-पिता दोनोंके ओरसे प्रेम होना आवश्यक हैं । जितनी जातियाँ हैं, सबमें स्त्री और पुरुषके प्रेमको प्रधान माना है । हिन्दू जातिमें विवाह जन्मपत्री मिलाकर होता है, प्रहर्मेत्री और गणमेत्री आदि देख जाते हैं । इस कारण कि इनमें आगे

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सन्तति शास्त्र ।

चलकर प्रेम कैसा होगा ? बहुतेरे इस बातको नहीं मानते कि जन्मपत्रीसे इस बातका पता क्या लगेगा कि स्त्री पुरुषमें प्रेम होगा या नहीं। यह एक मिथ्या बात है। जिन स्त्री पुरुषोंकी यह मैत्री और गण मैत्री ठीक है, चाहे उनमेंसे एक कुरूप ही क्यों न हो, वे दोनों अवश्य परस्पर प्रेमी होंगे। परन्तु वह स्त्री पुरुष कि जिनकी यहमैत्री और गण मैत्री ठीक नहीं हैं, दोनोंके सुन्दर और लावण्यता पूर्ण होते हुए भी प्रेम नहीं रहता। पहले हिन्दुओंमें स्वयंवरकी प्रथा थी। इसका भी यही मत-लव था कि कन्याका प्रेम जिसपर हो वही उसका पति हो। यूरोपमें कन्याएं स्वयं अपना पति ढूँढ़ लेती हैं। इससे भी यही तात्पर्य है कि जिससे प्रेम हो वही पतित्वमें वरण किया जाय। गर्भाधान समयका मन्द प्यार बालकोंकी मांस रज्जुको शिथिल बना देता है। उत्साहयुक्त प्यारसे अवयव दह और मनके तन्तु सतेज बनते हैं। जिस प्रकार संयोग समयमें प्रेम द्वारा माता पिताका हर्ष बढ़ता है उसी प्रकार सन्तान सुन्दर, सुडौल और उत्तम होती है। यदि संयोग-समयमें मातापिताका हर्ष पूर्ण प्रकाश नहीं पाता तो मध्यम गुणोंवाली सन्तान होती है। यदि हर्षका प्रकाश विलकुल न हुआ, तो अनेक प्रकारकी कुरूप और अंगहीन सन्तान उत्पन्न होती है।

प्रेम इस बातको नहीं चाहता कि स्त्री या पुरुष सुन्दर हों। प्रेम तो बदलेमें केवल प्रेम ही चाहता है। प्रायः देखा गया है कि रूपवती स्त्री और कुरूप पुरुष या कुरूप स्त्री और सर्वोत्तम सुन्दर पतिमें प्रेमकी धारा वेगसे बहती है। स्त्री और पुरुषके प्रेमकी, कि जिसका प्रभाव सन्तानपर पड़ता है, अनेक बार परीक्षा की जा चुकी है और इनमें प्रेमकी सत्यताकी भलक-दिललाई भी पड़ती है।

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बच्चोंपर माता-पिताके मनोबलका प्रभाव । १६१

१. एक परिवारमें अच्छे खूबसूरत मोटे ताजे माता-पिता से जितने बच्चे हुए सब कुरूप और बुद्धिहीन थे जाँच करनेपर मालूम हुआ कि माता-पितामें अनबन रहती थी।

२. एक सुन्दर माता-पितासे जो पूरे जवान थे, डील डौल अच्छा था, उन्हें ठिगने कदकी सन्तान उत्पन्न हुई। जाँच करनेसे पता चला और खीने स्वीकार किया कि जब उस बच्चेका गर्भाधान हुआ था उस दिन स्त्री पुरुषमें लड़ाई हुई थी।

इन बातोंसे सिद्ध है कि सन्तानके विषयमें प्रेमका बहुत बड़ा महत्व है। जितने अंशोंमें माता-पिता प्रेम द्वारा मनसे एक हो जाते हैं उतने ही अंशोंमें बालक श्रेष्ठ होता है। माता-पिता के प्रेममें जब मनकी स्थिति अच्छी हालतमें रहती है तब बालक सुन्दर उत्पन्न होता है। प्रेमसे गर्भाधान समयमें माता-पिता अपने चित्तको जिसमें लगावेंगे उसी 'वातकी प्रेमी सन्तान उत्पन्न होगी। इसलिये जैसी सन्तान उत्पन्न करना हो माता-पिताको प्रेमसे अपने अपने मनको गर्भाधानके समय उसीमें लगाना चाहिये। इस प्रकार केवल प्रेम द्वारा ही उत्तम सन्तान उत्पन्न हो सकती है।

