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संतति शास्त्र

Santati Shastra

by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव

Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)

Devanagarihipublished302 pages
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बच्चोंपर माता-पिताके मनोबलका प्रभाव । १६३

किसी सुन्दर पुरुषका दर्शन करना चाहिये । कारण यह है कि स्नान करके जैसे पुरुषका दर्शन स्त्री करता है उसीके रूप-रंगकी सन्तान उत्पन्न होती है । (श० क० )

इसमें एक प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि एक सज्जनकी स्त्री रजस्वला हुई । वह स्नान कर रही थी कि उसी समय में उसका भाई मिलनेके लिये आया । स्त्रीने स्नान करके तुरन्त ही अपने भाईसे भेंट की । संयोगवशात् उसी रजो-दर्शनसे गर्भ रह गया । सन्तान उत्पन्न हुई वह अपने मामाके रूप-रंग और आकृति की थीं ।

२. गर्भाधानके समय मनकी शक्तिका प्रभाव ।

१. इस विषयमें वैद्यकका मत है कि गर्भाधान समयमें जैसे रंग-रूपवाले स्त्री पुरुषका ध्यान या बच्चेकी भलाई बुराई या गुणोंपर माता-पिताका विचार चला जाता है, उसीके अनुसार सन्तान उत्पन्न होती । ( श० क० )

आप ग्रन्थोंका मत है कि गर्भाधानके समयमें जिस जीवमें स्त्रीका चित्त होगा अर्थात् जिस जीवका उसको ध्यान आ जावेगा उसीके अनुसार सन्तान उत्पन्न होगी । (च० श० अ०२ श्लोक० २४) भोज वैद्यने भी ऐसा ही कहा है । इसमें प्रमाण यह है कि—

१. गुजरात देशमें एक सज्जनके घर बन्दरके आकृतिवाली सन्तान उत्पन्न हुई । पिता बुद्धिमान थे । इस बातको अनेक डाक्टरोंसे कहा गया । जाँचसे पता लगा कि एक बन्दर माताके पास रहता था और वह उसे अत्यन्त स्नेहसे पालती थी । पूछनेपर माताने इस बातको स्वीकार किया कि गर्भाधान समयमें उसकी दृष्टि बन्दर पर पड़ी थीं ।

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सन्तति-शास्त्र ।

२ महाराष्ट्र देशमें माता-पिताने गर्भाधान समयमें अपने मनकी शक्तिको ज्योतिष-शास्त्रमें लगाकर बालक उत्पन्न किया। बालक बहुत बड़ा ज्योतिषी हुआ।

३. गर्भाधानके बाद मनकी शक्तिका प्रभाव।

१. गर्भाधान होनेतक तो मातापिता दोनोंके मनकी शक्तिका प्रभाव पड़ता है, परन्तु गर्भाधान होनेके बाद बच्चों-पर केवल माताकी ही मनशक्तिका प्रभाव रहता है। तीन मास तक तो कम परन्तु चौथे महिनेसे विशेष प्रभाव पड़ने लगता है। इसका कारण यह है कि बालक का हृदय चौथे महिनेमें बन जाता है। अतएव माताके हृदयमें जो बात उत्पन्न होती है ऐसे समयमें उसका बहुत बड़ा प्रभाव सन्तानपर पड़ता है।

(३० क०)

इसके अनेक उदाहरण हैं।

१ नेपोलियन बोनापार्ट यूरोपमें इतना युद्धवीर क्यों हुआ ? कारण यह था कि जब नेपोलियन गर्भमें था, तो उसकी माता अपने पतिके साथ लड़ाईमें काम करती थी। इस कारण वह संकट और साहससे काम करनेमें निर्भय हो गयी थी। वह घोड़ेपर सवार होती और उसके पतिके अधीन जितने मनुष्य थे सब पर हुकूमत रखती थी। इस वजहसे माताका यह गुण पुत्रमें विकास पाकर इतना बड़ा कि जिसकी वदौलत आजतक नेपोलियन युद्धवीर विख्यात है।

२ एक गर्भवती स्त्रीने अपने पतिसे भगड़ा किया। घरमें स्त्री पुरुष दो ही थे। कई महिनेतक दोनों नहीं चले।

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बच्चोंपर माता-पिताके मनोबलका प्रभाव ।

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बच्चा पैदा हुआ, परन्तु वह सुस्त पड़ा रहता । बडे होने पर हर समय उसे गुस्सा रहता । उसे सबसे अलग बैठना पसन्द था । पिता ने इसकी जाँच की तो लड़ाई होना ही इसका कारण प्रतीत हुआ ।

३. अभिमन्युको गर्भमें ही चक्रव्यूहकी लड़ाई मालूम हो गई थी । कथा इस प्रकार है । कि जब अभिमन्यु पेटमें आ, तो उसकी माताके पेटमें दर्द उत्पन्न हुआ । उस समय अभिमन्युके पिता अर्जुनने अपनी स्त्री सुभद्रा देवीका चित्त बँटाने और दुःख भुलवानेके लिये चक्रव्यूहकी लड़ाईका हाल सुनाया था । सुनते सुनते सुभद्रा देवी सो गई । केवल पाँच फाटककी लड़ाईका हाल बालकने गर्भमें सुना । उतना ही हाल अभिमन्युको याद रहा और वह महाभारतमें चक्रव्यूहके पाँच फाटकतक लड़ा और छुटेपर मारा गया, क्योंकि उसको माताके सो जानेके कारण आगेकी लड़ाईका हाल मालूम न हो सका ।

