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शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

रुद्रसंहिता: पंचम (युद्ध) खण्ड

रुद्रसंहिता, पंचम ( युद्ध ) खण्ड

तारकपुत्र तारकाक्ष, विद्युन्माली और कमलाक्षकी तपस्या, ब्रह्माद्वारा उन्हें वर-प्रदान, मयद्वारा उनके लिये तीन पुरोंका निर्माण और उनकी सजावट-शोभाका वर्णन

नारदजीने कहा—पिताजी! जो गणेश और स्वामिकार्तिककी उत्तम कथाओंसे ओतप्रोत तथा आनन्द प्रदान करनेवाला है, भगवान् शंकरके गृहस्थ-सम्बन्धी उस उत्तम चरित्रको हमने सुन लिया। अब आप कृपा करके उस परमोत्तम चरित्रका वर्णन कीजिये, जिसमें रुद्रदेवने खेल-ही-खेलमें दुष्टोंका वध किया था। महान् वीर्यशाली भगवान् शंकरने देवद्रोहियोंके तीनों नगरोंको एक ही साथ एक ही बाणसे किस कारण एवं कैसे भस्म कर डाला था ? भगवन्! जिनके भालमें बालचन्द्रमा सुशोभित है तथा जो सदा मायाके साथ विहार करनेवाले हैं, उन भगवान् शंकरका चरित तो देवर्षियोंको आनन्द प्रदान करनेवाला है। आप वह सारा चरित विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।

ब्रह्माजी बोले—ऋषिश्रेष्ठ! पहले किसी समय व्यासने सनत्कुमारसे ऐसा ही प्रश्न किया था। उस समय सनत्कुमारने जो कुछ उत्तर दिया था, वही मैं वर्णन करता हूँ।

उस समय सनत्कुमारने कहा था—महाबुद्धिमान् व्यासजी! विश्वका संहार करनेवाले चन्द्रमौलि शिवने जिस प्रकार एक ही बाणसे त्रिपुरको भस्म किया था, वह चरित्र कहता हूँ; सुनो। मुनीश्वर! जब शिवकुमार स्कन्दने तारकासुरको मार डाला, तब उसके तीनों पुत्रोंको महान् संताप हुआ। उनमें तारकाक्ष सबसे ज्येष्ठ था, विद्युन्माली मझला था और छोटेका नाम कमलाक्ष था। उन तीनोंमें समान बल था। वे जितेन्द्रिय, सदा कार्यके लिये उद्यत, संयमी, सत्यवादी, दृढ़चित्त, महान् वीर और देवोंसे द्रोह करनेवाले थे। उन तीनोंने सभी उत्तमोत्तम एवं मनोहर भोगोंका परित्याग करके मेरुपर्वतकी एक कन्दरामें जाकर परम अद्भुत तपस्या आरम्भ की। वहाँ उन्होंने हजारों वर्षोंतक ब्रह्माजीकी प्रसन्नताके लिये अत्यन्त उग्र तप किया। तब सुर और असुरोंके गुरु महायशस्वी ब्रह्माजी उनकी तपस्यासे अत्यन्त संतुष्ट होकर उन्हें वर देनेके लिये प्रकट हुए।

ब्रह्माजीने कहा—महादैत्यो! मैं तुम-लोगोंके तपसे प्रसन्न हो गया हूँ, अतः तुम्हारी कामनाके अनुसार तुम्हें सभी वर प्रदान करूँगा। देवद्रोहियो! मैं सबकी तपस्याके फलदाता और सर्वदा सब कुछ करनेमें समर्थ हूँ; अतः बताओ, तुमलोगोंनें

३७० * संक्षिप्त शिवपुराण *

इतना घोर तप किसलिये किया है?

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! ब्रह्माजीकी वह बात सुनकर उन सबने अंजलि बाँधकर पितामहके चरणोंमें प्रणिपात किया और फिर धीरे-धीरे अपने मनकी बात कहना आरम्भ किया।

दैत्य बोले—देवेश! यदि आप हमपर प्रसन्न हैं और हमें वर देना चाहते हैं तो यह वर दीजिये कि समस्त प्राणियोंमें हम सबके लिये अवध्य हो जायँ। जगन्नाथ! आप हमें स्थिर कर दें और हमारे जरा, रोग आदि सभी शत्रु नष्ट हो जायँ तथा कभी भी मृत्यु हमारे समीप न फटके। हमलोगोंका ऐसा विचार है कि हमलोग अजर-अमर हो जायँ और त्रिलोकीमें अन्य सभी प्राणियोंको मौतके घाट उतारते रहें; क्योंकि ब्रह्मन्! यदि पाँच ही दिनोंमें कालके गालमें चला जाना निश्चित ही है तो अतुल लक्ष्मी, उत्तमोत्तम नगर, अन्यान्य भोग-सामग्री, उत्कृष्ट पद और ऐश्वर्यसे क्या प्रयोजन है। मेरे विचारसे तो उस प्राणीके लिये ये सभी व्यर्थ हैं।

सनत्कुमारजी कहते हैं—महर्षे! उन तपस्वी दैत्योंकी यह बात सुनकर ब्रह्मा अपने स्वामी गिरिशायी भगवान् शंकरका ध्यान करके बोले।

ब्रह्माजीने कहा—असुरो! अमरत्व सभीको नहीं मिल सकता, अतः तुमलोग अपना यह विचार छोड़ दो। इसके अतिरिक्त अन्य कोई वर जो तुम्हें रुचता हो, माँग लो। क्योंकि दैत्यो! इस भूतलपर जहाँ कहीं भी जो प्राणी जन्मा है अथवा जन्म लेगा, वह जगत्में अजर-अमर नहीं हो सकता। इसलिये पापरहित असुरो! तुमलोग स्वयं अपनी बुद्धिसे विचारकर मृत्युकी वंचना करते हुए कोई ऐसा दुर्लभ एवं दुःसाध्य वर माँग लो, जो देवता और असुरोंके लिये अशक्य हो। उस प्रसंगमें तुमलोग अपने बलका आश्रय लेकर पृथक्-पृथक् अपने मरणमें किसी हेतुको माँग लो, जिससे तुम्हारी रक्षा हो जाय और मृत्यु तुम्हें वरण न कर सके।

सनत्कुमारजी कहते हैं—महर्षे! ब्रह्माजीके ऐसे वचन सुनकर वे दो घड़ीतक ध्यानस्थ हो गये, फिर कुछ सोच-विचारकर सर्वलोकपितामह ब्रह्माजीसे बोले।

दैत्योंने कहा—भगवन्! यद्यपि हमलोग प्रबल पराक्रमी हैं तथापि हमारे पास कोई ऐसा घर नहीं है, जहाँ हम शत्रुओंसे सुरक्षित रहकर सुखपूर्वक निवास कर सकें; अतः आप हमारे लिये ऐसे तीन नगरोंका निर्माण करा दीजिये, जो अत्यन्त अद्भुत और सम्पूर्ण सम्पत्तियोंसे सम्पन्न हों तथा देवता जिनका प्रधर्षण न कर सकें। लोकेश! आप तो जगद्गुरु हैं। हमलोग आपकी कृपासे ऐसे तीनों पुरोंमें अधिष्ठित होकर इस पृथ्वीपर विचरण करेंगे। इसी बीच तारकाक्षने कहा कि विश्वकर्मा मेरे लिये जिस नगरका निर्माण करें, वह स्वर्णमय हो और देवता भी उसका भेदन न कर सकें। तत्पश्चात् कमलाक्षने चाँदीके बने हुए अत्यन्त विशाल नगरकी याचना की और विद्युन्मालीने प्रसन्न होकर वज्रके समान कठोर लोहेका बना हुआ बड़ा नगर माँगा। ब्रह्मन्! ये तीनों पुर मध्याह्नके समय अभिजित् मुहूर्तमें चन्द्रमाके पुष्य नक्षत्रपर स्थित होनेपर एक स्थानपर मिला करें और आकाशमें नीले बादलोंपर स्थित होकर ये

* रुद्रसंहिता * ३७१

क्रमशः एकके ऊपर एक रहते हुए लोगोंकी दृष्टिसे ओझल रहें। फिर पुष्करावर्त नामक कालमेघोंके वर्षा करते समय एक सहस्र वर्षके बाद ये तीनों नगर परस्पर मिलें और एकीभावको प्राप्त हों, अन्यथा नहीं। उस समय कृत्तिवासा भगवान् शंकर, जो वैर-भावसे रहित, सर्वदेवमय और सबके देव हैं। लीलापूर्वक सम्पूर्ण सामग्रियोंसे युक्त एक असम्भव रथपर बैठकर एक अनोखे बाणसे हमारे पुरोंका भेदन करें। किंतु भगवान् शंकर सदा हमलोगोंके वन्दनीय, पूज्य और अभिवादनके पात्र हैं; अतः वे हमलोगोंको कैसे भस्म करेंगे—मनमें ऐसी धारणा करके हम ऐसे दुर्लभ वरको माँग रहे हैं।

