BharatKosha
Back to the archive

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५७१

Page 536Permalink

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५७१ न्यायकदली प्रत्यक्षप्रामाण्याभ्युपगमेन प्रवर्त्तमानं प्रतिषेधानुमानं तद्विपरीतवृत्ति तेनैव बाध्यते, विषयापहारात् । को विषयस्यापहारः ? तद्विपरीतार्थप्रवेदनम्, तस्मिन् सत्यनुमानस्य किं भवति ? उत्पत्त्यभावः, प्रथमप्रवृत्तेनाबाधितविषयप्रत्यक्षेण वह्नेरुष्णत्वे प्रतिपादिते तत्प्रतीत्यवरुद्धे च तस्यानुष्णत्वप्रतीतिर्न भवति । हेतोरप्ययमेव बाधो यदयमनुष्णत्वप्रतिपादनाय प्रयुक्तः, तत्प्रतीतिं न करोति, प्रत्यक्षविरोधात् । यथोक्तम्- वैपरीत्यपरिच्छेदे नावकाशः परस्य तु । मूले तस्य ह्यनुत्पन्ने पूर्वेण विषयो हतः ॥ इति । बाधाविनाभावयोर्विरोधादविनाभूतस्य बाधानुपपत्तिरिति चेत् ? यदि त्रैरूप्यमविनाभावोऽभिमतः ? तदास्त्येवाविनाभूतस्य बाधः, यथानुष्णोऽग्निः लिए उस प्रत्यक्ष का प्रामाण्य स्वीकार कर ही लिया जाता है, अतः उक्त स्वीकृति से प्रवृत्त होनेवाले वह्नि में उष्णता के प्रतिषेध का अनुमान उस प्रत्यक्ष से ही बाधित हो जाता है, जो प्रकृत प्रतिषेध के विरोधी उष्णता का ज्ञापक है; क्योंकि इस प्रत्यक्ष के द्वारा अनुमान के विषयरूपी उष्णता के प्रतिषेध का अपहरण कर लिया जाता है । (प्र.) विषय का यह 'अपहरण' क्या वस्तु है ? (उ.) प्रकृत अनुमान के द्वारा ज्ञाप्य विषय के विरोधी विषय का ज्ञापन ही प्रकृत में विषय का अपहरण है । (प्र.) इस विषयापहरण से अनुमान के ऊपर क्या प्रभाव पड़ता है ? (उ.) यही कि उसकी उत्पत्ति ही नहीं हो पाती; किन्तु उष्णता के बोधक प्रत्यक्ष की प्रवृत्ति अनुष्णत्व के अनुमान से पहले होती है, उसका विषय उष्णत्व किसी दूसरे प्रमाण से बाधित भी नहीं है, अतः इस प्रत्यक्ष के द्वारा जब वह्नि में उष्णता की प्रतिपत्ति हो जाती है, उसके बाद उस प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात वह्नि में अनुष्णता की प्रतीति नहीं होती है । हेतु में बाध की प्रतीति का भी यही रहस्य है कि वह्नि में अनुष्णत्व को समझाने के लिए प्रयुक्त होने पर भी इस प्रत्यक्षविरोध के कारण वह्नि में उष्णता की प्रतीति का उत्पादन नहीं कर सकता । जैसा कहा गया है कि विपरीत (अभाव) विषयक निश्चय के उत्पन्न हो जाने पर उसके विरोधी के ज्ञान का अवकाश नहीं रह जाता, क्योंकि उसके उत्पन्न होने के पहले ही पहले के प्रमाण से उसके विषय का अपहरण हो जाता है । (प्र.) साध्य की व्याप्ति और साध्य का अभाव ये दोनों परस्पर विरोधी हैं, अतः साध्य का व्याप्य हेतु कभी बाधित नहीं हो सकता । (उ.) व्याप्ति या अविनाभाव को यदि हेतु में (पक्षसत्त्व, सपक्षसत्त्व और विपक्षासत्त्व इन) तीनों रूपों का रहना समझें, तो फिर इन तीनों रूपों के रहने पर भी हेतु में 'बाध' रह ही सकता है; क्योंकि 'अग्निरनुष्णः कृतकत्वात्' इस स्थल में कृतकत्व रूप हेतु में उक्त तीनों रूप हैं ।

पादनम् ? योग्यताविरहश्च दूषणमभिमतम् ? तदा कर्मकरणयोरप्यस्ति दोषः ।

Page 537Permalink

५७२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव- प्रशस्तपादभाष्यम् विरोधी, घनमम्बरमित्यनुमानविरोधी, ब्राह्मणेन सुरा पेयेत्यागम- अनुमानविरोधी प्रतिज्ञावाक्य का उदाहरण है— 'घनमम्बरम्' । 'ब्राह्मणेन सुरा पेया' यह वाक्य आगमप्रमाण से विरुद्ध है; वैशेषिकशास्त्र को मानने- न्यायकन्दली कृतकत्वादित्यस्यैव । अबाधितविषयत्वे सति त्रैरूप्यमविनाभाव इत्यभिप्रायेणोच्यते— अविनाभूतस्य नास्ति बाधेति, तदोमित्युच्यते; किन्त्वबाधितविषयत्वमेव रूपं कथितुं प्रत्यक्षबाधविरोधग्रहणं कृतम् । प्रत्यक्षविरोधः किं पक्षस्य दोषः ? किं वा हेतोः ? न पक्षस्य, धर्मिणस्तदवस्थ्यात् । नापि हेतोः, स्वविषये तस्य सामर्थ्यात्, विषयान्तरे सर्वस्यैवासामर्थ्यात्; किन्तु प्रतिपा- दयितुरिदं दूषणम्, योऽविषये साधनं प्रयुङ्क्ते । यदि प्रतिज्ञातार्थप्रतीतियोग्यताविरहस्तत्प्रति- पादनम् ? योग्यताविरहश्च दूषणमभिमतम् ? तदा कर्मकरणयोरप्यस्ति दोषः । घनमम्बरमित्यनुमानविरोधी । येन प्रमाणेनाकाशमवगतं तेनैवाकाशस्य नित्यत्वं निरवय- वत्वं च प्रतिपादितम्, अतो निबिडावयवमम्बरमिति प्रतिज्ञा धर्मिग्राहकानुमानविरुद्धा । (क्योंकि कृतकत्व वह्नि में है और वायु में भी है एवं आकाश में नहीं है) और अग्निरूप पक्ष में अनुष्णत्वरूप साध्य का अभाव स्वरूप बाध भी है । यदि जो हेतु बाधित न होकर पक्षसत्त्वादि तीनों रूपों से युक्त हो उस हेतु को ही साध्य का व्याप्य या अविनाभूत मानकर यह कहते हों कि व्याप्ति से युक्त हेतु कभी बाधित नहीं हो सकता, तो हम इसके उत्तर में 'हाँ' कहेंगे (अर्थात् इस प्रकार का हेतु कभी बाधित नहीं होता); किन्तु व्याप्ति के लिए जिस अबाधितत्व या अबाधितविषयत्व को आप प्रयोजक मानते हैं, हेतु में उस अबाधितविषयत्व की सत्ता की आवश्यकता को समझाने के लिए ही प्रतिज्ञा-लक्षण में 'अविरोधि' पद का उपादान किया गया है । यह 'प्रत्यक्ष विरोध' किसका दोष है ? पक्ष का या हेतु का ? पक्ष का दोष तो वह हो नहीं सकता; क्योंकि पक्ष तो ज्यों का त्यों रहता है । हेतु का भी वह दोष नहीं हो सकता; क्योंकि अपने (व्यापक) साध्य रूप विषय के ज्ञापन की क्षमता तो उसमें है ही ? दूसरे हेतु के साध्य को समझाने की क्षमता तो किसी भी हेतु में नहीं होती । अतः यह प्रत्यक्षादि विरोध रूप दोष वस्तुतः प्रयोग करनेवाले पुरुष का है, जो ऐसे साध्य के ज्ञापन के लिए ऐसे हेतु का प्रयोग करता है, जिस साध्य के ज्ञापन की क्षमता जिस हेतु में नहीं होती है । 'घनमम्बरमित्यनुमानविरोधी' जिस प्रमाण से आकाश के अस्तित्व का ज्ञान होता है, उसी प्रमाण से उसमें नित्यत्व एवं अवयवशून्यत्व भी निश्चित है, अतः 'आकाश के अवयव घन हैं, अर्थात् परस्पर निविड़ संयोग से युक्त हैं' यह प्रतिज्ञा आकाशरूप धर्मी के ज्ञापक अनुमान के ही विरुद्ध है ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५७३

