संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
२७२
सन्तति-शाखा ।
| श्रवण्या | दिन रातमें कितने बार पिलाना चाहिए | दिन रातमें सबलको के बार पिलाना चा° | दिन रातमें निर्बलको के बार पिलाना चा° |
|---|---|---|---|
| सबल | निर्बल | सबल | निर्बल |
| पहला दिन | ४ बार | ३ बार | ३ बार |
| दूसरा दिन | ६ " | ५ " | ५ " |
| ३ दिनसे २० दिन तक | १० " | ८ " | ५ " |
| तीसरे सप्ताहसे १२ मास तक | ८ " | ७ " | ७ " |
| ३ माससे ५ मास तक | ७ " | ६ " | ६ " |
| ६ माससे १२ मास तक | ६ " | ५ " | ५ " |
| १३ माससे १८ मास तक | ५ " | ५ " | ४ " |
वच्चोंको किस तरह और कितना दूध पिलाना चाहिये ? २६३
डेढ़ वर्षके पीछे वच्चोंको माताका दूध पिलाना ही नहीं चाहिये । प्रायः वे वच्चे कि जिनको जन्मसे ही माताका दूध नहीं मिलता उनका पोषण गाय अथवा बकरीके दूध से होता है । इसमें भी स्त्रियाँ अनेक असावधानी करती हैं । इनका यह खयाल होता है कि जितना अधिक बच्चा दूध पीयेगा उतनाही पुष्ट होगा । यह एक भ्रम है । पैसा करनेसे अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं । गाय अथवा बकरीका दूध कितना और कै बार पिलाना चाहिये, विद्वानोंके मतानुसार इसकी भी एक सूची नीचे दी जाती है । यहाँ सूर्य निकलने से अस्त होने तक दिन और शामसे आगे रातका समय जानना चाहिये ।
| अवस्था | सबल वच्चोंको २४ घंटोंमें कै बार और कितना दूध पिलाना चाहिये |
|---|---|
| दिनमें कै बार | रातमें कै बार |
| पहला दिन | ३ |
| दूसरा दिन | ३ |
| ३ दिनसे १० दिनतक | ४ |
| ११ दिनसे २० दिनतक | ५ |
| २१ दिनसे ३० दिनतक | ६ |
| १ माससे ११ मासतक | ६ |
| ११ माससे २ मासतक | ८ |
| तीसरे महीनेसे पाँचवेंतक | ८ |
| छठे और सातवें मासमें | ८ |
| आठवें और नवें मासमें | ८ |
| दसवें और ग्यारहवें मासमें | ८ |
| बारहवें महीनेमें | ८ |
| तेरहवेंसे १८ मासतक | ८ |
२६४
सन्तति-शास्त्र ।
श्रवस्था | निर्वल बच्चेको २४ घंटैमै कै वार और कितना दूध पिलाना चाहिये ---|--- दिनमै कै वार | रातमै कै वार | कितना दूध दिन रातमै पहला दिन | २ | वार | १ | वार | ३ | छटांक दूसरा दिन | २ | " | १ | " | ३ | " ३ दिनसे १० दिनतक | ३ | " | २ | " | ५ | " ११ दिनसे २० दिनतक | ५ | " | २ | " | ७ | " २१ दिनसे ३० दिनतक | ५ | " | ३ | " | ८ | " १ माससे ११ मासतक | ६ | " | ३ | " | १० | " ११ माससे २ मासतक | ६ | " | ३ | " | १२ | " तीससे महीनेसे पांचवैँतक | ७ | " | ३ | " | ११ | सेर छठे और सातवैँ मासमै | ७ | " | ३ | " | ११ | " आठवैँ और सातवैँ मासमै | ७ | " | ३ | " | ११ | " दसवैँ और ग्यारहवैँ मासमै | ७ | " | ३ | " | २१ | " बारहवैँ महीनेमै | ७ | " | ३ | " | २१ | " बारहवैँसे १८ मासतक | ७ | " | ३ | " | २१ | "
