भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २५३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २५३ न्यायकन्दली रविशेषात् । तस्मात् पूर्वं द्रव्यस्य विनाशस्तदनु रूपस्य, आशुभावात् क्रमस्याग्रहणमिति युक्तमुत्पश्यामः । ये तु रूपद्रव्ययोस्तादात्म्यमिच्छन्तो द्रव्यकारणमेव रूपस्य कारण- माहुस्ते इदं प्रष्टव्याः-किं परमाणुरूपं रूपान्तरमारभते न वा ? आरभ- माणमपि किं स्वात्मन्यारभते ? किं वा स्वाश्रये परमाणौ ? यदि नारभते ? यदि वा स्वात्मनि स्वाश्रये चारभते ? द्व्यणुके रूपानुत्पत्तौ तत्पूर्वकं जगद्रूपं स्यात् । अथ तद् द्व्यणुके आरभते, अविद्यमानस्य स्वाश्रयत्वायोगादुत्पन्ने द्व्यणुके पश्चात्तत्र रूपोत्पत्तिरित्यवश्यमभ्युपेतव्यम्, निराश्रयस्य कार्यस्यानुत्पादात् । तथा सति तादा- त्म्यं कुतः ? पूर्वापरकालभावात् । किञ्चावस्थित एवँ घटे रूपादयो वह्निसंयोगाद्वि- नश्यन्ति तथा सति जायन्ते चेति भवतामभ्युपगमः, यस्य चोत्पत्तौ यस्यानुत्पत्ति- रहनेवाले रूप के प्रति कारण न होते हुए भी अवयवों का संयोग अपने नाश से अवयवी में रहनेवाले रूप का नाश कर सकता है, तो फिर वही संयोग कपालादि अवयवों में रहनेवाले रूप का नाश क्यों नहीं कर सकता ? अतः हम यही युक्त समझते हैं कि पहले द्रव्य का नाश होता है, उसके बाद तद्गत गुण का नाश होता है । द्रव्य एवं तद्गत गुण के नाश का यह क्रम मालूम इसलिए नहीं पड़ता है कि दोनों के मध्य में अत्यन्त थोड़े समय का व्यवधान रहता है । किसी सम्प्रदाय का मत है कि (प्र.) द्रव्य एवं गुण दोनों अभिन्न हैं, अतः जो द्रव्य का कारण है, वही गुण का भी कारण है । (उ.) उनसे यह पूछना चाहिए कि परमाणुओं के रूप किसी दूसरे रूप को उत्पन्न करते हैं या नहीं ? अगर उत्पन्न करते हैं तो कहाँ ? अपने में ही ? या अपने आश्रय परमाणु में ? अगर यह मान लें कि परमाणु के रूप किसी भी दूसरे रूप को उत्पन्न नहीं करते हैं या फिर यही मान लें कि परमाणु के रूप अपने आश्रय में एवं अपने में भी रूप को उत्पन्न करते हैं-हर हालत में द्वयणुक में रूप की उत्पत्ति न हो सकेगी, जिससे समूचे जगत् को ही रूपशून्य मानना पड़ेगा । अगर परमाणुओं के रूप से द्वयणुक में रूप की उत्पत्ति मानें .तो फिर द्वयणुक में रूप की उत्पत्ति के पहले द्वयणुक की उत्पत्ति माननी ही होगी । अतः यही कहना पड़ेगा कि द्वयणुक के उत्पन्न हो जाने पर पीछे उसमें रूपादि की उत्पत्ति होती है; क्योंकि बिना आश्रय के कार्य की उत्पत्ति नहीं होती । अगर यह स्थिति है तो फिर रूप (गुण) और द्रव्य का अभेद कैसा ? क्योंकि द्रव्य पहले उत्पन्न होता है और रूप पीछे । और भी बात है, वह्नि के संयोग से घटगत रूप का नाश घट के रहते ही हो जाता है, अतः यही मानना पड़ेगा कि अग्नि के संयोग से ही उसी घट में दूसरे रूप की उत्पत्ति होती है । अतः यही रीति माननी होगी कि जिसकी उत्पत्ति से

२५४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे स्पर्श- प्रशस्तपादभाष्यम् रसो रसनग्राह्यः पृथिव्युदकवृत्तिर्जीवनपुष्टिबलारोग्यनिमित्तं रसनसहकारी मधुराम्ललवणतिक्तकटुकषायभेदभिन्नः । अस्यापि नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयो रूपवत्। रसनेन्द्रिय से गृहीत होनेवाला (गुण ही) 'रस' है । वह पृथिवी और जल इन दो द्रव्यों में ही रहता है एवं जीवन, पुष्टि, बल और आरोग्य का कारण है । प्रत्यक्ष के उत्पादन में रसनेन्द्रिय का सहायक है । वह मधुर, अम्ल, लवण, कटु, कषाय और तिक्त भेद से छः प्रकार का है । नित्यत्व एवं अनित्यत्व के प्रसङ्ग में इसकी सभी बातें रूप की तरह हैं । न्यायकन्दली र्यन्निवृत्तौ चानिवृत्तिर्न तयोस्तादात्म्यमिति प्रक्रियेयम् । न चात्यन्तभेदे पृथगुपलम्भ- प्रसङ्गः, सर्वदा रूपस्य द्रव्याश्रितत्वात् । एतदेव कथम् ? वस्तुस्वाभाव्यादिति कृतं गुरुप्रतिकूलवादेन । सम्प्रति बाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्यस्य प्रत्यक्षद्रव्यवृत्तेर्विशेषगुणस्य निरूपण- प्रसङ्गेन रसगन्धयोर्व्याख्यातव्ययोरुभयद्रव्यवृत्तित्वाविशेषेणादौ रूपं व्याख्याय रसं व्याचष्टे-रसो रसनग्राह्य इति । गुणेषु मध्ये रस एव रसनग्राह्यो रसनग्राह्य एते रसः । पृथिव्युदकवृत्तिः । पृथिव्युदकयोरेव वर्तते । जीवनपुष्टिबला- ही जिसकी उत्पत्ति सिद्ध नहीं हो जाती एवं जिसके विनाश से ही जिसका विनाश सिद्ध नहीं हो जाता, वे दोनों अभिन्न नहीं हो सकते । (प्र.) अगर रूप और द्रव्य अत्यन्त भिन्न हैं, तो द्रव्य को छोड़कर भी रूप की प्रतीति होनी चाहिए । (उ.) नहीं; क्योंकि रूप सभी कालों में द्रव्य में ही रहता है । (प्र.) यहीं क्यों होता है ? (उ.) यह तो वस्तुओं का स्वभाव है । गुरुचरणों के विरुद्ध व्यर्थ की बातों को बढ़ाना व्यर्थ है । अब एक ही बाह्य इन्द्रिय से गृहीत होनेवाले एवं प्रत्यक्ष योग्य द्रव्यों में ही रहने वाले गुणों का निरूपण करना है । इस प्रसङ्ग में रस और गन्ध इन दोनों की व्याख्या समान रूप से प्राप्त हो जाती है; किन्तु इन दोनों में गन्ध एक ही द्रव्य में रहता है और रस दो द्रव्यों में, इस विशेष के कारण रूप के निरूपण के बाद और गन्ध के निरूपण से पहले 'रसो रसनग्राह्यः' इत्यादि से रस का निरूपण करते हैं । गुणों में से केवल रस ही रसनेन्द्रिय से गृहीत होता है, अतः रसनेन्द्रिय से गृहीत होने- वाला गुण ही रस है । 'पृथिव्युदकवृत्तिः' अर्थात् यह पृथिवी और जल इन दो द्रव्यों में रहता है । 'जीवनपुष्टिबलारोग्यनिमित्तम्' प्राण के धारण को 'जीवन' कहते हैं । शरीर के अवयवों की वृद्धि ही 'पुष्टि' है । विशेष प्रकार के उत्साह को 'बल' कहते हैं ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २५५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २५५ प्रशस्तपादभाष्यम् गन्धो घ्राणग्राह्यः पृथिवीवृत्तिर्घ्राणसहकारी सुरभिरसुरभिश्च । अस्यापि पूर्ववदुत्पत्त्यादयो व्याख्याताः । जिस गुण का प्रत्यक्ष घ्राणेन्द्रिय से हो वही 'गन्ध' है । वह केवल पृथिवी में ही रहता है । (प्रत्यक्ष के उत्पादन में) वह घ्राण का सहायक है । सुरभि एवं असुरभि भेद से वह दो प्रकार का है । इसकी उत्पत्ति और विनाश प्रभृति पहले की तरह जानना चाहिए । न्यायकन्दली रोग्यनिमित्तम् । जीवनं प्राणधारणम्, पुष्टिरवयवोपचयः, बलमुत्साहविशेषः, आरोग्यं रोगाभावः, एषां रसो निमित्तम् । एतच्च सर्वं वैद्यशास्त्रादवगन्तव्यम् । रसनसहकारी । स्वगतो रसो रसनस्य बाह्यरसोपलम्भे सहकारी । मधुराम्ललवणतिक्तकटुकषायभेदभिन्नः । मधुरादिभेदेन भिन्नः षट्प्रकार इत्यर्थः । तस्य च नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयो रूपवत् । यथा रूपं पार्थिवपरमाणुष्वग्निसंयोगादुत्पत्तिविनाशवत् सलिलपरमाणुषु नित्यं कार्ये कारणगुणपूर्वकमाश्रयविनाशाद्विनश्यति, तथा रसोऽपि । गन्धो घ्राणग्राह्यः । गन्ध एव घ्राणग्राह्यो घ्राणग्राह्य एव गन्धः । ननु कथमयं नियमः ? स्वाभावनियमात् । ईदृशो गन्धस्य स्वभावो यदयमेव घ्राणेनैकेन गृह्यते नान्यः, दृष्टानुमितानां नियोगप्रतिषेधाभावात् । पृथिवीवृत्तिः । रोगों का अभाव ही 'आरोग्य' है । रस इन सबों का कारण है । ये सभी बातें आयुर्वेद से जाननी चाहिए । 'रसनसहकारी' अर्थात् रसनेन्द्रिय रूप द्रव्य में रहने वाला रस रसनेन्द्रिय के द्वारा होनेवाले रस के बाह्य प्रत्यक्ष में सहकारी कारण है । 'मधुराम्ललवणतिक्तकटुकषायादिभेदभिन्नः' अर्थात् मधुरादि भेदों से विभक्त होकर वह छः प्रकार का है । रस के नित्यत्व एवं अनित्यत्व की निष्पत्ति रूप की तरह जाननी चाहिए, अर्थात् जिस प्रकार से रूप पार्थिव परमाणुओं में अग्निसंयोग से उत्पन्न भी होता है और नष्ट भी होता है एवं (रूप) जलादि परमाणुओं में नित्य है और कार्य द्रव्यों में कारण के गुणों से उत्पन्न होता है, एवं आश्रय के विनाश से नाश को प्राप्त होता है, उसी प्रकार से रस के प्रसङ्ग में भी व्यवस्था समझनी चाहिए । 'गन्धो घ्राणग्राह्यः' (उक्त गुणों में से) केवल गन्ध का ही ग्रहण घ्राणेन्द्रिय से होता है, अतः घ्राण से जिस गुण का प्रत्यक्ष हो वही 'गन्ध' है । (प्र.) (गन्ध का ही प्रत्यक्ष घ्राण से होता है) यह नियम क्यों ? (उ.) स्वाभाविक नियम के अनुसार गन्ध का ही यह स्वभाव निर्णीत होता है कि गुणों में से केवल वही घ्राणेन्द्रिय के द्वारा गृहीत होता है, कोई और गुण नहीं; क्योंकि प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा

२५६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे स्पर्श- प्रशस्तपादभाष्यम् स्पर्शस्त्वगिन्द्रियग्राह्यः क्षित्युदकज्वलनपवनवृत्तिस्त्वक्सहकारी रूपानुविधायी शीतोष्णानुष्णाशीतभेदात् त्रिविधः । अस्यापि नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः पूर्ववत् । त्वगिन्द्रिय से गृहीत होनेवाला गुण ही 'स्पर्श' है। वह पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चार द्रव्यों में रहता है। स्पर्श त्वगिन्द्रिय (से प्रत्यक्ष के उत्पादन में उसका) सहायक है। रूप के आश्रयों में वह अवश्य ही रहता है । वह शीत, उष्ण और अनुष्णाशीत भेद से तीन प्रकार का है । इसके नित्यत्व और अनित्यत्व की रीति पहले की तरह जाननी चाहिए । न्यायकन्दली पृथिव्यामेव वर्तते नान्यत्र । घ्राणसहकारी । स्वगतो गन्धो घ्राणस्य सहकारी । सुरभिरसुरभिश्चेति भेदः । अस्यापि पूर्ववदुत्पत्त्यादयो व्याख्याताः । यथा रसः पार्थिवपरमाणुष्वग्निसंयोगादुत्पत्तिविनाशवान् कार्ये कारणगुणपूर्वक आश्रयविनाशाद्धि- नश्यति, तथा गन्धोऽपि । नित्यत्वं पुनरस्य नास्त्येव । स्पर्शस्त्वगिन्द्रियग्राह्यः । त्वचि स्थितमिन्द्रियं त्वगिन्द्रियम्, तेनैव स्पर्शो गृह्यते नान्येन । क्षित्युदकज्वलनपवनवृत्तिः । एतेष्वेव वृत्तिरेव । त्वक्सहकारी । स्पर्शस्त्वगिन्द्रियस्य विषयग्रहणसहकारी । रूपानुविधायी रूपमनुविधातुमनुगन्तुं शीलमस्य, यत्र रूपं नियमेन तस्य सद्भावात् । शीतोष्णा- सिद्ध विषयों में नियोग या प्रतिषेध नहीं किया जा सकता । 'पृथिवीवृत्तिः' अर्थात् गन्ध पृथिवी में ही रहता है और किसी द्रव्य में नहीं। इसके सुरभि (सुगन्ध) एवं असुरभि (दुर्गन्ध) दो भेद हैं । 'अस्यापि पूर्ववदुत्पत्त्यादयो व्याख्याताः' अर्थात् जिस प्रकार पार्थिव परमाणुओं के रस की उत्पत्ति और विनाश दोनों ही अग्नि के संयोग से होते हैं एवं कार्य द्रव्यों में वे कारणगत गुणों से उत्पन्न होते हैं एवं आश्रय के विनाश से विनष्ट होते हैं, उसी प्रकार से गन्ध में भी समझना चाहिए । गन्ध नित्य होता ही नहीं । त्वचा में रहनेवाली इन्द्रिय ही 'त्वगिन्द्रिय' है । स्पर्श का प्रत्यक्ष इसी से होता है, और किसी इन्द्रिय से नहीं । 'क्षित्युदकज्वलनपवनवृत्तिः' अर्थात् पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चार द्रव्यों में वह रहता है और अवश्य रहता है । 'त्वक्सहकारी' 'त्वगिन्द्रिय में रहनेवाला स्पर्श) त्वगिन्द्रिय के द्वारा स्पर्श के प्रत्यक्ष में सहायक है । 'रूपानुविधायी' 'रूपमनुविधातुं शीलमस्य' इस व्युत्पत्ति के अनुसार उक्त वाक्य का यह अभिप्राय है कि स्पर्श रूपानुगमनशील है, अर्थात् जहाँ रूप रहता है, वहाँ स्पर्श भी अवश्य ही रहता है । शीत, उष्ण और अनुष्णाशीत भेद से स्पर्श तीन प्रकार का है ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २५७

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २५७ प्रशस्तपादभाष्यम् पार्थिवपरमाणुरूपादीनां पाकजोत्पत्तिविधानम् । घटादे- रामद्रव्यस्याग्निना सम्बद्धस्याग्न्यभिघातान्नोदनाद्वा तदारम्भकेष्वणुषु पार्थिव परमाणुओं के रूपादि की पाक से उत्पत्ति की रीति (कहते हैं) । घटादि कच्चे द्रव्यों के उत्पादक परमाणुओं के साथ अग्नि का (अभिघात या नोदन नाम का) संयोग होता है । उक्त परमाणुओं के साथ न्यायकन्दली नुष्णाशीतभेदात् त्रिविधः । काठिन्यप्रशिथिलादयस्तु संयोगविशेषा न स्पर्शान्तरम्, उभयेन्द्रियग्राह्यत्वात् । अस्यापि नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः पूर्ववदिति । व्यवहितस्य रसस्य ग्रहणं न गन्धस्य, तस्य नित्यत्वाभावात् । पार्थिवपरमाणुरूपादीनामुत्पत्तिविनाशनिरूपणार्थमाह-पार्थिवपरमाणुरूपादीनामिति । यद्यपि परमाणव एव पृथिवी, तथापि ते कार्यरूपपृथिव्यपेक्षया पार्थिवा उच्यन्ते । पृथिव्या इमे कारणं परमाणवः पार्थिवपरमाणवः, तेषां ये रूपाद्यस्तेषां पाकजानामुत्पत्तेर्विधानं प्रकारः कथ्यते । नन्वेवं सति श्यामादिविनाशनिरूपणं न प्रतिज्ञातं स्यात्, नैवम्, प्रकार- शब्देन तस्यावबोधात् । यथा हि रूपादीनां पाकादुत्पत्तिप्रकारः । यत्र पूर्वेषां विनाशादपरेषा- मुत्पादस्तमेव प्रकारं दर्शयति-घटादेरामद्रव्यस्येत्यादिना । आदिशब्देन शरावादयो गृह्यन्ते । कठिनता और कोमलता नाम के कोई अतिरिक्त स्पर्श नहीं हैं, वे विशेष प्रकार के संयोग ही हैं, क्योंकि आँख और त्वचा दोनों इन्द्रियों से इनका प्रत्यक्ष होता है । 'अस्यापि नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः पूर्ववत्' इस वाक्य में 'पूर्व' शब्द से ठीक पहले कहा गया गन्ध अभिप्रेत नहीं है; क्योंकि गन्ध नित्य है ही नहीं; किन्तु गन्ध से पहले कहे हुए रस का ग्रहण है (जो नित्य और अनित्य दोनों प्रकार का होता है) । 'पार्थिवपरमाणुरूपादीनाम्' इत्यादि सन्दर्भ पार्थिव परमाणुओं के रूपादि की उत्पत्ति और विनाश का निरूपण करने के लिए है। पृथिवी के परमाणु यद्यपि स्वयं ही पृथिवी हैं, फिर भी 'पृथिव्या इमे कारणं परमाणवः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार कार्यरूप पृथिवी की अपेक्षा ये परमाणु भी 'पार्थिव' कहलाते हैं। पार्थिव परमाणुओं के जो 'रूपादि' अर्थात् पाकरूपादि उनकी जो उत्पत्ति उसका 'विधान' अर्थात् प्रकार कहते हैं । (प्र.) इस प्रकार की व्याख्या में (कच्चे घटादि के) श्यामादि रूपों का विनाश प्रतिज्ञा के अन्दर नहीं आवेगा? (उ.) (उक्त प्रतिज्ञा वाक्य में) 'प्रकार' शब्द के रहने से (उस प्रतिज्ञा वाक्य के द्वारा) रूपादि के विनाश का भी बोध हो जायगा । अर्थात् पाक से रूपादि की उत्पत्ति के जिस प्रकार में रूपादि के विनाश से दूसरे रूपादि की उत्पत्ति होती है, वही 'प्रकार' 'घटादेरामद्रव्यस्य' इत्यादि से कहते हैं ।

