भारतकोश
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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २३१

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २३१ प्रशस्तपादभाष्यम् सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापरत्वगुरुत्वनैमित्तिकद्रवत्ववेगाः सामान्यगुणाः । शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा बाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्याः । संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, नैमित्तिक द्रवत्व और वेग ये (दश) सामान्य गुण हैं । शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन पाँच में से प्रत्येक एक ही इन्द्रिय से गृहीत होता है एवं बाह्य इन्द्रिय से ही गृहीत होता है । न्यायकन्दली व्यवच्छिन्दन्ति न संख्यादयः, तेषां स्वतो विशेषाभावात् । यस्तु तेषां विशेषः स आश्रयविशेषकृत एवेति बोद्धव्यम् । संख्यादयः सामान्यगुणाः । सामान्याय स्वाश्रयसाधर्म्याय गुणाः, न स्वाश्रयविशेषा- येत्यर्थः । नन्वणुपरिमाणं परमाणूनां व्यवस्थापकम् ? न, जात्यन्तरपरमाणुसाधारणत्वात् । सांसिद्धिकद्रवत्वमपां विशेषगुण एव तेन नैमित्तिकग्रहणम् । शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा बाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्याः । बाह्यानीन्द्रियाणि चक्षुरादीनि बाह्यार्थ- प्रकाशकत्वात् । तैः प्रत्येकं रूपादयो गृह्यन्ते । वे ही 'वैशेषिक गुण' हैं, जैसे कि रूपादि । ये अपने आश्रयों को औरों से भिन्न रूप में समझाते हैं । संख्यादि सामान्य गुण अपने आश्रयों को औरों से भिन्न रूप में नहीं समझा सकते; क्योंकि (एक द्रव्य की एक संख्या से दूसरे द्रव्य की उसी संख्या में) स्वतः कोई अन्तर अर्थात् विशेष नहीं है । उन दोनों संख्याओं में जो कुछ अन्तर है उसे आश्रय के विशेषों से ही समझना चाहिए । ऊपर कहे हुए संख्यादि सामान्य गुण हैं । अर्थात् 'सामान्याय गुणाः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार कथित संख्यादि 'सामान्य' अर्थात् अपने आश्रयों में परस्पर साधर्म्य प्रतीति के ही कारणीभूत गुण हैं, इनसे इनके आश्रयों में परस्पर विभिन्नता की प्रतीति नहीं होती है । (प्र.) अणु परिमाण तो परमाणुओं का व्यवस्थापक है, अर्थात् और परिमाणवालों से विभिन्नत्व बुद्धि का कारण है ? (उ.) नहीं, अणु परिमाण भी विभिन्न जातीय परमाणुओं में समान रूप से रहने के कारण परस्पर (परमाणुत्व रूप) साधर्म्यबुद्धि का ही कारण है । सांसिद्धिक (स्वाभाविक) द्रवत्व जल का विशेष गुण है, अतः नैमित्तिक द्रवत्व को ही सामान्य गुणों में गिनाया है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पाँच गुण 'बाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्य' हैं, अर्थात् बाह्य विषयों के ही प्रकाशक होने के कारण चक्षुरादि 'बाह्येन्द्रिय' हैं । शब्दादि में से प्रत्येक

२३२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य- प्रशस्तपादभाष्यम् सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापरत्वद्रवत्वस्नेहवेगा द्वीन्द्रिय- ग्राह्याः । बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नास्त्वन्तःकरणग्राह्याः । संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, नैमित्तिक द्रवत्व और वेग ये नौ गुण दो इन्द्रियों से (भी) गृहीत हो सकते हैं । बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष और प्रयत्न ये छः गुण 'अन्तःकरण' अर्थात् मन से ज्ञात होते हैं । न्यायकन्दली संख्यादयो वेगान्ता द्वीन्द्रियग्राह्याः चक्षुःस्पर्शनग्राह्याः । यथा चक्षुषा 'स्निग्धोऽयम्' इति प्रतीतिरेवं त्वगिन्द्रियेणापि भवति, संख्यादिवत् स्नेहोऽपि तदुभयग्राह्यः । बुद्ध्यादयः प्रयत्नान्ता अन्तःकरणग्राह्याः, मनसा प्रतीयन्त इत्यर्थः । बुद्धिरनुमेया नान्तःकरणेन गृह्यत इति केचित्, तदयुक्तम्, लिङ्गाभावात् । न तावदर्थमात्रं लिङ्गम्, तस्य व्यभिचारात् । ज्ञातोऽर्थो लिङ्गं चेत् ? ज्ञान- सम्बन्धो ज्ञातता, याऽसौ ज्ञानकर्मता सा प्रतीयमाने ज्ञाने न प्रतीयते, सम्बन्धिप्रतीत्यधीनत्वात् सम्बन्धप्रतीतेरिति कथं तद्विशेषणार्थो लिङ्गं स्यात् ? चक्षुरादि बाह्य इन्द्रियों में से ही किसी एक इन्द्रिय से गृहीत होता है । संख्या से लेकर वेगपर्यन्त कथित ये दश गुण 'द्वीन्द्रियग्राह्य' हैं, अर्थात् चक्षु और त्वचा दोनों इन्द्रियों से गृहीत होते हैं । 'यह स्निग्ध है' यह प्रतीति जैसे चक्षु से होती है, वैसे ही त्वचा से भी होती है, अतः संख्यादि की तरह स्नेह भी 'द्वीन्द्रियग्राह्य' है । बुद्धि से लेकर प्रयत्न पर्यन्त कहे हुये ये छः गुण 'अन्तःकरणग्राह्य' हैं, अर्थात् इनका प्रत्यक्ष मन रूप अन्तरिन्द्रिय से ही होता है । कोई कहते हैं कि (प्र.) बुद्धि का अनुमान ही होता है, अतः अन्तरिन्द्रिय से भी उसका प्रत्यक्ष नहीं होता । (उ.) किन्तु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि बुद्धि की अनुमिति का कोई उपयुक्त हेतु नहीं है । केवल (ज्ञेय) अर्थ के ज्ञान अनुमिति के हेतु नहीं हो सकते; क्योंकि यह व्यभिचरित है । ज्ञात अर्थ के ज्ञानों को अनुमिति का हेतु मानें (तो भी नहीं हो सकता, क्योंकि) अर्थ में ज्ञान का सम्बन्ध ही उसकी 'ज्ञातता' है । अर्थ में ज्ञान का सम्बन्ध (ज्ञानक्रिया का) कर्मत्व रूप ही है । अतः ज्ञान के प्रतीत हुये बिना ज्ञानकर्मत्व रूप ज्ञातता की प्रतीति नहीं हो सकती; किन्तु अनुमिति में लिङ्ग की तरह उसका विशेषण

