श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
‘वानर पीट रहे थे और मैं हाथ जोड़कर रक्षाके लिये याचना कर रहा था। उस दशामें श्रीरामने अकस्मात् ‘मत मारो, मत मारो’ कहकर मेरी रक्षा की॥ १०॥
‘श्रीराम पर्वतीय शिलाखण्डोंद्वारा समुद्रको पाटकर लङ्काके दरवाजेपर आ धमके हैं और हाथमें धनुष लिये खड़े हैं॥ ११॥
‘वे महातेजस्वी रघुनाथजी गरुड़व्यूहका आश्रय ले वानरोंके बीचमें विराजमान हैं और मुझे विदा करके वे लङ्कापर चढ़े चले आ रहे हैं॥ १२॥
‘जबतक वे लङ्काके परकोटेतक पहुँचें, उसके पहले ही आप शीघ्रतापूर्वक दोमेंसे एक काम अवश्य कर डालिये—या तो उन्हें सीताजीको लौटा दीजिये या युद्धस्थलमें खड़े होकर उनका सामना कीजिये’॥ १३॥
उसकी बात सुनकर मन-ही-मन उसपर विचार करनेके पश्चात् राक्षसराज रावणने शार्दूलसे यह महत्त्वपूर्ण बात कही—॥ १४॥
‘यदि देवता, गन्धर्व और दानव मुझसे युद्ध करें और सम्पूर्ण लोक मुझे भय देने लगे तो भी मैं सीताको नहीं लौटाऊँगा’॥ १५॥
ऐसा कहकर महातेजस्वी रावण फिर बोला—‘तुम तो वानरोंकी सेनामें विचरण कर चुके हो; उसमें कौन-कौन-से वानर अधिक शूरवीर हैं?॥ १६॥
‘सौम्य! जो दुर्जय वानर हैं, वे कैसे हैं? उनका प्रभाव कैसा है? तथा वे किसके पुत्र और पौत्र हैं? राक्षस! ये सब बातें ठीक-ठीक बताओ॥ १७॥
‘उन वानरोंका बलाबल जानकर तदनुसार कर्तव्यका निश्चय करूँगा। युद्धकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको अपने तथा शत्रुपक्षकी सेनाकी गणना—उसके विषयकी आवश्यक जानकारी अवश्य करनी चाहिये’॥ १८॥
रावणके इस प्रकार पूछनेपर श्रेष्ठ गुप्तचर शार्दूलने उसके समीप यों कहना आरम्भ किया—॥ १९॥
‘राजन्! उस वानरसेनामें जाम्बवान् नामसे प्रसिद्ध एक वीर है, जिसको युद्धमें परास्त करना बहुत ही कठिन है। वह ऋक्षरजा तथा गद्गदका पुत्र है॥ २०॥
‘गद्गदका एक दूसरा पुत्र भी है (जिसका नाम धूम्र है)। इन्द्रके गुरु बृहस्पतिका पुत्र केसरी है, जिसके पुत्र हनुमान्ने अकेले ही यहाँ आकर पहले बहुत-से राक्षसोंका संहार कर डाला था॥
२१ ॥
‘धर्मात्मा और पराक्रमी सुषेण धर्मका पुत्र है। राजन्! दधिमुख नामक सौम्य वानर चन्द्रमाका बेटा है॥ २२ ॥
‘सुमुख, दुर्मुख और वेगदर्शी नामक वानर—ये मृत्युके पुत्र हैं। निश्चय ही स्वयम्भू ब्रह्माने मृत्युकी ही इन वानरोंके रूपमें सृष्टि की है॥ २३ ॥
‘स्वयं सेनापति नील अग्निका पुत्र है। सुविख्यात वीर हनुमान् वायुका बेटा है॥ २४ ॥
‘बलवान् एवं दुर्जय वीर अङ्गद इन्द्रका नाती है। वह अभी नौजवान है। बलवान् वानर मैन्द और द्विविद—ये दोनों अश्विनीकुमारोंके पुत्र हैं॥ २५ ॥
‘गज, गवाक्ष, गवय, शरभ और गन्धमादन—ये पाँच यमराजके पुत्र हैं और काल एवं अन्तकके समान पराक्रमी हैं॥ २६ ॥
‘इस प्रकार देवताओंसे उत्पन्न हुए तेजस्वी शूरवीर वानरोंकी संख्या दस करोड़ है। वे सब-के-सब युद्धकी इच्छा रखनेवाले हैं। इनके अतिरिक्त जो शेष वानर हैं, उनके विषयमें मैं कुछ नहीं कह सकता; क्योंकि उनकी गणना असम्भव है॥ २७ ॥
‘दशरथनन्दन श्रीरामका श्रीविग्रह सिंहके समान सुगठित है। इनकी युवावस्था है। इन्होंने अकेले ही खर-दूषण और त्रिशिराका संहार किया था॥ २८ ॥
‘इस भूमण्डलमें श्रीरामचन्द्रजीके समान पराक्रमी वीर दूसरा कोर्इ नहीं है। इन्होंने ही विराधका और कालके समान विकराल कबन्धका भी वध किया था॥
‘इस भूतलपर कोर्इ भी मनुष्य ऐसा नहीं है, जो श्रीरामके गुणोंका पूर्णरूपसे वर्णन कर सके। श्रीरामने ही जनस्थानमें उतने राक्षसोंका संहार किया था॥ ३० ॥
‘धर्मात्मा लक्ष्मण भी श्रेष्ठ गजराजके समान पराक्रमी हैं, उनके बाणोंका निशाना बन जानेपर देवराज इन्द्र भी जीवित नहीं रह सकते॥ ३१ ॥
‘इनके सिवा उस सेनामें श्वेत और ज्योतिर्मुख— ये दो वानर भगवान् सूर्यके औरस पुत्र हैं। हेमकूट नामका वानर वरुणका पुत्र बताया जाता है॥ ३२ ॥
‘वानरशिरोमणि वीरवर नल विश्वकर्माके पुत्र हैं। वेगशाली और पराक्रमी दुर्धर वसु देवताका पुत्र है॥
‘आपके भार्इ राक्षसशिरोमणि विभीषण भी लङ्कापुरीका राज्य लेकर श्रीरघुनाथजीके ही हितसाधनमें तत्पर रहते हैं॥ ३४ ॥
‘इस प्रकार मैंने सुवेल पर्वतपर ठहरी हुर्इ वानरसेनाका पूरा-पूरा वर्णन कर दिया। अब जो शेष कार्य है, वह आपके ही हाथ है’*॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३० ॥