२५८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे रूपादीनां पाकोत्पत्ति- प्रशस्तपादभाष्यम् कर्माण्युत्पद्यन्ते तेभ्यो विभागा विभागेभ्यः संयोगविनाशाः संयोग- विनाशेभ्यश्च कार्यद्रव्यं विनश्यति । तस्मिन् विनष्टे स्वतन्त्रेषु परमाणुष्वग्निसंयोगादौष्ण्यापेक्ष्यामादीनां विनाशः पुनरन्यस्मादग्निसं- योगादौष्ण्यापेक्षात् पाकजा जायन्ते। अग्नि के उस नोदन या अभिघात से उनमें क्रियाओं की उत्पत्ति होती है । उन क्रियाओं से परमाणुओं में विभाग होते हैं । उन विभागों से परमाणुओं के परस्पर के सारे संयोग टूट जाते हैं । संयोग के उन विनाशों से घटादि द्रव्यों का विनाश हो जाता है । उनके विनष्ट हो जाने के बाद परस्पर अलग हुए उन परमाणुओं में उष्णता और अग्नि के संयोग से पाकज रूपादि की उत्पत्ति होती है । न्यायकन्दली आमद्रव्यस्येत्यपक्वद्रव्यस्येत्यर्थः । पाकार्थमग्निना सम्बद्धस्य परमाणुषु कर्माण्युत्पद्यन्ते, आमद्रव्यस्य घटादेः संयोगिनोऽप्युदकपरमाणवः सन्ति, तन्निवृत्त्यर्थमाह-तदारम्भकेष्विति । तस्य घटादेरारम्भकेष्वित्यर्थः । घटारम्भकाश्च परमाणवः पारम्पर्येण कर्मणां कारणमित्याह-अग्न्यभिघातान्नोदनाद्वेति । पार्थिवस्य परमाणोरग्निनाऽभिघातो नोदनं वा संयोगविशेषः, स च कर्माधिकारे वक्ष्यते । तेभ्यो विभागा विभागेभ्यः संयोगविनाशाः संयोगविनाशेभ्यश्च कार्यद्रव्यं विनश्यति, तेभ्यः कर्मभ्यः परमाणूनां विभागा विभागेभ्यो द्व्यणुकलक्षणं कार्यद्रव्यं विनश्यति । तस्मिन् विनष्टे स्वतन्त्रेषु परमाणुष्वग्निसंयोगादग्नि- (घटादि पद में प्रयुक्त) 'आदि' शब्द से शराव प्रभृति द्रव्यों को समझना चाहिए । 'आमद्रव्य' का अर्थ है- बिना पका हुआ कच्चा द्रव्य । पाक के लिए अग्नि के साथ सम्बद्ध परमाणुओं में क्रिया उत्पन्न होती हैं; किन्तु घटादि कच्चे द्रव्यों में तो जलादि के परमाणु भी सम्बद्ध हैं; किन्तु उनके परमाणुओं में पाक इष्ट नहीं है, अतः उनको हटाने के लिए 'तदारम्भकेषु' यह वाक्य दिया गया है । 'तस्य' शब्द के 'तत्' शब्द से घटादि द्रव्य अभिप्रेत हैं । उनके आरम्भक अर्थात् उत्पादक पर- माणुओं में । 'अग्न्यभिघातान्नोदनाद्वा' इत्यादि से यह कहते हैं कि घटादि के उत्पादक परमाणु भी परम्परा से उक्त क्रिया के कारण हैं । पार्थिव परमाणु के साथ अग्नि का नोदन या अभिघात नाम का संयोग (होता है) । इसकी बातें आगे कर्मपदार्थ- निरूपण में कहेंगे । 'तेभ्यो विभागाः, विभागेभ्यः संयोगविनाशाः, संयोगविनाशेभ्य- श्च कार्यद्रव्यं विनश्यति' अर्थात् उन क्रियाओं से परमाणुओं में विभाग उत्पन्न होते हैं, उन विभागों से संयोगों के नाश उत्पन्न होते हैं, संयोग के उन विनाशों से द्व्यणुक रूप कार्य द्रव्यों का नाश होता है । 'तस्मिन् विनष्टे स्वतन्त्रेष्वग्नि-

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २५९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २५९ न्यायकन्दली गतौष्ण्यापेक्षाच्छ्यामादीनां पूर्वरूपरसगन्धस्पर्शानां विनाशः । पुनरन्यस्मादग्निसंयोगात् पाकजा जायन्ते । स्वतन्त्रेषु परमाणुषु पाकजोत्पत्तौ कार्यानवरुद्ध एव द्रव्ये सर्वत्र रूपाद्युत्पत्तिदर्शनं प्रमाणम् । परमाणुरूपादयः कार्यानवरुद्धेष्वेव द्रव्येषु भवन्ति, आरभ्यमाणरूपादित्वात्, तन्त्वादिरूपवत् । पूर्वरूपादिविनाशेऽपि रूपान्तरोत्पत्तिः प्रमाणम् । रूपादिमति रूपाद्यन्तरा- रम्भासम्भवाद् रक्तादिरूपादयो रूपादिमत्सु नारभ्यन्ते रूपादित्वात्, तन्त्यादिरूपादिवत् । एवं परमाणुषु पूर्वरूपादिविनाशे सिद्धे वह्निसंयोग एव विनाशहेतुरवतिष्ठते, तद्भावित्वादन्यस्यासम्भवात् । न च यदेव रूपादीनां विनाशकारणं तदेव तेषामुत्पत्तिकारणमित्यवगन्तव्यम्, तन्तुरूपादीनामन्यत उत्तरेरन्यतश्च विनाशदर्शनात् । तेन परमाणुषु रूपादीनामन्यस्मादग्निसंयोगादुत्पत्तिरन्यस्मादग्निसंयोगाद्विनाश इत्य- संयोगादौष्ण्यापेक्षाच्छ्यामादीनां विनाशः, पुनरन्यस्मादग्निसंयोगादौष्ण्यापेक्षात्पाकजा जायन्ते' । 'स्वतन्त्र' अर्थात् परस्पर असम्बद्ध परमाणुओं में पाक से विलक्षण रूपादि की उत्पत्ति होती है । जिस समय द्रव्य दूसरे द्रव्य के उत्पादनकार्य से विरत रहता है, उसी समय उसमें गुण की उत्पत्ति होती है । पटरूप कार्य के उत्पादन में लगने से पहले ही तन्तुओं में रूपादि की उत्पत्ति होती है, अतः यही प्रामाणिक है कि द्वयणुक रूप कार्य में व्याप्त होने से पहले पार्थिव परमाणुओं में भी रूपादि की उत्पत्ति होती है; क्योंकि ये भी उत्पत्तिशील रूपादि ही हैं । एवं यह भी प्रमाण से सिद्ध है कि एक आश्रय में दूसरे रूपादि की उत्पत्ति तब तक नहीं हो सकती, जब तक उसके पहले के रूपादि का नाश न हो जाय । अतः यह अनुमान ठीक है कि पाक से रक्त रूपादि की उत्पत्ति रूप से युक्त किसी द्रव्य में नहीं होती है,, जैसे कि तन्तु प्रभृति के रूपादि किसी रूपयुक्त द्रव्य में नहीं उत्पन्न होते हैं । इससे यह सिद्ध होता है कि परमाणुओं के पहले रूपादि का नाश हो जाने पर पाक से उनमें दूसरे रूपादि की उत्पत्ति होती है । एवं रूप का उक्त नाश भी अग्निसंयोग के रहते ही होता है एवं नहीं रहने से नहीं होता है, अतः (पाकज रूपादि की उत्पत्ति की तरह उस आश्रय में रहनेवाले अपाकज) रूपादि के नाश का भी अग्निसंयोग ही कारण है; किन्तु रूप का नाश एवं रूप की उत्पत्ति दोनों एक कारण से सम्भव नहीं हैं; क्योंकि तन्तु प्रभृति के रूपों का नाश एवं उत्पत्ति विभिन्न कारणों से देखे जाते हैं । इससे यह फलितार्थ निकलता है कि अग्नि के एक संयोग से पहले के रूपादि का नाश होता है एवं अग्नि के ही दूसरे संयोग से दूसरे रूपादि की उत्पत्ति होती है । इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार तन्तु प्रभृति के रूपादि की उत्पत्ति और विनाश दोनों एक सामग्री से इसलिए नहीं होते कि

२६० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे रूपादीनां पाकजोत्पत्ति- प्रशस्तपादभाष्यम् तदनन्तरं भोगिनामदृष्टापेक्षादात्माणुसंयोगादुत्पन्नपाकजेष्वणुषु कर्मोत्पत्तौ तेषां परस्परसंयोगाद् द्व्यणुकादिक्रमेण कार्यद्रव्यमुत्पद्यते । तत्र च कारण- गुणप्रक्रमेण रूपाद्युत्पत्तिः । इसके बाद भोग करनेवाले आत्मा के अदृष्ट एवं आत्मा और परमाणुओं के संयोग इन दोनों से पाकजनित विलक्षण रूपादि से युक्त परमाणुओं में परस्पर संयोग उत्पन्न होते हैं । इन संयोगों से द्व्यणुकादि की उत्पत्ति के क्रम से (घटादि) स्थूल द्रव्य की उत्पत्ति होती है । फिर इस (नये) कार्य-द्रव्य में स्वाभाविक कारणगुण के क्रम से रूपादि गुणों की उत्पत्ति होती है । न्यायकन्दली वसीयते । परमाणुरूपादिविनाशोत्पादावेककारणकौ न भवतः, रूपादिविनाशोत्पादत्वात् तन्तुरूपादिविनाशोत्पादवत् । तदनन्तरमित्यादि । उत्पन्नेषु घटादिषु येषां तत्साध्ययोः सुखदुःखयोरनुभवो भोगो भविष्यति ते भोगिनः, तेषामदृष्टं धर्माधर्मलक्षणम्, तमपेक्षमाणादात्मपरमाणुसंयोगा- दुत्पन्नपाकजरूपरसगन्धस्पर्शेषु परमाणुषु कर्माण्युत्पद्यन्ते । तेभ्यस्तेषां परमाणूनां परस्पर- संयोगास्ततश्च द्वाभ्यां द्व्यणुकं त्रिभिर्द्व्यणुकैस्त्र्यणुकमित्यनेन क्रमेण कार्यद्रव्यं घटादिकमुत्पद्यत इति । तत्र च कारणगुणप्रक्रमेण रूपाद्युत्पत्तिः । परमाणुद्वयरूपाभ्यां द्व्यणुके रूपं द्व्यणुकरूपेभ्यश्च त्र्यणुकरूपमित्यनेन क्रमेण घटादौ रूपरसगन्धस्पर्शोत्पत्तिः । वे भी उत्पत्ति और विनाश हैं, उसी प्रकार उसी हेतु से यह भी निष्पन्न होता है कि पर- माणुओं के रूपादि की उत्पत्ति और विनाश दोनों ही एक सामग्री से उत्पन्न नहीं होते । 'तदनन्तरम्' अर्थात् घटादि द्रव्यों के उत्पन्न हो जाने के बाद उन घटादि द्रव्यों से जिन जीवों को सुख या दुःख का अनुभव रूप 'भोग' होगा, वे ही जीव (भोगिनाम्' इस पद के) 'भोगी' शब्द से अभिप्रेत हैं । उन्हीं के अदृष्ट अर्थात् धर्म और अधर्म एवं आत्मा और परमाणुओं के संयोग इन सबों से पाकज रूपादि से युक्त परमाणुओं में क्रियायें उत्पन्न होती हैं । इन क्रियाओं से उन परमाणुओं में परस्पर संयोग उत्पन्न होते हैं । उक्त संयोग एवं दो परमाणुओं से द्व्यणुक एवं तीन द्व्यणुकों से 'त्र्यणुक' इसी क्रम से (अभिनव) घटादि द्रव्यों की उत्पत्ति होती है । 'उसमें' अर्थात् द्व्यणुक में 'कारणगुणक्रम' से अर्थात् परमाणुओं के (पाकज) रूपों से (द्व्यणुकों में) रूपों की उत्पत्ति होती है । अर्थात् दोनों परमाणुओं के दोनों रूपों से द्व्यणुक में एक रूप की उत्पत्ति होती है । एवं तीन द्व्यणुकों के तीनों रूपों से त्र्यणुक में एक