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २११

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २११ न्यायकन्दली लिङ्गवल्लिङ्गविशेषणस्यापि ज्ञायमानस्यैवानुमानहेतुत्वम् । अथ मन्यसे 'ज्ञानेन स्वोत्पत्त्य- न्तरमर्थे ज्ञातता नाम काचिदवस्था जन्यते पाकेनेव तण्डुलेषु पक्वता, सा चार्थ- धर्मत्वादर्थेन सह प्रतीयते' इति । तदप्यसारम्, अननुभवात् । यथा हि तण्डुला- नामैवौदनीभावः पक्वताऽनुभूयते नैवमर्थस्य ज्ञातता । या चेयमपरोक्षरूपता हानादिव्य- वहारयोग्यता च तस्य, साऽपि हि ज्ञानसम्बन्धो न धर्मान्तरम् । यथा चार्थे ज्ञायमाने ज्ञातता, तथा ज्ञाततायामपि ज्ञायमानायां ज्ञाततान्तरमित्यनवस्था । अथेयं स्वप्रकाशा ? ज्ञाने कः प्रद्वेषः ? वस्तुतस्त्रिकालविशिष्टोऽप्यर्थो ज्ञानेन प्रतीयमानो वर्त्तमानकालावच्छिन्नः प्रतीयते । या च त्रिकालस्य वर्त्तमानकालावच्छिन्नावस्था सा ज्ञातता, ज्ञानकृतत्वात्तस्य लिङ्गमिति कश्चित् । तदपि न किञ्चित्, वर्त्तमानावच्छिन्नता भी कारण है, वह लिङ्ग की तरह ज्ञात होकर ही । अगर यह मानें कि (प्र.) ज्ञान की उत्पत्ति के बाद इस ज्ञान से ही अर्थ की एक विशेष प्रकार की अवस्था होती है, जिसे ज्ञाततावस्था कहते हैं । जिस प्रकार कि चावल में पाक से पक्वता नाम की एक अवस्था उत्पन्न होती है । (उ.) इस कथन में भी कुछ विशेष सार नहीं हैं; क्योंकि पाक से चावल में जिस प्रकार ओदनावस्था रूप पक्वता का अनुभव होता है, वैसे ही अर्थ में ज्ञातता का कोई अनुभव नहीं होता । (विषयों के ज्ञान के बाद जो) उसमें अपरोक्षरूपता, त्याग या ग्रहण करने की जो योग्यता भासित होती है, वह भी ज्ञान सम्बन्ध को छोड़कर और कुछ नहीं है । एवं इस पक्ष में अनवस्था दोष भी है; क्योंकि जिस प्रकार ज्ञात होने पर अर्थों में ज्ञातता मानते हैं, उसी प्रकार ज्ञातता के ज्ञात होने पर उसमें भी कोई दूसरी ज्ञातता माननी पड़ेगी । जिसका पर्यवसान अनवस्था में होगा । अगर ज्ञातता को स्वप्रकाश मान लें तो फिर ज्ञान को ही स्वप्रकाश मान लेने में क्यों द्वेष है ? कोई कहते हैं कि (प्र.) तीनों कालों में से वर्त्तमानकाल ही ऐसा है जिससे युक्त अर्थ का प्रत्यक्ष होता है, अर्थात् वर्त्तमानकालिक वस्तुओं का ही प्रत्यक्ष होता है । अतः वस्तुओं की जो वर्त्तमानावस्था, भूतावस्था और भविष्यदवस्था है, इनमें से वस्तुओं के प्रत्यक्षमूलक होने के कारण केवल वर्त्तमानावस्था ही उसकी ज्ञातता है । यह ज्ञातता ही ज्ञानानुमिति का हेतु है । (उ.) किन्तु इस कथन में भी कुछ सार नहीं है; क्योंकि वस्तुओं का वर्त्तमानकाल के साथ सम्बन्ध (या उसमें रहना) ही उनकी

२३४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य- न्यायकन्दली हि वर्त्तमानकालविशिष्टता सा चार्थस्य स्वाभाविकी, न ज्ञानेन क्रियते किन्तु प्रतीयते । योऽपि हि विषयसंवेदनानुमेयं ज्ञानमिच्छति, सोऽप्येवं पर्यनुयोज्यः-किं विषय- संवेदनमात्मनि समवैति ? विषये वा ? न तावद्विषये, तच्चैतन्यप्रतिषेधात् । अथात्मनि समवैति ? ततः किमन्यद्विज्ञानं यदस्यानुमेयम् । अस्य कारणं ज्ञातृव्यापारलक्षणं तदिति चेत् ? तत्किं नित्यम् ? अनित्यं वा ? यद्यनित्यं तदुत्पत्तावपि कारणं वाच्यम् । विषये- न्द्रियादिसहकारी ज्ञानमनःसंयोगोऽस्य कारणमिति चेत् ? सैव सामग्री विषयसंवेदनो- त्पत्तावस्तु किमन्तर्गडुनानेन ? अथ तन्नित्यम् ? कादाचित्कविषयेन्द्रियसन्निकर्षादिसहकारि कादाचित्कं विषयसंवेदनं करोतीत्यभ्युपगमः, तदस्याप्यागन्तुककारणकलापादेव विषय- संवेदनोत्पत्तिसिद्धौ तत्कल्पनावैयर्थ्यम् ? विषयसंवेदनादेवार्थावबोधस्य तत्पूर्वकस्य व्यवहा- रस्य च सिद्धेः । वर्तमानकालावच्छिन्नता है । यह उनका स्वाभाविक धर्म है, यह धर्म ज्ञान से उत्पन्न नहीं होता, ज्ञान के द्वारा प्रतीत भर होता है । जो कोई विषयसंवेदन ज्ञान का अनुमान मानते हैं, उन्हें इस प्रकार पराजित करना चाहिए कि यह 'विषयसंवेदन' समवाय सम्बन्ध से आत्मा में रहता है ? या विषयों में ? विषयों में तो रह नहीं सकता; क्योंकि विषयों में चैतन्य का खण्डन कर चुके हैं (देखिए-आत्मनिरूपण, पृ. १७१) । अगर यह समवाय सम्बन्ध से आत्मा में रहता है तो फिर ज्ञान उससे भिन्न कौन-सी वस्तु है ? जिसका विषयसंवेदन से अनुमान होता है । (प्र.) अनुमेयज्ञान एवं विषयसंवेदन ये दोनों भिन्न हैं; क्योंकि (अनुमेय) ज्ञान विषयसंवेदन का कारण और ज्ञाता का व्यापार है । (उ.) विषयसंवेदन का कारणीभूत ज्ञान नित्य है ? अथवा अनित्य ? अगर अनित्य है तो फिर उसकी उत्पत्ति के लिए भी अलग से कारण कहना पड़ेगा । विषय एवं इन्द्रियादि सहकारियों से युक्त ज्ञाता के मनःसंयोग को अगर उसका कारण मानें, तो फिर इन्हीं कारणों के समूह से विषयसंवेदन की भी उपपत्ति मानिये । विषयसंवेदन के उत्पादक कारणों की पंक्ति में उस ज्ञान को बिठाने की क्या आवश्यकता है ? अगर उस अनुमेय ज्ञान को नित्य मानते हैं और विषय एवं इन्द्रियादि सहकारियों के रहने और नहीं रहने से विषयसंवेदन के कादाचित्कत्व (कभी होना कभी नहीं) का निर्वाह करते हैं, तो फिर विषयसंवेदन के कादाचित्कत्व के प्रयोजक इन्द्रियादि रूप कारणों से ही विषयसंवेदन की उत्पत्ति मान लीजिए । इस तरह के ज्ञान की कल्पना ही व्यर्थ है जो विषयसंवेदन से अनुमेय हों