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! उन दैत्योंका कथन सुनकर सृष्टिकर्ता लोक-पितामह ब्रह्माने शिवजीका स्मरण करके उनसे कहा कि 'अच्छा, ऐसा ही होगा।' फिर मयको भी आज्ञा देते हुए उन्होंने कहा—'हे मय! तुम सोने, चाँदी और लोहेके तीन नगर बना दो।' यों मयको आदेश देकर ब्रह्माजी उन तारकपुत्रोंके देखते-देखते अपने धाम स्वर्गको चले गये। तदनन्तर धैर्यशाली मयने अपने तपोबलसे नगरोंका निर्माण करना आरम्भ किया। उसने तारकाक्षके लिये स्वर्णमय, कमलाक्षके लिये रजतमय और विद्युन्मालीके लिये लौहमय—यों तीन प्रकारके उत्तम दुर्ग तैयार किये। वे पुर क्रमशः स्वर्ग, अन्तरिक्ष और भूतलपर निर्मित हुए थे। असुरोंके हितमें तत्पर रहनेवाला मय इन तीनों पुरोंको तारकाक्ष आदि असुरोंके हवाले करके स्वयं भी उसीमें प्रवेश कर गया। इस प्रकार उन तीनों पुरोंको पाकर महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न वे तारकासुरके लड़के उनमें प्रविष्ट हुए और समस्त भोगोंका उपभोग करने लगे। वे नगर कल्पवृक्षोंसे व्याप्त तथा हाथी-घोड़ोंसे सम्पन्न थे। उनमें मणिनिर्मित जालियोंसे आच्छादित बहुतेरे महल बने हुए थे। वे पद्मरागके बने हुए एवं सूर्य-मण्डलके समान चमकीले विमानोंसे, जिनमें चारों ओर दरवाजे लगे थे, शोभायमान थे। कैलासशिखरके समान ऊँचे तथा चन्द्रमाके समान उज्ज्वल दिव्य प्रासादों तथा गोपुरोंसे उनकी अद्भुत शोभा हो रही थी। वे अप्सराओं, गन्धर्वों, सिद्धों तथा चारणोंसे खचाखच भरे थे। प्रत्येक महलमें शिवालय तथा अग्निहोत्रशालाकी प्रतिष्ठा हुई थी। उनमें शिवभक्तिपरायण शास्त्रज्ञ ब्राह्मण सदा निवास करते थे। वे बावली, कूप, तालाब और बड़ी-बड़ी तलैयाँसे तथा समूह-के-समूह स्वर्गसे च्युत हुए वृक्षोंसे युक्त उद्यानों और वनोंमें सुशोभित थे। बड़ी-बड़ी नदियों, नदों और छोटी-छोटी सरिताओंसे, जिनमें कमल खिले हुए थे, उनकी शोभा और बढ़ गयी थी। उनमें सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले अनेकों फलोंके भारसे लदे हुए वृक्ष लगे थे, जिनसे वे नगर विशेष मनोहर लगते थे। वे झुंड-के-झुंड मदमत्त गजराजोंसे, सुन्दर-सुन्दर घोड़ोंसे, नाना प्रकारके आकार-प्रकारवाले रथों एवं शिबिकाओंसे अलंकृत थे। उनमें समयानुसार पृथक्-पृथक् क्रीडास्थल बने थे और वेदाध्ययनकी पाठशालाएँ भी भिन्न-भिन्न निर्मित हुई थीं। वे पापी पुरुषोंके लिये मन-वाणीसे भी अगोचर थे। उन्हें सदाचारी

३७२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

पुण्यशील महात्मा ही देख सकते थे। पतिसेवापरायण तथा कुधर्मसे विमुख रहनेवाली पतिव्रता नारियोंने उन नगरोंके उत्तम स्थलोंको सर्वत्र पवित्र कर रखा था। उनमें महाभाग शूरवीर दैत्य और श्रुति-स्मृतिके अर्थके तत्त्वज्ञ एवं स्वधर्मपरायण ब्राह्मण अपनी स्त्रियों तथा पुत्रोंके साथ निवास करते थे। उनमें मयद्वारा सुरक्षित ऐसे सुदृढ़ पराक्रमी वीर भरे हुए थे, जिनके केश नील कमलके समान नीले और घुँघराले थे। वे सभी सुशिक्षित थे, जिससे उनमें सदा युद्धकी लालसा भरी रहती थी। वे बड़े-बड़े समरोंसे प्रेम करनेवाले थे, ब्रह्मा और शिवका पूजन करनेसे उनके पराक्रम विशुद्ध थे; वे सूर्य, मरुद्गण और महेन्द्रके समान बली थे और देवताओंके मथन करनेवाले थे। वेदों, शास्त्रों और पुराणोंमें जिन-जिन धर्मोंका वर्णन किया गया है, वे सभी धर्म और शिवके प्रेमी देवता वहाँ चारों ओर व्याप्त थे। उन नगरोंमें प्रवेश करके वे दैत्य सदा शिवभक्तिनिरत होकर सारी त्रिलोकीको बाधित करके विशाल राज्यका उपभोग करने लगे। मुने! इस प्रकार वहाँ निवास करनेवाले उन पुण्यात्माओंके सुख एवं प्रीतिपूर्वक उत्तम राज्यका पालन करते हुए बहुत लंबा काल व्यतीत हो गया।

(अध्याय १)


तारकपुत्रोंके प्रभावसे संतप्त हुए देवोंकी ब्रह्माके पास करुण पुकार, ब्रह्माका उन्हें शिवके पास भेजना, शिवकी आज्ञासे देवोंका विष्णुकी शरणमें जाना और विष्णुका उन दैत्योंको मोहित करके उन्हें आचारभ्रष्ट करना

सनत्कुमारजी कहते हैं—महर्षे! तदनन्तर तारकपुत्रोंके प्रभावसे दग्ध हुए इन्द्र आदि सभी देवता दुःखी हो परस्पर सलाह करके ब्रह्माजीकी शरणमें गये। वहाँ सम्पूर्ण देवताओंने दीन होकर प्रेमपूर्वक पितामहको प्रणाम किया और अवसर देखकर उनसे अपना दुखड़ा सुनाते हुए कहा।

देवता बोले—धातः! त्रिपुरोंके स्वामी तारकपुत्रोंने तथा मयासुरने समस्त स्वर्गवासियोंको संतप्त कर दिया है। ब्रह्मन्! इसीलिये हमलोग दुःखी होकर आपकी शरणमें आये हैं। आप उनके वधका कोई उपाय कीजिये, जिससे हमलोग सुखसे रह सकें।

ब्रह्माजीने कहा—देवगणो! तुम्हें उन दानवोंसे विशेष भय नहीं करना चाहिये। मैं उनके वधका उपाय बतलाता हूँ। भगवान् शिव तुम्हारा कल्याण करेंगे। मैंने ही इन दैत्योंको बढ़ाया है, अतः मेरे हाथों इनका वध होना उचित नहीं। साथ ही त्रिपुरमें इनका पुण्य भी वृद्धिंगत होता रहेगा। अतः इन्द्रसहित सभी देवता शिवजीसे प्रार्थना करें। वे सर्वाधीश यदि प्रसन्न हो जायँगे तो वे ही तुमलोगोंका कार्य पूर्ण करेंगे।

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! ब्रह्माजीकी यह वाणी सुनकर इन्द्रसहित सभी देवता दुःखी हो उस स्थानपर गये, जहाँ वृषभध्वज शिव आसीन थे। तब उन सबने

* रुद्रसंहिता * ३७३

अंजलि बाँधकर देवेश्वर शिवको भक्ति-पूर्वक प्रणाम किया और कंधा झुकाकर लोकोंके कल्याणकर्ता शंकरका स्तवन किया। मुने! इस प्रकार नाना प्रकारके दिव्य स्तोत्रोंद्वारा त्रिशूलधारी परमेश्वरकी स्तुति करके स्वार्थसाधनमें निपुण इन्द्र आदि देवताओंने दीनभावसे कंधा झुकाये हुए हाथ जोड़कर प्रस्तुत स्वार्थको निवेदन करना आरम्भ किया।

देवताओंने कहा—महादेव! तारकके पुत्र तीनों भाइयोंने मिलकर इन्द्रसहित समस्त देवताओंको परास्त कर दिया है। भगवन्! उन्होंने त्रिलोकीको तथा मुनीश्वरोंको अपने अधीन कर लिया है और सम्पूर्ण सिद्ध स्थानोंको नष्ट-भ्रष्ट करके सारे जगत्‌को उत्पीड़ित कर रखा है। वे दारुण दैत्य समस्त यज्ञभागोंको स्वयं ग्रहण करते हैं। उन्होंने ऋषिधर्मका निवारण करके अधर्मका विस्तार कर रखा है। शंकर! निश्चय ही वे तारकपुत्र समस्त प्राणियोंके लिये अवध्य हैं, इसीलिये वे स्वेच्छानुसार सभी कार्य करते रहते हैं। प्रभो! ये त्रिपुरनिवासी दारुण दैत्य जबतक जगत्‌का विनाश न कर डालें, उसके पहले ही आप किसी ऐसी नीतिका विधान करें, जिससे इसकी रक्षा हो सके।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! यों भाषण करते हुए उन स्वर्गवासी इन्द्रादि देवोंकी बात सुनकर शिवजी उत्तर देते हुए बोले।

शिवजीने कहा—देवगण! इस समय वे त्रिपुराधीश महान् पुण्य-कार्योंमें लगे हुए हैं और ऐसा नियम है कि जो पुण्यात्मा हो, उसपर विद्वानोंको किसी प्रकार भी प्रहार नहीं करना चाहिये। मैं देवताओंके सारे महान् कष्टोंको जानता हूँ; फिर भी वे दैत्य बड़े प्रबल हैं, अतः देवता और असुर मिलकर भी उनका वध नहीं कर सकते। वे तारकपुत्र सब-के-सब पुण्य-सम्पन्न हैं, इसलिये उन सभी त्रिपुरवासियोंका वध दुःसाध्य है। यद्यपि मैं रणकर्कश हूँ, तथापि जान-बूझकर मैं मित्रद्रोह कैसे कर सकता हूँ; क्योंकि पहले किसी समय ब्रह्माजीने कहा था कि मित्रद्रोहसे बढ़कर दूसरा कोई बड़ा पाप नहीं है। सत्पुरुषोंने ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा व्रतभंग करनेवालेके लिये प्रायश्चित्तका विधान किया है; परंतु कृतघ्नके उद्धारका कोई उपाय नहीं है।* देवताओ! तुमलोग भी तो धर्मज्ञ हो, अतः धर्मदृष्टिसे विचारकर तुम्हीं बताओ कि जब वे दैत्य मेरे भक्त हैं, तब मैं उन्हें कैसे मार सकता हूँ। इसलिये अमरो! जबतक वे दैत्य मेरी भक्तिमें तत्पर हैं, तबतक उनका वध असम्भव है। तथापि तुमलोग विष्णुके पास जाकर उनसे यह कारण निवेदन करो।

तदनन्तर देवगण भगवान् विष्णुके समीप गये और उनके द्वारा ऐसी व्यवस्था की गयी कि जिससे वे असुर शैव-सनातनधर्मसे विमुख होकर सर्वथा अनाचारपरायण हो गये। वैदिक धर्मका नाश होनेसे वहाँ स्त्रियोंने पातिव्रतधर्म छोड़ दिया, पुरुष इन्द्रियोंके वश हो गये। यों


* ब्रह्मघ्ने च सुरापे च स्तेने भग्नव्रते तथा। निष्कृतिर्विहिता सद्भिः कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः॥
(शि० पु०, रु० सं०, युद्ध खण्ड ३।५)