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २६१

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २६१ न्यायकन्दली सङ्ख्यादीनां न पाकजत्वं तेषामविलक्षणत्वात् । ननु स्पर्शस्यापि वैलक्षण्यं न दृश्यते, सत्यम्, तथाप्यस्य पाकजत्वमनुमानात् । तच्च पृथिव्यधिकारे दर्शितम् । पाकजोत्पत्त्यनन्तरं परमाणुषु क्रिया, न तु श्यामादिनिवृत्तिसमकालमेवेति रूपादिमत्येव द्रव्ये रूपादिमत्कार्य- द्रव्यारम्भहेतुभूतक्रियादर्शनाद् दृश्यते । परमाणुक्रिया रूपादिमत्येव जायते रूपादिमत्कार्या- रम्भहेतुभूतक्रियात्वात् पटारम्भकसंयोगोत्पादकतन्तुक्रियावत् । अथ कथं कार्यद्रव्ये एव रूपादीनामग्निसंयोगादुत्पादविनाशौ न कल्प्येते ? प्रतीयन्ते हि पाकार्थमुपक्षिप्ता घटादयः सर्वावस्थासु प्रत्यक्षा- श्छिद्रविनिवेशितदृशा, प्रत्यभिज्ञायन्ते च पाकोत्तरकालमपि त एवामी घटादय इति, तन्नाह-न चेति । उपपत्तिमाह-सर्वावयवेष्विति । अन्तर्बहिश्च रूप की उत्पत्ति होती है। इसी (कारणगुणपूर्वक) क्रम से घटादि स्थूल द्रव्यों में भी (पाकज) रूप, रस, गन्ध एवं स्पर्श की उत्पत्ति होती है। (पके हुए घटादि में भी) संख्यादि गुणों की उत्पत्ति पाक से नहीं होती है; क्योंकि पाक के बाद भी संख्यादि गुणों में कोई अन्तर नहीं दीखता है। (प्र.) स्पर्श में भी तो पाक के बाद कोई अन्तर नहीं दीखता है ? (उ.) हाँ, फिर भी पृथिवी निरूपण में इस अनुमान को दिखा चुके हैं, जिसके द्वारा पके हुए द्रव्यों के स्पर्शों में पाकजन्यत्व की सिद्धि होती है। जिस क्रिया के द्वारा रूपादि से युक्त द्रव्य की उत्पत्ति होती है वह क्रिया रूपादि से युक्त द्रव्यों में ही देखी जाती है, अतः यह समझना चाहिए कि पार्थिव परमाणुओं में पाक से रूपादि की उत्पत्ति के बाद ही उसमें (पके हुए द्व्यणुक को उत्पन्न करनेवाली) क्रिया उत्पन्न होती है, श्यामादि रूपों के नाशक्षण में नहीं। इस प्रकार यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार पट के कारणीभूत तन्तुओं के संयोग को उत्पन्न करनेवाली क्रिया रूप से युक्त तन्तुओं में ही देखी जाती है; क्योंकि वह क्रिया (तन्तुसंयोग के द्वारा) रूप से युक्त पट स्वरूप द्रव्य का उत्पादक है, उसी प्रकार रूप से युक्त द्व्यणुक स्वरूप द्रव्य के उत्पादक दोनों परमाणुओं की क्रिया भी रूप से युक्त परमाणुओं में ही उत्पन्न होती है। (प्र.) घटादि कार्य द्रव्यों में ही अग्निसंयोग से रूपादि का विनाश एवं उत्पत्ति क्यों नहीं मान लेते ? क्योंकि भट्ठी में पकने के लिए दिये गये घटादि का तीनों अवस्थाओं में प्रत्यक्ष होता है। एवं भट्ठी के किसी छेद से झाँकनेवाले को 'यह वही घट है' इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञा भी होती है। इसी आक्षेप के समाधान के लिए 'न च' इत्यादि वाक्य लिखते हैं। 'सर्वावयवेषु' इत्यादि वाक्य से उक्त आक्षेप के खण्डन की ही युक्ति का प्रतिपादन करते हैं। अभिप्राय यह है कि भीतर और बाहर के सभी

२६२ न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे रूपादीनां पाकजोत्पत्ति- प्रशस्तपादभाष्यम् न च कार्यद्रव्य एव रूपाद्युत्पत्तिर्विनाशो वा सम्भवति, सर्वावयवेष्वन्त- र्बहिश्च वर्त्तमानस्याग्निना व्याप्यभावात् । अणुप्रवेशादपि च व्याप्तिर्न सम्भवति, कार्यद्रव्यविनाशादिति । उस (कच्चे स्थूल घटादि) द्रव्यों में ही (अग्निसंयोग से पाकज) रूपादि की उत्पत्ति या (नीलादि पहले) रूपादि का विनाश नहीं हो सकता; क्योंकि बाहर और भीतर के सभी अवयव केवल बाहर में विद्यमान अग्नि के संयोग से व्याप्त नहीं हो सकते । (अग्नि के) परमाणुओं से भी उक्त व्याप्ति नहीं हो सकती; क्योंकि इसके मानने पर भी कार्य द्रव्य का नाश मानना ही पड़ेगा । न्यायकन्दली सर्वेष्ववयवेषु वर्त्तमानस्य समवेतस्यावयविनो बाह्ये वर्त्तमानेन वह्निना व्याप्ते- र्व्यापकस्य संयोगस्याभावात् कार्यरूपादीनामुत्पत्तिविनाशयोरक्लृप्तेरन्तर्वर्त्तिना- मपाकप्रसङ्गादिति भावः । सच्छिद्राण्येवावयविद्रव्याणि । तत्र यदि नाम महतस्ते- जोऽवयविनो नान्तः प्रवेशोऽस्ति, तत्परमाणूनां ततो व्याप्तिर्भविष्यति ? तत्राह- अणुप्रवेशादपीति । न तावत्परमाणवः सान्तराः, निर्भागत्वात् । द्व्यणुकस्य सान्तरत्वे चानुत्पत्तिरेव, तस्य परमाण्वोरसंयोगात् । संयुक्तौ चेदिमौ निरन्तरावेव । सभागयोर्हि अवयवों में 'वर्तमान' अर्थात् समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले अवयवी में केवल बाहर रहनेवाले वह्नि की 'व्याप्ति' अर्थात् व्यापक संयोग (बाहर और भीतर सभी अवयवों के साथ संयोग) नहीं हो सकता । एवं कार्यद्रव्यों के रूपादि की उत्पत्ति और विनाश भी (बिना कारण के) नहीं हो सकते । (अतः आक्षेप करनेवाले के पक्ष में कथित व्यापक संयोग रूप कारण के अभाव से) भीतर के अवयवों में पाक ही उत्पन्न नहीं होगा (फलतः भीतर की तरफ घटादि कच्चे ही रह जायेंगे) । (प्र.) जितने भी अवयवी रूप द्रव्य हैं सभी छोटे-छोटे छिद्रों से युक्त हैं, उन छोटे छिद्रों के द्वारा यद्यपि बड़े तेजद्रव्य का प्रवेश सम्भव नहीं है, फिर भी तेज के परमाणुओं का प्रवेश उन छोटे छिद्रों से भी हो सकता है । इस प्रकार घट का विनाश न मानने पर भी (अवयवी के बाहर और भीतर पाक का प्रयोजक) कथित व्यापक वह्निसंयोग की उपपत्ति हो सकती है । इसी आक्षेप के समाधान में 'अणुप्रवेशादपि' इत्यादि वाक्य लिखते हैं । अभिप्राय यह है कि परमाणुओं के तो अंश हैं नहीं, जिससे कि वे छिद्रयुक्त होंगे ? द्व्यणुकों को अगर छिद्रयुक्त मानें तो फिर उनकी उत्पत्ति ही सम्भव नहीं