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २३५

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २३५ न्यायकन्दली अथोच्यते विषयेन्द्रियादिजन्यं विज्ञानं कथमात्मन्येव समवैति ? यद्यात्मा सहज- ज्ञानमयो न स्यात् । तस्याचेतनत्वे हि कारणत्वाविशेषादिन्द्रियादिष्वपि ज्ञानसमवायो भवेदिति । तन्न स्वभावनियमादेव नियमोपपत्तेः । यथा तन्तूनामपटत्वेऽपि तन्तुत्व- जातिनियमात्तेषु समवायो न तुर्यादिषु, तद्वदचिदात्मकेऽप्यात्मन्यात्मत्वजातिनियमाद् ज्ञान- समवायस्य नियमो भविष्यति । एतेनैतदपि प्रत्युक्तं यदाहुरेके 'स्वसंवेदनमात्मनो निजं चैतन्यम्' इति संसारावस्थायामपि तस्यावभासप्रसङ्गात् । अविद्यया वा तस्य तिरोधानमिति चेत् ? किं ब्रह्मणोऽप्यविद्या ? कथं च नित्ये स्वप्रकाशे तिरोधानस्यायोयुक्तिः ? न च तिरोहिते तस्मिन्नन्यप्रतिभानमस्ति, 'तस्य भासा एवं विषयसंवेदन का कारण हों; क्योंकि उसी विषयसंवेदन से अर्थविषयक बोध एवं तज्जनित व्यवहार दोनों की उपपत्ति हो जायगी । अगर यह कहें कि (प्र.) विषय एवं इन्द्रियादि से उत्पन्न ज्ञान तब तक आत्मा में समवाय सम्बन्ध से कैसे रह सकता है, जब तक कि आत्मा को सहजज्ञानमय न माना जाय । आत्मा अगर स्वतः अचेतन हो किन्तु ज्ञान का कारण होने से ही (उसमें) ज्ञान की सत्ता हो तो फिर इन्द्रियादि (रूप ज्ञान के और कारणों) में भी ज्ञान का समवाय मानना पड़ेगा । (उ.) उक्त कथन भी असङ्गत ही है; क्योंकि स्वाभाविक नियम के अनुसार ही इस विषय का अवधारण हो जायगा कि ज्ञान अपने आत्मा रूप कारण में ही समवाय सम्बन्ध से है, इन्द्रियादि रूप कारणों में नहीं । जैसे कि तन्तु में पटरूपता न रहने पर भी (पट के कारणीभूत) तन्तु में ही समवाय सम्बन्ध से पट रहता है, तुरी, वेमा प्रभृति अपने अन्य कारणों में नहीं । इस नियम को मान लेने से ही आत्मा में ही ज्ञान का समवाय है, इस नियम की भी उपपत्ति हो जायगी । इसी से किसी का यह मत भी खण्डित हो जाता है कि (प्र.) स्वसंवेदन (स्वतःप्रकाश) ज्ञान आत्मा का स्वकीय चैतन्य ही है (वह ज्ञान अगर स्वतः प्रकाश और नित्य है तो फिर) संसारावस्था में भी उसका प्रत्यक्ष होना चाहिए । अगर यह कहें कि (प्र.) संसारावस्था में वह अविद्या से ढँका रहता है ? (उ) तो फिर इस विषय में यह पूछना है कि क्या ब्रह्म में भी अविद्या रहती है ? एवं नित्य एवं स्वप्रकाश रूप ज्ञान के तिरोधान में ही क्या युक्ति है ? एवं उसके तिरोहित हो जाने पर (संसारावस्था में) और विषयों का ज्ञान भी असम्भव होगा; क्योंकि 'तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' इत्यादि श्रुतियों में कहा

२३६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य- प्रशस्तपादभाष्यम् गुरुत्वधर्माधर्मभावना ह्यतीन्द्रियाः । अपाकजरूपरसगन्धस्पर्शपरिमाणैकत्वैकपृथक्त्वगुरुत्वद्रवत्वस्नेहवेगाः कारणगुण- पूर्वकाः । गुरुत्व धर्म, अधर्म और भावना ये चार गुण किसी भी इन्द्रिय से गृहीत नहीं होते (अर्थात् अतीन्द्रिय हैं) । अपाकज रूप, अपाकज रस, अपाकज गन्ध, अपाकज स्पर्श, परिमाण, एकत्व, एकपृथक्त्व, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह और वेग ये ग्यारह गुण 'कारणगुणपूर्वक' हैं, अर्थात् अपने आश्रयीभूत द्रव्य के अवयवों में रहनेवाले अपने-अपने समानजातीय गुण से उत्पन्न होते हैं । न्यायकन्दली सर्वमिदं विभाति' इति श्रुतेः । भासते चेत् ? सर्वमुक्तिः, विद्याविर्भावे सत्य- विद्याविलयात् । अथेयं न विलीयते ? न तर्हि विद्याप्रकाशस्तस्याविलयहेतुरित्य- निर्मोक्षः । निर्भागस्यैकदेशेन प्रतिभानमनाशङ्कनीयम् । गुरुत्वधर्माधर्मभावना अतीन्द्रियाः, न केनचिदिन्द्रियेण गृह्यन्त इत्यर्थः । अपाकजरूपादयो वेगान्ताः कारणगुणपूर्वकाः स्वाश्रयस्य यत्समवायिकारणं तस्य ये गुणास्तत्पूर्वका रूपादयः, तन्तुरूपादिपूर्वकाः पटरूपादयः, गया है कि उसी के प्रकाश से और सभी प्रकाशित होते हैं । अगर संसारावस्था में भी आत्मा का वह सहज चैतन्य प्रकाशित होता है तो फिर सभी जीवों को मुक्ति मिल जायगी; क्योंकि विद्या रूप तत्त्वज्ञान से अविद्या का विनाश हो जाता है । अगर विद्या के प्रकाशित होने पर भी अविद्या का विनाश नहीं होता है तो फिर विद्या (तत्त्वज्ञान) अविद्या के विनाश का कारण ही नहीं है । तब फिर किसी को भी मोक्ष का मिलना असम्भव हो जायगा । अंशों से शून्य किसी अखण्ड वस्तु के किसी अंश के प्रकाशित होने एवं किसी अंश के अप्रकाशित होने की तो शङ्का ही नहीं करनी चाहिए । गुरुत्व, धर्म, अधर्म और भावना ये चार गुण 'अतीन्द्रिय' हैं, अर्थात् किसी भी इन्द्रिय से इनका ग्रहण नहीं होता । अपाकज रूप से लेकर वेगपर्यन्त कथित ग्यारह गुण 'कारणगुणपूर्वक' हैं । अर्थात् उक्त रूपादि गुण अपने आश्रय (द्रव्य) के समवायिकारण (अवयव) में रहनेवाले गुणों से उत्पन्न होते हैं । पट प्रभृति द्रव्यों में रहने- वाले रूपादि की उत्पत्ति तन्तु आदि में रहनेवाले रूपादि गुणों से ही होती है; क्योंकि जिस तरह के रूपादि तन्तुओं में देखे जाते हैं, उसी प्रकार के रूपादि पट में देखे जाते हैं । अगर ऐसी बात न हो तो फिर