४. महाराज युधिष्ठिर ऐसे न्यायमूर्ति क्यों हुए ? कारण यह था कि जब वे गर्भमें थे तो उनकी माता धर्मशास्त्र पढ़ती थी ।

५. महात्मा बुद्ध ऐसे दयालु क्यों हुए ? कारण यह था कि जब बुद्धदेव गर्भमें थे, तो उनकी माताको प्रजाका कष्ट दूर करनेके विषयमें बहुत कुछ विचार करना पड़ा था ।

४. शरीरके रंगपर मनका प्रभाव ।

१. एक हवशी ( अफ्रीकाका रहनेवाला काला आदमी ) ने अपने जातिकी स्त्रीसे विवाह किया, परन्तु वह स्त्रीको प्यारसे नहीं रखता था । उसका चित्त एक दूसरी सुन्दर और गोरी स्त्रीपर था । एक दिन हवशीने उस

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सन्तति-शास्त्र ।

सुन्दर स्त्रीसे संयोगकी प्रार्थना की परन्तु उसने स्वीकार नहीं किया। अन्तमें हवशीको अपनी व्याही स्त्रीसे सन्तुष्ट होना पड़ा। उसी दिन गर्भ रह गया। मातापिता दोनोंके काले होनेपर गोरे रंगकी सन्तान उत्पन्न हुई। कारण यह था कि पिताका चित्त गोरे रंगकी स्त्रीपर था और गर्भाधान समयमें भी वह उसीका ध्यान करता रहा।

१ एक यूरोपियन स्त्रीके कमरेमें ठीक पलकके सामने एक हवशीका चित्र लगा हुआ था। वह उसको नित्य देखा करती थी। गर्भ रह गया। गर्भांचक्षामें भी स्त्री उस चित्रको देखती रही। सन्तान उत्पन्न हुई तो उसका रङ्ग काला था। माता पिता गोरे रङ्गके थे और सन्तान काली हुई। इन दोनोंको इस बातका बड़ा शोक रहा और अनेक डाकूरीसे इस बातको उन्होंने कहा। एक डाकूरेने जाँच की तो यह पता लगा कि जिस हवशीके काले चित्रको स्त्री रोज देखती थी, उसके मनपर उसका इतना प्रभाव पड़ा कि बच्चा काले रङ्गका उत्पन्न हुआ।

३ रोम देशमें एक प्रतिष्ठित मनुष्य कुरूप और छोटे डीलका था। उसकी स्त्री सुन्दर और अच्छे कदकी थी। इनसे सन्तान हुई वह पिता सरीखी थी। मातापिताको यह चिन्ता हुई कि कहाँ ऐसा न हो कि सारी सन्तानें इसी प्रकारकी हों। अनेक डाकूरीसे सम्मति ली गई। एक डाकूरेने यह कहा कि स्त्रीका चित्त लम्बे और खूब-सुरत मनुष्योंपर होना चाहिये। इस विचारसे उसने तीन अत्यन्त सुन्दर पुतले बनवाकर अपने कमरेमें रखे। स्त्रीकी निगाह हर समय उन पुतलोंपर ही पड़ती थी।

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बन्धांपर माता-पिताके मनावलका प्रभाव ।

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संयोग वश गर्भ रह गया । उन्हीं पुतलोंके समान रङ्ग रूपकी सन्तान उत्पन्न हुई । कारण यह था कि गर्भाधान समयमें स्त्रीको उन पुतलोंका ही ध्यान रहा करता था ।

५. शरीरकी सुन्दरता और अँगोंपर मनका प्रभाव ।

१. किसी प्रतिष्ठित घरमें एक कुबडी नित्य मिक्षा माँगने आया करती थी । उसको कहानी कहनेका बड़ा शौक था । जब वह आती तो घरकी सारी स्त्रियाँ उसे घेर लेतीं और कहानी सुन कर जाने देतीं । इनमेंसे एक स्त्री उसको बहुत चाहती थी और वही नित्य मिक्षा भी देती थी । दैव संयोगसे उस स्त्रीको गर्भ रह गया और उस मिक्षा माँगनेवाली स्त्रीके समान सन्तान हुई । कारण यह था कि माता उस स्त्रीको रोज देखती थी और उसका प्रेम उसपर था । अतएव उसका आकार माताके हृदयपर गर्भाधान समयमें भी जमा रहा, इसी कारण उसीके अनुसार सन्तान हुई ।

२. एक घरमें दो स्त्री पुरुष थे । एक स्त्री और आगई, वह कानी और कुरुपा थी । उसी बीचमें गर्भाधान हो गया । सन्तान उत्पन्न हुई तो बच्चेको भी एक आंख थी । कारण पूछनेसे मालूम हुआ कि जिस दिन गर्भाधान हुआ था उस रोज थोड़ी ही देर पहले दोनों स्त्रियाँ पास पास बैठी बातचीत कर रही थीं । गर्भाधान समयमें माताको उस कानी स्त्रीका ध्यान रहा था, इसीलिये ऐसी सन्तानका जन्म हुआ ।

