BharatKosha
Back to the archive

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

लगी और पुकारा कि, दौडो, मेरे खाविंदको चोर मारके भागे

Page 158Permalink

( १९८ ) सिंहासनबत्तीसी.

गया अभी रात कुछ बाकी है बेहतर कि, फिर घर चलिये और स्वामीके साथ जलिये. यह दिलमे ठानकर अपने घरमे गई और खाविंदके पास जा कूक मार हाय हाय कर रोने लगी और पुकारा कि, दौडो, मेरे खाविंदको चोर मारके भागे जाते हैं और घरकी सब माया लिये जाते हैं. यह रोनेकी आवाज सुन बाहरके सब लोग दौड आये और पूछने लगे कि चोर किधर गये हैं ? उसने कहा अभी इसी रास्तेसे निकल गये. लोग तो ढूँढने लगे और यह शिर पटक पटक रो रो कहतीथी कि, मेरा सुहाग लूटकर मुझे अनाथ किये जाता है सब लोग कुटुंबके समझाने लगे कि, यह तो भगवानकी माया हे इसमें किसीका बश नहीं चलता. जब मौत आती है तब कुछ बहाना लिये आती है इसके दिन पूरे हो चुके और कौन किसीको यो मार सकता है और कोन किसीको जिला सकता है. तू अपने जीमे ढाढस बांध और इसकी गतिकर. तब यह बोली मैं भी इसके साथ सती हूंगी. क्योंकि मेरा जगत्‌मे इस बख्‍त कोई नहीं कि, मेरा सहाय करे. लोगोने बहुतेरा सम- झाया, पर उसने न माना और खाविंदको ले नदीके किनारे गई और चिता बना उसको लेकर आपही जलनेको बैठी. उस बख्‍त तमाम नगरके लोग देखने आये. उसी बख्‍त राजाभी वहां आकर खडा हुआ और उसने खातिर जमासे आग अपने

Page 159Permalink

हाथसे चितामे लगाई और सम्भल बैठी जब कपडे और बाल उसके जलकर बदनमे आंच लगी तब घबराकर उठी और सब लोग देखकर हँसे. वह चितामेसे कूद नदीमे जा पडी. तब राजासे चुप न रहा गया. और कहा कि अय सुन्दरी ! यह क्या है? वह बोली सुनो राजा ! इसका मर्म जाकर अपने घरमें पूछो और मै जो अपने कर्ममें लिखा लायीथी उसीका फल पाया. पर तूने अपने घरका भेद न पाया. हम सात सखियां इस नगरमें हैं उनमेकी एक मैं हूं और छः तेरे घरमे हैं ! यह कह वह तो पानी डूबगई. राजा अपने मनमे दुःख पा महलमें आया और छिप रहा. किसीको दिखाई न दिया. एक दिन और एक रात वहां लगा रहा. दूसरी रात जब हुई तब आधी रातके समय छहो रानियां हाथोंमें कंचनके थाल मिठाई पकवानसे भरभर लेकर महलके पिछवाडीकी वाडीमें गई. उसके आगे एक बन था. उस बनमे एक मठी थी. उसमें एक योगी ध्यान लगाये बैठा था. ये छहो रानिया दंडवते कर वहीं जा बैठीं. वहा राजाभी जो उसके पीछे पीछे आया था. यह अह- वाल देखने लगा. जब सिद्ध अपने ध्यानसे निश्चित हुआ, और उनसे हँस हँस बातें करने लगा. और जिसकदर ये मिठाई पकान लेगईथी सो सब आगे रख दिया. उसने भोजन किया और पान खाकर एक योगविद्याकी एक देहकी छे देह

Page 160Permalink

( १६० ) सिंहासनबत्तीसी. भयी और उन छहों रानियोंसे भोग किया. फिर वे छहों रानियों बिदा हो अपने मंदिरको चली आईं. राजा यह चरित्र देख अपने मनमें विचार करने लगा कि, इस सिद्धने क्या किया कि अपना योग भ्रष्ट किया और उनका धर्म खोया. यह विचार कर राजा सिद्धके सोहीं जाकर खड़ा रहा. सिद्ध मनमें कुछ शंका लिये बोला कि, हे नृपती ! कहांसे आये हो अपने मनका मुझसे भाव कहो. तब राजाने कहा मुझे आपके दर्शनकी इच्छा थी. इस लिये मै यहां आया हूं. तब वह योगी बोला कि राजा ! तू मुझसे जो कामना मांगे सो तेरी पूरी करूं फिर राजाने कहा कि स्वामी ! एक देहकी छः दह किस तरहसे बनें वह विद्या मै आपके पास मांगता हूं मुझे बताओ नहीं तो मैं तुझे जानसे मार डालता हूं, इसका विचार कर, जबाब दो. इतनी बात कह पुतली कहने लगी कि, सुन राजा भोज जब विक्रमने सिद्धसे ये बातें कहीं तब उसने डरके वह विद्या दी. और राजाने वहां परीक्षा करली. तिस पीछे योगीको तलवार मार उसके टुकडे टुकडे कर डाल दिया. फिर वहांसे निकल महलमे आया और जहां छहों- रानियां बैठीं थीं वहां आनकर राजाभी बैठ गया. तब राजाको देखकर छहों उठकर खिदमतमे हाजिर हुई. किसीने पंखा हि- लाया, किसीने हाथ मुंह धुलाया, किसीने पान बना खिलाया इसी तरह सब अपनी २ बीती राजासे प्रकाश करने लगी. और