* इस सर्गमें जो वानरोंके जन्मका वर्णन किया गया है, वह प्रायः बालकाण्डके सत्रहवें सर्गमें किये गये वर्णनसे विरुद्ध है। वहाँ वरुणसे सुषेण, पर्जन्यसे शरभ और कुबेरसे गन्धमादनकी उत्पत्ति कही गयी है। परंतु इस सर्गमें सुषेणको धर्मका तथा शरभ और गन्धमादनको वैवस्वत यमका पुत्र कहा गया है। इस विरोधका परिहार यही है कि यहाँ कहे गये सुषेण आदि बालकाण्डवर्णित सुषेण आदिसे भिन्न हैं।
इकतीसवाँ सर्ग
इकतीसवाँ सर्ग
मायारचित श्रीरामका कटा मस्तक दिखाकर रावणद्वारा सीताको मोहमें डालनेका प्रयत्न
राक्षसराज रावणके गुप्तचरोंने जब लङ्कामें लौटकर यह बताया कि श्रीरामचन्द्रजीकी सेना सुवेल पर्वतपर आकर ठहरी है और उसपर विजय पाना असम्भव है, तब उन गुप्तचरोंकी बात सुनकर और महाबली श्रीराम आ गये, यह जानकर रावणको कुछ उद्वेग हुआ। उसने अपने मन्त्रियोंसे इस प्रकार कहा— ॥ १-२ ॥
‘मेरे सभी मन्त्री एकाग्रचित्त होकर शीघ्र यहाँ आ जायँ। राक्षसो! यह हमारे लिये गुप्त मन्त्रणा करनेका अवसर आ गया है’॥ ३ ॥
रावणका आदेश सुनकर समस्त मन्त्री शीघ्रतापूर्वक वहाँ आ गये। तब रावणने उन राक्षसजातीय सचिवोंके साथ बैठकर आवश्यक कर्तव्यपर विचार किया॥ ४ ॥
दुर्घर्ष वीर रावणने जो उचित कर्तव्य था, उसके विषयमें शीघ्र ही विचार-विमर्श करके उन सचिवोंको विदा कर दिया और अपने भवनमें प्रवेश किया॥ ५ ॥
फिर उसने महाबली, महामायावी, मायाविशारद राक्षस विद्युज्जिह्वको साथ लेकर उस प्रमदावनमें प्रवेश किया, जहाँ मिथिलेशकुमारी सीता विद्यमान थीं॥ ६ ॥
उस समय राक्षसराज रावणने माया जाननेवाले विद्युज्जिह्वसे कहा—‘हम दोनों मायाद्वारा जनकनन्दिनी सीताको मोहित करेंगे॥ ७ ॥
‘निशाचर! तुम श्रीरामचन्द्रजीका मायानिर्मित मस्तक लेकर एक महान् धनुष-बाणके साथ मेरे पास आओ’॥
रावणकी यह आज्ञा पाकर निशाचर विद्युज्जिह्वने कहा—‘बहुत अच्छा’। फिर उसने रावणको बड़ी कुशलतासे प्रकट की हुई अपनी माया दिखायी॥ ९ ॥
इससे राजा रावण उसपर बहुत प्रसन्न हुआ और उसे अपना आभूषण उतारकर दे दिया। फिर वह महाबली राक्षसराज सीताजीको देखनेके लिये अशोकवाटिकामें गया॥ १० १/२ ॥
कुबेरके छोटे भाई रावणने वहाँ सीताको दीन दशामें पड़ी देखा, जो उस दीनताके योग्य नहीं थीं। वे अशोक-वाटिकामें रहकर भी शोकमग्न थीं और सिर नीचा किये पृथ्वीपर बैठकर अपने पतिदेवका चिन्तन कर रही थीं॥
उनके आसपास बहुत-सी भयंकर राक्षसियाँ बैठी थीं। रावणने बड़े हर्षके साथ अपना नाम बताते हुए जनककिशोरी सीताके पास जाकर धृष्टतापूर्ण वचनोंमें कहा—॥ १३ १/२ ॥
‘भद्रे! मेरे बार-बार सान्त्वना देने और प्रार्थना करनेपर भी तुम जिनका आश्रय लेकर मेरी बात नहीं मानती थीं, खरका वध करनेवाले वे तुम्हारे पतिदेव श्रीराम समरभूमिमें मारे गये॥ १४ १/२ ॥
‘तुम्हारी जो जड़ थी, सर्वथा कट गयी। तुम्हारे दर्पको मैंने चूर्ण कर दिया। अब अपने ऊपर आये हुए इस संकटसे ही विवश होकर तुम स्वयं मेरी भार्या बन जाओगी। मूढ़ सीते! अब यह रामविषयक चिन्तन छोड़ दो। उस मरे हुए रामको लेकर क्या करोगी॥ १५-१६ ॥
‘भद्रे! मेरी सब रानियोंकी स्वामिनी बन जाओ। मूढ़े! तुम अपनेको बड़ी बुद्धिमती समझती थी न। तुम्हारा पुण्य बहुत कम हो गया था। इसीलिये ऐसा हुआ है। अब रामके मारे जानेसे तुम्हारा जो उनकी प्राप्तिरूप प्रयोजन था, वह समाप्त हो गया। सीते! यदि सुनना चाहो तो वृत्रासुरके वधकी भयंकर घटनाके समान अपने पतिके मारे जानेका घोर समाचार सुन लो॥ १७ ॥
‘कहा जाता है राम मुझे मारनेके लिये समुद्रके किनारेतक आये थे। उनके साथ वानरराज सुग्रीवकी लायी हुई विशाल सेना भी थी॥ १८ ॥
‘उस विशाल सेनाके द्वारा राम समुद्रके उत्तर तटको दबाकर ठहरे। उस समय सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये थे॥ १९ ॥
‘जब आधी रात हुई, उस समय रास्तेकी थकी-माँदी सारी सेना सुखपूर्वक सो गयी थी। उस अवस्थामें वहाँ पहुँचकर मेरे गुप्तचरोंने पहले तो उसका भलीभाँति निरीक्षण किया॥ २० ॥
‘फिर प्रहस्तके सेनापतित्वमें वहाँ गयी हुई मेरी बहुत बड़ी सेनाने रातमें, जहाँ राम और लक्ष्मण थे, उस वानर-सेनाको नष्ट कर दिया॥ २१ ॥
‘उस समय राक्षसोंने पट्टिश, परिघ, चक्र, ऋष्टि, दण्ड, बड़े-बड़े आयुध, बाणोंके समूह, त्रिशूल, चमकीले कूट और मुद्गर, डंडे, तोमर, प्रास तथा मूसल उठा-उठाकर वानरोंपर प्रहार किया था॥ २२-२३ ॥