३. अमेरिकाके एक निवासीने दो सुन्दर चित्र खरीदे और अपने सोनेके कमरमें रखवा दिये । दोनों स्त्रीपुरुषका-

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सन्तति-शास्त्र ।

इन चित्रोंसे बड़ा स्नेह था। स्त्रीको गर्भ रह गया। उन्हीं चित्रोंके समान सुन्दर सन्तान हुई। कारण यह था कि दोनों ह्रीपुरष चित्रोंसे स्नेह रखते थे और गर्भाधान समयमें दोनोंको उनका ध्यान था।

६. बच्चेके स्वास्थ्यपर मनका प्रभाव ।

१. एक गृहस्थके घरमें बच्चा बीमार था और मानाके पास ही मोता था। दैव संयोगसे उस दिन माताको गर्भ रह गया। उससे जो सन्तान हुई वह सदा रोगी रहनी थी, कारण कि गर्भाधान समयमें मानापिताका चित्त बच्चेके रोगकी ओर था।

२. एक स्त्रीके शरीरमें दर्द था और उसी दिन उसका पति परदेशसे आया। दैव संयोग उस दिन गर्भ रह गया। पुत्र उत्पन्न हुआ वह सदा रोगी रहता था। कारण यह था कि मानापिता दोनोंके चित्तपर रोगका न्याल जमा हुआ था।

७. सन्तान उत्पन्न हो जानेपर मनकी शक्तिका प्रभाव ।

१. जिस समयतक बालक दूध पीता है तबतक बच्चेकी आत्मा माताकी आत्मापर अवलम्बित रहनी है। माताकी आत्माका और दूधका बहुत बड़ा सम्बन्ध रहता है। इसी प्रकार विचार और आत्माका बहुत बड़ा सम्बन्ध है, इस कारण माताके विचारोंका असर दूधपर होता है और उसीके अनुसार सन्तान होती है। जो मानपर नोवी होती हैं उनके बच्चे भी अवश्य कौधी होते हैं। जिन माताओंको मिरगी इत्यादिका रोग है उनके बच्चोंको भी अवश्य मिरगी आती है। बहुतेरे

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बच्चोंपर माता-पिताके मनोबलका प्रभाव ।

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इस बात को नहीं मानते, परन्तु इसमें प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि यदि शेरनी का दूध बच्चेको पिला दिया जाय, तो बच्चा अत्यन्त क्रोधी हो जायगा, परन्तु गाय का दूध पिलानेसे बच्चा क्रोधी नहीं होता, कारण यह है कि शेरनीकी प्रकृति ऐसी है कि वह हर समय क्रोधमें रहती है और क्रोधका असर दूध में रहता है। अतएव यह मानना पड़ेगा कि माताके अच्छे बुरे गुणोंका असर दूधमें अवश्य रहता है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि—

१. जो बच्चे धायाँके यहाँ पाले जाते हैं, जवानी और बुढ़ापे तक चाहे वे कैसेही क्यों न हो जायँ, परन्तु उनमें धायाँके गुण दोष अवश्य आ जाते हैं।

२. बंगालमें एक प्रतिष्ठितके घर सन् १८६५ ई० में एक बालक उत्पन्न हुआ। माता चार दिन बाद मर गई। एक अहीरिनने उसे पाला। इसके यहाँ सब चोरी किया करते थे। तीन वर्षतक बालकने इसका दूध पिया। इसके बाद लड़का पिताके घर रहने लगा। पिताजी सीधे सादे थे, परन्तु बालक बड़ा होनेपर चोरोंके समुदाय का सरदार बना।

मानसशास्त्रके विद्वानोंका यह सिद्धान्त बहुत ठीक है कि संसारमें जो कुछ होता है वह मनःशक्तिके प्रभावसे। यही कारण है कि एक माता से उत्पन्न हुए बालकोंकी सूरत और प्रकृति दूसरेसे नहीं मिलती। एक भाई पापी है, तो दूसरा धर्मात्मा, एक कुरूप तो दूसरा रूपवान। इन सब का कारण मनःशक्ति हैं इसलिये सन्तानके सुधारनेके लिये माता पिताको अपने मनकी शक्ति ठीक रखनी चाहिये।

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सन्ततिशास्त्र ।

(३४) गर्भकी वायुका सन्तानपर प्रभाव ।

गर्भाशय वन्धनेके रहने का स्थान है । जब यहाँ पर किसी प्रकारसे वायुका उत्पात हो जाता है, तब अनेक प्रकारकी रोगी सन्तान उत्पन्न होती है । इसके अनेक भेद हैं ।

१. गर्भाधान होनेपर गर्भमें वायुसे मिले हुए रज वीर्यके दो भाग हो जानेसे इसके एक भागमें वीर्य और दूसरे भागमें रज अधिक हो, तो एक कन्या और एक पुत्र उत्पन्न होता है । रज-वीर्य मिले पदार्थमें जब अधिक वीर्य हो तो उसके दो भाग हो जाने से दो पुत्र और जब रज अधिक हो तो दो भाग हो जानेसे दो कन्याएँ उत्पन्न होती हैं । जब वही हुई वायुसे मिले हुए रजवीर्यके कई टुकड़े हो जावें, तो कर्मवश एक ही बार बहुत सी सन्तानें उत्पन्न होती हैं ।

(च० श० अ० २ शी० ११ सं १३ )