चौबीसवीं पुतली २४. ( १६१)

Page 161Permalink

चौबीसवीं पुतली २४. ( १६१) ज्यों ज्यों वे प्यार करती थीं त्यों त्यों राजा मान करता था, फिर राजा बोला सुनो-सुंदरियो ! मैं तुमसे हित करता हूं और तुम मुझसे अनहित कर औरका ध्यान धरो यह तुम्हे उचित नहीं. तब वे बोलीं कि, महाराज ! हमारे तो प्राणरक्षक तुम हो, तुम्हे देखे बिना हम जीतीं नहीं तुम्हारा ध्यान हम आठो पहर करती हैं जो कभी तुम कहीं बाहर जाते हौ तो हम चकोरकी तरह तुम्हारे मुखचंद्रके देखनेको तरसती हैं. और जैसे जल बिना मीन तडके तैसे हम व्याकुल रहती हैं और क्षणभरके वियोगमें जलकमलकी तरह हम कुम्हला जाती हैं.' यह सुन राजा क्रोधकर मुस्कुराया और बोला-सच है, सुंदरियो ! हमने जाना तुम्हारा दिल मुझे नहीं छोडता जैसे एक सिद्धके छह सिद्ध होगये और फिर वह एकही सिद्ध हो गया. यह सुन रानियां एकदम चुप होकर बोलीं कि-महाराज ! ऐसी अचरजकी बात तुम कहते हो जो कभी न देखी न सुनी और किसीको इतिवारभी जिसका न आवे. क्यों कर एक देहकी छह देह होयं और इस बातको कौन मानेगा ? तब राजाने कहा कि-चलो हम तुम्हें दिखादे तब छहोंको अपने साथ ले उसी बाड़ीमें जा उस गुफाका मुँह खोल दिया. देख कर वे शरमागईं और अपने मनमें जाना कि, राजाने हमारा सब चरित्र देखा. फिर राजाने कहा कि, तुमने जाना या नहीं. यह सुनकर उन्होंने नीच गरदनें कर जवाब कुछ न दिया. ११

Page 162Permalink

( १६२ ) सिंहासनबत्तीसी.

तब राजाने छहोंका शिर काट उस गुंफामें डाला और उसका मुँह बंद कर चला २ मंदिरमें आया. और आतेही नगरमें ढँढोरा फिरा दिया कि जितने ब्राह्मण और ब्राह्मणियां और ब्राह्म- णोंकी कन्या हैं वे सब यहां आनकर हाजिर होवें. यह सुनकर सब हाजिर हुई जितने रानियोंके गहने और वस्त्र थे सब ब्राह्मणियोंको पहनाये. और एक एक ब्राह्मणको एक एक गांव वृत्ति करदिया. और जितनी कन्या थीं उनको दान दहेज़ दे व्याह कर दिया. और आप राजकाज करने लगा. इतनी बात कह पुतली समझाने लगी कि, सुन राजा भोज ! तू बड़ा पंडित है पर इस आसनपर वह बैठेगा, जो विक्रमादित्यके समान होगा. तब वह साअत गुजर गई. राजाभी वहांसे उठकर अपने मकानको गया. रातको इसी सोचमें पडा रहा. दूसरे दिन सुबहको फिर सिंहासनके पास आकर चढ़नेके तयार हुआ तब जयलक्ष्मी-

पचीसवीं पुतली-

बोली-सुन, राजा भोज ! एक दिनकी बात मैं तेरे आगे कहतीहूं एक भाट निपट दरिद्री खररावहक था. सब पृथ्वीके राजाओंके पास फिर आयाथा. और एक कौ-

पचीसवीं पुतली २५. ( १६३ )

Page 163Permalink

[header] पचीसवीं पुतली २५. ( १६३ ) [/header]