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २३७

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २३७ न्यायकन्दली नियमेन तद्धर्मानुविधानात् । अतत्पूर्वकत्वे हि पटे यत्किञ्चिद् गुणान्तरं स्यान्नियम- हेतोरभावात् । एतेनैकमेव सर्वत्र शुक्लं रूपं प्रत्यभिज्ञानादिति प्रत्युक्तम् । तरतमादिभावानुप- पत्तिप्रसङ्गाच्च । तस्मात्सामान्यविषया प्रत्यभिज्ञा । पार्थिवपरमाणुरूपादयः पाकजाद्विसंयोगाज्जायन्ते न तु परमाणुसम- वायिकारणाश्रितरूपादिपूर्वकाः, अतस्तन्निवृत्यर्थमपाकजग्रहणम् । सिद्धायामुत्पत्तौ कारणगुणपूर्वकत्वमकारणगुणपूर्वकत्वं चेति निरूपणीयम् । जलादिपरमाणु- पट में ऐसे भी गुणों की उत्पत्ति हो जो तन्तुओं में न देखे जाते हों; क्योंकि 'अवयव के गुणों से ही अवयवी के गुण उत्पन्न होते हैं' इस नियम में कोई (अन्य) प्रमाण नहीं है । अगर यह नियम न हो तो फिर पट में तन्तुओं में न रहनेवाले किसी गुण की उत्पत्ति होने में भी कोई बाधा नहीं है; क्योंकि 'पट में इतने ही गुण उत्पन्न हों, इस विषय में (उक्त नियम को छोड़ कोई अन्य) कारण नहीं है । कथित युक्ति से ही किसी आचार्य का निम्नलिखित यह मत भी खण्डित हो जाता है कि (प्र.) शुक्ल रूप से युक्त जितने भी द्रव्य दीख पड़ते हैं, उन सभी द्रव्यों में एक ही शुक्ल रूप है; क्योंकि (जिस शुक्ल रूप को मैंने घट में देखा था, उसी को पट में भी देख रहा हूँ यह) प्रत्यभिज्ञा होती है । (उ.) ('अवयवगत गुण ही अवयवी में गुण को उत्पन्न करते हैं' इस नियम की अनुपपत्ति रूप दोष के अतिरिक्त इस पक्ष में) यह दोष भी है कि अगर शुक्ल रूप से युक्त सभी द्रव्यों में एक ही शुक्ल रूप हो तो फिर उनमें इस न्यूनाधिकभाव की प्रतीति नहीं होगी कि 'यह इससे अधिक शुक्ल है' या 'यह इससे कम शुक्ल है', अतः कथित प्रत्यभिज्ञा केवल सादृश्य के कारण होती है (दोनों द्रव्यों में प्रतीत होने वाले शुक्ल रूपों के एकत्व से नहीं) । पार्थिव परमाणु के रूपरसादि पाक से ही उत्पन्न होते हैं, अपने आश्रय के समवायिकारणों में रहनेवाले रूपरसादि से नहीं; क्योंकि उन रूपादि के आश्रयीभूत परमाणुओं का कोई समवायिकारण ही नहीं है । पार्थिव परमाणुओं के पाकजरूपादि में 'कारणगुणपूर्वकत्व' रूप साधर्म्य अव्याप्त न हो जाय, अतः (प्रकृत साधर्म्य के लक्ष्यबोधक वाक्य में) 'अपाकज' पद दिया है । उत्पत्ति की सिद्धि हो जाने पर फिर उस उत्पन्न वस्तु में ही जिज्ञासा होती है कि उसकी उत्पत्ति कारण के गुणों से होती है या और किसी से ? जलादि के परमाणुओं के रूपादि की तो उत्पत्ति ही नहीं होती (क्योंकि वे नित्य हैं), अतः उनमें कारणगुणपूर्वकत्व साधर्म्य के न होने से भी व्यभिचार दोष नहीं है । इन गुणों को 'कारणगुणपूर्वक' कहने का अभिप्राय केवल इनके स्वरूपों का कथन मात्र है ।

२३८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य- प्रशस्तपादभाष्यम् बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावनाशब्दा अकारणगुणपूर्वकाः । बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावनाशब्दतूलपरिमाणोत्तरसंयोगनैमित्तिक- द्रव्यत्वपरत्वापरत्वपाकजाः संयोगजाः । बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, भावना और शब्द ये दश गुण 'अकारणगुणपूर्वक' हैं (अर्थात् ये अपने आश्रयों के अवयवों में रहनेवाले अपने समानजातीय गुण से नहीं उत्पन्न होते) । बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, भावना, शब्द, रूई प्रभृति के परिमाण, उत्तरदेश के साथ संयोग, नैमित्तिक द्रवत्व ये तेरह गुण संयोग से उत्पन्न होते हैं । न्यायकन्दली रूपादीनां चोत्पत्तिरेव नास्तीति न व्यभिचारः । एषां कारणगुणपूर्वकत्वाभिधानं स्वरूप- कथनं न त्ववधारणार्थम्, नैमित्तिकद्रवत्ववेगयोरकारणगुणपूर्वकत्वस्यापि सम्भवात् । कारण- गुणपूर्वकत्वमनयोर्वेगवदारब्धजलावयविसमवेतयोर्द्रष्टव्यम् । बुद्ध्यादयः शब्दान्ता अकारणगुणपूर्वकाः स्वाश्रयस्य यत्समवायिकारणं तद्गुण- पूर्वका न भवन्ति, नित्यगुणत्वात् । बुद्ध्यादयः संयोगजाः । बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावना आत्ममनःसंयोगजाः । शब्दो भेर्याकाशसंयोगजः । तूलपरिमाणं प्रचयसंयोगजम् । इस नियम का यह अभिप्राय नहीं है कि ये सभी गुण कारणगुणपूर्वक ही होते हैं; क्योंकि नैमित्तिक द्रवत्व और वेग अकारणगुणपूर्वक भी होते हैं । वेग एवं द्रवत्व से युक्त अवयवों के द्वारा उत्पन्न जल रूप अवयवी के वेग और द्रवत्व में कथित कारणगुणपूर्वकत्व समझना चाहिए । बुद्धि से लेकर शब्दपर्यन्त कथित ये नौ गुण 'अकारणगुणपूर्वक' हैं, अर्थात् अपने आश्रयरूप द्रव्य के समवायिकारण में रहनेवाले गुण से नहीं उत्पन्न होते; क्योंकि इनके आश्रय नित्य हैं । इन गुणों के समवायिकारणों का कोई कारण ही नहीं है । 'बुद्धि प्रभृति कथित गुण संयोग से उत्पन्न होते हैं', इनमें बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और भावना, ये नौ गुण आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होते हैं । शब्द की उत्पत्ति भेरी (नगाड़ा) और आकाश के संयोग से होती है । 'प्रचय' नाम के संयोग से रूई के परिमाण की उत्पत्ति होती है । संयोगज

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २३९

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २३९ प्रशस्तपादभाष्यम् संयोगविभागवेगाः कर्मजाः । शब्दोत्तरविभागौ विभागजौ । परत्वापरत्वद्वित्वद्विपृथक्त्वदयो बुद्धयपेक्षाः । संयोग, विभाग और वेग ये तीन गुण क्रिया से उत्पन्न होते हैं ! शब्द और उत्तर (विभागज) विभाग ये दोनों विभाग से उत्पन्न होते हैं । परत्व, अपरत्व, द्वित्व, द्विपृथक्त्व प्रभृति बुद्धिसापेक्ष हैं । न्यायकन्दली उत्तरसंयोगः संयोगजः संयोगोऽभिमतः । नैमित्तिकद्रवत्वं वह्निसंयोगजम् । परत्वापरत्वे दिक्कालपिण्डसंयोगजे । पार्थिवपरमाणुरूपरसगन्धस्पर्शा वह्निसंयोगजा इति विवेकः । संयोगविभागवेगाः कर्मजाः । आद्यौ संयोगविभागौ कर्मजौ । शब्दोत्तरविभागौ विभागजौ । आद्यः शब्दो विभागादपि जायते, उत्तरो विभागो विभागादेव जायत इति विवेकः । परत्वापरत्वद्वित्वद्विपृथक्त्वदयो बुद्धयपेक्षाः । एषामुत्पत्तौ निमित्तकारणं बुद्धिः । आदिशब्दात् त्रित्वत्रिपृथक्त्वादिपरिग्रहः । संयोग ही यहाँ 'उत्तरसंयोग' शब्द से इष्ट है । वह्नि के संयोग से नैमित्तिक द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । द्रव्यों के साथ दिशा एवं काल के संयोग से परत्व एवं अपरत्व की उत्पत्ति होती है । पार्थिव परमाणुओं के रूप, रस, गन्ध और स्पर्श ये सभी (विशेष प्रकार के) वह्निसंयोग रूप पाक से उत्पन्न होते हैं (अतः संयोगज होते हुए भी अपाकज नहीं हैं) । संयोग, विभाग और वेग ये तीनों क्रिया से उत्पन्न होते हैं । पहला संयोग और पहला विभाग ये दोनों ही क्रिया से उत्पन्न होते हैं (द्वितीय संयोग की उत्पत्ति संयोग से एवं द्वितीय विभाग की उत्पत्ति विभाग से ही होती है) । शब्द और उत्तर विभाग दोनों ही विभाग से उत्पन्न होते हैं । यह ध्यान रखना चाहिए कि (इनमें) प्रथम शब्द विभाग से भी उत्पन्न होता है, किन्तु उत्तर विभाग केवल विभाग से ही उत्पन्न होता है । परत्व, अपरत्व, द्वित्व, द्विपृथक्त्वदि 'बुद्धिसापेक्ष' हैं, अर्थात् इन सबों की उत्पत्ति में बुद्धि निमित्तकारण है ! 'आदि' पद से त्रित्व एवं त्रिपृथक्त्व प्रभृति को समझना चाहिए ।