Page 538Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५७३ प्रशस्तपादभाष्यम् विरोधी, वैशेषिकस्य सत्कार्यमिति ब्रुवतः स्वशास्त्रविरोधी, न शब्दोऽर्थ- प्रत्यायक इति स्ववचनविरोधी । वाले यदि 'सत्कार्यम्' इस प्रतिज्ञावाक्य का प्रयोग करें तो वह स्वशास्त्र- विरोधी प्रतिज्ञा होगी । यदि कोई इस प्रतिज्ञा वाक्य का प्रयोग करे कि 'शब्दो नार्थप्रत्यायकः', तो यह स्ववचनविरोधी प्रतिज्ञा होगी । न्यायकन्दली ब्राह्मणेन सुरा पेयेत्यागमविरोधी । ब्राह्मणेन सुरा पीता पापसाधनं न भवतीति प्रतिज्ञार्थः । अत्र क्षीरमुदाहरणम्, क्षीरस्य च पापसाधनत्वाभावः श्रुतिस्मृत्यागमैकसम- धिगम्यः । येनैवागमेन क्षीरपानस्य पापसाधनत्वाभावः प्रतिपादितः, तेनैव सुरापानस्य पापसाधनत्वं प्रतिपादितमिति ब्राह्मणेन सुरा पेयेति प्रतिज्ञाया दृष्टान्तग्राहकप्रमाणविरोधः । वैशेषिकस्यापि प्रागुत्पत्तेः सत्कार्यमिति ब्रुवतः स्वशास्त्रविरोधी । वैशेषिको हि वैशेषिकशास्त्रप्रामाण्याभ्युपगमेन वादादिषु प्रवर्तते । तस्य 'प्रागुत्पादात् सत् कार्यम्' इति ब्रुवतः प्रतिज्ञायाः शास्त्रेण विरोधः, वैशेषिकशास्त्रे 'असदुत्पद्यते' इति प्रतिपादनात् । शब्दो नार्थप्रत्यायक इति स्ववचनविरोधी । यदि शब्दस्यार्थप्रत्यायकत्वं नास्ति, तदा 'शब्दो नार्थं प्रतिपादयति' इत्यस्यार्थस्य प्रतिपादनाय शब्दप्रयोगोऽनुपपन्नः । 'ब्राह्मणेन सुरा पेयेत्यागमविरोधी' । 'ब्राह्मणेन सुरा पेया' इस प्रतिज्ञा वाक्य का यह अर्थ है कि ब्राह्मण के द्वारा पी गयी सुरा (मद्य) पाप का कारण नहीं होती । इसका उदाहरण है- (दूध (अर्थात् जिस प्रकार ब्राह्मण से पान किया गया दूध पाप का कारण नहीं है, उसी प्रकार ब्राह्मण से पान किया गया मद्य भी पाप का कारण नहीं है) । 'दूध स्वपान के द्वारा पाप का साधन नहीं है' यह केवल श्रुति एवं स्मृति रूप 'आगम प्रमाण' से ही समझा जा सकता है । आगम के द्वारा ही 'दूध का पीना पाप का कारण नहीं है' यह कहा गया है एवं आगम (शब्द) प्रमाण से ही यह निश्चित है कि 'सुरापान पाप का साधन है'। इस प्रकार 'ब्राह्मण को सुरापान करना चाहिए' यह प्रतिज्ञा दुग्धपान रूप अपने दृष्टान्त के ज्ञापक प्रमाण का विरोधी है । 'वैशेषिकस्यापि प्रागुत्पत्तेः सत्कार्यमिति ब्रुवतः स्वशास्त्रविरोधी' वैशेषिकदर्शन के अनुयायी वैशेषिकदर्शनरूप शास्त्र को प्रमाण मानकर ही वादादि कथाओं में प्रवृत्त होते हैं । वे यदि इस प्रतिज्ञावाक्य का प्रयोग करें कि 'कार्य अपनी उत्पत्ति के पहले भी विद्यमान ही रहता है' तो उनकी यह प्रतिज्ञा वैशेषिकदर्शनरूप अपने शास्त्र के ही विरुद्ध होगी; क्योंकि वैशेषिकदर्शन में यह प्रतिपादन किया गया है कि 'पहले से अविद्यमान कार्य की ही उत्पत्ति होती है' । 'शब्दो नार्थप्रत्यायक इति स्ववचनविरोधी' शब्द से यदि अर्थ का बोध ही नहीं होता है, तो फिर 'शब्द अर्थबोध का कारण नहीं है' इस अर्थ को समझाने के

Page 539Permalink

५७४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव- न्यायकन्दली अथैतदर्थः शब्दः प्रयुज्यते ? तदभ्युपगतं शब्दस्यार्थप्रतिपादकत्वमिति प्रतिज्ञायाः स्ववचनविरोधः । प्रत्यक्षानावगतवस्तुतत्त्वान्वाख्यानं शास्त्रम् । तद्विरोधः प्रत्यक्षानुमानविरोध एव, तथा तद्भावभावित्वानुमानसंसमधिगम्यं शब्दस्यार्थप्रत्ययाकत्वं प्रतिषेधयतोऽनुमानविरुद्धैव प्रतिज्ञा, कस्मात् स्वशास्त्रवचनविरोधयोः पृथगभिधानम् ? अत्रोच्यते-प्रमाणाभासमूलमपि शास्त्रं भवति शाक्यादीनाम्, अत्र बौद्धस्य 'सर्वमक्षणिकम्' इति प्रतिजानतः स्वशास्त्रविरोध एव, न प्रमाणविरोधः । स्ववचनम् (अपि) कदाचिदप्रमाणमूलमपि स्यात्, अतस्तद्विरोधो न प्रमाणविरोधः, किन्तु स्ववचनविरोध एव । लिए 'शब्दो नार्थप्रत्यायकः' इस वाक्य का भी प्रयोग करना उचित नहीं होगा । यदि उक्त अर्थ को समझाने के लिए उक्त वाक्य का प्रयोग वादी करते हैं, तो फिर वादी शब्द को अर्थबोध का कारण स्वयं मान ही लेते हैं । इस प्रकार उक्त प्रतिज्ञा स्ववचन-विरोधी है (क्योंकि वादी अपने अभीष्ट अर्थ को समझाने के लिए शब्दों का प्रयोग भी करें और शब्द को अर्थप्रत्यायक भी न मानें, ये दोनों बातें नहीं हो सकतीं) । (प्र.) प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा निर्णीत तत्त्व का ही 'अन्वाख्यान' अर्थात् पश्चात् कथन तो 'शास्त्र' है, अतः शास्त्र का विरोध वस्तुतः प्रत्यक्ष और अनुमान का ही विरोध है । एवं शब्द में अर्थबोध की कारणता इस अनुमान के द्वारा ही निश्चित होती है कि "चूँकि शब्दप्रयोग के 'भाव' अर्थात् सत्ता के कारण ही अर्थबोध की सत्ता देखी जाती है, अतः 'शब्द ही अर्थ का बोधक है' सुतरां शब्द में अर्थबोध का निषेध करनेवाले पुरुष की 'शब्दो नार्थप्रत्यायकः' यह प्रतिज्ञा भी वस्तुतः अनुमान के ही विरुद्ध है" । (इस प्रकार स्वशास्त्रविरोध और स्ववचन- विरोध ये दोनों ही प्रत्यक्षविरोध या अनुमानविरोध में ही अन्तर्भूत हो जाते हैं) उनका अलग से परिगणन क्यों ? (उ.) इस आक्षेप के उत्तर में हम लोग कहते हैं कि सभी शास्त्र प्रमाणमूलक ही नहीं होते, ऐसे भी शास्त्र हैं जिनका अनुमोदन प्रमाण से नहीं किया जा सकता, जैसे कि बौद्धों के आगम हैं । अतः बौद्ध यदि 'सभी वस्तुयें अक्षणिक हैं' इस आशय के प्रतिज्ञावाक्य का प्रयोग करें तो वह प्रतिज्ञा प्रत्यक्ष या अनुमान प्रमाण के विरुद्ध नहीं होगी; किन्तु उसमें 'स्वशास्त्र- विरोध' ही होगा । इसी प्रकार स्ववचन भी कभी-कभी अप्रमाणमूलक होता है, ऐसे स्थलों की प्रतिज्ञा में प्रमाणविरोध तो होगा नहीं, स्ववचन-विरोध ही होगा (अतः स्वशास्त्रविरोध और स्ववचनविरोध का अलग से उल्लेख किया गया है) ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५७५

Page 540Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५७५ प्रशस्तपादभाष्यम् लिङ्गवचनमपदेशः । यदनुमेयेन सहचरितं तत्समान- जातीये सर्वत्र सामान्येन प्रसिद्धं तद्विपरीते च सर्वस्मिन्नसदेव तल्लिङ्ग- हेतुबोधक वाक्य ही 'अपदेश' है । (विशदार्थ) जो अनुमेय (पक्ष) में साध्य के साथ रहे एवं सभी तत्सजातीयों में अर्थात् सभी दृष्टान्तों में सामान्य रूप से (साध्य के साथ) ज्ञात हो एवं उसके विपरीत अर्थात् सभी विपक्षों में जो कदापि न रहे, उसे 'लिङ्ग' अर्थात् हेतु कहा गया है, न्यायकन्दली लिङ्गवचनमपदेशः । अस्यार्थं कथयति-यदनुमेयेनेत्यादिना । तत्सुगमम् । उदाहरणमाह-क्रियावत्त्वाद् गुणवत्त्वाच्चेति । द्रव्यं वायुरिति प्रतिज्ञायाः क्रियावत्त्वादिति क्रियावत्त्वस्य लिङ्गस्य वचनमपदेशः, तस्यामेव प्रतिज्ञायां गुणवत्त्वस्य लिङ्गस्य गुणवत्त्वा- दिति वचनमपदेशः, तयोरुपन्यासः सपक्षैकदेशवृत्तेः सपक्षव्यापकस्य हेतुत्वप्रदर्शनार्थः । यदुक्तं लिङ्गलक्षणं तत् क्रियावत्त्वस्य गुणवत्त्वस्य चास्तीत्याह-तथा च तदिति । तद् गुणवत्त्वमनुमेयेऽस्ति तत्समानजातीये सपक्षे द्रव्ये सर्वस्मिन्नस्ति, असर्वस्मिन् सपक्षैकदेशे मूर्त्तद्रव्यमात्रे क्रियावत्त्वमस्ति, उभयमप्येतत् क्रियावत्त्वं गुणवत्त्वं चाद्रव्ये विपक्षे 'यदनुमेयेन' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा 'लिङ्गवचनमपदेशः' इस वाक्य का अर्थ स्वयं कहते हैं । इस (स्वपदवर्णनरूप भाष्य) का अर्थ सुगम है । क्रियावत्त्वाद् गुणवत्त्वाच्च' इस वाक्य के द्वारा 'अपदेश' रूप दूसरे अवयव का उदाहरण दिखलाया गया है । (प्रतिज्ञा ग्रन्थ में उल्लिखित) 'द्रव्यं वायुः' इस प्रतिज्ञा के ही 'क्रियावत्त्व' रूप हेतु का प्रतिपादक 'क्रियावत्त्वात्' इस वाक्य का प्रयोग ही प्रकृत में 'अपदेश' है । उसी प्रतिज्ञा में 'गुणवत्त्वात्' इस वाक्य के द्वारा गुणवत्त्वरूप लिङ्ग का जो निर्देश किया गया है वह वचन भी 'अपदेश' है । इन दोनों हेतुओं का निर्देश इस विशेष को समझाने के लिए किया गया है कि कुछ ही सपक्षों में रहनेवाला भी 'हेतु' है (जैसे कि क्रियावत्त्वरूप हेतु पृथिवी प्रभृति कुछ सपक्षों में ही है सभी सपक्षों में नहीं; क्योंकि आकाशादि सपक्षों में क्रियावत्त्व नहीं है) एवं कुछ ऐसे भी हेतु होते हैं जो सभी सपक्षों में रहते हैं, जैसे कि प्रकृत 'गुणवत्त्व' हेतु (क्योंकि वह सभी द्रव्यों में है) । 'तथा च तदनुमेयेऽस्ति' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा कहते हैं कि लिङ्ग के जितने भी लक्षण कहे गये हैं, वे सभी क्रियावत्त्व और गुणवत्त्व रूप दोनों हेतुओं में हैं । 'तत्' अर्थात् गुणवत्त्व और क्रियावत्त्वरूप दोनों हेतु अनुमेय में अर्थात् वायुरूप पक्ष में हैं । इनमें गुणवत्त्व हेतु 'सर्वस्मिन्' अर्थात् द्रव्य- रूप सभी सपक्षों में है। और 'क्रियावत्त्व' रूप हेतु 'असर्वस्मिन्' अर्थात् 'सपक्षैकदेश' में अर्थात् मूर्त्तद्रव्यरूप कुछ ही सपक्षों में है; किन्तु गुणवत्त्व और क्रियावत्त्वरूप दोनों हेतु 'अद्रव्य' अर्थात् विपक्षों में द्रव्य से भिन्न सभी पदार्थों में कभी भी नहीं