डेका किसीसे उसने फायदा न पाया था. जब अपने घरमें आया तो देखा कि बेटी जवान व्याहनेके लायक हुई है. यह अपने जीमें चिंताही करताथा कि, उसकी भाटिन बोल उठी कि, तमाम देश तुम फिर आये पर जो कमाई कर लाये सो कहो. तब उसने जवाब दिया कि, मेरे प्रारब्धमें धन नहीं. मैं इस लिये कि. तमाम राजाओंके पास गया. और शिष्टाचार उन्होंने सब किया; पर एक दाम न हाथ आया. अब मेरे जीमें एक बात आती है. राजा बीरविक्रमादित्य बाकी रहगया है उसके पासभी जाकर माँगूं जो मेरे जीका संदेह मिटे. फिर वह भाटिन बोली-अब तुम कहीं मत जाओ और संतोषकर रहो. कर्मका लिखा फल यहीं बैठे पाओगे. फिर भाटने कहा कि, राजा वीरविक्रमादित्य सुनते है कि बड़ा दानी है, उसके पास अपनी कामनों जो ले गया है वह खाली हाथ नहीं फिरा और अपने मकसदको पहुँचा है. ये बाते कर वह राजाके पास चला और गणेशजीको मनाय राजाके सन्मुख जा खडा रहा. तब राजाने दंडवत् की और वह आशीष देकर बोला कि-हे राजा ! बहुत भूमि पै फिर आया हूं और आपका यश मुझे यहां ले आया है. आप इस मर्त्यलोकमें इंद्रका अवतार हो. आपकी बराबर दानी इस संसारमें कोई नहीं. इस समयमें आप दान देनेमें राजा हरिश्चंद्र हो और तमाम पृथ्वीमें आपकाही यश छाय रहा है. और स्वामी मैं कालिकासुत हूं. भाटवंशमें आनकर अवतार लिया है और

Page 164Permalink

यहाँ पृष्ठ पर दिए गए पाठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:

( १६४ ) सिंहासनबत्तीसी. अब तुम्हें याचने आयाहूं, मेरा मनोरथ पूर्ण करदो. मैंने संसारमें फिरकर खूब देखा कि, सिवाय तुम्हारे मेरी आशाका पुजानेवाला और और कोई नहीं. तब हँसकर राजाने कहा कि, तू अपना मतलब सब मेरे आगे प्रकाश करके कह तो मैं तेरी कामना पूरी करूं. भाटने कहा-यों मुझे अपने कर्मका भरोसा नहीं आप बचन दीजिये तो मैं खातिरजमासे कहूं. तब राजाने बचन दिया. भाट बोला-महाराज ! मुझे मुंहमांगा दान दीजिये, मेरी पुत्रीकी शादी करदो बारह बरसकी कन्या मेरे घरमें बैठी है, इस लिये मैं आपके पारा याचने आया हूं, यह सुन राजाने हँसकर मंत्रीसे कहा कि, जो यह मांगे वह इसे दो. फिर भाटने कहा-महाराज ! जो कुछ आपको देना है सो अपने सम्मुख मँगा- कर दीजिये मुझे इस संसारमें अब किसीका इतबार नही. राजाने दश लाख रुपये रोक और हीरे, लाल, मोती, सोने, रूपेके गहने था ल भरकर दिये. और वह ले आशीश दे अपने घरमें गया. जो कुछ लाया था सो सब ब्याहमें लगाया और राजाने उसके पीछे जासूद कर दिये थे कि तुम देखो कि, 'यह धनको लेजाकर क्या करता है,' ? इसकी खबर ठीक मुझे लाकर दो. जब शादी कर चुका और उसके पास एक दिनेके खानेको कुछ न रहा तब उन हलकारोंने जाकर राजाको खबर दी कि, महाराज ! उस भाटने ऐसा ब्याह बेटीका किया कि इस कलियुगमें कोई और करसकता नहीं. जो कुछ वो आपके पाससे धन दौलत लेगया

छब्बीसवीं पुतली २६. ( १६५ )