२४० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य- प्रशस्तपादभाष्यम् रूपरसगन्धानुष्णस्पर्शशब्दपरिमाणैकत्वैकपृथक्त्वस्नेहाः समानजात्या- रम्भकाः । सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाह्यासमानजात्यारम्भकाः । रूप, रस, गन्ध, उष्ण से भिन्न सभी स्पर्श, शब्द, परिमाण, एकत्व, एकपृथक्त्व और स्नेह ये नौ गुण अपने-अपने समानजातीय गुणों के ही उत्पादक हैं । सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष और प्रयत्न ये पाँच गुण अपने से भिन्नजातीय वस्तुओं के उत्पादक हैं । न्यायकन्दली रूपादयः स्नेहान्ताः समानजात्यारम्भकाः । कारणरूपात् कार्यरूपं रसाद्रसो गन्धाद् गन्धः, स्पर्शात् स्पर्शः, स्नेहात् स्नेहो महत्त्वान्महत्त्वमित्यादि योज्यम् । शब्दस्तु स्वाश्रय एव शब्दान्तरारम्भकः । अत्र कारणत्वमात्रं विवक्षितम्, न त्वसमवायिकारणत्वम्, अन्यथा विजातीयानां पाकजानां निमित्तकारणस्योष्णस्पर्शव्यवच्छेदोऽसङ्गतार्थः स्यात् । नन्वेवं तर्हि कथं रूपादीनां ज्ञानकारणत्वम् ? न, तद्व्यतिरेकेण समानजातीयारम्भकत्वस्याभि- प्रेतत्वात् । सुखादयोऽसमानजात्यारम्भकाः । सुखमिच्छायाः कारणं दुःखं द्वेषस्य इच्छाद्वेषौ प्रयत्नस्य सोऽपि कर्मणः । पुत्रसुखं पितरि सुखं जनयति, रूप से लेकर स्नेहपर्यन्त नौ गुण समानजातीय गुणों के उत्पादक हैं । कारणों में रहनेवाले रूप से कार्य में रूप की उत्पत्ति होती है । कारण में रहनेवाले रस से कार्य में रस की उत्पत्ति होती है । कारणों में रहनेवाले गन्ध से कार्य में गन्ध की उत्पत्ति होती है । कारणों में रहनेवाले स्पर्श से कार्य में स्पर्श की उत्पत्ति होती है । कारणों में रहनेवाले स्नेह से कार्य में स्नेह की उत्पत्ति होती है । कारणों में रहनेवाले महत्परिमाण से कार्य में महत्परिमाण की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार के वाक्यों की कल्पना करनी चाहिए । शब्द अपने आश्रय में ही दूसरे शब्द को उत्पन्न करता है । यहाँ 'आरम्भकत्व' शब्द से सामान्यतः कारणत्व ही विवक्षित है, (प्रकरणप्राप्त) असमवायिकारणत्व नहीं; क्योंकि ऐसा न मानने पर उष्ण स्पर्श को प्रकृत लक्ष्यबोधक वाक्य में छोड़ देना असङ्गत होगा, चूँकि उष्ण स्पर्श भी अपने विजातीय पाकजरूपादि गुणों का निमित्तकारण तो है ही । (उष्ण स्पर्श भी अपने सजातीय उष्ण स्पर्श का असमवायिकारण है) । (प्र.) फिर रूपादि अपने ज्ञान के प्रति कैसे कारण होते हैं ? (उ.) प्रकृत में समानजातीय गुणों में ज्ञान से भिन्न गुणों की ही गणना करनी चाहिए । अतः ज्ञान से भिन्न अपने सजातीय गुणों की उत्पादकता ही प्रकृत में विवक्षित है ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २४१

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २४१ प्रशस्तपादभाष्यम् संयोगविभागसङ्ख्यागुरुत्वद्रवत्वोष्णस्पर्शज्ञानधर्माधर्मसंस्काराः समानासमान- जात्यारम्भकाः । संयोग, विभाग, संख्या, गुरुत्व, द्रवत्व, उष्ण स्पर्श, ज्ञान, धर्म, अधर्म और संस्कार ये दश गुण अपने समानजातीय एवं असमानजातीय दोनों तरह की वस्तुओं के उत्पादक हैं। न्यायकन्दली अन्यथा तस्य प्रमोदानुपपत्तिरिति चेत् ? तदसारम्, पुत्रस्य हि मुखप्रसादादिना सुखोत्पत्तिमनुमीय पश्चात् पितरि सुखं जायते । तत्रास्य पुत्रस्य सुखं न कारणम्, तस्यैतावन्तं कालमनवस्थानात् । किन्तु लैङ्गिकी तद्विषया प्रतीतिः कारणमिति प्रक्रिया । संयोगादयः संस्कारान्ताः समानासमानजात्यारम्भकाः । संयोगात् समान- जातीय उत्तरसंयोगो विजातीयं द्वितूलके महत्परिमाणम्, विभागाद्विभागः शब्दश्च, कारणगतैकत्वसङ्ख्यातः कार्यवर्त्तिन्येकत्वसङ्ख्या, द्वित्वबहुत्वसङ्ख्याभ्यां सुखादि अपने असमानजातीय वस्तुओं के उत्पादक हैं। (जैसे कि) सुख इच्छा का, दुःख द्वेष का, इच्छा और द्वेष ये दोनों ही प्रयत्न के एवं प्रयत्न भी क्रिया का उत्पादक है । (प्र.) पुत्र का सुख तो पिता में (अपने सजातीय) सुख को उत्पन्न करता है । अगर ऐसा न हो तो फिर सुखी पुत्र को देखकर पिता का प्रफुल्लित होना युक्त नहीं होगा । (उ.) इस आक्षेप में कुछ विशेष सार नहीं है । यहाँ (पुत्र के सुख से पिता में सुख की उत्पत्ति) की यह रीति है कि पुत्र के प्रफुल्लमुख से पिता को उसमें सुख का अनुमान होता है । इस अनुमान से पिता में दूसरे सुख की उत्पत्ति होती है । पिता के इस सुख में पुत्र का सुख (स्वयं) कारण नहीं है; क्योंकि वह पिता में सुख की उत्पत्ति के अव्यवहितपूर्व क्षण तक (क्षणिक होने के कारण) ठहर नहीं सकता । अतः मुखप्रफुल्लतादि हेतुओं से उत्पन्न पुत्रगत सुखविषयक अनुमिति रूप प्रतीति ही पिता के प्रकृत सुख का कारण है । संयोग से लेकर संस्कारपर्यन्त कथित ये नौ गुण अपने समानजातीय एवं असमान- जातीय दोनों प्रकार की वस्तुओं के उत्पादक हैं । संयोग से उसके सजातीय उत्तरदेश- संयोग (संयोगजसंयोग) की उत्पत्ति होती है, एवं संयोग से ही उसके विजातीय तूल (रूई) के दो अवयवों से उत्पन्न होने वाले एक बड़े तूल के अवयवी के महत्परिमाण की भी उत्पत्ति होती है । विभाग से उसके सजातीय विभागजविभाग की उत्पत्ति होती है एवं विभाग से ही उसके विजातीय शब्द की भी उत्पत्ति होती है, कारण में रहने- वाली एकत्व संख्या से कार्य में उसकी सजातीय एकत्व संख्या की उत्पत्ति होती है एवं द्वित्व-बहुत्वादि संख्याओं से उनके विजातीय अणुत्व एवं महत् परिमाणों की भी