सबल और निर्वलसे यह मतलब नहीं है कि अत्यन्त सबल और अत्यन्त निर्वल, इससे यह अर्थ लेना चाहिये कि अच्छे शरीरवाला और निर्वल वह कि जो अच्छेसे कुछ निर्वल हो। जो बच्चे अत्यन्त दुर्बल हों उनकी योग्यता के अनुसार व्यवहार करना चाहिये। छ मासके बाद बच्चोंको कुछ थोड़ा थोड़ा अन्न देना चाहिये। इस प्रकार बच्चेका पोषण करना भविष्यके लिये अच्छा है।
बच्चोंकी ज्ञानेन्द्रिय ।
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(६६) बच्चोंकी ज्ञानेन्द्रिय ।
जिस प्रकार हमारी ज्ञानेन्द्रिय प्रबल होती है, इस प्रकार तुरन्तके पैदा हुए बच्चेकी नहीं होती । पैदा होनेसे चौबीस घंटेतक बच्चोंको कुछ नहीं सुनाई देता । इसके बाद थोडाथोड़ा सुनने लगते हैं । कारण यह कि बच्चेका मस्तक अत्यन्त कोमल होता है, इसलिये वह धीरे २ अपना काम करता है । इसीसे भारी शब्द होनेपर बच्चेचौंक उठते हैं । चार महीनेके बालकमें मामूली आवाज सुननेकी ताकत आ जाती है । इसी तरह बोलनेके भी अनेक भेद हैं । कोई देरमें और कोई जल्द बोलने लगता है । लड़कोंसे लड़कियाँ जल्द बोलती हैं । प्रायः दो वर्षकी अवस्थातक अच्छी तरह पता नहीं लग सकता कि बच्चा कैसा बोलेगा ? यदि दो वर्षके बाद बच्चा बोलनेमें उन्नति नकरे तो समझना चाहिये कि इसके मस्तकमें कुछ दोष है । होशियार बच्चोंका मस्तक कुछ बड़ा होता है । पैदा होनेपर सर १३ और १४ इञ्च गोल होना चाहिये, यदि छोटा हो तो बच्चेको बुद्धि-हीन समझना चाहिये; क्योंकि बुद्धि मस्तकपर ही निर्भर है । इसलिये मस्तकका वह भाग जहाँ बुद्धिका स्थान है ऐसेबच्चोंमें बहुत छोटा होता है । इसी प्रकार रस उत्पन्न होते ही बच्चेको रसका ज्ञान होता है और स्वादको पहचानने लगता है । सृष्टिनेका ज्ञान भी उसी समय होता है जबकि प्राणेन्द्रिय कुछ प्रबल पड़ती है । यह प्रायः डेढ़ सालके बाद होता है । इसी प्रकार और इन्द्रियाँ अपने समयपर विकास पाती हैं ।
(६७) स्त्री और पशुओंके दूधका अन्तर ।
जबतक बच्चा अन्न न खाने लगे उस समयतक उसका जीवन दूधपर ही निर्भर रहता है । इसलिये ईश्वरने स्त्री, गाय,
66. वच्चोंकी शानेन्डिय
२६६
सन्तति-शास्त्र ।
मैंस और वकरीके दूधको आहारके सारे अंशोंसे युक्त बनाया है, इस कारण माताका दूध न मिलनेपर नाय मैंस और वकरीका दूध बनाकर पिलानेमें बच्चोंको कुछ हानि नहीं होती ।
दूधके पृथक् पृथक् अंशोंकी सूची ।
| अंश | १००भाग दूध | १००भाग दूध | १००भाग दूध | १००भाग दूध |
|---|---|---|---|---|
| स्त्रीका दूध | नायका दूध | मैंसका दूध | वकरीका दूध | |
| श्रीका अंश | ४ | ४ | भाग ७ | भाग ४ |
| मर्दान या निष्ठास्तेका अंश | ७ | ४ | ४ | ४ |
| मांसका अंश | १३ | ३३ | ४ | ३३ |
| नामकका अंश | १ | १ | ३ | १ |
| पानीका अंश | ८७ | ८७ | ८४ | ८७ |
| भाग | भाग | भाग | भाग | |
| " | " | " | " | |
| " | " | " | " | |
| " | " | " | " | |
| " | " | " | " |
दूध कैसे बिगड़ता है ?