Page 165Permalink

छब्बीसवीं पुतली २६. ( १६५ ) सो सब क्षणभरमें बेटीको दे ब्याह दिया. यह सुन राजाने और कई लाखैं रुपये उसके घर भेज दिये. और अपने चित्तमें बहुत प्रसन्न हुआ कि, धन्य भाग्य मेरा है जो मेरे राजमे ऐसे हिम्मत- वाले लोग हैं. इतनी बात कह पुतली बोली कि सुन राजा भोज ! इतना.धन देकरभी राजाने उसका खर्च सुन और दौलत भेज दी ऐसा दानी तू हो तो इस सिंहासनपर बैठ और नहीं तो मनके लड्डू खानेसे कुछ हाँसिल नहीं है. यह सुनकर राज अपने महलमें आया. फिर सुबह हुआ तो स्नान पूजा कर वहीं आन पहुंचा इतनेमें विद्यावती नाम— छब्बीसवीं पुतली— कहने लगी कि, सुन राजा भोज ! मैं तेरे आगे ज्ञानकी बात कहती हूं और तू मन देकर कान रख जब आदमी जन्मता है तो कुछ नहीं संग लाता और मरता है तो कुछ नहीं लेजाता. इस जीवितका फल यही है कि, संसारमें आकर कुछ करनी करे, और जैसी करनी करेगा वैसाही फल पावेगा. और संसारमें जीवन थोडा है इससे ऐसा यश करो कि, जानेपरभी जगमें नाम ठहरा रहे. दोनों लोकोंमें सुख पावे. यह मनुष्यजन्म बारंबार नहीं पाता देह पाता है. और लक्ष्मी दान कर कुछ सोच मत कर. यही अपने

बैकुंठ पाया. ये बाते पुतलीकी सुन राजा भोज बोला कि, राजा

Page 166Permalink

( १६६ ) सिंहासनबत्तीसी. जीमें सदा रख कि, दान हमेशा किया कीजिये यह भयरूप जो संसारसागर है इसके तरनेको सिवाय दान, उपकार और हरि- भजनके चौथा उपाय नहीं. मैंने तुझे कहा कि, साथ कोई कुछ ले नहीं जाता. मैं तेरे आगे सब कहतीहूं कि, राजा हरिश्चंद्र, राजा कर्ण, राजा बीरविक्रमादित्य क्या ले गये ! और जिन्होंने दान उपकार हरिभजन किया उनका जगमे नाम रहा और अंतसमय बैकुंठ पाया. ये बाते पुतलीकी सुन राजा भोज बोला कि, राजा विक्रमादित्यने क्या किया है ! वह कह. तब विद्यामती पुतली बो- ली कि, एक दिन राजा बीरविक्रमादित्य राजसभामें बैठा था तब एक दासीने आकर अरज किया कि, महाराज ! उठिये पूजाका समय जाता है. यह सुनकर राजाने विचार कि, इसने सच कहा मेरी उमर चली जाती है और मुझसे ज्ञान, धर्म, पूजा बन नहीं आई इससे उत्तम यही है कि, इस राजकाजकी माया भुलाय आप योग कमाइये जो कि और जन्ममें काम आवे. यह राजाने अपने जीमें विचार और राजपाट, धन जन मिथ्या समझकर तपश्या करनेको एक बनको चला ओर यह विचार करता जाताथा कि, इस संसारमें जीना सबेरेकी ओसकी समान है और जिसके भरोसेमें मैंने अपना काम अकारण गवाँया. यह विचार करता हुआ पूर्वजन्ममें दान, व्रत, तपश्या बहुत कर आता है तो यह नर- हुआ राजा एक महाबनमें जा पहुँचा वहां जाकर देखे तो

छब्बीसवीं पुतली २६. (१६७)

Page 167Permalink

छब्बीसवीं पुतली २६. (१६७) एक मंडली तपस्वियोंकी बैठी हुई है. धुनी एक एकके आगे जागे रही है, आसन मारमार अपने अपने ध्यानमें लीन हो रहे हैं. कोई ऊर्ध्वबाहु, कोई कपाली आसन मार, कोई पचाग्नि, इस रीतिसे अनेक अनेक प्रकारकी साधना कर रहे हैं और कोई कोई उनमें बैठ शरीरसे मास काट काट होम कर रहा है. इस तरहसे उनकी तपस्या देख राजाभी तपस्या करने लगा. आपभी तपश्या कर- ताथा और कईएक दिनमें तपस्वियोंने अपना शरीर होमने लगा- कर दिया. उनकी देखादेखी राजाभी अपना शरीर सब होम कई महीनोमें राजाने एक दिन शिरभी अपना काट होम कर- दिया. वहां जो एक शिवका मंदिर था उसमेंसे एक शिवगण निकला और निकलकर सब तपस्वियोंकी धुनीमेंसे राख समेट कर जुदी जुदी ढेरी की और फिर जा शिवको खबर दी कि, महाराज ! आपने कहाथा सो मैंने किया तब शिवने आज्ञा दी कि, यह अमृत तू लेजा और उनके ऊपर छिड़क आ. यह आज्ञा पाय अमृत ला ज्यों ज्यों छिड़कताथा त्यों त्यों उनमें एक २ आदमी शिव शिव रामराम कहकर खडा रहताथा. सब पर तो उसने छिडक दिया पर राजाकी धुनी भूल गया और सब तपस्वी मिलकर शिवकी स्तुति करने लगे कि, महाराज ! आपका भक्त राजाभी है आप अनाथके नाथ हो जिसने आपका स्मरण किया तिसको तभी तुमने फल दिया और जहां जहां सेवकोंक

Page 168Permalink

( १६८ ) सिंहासनबत्तीसी.