‘तदनन्तर शत्रुओंको मथ डालनेवाले प्रहस्तने, जिसके हाथ खूब सधे हुए हैं, बहुत बड़ी तलवार हाथमें लेकर उससे बिना किसी रुकावटके रामका मस्तक काट डाला॥ २४ ॥
‘फिर अकस्मात् उछलकर उसने विभीषणको पकड़ लिया और वानरसैनिकोंसहित लक्ष्मणको विभिन्न दिशाओंमें भाग जानेको विवश किया॥ २५॥
‘सीते! वानरराज सुग्रीवकी ग्रीवा काट दी गयी, हनुमान्की हनु (ठोढ़ी) नष्ट करके उसे राक्षसोंने मार डाला॥ २६॥
‘जाम्बवान् ऊपरको उछल रहे थे, उसी समय युद्धस्थलमें राक्षसोंने बहुत-से पट्टिशोंद्वारा उनके दोनों घुटनोंपर प्रहार किया। वे छिन्न-भिन्न होकर कटे हुए पेड़की भाँति धराशायी हो गये॥ २७॥
‘मैन्द और द्विविद दोनों श्रेष्ठ वानर खूनसे लथपथ होकर पड़े हैं। वे लंबी साँसें खींचते और रोते थे। उसी अवस्थामें उन दोनों विशालकाय शत्रुसूदन वानरोंको तलवारद्वारा बीचसे ही काट डाला गया है॥
‘पनस नामका वानर पककर फटे हुए पनस (कटहल) के समान पृथ्वीपर पड़ा-पड़ा अन्तिम साँसें ले रहा है। दरीमुख अनेक नाराचोंसे छिन्न-भिन्न हो किसी दरी (कन्दरा) में पड़ा सो रहा है। महातेजस्वी कुमुद सायकोंसे घायल हो चीखता-चिल्लाता हुआ मर गया॥ २९-३०॥
‘अङ्गदधारी अङ्गदपर आक्रमण करके बहुत-से राक्षसोंने उन्हें बाणोंद्वारा छिन्न-भिन्न कर दिया है। वे सब अङ्गोंसे रक्त बहाते हुए पृथ्वीपर पड़े हैं॥ ३१॥
‘जैसे बादल वायुके वेगसे फट जाते हैं, उसी प्रकार बड़े-बड़े हाथियों तथा रथसमूहोंने वहाँ सोये हुए वानरोंको रौंदकर मथ डाला॥ ३२॥
‘जैसे सिंहके खदेड़नेसे बड़े-बड़े हाथी भागते हैं, उसी प्रकार राक्षसोंके पीछा करनेपर बहुत-से वानर पीठपर बाणोंकी मार खाते हुए भाग गये हैं॥ ३३॥
‘कोई समुद्रमें कूद पड़े और कोई आकाशमें उड़ गये हैं। बहुत-से रीछ वानरी वृत्तिका आश्रय ले पेड़ोंपर चढ़ गये हैं॥ ३४॥
‘विकराल नेत्रोंवाले राक्षसोंने इन बहुसंख्यक भूरे बंदरोंको समुद्रतट, पर्वत और वनोंमें खदेड़-खदेड़कर मार डाला है॥ ३५॥
‘इस प्रकार मेरी सेनाने सैनिकोंसहित तुम्हारे पतिको मौतके घाट उतार दिया। खूनसे भीगा और धूलमें सना हुआ उनका यह मस्तक यहाँ लाया गया है’॥ ३६॥
‘ऐसा कहकर अत्यन्त दुर्जय राक्षसराज रावणने सीताके सुनते-सुनते एक राक्षसीसे कहा—॥ ३७॥
‘तुम क्रूरकर्मा राक्षस विद्युज्जिह्वको बुला ले आओ, जो स्वयं संग्रामभूमिसे रामका सिर यहाँ ले आया है’॥ ३८॥
तब विद्युज्जिह्व धनुषसहित उस मस्तकको लेकर आया और सिर झुका रावणको प्रणाम करके उसके सामने खड़ा हो गया। उस समय अपने पास खड़े हुए विशाल जिह्वावाले राक्षस विद्युज्जिह्वसे राजा रावण यों बोला—॥ ४०॥
‘तुम दशरथकुमार रामका मस्तक शीघ्र ही सीताके आगे रख दो, जिससे यह बेचारी अपने पतिकी अन्तिम अवस्थाका अच्छी तरह दर्शन कर ले’॥ ४१॥
रावणके ऐसा कहनेपर वह राक्षस उस सुन्दर मस्तकको सीताके निकट रखकर तत्काल अदृश्य हो गया॥ ४२॥
रावणने भी उस विशाल चमकीले धनुषको यह कहकर सीताके सामने डाल दिया कि यही रामका त्रिभुवनविख्यात धनुष है॥ ४३॥
फिर बोला—‘सीते! यही तुम्हारे रामका प्रत्यञ्चासहित धनुष है। रातके समय उस मनुष्यको मारकर प्रहस्त इस धनुषको यहाँ ले आया है’॥ ४४॥
जब विद्युज्जिह्वने मस्तक वहाँ रखा, उसके साथ ही रावणने वह धनुष पृथ्वीपर डाल दिया। तत्पश्चात् वह विदेहराजकुमारी यशस्विनी सीतासे बोला—‘अब तुम मेरे वशमें हो जाओ’॥ ४५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें इकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३१॥
बत्तीसवाँ सर्ग
बत्तीसवाँ सर्ग
श्रीरामके मारे जानेका विश्वास करके सीताका विलाप तथा रावणका सभामें जाकर मन्त्रियोंके सलाहसे युद्धविषयक उद्योग करना
सीताजीने उस मस्तक और उस उत्तम धनुषको देखकर तथा हनुमान्जीकी कही हुई सुग्रीवके साथ मैत्री-सम्बन्ध होनेकी बात याद करके अपने पतिके-जैसे ही नेत्र, मुखका वर्ण, मुखाकृति, केश, ललाट और उस सुन्दर चूडामणिको लक्ष्य किया। इन सब चिह्नोंसे पतिको पहचानकर वे बहुत दुखी हुईं और कुररीकी भाँति रो-रोकर कैकेयीकी निन्दा करने लगीं— ॥ १ —३ ॥
‘कैकेयि! अब तुम सफलमनोरथ हो जाओ, रघुकुलको आनन्दित करनेवाले ये मेरे पतिदेव मारे गये। तुम स्वभावसे ही कलहकारिणी हो। तुमने समस्त रघुकुलका संहार कर डाला॥ ४ ॥