२. वायु द्वारा मिले हुए रज-वीर्यके दो भाग हो जानेपर बड़े भागसे जो बालक होगा वह पुष्ट और छोटे टुकड़ोंसे निर्बल और क्षीण देहवाली सन्तान होगी ।

(च० श० अ० २ श्लो० १५ )

३. यदि वायु गर्भके शुक्राशयको चिगाड़ दे, तो उससे जो पुत्र उत्पन्न होता है उसको पवनेन्द्री नपुंसक कहते हैं ।

(च० श० अ० २ श्लो० १७ )

४. यदि वायु शुक्राशयके द्वारको रोक दे तो सस्कारवाही नपुंसक पैदा होता है ।

(च० श० अ० २ श्ली० १८ )

५. वायु और अग्निके दोषसे जिसके दोनों अण्डकोष नष्ट

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हर्ष शोकादिका सन्तानपर प्रभाव ।

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हो गप हो तो उसको वातिक पण्ड ( वातजनित नामदं ) कहते हैं । ( च० २० अ० २ श्लो० २० )

६. वायुके कोपसे गर्भका बालक कुबड़ा, पंगुल, लूला गूँगा और मिनमिता हो जाता है ।

( सु० २० अ० २ श्लो० ५५ )

इस प्रकार गर्भकी वायुके प्रकोपसे अनेकप्रकारकी सन्तान उत्पन्न होती है ।

( २५ ) गर्भ समयके हर्ष, शोक, चिन्ता और इच्छाका सन्तानपर प्रभाव ।

यह बात प्रसिद्ध है कि गर्भाधानके समयमें माता-पिताका मन जैसा होगा उसीके गुण-दोषके अनुसार सन्तान होगी; क्योंकि माता-पिताके हाथोंमें सन्तानके आत्माकी एक पेंसी कुंजी है कि जिससे वे बच्चेको अपनी इच्छाके अनुसार बना सकते हैं । गर्भाधान समयमें शोक और चिन्तासे अनेक प्रकारकी सन्तानें उत्पन्न होती हैं ।

१. संयोग-समयके शोक चिन्ता और स्त्री पुष्पमें अनवन होनेके कारण बदसूरत, कुबडी, अंगहीन, सुस्त, बुरे स्वभाववाली, ढ़ेरी, ठिगनी और दुर्बल सन्तान उत्पन्न होती है । ( रतिशान्त्र )

२. प्रसव्त्तारहित संयोग करनेपर माता-पिताके थोड़े रज-वीर्यसे यदि गर्भ रह जावे तो पुत्र होनेपर नरपण्ड ( हिजड़ा ) और कन्या होनेपर नारीपण्ड ( हिजड़ी ) उत्पन्न होती है । ( च० २० अ० २ श्लो० १८ )

३. शोकयुक्त मातापिताके संयोगसे सदैव शोकमें रहने-

35. गर्भ-समयके हर्ष शोक चिन्ता और इच्छाका संन्तानपर प्रभाव

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सन्तति-शास्त्र ।

वाली सन्तान उत्पन्न होगी । यदि पिता शोकयुक्त हो तो वीर्यसे उत्पन्न होनेवाले, और यदि माता शोकयुक्त हो तो, रजसे उत्पन्न होनेवाले अंग निस्तेज होंगे ।

( श० क० )

४. गर्भवतीके हर्षयुक्त रहनेसे उत्तम शरीरवाली और लम्बी सन्तान उत्पन्न होती है । ( श० फ० )

५. गर्भसमयमें हर्ष-विषाद दोनोंके होनेसे श्रौस्त दर्जेंकी लम्बी और चली सन्तान होती है । ( श० क० )

६. यदि गर्भवती विषादयुक्त हो तो छोटे कद और दुष्ट स्वभावकी सन्तान होती है । ( श० क० )

७. गर्भोद्यान समयमें मातापिताके हर्षित होनेसे उत्तम और बड़े डीलडोलकी सन्तान होती है । ( श० क० )

८. माताकी मैथुनकी इच्छा न हो और विना इच्छाके मैथुनसे गर्भ रह जाय, तो टेढ़ी सन्तान होती है ।

च० श० अ० २ श्ल० १२ )

९. मातापिता यदि ईर्षायुक्त और मन्द हर्ष अर्थात् अच्छी तरहसे प्रसन्न न होकर गर्भोद्यान करें, तो ईर्षा करनेवाली सन्तान उत्पन्न होती है ।

इस प्रकार गर्भोद्यान समय और गर्भ समयमें हर्ष, शोक और चिन्तासे अनेक प्रकारको सन्तान उत्पन्न होती है । अतः पत्र मातापिताको अत्यन्त सावधानीसे गर्भोद्यानके समय हर्षयुक्त और प्रसन्न रहना चाहिये ।

(३६) माता-पिताके दूषित व्यवहारोंका

सन्तानपर प्रभाव ।

जैसा व्यवहार माता-पिताका गर्भोद्यान और गर्भस्थितिमें

36. माताके दूषित व्यवहारोंका सन्तानपर प्रभाव

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मातापिताके दूषित व्यवहारोंका सन्तानपर प्रभाव । १७३

होता है गर्भके वक्षेको वैसा ही बनना पड़ता है; क्योंकि वृत्तके आत्मा मातापिताकी आत्मापर अवलंबित है । अतएव कुव्यवहारके कारण अनेक प्रकारकी सन्तान उत्पन्न होती है ।