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यह मामूली तौरसे रहनेवाली खियों और गाय भैंसों की सूची है। उत्तम और मध्यम आहार होनेपर अंशोंके प्रमाणमें कम व বেশ समझना चाहिये।
- (१) घीका अंश। इससे चरबी बनती है—गरमी उत्पन्न होती है। वदन मोटा होता है वजन और दिमागकी ताकत बढ़ती है। हड्डियाँ पुष्ट होती हैं। शरीर मुलायम और चिकना होता है।
- (२) मेदा ( निशास्ते ) का अंश। इससे गरमी उत्पन्न होती है। शरीर मोटा होता है। बल उत्पन्न होता है। मांस और चरबीके काममें सहायता पहुँचती है।
- (३) मांसका अंश। इससे मांस बनता है—बदन मोटा पड़ता है और तौल बढ़ती है।
- (४) नमकका अंश। इससे खून और हड्डियाँ बनती हैं। जो अंश नमकका खूनमें मिलनेसे रह जाता है वह पेशाबमें मिलकर निकल जाता है। इसी कारण पेशाब खारी होता है।
- (५) पानीका अंश। इसका काम यह है कि यह सबको पचाकर अपना अपना काम करनेमें सहायता दे और हर एकको उसके स्थानमें पहुँचावे। बहुतेरे यह मानते हैं कि माता और गायोंका दूध दूषित होता ही नहीं, यह एक खासी भूल है। अनेक कारणोंसे दूध दूषित होकर हाँनि पहुँचती है। अतएव भोजन इत्यादिमें माताओंको अत्यन्त सावधानी रखनी चाहिये, क्योंकि दूध दूषित होनेका मूल कारण आहार-विहारकी असावधानी ही है।
(६८) दूध कैसे बिगड़ता है ?
दूध वह पदार्थ है कि जिसपर बच्चेका जीवन निर्भर है यह
68. दूध कैसे विगडता है ?
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सन्तति-शास्त्र ।
अनेक प्रकारकी असावधानियोंने दूषित हो जाना है और माताओंको जरा भी पता नहीं चलता। बच्चोंके रोगी होनेपर चिकित्सकोंकी जरा भी दृष्टि दूषपर नहीं जाती। अनेक विद्वानोंकी राय है कि दूषके विगड़नेसे ही बच्चोंमें अधिकांग रोग उत्पन्न होते हैं, जिसके अनेक कारण हैं।
१. वैयक्तिका मत।
- १. माता श्रववा धावके भारी आहार और दूषित व्यवहार से शरीरमें दोष उत्पन्न होकर दूष विगाड़ देते हैं। ( श० क० )
- २. अनिर्भयुत, शोक, चिन्ता, भय और क्रोधसे । ( श० क० )
- ३. माताके अनेक प्रकारके रोगोंसे । ( श० क० )
- ४. दूधमें, घी, खाड़, मांस और नमकका अंश कम हो जानेसे। ऐसा उस समयमें होता है जब कि स्त्री की दूध इत्यादि पौष्टिक पदार्थ न खावे। ( रतिशास्त्र )
- ५. पैंतीस वर्षकी श्रवस्थाके ऊपरवाली माताका दूष हलका पड़ जाता है। गर्भवती स्त्रीका दूष तीन मानके बाद विगड़ जाता है। ( श० क० )
- ६. अधिक मेहनत करनेसे दूधमें मांसका अंश कम हो जाता है। ( रतिशास्त्र )
- ८. बुरी शौपधियोंके बानेसे दूषके सारे अंश दूषित हो जाने हैं।
- ९. आहार और विहारसे वात, पित्त और कफ अलग अलग या एक साथ विगड़ कर दोष उत्पन्न कर देते हैं। ( श० क० )
इस प्रकारसे विगड़े हुए दूधमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं।
दूध कैसे विगाड़ता है ?