२४२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् | गुणसाधर्म्यवैधर्म्य- प्रशस्तपादभाष्यम् बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषभावनाशब्दाः स्वाश्रयसमवेतारम्भकाः। रूपरसगन्धस्पर्शपरिमाणस्नेहप्रयत्नाः परत्रारम्भकाः। बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, भावना और शब्द ये सात गुण अपने आश्रय में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली वस्तुओं के उत्पादक हैं । रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, परिमाण, स्नेह और प्रयत्न ये सात गुण अपने आश्रय से भिन्न आश्रयों में ही कार्य को उत्पन्न करते हैं । न्यायकन्दली चाणुत्वमहत्त्वे, गुरुत्वाद् गुरुत्वान्तरं पतनं च, द्रवत्वाद् द्रवत्वान्तरं स्यन्दनक्रिया च, उष्णस्पर्शादुष्णस्पर्शः पार्थिवपरमाणुरूपादयश्च, ज्ञानाज्ज्ञानं संस्कारश्च, धर्माद्धर्मः सुखं च, अधर्मादधर्मो दुःखं च, संस्कारात् संस्कारः स्मरणं च । बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषभावनाशब्दाः स्वाश्रयसमवेतारम्भकाः । सुखादयस्तावद्यत्र स्वयं वर्तन्ते तत्रैव कार्यं जनयन्ति । बुद्धिस्तु द्वित्वादिकं परत्रारभमाणाप्यात्मविशेषगुणं जनयन्ती स्वाश्रयसमवेतमेव जनयति, नान्यत्र । रूपरसगन्धस्पर्शपरिमाणस्नेहप्रयत्नाः परत्रारम्भकाः । अवयवेषु उत्पत्ति होती है । (कारणों में रहनेवाले) एक गुरुत्व से (कार्य में रहनेवाले सजातीय) दूसरे गुरुत्व एवं विजातीय पतन इन दोनों की उत्पत्ति होती है । कारणों में रहनेवाले द्रवत्व से कार्य में रहनेवाला उसका सजातीय दूसरा द्रवत्व एवं विजातीय स्यन्दन (प्रसरण) क्रिया, इन दोनों की उत्पत्ति होती है । (कारणों में रहनेवाले) उष्ण स्पर्श से (कार्य में रहने वाले) उष्ण स्पर्शरूप सजातीय कार्य की उत्पत्ति होती है एवं पार्थिव परमाणुओं के रूपादि स्वरूप विजातीय कार्यों की भी उत्पत्ति होती है । ज्ञान से भी अपने सजातीय ज्ञान और विजातीय संस्कार दोनों की उत्पत्ति होती है । धर्म से भी सजातीय धर्म एवं विजातीय सुख दोनों ही प्रकार के कार्य होते हैं । अधर्म भी अपने सजातीय अधर्म एवं विजातीय दुःख दोनों का उत्पादक है । संस्कार भी अपने सजातीय संस्कार एवं विजातीय स्मृति दोनों का उत्पादक है । बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, भावना और शब्द ये सात गुण अपने-अपने आश्रयों में ही समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले पदार्थों के उत्पादक हैं । (इनमें) सुखादि जहाँ स्वयं रहते हैं, वहीं अपने कार्यों को भी उत्पन्न करते हैं; किन्तु बुद्धि अपने आश्रय से भिन्न पदार्थों में भी द्वित्वादि संख्या को उत्पन्न करती है, आत्मा के विशेष गुणों को बुद्धि तो अपने आश्रय में ही समवाय सम्बन्ध से उत्पन्न करती है और किसी आश्रय में नहीं । रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, परिमाण, स्नेह और प्रयत्न ये सात गुण अपने

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २४३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २४३ प्रशस्तपादभाष्यम् संयोगविभागसङ्ख्यैकपृथक्त्वगुरुत्वद्रवत्ववेगधर्माधर्मास्तूभयत्रारम्भकाः । संयोग, विभाग, संख्या, एकपृथक्त्व, गुरुत्व, द्रवत्व, वेग, धर्म और अधर्म ये नौ गुण अपने आश्रय एवं अनाश्रय दोनों प्रकार की वस्तुओं में कार्य को उत्पन्न करते हैं । न्यायकन्दली वर्त्तमाना रूपादयो यथासम्भवमवयविनि रूपादिकमारभन्ते, आत्मनि समवेतः प्रयत्नो हस्तादिषु क्रियाहेतुः । संयोगादय उभयत्रारम्भकाः । स्वाश्रये तदन्यत्र चारम्भकाः । तन्तुषु वर्त्तमानः संयोगस्तेष्वेव पटमारभते, विषयेन्द्रियसंयोगश्चात्मनि ज्ञानम् । वंशदलयोर्विभागोऽन्य- त्राकाशे शब्दमारभते, वंशदलाकाशविभागश्च स्वाश्रय आकाशे । अवयववर्त्तिन्येकत्व- सङ्ख्या अवयविन्येकत्वसङ्ख्यामारभते, स्वाश्रये च द्वित्वादिसङ्ख्याम् । अथावयवेष्वेकपृथ- कत्वमवयविन्येकपृथक्त्वं स्वाश्रयेषु त्रिपृथक्त्वादिकमिति । कारणगताश्च गुरुत्व- द्रवत्ववेगाः कार्ये तानारभन्ते, स्वाश्रयेषु क्रियाम् । धर्माधर्मावात्मनि सुखदुःखे परत्र चाग्न्यादौ ज्वलनादिक्रियाम् । आश्रय से भिन्न आश्रय में ही कार्य को उत्पन्न करते हैं । अवयवों में रहने वाले रूपादि यथासम्भव अवयवों में ही रूपादि को उत्पन्न करते हैं । प्रयत्न स्वयं समवाय सम्बन्ध से आत्मा में रहता है; किन्तु हाथ, पैर प्रभृति अङ्गों में क्रिया को उत्पन्न करता है । संयोगादि ये नौ गुण दोनों ही प्रकार के आश्रयों में कार्य को उत्पन्न करते हैं, अर्थात् ये अपने आश्रय और उससे भिन्न आश्रय, दोनों प्रकार के आश्रयों में कार्य के उत्पादक हैं, (जैसे कि) तन्तुओं में रहनेवाला संयोग अपने आश्रयीभूत उन तन्तुओं में ही पटरूप कार्य को उत्पन्न करता है; किन्तु विषय एवं इन्द्रिय का संयोग (अपने आश्रयीभूत इन दोनों से भिन्न) आत्मा में ज्ञान को उत्पन्न करता है । बाँस के दो दलों का विभाग (अपने आश्रयीभूत उन दो वंशदलों से भिन्न) आकाश में शब्दरूप कार्य को उत्पन्न करता है; किन्तु बाँस के ही दल और आकाश का विभाग अपने आश्रयीभूत आकाश में ही शब्दरूप कार्य को उत्पन्न करते हैं । अवयव में रहनेवाली एकत्व संख्या (अपने आश्रय से भिन्न) अवयवी में एकत्व संख्या को उत्पन्न करती है एवं अपने आश्रयरूप अवयव में द्वित्वादि संख्या को भी उत्पन्न करती है । अवयवों में रहनेवाला एकपृथक्त्व अवयवी में एकपृथक्त्व को एवं अपने आश्रय में त्रिपृथक्त्वादि को भी उत्पन्न करता है । इसी प्रकार कारणों में रहनेवाले गुरुत्व, द्रवत्व, वेग और स्नेह आश्रयीभूत उन कारणों के गुरुत्व, द्रवत्व, वेग एवं स्नेहरूप कार्यों को उत्पन्न करते हैं; किन्तु अपने आश्रय