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २६३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २६३ न्यायकदली वस्तुनोः केनचिदंशेन संयोगात् केनचिदसंयोगात् सान्तरः संयोगः । निर्भागयोस्तु नायं विधिरवकल्पते । स्थूलद्रव्येषु प्रतीयमानेष्वन्तरं न प्रतिभात्येव, त्र्यणुकेष्वेवान्तरम्, तच्चानुपलब्धियोग्यत्वान्न प्रतीयात इति गुर्वीयं कल्पना । तस्मान्निरन्तरा एव घटादयः । तेषामन्तस्तावदग्निपरमाणूनां प्रवेशो नास्ति यावत्पार्थिवावयवानां व्यतिभेदो न स्यात् । स्पर्शवति द्रव्ये तथाभूतस्य द्रव्यान्तरस्य प्रतिघाताद् व्यतिभिद्यमानेषु चावयवेषु क्रियाविभागादिन्यायेन द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशादवश्यं द्रव्यविनाश इति कुतस्तस्याणु- प्रवेशादभिव्यक्तिः । न च कार्यद्रव्येष्याश्रयविनाशादन्यतो रूपादीनां विनाशः कारण- गुणेभ्यश्चान्यत उत्पादो दृष्टः, तेनादिघटवह्निसंयोगाद्रूपादीनामुत्पत्तिविनाशौ न कल्प्येते । घटरूपादय आश्रयविनाशादेव नश्यन्ति कार्यद्रव्यगतरूपरसगन्ध- स्पर्शत्वाद् मुद्गराभिहतनष्टघटरूपादिवत् । तथा घटरूपादयः कारणगुणेभ्य होगी; क्योंकि दो परमाणुओं में इस प्रकार का संयोग असम्भव है (जिससे छिद्र- युक्त द्वयणुक की उत्पत्ति सम्भव हो) क्योंकि दोनों परमाणु अगर संयुक्त हैं तो फिर उनमें अन्तर नहीं हो सकता । अनुयोगी और प्रतियोगी के किसी अंश में संयोग एवं किसी अंश में असंयोग से ही अन्तरयुक्त संयोग होता है, निरंश परमाणुओं में उक्त संयोग की संभावना नहीं है । एवं प्रतीत होनेवाले स्थूल द्रव्यों में छिद्र देखा भी नहीं जाता । अब केवल एक कल्पना बच जाती है कि केवल त्र्यसरेणु रूप अवयवी में ही छिद्र हैं, किन्तु अतीन्द्रिय होने के कारण उनका प्रत्यक्ष नहीं होता है; किन्तु इस कल्पना में बहुत ही गौरव है । अतः घटादि द्रव्य छिद्रों से युक्त नहीं हैं । उनके भीतर अग्नि के परमाणुओं का प्रवेश तब तक सम्भव नहीं है, जब तक उनके अवयव विभक्त न हो जायें । स्पर्श से युक्त किसी द्रव्य में जब स्पर्श से युक्त किसी दूसरे द्रव्य का प्रतिघात होता है, तब उसके अवयव अवश्य ही विभक्त हो जाते हैं । फिर 'क्रिया से विभाग, विभाग से आरम्भक संयोग का नाश' इस रीति से आरम्भक संयोग के नाश के द्वारा अवयवी द्रव्य का भी नाश अवश्य ही होगा फिर अणुप्रवेश के बाद अग्नि के व्यापक संयोग की उत्पत्ति कैसे होगी ? एवं कार्यद्रव्यों के रूपादि का नाश आश्रयनाश को छोड़कर और किसी कारण से नहीं देखा जाता है, इसी प्रकार कार्यद्रव्य के रूपादि की उत्पत्ति भी कारणों में रहनेवाले रूपादि से भिन्न किसी और कारण से नहीं देखी जाती है । इन सभी युक्तियों से भी घटादि कार्यद्रव्यों के रूपादि की उत्पत्ति घटादि कार्यद्रव्य और वह्नि के संयोग से कल्पित नहीं हो सकती । इस प्रकार यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार घटादि द्रव्यों के रूप, रस, गन्ध एवं स्पर्श मुद्गरादि के प्रहार से उत्पन्न होते हैं एवं घटादि कार्यद्रव्यों के नाश से ही नष्ट होते हैं; क्योंकि वे भी कार्यद्रव्य के रूपादि हैं, उसी प्रकार सभी कार्यद्रव्यों के

२६४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे रूपादीनां पाकजोत्पत्ति- न्यायकन्दली एव जायन्ते कार्यद्रव्यगतरूपादित्वात् पटगतरूपादिवत् । किञ्च, पूर्वमवयवानां प्रशिथिलता आसीदिदानीं काठिन्यमुपलभ्यते, न च नोदनाभिघातयोरिव शैथिल्यकाठिन्ययोरेकत्र समावेशो युक्तः, परस्परविरोधात् । तस्मात् पूर्वव्यूहनिवृत्तौ व्यूहान्तरमेतदुपजातम् । तथा सति प्राक्तनद्रव्यविनाशः कारणविनाशात्, द्रव्यान्तरस्योत्पादः कारणसद्भावादेवेत्यवतिष्ठते । प्रत्यभिज्ञानं च ज्वालादिवत् सामान्यविषयम् । सर्वावस्थोपलब्धिरपि कार्यस्य विनश्यतोऽपि क्रमेण विनाशात् । न हि घटः परमाणुसञ्चयारब्धो येन विभक्तेषु परमाणुषु सहसैव विनश्येत्, किन्तु द्व्यणुकादिक्रमेणारब्धः । तस्य द्व्यणुकत्र्यणुकाद्यसङ्ख्येयद्रव्यविनाशात्परम्परया चिरेण विनश्यतो यावद्विनाशास्तावदुपलब्धिरस्त्येव । एकतश्च पूर्वऽवयवा विनश्यन्ति, अन्यतश्चोत्पन्नपाकजैरणुभिरपूर्वे तत्स्थान एव द्व्यणुकादिक्रमेणारभ्यन्ते, तेन रूपादि अपने आश्रयों के नाश से ही नष्ट होते हैं । एवं जिस प्रकार पटस्वरूप कार्यद्रव्य के रूपादि अपने कारणीभूत तन्तुओं के रूपादि से ही उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार घटादि सभी कार्यद्रव्यों के रूपादि अपने कारणीभूत द्रव्यों के रूपादि से ही उत्पन्न होते हैं । और भी बात है कि पाक से पहले घटादि में रहनेवाला प्रशिथिल संयोग एवं पाक के बाद होनेवाला कठिन संयोग दोनों परस्पर विरोधी हैं, नोदन-संयोग एवं अभिघात-संयोग इन दोनों की तरह वे परस्पर अविरोधी नहीं हैं, अतः एक घट में पाक से पहले का प्रशिथिल संयोग एवं पीछे का कठिन संयोग ये दोनों नहीं रह सकते । अतः यही मानना पड़ेगा कि पहले 'व्यूह' अर्थात् अवयवों के संयोग का नाश हो जाने पर अवयवों के दूसरे व्यूह (संयोग) की उत्पत्ति होती है । फलतः पहले अवयवी का नाश हो गया; क्योंकि उसके कारण अवयवों के संयोग (पूर्वव्यूह) का नाश हो गया है । दूसरे अवयवी की उत्पत्ति होती है; क्योंकि कारणीभूत दूसरे व्यूह (अवयवसंयोग) की सत्ता है । पकने के बाद भी 'यह वही घट है' इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञा तो दोनों में अत्यन्त सादृश्य के कारण होती है, जैसे कि दीपादि की ज्वालाओं में इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञायें होती हैं । घटादि की सभी अवस्थाओं की उक्त उपलब्धि में यह युक्ति है कि (पाक से) घटादि द्रव्यों का विनाश क्रमशः होता है । परमाणुओं के समूहों से ही तो घट उत्पन्न होते नहीं कि उनमें परस्पर विभागों के उत्पन्न होते ही उनका सहसा नाश हो जाय । द्व्यणुकादि क्रम से उनकी उत्पत्ति होती है, अतः द्व्यणुक, त्र्यस- रेणु प्रभृति के नाश की असंख्य परम्परा से बहुत समय के बाद घटादि का नाश भी होगा, अतः जितने समय तक उनका नाश नहीं हो जाता उतने समय तक उनकी उपलब्धि होना उचित ही है। अग्नि के एक संयोग से पहले के अवयव नष्ट होते हैं एवं अग्नि के ही दूसरे संयोग से उसी स्थान पर पाकज रूपादि से युक्त अवयवों से

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २६५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २६५ न्यायकन्दली पक्वापक्वायवयवदर्शनम् । यदा चान्यावयवानां नाशात्पूर्वावयविनो विनश्यत्ता तदैवापूर्वाव- यवानामुत्पादात् क्षणान्तरे पूर्वावयविविनाशेऽप्यवयव्यन्तरस्य चोत्पाद इत्याधाराधेयभावोऽव- धारणं च स्यात्, यावन्तः पूर्वस्यावयवास्तावन्त एवोत्तरस्यारम्भकाः (इति) तत्परिमाणत्वं तत्सङ्ख्यात्वं चोपपद्यते । प्रक्रिया तु द्व्यणुकस्य विनाशः, त्र्यणुकस्य विनश्यत्ता, श्यामादीनां विनश्यत्ता, सक्रिये परमाणौ विभागजविभागस्योत्पद्यमानता, रक्ताद्युत्पादकस्याग्निसंयोगस्योत्पद्यमान- तेत्येकः कालः । ततस्त्र्यणुकविनाशः, तत्कार्यस्य विनश्यत्ता, श्यामादीनां विनाशः, विभागजविभागस्योत्पादः, संयोगस्य विनश्यत्ता, रक्ताद्युत्पादकाग्निसंयोगोत्पादः, रक्तादीनामुत्पद्यमानता, श्यामादिनिवर्त्तकाग्निसंयोगस्य विनश्यत्तेत्येकः कालः । ततस्तत्कार्यविनाशः, तत्कार्यविनश्यत्ता, उत्तरस्य संयोगस्योत्पद्यमानता, नवीन अवयवी की सृष्टि होती जाती है, अतः पके हुए एवं बिना पके हुए दोनों प्रकार के अवयव देखने में आते हैं। जिस समय कुछ अवयवों के विनाश.से पहले के अवयवी के विनाश की सम्भावना होती है, उसी समय अपूर्व अवयवों की उत्पत्ति भी होती है । इसके बाद दूसरे क्षण में पहले अवयवी का नाश एवं दूसरे अवयवी की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार आधार-आधेयभाव और नियम दोनों की ही उपपत्ति होती है । जितने ही अवयव पहले अवयवी के उत्पादक थे, उतने ही अवयव नवीन अवयवी के भी उत्पादक हैं, अतः दूसरे अवयवी में पहले अवयवी के समान ही संख्या एवं परिमाण का भी सम्बन्ध ठीक बैठता है । (पाकज रूपादि की उत्पत्ति की) रीति यह है कि (१) परमाणुओं में अग्नि के नोदन या अभिघात संयोग से परमाणुओं के विभक्त हो जाने से द्व्यणुक के उत्पादक परमाणुओं के संयोग नष्ट हो जाते हैं । उसके बाद द्व्यणुकों का नाश, त्र्यसरेणु के विनाश की सम्भावना, श्यामरूपादि के विनाश की सम्भावना, क्रिया से युक्त परमाणुओं में विभागजविभाग की उत्पत्ति की सम्भावना, रक्तरूपादि के उत्पादक अग्नि के संयोग की उत्पत्ति की सम्भावना, ये पाँच काम एक समय में होते हैं । (२) उसके बाद एक ही समय में त्र्यसरेणु का विनाश, त्र्यसरेणु से बननेवाले अवयवों के नाश की सम्भावना, श्यारूपादि का विनाश, विभागजविभाग की उत्पत्ति, संयोग के विनाश की सम्भावना, रक्तरूपादि के उत्पादक अग्निसंयोग की उत्पत्ति, रक्तरूपादि की उत्पत्ति की सम्भावना, श्यामरूपादि का नाश एवं अग्निसंयोग के.विनाश की सम्भावना ये आठ काम होते हैं । (३) इसके बाद त्र्यसरेणु से उत्पन्न द्रव्य का विनाश, इस द्रव्य से उत्पन्न द्रव्य के विनाश की सम्भावना, उत्तरदेशसंयोग की उत्पत्ति की सम्भावना,