२६६
१. यदि दूधका रंग काला अथवा लाल रंगका कसैला जिसमें कुछ वास आती है, अत्यंत रुखा, तरल, भागदार हलका जिसमें बच्चों को रुस करनेकी शक्ति न हो, दुबला करनेवाला, जिसके पीनेसे वायु उत्पन्न हो इस प्रकारका दूध वात-दोषसे दूषित होता है।
(च० श० अ० ८ श्लो० १०८)
२. यदि दूधका रंग काला, नीला, पीला और तांबेके रंगका कड़ुआ खड़ा या चरपरा हो और गंध मुग्दे या क्षधिर-किसी हो, अत्यन्त गरम पित्त-योग उत्पन्न करनेवाला, ऐसा दूध पित्त-दोषसे दूषित होता है।
(च० श० अ० ८ श्लो० १०९)
३. यदि दूधका रंग अत्यन्त सफेद अत्यन्त मीठा और नमकीन हो जिसमें घी, तेल, वसा और मजाके समान गंध तंतु युक्त अथवा पानीमें डालनेसे झूब जावे जिससे कफ पैदा हो, ऐसा दूध कफसे दूषित होता है।
(च० श० अ० ८ श्लो० ११०)
४. यदि वात, पित्त और कफ तीनों दोषके लक्षण मिले तो सन्निपातसे दूषित और यदि दो प्रकारके दूषित लक्षण मिले तो द्विदोषसे दूषित जानना चाहिये। (भा० वा०)
इस प्रकारके दूषित दूध पीनेसे बच्चोंमें अनेक लक्षण प्रगट होते हैं।
१. शरीरकी तौलका कम होना नींद कम आना, उल्टी होना, शरीरका दुबलापन, बलगम पैदा होना, भागदार हरे दस्त आना, आंतोंमें विगाड़, अतिसार, दस्तमें फटा दूध निकलना, पाचन-शक्तिका विगाड़, बराबर कै दस्त और हिचकीका होना इत्यादि।
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सम्बन्धित-शाल ।
पैसे लक्ष्योंसे बच्चोंको उंगी समझना चाहिये। बच्चोंका वजन कम होनेकी जांच नौलसे हो सकती है। जब विगड़े हुए दूधका अस्तर वजन पर पड़ता है तब दूध थोड़ा सा ज्वर जल्द रहता है। मोटी वाजी खियामें प्रायः गाढ़ा दूध होता है। इससे स्पष्ट अचानक बड़े और दूधसे भरे रहते हैं। दूध गाढ़ा क्यों हो जाता है? इसका कारण तमदार चर्बी बढ़ानेवाले पुष्ट पदार्थोंका संचय है। इसी प्रकार कम और पतले दूधका विकार भी होता है। गाढ़े दूध होनेपर मावोंका हलका भोजन करना चाहिये। पौष्टिक पदार्थ बढ़ा देना चाहिये। बहुत दिनो तक पिलानेसे भी पौष्टिक पदार्थ बढ़ा देना चाहिये। ज्यादा दिन दूध पिलानेसे अनेक रोग हो जाते हैं। इन्सानिये ज्यादा दिन दूध पिलानेसे बड़े बंधनेके पिलाता उचम माना है। जितने दिनों दूध पीनेवाले पीनेवा उतनी ही देर रजस्वला होनेमें होगी। इस कारण कि वह अथ रज दनमें सहाय होता है। यही कारण है कि दूध पिलावेवाली मावोंको रज कुछ कम निकलता है। खियोंको हर समय यह विचार रखना चाहिये कि वे ऐसी असावधानियोंसे बचे कि जिनसे दूध दूधित हो जाता है। अपना दूध निकाल कर क्षय परीक्षा कर लेनी चाहिये !