१. जो पुरुष मोहवश ऋतु समयमें स्त्रीके नीचे होकर संयोग करता है, यदि उस समय गर्भ रह जावे और पुत्र हो तो वह स्त्री, चेष्टावाला, जनानियों, जनखा उत्पन्न होता है । इसको षण्ड कहते हैं ।

( सु० १० अ० २ श्लो० ४६ )

२. ऋतुसमयमें वलवती स्त्री पुरुषके ऊपर चढ़ कर संयोग करावे और गर्भ रह जावे और उससे यदि कन्या उत्पन्न हो तो वह कन्या दाढ़ी मूर्छवाली तथा पुरुषके समान चेष्टावाली होती है । ( सु० १० अ० २ श्लो० ४७ )

३. संयोगकी इच्छा रखनेवाली दो स्त्रियाँ यदि आपसमें पुरुषकी भाँति संयोग करे और एक स्त्रीका वीर्य गिर जावे और दूसरी स्त्रीके रजसे वह वीर्य मिल जाय, तो चिना हृद्विडयावाली पिंड सरीषी सन्तान उत्पन्न होती है

( सु० १० अ० २ श्लो० ५१ )

यहाँपर यह शंका होती है कि क्या स्त्रियोंको वीर्य होता है ? यह मानी हुई बात है कि स्त्रियोंमें वीर्य होता है । यदि ऐसा न हो तो उनमें श्रोत्र नहीं हो सकता । जब श्रोत्र न होगा तो लावण्यता और सुकुमारता इत्यादि नहीं हो सकती । अतएव उनमें वीर्य अवश्य होता है । उपर्युक्त गर्भ उस स्त्रीको रहता है जो संयोगके समय नीचे रहती है । ( १० क० )

४. दूसरे पुरुषके संयोगसे निर्ललज सन्तान उत्पन्न होती है ।

( १० क० )

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सन्तति-शास्त्र ।

७. यदि स्त्री लिंगके समान किसी वस्तु, गाजर मूली इत्यादिसे मैथुन करावे, तो पिंड सरीखा सन्तान उत्पन्न होती है । ( श० क० )

८. यदि स्त्री रजो-धर्मसे स्नान कर कामवश पुरुषसे स्वप्नमें मैथुन करावे तो वायुसे चिगड़ कर रज कुक्षिमें गर्भ सा बन जाता है और पिताके वीर्य गुणोंसे रहित बिना हडिडियोंका एक पिंड सरीखा उत्पन्न होता है ।

( सु० श० अ० २ ख० ५२ व ५३ )

इस प्रकार मातापिताके दपित व्यवहारोंसे अनेक प्रकारकी सन्तान उत्पन्न होती है । अतएव मातापिताको अत्यन्त सावधानीसे रहना चाहिये ।

(३७) सन्तानपर दूषित रजका प्रभाव ।

रज वह पदार्थ है कि जिससे शरीर चलता है । यह जितना उत्तम होता है उतनी ही अच्छी सन्तान होती है । जब किसी प्रकारसे रज दूषित हो जाता है, तो अनेक रोगयुक्त सन्तान उत्पन्न होता है । इसके अनेक भेद हैं ।

१. जब रज और गर्भोत्पादक यौग दूषित हो जाते हैं, तब वन्ध्या-दोषयुक्त कन्या उत्पन्न होती है । ( श० क० )

२ जब रजमें गर्भोत्पादक भाग दूषित हो जाता है, तब सड़ी हुई सन्तान उत्पन्न होती है । ( श० क० )

३. जब रजमें गर्भकारक पुरुष-यौग-भाग दूषित हो जाता है तब स्त्रीकी आकृतिवाली किन्तु स्त्री बिनहोसे रहित, वातां नामक सन्तान होती है । ( श० क० )

४. रजसे उत्पन्न होनेवाले जितने अवयव हैं जब उन अवयवोंका अंश, जिससे वे अवयव बनते हैं, दूषित हो

37. सन्तानपर दूषित रजका प्रभाव

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सन्तानपर दूषित रजका प्रभाव ।

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जाता है, तब वे अवयव विकृत अर्थात् टेढ़े पड़ जाने हैं। (श०क०)

५. वायुसे दूषित रजकी सन्तान लालीमें कुछ कालापन लिये होता है। (श०क०)

६. पित्तसे दूषित रजकी सन्तान कुछ पीलेपनमें कालापन लिये हुए और अल्पजीवी होती है। (श०क०)

७. कफसे दूषित रजसे उत्पन्न सन्तान सफेदीमें पीलापन लिये होती है। (श०क०)

८. खूनसे दूषित रजकी सन्तानका वर्ण लाल होता है और वह अल्पजीवी होती है। (श०क०)

९. कफ और वायुसे दूषित रजकी सन्तान अल्पजीवी और रोगयुक्त होती है। (श०क०)

१०. पित्त और वायुसे दूषित रजकी सन्तान रोगयुक्त और अल्पजीवी होती है। (श०क०)

११. पित्त और कफसे दूषित रजकी सन्तान टेढ़े अंगवाली होती है। (श०क०)

१२. वात, पित्त और कफसे दूषित रजसे प्रायः सन्तान उत्पन्न नहीं होती। गर्भापात हो जाता है। (श०क०)