‘आर्य श्रीरामने कैकेयीका कौन-सा अपराध किया था, जिससे उसने इन्हें चीरवस्त्र देकर मेरे साथ वनमें भेज दिया था’॥ ५ ॥
ऐसा कहकर दुःखकी मारी तपस्विनी वैदेही बाला थर-थर काँपती हुई कटी कदलीके समान पृथ्वीपर गिर पड़ीं॥ ६ ॥
फिर दो घड़ीमें उनकी चेतना लौटी और वे विशाललोचना सीता कुछ धीरज धारणकर उस मस्तकको अपने निकट रखकर विलाप करने लगीं— ॥ ७ ॥
‘हाय! महाबाहो! मैं मारी गयी। आप वीरव्रतका पालन करनेवाले थे। आपकी इस अन्तिम अवस्थाको मुझे अपनी आँखोंसे देखना पड़ा। आपने मुझे विधवा बना दिया॥ ८ ॥
‘स्त्रीसे पहले पतिका मरना उसके लिये महान् अनर्थकारी दोष बताया जाता है। मुझ सती-साध्वीके रहते हुए मेरे सामने आप-जैसे सदाचारी पतिका निधन हुआ, यह मेरे लिये महान् दुःखकी बात है॥ ९ ॥
‘मैं महान् संकटमें पड़ी हूँ, शोकके समुद्रमें डूबी हूँ, जो मेरा उद्धार करनेके लिये उद्यत थे, उन आप-जैसे वीरको भी शत्रुओंने मार गिराया॥ १० ॥
‘रघुनन्दन! जैसे कोई बछड़ेके प्रति स्नेहसे भरी हुई गायको उस बछड़ेसे विलग कर दे, यही दशा मेरी सास कौसल्याकी हुई है। वे दयामयी जननी आप-जैसे पुत्रसे बिछुड़ गयीं॥ ११
॥
'रघुवीर! ज्योतिषियोंने तो आपकी आयु बहुत बड़ी बतायी थी, किंतु उनकी बात झूठी सिद्ध हुईं। रघुनन्दन! आप बड़े अल्पायु निकले॥ १२ ॥
'अथवा बुद्धिमान् होकर भी आपकी बुद्धि मारी गयी। तभी तो आप सोते हुए ही शत्रुके वशमें पड़ गये अथवा यह काल ही समस्त प्राणियोंके उद्भवमें हेतु है। अतः वही प्राणिमात्रको पकाता है—उन्हें शुभाशुभ कर्मोंके फलसे संयुक्त करता है॥ १३ ॥
'आप तो नीतिशास्त्रके विद्वान् थे। संकटसे बचनेके उपायोंको जानते थे और व्यसनोंके निवारणमें कुशल थे तो भी कैसे आपको ऐसी मृत्यु प्राप्त हुईं, जो दूसरे किसी वीर पुरुषको प्राप्त होती नहीं देखी गयी थी?॥
'कमलनयन! भीषण और अत्यन्त क्रूर कालरात्रि आपको हृदयसे लगाकर मुझसे हठात् छीन ले गयी॥
'पुरुषोत्तम! महाबाहो! आप मुझ तपस्विनीको त्यागकर अपनी प्रियतमा नारीकी भाँति इस पृथ्वीका आलिङ्गन करके यहाँ सो रहे हैं॥ १६ ॥
'वीर! जिसका मैं प्रयत्नपूर्वक गन्ध और पुष्पमाला आदिके द्वारा नित्यप्रति पूजन करती थी तथा जो मुझे बहुत प्रिय था, यह आपका वही स्वर्णभूषित धनुष है॥
'निष्पाप रघुनन्दन! निश्चय ही आप स्वर्गमें जाकर मेरे श्वशुर और अपने पिता महाराज दशरथसे तथा अन्य सब पितरोंसे भी मिले होंगे॥ १८ ॥
'आप पिताकी आज्ञाका पालनरूपी महान् कर्म करके अद्भुत पुण्यका उपार्जन कर यहाँसे अपने उस राजर्षिकुलकी उपेक्षा करके (उसे छोड़कर) जा रहे हैं, जो आकाशमें नक्षत्र* बनकर प्रकाशित होता है (आपको ऐसा नहीं करना चाहिये)॥ १९ ॥
'राजन्! आपने अपनी छोटी अवस्थामें ही जब कि मेरी भी छोटी ही अवस्था थी, मुझे पत्नीरूपमें प्राप्त किया। मैं सदा आपके साथ विचरनेवाली सहधर्मिणी हूँ। आप मेरी ओर क्यों नहीं देखते हैं अथवा मेरी बातका उत्तर क्यों नहीं देते हैं?॥ २० ॥
'काकुत्स्थ! मेरा पाणिग्रहण करते समय जो आपने प्रतिज्ञा की थी कि मैं तुम्हारे साथ धर्माचरण करूँगा, उसका स्मरण कीजिये और मुझ दुःखिनीको भी साथ ही ले चलिये॥ २१ ॥
‘गतिमानोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन! आप मुझे अपने साथ वनमें लाकर और यहाँ मुझ दुःखिनीको छोड़कर इस लोकसे परलोकको क्यों चले गये?॥ २२ ॥
‘मैंने ही अनेक मङ्गलमय उपचारोंसे सुन्दर आपके जिस श्रीविग्रहका आलिङ्गन किया था, आज उसीको मांस-भक्षी हिंसक जन्तु अवश्य इधर-उधर घसीट रहे होंगे॥
‘आपने तो पर्याप्त दक्षिणाओंसे युक्त अग्निष्टोम आदि यज्ञोंद्वारा भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना की है; फिर क्या कारण है कि अग्निहोत्रकी अग्निसे दाह-संस्कारका सुयोग आपको नहीं मिल रहा है॥ २४ ॥
‘हम तीन व्यक्ति एक साथ वनमें आये थे; परंतु अब शोकाकुल हुई माता कौसल्या केवल एक व्यक्ति लक्ष्मणको ही घर लौटा हुआ देख सकेंगी॥ २५ ॥
‘उनके पूछनेपर लक्ष्मण उन्हें रात्रिके समय राक्षसोंके हाथसे आपके मित्रकी सेनाके तथा सोते हुए आपके भी वधका समाचार अवश्य सुनायेंगे॥ २६ ॥
‘रघुनन्दन! जब उन्हें यह ज्ञात होगा कि आप सोते समय मारे गये और मैं राक्षसके घरमें हर लायी गयी हूँ तो उनका हृदय विदीर्ण हो जायगा और वे अपने प्राण त्याग देंगी॥ २७ ॥