जो दूध पानमें डालनेसे मिल जावे, जिसका रंग कुल्हे पीलापन लिये हो, जो जलमें धारोंको न छोड़े हलका और न जमनेवाला ऐसा दूध शुद्ध होता है।
पैनी दशामें बड़ी कठिनाई पड़ती है, जब कि गोदिका बच्चा दूध पीता हो और गर्म रह जावे, ऐसे समयका दूध हानि पहुँचाता है केवल गोदके ही बच्चोंको नहीं, गर्मके बालक
सन्तति-शास्त्र ।
२७१
( ७२ )
बच्चोंके दाँत निकलते समयकी सावधानियाँ
बच्चोंके दाँत प्रायः छठे-सातवें महीनेसे निकलने आरम्भ होते हैं । इस समय बच्चोंको कई प्रकारके कष्ट होते हैं, जैसे—
१. मसूढ़ोंमें सूजन और दर्द होना ।
२. लारका अधिक बहना ।
३. हल्का ज्वर (बुखार) आना ।
४. दस्त (पतले पाखाने) लगना ।
५. चिड़चिड़ापन और बेचैनी होना ।
उपाय और सावधानियाँ :
१. मसूढ़ोंपर दिनमें दो-तीन बार शहद या सुहागेका फूला शहदमें मिलाकर धीरे-धीरे मलना चाहिये ।
२. बच्चेको चबानेके लिये साफ और कड़ा खिलौना या गाजर आदि देनी चाहिये ।
३. यदि दस्त अधिक हों तो सौंफ और अतीसका काढ़ा या घुट्टी देनी चाहिये ।
४. बच्चेके पेटको साफ रखना चाहिये और सुपाच्य भोजन देना चाहिये ।
५. दूध स्वच्छ और ताजा ही देना चाहिये ।
69. स्तनोंके रोग
२७२
सन्तति-शास्त्र ।
दिये हैं, परन्तु इसका विचार न करते हुये स्त्रियां विलकुल भूल गई स्तनोंकी रक्षा के लिये उनपर कितनी बड़ी जिम्मेदारी है। जहाँतक देखा जाता है स्त्रियोंकी असावधानीसे स्तनोंमें अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न हो जाते हैं, जिसके अनेक भेद हैं।
• स्तनोंको सूजन । इसके अनेक कारण हैं।
१ निर्बल स्तनोंमें सरदी गरमीके पहुँचनेसे।
२ पुरुषोंके कड़े हाथ, सोते समयमें किसी प्रकारकीकठिन रगड़ और दूध-पीते वच्चोंके सरकी चोदसे।
३ वच्चोंके दांत या किसी प्रकारकी चोट लगनेसे।
ऐसी सूजनमें अनेक लक्षण प्रतीत होते हैं।
१. स्तनोंका लाल हो जाना।
२ उर्दू, कभी कभी कठिन पीड़ा।
ऐसी सूजन दो तरहकी होती है। एक हलकी, दूसरी भारी। हलकी सूजन जब अच्छी नहीं होती तो वह भारी और पुरानी हो जाती है। जब वच्चेके दूध पीनेके पहले सूजन हो, तो सरदी गरमी तथा कड़े हाथके लगनेसे होती है। वच्चेके दूध पीनेके बाद और कारणोंसे सम्भक्ता चाहिये। जब सूजन गहरी होती है तो मवाद पड़ जाती है वैद्यकका मत है कि वात-पित्त कफके अलग अलग या इनके मिले हुए दोषोंसे स्तनोंका मांस रक्त और शिराजाल दूषित होकर अनेक रोग उत्पन्न होते हैं।
(श० क०)
२. स्तनोत्तर्द । इसके कई कारण हैं।
१. जब स्तनोंमें पसीना आ रहा हो तो सूर्य वायुके लगनेसे २ वातके प्रकोपसे।
स्तनोंके रोग ।
२७३
३. किसी प्रकारका दवाव पहुँचनेसे जब कि नसें और गिलटियाँ दब जावें या पेंट जावें ।
ऐसे दर्दमें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. सूजनका न होना ।
२. नसोंमें गाँठ पड़ जाना या मोटी हो जाना ।
ऐसे दर्दमें मवाद नहीं पड़ती है और न रगत बदलती है ।
३ स्तनोका सूख जाना । इसके कई कारण हैं ।
१. निर्बलता, दमा और कफके प्रकोपसे ।
२. तपेदिक, शरीरमें रक्तके न बनने और विषम ज्वरसे ।