Page 541Permalink

५७६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास- प्रशस्तपादभाष्यम् युक्तम्, तस्य वचनमपदेशः । यथा क्रियावत्त्वाद् गुणवत्त्वाच्चेति, तथा च तदनुमेयेऽस्ति तत्समानजातीये च सर्वस्मिन् गुणवत्त्वमसर्वस्मिन् क्रियावत्त्वम् । उभयमप्येतदद्रव्ये नास्त्येव । तस्मात् तस्य वचनमपदेश इति सिद्धम् । एतेनासिद्धविरुद्धसन्दिग्धवानध्यवसितवचनानामनपदेशत्वमुक्तं भवति । इस प्रकार के हेतु का प्रतिपादक वाक्य ही 'अपदेश' है । जैसे कि ('द्रव्यं वायुः' इस प्रतिज्ञा के उपयुक्त) 'क्रियावत्त्वाद् गुणवत्त्वाच्च' ये वाक्य । इनमें गुणवत्त्व हेतु तो वायुरूप द्रव्य में भी है एवं और सभी द्रव्यों में है । क्रियावत्त्व हेतु वायु में रहने पर भी (एवं सभी द्रव्यों में न रहने पर भी) मूर्त्तद्रव्यों में तो है ही; किन्तु ये दोनों ही विपक्षीभूत सभी अद्रव्य पदार्थों में नहीं हैं, अतः इससे सिद्ध होता है कि चूँकि ये दोनों ही हेतु के उक्त लक्षणों से युक्त हैं, अतः इनके बोधक उक्त वाक्य 'अपदेश' हैं । इससे (अर्थात् हेतु के अनुमेयसम्बद्धत्वादि लक्षणों के कहने से) १. असिद्ध, २. विरुद्ध, ३. सन्दिग्ध, ४. अनध्यवसित (हेत्वाभासों में) अनपदेशत्व अर्थात् हेत्वाभासत्व कथित हो जाता है । इनमें १. उभयासिद्ध, न्यायकन्दली नास्त्येव, तस्योभयस्य वचनं क्रियावत्त्वाद् गुणवत्त्वादित्येवं रूपमपदेश इति हेतुरिति सिद्धं व्यवस्थितं निर्दोषत्वात् । एतेन अपदेशलक्षणकथनेन अर्थादसिद्धविरुद्धसन्दिग्धवानध्यवसितवचनानामन- पदेशत्वमुक्तं भवति । अनुमेयेन सहचरितमित्यनेनासिद्धवचनस्यानपदेशत्व- हैं । अतः इससे सिद्ध होता है कि इन दोनों के बोधक 'क्रियावत्त्वात्' और 'गुणवत्त्वात्' इस आकार के दोनों वाक्य 'अपदेश' हैं, अर्थात् हेतुरूप अवयव हैं, क्योंकि इस निर्णय में कोई दोष नहीं है । 'एतेन' अर्थात् अपदेश के 'अनुमेयेन सहचरितम्' इत्यादि लक्षण के कहने से ही असिद्धवचन, विरुद्धवचन, सन्दिग्धवचन और अनध्यवसितवचनों में 'अनपदेशत्व' अर्थात् हेत्वाभासत्व का भी अर्थतः कथन हो जाता है। इस प्रसङ्ग में ऐसा विभाग समझना चाहिए कि हेतु के लक्षण में प्रयुक्त 'अनुमेयेन सहचरितम्' इस पद से 'असिद्धवचन' में हेत्वाभासत्व का आक्षेप होता है । एवं 'तत्समानजातीये च नास्ति' इस वाक्य

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५७७

Page 542Permalink

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५७७ प्रशस्तपादभाष्यम् तत्रासिद्धश्चतुर्विधः- उभयासिद्धः, अन्यतरासिद्धः, तद्भावासिद्धः, अनुमेयासिद्धश्चेति । तत्रोभयासिद्ध उभयोर्वादिप्रतिवादिनोःसिद्धः, यथाऽनित्यः शब्दः, सावयवत्वादिति । अन्यतरासिद्धो यथा- २. अन्यतरासिद्ध, ३. तद्भावासिद्ध और ४. अनुमेयासिद्ध भेद से 'असिद्ध' चार प्रकार के हैं । इनमें जो हेतुवादी और प्रतिवादी दोनों में से किसी के द्वारा पक्षादि में सिद्ध न हो उसे 'उभयासिद्ध' हेत्वाभास कहते हैं । जैसे कि शब्द में अनित्यत्व के साधन के लिए प्रयुक्त 'सावयवत्वात्' इस वाक्य से बोध्य सावयवत्व हेतु (उभयासिद्ध हेत्वाभास) है । शब्द में अनित्यत्व के साधन के लिए ही यदि कार्यत्व हेतु का कोई प्रयोग करे तो वह 'अन्यतरासिद्ध' हेत्वाभास होगा; क्योंकि वादी (वैशेषिक) ही शब्द को कार्य मानते हैं । प्रतिवादी (मीमांसक) उसे कार्य नहीं मानते । न्यायकन्दली मुक्तम् । तत्समानजातीये च प्रसिद्धमित्यनेन विरुद्धानध्यवसितवचनयोरनपदेशत्वम् । तद्विपरीते नास्त्येवेत्यनेन सन्दिग्धवचनस्यानपदेशत्वमिति विवेकः । एषामसिद्धविरुद्धसन्दिग्धानध्यवसितानां मध्ये असिद्धं कथयति- तत्रासिद्धश्चतुर्विध उभयासिद्ध इत्यादि । तत्रोभयासिद्धः - उभयोर्वादिप्रतिवादिनोरसिद्धः, यथाऽनित्यः शब्दः, सावयवत्वादिति शब्दे सावयवत्वं न वादिनो नापि प्रतिवादिनः सिद्धमित्युभयासिद्धः । के द्वारा 'विरुद्धवचन' और 'अनध्यवसितवचन' इन दोनों का हेत्वाभास व्यञ्जित होता है । एवं 'तद्विपरीते च नास्त्येव' इस वाक्य के द्वारा 'सन्दिग्धवचन' की हेत्वाभासता ध्वनित होती है । 'तत्रासिद्धश्चतुर्विधः' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इन असिद्ध, विरुद्ध, सन्दिग्ध और अनध्यवसितों में से असिद्ध नाम के हेत्वाभास का विवरण देते हैं । इनमें वादी और प्रतिवादी ये दोनों ही जिस हेतु की सत्ता पक्ष में न मानते हों, वह हेतु 'उभयासिद्ध' नाम का हेत्वाभास है । जैसे कि 'शब्दोऽनित्यः सावयवत्वात्' इस अनुमान का सावयवत्व हेतु उभयासिद्ध हेत्वाभास है । इस अनुमान के प्रयोग करनेवाले (नैयायिकादि) हैं वादी, वे भी शब्द को सावयव नहीं मानते एवं शब्द को नित्य माननेवाले मीमांसक हैं प्रतिवादी, वे भी शब्द को द्रव्य मानते हुए भी सावयव नहीं मानते, अतः उक्त सावयवत्व हेतु 'उभयासिद्ध' हेत्वाभास है ।

Page 543Permalink

५७८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास- प्रशस्तपादभाष्यम् अनित्यः शब्दः, कार्यत्वादिति । तद्भावासिद्धो यथा-धूमभावेनाग्न्यधिगतौ कर्तव्यायामुपन्यस्यमानो वाष्पो धूमभावेनासिद्ध इति । अनुमेयासिद्धो यथा-पार्थिवं द्रव्यं तमः, कृष्णरूपवत्त्वादिति । योह्यनुमेयेऽ- ३. जिस रूप (हेतुतावच्छेदक) से युक्त हेतु के द्वारा साध्य की अनुमिति अभिप्रेत हो, हेतु का वह रूप या धर्म जिस हेतु में न रहे वह हेतु तद्भावासिद्ध हेत्वाभास है । जैसे धूमत्व रूप से युक्त (धूम) से वह्नि की अनुमिति के अभिप्राय से यदि कोई वाष्प को धूम समझकर हेतु रूप से उपस्थित करे तो वह वाष्प हेतु धूमभाव से (अर्थात् धूमत्व रूप से) सिद्ध न होने के कारण (अर्थात् वाष्प में धूमत्व के न रहने के कारण) तद्भावासिद्ध हेत्वाभास होगा । ४. जहाँ अनुमेय अर्थात् अभीष्ट पक्ष ही असिद्ध रहे उसके लिए प्रयुक्त हेतु अनुमेयासिद्ध हेत्वाभास होगा । जैसे कि 'तमो द्रव्यं पार्थिवं कृष्णरूपवत्त्वात्' इस अनुमान का कृष्णरूप हेतु अनुमेयासिद्ध हेत्वा- न्यायकन्दली अन्यतरासिद्धो यथा कार्यत्वादनित्यः शब्द इति । यद्यपि शब्दे वस्तुतः कार्यत्व- मस्ति, तथापि विप्रतिपन्नस्य मीमांसकस्यासिद्धम् । अन्यतरासिद्धं साध्यं न साधयति यावन्न प्रसाध्यते । तद्भावासिद्धो यथा धूमभावेनाग्न्यधिगतौ कर्त्तव्यायामुपन्यस्यमानो वाष्पो धूम- भावेन धूमस्वरूपेणासिद्धस्तद्भावासिद्ध इत्युच्यते । अनुमेयासिद्धो यथा पार्थिवं तमः, कृष्णरूपवत्त्वात् । तमो नाम द्रव्यान्तरं 'अन्यतरासिद्ध' का उदाहरण है 'शब्दोऽनित्यः कार्यत्वात्' इस अनुमान का कार्यत्व हेतु । वैशेषिक नैयायिकादि के मत से शब्द में यद्यपि कार्यता सिद्ध है; किन्तु मीमांसक लोग शब्द को कार्य नहीं मानते, नित्य मानते हैं, अतः यह हेतु वादी और प्रतिवादी इन दोनों में से एक के द्वारा असिद्ध होने के कारण 'अन्यतरासिद्ध' नाम का हेत्वाभास है; क्योंकि अन्यतर के द्वारा भी असिद्ध हेतु तब तक साध्य का साधन नहीं कर सकता, जब तक कि वह दूसरे के द्वारा सिद्ध नहीं माना जाता । 'तद्भावासिद्ध' का उदाहरण वह वाष्प हेतु है, जो धूम समझकर वह्निसाधन के लिए प्रयुक्त होता है; क्योंकि 'तद्भाव' अर्थात् धूम का धूमत्वरूप धर्म वाष्प में सिद्ध नहीं है । अतः उक्त वाष्प हेतु 'तद्भावासिद्ध' हेत्वाभास है । 'अनुमेयासिद्ध' का उदाहरण है 'पार्थिवं तमः कृष्णरूपवत्त्वात्' इस अनुमान का 'कृष्ण- रूपवत्त्व' रूप हेतु । तम नाम का कोई द्रव्य ही नहीं है; क्योंकि कृष्णरूप (गुण) का तेज के अभाव में आरोपमात्र होता है (चूँकि पार्थिवत्वविशिष्ट तम रूप अनुमेय ही