३७४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

स्त्री-पुरुष सभी दुराचारी हो गये। देवाराधन, श्राद्ध, यज्ञ, व्रत, तीर्थ, शिव-विष्णु-सूर्य-गणेश आदिका पूजन, स्नान, दान आदि सभी शुभ आचरण नष्ट हो गये। तब माया तथा अलक्ष्मी उन पुरोंमें जा पहुँची। तपसे प्राप्त लक्ष्मी वहाँसे चली गयीं। इस प्रकार वहाँ अधर्मका विस्तार हो गया। मुने! तब शिवेच्छासे भाइयोंसहित उस दैत्यराजकी तथा मयकी भी शक्ति कुण्ठित हो गयी।
(अध्याय २—५)


देवोंका शिवजीके पास जाकर उनका स्तवन करना, शिवजीके त्रिपुरवधके लिये उद्यत न होनेपर ब्रह्मा और विष्णुका उन्हें समझाना, विष्णुके बतलाये हुए शिव-मन्त्रका देवोंद्वारा तथा विष्णुद्वारा जप, शिवजीकी प्रसन्नता और उनके लिये विश्वकर्माद्वारा सर्वदेवमय रथका निर्माण

व्यासजीने पूछा—सनत्कुमारजी! जब भाइयों तथा पुरवासियोंसहित उस दैत्यराजकी बुद्धि विशेषरूपसे मोहाच्छन्न हो गयी, तब उसके बाद कौन-सी घटना घटी? विभो! वह सारा वृत्तान्त वर्णन कीजिये।

सनत्कुमारजीने कहा—महर्षे! जब तीनों पुरोंकी पूर्वोक्त दशा हो गयी, दैत्योंने शिवार्चनका परित्याग कर दिया, सम्पूर्ण स्त्री-धर्म नष्ट हो गया और चारों ओर दुराचार फैल गया, तब भगवान् विष्णु और ब्रह्माके साथ सब देवता कैलास पर्वतपर गये और सुन्दर शब्दोंमें शिवकी स्तुति करने लगे—'महेश्वर देव! आप परमोत्कृष्ट आत्मबलसे सम्पन्न हैं; आप ही सृष्टिके कर्ता ब्रह्मा, पालक विष्णु और संहर्ता रुद्र हैं; परब्रह्मस्वरूप आपको नमस्कार है।' यों महादेवजीका स्तवन करके देवोंने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। फिर भगवान् विष्णुने जलमें खड़े होकर अपने स्वामी परमेश्वर शिवका मन-ही-मन स्मरण करके तन्मय हो दक्षिणामूर्तिके द्वारा प्रकटित रुद्रमन्त्रका डेढ़ करोड़की संख्यातक जप किया। तबतक सभी देवता उन महेश्वरमें मन लगाकर यों उनकी स्तुति करते रहे।

देवोंने कहा—प्रभो! आप समस्त प्राणियोंके आत्मस्वरूप, कल्याणकर्ता और भक्तोंकी पीड़ा हरनेवाले हैं। आपके गलेमें नीला चिह्न है, जिससे आप नीलकण्ठ कहलाते हैं। आप चिद्रूप एवं प्रचेता हैं, आप रुद्रको हमारा प्रणाम है। असुरनिकन्दन! आप ही हमारी सारी आपत्तियोंके निवारण करनेवाले हैं, अतः सदासे आप ही हमारी गति हैं और आप ही सर्वदा हमलोगोंके वन्दनीय हैं। आप सबके आदि हैं और आप ही अनादि भी हैं। आप ही आनन्दस्वरूप, अव्यय, प्रभु, प्रकृति-पुरुषके भी साक्षात् स्रष्टा और जगदीश्वर हैं। आप ही रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणके आश्रयसे ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र होकर जगत्के कर्ता, भर्ता और संहारक बनते हैं। आप ही इस भवसागरसे तारनेवाले हैं। आप समस्त प्राणियोंके स्वामी, अविनाशी, वरदाता, वाङ्मयस्वरूप, वेदप्रतिपाद्य

  • रुद्रसंहिता * ३७५

और वाच्य-वाचकतासे रहित हैं। योगवेत्ता योगी आप ईशानसे मुक्तिकी याचना करते हैं। आप योगियोंके हृदयकमलकी कर्णिकापर विराजमान रहते हैं। वेद और संतजन कहते हैं कि आप परब्रह्मस्वरूप, तत्त्वरूप, तेजोराशि और परात्पर हैं। शर्व! आप सर्वव्यापी, सर्वात्मा और त्रिलोकीके अधिपति हैं। भव! इस जगत्में जिसे परमात्मा कहा जाता है, वह आप ही हैं। जगद्गुरो! इस जगत्में जिसे देखने, सुनने, स्तवन करने तथा जाननेयोग्य बताया जाता है और जो अणुसे भी सूक्ष्म तथा महान्से भी महान् है, वह आप ही हैं। आप चारों ओर हाथ, पैर, नेत्र, सिर, मुख, कान और नाकवाले हैं; अतः आपको चारों ओरसे नमस्कार है। सर्वव्यापिन्! आप सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, अनावृत और विश्वरूप हैं; आप विरूपाक्षको सब ओरसे अभिवादन है। आप सर्वेश्वर, भवाध्यक्ष, सत्यमय, कल्याणकर्ता, अनुपमेय और करोड़ों सूर्योंके समान प्रभावशाली हैं; आपको हम चारों ओरसे दण्डवत्-प्रणाम करते हैं। विश्वाराध्य, आदि-अन्तशून्य, छब्बीसवें तत्त्व, नियमकरहित तथा समस्त प्राणियोंको अपने-अपने कार्योंमें प्रवृत्त करनेवाले आपको हमारा सब ओरसे प्रणाम है। आप प्रकृतिके भी प्रवर्तक, सबके प्रपितामह और समस्त शरीरोंमें व्याप्त हैं; आप परमेश्वरको हमारा नमस्कार है। श्रुतियाँ तथा श्रुतितत्त्वके ज्ञाता विज्ञजन आपको वरदायक, समस्त भूतोंमें निवास करनेवाला, स्वयम्भू और श्रुतितत्त्वज्ञ बतलाते हैं। नाथ! आपने जगत्में अनेकों ऐसे कार्य किये हैं, जो हमारी समझसे परे हैं; इसीलिये देवता, असुर, ब्राह्मण और अन्यान्य स्थावर-जंगम भी आपकी ही स्तुति करते हैं। शम्भो! त्रिपुरवासी दैत्योंने हमें प्रायः नष्ट-सा कर डाला है, अतः आप शीघ्र ही उन असुरोंका विनाश करके हमारी रक्षा कीजिये; क्योंकि देववल्लभ! हम देवोंके एकमात्र आप ही गति हैं। परमेश्वर! इस समय वे आपकी मायासे मोहित हो गये हैं, अतः प्रभो! वे भगवान् विष्णुद्वारा बतायी हुई युक्तिके चक्रमें फँसकर सारा धर्म-कर्म छोड़ बैठे हैं। भक्तवत्सल! हमारे सौभाग्यवश इस समय उन दैत्योंने सम्पूर्ण धर्मोंका परित्याग कर दिया है और नास्तिक शास्त्रका आश्रय ले रखा है। शरणदाता! आप सदासे देवताओंका कार्य करते आये हैं, इसीलिये आज भी हमलोग आपके शरणापन्न हुए हैं। अब आपकी जैसी इच्छा हो, वैसा कीजिये।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुनिवर! इस प्रकार महेश्वरका स्तवन करके देवगण दीनभावसे अंजलि बाँधकर सामने खड़े हो गये। उस समय उनके मस्तक झुके हुए थे।

३७६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

इस प्रकार जब सुरेन्द्र आदि देवोंने महेश्वरकी स्तुति की और विष्णुने ईशान-सम्बन्धी मन्त्रका जप किया, तब सर्वेश्वर भगवान् शिव प्रसन्न हो गये और वृषपर सवार हो वहीं प्रकट हो गये। उस समय पार्वतीपति शिवका मन प्रसन्न था। उन्होंने नन्दीश्वरकी पीठसे उतरकर विष्णुका आलिंगन किया और फिर वे नन्दीपर हाथ टेककर खड़े हो गये और सम्पूर्ण देवताओंकी ओर कृपाभरी दृष्टिसे देखकर गम्भीर वाणीमें श्रीहरिसे बोले।

शिवजीने कहा—देवश्रेष्ठ! उन अधर्मनिष्ठ दैत्योंके तीनों पुरोंको मैं नष्ट कर डालूँगा—इसमें संशय नहीं है; परंतु वे महादैत्य मेरे भक्त थे और उनका मन सुदृढ़ रूपसे मुझमें लगा रहता था; अतः यद्यपि इस समय उन्होंने व्याजवश उत्तम धर्मका परित्याग कर दिया है, तथापि क्या वे मेरे ही द्वारा मारनेयोग्य हैं? इसलिये जिन्होंने त्रिपुरवासी सारे दैत्योंको धर्मभ्रष्ट करके मेरी भक्तिसे विमुख कर दिया है, वे विष्णु अथवा अन्य कोई ही उन्हें क्यों नहीं मारते? मुनीश्वर! शम्भुके ये वचन सुनकर उन समस्त देवताओंका तथा श्रीहरिका भी मन उदास हो गया। जब सृष्टिकर्ता ब्रह्माने देखा कि देवताओं और विष्णुके मुखपर उदासी छा गयी है, तब उन्होंने हाथ जोड़कर शम्भुसे कहना आरम्भ किया।