३. रजस्वला होनेके पहले या होनेपर जब कि शरीर अत्यन्त निर्बल हो, पुरुषका संसर्ग होनेसे ।
ऐसे रोगमें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. स्तनमें गिलटियोंका सूखना ।
२. भिटनीका सुरक्षा जाना ।
ऐसी दशामें दूध नहीं निकलता, स्तन सूखते चले आते हैं ।
स्तानोंकी खजली । इसके कई कारण हैं ।
१. रक्त-विकार और छूतदार रोगोंसे ।
२. दाढ़का पानी या प्रसव समयमें बहते हुए खून या पानीके लग जानेसे ।
३. रजके लगने या खुजलाते समय नाखूनके विकारोंसे ।
एसी दशामें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. छोटे छोटे दाने पोस्त सरीखे पड़ जाते हैं ।
२. स्तनका रंग लाल हो जाता है ।
जब ऐसा होता है । तो दाने फूट जाते हैं और जहाँ वह पनी लगता है वहाँ दूसरे दाने पड़ते जाते हैं । इसमें सफाईकी बड़ी जरूरत है ।
२७४
सन्तति-शास्त्र ।
५. स्तनोंका फावा । यह तीन तरहका होता है । (१) वह कि जो स्तनोंकी गिलटियाँमें हो । इसे स्तनका गहरा फोड़ा कहते हैं । (२) वह कि जो खालकी तहमें पीप पड़नेसे हो, इसको उथला फोड़ा कहते हैं । (३) वह कि जब स्तनके पड़ोके मध्यमें पीप पड़ जाय । इसको पटुका गहरा फोड़ा कहते हैं । इनके कई कारण हैं ।
१. वात-पित्त और कफके अलग अलग या सन्मिलित विगाडसे ।
२. दवाय, चोट और रगडसे ।
ऐसी दशामें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. स्तनोंका लाल पड़ जाना और कठिन धर ।
२. ज्वरका बराबर रहना और जलन ।
३. छुनेसे गरम प्रतीत होना ।
प्रायःलोग इसको धर्नेली कहते हैं । यह जिस स्तनमें होती है उसको दूध नहीं रहता या कम पड़ जाता है । नासुर होनेका भी भय रहता है जब कि फोड़ा अपने आप फूटे ।
६ स्तनोंका लाल पड़ जाना । इसके अनेक कारण हैं ।
१. वात-पित्त और कफकी अलग अलग या तीनोंकी मिली हुई खराबीसे ।
२. आमशय, जिंगर, अण्डे, गुरदे और गर्भाशयके विकारसे ।
३. गरमी, सूजाक और आतशकके प्रकोपसे ।
ऐसी दशामें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. भिटनीके चारों ओर स्याहीमें छोटे छोटे दाने पड़ जाते हैं ।
२. खाजका आना और चकत्ते से पड़ जाना ।
स्तनोंके रोग ।
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जब ऐसे दाने पड़कर फूटते हैं तो जहाँ वह पानी लगता है वहाँ वैसे ही दाने पड़ जाते हैं ।
७ स्तनोंका वदना । इसके कई कारण हैं ।
१. गर्भाशयके विकारसे ।
२. ऐसे भोजनसे कि जिससे चरबी अधिक बनती है ।
ऐसी दशामें अनेक लक्षण होते हैं ।
१ स्तनोंमें दूधका अधिक आना ।
२. थोड़ी थड़ीसी सरसराहट मालूम होती है ।
३. स्तनों का मोटा हो जाना ।
जब ऐसा होता है तो स्तन बढ़ते चले जाते हैं, परन्तु यह रोग उसी समय होता है जब कि बच्चा पीता हो या गर्भ हो । ये इतने बढ़ जाते हैं कि स्वयं स्त्रिको दुःख होने लगता है । चलवान् स्त्रियोंमें अधिक पाया जाता है । प्रायः देखा गया है कि स्तन इतने बढ़ जाते हैं कि पीठके पीछे बैठकर बगलसे लेजाकर बच्चे पीते है यह रोग रडियोंमें प्रायः होता है ।
८. स्तनकी कठोरता—इसके कई कारण हैं ।