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५७९

Page 544Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५७९ न्यायकन्दली नास्ति, आरोपितस्य कार्ण्यमात्रस्य प्रतीतेः, अतस्तमो द्रव्यं पार्थिवम्, कृष्णरूपवत्त्वादित्यनुमेयासिद्धमाश्रयासिद्धम् । अनुमेयमसिद्धं यस्येत्यसिद्धानुमेयमिति प्राप्तावाहिताग्न्यादित्वात्रिष्ठायाः पूर्वनिपातः । यथा हेतुरन्यतरासिद्ध उभयासिद्धो वा भवति, एवमाश्रयासिद्धिरप्युभयथा । यथा च हेतोर्वादिप्रतिवादिनोः प्रत्येकं समुदितयोर्वा अज्ञानात् सन्देहाद् विपर्ययाद् वा असिद्धो भवति, तथाश्रयोऽपि । यथा च हेतुः कश्चिद् वादिनोऽज्ञानादसन्दिग्धः प्रतिवादिनः सन्दिग्धासिद्ध इति । यद्वा वादिनोऽज्ञानासिद्धः, यदि वा प्रतिवादिनो विपर्ययासिद्धः । यद्वा वादिनः सन्देहासिद्धः प्रतिवादिनोऽज्ञानासिद्धः । यद्वा विपर्ययासिद्धो भवति वादिनः, उक्त स्थल में प्रसिद्ध नहीं है अतः ) 'पार्थिवं तमः कृष्णरूपवत्त्वात्' इस अनुमान का 'अनुमेय' अर्थात् आश्रय सिद्ध न होने के कारण इस अनुमान का (कृष्णरूपवत्त्व) हेतु अनुमेयासिद्ध या आश्रयासिद्ध हेत्वाभास है । यद्यपि 'अनुमेयमसिद्धं यस्य' इस व्युत्पत्ति के द्वारा निष्पन्न होने के कारण 'अनुमेयासिद्ध' न होकर 'असिद्धानुमेय' शब्द का प्रयोग उचित है, तथापि आहिताग्न्यादि गण में पठित होने के कारण 'अनुमेय' शब्द का पूर्वप्रयोग मानकर (असिद्धानुमेय न लिखकर) 'अनुमेयासिद्ध' शब्द लिखा गया है । जैसे कि हेतु वादी और प्रतिवादी दोनों से असिद्ध होने के कारण 'उभयासिद्ध' और उन दोनों में से केवल एक से असिद्ध होने के कारण 'अन्यतरासिद्ध' कहलाता है, अर्थात् हेतु की सिद्धि दो प्रकार की होने से 'असिद्ध' हेत्वाभास भी दो प्रकार का होता है, उसी प्रकार अनुमेयरूप आश्रय जहाँ वादी और प्रतिवादी दोनों के द्वारा असिद्ध होगा, वहाँ अनुमेयासिद्ध या आश्रयासिद्ध भी उभयासिद्ध रूप होगा । एवं जहाँ अनुमेय केवल वादी या प्रतिवादी किसी एक ही के द्वारा असिद्ध होगा, वहाँ अनुमेयासिद्ध भी अन्यतरासिद्ध नाम का आश्रयासिद्ध हेत्वाभास होगा । कहने का अभिप्राय है कि वादी और प्रतिवादी दोनों में से किसी एक के हेतुविषयक अज्ञान या हेतुविषयक सन्देह या हेतुविषयक विपर्यय के कारण 'असिद्ध' नाम का हेत्वाभास होता है, उसी प्रकार 'आश्रयासिद्ध' नाम के हेत्वाभास के प्रसङ्ग में भी समझना चाहिए कि साध्यविशिष्ट पक्षरूप आश्रय या अनुमेयविषयक वादी और प्रतिवादी दोनों के अज्ञान या सन्देह या विपर्यय एवं वादी और प्रतिवादी दोनों में से एक के उक्त अनुमेय या आश्रय के अज्ञान या सन्देह या विपर्यय के कारण ही आश्रयासिद्ध या अनुमेयासिद्ध नाम का हेत्वाभास भी होता है । (अन्यतरासिद्ध के प्रसङ्ग में यह विशेष) योजना या अतिदेश आश्रयासिद्ध के प्रसङ्ग में भी समझना चाहिए । जैसे कि कोई हेतु वादी के द्वारा अज्ञात होने के कारण असन्दिग्ध होने पर भी प्रतिवादी के लिए सन्दिग्धासिद्ध होता है, वैसे ही आश्रयासिद्ध के प्रसङ्ग में भी समझना चाहिए । अथवा कोई हेतु वादी के लिए सन्दिग्धासिद्ध होने पर भी प्रतिवादी के लिए विपर्ययासिद्ध होता है । अथवा जिस प्रकार कोई हेतु वादी के लिए सन्दिग्धा- सिद्ध है; किन्तु प्रतिवादी के लिए अज्ञानासिद्ध होता है, वैसे ही आश्रयासिद्ध

Page 545Permalink

५८० न्यायकिन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास- प्रशस्तपादभाष्यम् विद्यमानोऽपि तत्समानजातीये सर्वस्मिन्नास्ति, तद्विपरीते चास्ति, स विपरीत- साधनाद् विरुद्धः, यथा यस्माद् विषाणी तस्मादश्व इति । भास है (क्योंकि तम यदि द्रव्य होगा तभी वह पार्थिव हो सकता है; किन्तु तम में द्रव्यत्व ही सिद्ध नहीं है, चूँकि वह अभावरूप है, अतः द्रव्यत्वविशिष्ट तमरूप अनुमेय असिद्ध होने के कारण उसमें पार्थिवत्व के साधन के लिए प्रयुक्त कृष्णरूपवत्त्व हेतु अनुमेयासिद्ध है) । २. जो हेतु अनुमेय अर्थात् साध्य में एवं उसके सजातीयों में भी न रहे एवं अनुमेय के विपरीत वस्तुओं में रहे, वह हेतु साध्य के विपरीत वस्तु का साधक होने के कारण 'विरुद्ध' नाम का हेत्वाभास है। जैसे गो में (अभेद सम्बन्ध से) अश्व के साधन के लिए प्रयुक्त विषाण (सींग) हेतु (विरुद्ध नाम का हेत्वाभास है); क्योंकि अश्वरूप अनुमेय में विषाण हेतु न्यायकन्दली प्रतिवादिनः सन्देहासिद्धः । एवमाश्रयोऽपीति योजनीयम् । विशेषाणासिद्धादयः, अन्य- तरासिद्ध उभयासिद्धेष्वेवान्तर्भवन्तीति पृथङ् नोक्ताः । विरुद्धं हेत्वाभासं कथयति-यो ह्यनुमेय इति । यदा कश्चिद् वनान्तरिते गोपिण्डे विषाणमुपलभ्य 'अयं पिण्डोऽश्वो विषाणित्वात्' इति साधयति, तदा विषाणित्वमश्वजातीये पिण्डान्तरेऽविद्यमानमश्वविपरीते गवि महिषादौ च विपक्षे विद्यमानं व्याप्तिबलेनाश्वत्वविरुद्धमनश्वत्वं साध्यदभिमतसाध्यविपरीतसाधनाद् के प्रसङ्ग में भी समझना चाहिए । अथवा जिस तरह कोई हेतु वादी के लिए ही विपर्ययासिद्ध और प्रतिवादी के लिए ही सन्दिग्धासिद्ध होता है, वैसे ही आश्रयासिद्ध के प्रसङ्ग में भी समझना चाहिए । 'विशेषाणासिद्ध' प्रभृति हेत्वाभास कथित अन्यतरासिद्ध और उभयासिद्धों में ही अन्तर्भूत हो जाते हैं, अतः उनका अलग से उल्लेख नहीं किया गया । 'यो ह्यनुमेये' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा 'विरुद्ध' नाम के हेत्वाभास का निरूपण करते हैं । जिस समय कोई पुरुष वन में छिपे हुए गो रूप अवयवी के केवल सींग को देखकर इस अनुमान-वाक्य का प्रयोग करता है कि 'यह दीखनेवाला पिण्ड घोड़ा है, क्योंकि इसे सींग है' उस समय यह 'विषाणित्व' हेतु विरुद्ध नाम का हेत्वाभास होता है; क्योंकि अश्वरूप पक्ष के सजातीय सजातीय गदहे प्रभृति में विषाणित्व हेतु नहीं है एवं अश्व के विपरीत गो-महिषादि विपक्षों में विषाणित्व हेतु विद्यमान है । इस व्याप्ति के कारण विषाणित्व हेतु वन में दीखनेवाले उक्त पिण्ड में अश्वत्व के विरुद्ध अश्वभिन्नत्व का ही साधक होने का कारण 'विरुद्ध' कहलाता है । यह उदाहरण कुछ ही विपक्षों में