संकट हुआ है तहां तहां उसका सहाय किया है. यह स्तुति करके उन तपस्वियोंने कहा कि, महाराज ! एक नृपतिभी हमारे साथ तपस्या करता था, मालूम नहीं कि, उसको उठानेकी आपकी आज्ञा हुई कि नहीं यह सुन महादेवने उस गणके तरफ देखा. देख- तेही उसने अमृत ले जाकर जो धुनी बाकी रहीथी उसपर छिड़- का राजाभी हरिहर कहता उठ खडा हुआ और हाथ जोड स्तुति करने लगा कि, महाराज ! संसारके सब जीवोंकी आप सहाय करते हैं और पालते हैं आप बिना इस संसारसागरसे कौन पार उतारे ? जिसने जगमें आपको नहीं पहुँचाना उसने अपना जन्म निष्फल खोया. फिर जितने तपस्वी वहां थे उनको शिवजीने मुंह मांगा वर दिया. और सबको बिदा किया. सबके पीछे जब राजा अकेला रहगया तो उसे कहा कि, हे राजा वीरविक्रमादित्य ! अब जो तेरी इच्छामें आवे सोही वह मुझसे मांग मैं तुझे दूंगा. यह सुन राजाने कहा-महाराज ! आपकी दयासे सब कुछ है पर एक यह मांगता हूँ कि-संसारके जन्ममरणसे मेरा निबेडा करो. जैसे और भक्तोंका निबेडा किया तैसे मुझ परमपापी आधीन दीनही- नको तारो. यह राजाकी विनती सुन दयाकर शिवजीने हँसकर कहा कि, तेरे समान कर्मी इस कलियुगमें कोई नहीं है. ओर तू ज्ञानी, भोगी, दानी, साहसी, तपस्वी है, कलिके राजाओंका उद्धार कर-

छब्बीसवीं पुतली २६. ( १६९ )

Page 169Permalink

छब्बीसवीं पुतली २६. ( १६९ )

नेवाला है और मैं तुझसे कहताहूं कि, तू जाकर अपना राज कर, तेरा काल निकट आवेगा तब तू मेरेपास आइयो, मैंने तुझे बचन दिया है कि, अंतसमयमें मैं तुझे मोक्षपद दूंगा. इससे तू अब जाकर मर्त्यलोकमें आनंदसे राज कर. फिर राजा करुणा करके बोला कि, महाराज ! संसारमें तुम्हारे प्रपंच कुछ जाने नहीं जाते या तो मुझे इस समय तारो नहीं तो मैं अपना जी देताहूं. तब हँसकर शंकरजीने कहा कि, जो तू जी देगा तो मृत्युबिना यम तुझे हाथसे भी न छुएगा. और फिर आयुर्बलके दिन भरने पड़ेंगे इसवास्ते तू जा उठ मेरा वचन जीमें रख इतना कह शिवजी तो कैलासको गये, और राजाके हाथमे कमलका फूल दे यह कह गये कि जब यह कमल मुर्झायगा तब तू जानियो कि अब छ महीनेमें मैं मरूंगा. फूल ले राजा अपने नगरको आया और अपने मनका विचार किसीके न कहा. कितनेएक बरस पीछे वह कमलका फूल मुर्झा गया. तब राजाने समझा कि, मैं अबसे छ महीनेमें मरूंगा. जितनी कुछ धन और दौलत थी सो सब ब्राह्म- णोंको संकल्प करदी. स्त्री और पुत्रके खानेको कुछ धन दिया बाकी सब पृथ्वी ब्राह्मणोंको दान करदी. इस तरह राजा ज्ञान पुण्यकर सदेह कैलासको चला गया. इतनी बात कह पुतली बोली सुन राजा भोज ! विक्रमा दित्यने इतना काम किया और जीवन मरण दोनों चीन्हा. इससे मैं तुझसे कहती हूं कि, जीनेका

Page 170Permalink

( १७० ) सिंहासनबत्तीसी.