१३. कुमारी कन्याओंमें बाल-प्रदर माताके रज-विकारसे होता है। (रतिशास्त्र)

१४. यदि माताका थोड़ा रज गर्भाधान समयमें गिरे, तो पेशी दुबली मातासे नारीपद सन्तान उत्पन्न होती है।

(च०श०अ०२श्ल०१८)

१५. रजमें गर्भाशयकारक बीजका अंश दूषित होनेसे मरी दुर्दुःश्रव्या किन्नापा सन्तान उत्पन्न होती है। (श०क०)

इस प्रकार दूषित रजसे अनेक प्रकारकी सन्तान उत्पन्न

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सन्तति-शास्त्र ।

होती है । अतएव जन्म जिस समय हुआ भी विवाह आतुर हो तो उसके दूर करनेका यत्न तुल्य अन्यत्त सावधानी से करना चाहिये ।

(३२) सन्तानपर दूषित वीर्यका प्रभाव ।

वीर्य वह पदार्थ है कि जिससे शरीर बनता है । यह जिवन्ता उत्पन्न हो उदमी हो अच्छी सन्तान उत्पन्न होती है । वीर्य जब किसी प्रकारसे दूषित हो जाता है, तो अनेक रोग-युक्त सन्तान उत्पन्न होती है । इसके अनेक नमूने हैं ।

  1. १. वीर्यके उत्पन्न होनेसे गर्भाधान होनेपर जो सन्तान होती है वह स्त्री और पुत्रके लक्षणसे रहित हिरना अयान् नुपक होती है । (ग० क० २ पृ० १०)
  2. २. पित्तके दुषले वीर्यसे उद्भूत सन्तान उत्पन्न होती है । (ग० क० ३ पृ० ११ ;
  3. ३. वायु से दूषित वीर्य का सन्तान लालीमें कुछ कालापन लिये होती है । (ग० क०)
  4. ४. पित्तसे दूषित वीर्यकी सन्तान अत्यजीवी, पीलेपनमें कुछ कालापन लिये होती है । (ग० क०)
  5. ५. कफसे दूषित वीर्यकी सन्तान सफेद में पीलापन लिये होती है । (ग० क०)
  6. ६. शुभमे दूषित वीर्यकी सन्तान नात रंगका और अत्यजीवी होती है । (ग० क०)
  7. ७. कफ और वायुने दूषित वीर्यकी अत्यजीवी और रोग-युक्त सन्तान होती है । (ग० क०)
  8. ८. पित्त और वायुने दूषित वीर्यकी अत्यजीवी और रोगयुक्त सन्तान होती है । (ग० क०)

38. सन्तानपर दूषित वीर्यका प्रभाव

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सन्तानपर दूषित वीर्यका प्रभाव ।

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६. पित्त और कफ से दूषित वीर्यकी उत्पन्न सन्तान अल्पायु, टेढ़े अंगवाली होती है । (१० क०)

१०. वात, पित्त और कफ तीनोंसे दूषित वीर्य सन्तान उत्पन्न नहीं करता । गर्भपात हो जाता है । (१० क०)

११. सिद्धियोंका कुरूप और काला रंग, यूरोपियनोंकी कंजी आखें, अमेरिकावालोंका ताम्रवर्ण, काबुलियोंका कोधी होना, वीर्यका दोष है ।

१२. गर्भाधान समयमें यदि पिताका बहुत ही थोड़ा वीर्य हो तो आसेवय अर्थात् थोड़े वीर्यवाला पुरुष उत्पन्न होता है । (सु० १० अ० २ श्लो० ४२)

१३. वीर्य-दोषके कारण गर्भमें कन्याका गर्भाशय नष्ट हो जाता है । पैंसी खीके स्तन नहीं निकलते और न उसे पुरुष समागमकी इच्छा होती है । पैंसी खीको पत्नी कहते हैं । (च० चि० अ० ३० श्लो० २३)

१४. जब पुरुष के बीजभागमें दोष उत्पन्न होता है, तब पित्त अर्थात् पितासे उत्पन्न होनेवाले अवयवोंमें विकार होता है । (१० क०)

१५. जब पुरुषके सन्तान-कारक अर्थात् सन्तान उत्पन्न करनेवाले बीजभागमें दोष उत्पन्न होता है तो पूति अर्थात् नमर्द सन्तान उत्पन्न होती है । (१० क०)

१६. जब पुरुष-कारक बीजभाग दूषित हो जाता है, तब पुरुषकृति, विशिष्ट पुरुष चिह्नोंसे रहित, दण्डपूति सन्तान होती है । (१० क०)

१७. वीर्यसे उत्पन्न होनेवाले जितने अवयव हैं, जब वीर्यमें उन अवयवोंका अंश, जिससे वे बनते हैं, दूषित हो

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सन्तति-शास्त्र ।

जाता है तब वे श्रवयव विरुत अर्थात् देहे इत्यादि हां जाते हैं । (च० १० अ० ४ श्लो० १५)

१८. वीर्यमें जब हडिडियोंको बनानेवाला अंश दूषित हो जाता है तब वीनी सन्तान उत्पन्न होती । (१० क०)

१९. यदि गर्भाधान समयमें पिताका थोडा वीर्य गिरे तो ऐसे पितासे नरप० सन्तान उत्पन्न होती है ।