ब्रह्माजी बोले—परमेश्वर! आप योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, परब्रह्म तथा सदासे देवों और ऋषियोंकी रक्षामें तत्पर हैं; अतः पाप आपका स्पर्श नहीं कर सकता। साथ ही आपके आदेशसे ही तो उन्हें मोहमें डाला गया है। इसके प्रेरक तो आप ही हैं। इस समय अवश्य ही उन्होंने अपने धर्मका परित्याग कर दिया है और वे आपकी भक्तिसे विमुख हो गये हैं; तथापि आपके सिवा दूसरा कोई उनका वध नहीं कर सकता। देवों और ऋषियोंके प्राणरक्षक महादेव! साधुओंकी रक्षाके लिये आपके द्वारा उन म्लेच्छोंका वध उचित है। आप तो राजा हैं, अतः राजाको धर्मानुसार पापियोंका वध करनेसे पाप नहीं लगता; इसलिये इस काँटेको उखाड़कर साधु-ब्राह्मणोंकी रक्षा कीजिये। राजा यदि अपने राज्य तथा सर्वलोकाधिपत्यको स्थिर रखना चाहता हो तो उसे अपने राज्यमें एवं अन्यत्र भी ऐसा ही व्यवहार करना चाहिये। इसलिये आप देवगणोंकी रक्षाके लिये उद्यत हो जाइये, विलम्ब मत कीजिये। देवदेवेश! बड़े-बड़े मुनीश्वर, यज्ञ, सम्पूर्ण वेद, शास्त्र, मैं और विष्णु भी निश्चय ही आपकी प्रजा हैं। प्रभो! आप देवताओंके सार्वभौम सम्राट् हैं। ये श्रीहरि आदि देवगण तथा सारा जगत् आपका ही कुटुम्ब है। अजन्मा देव! श्रीहरि आपके युवराज हैं और मैं ब्रह्मा आपका पुरोहित हूँ तथा आपकी आज्ञाका पालन करनेवाले शक्र राजकार्य सँभालनेवाले मन्त्री हैं। सर्वेश! अन्य देवता भी आपके शासनके नियन्त्रणमें रहकर सदा अपने-अपने कार्यमें तत्पर रहते हैं। यह बिल्कुल सत्य है।

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! ब्रह्माकी यह बात सुनकर सुरपालक परमेश्वर शिवका मन प्रसन्न हो गया। तब उन्होंने ब्रह्माजीसे कहा।

शिवजी बोले—ब्रह्मन्! यदि आप मुझे देवताओंका सम्राट् बतला रहे हैं तो मेरे

* रुद्रसंहिता * ३७७


पास उस पदके योग्य कोई ऐसी सामग्री तो है नहीं, जिससे मैं उस पदको ग्रहण कर सकूँ; क्योंकि न तो मेरे पास कोई महान् दिव्य रथ है, न उसके उपयुक्त सारथि है और न संग्राममें विजय दिलानेवाले वैसे धनुष-बाण ही हैं कि जिन्हें लेकर मैं मनोयोगपूर्वक संग्राममें उन प्रबल दैत्योंका वध कर सकूँ। यों कहकर वे चुप हो गये। परंतु शिवजीको शीघ्र प्रस्तुत होते न देखकर समस्त देवता, कश्यप आदि ऋषि अत्यन्त व्याकुल तथा दुःखी हो गये। तब भगवान् हरिने उनसे कहा।

भगवान् विष्णु बोले—‘‘देवो तथा मुनियो! तुमलोग क्यों दुःखी हो रहे हो? तुम्हें अपने सारे दुःखका परित्याग कर देना चाहिये। अब तुम सब लोग आदरपूर्वक मेरी बात सुनो। देवगण! तुम्हीं लोग विचार करो कि महान् पुरुषोंकी आराधना सुखसाध्य नहीं होती। मैंने ऐसा सुना है कि महदाराधनमें पहले महान् कष्ट झेलना पड़ता है। पीछे भक्तकी दृढ़ता देखकर इष्टदेव अवश्य प्रसन्न होते हैं। परंतु शिव तो समस्त गणोंके अध्यक्ष तथा परमेश्वर हैं। ये तो आशुतोष ही ठहरे। अतः पहले ‘ॐ’–का उच्चारण करके फिर ‘नमः’ का प्रयोग करे। फिर ‘शिवाय’ कहकर दो बार ‘शुभम्’ का उच्चारण करे। उसके बाद दो बार ‘कुरु’ का प्रयोग करके फिर ‘शिवाय नमः’ ‘ॐ’ जोड़ दे। (ऐसा करनेसे ‘ॐ नमः शिवाय शुभं शुभं कुरु कुरु शिवाय नमः ॐ’ यह मन्त्र बनता है।) बुद्धिविशारदो! यदि तुमलोग शिवकी प्रसन्नताके लिये इस मन्त्रका पुनः एक करोड़ जप करोगे तो शिवजी अवश्य तुम्हारा कार्य पूर्ण करेंगे।’’ मुने! प्रभावशाली श्रीहरिने जब यों कहा, तब सभी देवता पुनः शिवाराधनमें लग गये। तत्पश्चात् श्रीहरि भी देवों तथा मुनियोंके कार्यकी सिद्धिके हेतु शिवमें मन लगाकर विशेषरूपसे विधिपूर्वक जपमें तत्पर हो गये। मुनिश्रेष्ठ! इधर देवगण धैर्यसम्पन्न हो बारंबार ‘शिव’-‘शिव’ यों उच्चारण करते हुए एक करोड़ जप करके सामने खड़े हो गये। इसी समय स्वयं साक्षात् शिव पूर्वोक्त स्वरूप धारण करके प्रकट हो गये और यों कहने लगे।

श्रीशिवजी बोले—हरे! ब्रह्मन्! देवगण तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनियो! मैं तुमलोगोंके इस जपसे प्रसन्न हो गया हूँ, अतः अब तुमलोग अपना मनोवांछित वर माँग लो।

देवताओंने कहा—देवाधिदेव! कल्याणकर्ता जगदीश्वर! यदि आप हमपर प्रसन्न हैं तो देवोंकी विकलताका विचार करके शीघ्र ही त्रिपुरका संहार कर दीजिये। परमेश्वर! आप दीनबन्धु तथा कृपाकी खान हैं। आपने ही सदासे हम देवताओंकी बारंबार विपत्तियोंसे रक्षा की है, अतः इस समय भी आप हमारी रक्षा कीजिये।

सनत्कुमारजी कहते हैं—ब्रह्मन्! तब ब्रह्मा और विष्णुसहित देवोंकी वह बात सुनकर शिवजी मन-ही-मन प्रसन्न हुए और पुनः इस प्रकार बोले।

महेश्वरने कहा—हरे! ब्रह्मन्! देवगण! तथा मुनियो! अब त्रिपुरको नष्ट हुआ ही समझो। तुमलोग आदरपूर्वक मेरी बात सुनो (और उसके अनुसार कार्य करो)। मैंने पहले जिस दिव्य रथ, सारथि, धनुष और उत्तम बाणको अंगीकार किया

३७८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

है, वह सब शीघ्र ही तैयार करो। विष्णो तथा विधे! निश्चय ही तुम दोनों त्रिलोकीके अधिपति हो; इसलिये तुम्हें चाहिये कि मेरे लिये प्रयत्नपूर्वक सम्राट्के योग्य सारा उपकरण प्रस्तुत कर दो। तुम दोनों सृष्टिके सृजन और पालन-कार्यमें नियुक्त हो, अतः त्रिपुरको नष्ट हुआ समझकर देवताओंकी सहायताके लिये यह कार्य अवश्य करो। यह शुभ मन्त्र (जिसका तुमलोगोंने जप किया है) महान् पुण्यमय तथा मुझे प्रसन्न करनेवाला है। यह भुक्ति-मुक्तिका दाता, सम्पूर्ण कामनाओंका पूरक और शिव-भक्तोंके लिये आनन्दप्रद है। यह स्वर्गकामी पुरुषोंके लिये धन, यश और आयुकी वृद्धि करनेवाला है। यह निष्कामके लिये मोक्ष तथा साधन करनेवाले पुरुषोंके लिये भुक्ति-मुक्तिका साधक है। जो मनुष्य पवित्र होकर सदा इस मन्त्रका कीर्तन करता है, सुनता है अथवा दूसरेको सुनाता है, उसकी सारी अभिलाषाएँ पूर्ण हो जाती हैं।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! परमात्मा शिवकी यह बात सुनकर सभी देवता परम प्रसन्न हुए और ब्रह्मा तथा विष्णुको तो विशेष आनन्द प्राप्त हुआ। उस समय विश्वकर्माने शिवके आज्ञानुसार विश्वके हितके लिये एक सर्वदेवमय तथा परम शोभन दिव्य रथका निर्माण किया।

(अध्याय ६—८)

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सर्वदेवमय रथका वर्णन, शिवजीका उस रथपर चढ़कर युद्धके लिये प्रस्थान, उनका पशुपति नाम पड़नेका कारण, शिवजीद्वारा गणेशका पूजन और त्रिपुर-दाह, मयदानवका त्रिपुरसे जीवित बच निकलना

व्यासजीने कहा—शैवप्रवर सनत्कुमारजी! आपकी बुद्धि बड़ी उत्तम है, आप सर्वज्ञ हैं। तात! आपने परमेश्वर शिवकी जो कथा सुनायी है, वह अत्यन्त अद्भुत है। अब बुद्धिमान् विश्वकर्माने शिवजीके लिये जिस देवमय एवं परमोत्कृष्ट दिव्य रथका निर्माण किया था, उसका वर्णन कीजिये।

सूतजी कहते हैं—मुने! व्यासजीकी यह बात सुनकर मुनीश्वर सनत्कुमार शिवजीके चरणकमलोंका स्मरण करके बोले।

सनत्कुमारजीने कहा—महाबुद्धिमान् मुनिवर व्यासजी! मैं शिवजीके पाद-पद्मोंका स्मरण करके अपनी बुद्धिके अनुसार रथकी निर्माण-कथाका वर्णन करता हूँ, सुनो! तदनन्तर विश्वकर्माने रुद्रदेवके लिये बड़े यत्नसे आदरपूर्वक सर्वलोकमय दिव्य रथकी रचना की। वह सर्वसम्मत तथा सर्वभूतमय रथ सुवर्णका बना हुआ था। उसके दाहिने चक्रमें सूर्य और वामचक्रमें चन्द्रमा विराजमान थे। दाहिने चक्रमें बारह अरे लगे हुए थे, जिनमें बारहों सूर्य प्रतिष्ठित थे और बायाँ पहिया सोलह अरोंसे युक्त था, जिनमें चन्द्रमाकी सोलह कलाएँ विराजमान थीं। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले विप्रेन्द्र! अश्विनी आदि सभी सत्ताईसों नक्षत्र भी उस वामचक्रकी ही शोभा बढ़ा रहे थे। विप्रश्रेष्ठ! छहों ऋतुएँ उन दोनों पहियोंकी नेमि बनीं। अन्तरिक्ष