कुछ भरोसा नहीं और मरण साथ लग रहा है. दुःख सुखभी मनुष्यके साथ हैं और पापपुण्यभी रहते हैं. नि- र्गुण और सगुण ज्ञानभी घटमें रहता है पर एक ब्रह्मही अलग है. इस वास्ते मैं तुझसे कहतीहूं-ऐ भूपाल ! संसारमे जिसकी कीर्ति रह जाती है सोही अमर है. जो मैंने तुझे कहा कि, मन वचन कर्म कर तू सच जान. वह दिन तो यों गुजर गया, राजा नाउ- म्मेद होकर अपने मकानको फिर गया. सुबह होतेही हाथ, मुंह धो, स्नान पूजा कर फिर वहीं आन मौजूद हुआ और जितने राजाके सभामें लोग थे वे भी सब हाजिर हुए राजाने अपने लोगों कहा कि-पुतलिया तो बाते झूठ झूठ बना मेरे आगे कहती है अब मैं इनकी बाते न सुनूंगा और इस सिंहासनपर बैठूंगा. यह अपने लोगोंसे बाते करता था कि-जगज्ज्योति नामावाली -- सताईसवीं पुतली- बोली-सुन राजा भोज ! एक दिन राजा बीरविक्रमादित्य अपनी सभामें बैठा था कि, उसमें प्रसंग निकला. उसमे- कोई बोल उठा कि, आज राजा इंद्रके बराबर कोई राजा नहीं है, क्योंकि वह देवलोकका राज करता है ! यह बात राजाने सुन किसीसे कुछ न कहा और बैतालोंको बुलाकर कहा कि, मुझे इंद्रपुरीको ले चलो. बैताल तुरंत के उडे और एकदममें के

सत्ताईसवीं पुतली २७. ( १७१ )

Page 171Permalink

[Page Header] सत्ताईसवीं पुतली २७. ( १७१ )

जाकर इंद्रकी सभामे पहुंचा दिया. राजाने जातेही वहां इंद्रको दंड- वत् की और हाथ जोड़ खड़ाहुआ. तब इंद्रने बैठनेको आज्ञा दी वह हुकुम पाकर बैठगया तब इंद्रने कहा तुम कहांसे आये हो । और तुम्हारा नाम क्या है ? देश तुम्हारा कौनसा है ! किस अर्थको यहां आये हो ! सो तुम कहो. तब राजा बोला कि-स्वामी ! अंबा- वती नगरीका मैं राजा हूं. मेरा नाम विक्रम है, और आपके पद पंकजके दर्शनके अर्थ आया हूं. तब प्रसन्न हो इंद्र बोला कि- हमनेभी तुम्हारा नाम सुनाथा. और मिलनेकी इच्छा थी सो तु- मने आके यहा उलटी रीत की अब जो कुछ तुम्हारा मनोरथ हो सो हमसे कहो और जो कुछ तुम्हें चाहिये सो मांगो हम तुम्हें देंगे. राजाने कहा-स्वामी ! आपकी कृपा और धर्मसे सब कुछ है और जो कुछ न हो तो मैं आपसे मागूं. आपका दिया हुआ सब कुछ तेरेपास है. राजाकी ये बातें सुनकर इंद्रने प्रसन्न हो अपना मुकुट और एक विमान दे यह आशीष दिया कि, जो तेरे सिंहासनको बुरी दृष्टिसे देखेगा वह तुर्त अंधा होगा. राजा वहांसे बिदा हो फिर अपने नगरमे आया और बधाई बजने लगी. इतनी बात पुतलीसे सुनकर राजा भोज सिंहासनपर हाथ धरकर एक अपने पावको ऊपर रख खडा होकर कहने लगा कि आसन मार गद्दीपर जा बैठूं. इतनेमें आँखोंसे अंधा होगया और दिवानी दिवानी बातें करने लगा. चाहता था कि हाथ उसपरसे उठावें पर जुदा न होता था. यह हालत देख

लज्जित हुआ. तब पुतली बोली कि, ऐ मुर्ख ! तूने हमारी

Page 172Permalink

( १७२ ) सिंहासनबत्तीसी. पुतलियां खिल २ हँसने लगीं. और सब सभा भौंचक होगई. और जीमें सब लोग कहने लगे कि, राजाने क्या यह अपन किया कि, बिना बात सुन सिंहासनपर पांव धर दिया. यह अपनी दशा देख राजा भोज बहुत पछताकर लज्जित हुआ. तब पुतली बोली कि, ऐ मुर्ख ! तूने हमारी बात न सुनकर यह फल पाया. अब तू ऐसा ही रह. यह सुन राजा निराश होकर बोला-इसका उपाय बताओ. पुतली बोली-राजा विक्रमका नाम ले तब तू इस दुःखसे छूटेगा. जब विक्रमका यश राजा भोजने बखान किया तब हाथ छूट गया और आँखसेभी सूझने लगा. फिर नीचे उतर खड़ा हुआ. देखकर सब लोग भयमान होंगये और राजाभी अपने चित्तमें डरा. सभाके सब लोग बोले कि, राजा विक्रमके समान होना इस कलियुगमे बड़ा कठिन है. फिर पुतली बोली कि, राजा ! इसीवास्ते मैंने कहा था और तू मेरी बात झूठ मत मान, तू मूर्ख है. कुछभी तुझे ज्ञान नहीं. जो तू विद्या पढ़ा है इससे कुछ होता नहीं. ज्ञान हे सो औरही चीज है अपने बराबर राजा बीरविक्रमादित्यको मत समझ. वह देवता- ओंके समान था. और उसके बराबर ज्ञान ध्यान तेरा नहीं. अ- पने जीमें इस सिंहासनकी आश छोड़. वह सिंहासन तुझे नहीं साजेगा और संसारमें बहुत बातें हैं वे कर, जिसमें तेरा राज