२४४ न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य- प्रशस्तपादभाष्यम् गुरुत्वद्रवत्ववेगप्रयत्नधर्माधर्मसंयोगविशेषाः क्रियाहेतवः । रूपरसगन्धानुष्णास्पर्शसङ्ख्यापरिमाणैकपृथक्त्वस्नेहशब्दानामसमवायिकारणत्वम् । गुरुत्व, द्रवत्व, वेग, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और विशेष प्रकार के संयोग से सात गुण क्रिया के कारण हैं। रूप, रस, गन्ध, अनुष्णाशीत स्पर्श, संख्या, परिमाण, एकपृथक्त्व, स्नेह और शब्द ये नौ गुण असमवायिकारण हैं । न्यायकन्दली गुरुत्वादयः क्रियाहेतवः । गुरुत्वात्पतनं द्रवत्वात् स्यन्दनं वेगादिषोरुत्तरकर्माणि प्रयत्नाच्छरीरादिक्रिया धर्माधर्माभ्यामन्यादिक्रिया । विशिष्यत इति विशेषः, संयोग एव विशेषः संयोगविशेषः, विशिष्टः संयोगो नोदनाभिघातलक्षणः, सोऽपि क्रियाहेतुरिति वक्ष्यते । रूपादयः शब्दान्ता असमवायिकारणम् । समवायिकारणप्रत्या- सन्नमवधृतसामर्थ्यमसमवायिकारणम् । प्रत्यासत्तिश्च समवायिकारणसमवायः समवायि- कारणैकार्थसमवायश्च । सुखादीनां समवायिकारणमात्मा, तत्र समवाया- में क्रिया को उत्पन्न करते हैं । धर्म और अधर्म अपने आश्रय में (क्रमशः) सुख और दुःख को एवं अपने आश्रय से भिन्न अग्नि प्रभृति में ऊर्ध्वज्वलनादि क्रिया को भी उत्पन्न करते हैं । ये गुरुत्वादि सात गुण क्रिया के उत्पादक हैं। इनमें गुरुत्व से पतनरूप क्रिया, द्रवत्व से प्रसरणरूप क्रिया, वेग से तीर प्रभृति की उत्तर क्रियायें, प्रयत्न से शरीर की क्रिया, धर्म और अधर्म से अग्नि प्रभृति में ऊर्ध्वज्वलनादि क्रियायें होती हैं । 'संयोग एव विशेषः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार नोदन एवं अभिघातरूप विशेष प्रकार के संयोग ही प्रकृत 'संयोगविशेष' शब्द से इष्ट हैं । आगे कहेंगे कि ये दोनों ही प्रकार के संयोग क्रिया के कारण हैं । रूप से लेकर शब्दपर्यन्त कथित ये सात गुण असमवायिकारण हैं । समवायिकारण में 'प्रत्यासन्न' अर्थात् समवाय सम्बन्ध से सम्बद्ध जिस वस्तु में कार्य करने का सामर्थ्य निश्चित है, वही असमवायिकारण है । कार्यों के साथ अन्वय (अर्थात् कारण के अव्यवहित क्षण में कार्य का अवश्य रहना) एवं व्यतिरेक (अर्थात् जिसके न रहने पर कार्य उत्पन्न ही न हों) यही दोनों कारणों में कार्य के उत्पादन का सामर्थ्य है । 'प्रत्यासन्न' शब्द में प्रयुक्त 'प्रत्यासत्ति' शब्द समवायिकारणानुयोगिक समवाय सम्बन्ध का वाचक है । यह समवायरूप सम्बन्ध प्रकृत में दो प्रकार का है- (१) समवायिकारणानुयोगिक

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २४५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २४५ न्यायकन्दली दात्ममनःसंयोगस्तेषामसमवायिकारणम् । नन्वेवं तर्हि धर्माधर्मयोरप्यसमवायिकारणत्वं स्यात्, न, तयोः समस्तात्मविशेषगुणोत्पत्तौ सामर्थ्यानवधारणात् । तथा हि-धर्माद्धर्म- दुःखयोरनुत्पत्तिः, अधर्माच्च धर्मसुखयोरनुत्पादः । एवं ज्ञानादीनामपि प्रत्येकं व्यभिचारो दर्शनीयः । सर्वत्रावधृतसामर्थ्यस्तु ज्ञातुमनःसंयोग इत्येतावता विशेषेण तस्यैवासमवायि- कारणत्वम् । तथा पटरूपस्य समवायिकारणेन पटेन सहैकस्मिन्नर्थे तन्तौ समवायात् तन्तु- रूपं पटरूपस्यासमवायिकारणम्, न रसादयः, तस्यैव तदुत्पत्तावन्वयव्यतिरेकाभ्यां सामर्थ्याव- धारणात् । एवं रसादिष्वपि योज्यते । उष्णस्पर्शस्य पाकजारम्भे निमित्तकारणत्वमप्यस्ति, तदर्थमनुष्णस्य ग्रहणम् । रूपरसगन्धानुष्णस्पर्शपरिमाणस्नेहानां समवायिकारणैकार्थसमवायाद- समवायिकारणत्वम्, कारणवर्तिनामेषां कार्यसजातीयारम्भकत्वात् । शब्दस्य समवाय एवं (२) समवायिकारण जिस वस्तु में समवेत हो तदनुयोगिक समवाय । (प्रथम प्रकार के सम्बन्ध के अनुसार) आत्मा और मन का संयोग सुखादि का असम- वायिकारण है; क्योंकि सुख के समवायिकारण आत्मा में आत्मा और मन का संयोग समवाय सम्बन्ध से है । (प्र.) इस प्रकार तो धर्म और अधर्म भी असमवायिकारण होंगे । (उ.) नहीं; क्योंकि उन दोनों में आत्मा के किसी भी विशेष गुण को उत्पन्न करने का सामर्थ्य (अन्वय और व्यतिरेक से) निश्चित नहीं है । इसी रीति से धर्म के द्वारा अधर्म और दुःख की उत्पत्ति और अधर्म से सुख तथा धर्म की उत्पत्ति का निराकरण होता है । इसी प्रकार आत्मा के ज्ञानादि सभी विशेष गुणों में व्यभिचार दिखाना चाहिए । आत्मा के सभी गुणों में से केवल आत्मा और मन का संयोग ही ऐसा गुण है, जिसमें आत्मा के सभी विशेष गुणों के उत्पादन का सामर्थ्य (अर्थात् अन्वय और व्यतिरेक) निर्णीत है, इसी वैशिष्ट्य के कारण आत्मा के गुणों में से केवल आत्मा और मन का संयोग ही आत्मा के सभी विशेष गुणों का असमवायिकारण है । (असमवायिकारण के लक्षण में कथित एक दूसरे सम्बन्ध के अनुसार) तन्तुओं का रूप पट के रूप का असमवायिकारण है; क्योंकि पटगत रूप का समवायिकारण पट है, वह तन्तुओं में समवाय सम्बन्ध से रहता है एवं तन्तुओं का रूप भी तन्तुओं में ही समवाय सम्बन्ध से है । इस प्रकार तन्तुओं के रूपों में ही पटगत रूप के उत्पादन का सामर्थ्य निश्चित है, रसादि में नहीं, अतः तन्तुओं के रूप ही पटगत रूप के असमवायिकारण हैं, पटगत रसादि नहीं । इसी प्रकार अवयवियों में रहनेवाले रसादि का असमवायिकारणत्व अवयवों में रहनेवाले रसादि में ही समझना चाहिए। उष्ण स्पर्श पाकज रूपादि का निमित्तकारण भी है, अतः (लक्ष्यबोधक वाक्य में) 'अनुष्ण' पद लिखा है । समवायिकारणरूप एक वस्तु में कार्य के साथ समवाय सम्बन्ध से रहने के कारण रूप, रस, गन्ध, अनुष्ण स्पर्श, परिमाण और स्नेह ये छः गुण असमवायिकारण होते हैं ।