(च० १० अ० २ श्लो० १८)

२०. गर्भके जो श्रवयव वीर्यके जिस अंशसे उत्पन्न हों हैं उस वीर्यके उसी अंशके दूषित होने से गर्भके वेही श्रवयव दूषित हो जाते हैं । (च० १० अ० ४ श्लो० २५)

२१. वीर्य रक्त और गर्भाशयकारक अंश दूषित होनेसे स्त्री वन्ध्या कन्याको उत्पन्न करती है ।

(च० १० अ० ४ श्लो० ३९)

२२. वीर्यमें रज और गर्भाशय-कारक अंश दूषित हों तथा आनुवंशिक स्त्री-चिह्न प्रगटकर्ता बीजांश दूषित होनेसे गर्भिणी स्त्री—स्त्रीकी आकृतिवाली, योनि रहित पाला नामक सन्तान-उत्पन्न करती है । (च० १० अ० ४ श्लो० ४५)

२३. मिले हुए रजवीर्यमें जब वीर्य उत्पन्न करनेवाली वीर्यका अंश दूषित होने और आनुवंशिक पुरुष चिह्न कारक बीजांश दूषित होनेसे पुरुषकी सी आकृतिवाली नाम० कृष्णतिक नामक सन्तान उत्पन्न होती है । इसको पुरुष भ्रष्ट श्रवयव पुरुष नश कहते हैं ।

(च० १० अ० ४ श्लो० ५५)

वीर्य और सन्तानका बहुत बडा सम्बन्ध है । जिनने मनुष्योंके सन्तान होती है सबके लिये यह नहीं कहा जा सकता कि उनका वीर्य शुद्ध और नीरग है । यहाँ एक बहुत

39. माताके आचरणका सन्तानपर प्रभाव

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माताके आचरणका सन्तानपर प्रभाव ।

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बड़ा प्रश्न यह होता है कि बात पिछ इत्यादिसे दूषित वीर्य-वाले पुरुष सन्तान उत्पन्न कर सकते हैं या नहीं ?

इस विषयमें सुश्रुत ने लिखा है कि वातापिच्छ इत्यादि दोष-सेदूषित वीर्यवाले सन्तान उत्पन्न नहीं कर सकते; परन्तु इस विषयमें वैद्यकके दूसरे विद्वान् सन्तान उत्पन्न होना कहते हैं, जैसा कि ऊपर शरीरकल्पवृद्धमसे लिखा गया है । भाष्य-प्रकाशमें परिण्डित दत्तराम चौबेजाने सुश्रुतकी इस पंक्तिके विषयमें कि 'वातादि दोषसे युक्त वीर्यवाले सन्तान उत्पन्न नहीं कर सकते ।' आदि पंक्तिसे वे यह अर्थ निकालते हैं कि 'वात इत्यादि से दूषित वीर्यवाले शुद्ध सन्तान उत्पन्न नहीं कर सकते, किन्तु रोग इत्यादिसे युक्त अशुद्ध सन्तान उत्पन्न कर सकते हैं । क्योंकि जन्मांध, बहरे, पंगू आदि ऐसे ही दूषित वीर्यसे उत्पन्न होते हैं ।'

जिन स्त्री-पुरुषोंके कुष्ठकी विशेषतासे रज-वीर्य दूषित होता है ऐसे रज-वीर्यसे कोठी सन्तान उत्पन्न होती है । ( भा० १० प्र० ) इससे स्पष्ट है कि वातादि दोषयुक्त वीर्यसे सन्तान होती तो अवश्य है, परन्तु रोगी और अल्पायु होती है ।

इस प्रकार वीर्य-दोषसे रोगी और अनेक प्रकारको सन्तान उत्पन्न होती है ।

(३६) माताके आचरणका सन्तानपर प्रभाव ।

आचरणसे शरीरमें श्रच्छाई और बुराई उत्पन्न होती है । जिस समय मनुष्य बुरीकी संगतमें पड़ता है या स्वयं उसके हृदयमें बुरे आचरणोंका प्रवाह बहने लगता है, तो ऐसी दशा-में बुरे आचरणोंका आश्रय लेना पड़ता है । जब माता द्वारा बुरे आचरण हो जाते हैं, तो गर्भके बालकपर उनका बहुत ही

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सूत्रति-शास्त्र ।

बुरा प्रभाव पड़ता है । इसके अनेक भेद हैं, जो रजस्वला होने से गर्भ उत्पन्न होनेतक होते हैं ।

१. दिनमें सोनेसे बहुत सोनेवाली, कज्जल लगानेसे अर्धी, रोनेसे नेत्र विकारवाली, स्नान और अनुलेपन करनेसे दुःखशील, तेल लगानेसे कुष्ठी, नाखून कतरनेसे खराब नाखूनवाली, दौड़कर चलनेसे चंचल, हँसनेसे काले दांतों तथा काले होठ, तालू और जीभवाली, बहुत बोलनेसे वकवादी, जीरका शब्द सुननेसे वहिरी, वालों में कंठी करनेसे गंजी, हवा अधिक खानेसे तथा कष्ट करनेसे भतवाली सन्तान उत्पन्न होती है । जब ये आन्वरण रजस्वला समयमें किये जावें और उसी ऋतु धर्मसे गर्भ रह जावे, तो उसका बहुत बुरा प्रभाव सन्तान पर होता है । (च० श० अ० २ श्ल० २३)