आठईसवीं पुतली २८. ( १७३ )

Page 173Permalink

आठईसवीं पुतली २८. ( १७३ ) स्थिर होजाय. प्रताप बढ़े, कीर्ति रहे वह दिनभी गुजर गया. राजा फिर अपने महलमें गया. रात ज्यों त्यों बीती. सुबह होतेही फिर उसी मकानपर आन खडा होगया तब मनमोहिनी नामक— अठाईसवीं पुतली— बोली—सुन राजा भोज ! बीरविक्रमादित्यके समान बली, साहसी और ज्ञानी कलिमें दूसरा कोई हुआ हो तो तू मुझे बतादे. औरजो मै कहती हूं सो सचकर जान. एक दिन- मैने राजा बीरविक्रमादित्यसे हँसकर कहा कि, स्वामी ! पातालमें राजा बालि बडा राजा है, जिसके दाससमानभी तू नहीं हो सकता है और जो अपना राजा तू स्थीर किया चाहे तो एकबार राजा बालिके पास तू जाकर आ. यह बात सुनतेही बैतालोंको बुला आज्ञा दी कि, पातालमें राजा बालिके पास मुझे ले चलो. यह सुनतेही बै- ताल तुर्त के उडे और दमभरमें पातालमें पहुँचा दिया. राजा वह नगर देख भौचक हुआ. और अपने मनमें कहने लगा कि, ऐसा नगर मैने आजतक कहीं नही देखा. आनंद कैलासके समान हो रहा है. धन्य राजा बालिको जो इस नगरका राज करता है. इस तरहसे नगर देखता हुआ राजाके सिंहपौरपर जा खडा हुआ और हाथ जोड बिनती कर द्वारपालोंसे कहा कि, अपने राजाको मेरे

Page 174Permalink

( १७४ ) सिंहासनबत्तीसी.

आनेका समाचार कहो कि, मर्त्यलोकसे राजा विक्रम आपके दर्शनके लिये आया है. सुनतेही डेवढीदारोंने अपने राजाके पास जा विक्रमकी खबर दी. सुनकर राजा बालिने कहा नरको मैं अपना मुँह न दिखाऊंगा. यह सुनकर दरवानने आ राजासे कहा कि, तुम्हें दर्शन न पाऊंगा तब तलक यहांसे मैं न हलूंगा. यह बात दरवानने जाकर राजा बालिसे कही. तब उसने कहा कि, विक्रम तो कौन है ! जो राजा इंद्रभी आवे तो मै अपना दर्शन दूंगा नहीं. फिर कोई मनमें बिचार न आया फिर एक दिन राजाने दुःख पाके अपना शिर काट डाला ओर बलिकी तमाम सभामें रोला मचा कि, बडा अयुक्त काम इस प्राणीने किया. राजाने यह बात सुन हंसकर आज्ञा दी कि, अमृत लेजाकर उसे जिलाओ और कहा कि, तुझे राजाका दर्शन होगा तू अपने जीमें मत घबरा इस वख्त तूं जा और अपना राजकाज कर जब शिवरात्रि आवेगी तब आइयो तुझे दर्शन मिलेगा, यह सुन एक दास राजाका अमृत ले गया. और राजा बीरविक्रमादित्यर छिडककर जियाला, जब राजा सावधान होकर बैठा तब उसने राजा बालिका संदेश सब कहा. यह सुनकर विक्रम बोला कि, तुम यह बात कहकर मुझे क्यों बहँकाते हो ? मैं तुम्हारा कहा नहीं मानूंगा. इससे उत्तम यह है कि, तुर्त महाराजाका दर्शन करूं. वह सुन लोगोंने राजाके पास जाकर कहा कि, महाराज ! वह नहीं मानता और

अठाईसवीं पुतली २८. ( १७५ )

Page 175Permalink

अठाईसवीं पुतली २८. ( १७५ )