२६६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् | गुणे रूपादीनां पाकजोत्पत्ति- न्यायकन्दली रक्तादीनामुत्पादः, श्यामायुच्छेदकाग्निसंयोगस्य विनाशः, द्वितीयपरमाणौ द्रव्यारम्भकक्रियाया उत्पद्यमानतेत्येकः कालः। ततस्तत्कार्यस्य विनाशः, तत्कार्यस्य विनश्यत्ता, उत्तरसंयोगस्योत्पादः, क्रियाविभागविभागजविभागानां विनश्यत्ता, द्वितीयपरमाणौ क्रियाया उत्पादः, विभागस्योत्पद्यमानतेत्येकः कालः। ततस्तत्कार्यस्य विनाशः, तत्कार्यस्य विनश्यत्ता, क्रियाविभागविभागजविभागानां विनाशः, द्वितीयपरमाण्याकाशविभागस्योत्पादः, तत्संयोगस्य विनश्यत्तेत्येकः कालः। ततस्तत्कार्यस्य विनाशः, तत्कार्यस्य विनश्यत्ता, परमाण्वाकाशसंयोगविनाशः, उत्तरसंयोगस्योत्पद्यमानतेत्येकः कालः। ततस्तत्कार्यस्य विनाशः, तत्कार्यस्य विनश्यत्ता, परमाणोः परमाण्वन्तरेण सहोत्तरसंयोगोत्पादः, द्वयणुकस्योत्पद्यमानता, विभागकर्मणोर्विनश्यत्तेत्येकः कालः। ततस्तत्कार्यस्य विनाशः, तत्कार्यस्य विनश्यत्ता, द्वयणुकस्योत्पादः, तद्गतानां रूपादीनामुत्पद्यमानता, विभागकर्मणोर्विनाशः, ततः क्षणान्तरे कारणगुणप्रक्रमेण द्वयणुके गुणान्तरोत्पादः। एवं सर्वत्र द्वयणुकेषु कल्पना। त्र्यणुकाद्युत्पत्तौ तु कर्म न चिन्तनीयम्, युगपद् बहूनां परमाणूनां रक्तरूपादि की उत्पत्ति, श्यामरूपादि के नाशक अग्नि के संयोग का विनाश, दूसरे (पके हुए) परमाणुओं में द्रव्य को उत्पन्न करनेवाली क्रिया की सम्भावना ये पाँच काम एक समय में होते हैं । (४) इसके बाद त्र्यसरेणुजनित द्रव्य से उत्पन्न कार्यद्रव्य का विनाश एवं इस कार्यद्रव्य से उत्पन्न द्रव्य के विनाश की सम्भावना, क्रिया और विभागजविभागों का विनाश, द्वितीय परमाणु के आकाश के साथ विभाग की उत्पत्ति, द्वितीय परमाणु एवं आकाश के पहले संयोग के विनाश की सम्भावना ये छः काम एक समय में होते हैं । (५) इसके बाद प्रकृत कार्य का नाश होता है । इससे विनष्ट कार्यद्रव्य से उत्पन्न द्रव्य के विनाश की सम्भावना, एक परमाणु का दूसरे परमाणु के साथ उत्तरसंयोग की उत्पत्ति, (पके हुए) द्वयणुक की उत्पत्ति की सम्भावना एवं विभाग और क्रिया के विनाश की सम्भावना ये छः काम एक समय में होते हैं । (६) इसके बाद (उक्त सम्भावित विनाश के प्रतियोगी) कार्यद्रव्य का विनाश एवं इस कार्यद्रव्य से उत्पन्न कार्यद्रव्य के विनाश की सम्भावना, (पके हुए) द्वयणुक की उत्पत्ति, द्वयणुक में उत्पन्न होनेवाले (रक्त) रूपादि गुणों की उत्पत्ति की सम्भावना, विभाग एवं क्रिया का विनाश ये छः काम एक समय में होते हैं । इसके बाद अगले क्षण में दूसरे रक्तरूपादि गुणों की उत्पत्ति होती है । इसी प्रकार नवीन घटादि के प्रयो-जकीभूत और द्वयणुकों में भी कल्पना करनी चाहिए । त्र्यसरेणु की उत्पत्ति में क्रिया की चिन्ता अनावश्यक है; क्योंकि बहुत से परमाणुओं

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २६७

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २६७ प्रशस्तपादभाष्यम् एकादिव्यवहारहेतुः संख्या । 'यह एक है, ये दो हैं' इत्यादि व्यवहारों का कारण ही 'संख्या' है । न्यायकन्दली संयोगादुत्पन्नेषु द्व्यणुकान्तरकारणस्य परमाणोर्द्व्यणुकान्तरकारणेन परमाणुना सह संयोगाद् द्व्यणुकान्तरकारणपरमाणुना संयोगः, ततोऽपि द्व्यणुकयोः संयोग इत्यनेन क्रमेण संयोगजसंयोगेभ्य एतेषामुत्पादात् । एवं यथोपदेशं यथाप्रज्ञं च व्याख्यातमस्माभिः । सिद्धेऽपि सङ्ख्यास्वरूपे ये केचिदत्यन्तदुद्दर्शनाभ्यासात्तिरोहितबुद्धयो विप्रतिपद्यन्ते तान् प्रत्याह- एकादीति । व्यवहृतिर्व्यवहारो ज्ञेयज्ञानं व्यवह्रियतेऽनेनेति व्यवहारः शब्दः, एकादिव्यवहार एकं द्वे त्रीणीत्यादिप्रत्ययः शब्दश्च, तयोर्हेतुः सङ्ख्येति । एकं द्वे त्रीणीत्यादिप्रत्ययो विशेषणकृतो विशिष्टप्रत्ययत्वाद् दण्डीतिप्रत्ययवत् । एवं शब्दमपि पक्षीकृत्य विशिष्टप्रत्ययत्वादिति हेतुर्वगन्तव्यः । के संयोग से द्व्यणुकों की उत्पत्ति हो जाने पर दूसरे द्वयणुक के कारणीभूत परमाणु का तीसरे द्वयणुक के कारणीभूत परमाणु के साथ भी संयोग होगा। इस संयोग से एक द्वयणुक का दूसरे द्वयणुक के कारणीभूत परमाणु के साथ भी संयोग होगा । परमाणु एवं द्वयणुक के इस संयोग से इस परमाणु के कार्यरूप द्वयणुक एवं पहले के द्वयणुक इन दोनों में संयोगजसंयोग होगा। इन द्व्यणुकों के संयोगजसंयोग के द्वारा भी त्र्यसरेणु की उत्पत्ति हो सकती है। इस विषय में हम लोगों की जैसी शिक्षा है और जितनी बुद्धि है, तदनुसार व्याख्या लिखी है। संख्या को यद्यपि सभी लोग जानते हैं फिर भी अत्यन्त दुष्ट दर्शनों के अभ्यास से जिनकी बुद्धि मारी गयी है, वे इसमें भी विवाद ठानते हैं, अतः उनको समझाने के लिए ही 'एकादि' इत्यादि सन्दर्भ लिखते हैं । 'व्यवहृति- र्व्यवहारः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'व्यवहार' शब्द का अर्थ ज्ञान है । एवं 'व्यवह्रियते अनेन' इस व्युत्पत्ति के अनुसार इसी का शब्दप्रयोग अर्थ भी है । (तदनुसार) 'एकादिव्यवहारः' अर्थात् एक, दो, तीन इत्यादि की प्रतीतियाँ एवं एक, दो, तीन इत्यादि शब्दों के प्रयोग इनदोनों की हेतु ही 'संख्या' है । (प्रतीति की हेतुता संख्या में इस प्रकार है कि ) जैसे कि 'दण्डी पुरुषः' इस विशिष्ट प्रतीति के प्रति दण्ड केवल इसीलिए कारण है कि वह भी विशिष्ट प्रतीति (अर्थात् विशेषण से युक्त विशेष्य की प्रतीति) है, वैसे ही 'यह एक है, ये दो हैं, ये तीन हैं' इत्यादि प्रतीतियाँ भी विशिष्ट प्रतीति होने के कारण ही एकत्वादि संख्या रूप विशेषणों से उत्पन्न होती हैं। इसी प्रकार शब्द को पक्ष बनाकर विशिष्ट शब्दत्व