१ जो माताएँ अपने वदन और स्तनोंको सुन्दर सुडौल बनाये रहनेके कारण दूध रहते हुए बच्चोंको नहीं पिलातीं उनकी छातियोंमें दूध सूखकर स्तन कठोर हो जाते हैं ।
२. दूध न होता और स्तनका छोटा होना ।
ऐसी दशामें कई लक्षण होने हैं ।
१. स्तन कड़ा पड़ जाता है और दूध नहीं आता ।
२. टटोलनेसे स्तनमें गिलदियाँ आपसमें जकड़ी सी मालूम होती हैं और भिटनी छोटी पड़ जाती है ।
जब ऐसी दशा होती है तब दूध नहीं आता । स्तन कड़े बने रहते हैं और कुछ छोटे हो जाते हैं ।
२७६
सन्तति-शास्त्र ।
१. भिट्ठीका फोड़ा—इसके कई कारण हैं ।
१. चोद, रगड़ और दवाव पड़नेसे ।
२. वात-वित्त और कफके अलग अलग या सम्मिलित प्रकोपसे ।
३. रक्तविकार और गरमी सृजाक ऐसे छूतदार रोंगों के होने से ।
पेसी दशामें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. भिट्ठीके नीचेकी काली जगह लाल पड़ जाती है ।
२. खाज और दर्दका होना ।
ऐसे फोड़को आपसे न फूटने देना चाहिये । चीर कर मवाद निकाल देना उत्तम है । आपसे फूटनेमें नासुर होनेका भय रहता है । पेसी दशामें या तो दूध कम हो जाता है या वृद्ध हो जाता है ।
१० भिट्ठीका धाव । इसके कई कारण हैं ।
१. उन वच्चोंके दाँत लगनेसे कि जिनको दाँतोंका रोंग है ।
२. गरमी सृजाक ऐसे छूतदार रोंगों के होने या छूतसे ।
पेसी दशामें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. दूध पिलाने और छूनेमें कष्ट ।
२. स्तनोंपर कुछ लाली आ जाती है ।
इसमें बहुत बड़ी सर्फाईकी जरूरत है । दूध पिलाना हानि पहुँचाता है ।
११ स्तनोंके झाले । इसके कई कारण हैं ।
१. जब कि स्त्रीको गरमी सृजाक इत्यादि छूतदार रोगहो ।
२. ऐसे बालकके दाँत लगनेसे कि जिसके पिता को गरमी सृजाक और आतिशक हुआ हो ।
३. रक्तविकार से ।
बच्चोंको कैसे सुलाना चाहिये ?
२७७
ऐसी दशामें अनेक लक्षण होने हैं।
१. स्तनोंमें गरमी रोगकेसे चकत्ते पड़ जाते हैं।
२. दाढ़की तरह खाज आने लगती है।
३. छातीसे पानी बराबर निकलता रहता है।
जब ऐसा होता है तो छोले बराबर फैलते चले जाते हैं। इसमें सफाईकी बड़ी जरूरत है।
इसी प्रकारके अनेक रोगोंमें आजकल स्त्रियाँ फँसकर अपना जीवन व्यतीत कर रही हैं। स्त्रियोंको असावधानताकी ओर विशेष ध्यान देना चाहिये। ( भाग क० )
(७०) बच्चोंको कैसे सुलाना चाहिये ?
हमारे देशमें यह बात सब जगह पाई जाती है कि माताएँ बच्चोंको अपने साथ सुलाती हैं; परन्तु प्रकृतिके नियमानुसार जरूरत मालूम होती है कि बच्चा अलग सुलाया जाय। एक साथ सोनेमें माताएँ बड़ी असावधानी करती हैं। स्त्रियाँ नीदमें ग्रसित होकर बेहोश सोती हैं। कई जगह ऐसा हुआ है कि जवान और मोटी माताओंका हाथ बच्चेके मुँह और नाकपर पड़ा रहा, श्वास बन्द हो गया। बच्चा चल बसा। बच्चेके हाथ पाँवका दब जाना, पलंगसे नीचे गिर पड़ना, यह तो रोज का काम है। इसलिये माताके पलंगके पास बच्चेके लिये एक घेरेदार पलंग होना चाहिये कि जिससे वह अकेले सोनेमें नीचे न गिरे। माताके पास सोनेसे बच्चेको अनेक रोग हो जाते हैं।
१. कुपच।
१. पास सोनेसे बच्चा बार बार दूध पीता है और अधिक पी जानेसे नहीं पच्चा सकता, अतएव कुपच हो जाती है।
70. वच्चोंको कैसे छुलाना चाहिये ?