जाताभी नहीं. जब इस जबाब सवाल कहनेका कुछ देर हुई तब फिर राजा बीरविक्रमादित्यने अपना शिर काट डाला. द्वारपालने राजासे कहा कि, महाराज फिर इस मनुष्यने जी दिया. राजाने फिर अमृत भेज दिया और कहा कि, उसे जिला समझाकर उसके नगरको पठा दो. एक दूतने आकर राजापर अमृत छिड़क जिलाया. और कहा कि तू अपने जीमे धीरज रख अब तुझे दर्शन होगा और जितनी राजाकी सभाके लोग थे उन्होंने एक मताकर राजासे कहा कि, महाराज ! विक्रमकी आशको निराश मत करो, क्योंकि उसने बड़ा साहस किया है. उनकी बातें सुन राजा बलि उठकर द्वारपर आगया और विक्र- मने दर्शन पाया. तब दंडवत् कर हाथ जोड कहा कि, महाराज धन्य है भाग्य मेरा जो मैंने आपका दर्शन पाया. और जन्म जन्मका दुःख गँवाया. फिर कहने लगा-महाराज ! क्या मेरा अपराध था जो आप मुझे दर्शन न देते थे ? क्या मैं साहसी नहीं हूं या मुझे लोकके लोग नहीं जानते ! वह कौनसा पाप था जो मैं आपके द्वारेपर आनेसे आपने बुरा माना ? सो मुझे कृपा- करके कहो. तब राजा बलि हंसकर बोला कि, सुन विक्रम कुलनायक ! तेरे समान और कोई राजा नहीं अब, कान देकर सुन कि, तेरे आगे इसका ब्यौरा कहता हूं. पहले राजा हरि- श्चंद्र बडा दानी, साहसी, यशी हो गया है और एक राजा जग- देव बडा प्रतापी और दानी हो गया है. उन दोनोंने भी बडा

Page 176Permalink

( १७६ ) सिंहासनबत्तीसी. दान और साहस किया था. पर तेरासा उनका न था और उन्होंनेभी मेरे दर्शनकी बहुत अभिलाषा की थी. पर मैंने दर्शन किसीको न दिया. तू एक द्वीपका राजा किस गिनतीमें है ? पर तपस्या बडी जोरावर है जो तुझे मेरा दर्शन मिला. तब राजा विक्रम फिर हाथ जोडकर कहने लगा कि, हे महा- राज ! जो आपने कहा सो सब सच है. और मैंने निश्चयकर अपने जीमें माना कि, आपने मुझपर बडी कृपा कर दर्शन दिया. और दया कर इस भवसागरसे पार किया. फिर राजा बलिने कहा कि, राजा विक्रम ! तू अब यहांसे विदा हो और जाकर अपना राज कर. विदाका नाम विक्रमने सुनकर बडा खेद किया. इतनेमें राजा बलिने एक अच्छा लाल मँगवाकर राजा विक्रमको प्रसाद दिया. और उसका जो गुण था सो बताया कि, जो तू इससे मांगेगा वह सब यह देगा. विक्रमने हाथ जोड लिया और राजा बलिको दंडवत् कर वहांसे निकला, और बैतालोंको बुलाकर सवार हो अपने नग- रको आया. जब नगरके निकट आन पहुँचा तब एक नदीके किनारे देखे तो एक स्त्रीका खाविंद मर गया है उसे जलाकर खडीहुई वह डकरा डकरा रोती है और कहती है कि, अब इस संसारमें मेरा मालिक कोई नहीं है और न मेरेपास कुछ माया है अब किस तरहसे तेरा श्राद्ध करूंगी और पंचोंको क्या दूंगी. ? इसका कूक मार मार रोनेका अवाज राजाने सुना

अट्ठाईसवीं पुतली २९. ( १७७ )

Page 177Permalink

अट्ठाईसवीं पुतली २९. ( १७७ ) और वहां जाकर देखा, तो इसका ऐसा हाल हो रहा है सो देखकर वह रत्न यानी लाल उस स्त्रीको दिया और कहा कि जो तू इससे मांगेगी सो यह लाल तेरी आशा तुरंत ही पूरी करेगा. उसको ले वह नारी अपने धामको गई और राजा वीरविक्रमादित्यभी अपने महलमें आ दाखिल हुवा इतनी बात कह पुतली बोली कि, सुन राजा भोज ! ये गुण विक्रममें थे. वह ऐसा साहसी था और प्रजाका हितकारी. जो तू सात स्वर्ग फिर आवेगा तो भी उसके समान कोई न हो सकेगा. इससे अब तू अपने मनके ख्यालसें बाज आ. और जो राजाने काम किये हैं सोही तुझसे कहूंगी. वहभी दिन उसी तरहसे टल गया. रात ज्यों त्यों बीत गई. दूसरे दिन सुबह होतेही राजा भोज अपने दीवानको साथ ले आया. और फिर सिंहा- सनके पास जाकर खडा हुआ. इतनेमें वैदेही नाम --