२ यदि गर्भवती अंगोंको फैलाकर सोचे और रात्रिमें फिरा करे तो उन्मत्त सन्तान होती है ।

(च० श० अ० ८ श्ल० ४१)

३ यदि कलह और लड़ाई करना गर्भवतीको अच्छा मालूम हो या करे तो भृंगी रोगवाली सन्तान होती है ।

(च० श० अ० ८ श्ल० ४१)

४. यदि गर्भवती बहुत सोच विचार किया करे, तो डरनेवाली, क्षीण श्रयवा अल्पायु सन्तान होती है ।

(च० श० अ० ८ श्ल० ४६)

५. यदि गर्भवती चोरी किया करे, तो आलसी, भगड़ा करनेवाली और बुरे कामोंमें लगी रहनेवाली सन्तान होती है ।

(च० श० अ० ८ श्ल० ४१)

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सन्तानपर माताकी इच्छाका प्रभाव ।

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६. गर्भवतीके कोधी रहनेसे छली और चुगलखोर सन्तान उत्पन्न होती है । (च० श० अ० ८ श्ल० ४२)

७. बहुत सोनेवाली गर्भवतीसे तन्द्रावाली, मूर्ख या मन्दाग्नि रोगवाली सन्तान उत्पन्न होती है ।

(च० श० अ० ८ श्ल० ४५)

८. यदि गर्भवती बहुत चिड़ावे, ते उससे कानके रोगोंवाली सन्तान उत्पन्न होती है । (श० व०)

९. गर्भकी दशामें यदि स्त्री पुरुषसे संयोग कर लेवे और यदि पुत्र पैदा हो, तो बद्धचलन और कन्या हो, तो पार पुरुषके साथ गमन करनेवालो होती है । (श० क०)

१०. जैसा आचरण गर्भवतीका होता है उसीके अनुसार सन्तान उत्पन्न होती है । (श० क०)

इस प्रकार बुरे आचरणोंसे अनेक प्रकारकी सन्तान उत्पन्न होती है । अतएव माता-पिताको अपने अपने आचरणों पर विशेष ध्यान रखना चाहिये ।

(४०) सन्तानपर माताकी इच्छाका प्रभाव ।

इच्छा वह चीज है कि जिससे मनुष्य के हृदयका भाव मालूम होता है । जब मनुष्य किसी बातकी इच्छा करता है, तो उसको अपनी इच्छाके वशमें हो जाना पड़ता है । जबतक वह वस्तु उसको नहीं मिलती, उसके पानेकी लालसा लगी रहती है । गर्भवतीमें इच्छा-शक्ति अच्छी तरहसे चौथे महिनेमें उत्पन्न होती है । उस समयतक गर्भस्थित बालकका हृदय बल जाता है और माताकी इच्छामें बच्चेकी इच्छा भी मिली रहती है । अतएव माताकी इच्छाका बुरा भला प्रभाव सन्तानपर अनेक प्रकारसे पड़ता है ।

40. सन्तानपर माताकी इच्छाका प्रभाव

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सन्तति-शास्त्र ।

१. यदि गर्भवती मंथुन-प्राप्य हो अर्थात् उनको मंथुनको इच्छा हो तो निलंब, चिकलांग अथवा मेहरा, राडिया मन्तान उत्पन्न होती है । ( च० १० अ० ८ श्लो० ४१ )

२. यदि गर्भवती पराय धनके हरनेकी इच्छा करे, तो कुट्टन और हर्षवाली अथवा राडिया या ज्ञानानिया सन्तान होती है । ( च० १० अ० ८ श्लो० ४१ )

३. यदि गर्भवतीको मूत्ररका मांस प्राप्य हो अर्थात् उसके गनकी इच्छा हो, तो लाल नेत्रवाली, हत्यारी, कसाई तथा कुछ कुछ कठोर गेमवाली सन्तान उत्पन्न होती है । ( च० १० अ० ८ श्लो० ४२ )

४. अपनी इच्छाके अनुसार गर्भवतीको मनमाना पदार्थ न मिलनेसे गर्भका बालक, चीना, कुचडा, दूध, पागल, मूर्ख और नेत्रविकारवाला उत्पन्न होता है । इसलिये जिम वस्तुकी इच्छा हो वही स्त्रीको गर्भ समयमें देना चाहिये । यदि मनमाना पदार्थ मिल जाय तो प्रगल्भी-चिरंजीवी और उत्तम बालक उत्पन्न होता है । ( मु० १० श० ३ श्लो० ४१ )

५. जिन जिन द्रव्याँके सुगन्धको गर्भवती भोगनेको इच्छा करे उनके न मिलनेसे गर्भको वाधा पहुँचती है । इसलिये मनचाहा पदार्थ जरूर देना चाहिये । मनमाना पदार्थ मिलनेसे गुरगुरुक सन्तान होती है और न मिलनेसे बालक और माता दोनों भय रहता है । गर्भवतीकी इच्छा जिन जिन द्रव्याँसे संवन्ध रखने वाले पदार्थकी हो यदि वे न मिले तो उन्हीं २ अंगोंको हानि पहुँचती है । ( सु० १० श० ३ श्लो० २२ मे० २४ )