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५८१

Page 546Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५८१ प्रशस्तपादभाष्यम् यस्तु सन्ननुमेये तत्समानासमानजातीययोः साधारणः सन्नेव स सन्देहजनकत्वात् सन्दिग्धः, यथा-यस्माद् विषाणी तस्माद् गौरिति । एक- नहीं है एवं अश्व के सजातीय रासभादि में भी वह नहीं है; किन्तु अश्व के विपरीत महिषादि में विषाण हेतु है, अतः गो में अश्व के विपरीत अश्वभेद का ही वह साधक है। ३. जो हेतु अनुमेय में (साध्य में) एवं उसके सजातीय और विरुद्ध- जातीय दोनों प्रकार की वस्तुओं में समान रूप से सम्बद्ध रहे, वह (पक्ष में साध्य के) सन्देह का कारण होने से 'सन्दिग्ध' नाम का हेत्वाभास है । न्यायकन्दली विरुद्धमित्युच्यते । इदं विपक्षैकदेशवृत्तेर्विरुद्धस्योदाहरणम्, विषाणित्वस्य सर्वत्राश्वे स्तम्भादावसम्भवात् । समस्तविपक्षव्यापकस्य विरुद्धस्योदाहरणम्-नित्यः शब्दः कृतकत्वा- दिति द्रष्टव्यम् । यस्तु सन्ननुमेये धर्मिणि, तत्समानासमानजातीययोः सपक्षविपक्षयोः, साधारणः स सन्देहजनकत्वात् सन्दिग्धः । यथा यस्माद् विषाणी, तस्माद् गौरिति । यदायं पिण्डो गौरिवि- षाणित्वादिति साध्यते, तदा विषाणित्वं गवि महिषे च दर्शनात् सन्देहमापादयन् सन्दिग्धो हेत्वाभासः स्यात् । अयं सपक्षव्यापको विपक्षैकदेशवृत्तिरनैकान्तिकः । रहने वाले विरुद्ध (हेत्वाभास) का है (सभी विपक्षों में रहनेवाले विरुद्ध का नहीं); क्योंकि प्रकृत अनुमान के विपक्षीभूत स्तम्भादि द्रव्यों में विषाणित्व हेतु नहीं है । सभी विपक्षों में व्यापक रूप से रहनेवाले विरुद्ध हेत्वाभास का उदाहरण 'नित्यः शब्दः कृतकत्वात्' इस अनुमान में प्रयुक्त 'कृतकत्व' को समझना चाहिए (क्योंकि नित्यत्वरूप साध्य के अनाश्रयीभूत सभी वस्तुओं में कृतकत्व हेतु अवश्य है) । 'यस्तु सन्ननुमेये' (इस वाक्य में प्रयुक्त 'अनुमेये' शब्द का अर्थ है ) 'धर्मी में' अर्थात् जो हेतु पक्ष में रहते हुए 'तत्समानासमानजातीययोः' अर्थात् सपक्ष और विपक्ष दोनों में भी समान रूप से रहे, वह हेतु 'सन्देहजनक' होने के कारण 'सन्दिग्ध' नाम का हेत्वाभास है । 'यस्माद् विषाणी तस्माद् गौः' अर्थात् जिस समय वन में छिपे हुए कथित पिण्ड में ही केवल विषाण के देखने से कोई इस प्रकार के अनुमान का प्रयोग करे कि 'यह गो है क्योंकि इसे सींग है', उस समय यह विषाणरूप हेतु गोरूप पक्ष और महिषरूप विपक्ष दोनों में समान रूप से रहने के कारण इस सन्देह को उत्पन्न करता है कि 'यह गो है या महिष' । इस सन्देह को उत्पन्न करने के कारण ही उक्त विषाण हेतु 'सन्दिग्ध' नाम का हेत्वाभास होता है । (भाष्योक्त सन्दिग्ध हेत्वाभास का यह उदाहरण) (१) सपक्ष का व्यापक और कुछ ही विपक्षों में रहनेवाले 'सन्दिग्ध' नाम के हेत्वाभास का है (क्योंकि विषाणरूप हेतु विषाणित्वरूप से निश्चित सभी गोरूप सपक्ष में है; किन्तु

Page 547Permalink

५८२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [गुणेऽनुमाने हेत्वाभास- प्रशस्तपादभाष्यम् स्मिंश्च द्वयोर्हेत्वोर्यथोक्तलक्षणयोर्विरुद्धयोः सन्निपाते सति संशय- दर्शनादयमन्यः सन्दिग्ध इति केचित् । यथा-मूर्त्तत्वामूर्त्तत्वं प्रति मनसः जैसे कि किसी वस्तु में केवल विषाण के देखने से गो के अनुमान का विषाण हेतु (सन्दिग्ध नाम का हेत्वाभास है); क्योंकि विषाण रूप हेतु दर्शन का विषय किसी पक्षीभूत वस्तु में एवं उसके समानजातियों में एवं विजातीय महिषादि में साधारण रूप से रहने के कारण पक्षीभूत वस्तु में यह 'गो' है या 'महिष' इस सन्देह का उत्पादक है । (पूर्वपक्ष) कोई कहते हैं कि उक्त रीति से ही यदि समान बल के एवं परस्पर विरुद्ध दो वस्तुओं के साधक दो हेतुओं का समावेश जहाँ एक धर्मी में होता है, वहाँ वह हेतु उस धर्मी में उक्त परस्पर विरुद्ध दो वस्तुओं के सन्देह का हेतु होने के कारण एक और ही प्रकार का सन्दिग्ध नाम का हेत्वाभास है । न्यायकन्दली सपक्षविपक्षयोर्व्यापको नित्यः शब्दः, प्रमेयत्वादिति । सपक्षविपक्षैकदेशवृत्तिः, नित्यमाकाशममूर्तत्वादिति । सपक्षैकदेशवृत्तिर्विपक्षव्यापको द्रव्यं शब्दो निरवयवत्वादिति । समानासमानजातीययोः साधारण इति यत् साधारणपदं तस्य विवरणं सन्नेवेति । गो से भिन्न महिष एवं अश्व प्रभृति जो सभी उसके विपक्ष हैं, उनमें से महिषादि में ही विषाणरूप हेतु है, अश्वादि में नहीं) । (२) सभी सपक्षों और सभी विपक्षों में व्यापक रूप से रहनेवाले सन्दिग्ध हेत्वाभास का उदाहरण 'नित्यः शब्दः प्रमेयत्वात्' इस अनुमान का 'प्रमेयत्व' हेतु है (क्योंकि प्रमेयत्व सभी वस्तुओं में रहने के कारण नित्यरूप सभी सपक्षों में और अनित्यरूप सभी विपक्षों में विद्यमान है) । (३) कुछ ही विपक्षों में एवं कुछ ही सपक्षों में रहनेवाले सन्दिग्ध हेत्वाभास का दृष्टान्त है 'नित्यमाकाशममूर्त्तत्वात्' इस अनुमान का 'अमूर्त्तत्व' हेतु है (क्योंकि आत्मा प्रभृति कुछ ही सपक्षों में अमूर्त्तत्व है एवं अनित्य पृथिवी प्रभृति कुछ ही सपक्षों में अमूर्त्तत्व है । (४) सभी विपक्षों में एवं कुछ ही सपक्षों में रहनेवाले सन्दिग्ध हेत्वाभास का उदाहरण है 'द्रव्यं शब्दो निरवयवत्वात्' इस अनुमान का 'निरवयवत्व' हेतु है; क्योंकि द्रव्यत्वशून्य सभी वस्तुओं में निरवयवत्व है एवं सपक्षीभूत कुछ ही द्रव्यों में निरवयवत्व है।' । समानासमानजातीययोः साधारणः' इस वाक्य में जो 'साधारण' पद है, उसी की व्याख्या 'सन्नेव' इस वाक्य के द्वारा की गई है ।

  1. अर्थात् यह 'सन्दिग्ध' हेत्वाभास चार प्रकार का है- (१) सपक्षव्यापक और विपक्षैकदेशवृत्ति, (२) सपक्ष और विपक्ष दोनों का व्यापक, (३) सपक्षैकदेशवृत्ति एवं विपक्षैकदेशवृत्ति, (४) विपक्षव्यापक और सपक्षैकदेशवृत्ति । मुद्रित न्यायकन्दली

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५८३

Page 548Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५८३ न्यायकन्दली अथैको धर्मः सपक्षविपक्षयोर्दर्शनाद् धर्मिणि सन्देहं कुर्वन् सन्दिग्धो हेत्वाभासः स्यात्, एवमेकस्मिन् धर्मिणि द्वयोर्हेत्वोस्तुल्यबलयोर्विरुद्धार्थप्रसाधकयोः सन्निपाते सति संशयदर्शनादयं विरुद्धद्वयसन्निपातोऽन्यः सन्दिग्धो हेत्वाभास इति केश्चिदुक्तम्, तद् दूषयितुमुपन्यस्यति-एकस्मिंश्चेति । तस्योदाहरणमाह-यथा मूर्त्तत्यामूर्त्तत्वं प्रति मनसः क्रियावत्त्वात्स्पर्शवत्त्वयोरिति । मूर्त्तं मनः क्रियावत्त्वाच्छरावादिवत्, अमूर्त्तं मनोऽस्पर्शा- वत्त्वादाकाशादिवदिति विरुद्धार्थप्रसाधकयोः क्रियावत्त्वास्पर्शवत्त्वयोर्हेत्वोः सन्निपाते मूर्त्तत्वामूर्त्तत्वं प्रति संशयः, न ह्यत्रोभयोरपि साधकत्वम्, वस्तुनो द्वयात्मकत्वासम्भवात् । नापि परस्परविरोधादुभयोरप्यसाधकत्वम्, मूर्त्तामूर्त्तव्यतिरेकेण प्रकारान्तराभावात् । न किसी सम्प्रदाय के लोग कहते हैं कि जिस प्रकार सपक्ष और विपक्ष दोनों में यदि एक ही धर्म (हेतु) देखा जाय तो वह धर्मी (पक्ष) में साध्य के सन्देह को उत्पन्न करने के कारण 'सन्दिग्ध' नाम का हेत्वाभास होगा, उसी प्रकार परस्पर विरुद्ध दो साध्यों के साधक एवं समान बल के दो हेतु यदि एक धर्मी में देखे जाँय तो भी उस धर्मी में उक्त दोनों विरुद्ध साध्यों का संशय होगा । अतः यह 'विरुद्ध- द्वयसन्निपात'मूलक एक अलग ही 'सन्दिग्ध' नाम का हेत्वाभास है । इस पक्ष का खण्डन करने का ही उपक्रम 'एकस्मिंश्च' इत्यादि सन्दर्भ से किया गया है । इसी (विशेष प्रकार के) सन्दिग्ध का उदाहरण 'यथा मूर्त्तत्यामूर्त्तत्वं प्रति मनसः क्रियावत्त्वा- स्पर्शवत्त्वयोः' इस वाक्य के द्वारा प्रदर्शित हुआ है । अभिप्राय यह है कि 'जिस प्रकार घट शरावादि क्रिया से युक्त होने के कारण मूर्त्त है, उसी प्रकार मन भी मूर्त्त है; क्योंकि वह भी क्रियाशील है' एवं 'जिस प्रकार आकाश स्पर्श से रहित होने के कारण मूर्त्त नहीं है, उसी प्रकार मन भी स्पर्श से विहीन होने के कारण अमूर्त्त है' इस रीति से मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्वरूप दो विरुद्ध साध्य को सिद्ध करनेवाले क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व रूप दोनों हेतुओं का एक ही मनरूप धर्मी में यदि सम्मिलन होता है, तो मनरूप धर्मी में यह संशय होता है कि 'मन मूर्त्त है ? अथवा अमूर्त्त ?' चूँकि एक वस्तु एक ही प्रकार की हो सकती है, परस्पर विरोधी दो प्रकार की नहीं (सुतरां मन मूर्त्त ही होगा या अमूर्त्त ही), अतः वे दोनों हेतु मन- रूप अपने एक ही पक्ष में अपने-अपने साध्य (अर्थात् मूर्त्तत्व एवं अमूर्त्तत्व के) निश्चय का उत्पादन नहीं कर सकते । यह कहना भी सम्भव नहीं है कि (प्र.) चूँकि मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व दोनों परस्पर विरोधी हैं, अतः मनरूप एक ही धर्मी में उक्त दोनों साध्यों के साधन करने का सामर्थ्य उन दोनों हेतुओं में से किसी में भी नहीं है । (उ.) क्योंकि मन को मूर्त्त या अमूर्त्त इन दोनों से भिन्न किसी तीसरे प्रकार का होना सम्भव नहीं है (अतः उन दोनों में से एक हेतु मन में अपने साध्य का साधक पुस्तक के इस सन्दर्भ में जो 'अयं सपक्षविपक्षयोर्व्यापको विपक्षैकदेशवृत्तिरनैकान्तिकः' यह पाठ है' उसमें 'विपक्षयोः' यह प्रमाद से लिखा गया जान पड़ता है ।