* रुद्रसंहिता *
३७९

रथका अग्रभाग हुआ और मन्दराचलने रथकी बैठकका स्थान ग्रहण किया। उदयाचल और अस्ताचल—ये दोनों उस रथके कूबर हुए। महामेरु अधिष्ठान हुआ और शाखापर्वत उसके आश्रयस्थान हुए। संवत्सर उस रथका वेग, उत्तरायण और दक्षिणायन—दोनों लोहधारक, मुहूर्त बन्धुर (रस्सा), कलाएँ उसकी कीलें हुईं। काष्ठाएँ उसका घोणा (नासिकारूप अग्रभाग), क्षण अक्षदण्ड, निमेष अनुकर्ष (नीचेका काष्ठ) और लव ईषादण्ड हुए। द्युलोक इस रथका वरूथ (ऊपरी पर्दा) तथा स्वर्ग और मोक्ष ध्वजाएँ हुईं। अभ्रमु (ऐरावतकी पत्नी) और कामधेनु जुएके अन्तिम छोरपर स्थित हुए। अव्यक्त (प्रकृति) उसका ईषादण्ड, बुद्धि नड़वल, अहंकार कोना और पंच महाभूत उसका बल थे। मुनिश्रेष्ठ ! इन्द्रियाँ उसे चारों ओरसे विभूषित कर रही थीं और श्रद्धा उस रथकी चाल थी। उस समय वेदोंके छहों अंग ही उसके भूषण और पुराण, न्याय, मीमांसा तथा धर्मशास्त्र उपभूषण हुए। सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे युक्त बलसम्पन्न श्रेष्ठ मन्त्र घण्टाके स्थानापन्न हुए और वर्ण तथा आश्रम उसके पाद बने। सहस्र फणोंसे सुशोभित शेषनाग बन्धनरज्जु हुए और दिशाएँ तथा उपदिशाएँ उसके पाद बनीं। पुष्कर आदि तीर्थोंने रत्नजटित स्वर्णमय पताकाओंका स्थान ग्रहण किया और चारों समुद्र उस रथके आच्छादन-वस्त्र बने। गंगा आदि सभी श्रेष्ठ सरिताओंने सुन्दरी स्त्रियोंका रूप धारण किया और समस्त आभूषणोंसे विभूषित हो हाथमें चँवर ले यत्र-तत्र स्थित होकर वे रथकी शोभा बढ़ाने लगीं। आवह आदि सातों वायुओंने स्वर्णमय उत्तम सोपानका काम सँभाला। लोकालोक पर्वत उसके चारों ओरका उपसोपान और मानस आदि सरोवर उसके सुन्दर बाहरी विषमस्थान हुए। सारे वर्षचल उसके चारों ओरके पाश बने और नीचेके लोकोंके निवासी उस रथका तलभाग हुए। देवाधिदेव भगवान् ब्रह्मा लगाम पकड़नेवाले सारथि हुए और ब्रह्मदैवत ॐकार उन ब्रह्मदेवका चाबुक हुआ। अकारने विशाल छत्रका रूप धारण किया। मन्दराचल पार्श्वभागका दण्ड हुआ। शैलराज हिमालय धनुष और स्वयं नागराज शेष उसकी प्रत्यंचा बने। श्रुतिरूपिणी सरस्वती देवी उस धनुषकी घण्टा हुईं और महातेजस्वी विष्णु बाण तथा अग्नि उस बाणके नोक बने। मुने! चारों वेद उस रथमें जुतनेवाले चार घोड़े कहे गये हैं। इसके बाद शेष बची हुई ज्योतियाँ उन अश्वोंकी आभूषण हुईं। विषसे उत्पन्न हुई वस्तुओंने सेनाका रूप धारण किया, वायु बाजा बजानेवाले और व्यास आदि मुख्य-मुख्य ऋषि वाहवाहक हुए। मुनीश्वर! अधिक कहनेसे क्या लाभ, मैं संक्षेपमें ही बतलाता हूँ कि ब्रह्माण्डमें जो कुछ वस्तु थी, वह सब उस रथमें विद्यमान थी। इस प्रकार बुद्धिमान् विश्वकर्माने ब्रह्मा और विष्णुकी आज्ञासे उस शुभ रथका तथा रथसामग्रीका निर्माण किया था।

सनत्कुमारजी कहते हैं—महर्षे ! इस प्रकारके महान् दिव्य रथमें, जो अनेकविध आश्चर्योंसे युक्त था, वेदरूपी अश्वोंको जोतकर ब्रह्माने उसे शिवको समर्पित कर दिया। शम्भुको निवेदित करनेके पश्चात् जो विष्णु आदि देवोंके सम्माननीय एवं त्रिशूल धारण करनेवाले हैं, उन देवेश्वरकी

३८० * संक्षिप्त शिवपुराण *

प्रार्थना करके ब्रह्माजी उन्हें उस रथपर चढ़ाने लगे। तब महान् ऐश्वर्यशाली सर्वदेवमय शम्भुरथसामग्रीसे युक्त उस दिव्य रथपर आरूढ़ हुए। उस समय ऋषि, देवता, गन्धर्व, नाग, लोकपाल और ब्रह्मा, विष्णु भी उनकी स्तुति कर रहे थे। गानविद्याविशारद अप्सराओंके गण उन्हें घेरे हुए थे। सारथिके स्थानपर ब्रह्माको देखकर उन वरदायक शम्भुकी विशेष शोभा हुई। लोककी सारी वस्तुओंसे कल्पित उस रथपर शिवजी चढ़ ही रहे थे कि वेदसम्भूत वे घोड़े सिरके बल भूमिपर गिर पड़े। पृथ्वीमें भूकम्प आ गया। सारे पर्वत डगमगाने लगे। सहसा शेषनाग शिवजीका भार न सह सकनेके कारण आतुर हो काँप उठे। तब उसी क्षण भगवान् धरणीधरने उठकर नन्दीश्वरका रूप धारण किया और रथके नीचे जाकर उसे ऊपरको उठाया; परंतु नन्दीश्वर भी रथारूढ़ महेशके उस उत्तम तेजको सहन न कर सके, अतः उन्होंने तत्काल ही पृथ्वीपर घुटने टेक दिये। तत्पश्चात् भगवान् ब्रह्माने शिवजीकी आज्ञासे हाथमें चाबुक ले घोड़ोंको उठाकर उस श्रेष्ठ रथको खड़ा किया। तदनन्तर महेशद्वारा अधिष्ठित उस उत्तम रथमें बैठे हुए ब्रह्माजीने रथमें जुते हुए मन और वायुके समान वेगशाली वेदमय अश्वोंको उन तपस्वी दानवोंके आकाशस्थित तीनों पुरोंको लक्ष्य करके आगे बढ़ाया। तत्पश्चात् लोकोंके कल्याणकर्ता भगवान् रुद्र देवोंकी ओर दृष्टिपात करके कहने लगे—'सुरश्रेष्ठो! यदि तुमलोग देवों तथा अन्य प्राणियोंके विषयमें पृथक्-पृथक् पशुत्वकी कल्पना करके उन पशुओंका आधिपत्य मुझे प्रदान करोगे, तभी मैं उन असुरोंका संहार करूँगा; क्योंकि वे दैत्यश्रेष्ठ तभी मारे जा सकते हैं, अन्यथा उनका वध असम्भव है।'

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! अगाध बुद्धिसम्पन्न देवाधिदेव भगवान् शंकरकी यह बात सुनकर सभी देवता पशुत्वके प्रति सशंकित हो उठे, जिससे उनका मन खिन्न हो गया। तब उनके भावको समझकर देवदेव अम्बिकापति शम्भु करुणार्द्र हो गये। फिर वे हँसकर उन देवताओंसे इस प्रकार बोले।

शम्भुने कहा—देवश्रेष्ठो! पशुभाव प्राप्त होनेपर भी तुमलोगोंका पतन नहीं होगा। मैं उस पशुभावसे विमुक्त होनेका उपाय बतलाता हूँ, सुनो और वैसा ही करो। समाहित मनवाले देवताओ! मैं तुमलोगोंसे सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ कि जो इस दिव्य पाशुपतव्रतका पालन करेगा, वह पशुत्वसे मुक्त हो जायगा। सुरश्रेष्ठो! तुम्हारे अतिरिक्त जो अन्य प्राणी भी मेरे पाशुपतव्रतको करेंगे, वे भी निस्संदेह पशुत्वसे छूट जायँगे। जो नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए बारह वर्षतक, छः वर्षतक अथवा तीन वर्षतक मेरी सेवा करेगा अथवा करायेगा, वह पशुत्वसे विमुक्त हो जायगा। इसलिये श्रेष्ठ देवताओ! तुमलोग भी जब इस परमोत्कृष्ट दिव्य व्रतका पालन करोगे तो उसी समय पशुत्वसे मुक्त हो जाओगे— इसमें कुछ भी संशय नहीं है।

सनत्कुमारजी कहते हैं—महर्षे ! परमात्मा महेश्वरका वचन सुनकर विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओंने कहा—'तथेति'— बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा। इसीलिये बड़े-बड़े देवता तथा असुर भगवान् शंकरके पशु बने और पशुत्वरूपी पाशसे विमुक्त करनेवाले रुद्र पशुपति हुए।