२६८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या- न्यायकन्दली नन्वयं प्रत्ययो रूपादिविषयः ? न, तत्प्रत्ययविलक्षणत्वात् । रूपनिमित्तो हि प्रत्ययो नीलं पीतमित्येवं स्यान्न त्वेकं द्वे इत्यादि । अस्तु तर्हि निर्विषयो रूपादिद्व्यतिरि- क्तस्यार्थस्याभावात् । कुतोऽस्मिन्नेकद्वित्रीणीत्याद्याकारो जातः ? आलयविज्ञानप्रति- बद्धवासनापरिपाकादिति चेत् ? नीलाद्याकारोऽपि तत एवास्तु, न हि ज्ञानारूढस्य तस्य सङ्ख्याकारस्य वा कश्चिदनुभवकृतो विशेषो येनैकोऽर्थजोऽनर्थजश्चापर इति प्रतिपद्यामहे । अथायं विशेषोऽयमभ्रान्तो नीलाकारः, सङ्ख्याकारस्तु विप्लुत इति । तदसारम्, नीलाकारस्याप्यत्राभ्रान्तत्वे प्रमाणाभावात् । न तावत् क्वचिदस्यास्ति संवादः, तदेकज्ञाननियतत्वात् क्षणिकत्वाच्च । अत एव नार्थक्रियापि । न च प्रत्येकं सर्वज्ञानेषु स्वाकारमात्रसमाहितेषु पूर्वपरज्ञानवर्तिनामाकाराणां सादृश्यप्रतिपत्ति- को संख्या का साधक हेतु समझना चाहिए¹ । (प्र.) ये ('एकः, द्वौ' इत्यादि) प्रतीतियाँ तो रूपादिविषयक हैं ? (उ.) रूपादिविषयक प्रतीतियाँ 'यह नील है, यह पीत है' इत्यादि आकारों की होती हैं, 'एकः द्वौ' इत्यादि प्रतीतियाँ उनसे भिन्न आकार की हैं । अतः ये रूपादिविषयक नहीं हैं । (प्र.) (प्रत्यक्ष से दीखने वाले) रूपादि पदार्थों से भिन्न किसी वस्तु की सत्ता नहीं है । अतः 'एकः द्वौ' इत्यादि प्रतीतियाँ (अगर रूपादिविषयक नहीं हैं तो फिर) बिना विषय के (निर्विषयक) ही मानी जायें ? (उ.) तो फिर इस प्रतीति में 'एकः, द्वौ' इत्यादि आकार किससे उत्पन्न होते हैं । (प्र.) आलयविज्ञान में नियत रूप से सम्बद्ध वासना के परिपाक से ही (उक्त आकार उत्पन्न होते हैं) (उ.) इस प्रकार तो नीलाकार, पीताकारादि ज्ञान भी उस वासना से ही उत्पन्न होंगे (फलतः निर्विषयक होंगे); क्योंकि ज्ञानों में सम्बद्ध संख्या के आकारों में एवं नीलादि के आकारों में कोई अन्तर नहीं है । अतः नीलादिविषयक प्रतीतियों को अर्थ (नीलादि) जन्य मानें एवं संख्याविषयक प्रतीति को अनर्थ (केवल वासना) जन्य मानें, इसमें कोई विशेष युक्ति नहीं है । (प्र.) यही दोनों में अन्तर है कि नीलादि आकार अभ्रान्त हैं और संख्यादि आकार भ्रान्त हैं । (उ.) यह समाधान ठीक नहीं है; क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं है कि नीलादि आकार अभ्रान्त हैं । एवं प्रत्येक आकार क्षणिक है, अतः एक आकार नियमतः एक ही ज्ञान से गृहीत हो सकता है । सुतरां नीलादि आकारों की अभ्रान्तता किसी प्रमाण से निश्चित नहीं हो सकती । प्रत्येक ज्ञान क्षणिक होने के कारण अर्थक्रियाकारी (कार्यजनक) होने पर भी नीलाकारादि की

  1. अर्थात् जिस प्रकार 'दण्डी पुरुषः' विशेष प्रकार के इस शब्द के प्रयोग में दण्ड कारण है उसी प्रकार 'एकः, द्वौ, त्रीणि' इत्यादि प्रयोगों का भी कोई कारण अवश्य है । वही है संख्या ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २६९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २६९ न्यायकेन्दली रस्ति, येन तत्सदृशाकारप्रवाहोपलब्धिनिबन्धनः संवादो व्यवस्थाप्येत, नापि सदृशाकारोपलम्भ एव सर्वत्र, विलक्षणाकारोपलम्भस्यापि क्वचिद् भावात् । न चार्थजन्यतैव नीलाकारस्याभ्रान्तत्वसिद्धिः, अर्थस्याप्रतीतौ तज्जन्यत्व- विनिश्चयायोगात्, अन्यतश्च प्रमाणादर्थप्रतीतावाकारकल्पनावैय्यर्थ्यात्, आकार- संवेदनेदार्थसिद्धयभ्युपगमे वा अभ्रान्ताकारसंवेदनादर्थसिद्धिः, सिद्धे चार्थे तज्जन्यत्वविनिश्चयादाकारस्याभ्रान्तत्वसिद्धिरित्यन्योन्यापेक्षित्त्वम् । अबाधितत्वं च नीलाकारवज्ज्ञानान्तरूढस्य सङ्ख्याकारस्याप्यस्ति, अर्थगतत्वेन च बाधाया असम्भवो नीलादिष्वपि दुर्गमः, तेषां स्वरूपविप्रकृष्टत्वात् । तस्मादाकार- मात्रसंवेदनमेव सर्वत्र, न चेदेकत्राऽनर्थजोऽन्यत्रापि तथैवेति न नीलादिसिद्धिः । अभ्रान्तता का ज्ञापक प्रमाण नहीं हो सकता । (प्र.) नीलादि आकारों के समूह (प्रवाह) का प्रत्येक आकार परस्पर भिन्न होते हुए भी सभी एक-से हैं । इस सादृश्य के ज्ञान से इस 'संवाद' का निश्चय होगा, अर्थात् यह निश्चय होगा कि अत्यन्त सदृश ये सभी ज्ञान अभ्रान्त नीलाकारादि से अभिन्न ज्ञानसमूह के हैं । इस संवाद निश्चय से सभी आकारों में अभ्रान्तत्व का निश्चय होगा । (उ.) (इस पक्ष के खण्डन में प्रथम युक्ति यह है कि) (१) प्रत्येक आकार अपने विलक्षण ज्ञान से ही गृहीत होता है, अतः आकार के समूहों में परस्पर सादृश्य का ग्रहण ही असम्भव है । (२) यह बात भी नहीं कि सभी आकार सदृश ही उत्पन्न हों; क्योंकि कहीं- कहीं एक ही वस्तु विभिन्न आकारों से भी गृहीत होती है । (३) यह कहना भी सम्भव नहीं है कि चूँकि नीलादि आकार 'अर्थ' से उत्पन्न होते हैं, अतः वे अभ्रान्त हैं; क्योंकि अर्थनिश्चय के बिना अर्थजन्यत्व का निश्चय सम्भव नहीं है । यदि अर्थ का निश्चय किसी और ही प्रमाण से मान लें तो फिर आकार की कल्पना व्यर्थ हो जाती है । अगर आकार के ही अभ्रान्त ज्ञान से अर्थ का निश्चय मानें तो अन्योन्याश्रय दोष अनिवार्य होगा; क्योंकि आकार के अभ्रान्त ज्ञान से अर्थ की सिद्धि होगी एवं इसकी सिद्धि हो जाने पर आकार ज्ञान के अर्थजन्य होने के कारण उसमें अभ्रान्तत्व की सिद्धि होगी । (यदि आकार की अबाधित प्रतीति को ही नालीदि अर्थों का साधक मानें तो फिर) वह जिस प्रकार नीलादि आकार के विज्ञानों में है, वैसे ही संख्याविज्ञान के आकार में भी है ही । (एवं बौद्धों के मत से) नीलादि आकारों के बाधित न होने से भी उनकी सत्ता नहीं सिद्ध की जा सकती; क्योंकि नीलादि आकारों की वस्तुतः सत्ता न रहने के कारण नीलादि आकारों के बाधित न होने की प्रतीति ही असम्भव है । अतः सभी जगह केवल आकार का ही ज्ञान होता है, उन ज्ञानों में अगर एक बिना अर्थ के ही होता है, तो और ज्ञान भी बिना अर्थ के ही हो सकते हैं । संख्या के सम्बन्ध में इस प्रकार के आक्षेपों से नीलादि आकारों की सिद्धि भी सङ्कट में पड़ जायगी । (प्र.) यदि

२७० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या- प्रशस्तपादभाष्यम् सा पुनरेकद्रव्या चानेकद्रव्या च । तत्रैकद्रव्यायाः सलिलादिपरमाणु- रूपादीनामिव नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः । अनेकद्रव्या तु द्वित्वादिका परार्द्धान्ता । वह एकद्रव्य (एकद्रव्य मात्र में रहनेवाली) एवं अनेकद्रव्य (अनेक द्रव्यों में ही रहने वाली) भेद से दो प्रकार की है । इनमें एकद्रव्या संख्या के नित्यत्व और अनित्यत्व का निर्णय परमाणुरूप जल एवं कार्यरूप जल के रूपादि की तरह है । अनेकद्रव्या संख्या द्वित्व से लेकर परार्द्ध पर्यन्त है । न्यायकन्दली असति बाह्ये वस्तुनि स्वसन्तानमात्राधीनजन्मनो वासनापरिपाकस्य कादाचित्कत्यानु- पपत्तौ तन्मात्रहेतोर्नीलाद्याकारस्य कादाचित्कत्वासम्भवान्नीलादिकल्पनेति चेत्, एकद्वित्या- कारस्यापि बाह्यवस्त्वननुरोधिनो न कादाचित्कत्वमुपपद्यत इति सङ्ख्यापि कल्पनीया, उपपत्तेरुभयत्राप्यविशेषात् । यदपि द्रव्यव्यतिरिक्ता सङ्ख्या न विद्यते, भेदेनाग्रहणादित्युक्तम्, तदप्ययुक्तम्, परस्पर- प्रत्यासन्नानां वृक्षाणां दूरादेकत्वाद्यग्रहणेऽपि स्वरूपग्रहणस्य सम्भवात् । एवं रूपादि- व्यतिरेकोऽपि व्याख्यातः, दूरे रूपस्याग्रहणेऽपि द्रव्यप्रत्ययदर्शनात् । एवं सिद्धे सङ्ख्यास्वरूपे तस्या भेदं प्रतिपादयति-सा पुनरेकद्रव्या बाह्य वस्तुओं की सत्ता बिलकुल ही न मानी जाय तो अपने समुदाय मात्र से उत्पन्न होनेवाली वासना का परिपाक कभी होता है कभी नहीं, यह 'कादाचित्कत्व' असम्भव हो जायगा । एवं केवल वासना के परिपाक से ही उत्पन्न होनेवाले नीलादि का कादाचित्कत्व भी अनुपपन्न हो जायगा । अतः नीलादि की कल्पना करते हैं । (उ.) उसी प्रकार नीलादि आकारों की प्रतीति की तरह एकाकार, द्वित्वाकार, त्रित्वाकारादि प्रतीतियों की भी कादाचित्कत्व की अनुपपत्ति के कारण समान युक्ति से संख्या की कल्पना भी आवश्यक है । कोई कहते हैं कि (प्र.) द्रव्य की प्रतीति को छोड़कर अलग से संख्या की कोई प्रतीति नहीं होती, अतः द्रव्य से भिन्न संख्या नाम की कोई वस्तु नहीं है । (उ.) किन्तु यह कहना भी असत्य है; क्योंकि आपस में सटे हुए वृक्षों में संख्या का भान न होने पर भी उनके स्वरूपों (द्रव्यों) का ग्रहण होता है¹ । इस प्रकार संख्या की सिद्धि हो जाने पर 'सा पुनः' इत्यादि से इसके भेदों का १. द्रव्य और संख्या अगर अभिन्न होती तो फिर टूटे हुए वृक्षों के स्वरूप का जहाँ ग्रहण होता है वहीं वृक्ष से अभिन्न संख्या का भी ग्रहण अवश्य ही होता ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २७१