Page 549Permalink

५८४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास- प्रशस्तपादभाष्यम् क्रियावत्त्वास्पर्शवत्त्वयोरिति । नन्वयमसाधारण एवाचाक्षुषत्वप्रत्यक्ष- त्ववत् संहतयोरन्यतरपक्षासम्भवात् । ततश्चानध्यवसित इति जैसे कि मन में मूर्तत्व के साधक क्रियावत्त्व और अमूर्तत्व के साधक अस्पर्शवत्त्व ये दोनों ही हेतु विद्यमान हैं, अतः संशय होता है कि मन क्रियाशील होने के कारण मूर्त है या अस्पर्शयुक्त (द्रव्य) होने के कारण (आकाशादि की तरह) अमूर्त्त है ? मन में उक्त सन्देह का कारण होने से उक्त दोनों ही हेतु सन्दिग्ध नाम के हेत्वाभास हैं । (अवान्तर उत्तर- पक्ष) जिस प्रकार अचाक्षुषत्व (चक्षु से गृहीत न होना) एवं प्रत्यक्षत्व (इन्द्रिय से गृहीत होना) इन दोनों में से एक-एक गुण से भिन्न दूसरी जगह पृथक् रूप से रहने पर भी मिलित होकर केवल गुण में ही रहने के न्यायकन्दली चान्यतरस्य हेतोर्विशेषोऽवगम्यते येनैकपक्षावधारणं स्यात् । अतः क्रियावत्त्वास्पर्श- वत्त्वाभ्यां मनसि संशयो भवति, किं मूर्त्तं किं वामूर्त्तमिति । अयमेव च विरुद्धाव्यभि- चारिणः प्रकरणसमाद् भेदो यदयं संशयं करोति, प्रकरणसमस्तु सन्दिग्धेऽर्थे प्रयुज्यमानः संशयं न निवर्तयतीति । नन्वयमसाधारण एव, अचाक्षुषत्वप्रत्यक्षत्ववत् संहतयोरन्यतरपक्षा- सम्भवादिति । क्रियावत्त्वास्पर्शवत्त्वे प्रत्येकं न तावत् संशयं जनयतः, निर्णय- हेतुत्वात् । सन्निपातश्च तयोरयमसाधारण एव, संहतयोस्तयोर्मनोव्यतिरेकेणान्य- अवश्य है) । इन दोनों हेतुओं में से किसी एक हेतु में 'विशेष' बल का भी निश्चय नहीं है कि उन दोनों पक्षों में से किसी एक पक्ष का अवधारण हो जाय । अतः कथित क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व इन दोनों हेतुओं से मन में यह संशय उत्पन्न होता है कि 'मन मूर्त है या अमूर्त' ? विरुद्धाव्यभिचारी (प्रस्तुत विलक्षण सन्दिग्ध) हेत्वाभास में प्रकरणसम (सत्प्रतिपक्ष) हेत्वाभास से यही अन्तर है कि विरुद्धाव्यभिचारी हेत्वाभास पक्ष में प्रकृत साध्य के संशय का उत्पादन करता है; किन्तु प्रकरणसम उस साध्य में प्रवृत्त होता है जो सन्दिग्ध है, जिससे कि वह पक्ष में साध्य के सन्देह को दूर नहीं कर पाता । 'नन्वयमसाधारण एव, अचाक्षुषत्वप्रत्यक्षत्ववत् संहतयोरन्यतरपक्षासम्भवात्' इस (पूर्वपक्ष भाष्य) का अभिप्राय है कि यह (विरुद्धाव्यभिचारी या सन्दिग्धविशेष) असाधारण हेत्वाभास ही है; क्योंकि कथित क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व इन दोनों में कोई एक हेतु संशय को उत्पन्न नहीं कर सकता; क्योंकि प्रत्येकशः वे दोनों निश्चय के ही उत्पादक हैं । दोनों हेतुओं का सम्मिलन (जिससे संशय हो सकता है) असाधारण ही है; क्योंकि क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व इन दोनों का सम्मिलन तो केवल मनरूप पक्ष में ही सम्भव है, मन को छोड़कर उन दोनों का सम्मिलन

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५८५

Page 550Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५८५ न्यायकन्दली तरपक्षे सपक्षे विपक्षे यथाऽचाक्षुषत्वप्रत्यक्षत्वयोः प्रत्येकं गुणव्यभिचारेऽपि समुदायितयोर्गुण- व्यतिरेकेणान्यत्रासम्भवः । यद्यपि विरुद्धव्यभिचारिधर्मद्वयोपनिपातोऽसाधारणो धर्मः, तथापि संशयहेतुत्वमेव । व्यतिरेकिणो हि विपक्षादेवैकस्माद् व्यावृत्तिर्नियता, तेन पक्षे निर्णय- हेतुत्वम् । असाधारणस्य तु व्यावृत्तिरनैकान्तिकी, विपक्षादिव सपक्षादपि तस्याः सम्भवात् । तत्र यदि गन्धवत्त्वमनित्यव्यावृत्तत्यान्नित्यत्वं साधयति, नित्यादपि गगनाद् व्यावृत्तेरनित्यत्वमपि साधयेत् ? न चास्त्युभयोः सिद्धिः, वस्तुनो द्वैरूप्याभावात् । नाप्युभयोरसिद्धिः, प्रकारान्तराभावात् । अतो गन्धवत्त्वात् पृथिव्यां संशयो भवति किमियं नित्या ? किं वानित्या ? इति । यदाहुर्भट्टमिश्राः – यत्रासाधारणो धर्मस्तदभावमुखेन तु । द्वयासत्त्वविरोधाच्च मतः संशयकारणम् ॥ किसी भी सपक्ष में या किसी भी विपक्ष में सम्भव नहीं है । जैसे कि अचाक्षुषत्व (आँखों से न देखे जाने योग्य) और प्रत्यक्षत्व इन दोनों में से अलग-अलग प्रत्येक का गुण में व्यभिचार (गुण से भिन्न पदार्थ में विद्यमानत्व) है (क्योंकि गुण से भिन्न आकाशादि द्रव्य चक्षु से नहीं देखे जाते एवं गुण से भिन्न होने पर भी घटादि द्रव्यों का प्रत्यक्ष होता है); किन्तु अचाक्षुषत्व और प्रत्यक्षत्व दोनों मिलकर केवल गुण में ही हैं (क्योंकि गन्धादि गुणों का चक्षु से ग्रहण न होने पर भी प्रत्यक्ष होता है) । यद्यपि विरुद्धव्यभिचारी दो धर्मों का एक आश्रय में रहना असाधारण धर्म है, फिर भी वह संशय का ही उत्पादक है (निर्णय का नहीं) । (अन्वय) व्यतिरेकी हेतु में केवल विपक्ष में न रहना (विपक्षव्यावृत्ति) ही केवल निश्चित है (सपक्षव्यावृत्ति नहीं), अतः वह हेतु पक्ष में साध्य के निश्चय का उत्पादन कर सकता है । असाधारण हेतु में सपक्ष या विपक्ष इन दोनों में से किसी एक की भी व्यावृत्ति नियमित नहीं है; क्योंकि विपक्ष की तरह सपक्ष में भी उसका न रहना निर्णीत ही है । अतः गन्धवत्त्वरूप असाधारण हेतु सभी अनित्यों में न रहने के कारण पृथिवी में नित्यत्व का अगर साधन कर सकता है, तो फिर गगनादि नित्य पदार्थों में न रहने के कारण पृथिवी में अनित्यत्व का भी वह साधन कर ही सकता है; किन्तु एक ही पृथिवी व्यक्ति में नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों की सिद्धि नहीं हो सकती; क्योंकि एक वस्तु एक ही प्रकार की हो सकती है, दो प्रकार की नहीं । (वस्तुओं का किसी एक ही प्रकार का होना निश्चित होने के कारण ही) नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों की असिद्धि भी नहीं कही जा सकती; क्योंकि किसी एक वस्तु का नित्यत्व और अनित्यत्व से भिन्न कोई तीसरा प्रकार हो ही नहीं सकता । अतः पृथिवी में गन्ध के रहने के कारण यह संशय होता है कि 'यह नित्य है अथवा अनित्य' ? जैसा कि भट्टमिश्र (कुमारिलभट्ट) ने कहा