* रुद्रसंहिता * ३८१

तभीसे महेश्वरका 'पशुपति' यह नाम विश्वमें विख्यात हो गया। यह नाम समस्त लोकोंमें कल्याण प्रदान करनेवाला है। उस समय सम्पूर्ण देवता तथा ऋषि हर्षमग्न होकर जय-जयकार करने लगे और देवेश्वर ब्रह्मा, विष्णु तथा अन्यान्य प्राणी भी परमानन्दमग्न हो गये। उस अवसरपर महात्मा शिवका जैसा रूप प्रकट हुआ था, उसका वर्णन सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं हो सकता। तदनन्तर जो शिवा तथा सम्पूर्ण जगत्के स्वामी और समस्त प्राणियोंके सुख प्रदान करनेवाले हैं, वे महेश्वर यों सुसज्जित होकर त्रिपुरका संहार करनेके लिये प्रस्थित हुए। जिस समय देवदेव महादेव त्रिपुरका विनाश करनेके लिये चले, उस अवसरपर देवराज आदि सभी प्रधान-प्रधान देवता भी उनके साथ प्रस्थित हुए। पर्वतके समान विशालकाय उन सुरेश्वरोंका मन प्रसन्न था, वे सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे थे। वे सभी हाथोंमें हल, शाल, मुसल, भुशुण्डि और नाना प्रकारके पर्वत-जैसे विशाल आयुधोंको धारण करके हाथी, घोड़े, सिंह, रथ और बैलोंपर सवार हो चल रहे थे। उस समय जिनके शरीर परम प्रकाशमान थे और मन महान् उत्साहसे सम्पन्न थे तथा जो नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित थे, वे इन्द्र, ब्रह्मा और विष्णु आदि देव शम्भुकी जय-जयकार बोलते हुए महेश्वरके आगे-आगे चले। सभी दण्डी एवं जटाधारी मुनि हर्ष मनाने लगे और आकाशचारी सिद्ध तथा चारण पुष्पोंकी वृष्टि करने लगे। विप्रेन्द्र! त्रिपुरकी यात्रा करते समय जितने गणेश्वर शिवजीके साथ थे, उनकी गणना करके कौन पार पा सकता है; तथापि मैं कुछका वर्णन करता हूँ। योगिन्! समस्त गणराजोंमें श्रेष्ठ भृंगी गणेश्वरों तथा देवगणोंसे घिरकर विमानपर आरूढ़ हो महेन्द्रकी भाँति त्रिपुरका विनाश करनेके लिये चले। उनके साथ-साथ केश, विगतवास, महाकेश, महाज्वर, सोमवल्ली-सवर्ण, सोमप, सनक, सोमधृक्, सूर्यवर्चा, सूर्यप्रेक्षणक, सूर्याक्ष, सूरिनामा, सुर, सुन्दर, प्रस्कन्द, कुन्दर, चण्ड, कम्पन, अतिकम्पन, इन्द्र, इन्द्रजय, यन्ता, हिमकर, शताक्ष, पंचाक्ष, सहस्राक्ष, महोदर, सतीजहु, शतास्य, रंक, कर्पूरपूतन, द्विशिख, त्रिशिख, अहंकार-कारक, अजवक्त्र, अष्टवक्त्र, हयवक्त्र, अर्धवक्त्र आदि बहुत-से अप्रमेय बलशाली वीर गणाध्यक्ष लक्ष्य-लक्षणकी परवाह न करते हुए महेश्वरको घेरकर चल रहे थे।

व्यासजी! तदनन्तर महादेव शम्भु सम्पूर्ण सामग्रियोंसहित उस रथपर स्थित हो उन सुरद्रोहियोंके तीनों पुरोंको पूर्णतया दग्ध करनेके लिये उद्यत हुए। उन्होंने रथके शीर्ष-स्थानपर स्थित हो उस महान् अद्भुत धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ायी और उसपर उत्तम बाणका संधान करके वे रोषावेशसे होठको चाटने लगे। फिर धनुषकी मूठको दृढ़ता-पूर्वक पकड़कर और दृष्टिमें दृष्टि मिलाकर वे वहाँ अचलभावसे खड़े हो गये। परंतु उनके अँगूठेके अग्रभागमें स्थित होकर गणेश निरन्तर पीड़ा ही पहुँचाते रहे, जिससे वे तीनों पुर त्रिशूलधारी शंकरका लक्ष्य नहीं बन सके। तब धनुष-बाणधारी मुंजकेश विरूपाक्ष शंकरने परम शोभन आकाश-वाणी सुनी। (उस व्योमवाणीने कहा—) 'ऐश्वर्यशाली जगदीश्वर! जबतक आप

३८२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

इन गणेशकी अर्चना नहीं कर लेंगे, तबतक इन तीनों पुरोंका संहार नहीं कर सकेंगे।' तब ऐसी बात सुनकर अन्धकासुरके निहन्ता भगवान् शिवने भद्रकालीको बुलाकर गजाननका पूजन किया। जब हर्षपूर्वक विधि-विधानसहित अग्रभागमें स्थित उन विनायककी पूजा की गयी, तब वे प्रसन्न हो गये। फिर तो भगवान् शंकरको उन तारकपुत्र महामनस्वी दैत्योंके तीनों नगर यथोक्तरूपसे आकाशमें स्थित दीख पड़े। इस विषयमें कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि जब शिवजी स्वयं स्वतन्त्र, परब्रह्म, सगुण, निर्गुण, सबके द्वारा अलक्ष्य, स्वामी, परमात्मा, निरंजन, पंचदेवमय, पंचदेवोंके उपास्य और परात्पर प्रभु हैं, वे ही सबके उपास्य हैं, उनका उपास्य कोई नहीं है, तब सबके वन्दनीय परब्रह्मस्वरूप उन देवेश्वर महेश्वरके विषयमें यह बात उचित नहीं जान पड़ती कि उनकी कार्यसिद्धि अन्यकी कृपापर अवलम्बित हो। परंतु मुने! उन देवाधिदेव वरदानी महेश्वरके चरित्रमें लीलावश सब कुछ घटित हो सकता है। अस्तु! इस प्रकार जब गणाधिपका पूजन करके महादेवजी स्थित हुए, तब वे तीनों पुर कालवश शीघ्र ही एकताको प्राप्त हो गये। मुने! उन त्रिपुरोंके परस्पर मिलकर एक हो जानेपर महान् आत्मबलसे सम्पन्न देवताओंको महान् हर्ष हुआ। तब सम्पूर्ण देवगण, सिद्ध और परमर्षि अष्टमूर्तिधारी शिवकी स्तुति करके उच्चस्वरसे जय-जयकार करने लगे। उस समय ब्रह्मा और जगदीश्वर विष्णुने कहा—'महेश्वर! तारकके पुत्र उन त्रिपुरनिवासी दैत्योंके वधका समय भी आ गया है। विभो! इसीलिये ये पुर एकताको प्राप्त हो गये हैं। अतः देवेश! जबतक ये त्रिपुर पुनः विलग हों उसके पहले ही आप बाण छोड़कर इन्हें भस्म कर डालिये और देवताओंका कार्य सिद्ध कीजिये।'

मुने! तदनन्तर शिवजीने धनुषकी डोरी चढ़ाकर उसपर पूज्य पाशुपतास्त्र नामक बाणका संधान किया और उसे वे त्रिपुरपर छोड़नेका विचार करने लगे। शंकरजीने जिस समय अपने अद्भुत धनुषको खींचा था, उस समय अभिजित् मुहूर्त चल रहा था। उन्होंने धनुषकी टंकार तथा दुस्सह सिंहनाद करके अपना नाम घोषित किया और उन महासुरोंको ललकारकर करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान उस भीषण बाणको उनपर छोड़ दिया। तब जिसके नोकपर अग्निदेव प्रतिष्ठित थे और जो विशेषरूपसे पापका विनाशक तथा विष्णुमय था; उस महान् जाज्वल्यमान शीघ्रगामी बाणने उन त्रिपुरनिवासी दैत्योंको दग्ध कर दिया। तत्पश्चात् वे तीनों पुर भी भस्म हो गये और एक साथ ही चारों समुद्रोंरूपी मेखलावाली भूमिपर गिर पड़े।

  • रुद्रसंहिता * ३८३

उस समय शिवजीकी पूजाका अतिक्रमण कर देनेके कारण सैकड़ों दैत्य उस बाणस्थित अग्निसे जलकर हाहाकार मचा रहे थे। जब भाइयोंसहित तारकाक्ष जलने लगा, तब उसने अपने स्वामी भक्तवत्सल भगवान् शंकरका स्मरण किया और मन-ही-मन महादेवको देखकर परम भक्तिपूर्वक नाना प्रकारसे विलाप करता हुआ वह उनसे कहने लगा।

तारकाक्ष बोला—'भव! आप हमपर प्रसन्न हैं, यह हमें ज्ञात हो गया है। इस सत्यके प्रभावसे आप फिर कब भाइयों-सहित हमको दग्ध करेंगे। भगवन्! जो देवता और असुरोंके लिये अप्राप्य है, वह (आपके हाथसे मरणरूप) दुर्लभ लाभ हमें प्राप्त हो गया। अब जिस-जिस योनिमें हम जन्म धारण करें, वहाँ हमारी बुद्धि आपकी भक्तिसे भावित रहे।' मुने! यों वे दैत्य विलाप कर ही रहे थे कि शिवजीकी आज्ञासे उस अग्निने उन्हें अद्भुत रीतिसे जलाकर राखकी ढेरी बना दिया। व्यासजी! और भी जो बालक और वृद्ध दानव थे, वे शिवाज्ञानुसार उस अग्निद्वारा शीघ्र ही जलकर भस्म हो गये। यहाँतक कि उन त्रिपुरोंमें जितनी स्त्रियाँ और पुरुष थे, वे सब-के-सब उस अग्निसे उसी प्रकार दग्ध हो गये जैसे कल्पान्तमें जगत् भस्म हो जाता है। उस समय उस भीषण अग्निसे कोई भी स्थावर-जंगम बिना जले नहीं बचा, किंतु असुरोंका विश्वकर्मा अविनाशी मय बच गया; क्योंकि वह देवोंका अविरोधी, शम्भुके तेजसे सुरक्षित और सद्भक्त था। विपत्तिके अवसरपर भी वह महेश्वरका शरणागत बना रहता था। जिन दैत्यों तथा अन्य प्राणियोंका भाव-अभाव अथवा कृत-अकृतके प्राप्त होनेपर नाशकारक पतन नहीं होता, वे विनाशसे बचे रहते हैं। इसलिये सत्पुरुषोंको अत्यन्त सम्भावित-उत्तम कर्मके लिये ही प्रयत्न करना चाहिये; क्योंकि निन्दित कर्म करनेसे प्राणीका विनाश हो जाता है। अतः गर्हित कर्मका आचरण भूलकर भी न करे।* उस समय भी जो दैत्य बन्धु-बान्धवोंसहित शिवजीकी पूजामें तत्पर थे, वे सब-के-सब शिवपूजाके प्रभावसे (दूसरे जन्ममें) गणोंके अधिपति हो गये। (अध्याय ९-१०)

o

देवोंके स्तवनसे शिवजीका कोप शान्त होना और शिवजीका उन्हें वर देना, मय दानवका शिवजीके समीप आना और उनसे वर-याचना करना, शिवजीसे वर पाकर मयका वितललोकमें जाना