(३३) बच्चोंपर माता-पिताके मनोबलका प्रभाव ।

मानस शास्त्रके विद्वानोंका मत है कि सृष्टि मनसे उत्पन्न होती है। इसलिये मनचाही सन्तान पैदा करना मनकी ताकतके बाहर नहीं है। मनकी शक्तिको ही मानस-शक्ति मनःशक्ति,

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सन्तति शास्त्र ।

इच्छाशक्ति और मनो-बल कहते हैं। यही सबका सर्वस्व है और यही सर्वप्रधान वस्तु है। मनकी शक्ति दो तरहकी होती है। एक प्रत्यक्ष, दूसरी छिपी हुई। सन्तान पैदा करनेमें कैसी मनकी शक्तिका प्रयोग होता है, इस विषयमें विद्वानोंका मत है कि 'इसमें छिपी हुई मनकी ताकत काममें आती है।' माता-पिताके मनकी ताकतके अनुसार शरीर और उसके सारे अवयव तथा मनकी वृत्ति बनती है। सन्तानके रूप रंगमें, शरीरके बननेमें और स्वास्थ्यमें, विचारोंकी बनावट और विगाड़का कारण केवल मनकी ताकत ही है। जिस तरह यदि आदमी गुस्सेमें आकर तसवीर खिंचवाता है, तो उसकी तसवीर क्रोधभरी जान पड़ती है, इसी प्रकार हँसते गाते, क्रूढ़ते और उछलते हुए मनुष्यकी तसवीर उसी प्रकारकी होती है। इसी तरह मनकी शक्ति, जोगमाधानके समय होती है या जिसका संचार गभावसामें हुआ करता है, उसीके अनुसार अच्छी आकृति, प्रकृति और स्वभाव इत्यादि बनते हैं।

मनकी शक्तिमें सब शक्तियाँ आ जाती हैं, जिनका सवन्ध मनसे है। मनकी शक्तिका काम रजो-दर्शनसे ही प्रारम्भ हो जाता है और बच्चे के दूध पीनेके समय तक विशेष रीति से रहता है यही समय माता पिता द्वारा बच्चेके उत्तम वा मध्यम बननेका होता है। इसके अनेक प्रमाण हैं।

१. रजोदर्शनके समय मनोबलका प्रभाव ।

१. मनकी शक्तिमें विकार न उत्पन्न होनेके लिये ही रजोवती-को एकान्तवास कहा गया है। इस विषयमें वैद्यका मत है कि काल करके चौथे दिन स्त्रीको पति आगच्छ

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बच्चोंपर माता-पिताके मनोबलका प्रभाव । १६३

किसी सुन्दर पुरुषका दर्शन करना चाहिये । कारण यह है कि स्नान करके जैसे पुरुषका दर्शन स्त्री करता है उसीके रूप-रंगकी सन्तान उत्पन्न होती है । (श० क० )

इसमें एक प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि एक सज्जनकी स्त्री रजस्वला हुई । वह स्नान कर रही थी कि उसी समय में उसका भाई मिलनेके लिये आया । स्त्रीने स्नान करके तुरन्त ही अपने भाईसे भेंट की । संयोगवशात् उसी रजो-दर्शनसे गर्भ रह गया । सन्तान उत्पन्न हुई वह अपने मामाके रूप-रंग और आकृति की थीं ।

२. गर्भाधानके समय मनकी शक्तिका प्रभाव ।

१. इस विषयमें वैद्यकका मत है कि गर्भाधान समयमें जैसे रंग-रूपवाले स्त्री पुरुषका ध्यान या बच्चेकी भलाई बुराई या गुणोंपर माता-पिताका विचार चला जाता है, उसीके अनुसार सन्तान उत्पन्न होती । ( श० क० )

आप ग्रन्थोंका मत है कि गर्भाधानके समयमें जिस जीवमें स्त्रीका चित्त होगा अर्थात् जिस जीवका उसको ध्यान आ जावेगा उसीके अनुसार सन्तान उत्पन्न होगी । (च० श० अ०२ श्लोक० २४) भोज वैद्यने भी ऐसा ही कहा है । इसमें प्रमाण यह है कि—