Page 551Permalink

५८६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [गुणेऽनुमाने हेत्वाभास प्रशस्तपादभाष्यम् वक्ष्यामः । ननु शास्त्रे तत्र तत्रोभयथा दर्शनं संशयकारणमपदिश्यत कारण असाधारण होते हैं, इसी प्रकार क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व ये दोनों स्वतन्त्र रूप से अलग-अलग मन से भिन्न वस्तुओं में रहते हुए भी मिलित होकर केवल मनरूप पक्ष में ही हैं, अतः क्रियावत्त्व से युक्त अस्पर्शवत्त्व असाधारण ही है, सन्दिग्ध नहीं । (सिद्धान्तपक्ष) हम आगे कहेंगे कि कथित स्थिति में अचाक्षुषत्व विशिष्ट प्रत्यक्षत्व या क्रियावत्त्व- विशिष्ट अस्पर्शवत्त्व 'अनध्यवसित' होगा, सन्दिग्ध नहीं । (पूर्वपक्ष) शास्त्र (वैशेषिक सूत्रों आ.२, आ.२, सू.१८ तथा १९) में एक धर्मी में विरुद्ध दो धर्मों के ज्ञान को संशय का कारण कई स्थानों में कहा गया है । अतः उक्त कथन शास्त्र के विरुद्ध है । न्यायकन्दली यच्चाह न्यायवार्त्तिककारः - विभागजत्वं विभागजविभागासमवायिकारणकत्वं नर्ते शब्दात् सम्भवतीति सर्वतो व्यावृत्तेः संशयहेतुरिति । अत्राह-ततश्चानध्यवसित इति वक्ष्याम इति । विरुद्धयोः सन्निपातोऽसाधा- रणोऽसाधारणत्वाच्चानध्यवसितोऽयमिति वक्ष्यामः । किमुक्तं स्यात् ? असाधारणो धर्मोऽध्यवसायं न करोतीति वक्ष्याम इत्यर्थः । है कि (गन्धवत्त्वादि) असाधारण धर्म भी (पृथिवी में नित्यत्व एवं अनित्यत्व के) संशय का कारण है । (उसकी रीति यह है कि) उक्त असाधारण धर्म किसी सपक्ष में एवं किसी भी विपक्ष में न रहने के कारण पृथिवी में नित्यत्व का अभाव अनित्यत्व और अनित्यत्व का अभाव नित्यत्व इन दोनों का साधन कर सकता है; क्योंकि दो विरुद्ध धर्मों की सत्ता एक धर्मी में सम्भव नहीं है, अतः पृथिव्यादि में गन्धवत्त्वादिरूप असाधारण धर्मों से नित्यत्वादि का संशय ही होता है । जैसा कि न्यायवार्त्तिककार (उद्योतकर) ने भी कहा है कि-विभागजत्व अर्थात् विभागज विभागरूप असमवायिकारण से उत्पन्न होना शब्द से भिन्न किसी दूसरी वस्तु में सम्भव नहीं है, अतः सपक्ष और विपक्ष इन दोनों में से किसी में भी न रहने के कारण उक्त विभागजत्वरूप असाधारण धर्म शब्द में संशय का कारण है । इसी आक्षेप का समाधान 'ततश्चानध्यवसित इति वक्ष्यामः' इस वाक्य के द्वारा किया गया है । (अर्थात्) चूँकि विरुद्ध दो धर्मों का एक आश्रय में समावेश ही असाधारण है, अतः इसी असाधारण्यके कारण वह 'अनध्यवसित' नाम का हेत्वाभास है, यह

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५८७

Page 552Permalink

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५८७ प्रशस्तपादभाष्यम् इति, न, संशयो विषयद्वैतदर्शनात् । संशयोत्पत्तौ विषयद्वैतदर्शनं कारणम्, तुल्यबलत्वे च तयोः परस्परविरोधान्निर्णयानुत्पादकत्वं (सिद्धान्त) नहीं, यहाँ कोई भी शास्त्रविरोध नहीं है; क्योंकि एक ही विषय के दो विरुद्ध प्रकार के ज्ञान से संशय होता है, (एक धर्मी में दो विरुद्ध धर्मों के ज्ञान से नहीं)। अर्थात् विषय के द्वैतदर्शन (दो प्रकारों से देखने) से ही संशय की उत्पत्ति होती है। उन (क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व) दोनों न्यायकन्दली विरुद्धाव्यभिचारिणः संशयहेतुभावे प्रतिपादिते शास्त्रविरोधं चोदयति- नन्विति । उभयथा दर्शनमिति । उभाभ्यां विरुद्धधर्माभ्यां सहैकस्य धर्मिणो दर्शनं संशयकारणमिति शास्त्रे तत्र तत्र स्थाने कथितम् - 'दृष्टं च दृष्टवद् दृष्ट्वा' संशयो भवति (वै.अ.२,आ.२, सू.१८) । अमूर्त्तत्वेन सहात्मनि दृष्टमस्पर्शवत्त्वं यथा मनसि दृश्यते, तथा मूर्त्तत्वेन सह परमाणौ दृष्टं क्रियावत्त्वमपि दृश्यते, अतोऽमूर्त्तत्वेन सह दृष्टमस्पर्शवत्त्वमिव मूर्त्तत्वेन सह दृष्टं क्रियावत्त्वमपि दृष्ट्वा संशयो भवति किं मनो मूर्त्तम् ? किमुतामूर्त्तम् ? इति । 'यथादृष्टमयथादृष्टमुभयथादृष्टत्वात् संशयः' (अ. २, आ. २, सू. १९) । यथा हम आगे कहेंगे । (प्र.) इससे क्या अभिप्राय निकला ? (उ.) यही कि हम आगे कहेंगे कि 'असाधारण धर्म' (हेतु) 'अध्यवसाय' (निश्चय) को उत्पन्न नहीं करता । 'विरुद्धाव्यभिचारी' हेतु (असाधारण धर्म) संशय का कारण नहीं है । कथित इस पक्ष के ऊपर 'ननु' इत्यादि ग्रन्थ से (वैशेषिक सूत्र रूप) शास्त्र के विरोध का उद्भावन किया गया है । 'उभयथा दर्शनम्' इत्यादि सन्दर्भ का यह अभिप्राय है कि 'उभाभ्याम्' अर्थात् 'विरुद्ध दो धर्मों के साथ' एक धर्मी का ज्ञान संशय का कारण है । यह जो शास्त्र (वैशेषिक सूत्र) में उन सब स्थानों में कहा गया है उसका विरोध होगा । जैसे कि 'दृष्टं च दृष्टवत्' (वै.सू.अ.२, आ.२, सू.१८) इस सूत्र के द्वारा कहा गया है कि 'दृष्ट्वा संशयो भवति' (अभिप्राय यह है कि) मन में अमूर्त्तत्व के साथ आत्मा में रहनेवाला अस्पर्शवत्त्व भी है एवं परमाणु में मूर्त्तत्व के साथ रहनेवाला क्रियावत्त्व भी मन में है, अतः यह संशय होता है कि 'मन मूर्त्त है या अमूर्त्त' ? 'यथादृष्टमयथादृष्टमुभयथादृष्टत्वात् संशयः' (वै.सू.अ.२, आ.२, सू.१९) के द्वारा यह प्रतिपादन किया गया है कि 'यथादृष्ट' और 'अयथादृष्ट' इन दोनों प्रकार से ज्ञात धर्म के द्वारा संशय होता है । कहने का तात्पर्य है कि 'यथा' अर्थात् जिस प्रकार मूर्त्तत्व की व्याप्ति से युक्त क्रियावत्त्व के साथ मन की उपलब्धि होती है एवं 'अयथादृष्ट' अर्थात् उसी प्रकार इससे विरुद्ध अमूर्त्तत्व के साथ अवश्य रहनेवाले क्रियावत्त्व के साथ भी मन की उपलब्धि होती है, अतः 'उभयथादृष्ट' अर्थात्

सूत्रार्थो यदिहद्धाव्यभिचारिधर्मद्वयोपनिपातात् संशय इत्यभिप्रायः ।

Page 553Permalink

५८८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास- न्यायकन्दली येन धर्मेण मूर्त्तव्याव्यभिचारिणा क्रियावत्त्वेन समं 'दृष्टम्' मनस्तस्मात् 'अयथादृष्टम्' अमूर्त्तव्याव्यभिचारिणा स्पर्शवत्त्वेन समं दृष्टम्, अतः 'उभयथादृष्टत्वात्' संशयः किं क्रियावत्त्वान्मूर्त्तं मनः ? उतास्पर्शवत्त्वादमूर्त्तम् ? इति सूत्रार्थः । तेन विरुद्धाव्य- भिचारिणः संशयहेतुत्वं निराकुर्वतः शास्त्रविरोधः । एतत् परिहरति-न संशयः, विषयद्वैतदर्शनादिति । यत् त्वयोक्तं शास्त्रविरोध इति, तन्न, यस्मात् संशयो विषयद्वैतदर्शनाद् भवति । एतदेव विवृणोति-संशयोत्पत्तौ विषयद्वैतदर्शनं कारणमिति । यादृशे धर्मिण्यूर्ध्वस्वभावे संशयो जायते, 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' इति, तादृशस्य विषयस्य पूर्वं द्वैतदर्शनमुभयथादर्शनं स्थाणुत्वपुरुषत्वाभ्यां सह दर्शनं संशयकारणम्, न त्वेकस्य धर्मिणो विरुद्धधर्मद्वयसन्निपातस्तस्य कारणम्, तस्मान्नायं सूत्रार्थो यदिहद्धाव्यभिचारिधर्मद्वयोपनिपातात् संशय इत्यभिप्रायः । तथा च दृष्टं च दृष्टवद्दृष्ट्वेत्यस्यायमर्थः- पूर्वमेव 'दृष्टम्' पदार्थं स्थाणुं वा पुरुषं वा, 'दृष्टवद्' दृष्टाभ्यां स्थाणुपुरुषान्तराभ्यां तुल्यं वर्तमानं दृष्टम्, स्थाणुपुरुषान्तरसमानमिति यावत्, देशान्तरे कालान्तरे वा पुनर्द्दष्ट्वा मन की उक्त दोनों प्रकार से उपलब्धि होने के कारण यह संशय होता है कि 'यतः मन क्रियाशील है, अतः मूर्त्त है' ? अथवा 'मन में स्पर्श नहीं है, अतः मन अमूर्त्त है' ? यही उक्त दोनों वैशेषिक सूत्रों के अर्थ हैं । जो कोई विरुद्धाव्यभिचारी (असाधारण) धर्म को संशय का कारण नहीं मानते, उन्हें उक्त दोनों सूत्ररूप शास्त्रों के विरोध का सामना करना पड़ेगा । 'न, विषयद्वैतदर्शनात्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा सिद्धान्ती इस विरोध का परिहार करते हैं । अर्थात् आप (पूर्वपक्षी) ने जो यह कहा है कि 'शास्त्र-विरोध है' सो नहीं है; क्योंकि उक्त दोनों सूत्रों से यही कहा गया है कि विषय दो प्रकार से जानने के कारण 'विषयद्वैतदर्शन' से संशय उत्पन्न होता है । 'संशयो विषय- द्वैतदर्शनाद् भवति' अपने इस वाक्य का ही 'संशयोत्पत्तौ विषयद्वैतदर्शनं कारणम्' इस वाक्य के द्वारा विवरण देते हैं । अभिप्राय यह है कि 'स्थाणुर्वा पुरुषः' में ऊँचाई वाले जिस धर्मी में 'स्थाणुर्वा पुरुषः' इस आकार का संशय होता है, उस संशय के प्रति पहले 'विषय' का 'द्वैतदर्शन' अर्थात् 'उभयथा दर्शन' फलतः पुरुष और स्थाणु दोनों में समान रूप से ऊँचाई का देखना ही कारण है । उस संशय के प्रति एक धर्मी में विरुद्धाव्यभिचारी दो धर्मों का सम्मिलन कारण नहीं है । अतः उक्त सूत्र का यह अभिप्राय नहीं है कि विरुद्धाव्यभिचारी दो धर्मों का एक धर्मी में समावेश संशय का कारण है । तदनुसार 'दृष्टञ्च दृष्टवद् दृष्ट्वा' इस सूत्र का यह अभिप्राय है कि पूर्वकाल मे 'दृष्ट' स्थाणु या पुरुष को ही 'दृष्टवत्' अर्थात् वर्तमानकाल में दूसरे स्थाणु या दूसरे पुरुष के 'तुल्य' देखकर अर्थात् दूसरे काल या दूसरे देश में दूसरे पुरुष को दूसरे स्थाणु के समान फिर से देखकर, किसी कारणवश उन दोनों के स्थाणुत्व और पुरुषत्व