व्यासजीने पूछा—महाबुद्धिमान् सनत्कुमारजी! आप तो ब्रह्माके पुत्र और शिवभक्तोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं, अतः आप धन्य हैं। अब यह बतलाइये कि त्रिपुरके दग्ध हो जानेपर सम्पूर्ण देवताओंने क्या किया? मय कहाँ गया और उन त्रिपुराध्यक्षोंकी क्या


* तस्माद् यत्नः सुसम्भाव्यः सद्भिः कर्तव्य एव हि। गर्हणात् क्षीयते लोको न तत्कर्म समाचरेत्॥ (शि० पु०, रु० सं०, युद्धखं० १०।४२)

३८४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

गति हुई ? यदि यह वृत्तान्त शम्भुकी कथासे सम्बन्ध रखनेवाला हो तो वह सब विस्तारपूर्वक मुझसे वर्णन कीजिये।

सूतजी कहते हैं—मुने! व्यासजीका प्रश्न सुनकर सृष्टिकर्ता ब्रह्माके पुत्र भगवान् सनत्कुमार शिवजीके युगल चरणोंका स्मरण करके बोले।

सनत्कुमारजीने कहा—महाबुद्धिमान् व्यासजी ! जब महेश्वरने दैत्योंसे खचाखच भरे हुए सम्पूर्ण त्रिपुरको भस्म कर दिया, तब सभी देवताओंको महान् आश्चर्य हुआ। उस समय शंकरजीके महान् भयंकर रौद्र रूपको, जो करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान और प्रलयकालीन अग्निकी भाँति तेजस्वी था तथा जिसके तेजसे दसों दिशाएँ प्रज्वलित-सी दीख रही थीं, देखकर साथ ही हिमाचलपुत्री पार्वतीदेवीकी ओर दृष्टिपात करके सम्पूर्ण देवता भयभीत हो गये। तब मुख्य-मुख्य देवता विनम्र होकर सामने खड़े हो गये। उस अवसरपर बड़े-बड़े ऋषि भी देवताओंकी वाहिनीको भयभीत देखकर खड़े ही रह गये, कुछ बोल न सके। वे चारों ओरसे शम्भुको प्रणाम करने लगे। तत्पश्चात् ब्रह्मा भी शिवजीके उस रूपको देखकर भयग्रस्त हो गये। तब उन्होंने डरे हुए विष्णु तथा देवगणोंके साथ प्रसन्न मनसे सावधानीपूर्वक उन गिरिजासहित महेश्वरका, जो देवोंके भी देव, भव तथा हरनामसे प्रसिद्ध, भक्तोंके अधीन रहनेवाले और त्रिपुरहन्ता हैं, स्तवन किया। तदनन्तर सभी प्रमुख देवताओंने भगवान् शिवकी स्तुति की। यों स्तुति किये जानेपर लोकोंके कल्याणकर्ता शंकर प्रसन्न होकर बोले।

शंकरजीने कहा—ब्रह्मा, विष्णु तथा देवगण! मैं तुमलोगोंपर विशेषरूपसे प्रसन्न हूँ, अतः अब तुम सभी विचार करके अपना मनोवांछित वर माँग लो।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ! शिवद्वारा कहे हुए वचनको सुनकर सभी देवताओंका मन प्रसन्नतासे खिल उठा। फिर तो वे बोल उठे।

देवताओंने कहा—भगवन्! देवदेवेश! यदि आप हमपर प्रसन्न हैं और हम देव- गणोंको अपना दास समझकर वर देना चाहते हैं तो देवसत्तम! जब-जब देवताओंपर दुःखकी सम्भावना हो, तब-तब आप प्रकट होकर सदा उनके दुःखोंका विनाश करते रहें।

सनत्कुमारजी कहते हैं—महर्षे! जब ब्रह्मा, विष्णु और देवताओंने भगवान् रुद्रसे ऐसी प्रार्थना की, तब वे शान्त तथा प्रसन्न होकर एक साथ ही सबसे बोले—'अच्छा, सदा ऐसा ही होगा।' ऐसा कहकर शंकरजीने, जो सदा देवोंका दुःख हरण करनेवाले हैं, प्रसन्नतापूर्वक देवोंको जो कुछ अभीष्ट था, वह सारा-का-सारा उन्हें प्रदान कर दिया। इसी समय मय दानव, जो शिवजीकी कृपाके बलसे जलनेसे बच गया था, शम्भुको प्रसन्न देखकर हर्षित मनसे वहाँ आया। उसने विनीतभावसे हाथ जोड़कर प्रेमपूर्वक हर तथा अन्यान्य देवोंको भी प्रणाम किया। फिर वह शिवजीके चरणोंमें लोट गया। तत्पश्चात् दानवश्रेष्ठ मयने उठकर शिवजीकी ओर देखा। उस समय प्रेमके

* रुद्रसंहिता * ३८५

कारण उसका गला भर आया और वह भक्तिपूर्ण चित्तसे उनकी स्तुति करने लगा। द्विजश्रेष्ठ! मयद्वारा किये गये स्तवनको सुनकर परमेश्वर शिव प्रसन्न हो गये और आदरपूर्वक उससे बोले।

शिवजीने कहा—दानवश्रेष्ठ मय! मैं तुझपर प्रसन्न हूँ, अतः तू वर माँग ले। इस समय जो कुछ भी तेरे मनकी अभिलाषा होगी, उसे मैं अवश्य पूर्ण करूँगा।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! शम्भुके इस मंगलमय वचनको सुनकर दानवश्रेष्ठ मयने अंजलि बाँधकर विनम्र हो उन प्रभुके चरणोंमें नमस्कार करके कहा।

मय बोला—देवाधिदेव महादेव! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और मुझे वर पानेका अधिकारी समझते हैं तो अपनी शाश्वती भक्ति प्रदान कीजिये। परमेश्वर! मैं सदा अपने भक्तोंसे मित्रता रखूँ, दीनोंपर सदा मेरा दयाभाव बना रहे और अन्यान्य दुष्ट प्राणियोंकी मैं उपेक्षा करता रहूँ। महेश्वर! कभी भी मुझमें आसुर भावका उदय न हो। नाथ! निरन्तर आपके शुभ भजनमें तल्लीन रहकर निर्भय बना रहूँ।

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! शंकर तो सबके स्वामी तथा भक्तवत्सल हैं। मयने जब इस प्रकार उन परमेश्वरकी प्रार्थना की, तब वे प्रसन्न होकर मयसे बोले।

महेश्वरने कहा—दानवसत्तम! तू मेरा भक्त है, तुझमें कोई भी विकार नहीं है; अतः तू धन्य है। अब मैं तेरा जो कुछ भी अभीष्ट वर है, वह सारा-का-सारा तुझे प्रदान करता हूँ। अब तू मेरी आज्ञासे अपने परिवारसहित वितललोकको चला जा। वह स्वर्गसे भी रमणीय है। तू वहाँ प्रसन्न-चित्तसे मेरा भजन करते हुए निर्भय होकर निवास कर। मेरी आज्ञासे कभी भी तुझमें आसुर भावका प्राकट्य नहीं होगा।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! मयने महात्मा शंकरकी उस आज्ञाको सिर झुका-कर स्वीकार किया और उन्हें तथा अन्यान्य देवोंको भी प्रणाम करके वह वितललोकको चला गया। तदनन्तर महादेवजी देवताओंके उस महान् कार्यको पूर्ण करके देवी पार्वती, अपने पुत्र और सम्पूर्ण गणोंसहित अन्तर्धान हो गये। जब परिवारसमेत भगवान् शंकर अन्तर्हित हो गये, तब वह धनुष, बाण, रथ आदि सारा उपकरण भी अदृश्य हो गया। तत्पश्चात् ब्रह्मा, विष्णु तथा अन्यान्य देव, मुनि, गन्धर्व, किंनर, नाग, सर्प, अप्सरा और मनुष्योंको महान् हर्ष प्राप्त हुआ। वे सभी शंकरजीके उत्तम यशका बखान करते हुए आनन्दपूर्वक अपने-अपने स्थानको चले गये। वहाँ पहुँचकर उन्हें परम सुखकी प्राप्ति हुई। महर्षे! इस प्रकार मैंने शशिमौलि शंकरजीका विशाल चरित, जो त्रिपुरविनाशको सूचित करनेवाला तथा परमोत्कृष्ट लीलासे युक्त है, सारा-का-सारा तुम्हें सुना दिया।

(अध्याय ११-१२)

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789 संक्षिप्त शिवपुराण—13 A

३८६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

दम्भकी तपस्या और विष्णुद्वारा उसे पुत्रप्राप्तिका वरदान, शंखचूड़का जन्म, तप और उसे वरप्राप्ति, ब्रह्माजीकी आज्ञासे उसका पुष्करमें तुलसीके पास आना और उसके साथ वार्तालाप, ब्रह्माजीका पुनः वहाँ प्रकट होकर दोनोंको आशीर्वाद देना और शंखचूड़का गान्धर्व विवाहकी विधिसे तुलसीका पाणिग्रहण करना