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सन्तति-शास्त्र ।
२. कानके रोग ।
१. जो माताएँ सोते हुए बच्चेको दूध पिलाती हैं उन बच्चों-में दूध कानमें आ जाता है इससे अनेक रोग हो जाते हैं। ( श० क० )
१ बहरापन २ कानका बहना ३ कानका नासूर ४ परदेका मोटा पड जाना ५ परदेकी सूजन इत्यादि ।
३. शरीरमें गरमीका परिवर्तन ।
१. माताके पास सोनेसे बच्चेमें माताके शरीरकी गरमी-का प्रवेश हो जाता है । जो गरमी बच्चोंमें होती है उससे अधिक पहुँचनेमें हानि है । जब कभी माताको ज्वर आता है तो वह बच्चेको अलग नहीं सुलाती । पास सोने और ज्वरका दूध पीनेसे बच्चेको भी ज्वर आ जाता है ।
४. श्वाँस-रोग ।
१. पास सोनेवाले बच्चोंमें माताके श्वाँस रोगका संचार हो जाता है । इस कारण कि माताके पेटसे निकली हुई श्वाँस बच्चेकी श्वाँसके साथ मिल कर अन्दर पहुँचती है और वहाँ फेफड़ोंको खराब कर देती है । यह दशा उस समय होती है जब कि माता और बच्चा दोनों मुँह बन्द करके जाड़ेमें एक लिहाफके अन्दर सोते हैं ।
अतएव बच्चोंको ऐसी थान डालनी चाहिये कि जिससे वे रातमें खूब सोवें । दिनमें इतना न सुलाना चाहिये कि रातमें खूब जागें । यदि इनको रातमें नींद न आवे तो वो वातें समझनी चाहिये—भूख और कुपच । इस प्रकार अलग न सोनेसे बच्चे
बच्चा होनेके कितने दिन बाद गर्भधारण होना चाहिये । २७९
माया रोगी रहते हैं । माताओंको इन बातोंपर ध्यान देना जरूरी है ।
(७१) बच्चा होनेके कितने दिन बाद गर्भधारण होना चाहिये ?
यह एक बड़ा प्रश्न है । लोग इसपर बहुत कम ध्यान देते हैं । लोगोमें इस बातकी विवेचना ही नहीं कि संयोग बच्चा होनेके कितने दिनों बाद होना चाहिये ? इससे तो यह बात कहीं दूर है । लोग यह विचार करते हैं कि जितने बच्चे हो उतना ही अच्छा; परन्तु जल्दी जल्दी सन्तान होना अच्छा नहीं । इस विषयमें अनेक मत हैं ।
१. वैद्यकका मत ।
१. जब बच्चोंको मातासे कुछ भी वास्ता न रहे, वह अच्छी तरह अन्न खाकर जी सके, इसके बाद दूसरी सन्तान होनी चाहिये । ( श० क० )
२. बच्चा होनेके पाँच वर्ष बाद दूसरी सन्तान होनी चाहिये । ( रतिशास्त्र )
२. धर्मशास्त्रका मत ।
१. बच्चा तीन वर्षोंका पूरा होनेके बाद दूसरा गर्भाधान होनी चाहिये । ( वा० य० )
लोग कामवश होकर जल्दी संयोग कर बैठते हैं और इसी कारण बच्चा पैदा होनेके कुछ ही दिनों बाद गर्भ रह जाता है । इसमें अनेक दोष हैं । स्त्रीके श्रवयवमें विगाड़ हो जाता है । गोदका बच्चा दूध उत्तम और ठीक तौरसे नहीं पीने पाता । बच्चा जिस समयतक दूध पीता है उस समयतक माताके
71. वच्चा होनेके कितने दिन बाद गर्भधारण होना चाहिये ?
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सन्तति-शास्त्र ।
शरीरका पोषण कम होता है क्योंकि जो कुछ माता से उसके रससे बच्चेका भी पोषण होता है। यदि दो साल दूध पीवे तो इसके बाद माता जो कुछ भोजन करती है उससे पूरे रससे माताका पोषण होता है। एक विद्वानकी राय है कि जिस समयसे बच्चा दूध पीना छोड़ता है उससे एक साल तक यदि स्त्रीको गर्भ न रहे और उत्तम आहार मिला करे तो स्त्रीका शरीर गर्भ धारण होनेके पहलेका सा पुष्ट हो जावेगा और पेटके सारे अवयव, यदि उनमें कोई विकार उत्पन्न नहीं हुआ है तो, उत्तम हो जावेगा। इन बातोंपर विचार करते हुए यह बात निश्चय होती है कि दा वयतक दूध पिलाकर इसके एक साल बाद अर्थात् बच्चा पैदा होनेसे तीन वर्ष बाद गर्भाधान होना चाहिये।
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