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५८९

Page 554Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५८९ न्यायकदली कुतश्चिन्निमित्ताद्विशेषानुपलम्भे सति संशयो भवति । दृष्टं चेति चशब्देन पूर्वमदृष्टमपि पदार्थं दृष्टवद् दृष्टाभ्यां स्थाणुपुरुषा्तराभ्यां समानं दृष्ट्वा संशय इत्यर्थः । सूत्रान्तरं च यथादृष्टमयथादृष्टमुभयथादृष्टमित्येकधर्मिविशेषानुस्मरणकृतं संशयं दर्शयति । पूर्वदृष्टमेव पुरुषं 'यथादृष्टम्' येन येनावस्थाविशेषेण दृष्टं मुण्डं जटिलं वा, तस्माद्यथादृष्टमन्येनान्येनावस्थाभेदेन दृष्टम्, कालान्तरे दृष्ट्वा, अवस्थाविशेषमपश्यतः स्मरतश्चैवं तस्यैव प्राक्तनीमवस्थितामुभयीमवस्थां किमयमिदानीं मुण्डः किं वा जटिल इति संशयः स्यादिति सूत्रार्थः । न तु विरुद्धाव्यभिचारी संशयहेतुः, प्रयोगाभावात् । यदि तावदाद्यस्य हेतोर्यथोक्तलक्षणत्वमवगतं तदा तस्माद्योऽर्थोऽवधारितः स तथैवेति न द्वितीयस्य प्रयोगः, प्रतिपत्तिबाधितत्वात् । अथायं यथोक्तलक्षणो न भवति, तदानी- मयमेव दोषो वाच्यः, किं प्रत्यनुमानेन ? विरुद्धं प्रत्यनुमानं न व्यभिचरति, नातिवर्तत इति विरुद्धाव्यभिचारी प्रथमो हेतुस्तस्यायमेव दोषो यद्विपरीतानु- रूप असाधारण धर्म को न समझने के कारण संशय उत्पन्न होता है । 'दृष्टञ्च' इस वाक्य के 'च' शब्द से भी यही अर्थ व्यक्त होता है कि जो पदार्थ (स्थाणु या पुरुष में) पहले से ज्ञात नहीं है, अगर उसका भी दूसरे स्थाणु वा दूसरे पुरुष की तरह ज्ञान होता है, तो उस ज्ञान के बाद भी संशय की उत्पत्ति होती है । 'यथादृष्टमयथादृष्टमुभयथादृष्टम्' इस दूसरे सूत्र के द्वारा वह संशय दिखलाया गया है कि जिसकी उत्पत्ति एक धर्मी में (अनेक धर्मों की) स्मृति से होती है । पहले देखा हुआ पुरुष ही अगर 'यथादृष्ट' हो, अर्थात् जिन-जिन विशेष अवस्थाओं से-जटी अथवा मुण्डी प्रभृति अवस्थाओं से-युक्त होकर जो पूर्व में देखा गया हो, वही पुरुष अगर उससे 'अयथादृष्ट' अर्थात् (उन पूर्वदृष्ट अवस्थाओं से) दूसरी-दूसरी अवस्थाओं से युक्त रूप में दूसरे समय देखा जाता है एवं (उसकी वर्त्तमान) विशेष प्रकार की अवस्था की उपलब्धि नहीं होती है एवं पूर्व की जटी और मुण्डी दोनों अवस्थाओं का स्मरण होता है, तो इस स्थिति में इसी संशय की उत्पत्ति होती है कि यह 'जटाधारी है मुण्डित-मस्तक' ? ('विरुद्धाव्यभिचारी' हेतु में संशय की कारणता सूत्रों से नहीं कही गयी है इतनी ही नहीं वस्तुतः) विरुद्धाव्यभिचारी हेतु संशय का कारण हो ही नहीं सकता; क्योंकि उसका प्रयोग ही सम्भव नहीं है । ('मूर्त्तं मनः स्पर्श- वत्त्वात्', 'अमूर्त्तं मनः क्रियावत्त्वात्' इत्यादि स्थलों में) साध्य के ज्ञापकत्व के प्रयोजक जितने जिन प्रकार के (सपक्षसत्त्वादि) धर्म हैं- पहले हेतु में उन सबों का ज्ञान है, तो फिर इस हेतु से जो निश्चित होगा, वह उसी प्रकार का होगा । अतः (उस विरुद्ध साध्य के साधन के लिए) दूसरे हेतु का प्रयोग ही नहीं हो सकेगा; क्योंकि वह प्रथम हेतुजनित प्रथम साध्य की अनुमिति (प्रतिपत्ति) से बाधित है। ऐसी स्थिति में अगर प्रथम हेतु में साध्य ज्ञान के प्रयोजक (सपक्षसत्त्वादि)

Page 555Permalink

५१० न्यायकन्दलीसहितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास- प्रशस्तपादभाष्यम् स्यान्न तु संशयहेतुत्वम्, न च तयोस्तुल्यबलवत्त्वमस्ति, अन्यतरस्यानुमेयोद्दे- शस्यागमबाधितत्वादयं तु विरुद्धभेद एव । के ज्ञान समान बल के हैं, इससे इतना ही होगा कि दोनों में से कोई भी निश्चय का उत्पादन न कर सकेगा । इससे (निश्चय की इस अनुत्पादकता) से उनमें संशय की कारणता नहीं आ सकती । वस्तुतः मूर्तत्व का साधक क्रियावत्त्व और अमूर्तत्व का साधक स्पर्शवत्त्व ये दोनों हेतु समान बल के हैं भी नहीं; क्योंकि इन दोनों में से एक (अस्पर्शवत्त्व) का साध्य (अमूर्तत्त्व) मन में 'तद्भावादणु मनः' (अ.६। आ.१ । सू.२३) इस वैशेषिक सूत्ररूप आगम से बाधित है । अतः (जिसे पूर्वपक्षी दूसरे प्रकार का सन्दिग्ध हेत्वाभास कहते हैं) वह विरुद्ध हेत्वाभास का ही एक प्रभेद है । न्यायकन्दली मानसम्भवः । द्वितीयेन प्रतिपक्षे उपस्थाप्यमाने प्रथमस्य साध्यसाधकत्वाभावादिति चेत् ? यदि द्वितीयवत् प्रथममप्यनुमानलक्षणोपपन्नम्, न प्रथमस्यासाधकत्वम् । तदसाधकत्वेऽन्यत्रा- प्यनुमाने क आश्वासः ? वस्तुनो द्वैरूप्याभावादसाधकत्वमिति चेत् ? वस्तु द्विरूपं न भवतीति केनैतदुक्तम् ? यथा हि प्रमाणमर्थं गमयति, तदेव हि तस्य तत्त्वम् । धर्मों का ज्ञान ही नहीं है, तो फिर उस धर्मविहीनता के प्रयोजक हेत्वाभास का ही उद्भावन करना चाहिए, (उस हेतु को दूषित करने के लिए) प्रथमा- नुमान (के विरोधी अनुमान) के प्रयोग से क्या प्रयोजन ? (प्र.) 'विरुद्धं न व्यभिचरति' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'विरुद्धव्यभिचारी' शब्द का यह अर्थ है कि जो हेतु अपने विरोधी अनुमान की उत्पत्ति को न रोक सके, वही हेतु 'विरुद्धव्यभिचारी' है । तदनुसार पूर्व में प्रयुक्त हेतु ही 'विरुद्धव्यभिचारी' है । इस हेतु में यही 'दोष' है कि इसके रहते भी दूसरे हेतु से विपरीत अनुमिति की उत्पत्ति होती है; क्योंकि द्वितीय (प्रति) हेतु के द्वारा जब विरोधी पक्ष की उपस्थिति हो जाती है, तो अपने साध्य के साधन करने की क्षमता पहले हेतु से जाती रहती है । (उ.) अगर दूसरे हेतु की तरह पहले हेतु में अनुमान के उत्पादक (सपक्षसत्त्वादि) सभी लक्षण हैं, तो फिर पहला हेतु अपने साध्य के साधन में अक्षम ही नहीं है; क्योंकि सपक्षसत्त्वादि रूपी बलों के रहते हुए भी यदि प्रथम हेतु में साध्य के साधन का सामर्थ्य न माना जाय, तो और अनुमान प्रमाणों में ही कैसे विश्वास किया जा सकेगा कि वह अपने साध्य का साधन करेगा ही ? अगर यह कहें कि (प्र.) चूँकि कोई भी वस्तु (विरुद्ध) दो प्रकार की नहीं हो सकती, अतः एक (पहले) हेतु को असाधक मान लेते हैं । (उ.) यह किसने कहा कि एक वस्तु (विरुद्ध) दो प्रकार की नहीं हो सकती ? प्रमाण से जिस प्रकार की वस्तु की सिद्धि होगी, वही प्रकार उस