‘हाय! मुझ अनार्याके लिये निष्पाप राजकुमार श्रीराम, जो महान् पराक्रमी थे, समुद्रलङ्घन-जैसा महान् कर्म करके भी गायकी खुरीके बराबर जलमें डूब गये—बिना युद्ध किये सोते समय मारे गये॥ २८ ॥
‘हाय! दशरथनन्दन श्रीराम मुझ-जैसी कुलकलङ्किनी नारीको मोहवश ब्याह लाये। पत्नी ही आर्यपुत्र श्रीरामके लिये मृत्युरूप बन गयी॥ २९ ॥
‘जिनके यहाँ सब लोग याचक बनकर आते थे एवं सभी अतिथि जिन्हें प्रिय थे, उन्हीं श्रीरामकी पत्नी होकर जो मैं आज शोक कर रही हूँ, इससे जान पड़ता है कि मैंने दूसरे जन्ममें निश्चय ही उत्तम दानधर्ममें बाधा डाली थी॥ ३० ॥
‘रावण! मुझे भी श्रीरामके शवके ऊपर रखकर मेरा वध करा डालो; इस प्रकार पतिको पत्नीसे मिला दो; यह उत्तम कल्याणकारी कार्य है, इसे अवश्य करो॥
‘रावण! मेरे सिरसे पतिके सिरका और मेरे शरीरसे उनके शरीरका संयोग करा दो। इस प्रकार मैं अपने महात्मा पतिकी गतिका ही अनुसरण करूँगी’॥
इस प्रकार दुःखसे संतप्त हुई विशाललोचना जनकनन्दिनी सीता पतिके मस्तक तथा धनुषको देखने और विलाप करने लगीं॥ ३३ ॥
जब सीता इस तरह विलाप कर रही थीं, उसी समय वहाँ रावणकी सेनाका एक राक्षस हाथ जोड़े हुए अपने स्वामीके पास आया॥ ३४ ॥
उसने ‘आर्यपुत्र महाराजकी जय हो’ कहकर रावणका अभिवादन किया और उसे प्रसन्न करके यह सूचना दी कि ‘सेनापति प्रहस्त पधारे हैं॥ ३५ ॥
‘प्रभो! सब मन्त्रियोंके साथ प्रहस्त महाराजकी सेवामें उपस्थित हुए हैं। वे आपका दर्शन करना चाहते हैं, इसीलिये उन्होंने मुझे यहाँ भेजा है॥ ३६ ॥
‘क्षमाशील महाराज! निश्चय ही कोई अत्यन्त आवश्यक राजकीय कार्य आ पड़ा है, अतः आप उन्हें दर्शन देनेका कष्ट करें?॥ ३७ ॥
राक्षसकी कही हुई यह बात सुनकर दशग्रीव रावण अशोकवाटिका छोड़कर मन्त्रियोंसे मिलनेके लिये चला गया॥ ३८ ॥
उसने मन्त्रियोंसे अपने सारे कृत्यका समर्थन कराया और श्रीरामचन्द्रजीके पराक्रमका पता लगाकर सभाभवनमें प्रवेश करके वह प्रस्तुत कार्यकी व्यवस्था करने लगा॥ ३९ ॥
रावणके वहाँसे निकलते ही वह सिर और उत्तम धनुष दोनों अदृश्य हो गये॥ ४० ॥
राक्षसराज रावणने अपने उन भयानक मन्त्रियोंके साथ बैठकर रामके प्रति किये जानेवाले तात्कालिक कर्तव्यका निश्चय किया॥ ४१ ॥
फिर राक्षसराज रावणने पास ही खड़े हुए अपने हितैषी सेनापतियोंसे इस प्रकार समयानुकूल बात कही— ॥
‘तुम सब लोग शीघ्र ही डंडेसे पीट-पीटकर धौंसा बजाते हुए समस्त सैनिकोंको एकत्र करो; परंतु उन्हें इसका कारण नहीं बताना चाहिये’॥ ४३ ॥
तब दूतोंने ‘तथास्तु’ कहकर रावणकी आज्ञा स्वीकार की और उसी समय सहसा विशाल सेनाको एकत्र कर दिया; फिर युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले अपने स्वामीको यह सूचना दी कि ‘सारी सेना आ गयी’॥ ४४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३२ ॥
* इक्ष्वाकुवंशके राजा त्रिशंकु आकाशमें नक्षत्र होकर प्रकाशित होते हैं, उन्हींके कारण क्षत्रिन्यायसे समस्त कुलको ही नक्षत्रकुल बताया है।
तैंतीसवाँ सर्ग
तैंतीसवाँ सर्ग
सरमाका सीताको सान्त्वना देना, रावणकी मायाका भेद खोलना, श्रीरामके आगमनका प्रिय समाचार सुनाना और उनके विजयी होनेका विश्वास दिलाना
विदेहनन्दिनी सीताको मोहमें पड़ी हुई देख सरमा नामकी राक्षसी उनके पास उसी तरह आयी, जैसे प्रेम रखनेवाली सखी अपनी प्यारी सखीके पास जाती है॥
सीता राक्षसराजकी मायासे मोहित हो बड़े दुःखमें पड़ गयी थीं। उस समय मृदुभाषिणी सरमाने उन्हें अपने वचनोंद्वारा सान्त्वना दी॥ २॥
सरमा रावणकी आज्ञासे सीताजीकी रक्षा करती थी। उसने अपनी रक्षणीया सीताके साथ मैत्री कर ली थी। वह बड़ी दयालु और दृढ-संकल्प थी॥ ३॥
सरमाने सखी सीताको देखा। उनकी चेतना नष्ट-सी हो रही थी। जैसे परिश्रमसे थकी हुई घोड़ी धरतीकी धूलमें लोटकर खड़ी हुई हो, उसी प्रकार सीता भी पृथ्वीपर लोटकर रोने और विलाप करनेके कारण धूलिधूसरित हो रही थीं॥ ४॥
उसने एक सखीके स्नेहसे उत्तम व्रतका पालन करनेवाली सीताको आश्वासन दिया—‘विदेहनन्दिनी! धैर्य धारण करो। तुम्हारे मनमें व्यथा नहीं होनी चाहिये। भीरु! रावणने तुमसे जो कुछ कहा है और स्वयं तुमने उसे जो उत्तर दिया है, वह सब मैंने सखीके प्रति स्नेह होनेके कारण सुन लिया है। विशाललोचने! तुम्हारे लिये मैं रावणका भय छोड़कर अशोकवाटिकामें सूने गहन स्थानमें छिपकर सारी बातें सुन रही थी। मुझे रावणसे कोई डर नहीं है॥ ५-६॥