१. गुजरात देशमें एक सज्जनके घर बन्दरके आकृतिवाली सन्तान उत्पन्न हुई । पिता बुद्धिमान थे । इस बातको अनेक डाक्टरोंसे कहा गया । जाँचसे पता लगा कि एक बन्दर माताके पास रहता था और वह उसे अत्यन्त स्नेहसे पालती थी । पूछनेपर माताने इस बातको स्वीकार किया कि गर्भाधान समयमें उसकी दृष्टि बन्दर पर पड़ी थीं ।

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सन्तति-शास्त्र ।

२ महाराष्ट्र देशमें माता-पिताने गर्भाधान समयमें अपने मनकी शक्तिको ज्योतिष-शास्त्रमें लगाकर बालक उत्पन्न किया। बालक बहुत बड़ा ज्योतिषी हुआ।

३. गर्भाधानके बाद मनकी शक्तिका प्रभाव।

१. गर्भाधान होनेतक तो मातापिता दोनोंके मनकी शक्तिका प्रभाव पड़ता है, परन्तु गर्भाधान होनेके बाद बच्चों-पर केवल माताकी ही मनशक्तिका प्रभाव रहता है। तीन मास तक तो कम परन्तु चौथे महिनेसे विशेष प्रभाव पड़ने लगता है। इसका कारण यह है कि बालक का हृदय चौथे महिनेमें बन जाता है। अतएव माताके हृदयमें जो बात उत्पन्न होती है ऐसे समयमें उसका बहुत बड़ा प्रभाव सन्तानपर पड़ता है।

(३० क०)

इसके अनेक उदाहरण हैं।

१ नेपोलियन बोनापार्ट यूरोपमें इतना युद्धवीर क्यों हुआ ? कारण यह था कि जब नेपोलियन गर्भमें था, तो उसकी माता अपने पतिके साथ लड़ाईमें काम करती थी। इस कारण वह संकट और साहससे काम करनेमें निर्भय हो गयी थी। वह घोड़ेपर सवार होती और उसके पतिके अधीन जितने मनुष्य थे सब पर हुकूमत रखती थी। इस वजहसे माताका यह गुण पुत्रमें विकास पाकर इतना बड़ा कि जिसकी वदौलत आजतक नेपोलियन युद्धवीर विख्यात है।

२ एक गर्भवती स्त्रीने अपने पतिसे भगड़ा किया। घरमें स्त्री पुरुष दो ही थे। कई महिनेतक दोनों नहीं चले।

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बच्चोंपर माता-पिताके मनोबलका प्रभाव ।

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बच्चा पैदा हुआ, परन्तु वह सुस्त पड़ा रहता । बडे होने पर हर समय उसे गुस्सा रहता । उसे सबसे अलग बैठना पसन्द था । पिता ने इसकी जाँच की तो लड़ाई होना ही इसका कारण प्रतीत हुआ ।

३. अभिमन्युको गर्भमें ही चक्रव्यूहकी लड़ाई मालूम हो गई थी । कथा इस प्रकार है । कि जब अभिमन्यु पेटमें आ, तो उसकी माताके पेटमें दर्द उत्पन्न हुआ । उस समय अभिमन्युके पिता अर्जुनने अपनी स्त्री सुभद्रा देवीका चित्त बँटाने और दुःख भुलवानेके लिये चक्रव्यूहकी लड़ाईका हाल सुनाया था । सुनते सुनते सुभद्रा देवी सो गई । केवल पाँच फाटककी लड़ाईका हाल बालकने गर्भमें सुना । उतना ही हाल अभिमन्युको याद रहा और वह महाभारतमें चक्रव्यूहके पाँच फाटकतक लड़ा और छुटेपर मारा गया, क्योंकि उसको माताके सो जानेके कारण आगेकी लड़ाईका हाल मालूम न हो सका ।

४. महाराज युधिष्ठिर ऐसे न्यायमूर्ति क्यों हुए ? कारण यह था कि जब वे गर्भमें थे तो उनकी माता धर्मशास्त्र पढ़ती थी ।

५. महात्मा बुद्ध ऐसे दयालु क्यों हुए ? कारण यह था कि जब बुद्धदेव गर्भमें थे, तो उनकी माताको प्रजाका कष्ट दूर करनेके विषयमें बहुत कुछ विचार करना पड़ा था ।

४. शरीरके रंगपर मनका प्रभाव ।

१. एक हवशी ( अफ्रीकाका रहनेवाला काला आदमी ) ने अपने जातिकी स्त्रीसे विवाह किया, परन्तु वह स्त्रीको प्यारसे नहीं रखता था । उसका चित्त एक दूसरी सुन्दर और गोरी स्त्रीपर था । एक दिन हवशीने उस