तदनन्तर जलन्धरकी उत्पत्तिसे लेकर उसके वधतकका प्रसंग सुनाकर सनत्कुमारजीने कहा— मुने! अब शम्भुका दूसरा चरित्र प्रेमपूर्वक श्रवण करो। उसके सुननेमात्रसे शिवभक्ति सुदृढ़ हो जाती है। व्यासजी! शंखचूड़ नामक एक महावीर दानव था, जो देवोंके लिये कण्टकस्वरूप था। उसे शिवजीने रणके मुहानेपर त्रिशूलसे मार डाला था। शिवजीका वह दिव्य चरित्र परम पावन तथा पापनाशक है। तुमपर अधिक स्नेह होनेके कारण मैं उसका वर्णन करता हूँ, तुम प्रेमपूर्वक उसे श्रवण करो। ब्रह्माके पुत्र जो महर्षि मरीचि थे, उनके पुत्र कश्यप हुए। ये मननशील, धर्मिष्ठ, सृष्टिकर्ता, विद्यासम्पन्न तथा प्रजापति थे। दक्षने प्रसन्न होकर अपनी तेरह कन्याओंका विवाह इनके साथ कर दिया। उनकी संतानोंका इतना अधिक विस्तार हुआ कि उसका वर्णन करना कठिन है। उन कश्यप-पत्नियोंमें एकका नाम दनु था। वह श्रेष्ठ सुन्दरी तथा महारूपवती थी। उस साध्वीका सौभाग्य बढ़ा हुआ था। मुने! उस दनुके बहुत-से महाबली पुत्र उत्पन्न हुए। विस्तारभय से उनके नाम नहीं गिनाये जा रहे हैं। उनमें एकका नाम विप्रचित्ति था, जो महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न था। उसका पुत्र दम्भ हुआ, जो जितेन्द्रिय, धार्मिक तथा विष्णुभक्त था। जब उसके कोई पुत्र नहीं हुआ, तब उस वीरको चिन्ता व्याप्त हो गयी। उसने शुक्राचार्यको गुरु बनाकर उनसे श्रीकृष्ण-मन्त्र प्राप्त किया और पुष्करमें जाकर घोर तप करना आरम्भ किया। वहाँ सुदृढ़ आसन लगाकर कृष्ण-मन्त्रका जप करते हुए उसके एक लाख वर्ष बीत गये। तब उस तपस्वीके मस्तकसे एक जाज्वल्यमान तेज निकलकर सर्वत्र व्याप्त हो गया। वह तेज इतना दुःसह था कि उससे सम्पूर्ण देवता, मुनि तथा मनु संतप्त हो उठे। तब वे इन्द्रको अगुआ बनाकर ब्रह्माके शरणापन्न हुए। वहाँ उन्होंने सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता विधाताको प्रणाम करके उनकी स्तुति की और फिर विशेष-रूपसे व्याकुल होकर अपना सारा वृत्तान्त उनसे कह सुनाया। उनकी बात सुनकर ब्रह्मा भी उन्हें साथ लेकर वह सारा वृत्तान्त विष्णुको सुनानेके लिये वैकुण्ठको चले। वहाँ पहुँचकर सब लोगोंने त्रिलोकीके अधीश्वर तथा रक्षक परमात्मा विष्णुको विनीतभावसे प्रणाम किया और फिर हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे।

देवता बोले—देवदेव! हमें पता नहीं कि यहाँ कौन-सा कारण उत्पन्न हो गया है। हम किसके तेजसे संतप्त हो उठे हैं, यह आप ही बतलाइये। दीनबन्धो! अपने दुःखी


789 संक्षिप्त शिवपुराण—13 B

* रुद्रसंहिता * ३८७

सेवकोंके रक्षक तो आप ही हैं; अतः शरणदाता! रमानाथ! हम शरणागतोंकी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! ब्रह्मा आदि देवताओंके वचनको सुनकर शरणागतवत्सल भगवान् विष्णु मुसकराये और प्रेमपूर्वक बोले।

विष्णुने कहा—अमरो! शान्त रहो, घबराओ मत, भयभीत न होओ। कोई उलट-पलट नहीं होगा; क्योंकि अभी प्रलयका समय नहीं आया है। (यह तेज तो) दम्भ नामक दानवका है, जो मेरा भक्त है और पुत्रकी कामनासे तप कर रहा है। मैं उसे वरदान देकर शान्त कर दूँगा।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! भगवान् विष्णुके यों कहनेपर ब्रह्मा आदि देवताओंकी व्यग्रता जाती रही, वे सभी धैर्य धारण करके अपने-अपने धामको लौट गये। इधर भगवान् अच्युत भी वर प्रदान करनेके लिये पुष्करको चल पड़े, जहाँ वह दम्भ नामक दानव तप कर रहा था। वहाँ पहुँचकर श्रीहरिने अपने मन्त्रका जप करनेवाले भक्त दम्भको सान्त्वना देते हुए मधुर वाणीमें कहा—'वर माँग!' तब विष्णुका उपर्युक्त वचन सुनकर और उन्हें आगे उपस्थित देखकर दम्भ बड़ी भक्तिके साथ उनके चरणोंमें लोट-पोट हो गया और बारंबार स्तुति करते हुए बोला।

दम्भने कहा—देवाधिदेव! कमलनयन! आपको नमस्कार है। रमानाथ! मुझपर कृपा कीजिये। त्रिलोकेश! मुझे एक ऐसा वीर पुत्र दीजिये, जो आपका भक्त तथा महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न हो। वह त्रिलोकीको जीत ले, परंतु देवता उसे पराजित न कर सकें।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! दानवराज दम्भके यों कहनेपर श्रीहरिने उसे वह वर दे दिया और उस घोर तपसे उसे निवृत्त करके स्वयं अन्तर्धान हो गये। दानवेन्द्र दम्भकी तपस्या सिद्ध हो चुकी थी, जिससे उसका मनोरथ पूर्ण हो गया था; अतः वह भी श्रीहरिके चले जानेपर उस दिशाको नमस्कार करके अपने घरको लौट गया। थोड़े ही समयके उपरान्त उसकी भाग्यवती पत्नी गर्भवती हो गयी। वह अपने तेजसे घरके भीतरी भागको प्रकाशित करती हुई शोभा पाने लगी। मुने! श्रीकृष्णके पार्षदोंका अग्रणी जो सुदामा नामक गोप था, जिसे राधाजीने शाप दे दिया था, वही उसके गर्भमें प्रविष्ट हुआ था। तदनन्तर समय आनेपर साध्वी दम्भ-पत्नीने एक तेजस्वी बालकको जन्म दिया। तब पिताने बहुत-से मुनीश्वरोंको बुलाकर उसका विधिपूर्वक जातकर्म आदि संस्कार सम्पन्न किया। द्विजोत्तम! उस पुत्रके उत्पन्न होनेपर बहुत बड़ा उत्सव मनाया गया। फिर शुभ दिन आनेपर पिताने उस बालकका 'शंखचूड़' ऐसा नामकरण किया। वह अपने पिताके घरमें शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति बढ़ने लगा। वह अत्यन्त तेजस्वी था, अतः उसने बचपनमें ही सारी विद्याएँ सीख लीं। वह नित्य बालक्रीड़ा करके अपने माता-पिताका हर्ष बढ़ाने लगा और अपने समस्त कुटुम्बियोंका तो वह विशेषरूपसे प्रेम-भाजन हो गया।

तदनन्तर जब शंखचूड़ बड़ा हुआ, तब वह जैगीषव्य मुनिके उपदेशसे पुष्करमें जाकर ब्रह्माजीको प्रसन्न करनेके लिये भक्तिपूर्वक तपस्या करने लगा। उस समय वह एकाग्रमन हो अपनी इन्द्रियोंको काबूमें करके गुरूपदिष्ट ब्रह्मविद्याका जप करता रहा। यों पुष्करमें तपस्या करते हुए दानवराज


789 संक्षिप्त शिवपुराण—13 C

३८८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

शंखचूडको वर देनेके लिये लोकगुरु एवं ऐश्वर्यशाली ब्रह्मा शीघ्र ही वहाँ पधारे और उस दानवेन्द्रसे बोले—‘वर माँग!’ ब्रह्माजीको देखकर उसने अत्यन्त नम्रतासे उन्हें अभिवादन किया और फिर उत्तम वाणीसे उनकी स्तुति की। तत्पश्चात् उसने ब्रह्मासे वर माँगते हुए कहा—‘भगवन्! मैं देवताओंके लिये अजेय हो जाऊँ।’ तब ब्रह्माजी परम प्रसन्न होकर बोले—‘तथास्तु—ऐसा ही होगा।’ फिर उन्होंने शंखचूडको वह दिव्य श्रीकृष्णकवच प्रदान किया, जो जगत्के सम्पूर्ण मंगलोंका भी मंगल और सर्वत्र विजय प्रदान करनेवाला है। तदनन्तर ब्रह्माजीने उसे आज्ञा दी कि ‘तुम बदरीवनको जाओ। वहीं धर्मध्वजकी कन्या तुलसी सकामभावसे तपस्या कर रही है। तुम उसके साथ विवाह कर लो।’ यों कहकर ब्रह्माजी उसी क्षण उसके सामने ही तुरंत अन्तर्धान हो गये। तब तपः-सिद्ध शंखचूडने भी, जिसके सारे मनोरथ तपोबलसे पूर्ण हो चुके थे और मुखपर प्रसन्नता खेल रही थी, पुष्करमें ही उस जगत्के मंगलोंके भी मंगलस्वरूप कवचको गलेमें बाँध लिया और ब्रह्माके आज्ञानुसार वह तत्काल ही बदरिकाश्रमको चल पड़ा। वहाँ दानव शंखचूड सहसा उस स्थानपर जा पहुँचा जहाँ धर्मध्वजकी पुत्री तुलसी तप कर रही थी। सुन्दरी तुलसीका रूप अत्यन्त कमनीय और मनोहर था। वह उत्तम शीलसे सम्पन्न थी। उस सतीको देखकर शंखचूड उसके समीप ही ठहर गया और मधुर वाणीमें उससे बोला।

शंखचूडने कहा—सुन्दरी! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? तुम यहाँ चुपचाप बैठकर क्या कर रही हो? यह सारा रहस्य मुझे बतलाओ।

सनत्कुमारजी कहते हैं—मुने! शंखचूडके ये सकाम वचन सुनकर तुलसीने उससे कहा।

तुलसी बोली—मैं धर्मध्वजकी तपस्विनी कन्या हूँ और यहाँ तपोवनमें तप कर रही हूँ। आप कौन हैं? सुखपूर्वक अपने अभीष्ट स्थानको चले जाइये; क्योंकि नारीजाति ब्रह्मा आदिको भी मोहमें डाल देनेवाली होती है। यह विषतुल्य, निन्दनीय, दोष उत्पन्न करनेवाली, मायारूपिणी तथा विचारशीलोंको भी शृंखलाके समान जकड़ लेनेवाली होती है।

सनत्कुमारजी कहते हैं—महर्षे! तुलसी जब इस प्रकार रसभरी बातें कहकर चुप हो गयी, तब उसे मुसकराती देखकर शंखचूडने भी कहना आरम्भ किया।

शंखचूड बोला—देवि! तुमने जो बात कही है, वह सारी-की-सारी मिथ्या हो, ऐसी बात नहीं है। उसमें कुछ सत्य है और कुछ


789 संक्षिप्त शिवपुराण—13 D