‘मिथिलेशकुमारी! राक्षसराज रावण जिस कारण यहाँसे घबराकर निकल गया है, उसका भी मैं वहाँ जाकर पूर्णरूपसे पता लगा आयी हूँ॥ ७॥
‘भगवान् श्रीराम अपने स्वरूपको जाननेवाले सर्वज्ञ परमात्मा हैं। उनका सोते समय वध करना किसीके लिये भी सर्वथा असम्भव है। पुरुषसिंह श्रीरामके विषयमें इस तरह उनके वध होनेकी बात युक्तिसंगत नहीं जान पड़ती॥
‘वानरलोग वृक्षोंके द्वारा युद्ध करनेवाले हैं। उनका भी इस तरह मारा जाना कदापि सम्भव नहीं है; क्योंकि जैसे देवतालोग देवराज इन्द्रसे पालित होते हैं, उसी प्रकार ये वानर श्रीरामचन्द्रजीसे भलीभाँति सुरक्षित हैं॥
‘सीते! श्रीमान् राम गोलाकार बड़ी-बड़ी भुजाओंसे सुशोभित, चौड़ी छातीवाले, प्रतापी, धनुर्धर, सुगठित शरीरसे युक्त और भूमण्डलमें सुविख्यात धर्मात्मा हैं। उनमें महान् पराक्रम है। वे भार्इ लक्ष्मणकी सहायतासे अपनी तथा दूसरेकी भी रक्षा करनेमें समर्थ हैं। नीतिशास्त्रके ज्ञाता और कुलीन हैं। उनके बल और पौरुष अचिन्त्य हैं। वे शत्रुपक्षके सैन्यसमूहोंका संहार करनेकी शक्ति रखते हैं। शत्रुसूदन श्रीराम कदापि मारे नहीं गये हैं॥ १०—१२ ॥
‘रावणकी बुद्धि और कर्म दोनों ही बुरे हैं। वह समस्त प्राणियोंका विरोधी, क्रूर और मायावी है। उसने तुमपर यह मायाका प्रयोग किया था (वह मस्तक और धनुष मायाद्वारा रचे गये थे)॥ १३ ॥
‘अब तुम्हारे शोकके दिन बीत गये। सब प्रकारसे कल्याणका अवसर उपस्थित हुआ है। निश्चय ही लक्ष्मी तुम्हारा सेवन करती हैं। तुम्हारा प्रिय कार्य होने जा रहा है। उसे बताती हूँ, सुनो॥ १४ ॥
‘श्रीरामचन्द्रजी वानरसेनाके साथ समुद्रको लाँघकर इस पार आ रहे हैं। उन्होंने सागरके दक्षिणतटपर पड़ाव डाला है॥ १५ ॥
‘मैंने स्वयं लक्ष्मणसहित पूर्णकाम श्रीरामका दर्शन किया है। वे समुद्रतटपर ठहरी हुर्इ अपनी संगठित सेनाओंद्वारा सर्वथा सुरक्षित हैं॥ १६ ॥
‘रावणने जो-जो शीघ्रगामी राक्षस भेजे थे, वे सब यहाँ यही समाचार लाये हैं कि ‘श्रीरघुनाथजी समुद्रको पार करके आ गये’॥ १७ ॥
‘विशाललोचने! इस समाचारको सुनकर यह राक्षसराज रावण अपने सभी मन्त्रियोंके साथ गुप्त परामर्श कर रहा है’॥ १८ ॥
जब राक्षसी सरमा सीतासे ये बातें कह रही थी, उसी समय उसने युद्धके लिये पूर्णतः उद्योगशील सैनिकोंका भैरव नाद सुना॥ १९ ॥
डंडेकी चोटसे बजनेवाले धौंसेका गम्भीर नाद सुनकर मधुरभाषिणी सरमाने सीतासे कहा—॥ २० ॥
‘भीरु! यह भयानक भेरीनाद युद्धके लिये तैयारीकी सूचना दे रहा है। मेघकी गर्जनाके समान रणभेरीका गम्भीर घोष तुम भी सुन लो॥ २१ ॥
‘मतवाले हाथी सजाये जा रहे हैं। रथमें घोड़े जोते जा रहे हैं और हजारों घुड़सवार हाथमें भाला लिये दृष्टिगोचर हो रहे हैं॥ २२ ॥
‘जहाँ-तहाँसे युद्धके लिये संनद्ध हुए सहस्रों सैनिक दौड़े चले आ रहे हैं। सारी सड़कें अद्भुत वेषमें सजे और बड़े वेगसे गर्जना करते हुए सैनिकोंसे उसी तरह भरती जा रही हैं जैसे जलके असंख्य प्रवाह सागरमें मिल रहे हों॥ २३ १/२ ॥
‘नाना प्रकारकी प्रभा बिखेरनेवाले चमचमाते हुए अस्त्र-शस्त्रों, ढालों और कवचोंकी वह चमक देखो। राक्षसराज रावणका अनुगमन करनेवाले रथों, घोड़ों, हाथियों तथा रोमाञ्चित हुए वेगशाली राक्षसोंमें इस समय यह बड़ी हड़बड़ी दिखायी देती है। ग्रीष्म ऋतुमें वनको जलाते हुए दावानलका जैसा जाज्वल्यमान रूप होता है, वैसी ही प्रभा इन अस्त्र-शस्त्र आदिकी दिखायी देती है॥ २४—२६ ॥
‘हाथियोंपर बजते हुए घण्टोंका गम्भीर घोष सुनो, रथोंकी घर्घराहट सुनो और हिनहिनाते हुए घोड़ों तथा भाँति-भाँतिके बाजोंकी आवाज भी सुन लो॥ २७ ॥
‘हाथोंमें हथियार लिये रावणके अनुगामी राक्षसोंमें इस समय बड़ी घबराहट है। इससे यह जान लो कि उनपर कोऽइ बड़ा भारी रोमाञ्चकारी भय उपस्थित हुआ है और शोकका निवारण करनेवाली लक्ष्मी तुम्हारी सेवामें उपस्थित हो रही है॥ २८ १/२ ॥
‘तुम्हारे पति कमलनयन श्रीराम क्रोधको जीत चुके हैं। उनका पराक्रम अचिन्त्य है। वे दैत्योंको परास्त करनेवाले इन्द्रकी भाँति राक्षसोंको हराकर समराङ्गणमें रावणका वध करके तुम्हें प्राप्त कर लेंगे॥ २९-३० ॥
‘जैसे शत्रुसूदन इन्द्रने उपेन्द्रकी सहायतासे शत्रुओंपर पराक्रम प्रकट किया था, उसी प्रकार तुम्हारे पतिदेव श्रीराम अपने भाऽइ लक्ष्मणके सहयोगसे राक्षसोंपर अपने बलविक्रमका प्रदर्शन करेंगे॥ ३१ ॥