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २७१ न्यायकन्दली चानेकद्रव्या चेति । एकं द्रव्यमाश्रयो यस्याः सा एकद्रव्या । अनेकं द्रव्यमाश्रयो यस्याः सा अनेकद्रव्या । 'च'शब्दावेकद्रव्यानेकद्रव्ययोरन्योन्यसमुच्चयं प्रदर्शयन्तौ प्रकारान्तराभावं कथयतः । तत्रैकद्रव्यानेकद्रव्ययोर्मध्य एकद्रव्यायाः सलिलादिपरमाणुरूपादीनामिव नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयो यथा सलिलपरमाणौ रूपरसस्पर्शा नित्यास्तथैकत्वसङ्ख्यापि । यथा च कार्यसलिलस्य रूपादयोऽनित्या आश्रयविनाशाद्विनश्यन्ति कारणगुणप्रक्रमेण च निष्पद्यन्ते, तथैकत्वसङ्ख्यापि । अनेकद्रव्या तु द्वित्वादिका परार्द्धान्ता । द्वित्वमादिर्यस्याः सा द्वित्वादिका, परार्द्धोऽन्तो यस्याः सा परार्द्धान्ता । यस्मिन्नियत्ताव्यवहारः समाप्यते स परार्द्धः । एकद्रव्य- वर्त्तिन्या एकत्वसङ्ख्यायाः सकाशाद् द्वित्वादेरनेकवृत्तित्वविशेषप्रतिपादनार्थः 'तु'शब्दः । निरूपण करते हैं । 'एकं द्रव्यमाश्रयो यस्याः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार एक द्रव्य में ही रहने वाली संख्या को 'एकद्रव्या' कहते हैं । 'अनेकद्रव्यमाश्रयो यस्याः' इस विग्रह के अनुसार अनेक द्रव्यों में ही रहनेवाली संख्या को 'अनेकद्रव्या' कहते हैं । दोनों ही 'च' शब्द से एक द्रव्य और अनेक द्रव्य इन दोनों के समुच्चय का बोध होता है एवं इन दोनों से तीसरी तरह की संख्या की सम्भावना का खण्डन भी होता है । 'तत्र' अर्थात् एकद्रव्या और अनेकद्रव्या इन दोनों प्रकार की संख्याओं में, एकद्रव्या संख्या का निर्णय (कार्यरूप) जलादि और परमाणुरूप जलादि की तरह समझना चाहिए । अर्थात् जिस प्रकार जलादि के परमाणुओं के रूप-रसादि नित्य हैं, वैसे ही उनमें रहनेवाली एकद्रव्या संख्या भी नित्य है । एवं जिस प्रकार कार्यरूप जलादि के रूप-रसादि अनित्य हैं, (अर्थात्) आश्रय के नाश से उनका नाश एवं कारणगुणक्रम से उत्पत्ति होती है, वैसे ही कार्यरूप जलादि में रहनेवाली एकत्व (एकद्रव्या) संख्या भी (आश्रय के नाश से) विनष्ट होती है एवं (कारणगुणक्रम से) उत्पन्न भी होती है । 'अनेकद्रव्या तु द्वित्वादिका परार्द्धान्ता' (इस वाक्य में प्रयुक्त) 'द्वित्वादिका' शब्द का अर्थ वह संख्या समूह है जिस समूह के पहले व्यक्ति का नाम द्वित्व है, क्योंकि 'द्वित्वादिका' इस समस्त वाक्य का विग्रह वाक्य 'द्वित्वमादिर्यस्याः' इस प्रकार का है । जिस संख्या (परम्परा) की समाप्ति परार्द्ध में हो वही (संख्यासमूह) 'परार्द्धान्त' शब्द का अर्थ है; क्योंकि 'परार्द्धान्ता' इस समस्त वाक्य का विग्रह वाक्य 'परार्द्धोऽन्तं यस्याः' इस प्रकार है । जहाँ संख्या के व्यवहार की समाप्ति हो उसी संख्या को 'परार्द्ध' कहते हैं । एकत्व संख्या केवल एक ही द्रव्य में रहती है, द्वित्वादि संख्यायें अनेक द्रव्यों में ही रहती हैं, अनेकद्रव्या संख्या में एकद्रव्या संख्या से इसी अन्तर को समझाने के लिए प्रकृत वाक्य में 'तु' शब्द है ।

२७२ न्यायाकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या- प्रशस्तपादभाष्यम् तस्याः खल्वेकत्वेभ्योऽनेकविषयबुद्धिसहितेभ्यो निष्पत्तिरपेक्षा- बुद्धिविनाशाद् विनाश इति। कथम् ? यदा बोद्धुश्चक्षुषा समानासमान- जातीययोर्द्रव्ययोः सन्निकर्षे सति तत्संयुक्तसमवेतसमवेतैकत्वसामान्यज्ञानो- त्पत्तावेकत्वसामान्यतत्सम्बन्धज्ञानेभ्य एकगुणयोरनेकविषयिण्येका अनेक एकत्व की बुद्धि एवं अनेक एकत्व इन सबों से इसकी उत्पत्ति होती है । (प्र.) कैसे ? (उ.) चक्षु के साथ सम्बद्ध उक्त दोनों द्रव्यों में से प्रत्येक में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली 'एक' संख्या में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली एकत्व जाति का ज्ञान होता है । इसके हो जाने पर एकत्व सामान्य एवं इसके (दोनों 'एक' संख्यारूप गुणों के साथ) सम्बन्ध एवं (इन संख्यारूप गुणों में) उस सामान्य का ज्ञान इन सबों से दोनों 'एक' संख्याओं में अनेक (एकसंख्या) विषयक एक बुद्धि उत्पन्न होती न्यायकन्दली तस्याः खल्वेकत्वेभ्योऽनेकविषयबुद्धिसहितेभ्यो निष्पत्तिरपेक्षाबुद्धिविनाशाद्धि नाशः । खल्वित्यवधारणे, तस्या एकत्वेभ्यो निष्पत्तिरेव, न त्वेकैकगुणसमुच्चय- मात्रत्वमित्यर्थः । एकत्वे चैकत्वानि चेति समासाश्रयणम्, अन्यथा द्वित्वोत्पत्तिकारणं न कथितं स्यात् । अनेकविषयबुद्धिसहितेभ्य इति । अनेकशब्द एको न भवतीति व्युत्पत्त्या द्वयोर्बहुषु च द्रष्टव्यः, अनेकेषु विषयेषु या बुद्धिरुत्तत्सहितेभ्य इति । एतदेव प्रश्नपूर्वकं प्रतिपादयति कथमित्यादिना । यदा यस्मिन् काले बोद्धुरात्मनश्चक्षुषा समानजातीययोर्घटयो- 'तस्याः खल्वेकत्वेभ्योऽनेकविषयबुद्धिसहितेभ्यो निष्पत्तिरपेक्षाबुद्धिविनाशाद्विनाशः' (इस वाक्य में प्रयुक्त) 'खलु' शब्द का प्रयोग इस अवधारण के लिए हुआ है कि अनेकद्रव्या संख्या अनेक एकत्व संख्याओं का समूहमात्र नहीं है; किन्तु अनेक एकत्वों से उत्पन्न होनेवाली (एकत्व से भिन्न) अनेकद्रव्या संख्या (स्वतन्त्र) ही है । 'एकत्वेभ्यः' इस पद की निष्पत्ति के लिए 'एकत्वे च एकत्वानि च' इसी समास का अवलम्बन करना चाहिए, ऐसा न करने पर (एकत्वञ्च एकत्वञ्च एकत्वञ्च एकत्वानि' ऐसा समास मानने पर) 'एकत्वेभ्यः' इस पद से द्वित्व के कारणीभूत दो एकत्वों में द्वित्व की कारणता नहीं कही जायगी । 'अनेकविषयबुद्धिसहितेभ्यः' इस वाक्य में प्रयुक्त 'अनेक' शब्द से दो एवं उससे आगे की सभी संख्याओं का बोध होता है; क्योंकि 'अनेक' शब्द की 'एको न भवति' इस प्रकार की व्युत्पत्ति है । अनेक विषयों में जो (अनेक एकत्वों की) बुद्धि है, उससे (द्वित्वादि) अनेक- द्रव्या संख्याओं की उत्पत्ति होती है । 'कथम्' इस पद के द्वारा प्रश्न कर इसी विषय को समझाने का उपक्रम करते हैं । 'यदा' अर्थात् जिस समय 'बोद्धुः' अर्थात्