‘शत्रु रावणका संहार हो जानेपर मैं शीघ्र ही तुम-जैसी सतीसाध्वीको यहाँ पधारे हुए श्रीरघुनाथजीकी गोदमें समोद बैठी देखूँगी। अब शीघ्र ही तुम्हारा मनोरथ पूरा होगा॥ ३२ ॥
‘जनकनन्दिनि! विशाल वक्षःस्थलसे विभूषित श्रीरामके मिलनेपर उनकी छातीसे लगकर तुम शीघ्र ही नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहाओगी॥ ३३ ॥
‘देवि सीते! कर्ड महीनोंसे तुम्हारे केशोंकी एक ही वेणी जटाके रूपमें परिणत हो जो कटिप्रदेशतक लटक रही है, उसे महाबली श्रीराम शीघ्र ही अपने हाथोंसे खोलेंगे॥ ३४ ॥
‘देवि! जैसे नागिन केंचुल छोड़ती है, उसी प्रकार तुम उदित हुए पूर्णचन्द्रके समान अपने पतिका मुदित मुख देखकर शोकके आँसू बहाना छोड़ दोगी॥ ३५ ॥
‘मिथिलेशकुमारी! समराङ्गणमें शीघ्र ही रावणका वध करके सुख भोगनेके योग्य श्रीराम सफलमनोरथ हो तुझ प्रियतमाके साथ मनोवाञ्छित सुख प्राप्त करेंगे॥
‘जैसे पृथ्वी उत्तम वर्षासे अभिषिक्त होनेपर हरीभर ी खेतीसे लहलहा उठती है, उसी प्रकार तुम महात्मा श्रीरामसे सम्मानित हो आनन्दमग्न हो जाओगी॥ ३७ ॥
‘देवि! जो गिरिवर मेरुके चारों ओर घूमते हुए अश्वकी भाँति शीघ्रतापूर्वक मण्डलाकार-गतिसे चलते हैं, उन्हीं भगवान् सूर्यकी (जो तुम्हारे कुलके देवता हैं) तुम यहाँ शरण लो; क्योंकि ये प्रजाजनोंको सुख देने तथा उनका दुःख दूर करनेमें समर्थ हैं’॥ ३८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३३ ॥
चौंतीसवाँ सर्ग
चौंतीसवाँ सर्ग
सीताके अनुरोधसे सरमाका उन्हें मन्त्रियोंसहित रावणका निश्चित विचार बताना
रावणके पूर्वोक्त वचनसे मोहित एवं संतप्त हुई सीताको सरमाने अपनी वाणीद्वारा उसी प्रकार आह्लाद प्रदान किया, जैसे ग्रीष्म-ऋतुके तापसे दग्ध हुई पृथ्वीको वर्षा-कालकी मेघमाला अपने जलसे आह्लादित कर देती है॥
तदनन्तर समयको पहचानने और मुसकराकर बात करनेवाली सखी सरमा अपनी प्रिय सखी सीताका हित करनेकी इच्छा रखकर यह समयोचित वचन बोली— ॥
‘कजरारे नेत्रोंवाली सखी! मुझमें यह साहस और उत्साह है कि मैं श्रीरामके पास जाकर तुम्हारा संदेश और कुशल-समाचार निवेदन कर दूँ और फिर छिपी हुई वहाँसे लौट आऊँ॥ ३ ॥
‘निराधार आकाशमें तीव्र वेगसे जाती हुई मेरी गतिका अनुसरण करनेमें वायु अथवा गरुड़ भी समर्थ नहीं हैं’॥
ऐसी बात कहती हुई सरमासे सीताने उस स्नेहभरी मधुर वाणीद्वारा जो पहले शोकसे व्याप्त थी, इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥
‘सरमे! तुम आकाश और पाताल सभी जगह जानेमें समर्थ हो। मेरे लिये जो कर्तव्य तुम्हें करना है, उसे अब बता रही हूँ, सुनो और समझो॥ ६ ॥
‘यदि तुम्हें मेरा प्रिय कार्य करना है और यदि इस विषयमें तुम्हारी बुद्धि स्थिर है तो मैं यह जानना चाहती हूँ कि रावण यहाँसे जाकर क्या कर रहा है?॥ ७ ॥
‘शत्रुओंको रुलानेवाला रावण मायाबलसे सम्पन्न है। वह दुष्टात्मा मुझे उसी प्रकार मोहित कर रहा है, जैसे वारुणी अधिक मात्रामें पी लेनेपर वह पीनेवालेको मोहित (अचेत) कर देती है॥ ८ ॥
‘वह राक्षस अत्यन्त भयानक राक्षसियोंद्वारा प्रतिदिन मुझे डाँट बताता है, धमकाता है और सदा मेरी रखवाली करता है॥ ९ ॥
‘मैं सदा उससे उद्विग्न और शङ्कित रहती हूँ। मेरा चित्त स्वस्थ नहीं हो पाता। मैं उसीके भयसे व्याकुल होकर अशोकवाटिकामें चली आयी थी॥ १० ॥
‘यदि मन्त्रियोंके साथ उसकी बातचीत चल रही है तो वहाँ जो कुछ निश्चय हो अथवा रावणका जो निश्चित विचार हो, वह सब मुझे बताती रहो। यह मुझपर तुम्हारी बहुत बड़ी कृपा होगी’॥ ११ ॥
ऐसी बातें कहती हुर्इ सीतासे मधुरभाषिणी सरमाने उनके आँसुओंसे भीगे हुए मुखमण्डलको हाथसे पोंछते हुए इस प्रकार कहा— ॥ १२ ॥
‘मिथिलेशकुमारी जनकनन्दिनि! यदि तुम्हारी यही इच्छा है तो मैं जाती हूँ और शत्रुके अभिप्रायको जानकर अभी लौटती हूँ’॥ १३ ॥
ऐसा कहकर सरमाने उस राक्षसके समीप जाकर मन्त्रियोंसहित रावणकी कही हुर्इ सारी बातें सुनीं॥ १४ ॥
उस दुरात्माके निश्चयको सुनकर उसने अच्छी तरह समझ लिया और फिर वह शीघ्र ही सुन्दर अशोकवाटिकामें लौट आयी॥ १५ ॥
वहाँ प्रवेश करके उसने अपनी ही प्रतीक्षामें बैठी हुर्इ जनककिशोरीको देखा, जो उस लक्ष्मीके समान जान पड़ती थीं, जिसके हाथका कमल कहीं गिर गया हो॥
फिर लौटकर आयी हुर्इ प्रियभाषिणी सरमाको बड़े स्नेहसे गले लगाकर सीताने स्वयं उसे बैठनेके लिये आसन दिया और कहा—॥ १७ ॥
‘सखी! यहाँ सुखसे बैठकर सारी बातें ठीक-ठीक बताओ। उस क्रूर एवं दुरात्मा रावणने क्या निश्चय किया’॥
काँपती हुर्इ सीताके इस प्रकार पूछनेपर सरमाने मन्त्रियोंसहित रावणकी कही हुर्इ सारी बातें बतायीं—॥
‘विदेहनन्दिनि! राक्षसराज रावणकी माताने तथा रावणके प्रति अत्यन्त स्नेह रखनेवाले एक बूढ़े मन्त्रीने भी बड़ी-बड़ी बातें कहकर तुम्हें छोड़ देनेके लिये रावणको प्रेरित किया॥ २० ॥
‘राक्षसराज! तुम महाराज श्रीरामको सत्कारपूर्वक उनकी पत्नी सीता लौटा दो। जनस्थानमें जो अद्भुत घटना घटित हुर्इ थी, वही श्रीरामके पराक्रमको समझनेके लिये पर्याप्त प्रमाण एवं उदाहरण है॥ २१ ॥
‘(उनके सेवकोंमें भी अद्भुत शक्ति है) हनुमान्ने जो समुद्रको लाँघा, सीतासे भेंट की और युद्धमें बहुत-से राक्षसोंका वध किया—यह सब कार्य दूसरा कौन मनुष्य कर सकता है?’॥ २२
॥
‘इस प्रकार बूढ़े मन्त्रियों तथा माताके बहुत समझानेपर भी वह तुम्हें उसी तरह छोड़नेकी इच्छा नहीं करता है, जैसे धनका लोभी धनको त्यागना नहीं चाहता है॥ २३ ॥
‘मिथिलेशकुमारी! वह युद्धमें मरे बिना तुम्हें छोड़नेका साहस नहीं कर सकता। मन्त्रियोंसहित उस नृशंस निशाचरका यही निश्चय है॥ २४ ॥
‘रावणके सिरपर काल नाच रहा है। इसलिये उसके मनमें मृत्युके प्रति लोभ पैदा हो गया है। यही कारण है कि तुम्हें न लौटानेके निश्चयपर उसकी बुद्धि सुस्थिर हो गयी है। वह जबतक युद्धमें राक्षसोंके संहार और अपने वधके द्वारा (नष्ट) नहीं हो जायगा; केवल भय दिखानेसे तुम्हें नहीं छोड़ सकता॥ २५ १/२ ॥
‘कजरारे नेत्रोंवाली सीते! इसका परिणाम यही होगा कि भगवान् श्रीराम अपने सर्वथा तीखे बाणोंसे युद्धस्थलमें रावणका वध करके तुम्हें अयोध्याको ले जायँगे’॥ २६ ॥
इसी समय भेरीनाद और शङ्खध्वनिसे मिला हुआ समस्त सैनिकोंका महान् कोलाहल सुनायी दिया, जो भूकम्प पैदा कर रहा था॥ २७ ॥
वानरसैनिकोंके उस भीषण सिंहनादको सुनकर लङ्कामें रहनेवाले राक्षसराज रावणके सेवक हतोत्साह हो गये। उनकी सारी चेष्टा दीनतासे व्याप्त हो गयी। रावणके दोषसे उन्हें भी कोई कल्याणका उपाय नहीं दिखायी देता था॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३४ ॥
पैंतीसवाँ सर्ग
पैंतीसवाँ सर्ग
माल्यवान्का रावणको श्रीरामसे संधि करनेके लिये समझाना
शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले महाबाहु श्रीरामने शङ्खध्वनिसे मिश्रित हो तुमुल नाद करनेवाली भेरीकी आवाजके साथ लङ्कापर आक्रमण किया॥ १ ॥
उस भेरीनादको सुनकर राक्षसराज रावणने दो घड़ीतक कुछ सोच-विचार करनेके पश्चात् अपने मन्त्रियोंकी ओर देखा॥ २ ॥
उन सब मन्त्रियोंको सम्बोधित करके जगत्को संताप देनेवाले, महाबली, क्रूर राक्षसराज रावणने सारी सभाको प्रतिध्वनित करके किसीपर आक्षेप न करते हुए कहा— ॥ ३ १/२ ॥
‘आपलोगोंने रामके पराक्रम, बल-पौरुष तथा समुद्र-लङ्घनकी जो बात बतायी है, वह सब मैंने सुन ली; परंतु मैं तो आपलोगोंको भी, जो इस समय रामके पराक्रमकी बातें जानकर चुपचाप एक-दूसरेका मुँह देख रहे हैं, संग्रामभूमिमें सत्यपराक्रमी वीर समझता हूँ’॥ ४-५ ॥
रावणके इस आक्षेपपूर्ण वचनको सुननेके पश्चात् महाबुद्धिमान् माल्यवान् नामक राक्षसने, जो रावणका नाना था, इस प्रकार कहा— ॥ ६ ॥
‘राजन्! जो राजा चौदहों विद्याओंमें सुशिक्षित और नीतिका अनुसरण करनेवाला होता है, वह दीर्घकालतक राज्यका शासन करता है। वह शत्रुओंको भी वशमें कर लेता है॥ ७ ॥
‘जो समयके अनुसार आवश्यक होनेपर शत्रुओंके साथ संधि और विग्रह करता है तथा अपने पक्षकी वृद्धिमें लगा रहता है, वह महान् ऐश्वर्यका भागी होता है॥ ८ ॥
‘जिस राजाकी शक्ति क्षीण हो रही हो अथवा जो शत्रुके समान ही शक्ति रखता हो, उससे संधि कर लेनी चाहिये। अपनेसे अधिक या समान शक्तिवाले शत्रुका कभी अपमान न करे। यदि स्वयं ही शक्तिमें बढ़ा-चढ़ा हो, तभी शत्रुके साथ वह युद्ध ठाने॥ ९ ॥
‘इसलिये रावण! मुझे तो श्रीरामके साथ संधि करना ही अच्छा लगता है। जिसके लिये तुम्हारे ऊपर आक्रमण हो रहा है, वह सीता तुम श्रीरामको लौटा दो॥
‘देखो देवता, ऋषि और गन्धर्व सभी श्रीरामकी विजय चाहते हैं, अतः तुम उनसे विरोध न करो। उनके साथ संधि कर लेनेकी ही इच्छा करो॥ ११ ॥