२४६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य- प्रशस्तपादभाष्यम् बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावनानां निमित्तकारणत्वम् । संयोगविभागोष्णस्पर्शगुरुत्वद्रवत्ववेगानामुभयथा कारणत्वम् । बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और भावना ये सभी निमित्तकारण (ही) होते हैं । संयोग, विभाग, उष्ण स्पर्श, गुरुत्व, द्रवत्व और वेग ये छः गुण असमवायिकारण भी हैं और निमित्तकारण भी । न्यायकन्दली समवायिकारणसमवायादसमवायिकारणता, आकाशाश्रितेनाकाश एव शब्दान्तरारम्भात् । सङ्ख्यापृथक्त्वयोरुभयथा कारणत्वम्, कारणवर्तिनोस्तयोः कार्ये यथासङ्ख्यमेकत्वैकपृथक्त्या- रम्भकत्वात्, स्वाश्रये द्वित्वद्विपृथक्त्वजनकत्वात् । बुद्ध्यादीनां निमित्तकारणत्वम् । तेषां निमित्तकारणत्वमेवेत्यर्थः । संयोगविभागोष्णस्पर्शगुरुत्वद्रवत्ववेगानामुभयथा कारणत्वम् । असमवायिकारणत्वं निमित्तकारणत्वं चेत्यर्थः । तथाहि-भेरीदण्डसंयोगः शब्दोत्पत्तौ निमित्तं भेर्याकाशसंयोगोऽसम- वायिकारणम् । एवं विभागे दलविभागो निमित्तं वंशदलाकाशविभागोऽसमवायिकारणम् । उष्ण- स्पर्श उष्णस्पर्शस्यासमवायिकारणं पाकजानां निमित्तकारणम् । गुरुत्वं स्वाश्रये पतनस्यासमवायि- शब्द अपने कार्य के समवायिकारण (आकाश) में रहने से ही असमवायिकारण है; क्योंकि आकाश में रहने वाले शब्द से आकाश में ही शब्दों की उत्पत्ति होती है । संख्या एवं पृथक्त्व ये दोनों ही प्रकार से असमवायिकारण होते हैं; क्योंकि (कारणगत) ये दोनों कार्यगत एकत्व एवं पृथक्त्व के कारण हैं एवं अपने ही समवायिकारणरूप आश्रय में ही द्वित्व या द्विपृथक्त्व के कारण हैं । बुद्धि प्रभृति इन नौ गुणों का निमित्तकारणत्व साधर्म्य है, अर्थात् ये निमित्त- कारण ही होते हैं (असमवायिकारण भी नहीं) । संयोग, विभाग, उष्ण स्पर्श, गुरुत्व और वेग इन छः गुणों का 'उभयथा कारणत्व' साधर्म्य है, अर्थात् ये सभी गुण असमवायिकारण और निमित्तकारण दोनों ही होते हैं । भेरी और आकाश का संयोग शब्द का असमवायिकारण है एवं भेरी और आकाश कांसंयोग शब्द का ही निमित्तकारण है एवं विभाग में भी (उभयथा कारणत्व) है; क्योंकि बाँस के दोनों दलों का विभाग शब्द का निमित्तकारण है एवं बाँस के दल और आकाश का विभाग शब्द का ही असमवायिकारण भी है । (कारणगत) उष्ण स्पर्श (कार्यगत) उष्ण स्पर्श का असमवायिकारण है एवं पाकज रूपादि का निमित्त-

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २४७

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २४७ प्रशस्तपादभाष्यम् परत्वापरत्वद्वित्वद्विपृथक्त्वादीनामकारणत्वम् । संयोगविभागशब्दात्मविशेषगुणानां प्रदेशवृत्तित्वम् । परत्व, अपरत्व, द्वित्व और द्विपृथक्त्वादि गुण किसी के भी कारण नहीं हैं । संयोग, विभाग, शब्द एवं आत्मा के सभी विशेष गुण ये सभी प्रादेशिक (अव्याप्यवृत्ति) हैं । न्यायकन्दली कारणम्। नोदनाभिघातः क्रियोत्पत्तौ निमित्तकारणम् । द्रवत्ववेगयोरपि योज्यम् । परत्वापरत्वादीनामकारणत्वम् । नैतान्यसमवायिकारणं नापि निमित्तकारणम् । द्वित्व- द्विपृथक्त्वादीनामित्यादिपदेन त्रिपृथक्त्वानां परमाणुपरिमाणपरममहत्परिमाणयोश्च परिग्रहः । संयोगविभागशब्दात्मविशेषगुणानां प्रदेशवृत्तित्वमिति । प्रदेश- वृत्तयोऽव्याप्यवृत्तयः स्वाश्रये वर्त्तन्ते, न वर्त्तन्ते चेत्यर्थः । नन्वेतदयुक्तम्, युगपदेक- स्यैकत्र भावाभावविरोधात् । नानुषन्नम्, प्रमाणेन तथाभावप्रतीतेः । तथा हि- हतो वृक्षस्य पुरुषेण सहाग्रे संयोगो मूले च तदभावः प्रतीयते, मूले वृक्षोप- लब्धेऽपि संयोगस्य सर्वैरनुपलम्भात् । न च मूलाग्रयोरेव संयोगतदभावौ, तत्रप्रदेशा- कारण भी है । गुरुत्व अपने आश्रय की पतन क्रिया का असमवायिकारण है एवं नोदन और अभिघातजनित क्रिया का निमित्तकारण भी है । इसी तरह द्रवत्व और वेग में भी विचार करना चाहिए । परत्व एवं अपरत्व प्रभृति चार गुणों का 'अकारणत्व' साधर्म्य है, अर्थात् ये न तो असमवायिकारण हैं और न निमित्तकारण ही (समवायिकारण तो द्रव्य से भिन्न कोई होता ही नहीं है) । 'द्वित्वद्विपृथक्त्वादि' शब्द में प्रयुक्त 'आदि' पद से त्रिपृथक्त्व, परमाणुओं के परिमाण एवं परममहत्परिमाण प्रभृति को समझना चाहिए (अर्थात् ये भी किसी के कारण नहीं होते) । संयोग, विभाग, शब्द और आत्मा के सभी विशेष गुण, इन सबों का 'प्रदेशवृत्ति- त्व' साधर्म्य है। 'प्रदेशवृत्ति' शब्द का अर्थ है अव्याप्यवृत्ति, अर्थात् ये अपने आश्रय (के किसी अंश) में रहें भी, एवं अपने आश्रय (के ही दूसरे किसी अंश ) में न भी रहें । (प्र.) यह तो ठीक नहीं है; क्योंकि एक ही समय में एक ही आश्रय में एक ही वस्तु रहे भी और न भी रहे; क्योंकि 'रहना' और 'न रहना' दोनों परस्पर विरोधी हैं ? (उ.) इसमें कुछ भी असङ्गति नहीं है कि एक ही आश्रय में भाव और अभाव की उक्त प्रतीति प्रमाण से उत्पन्न होती है। एक ही महावृक्ष के अग्रभाग के साथ पुरुष के संयोग की प्रतीति होती है, उसी वृक्ष के मूल भाग में उसी पुरुष के संयोग के

२४८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य- न्यायकन्दली वच्छेदेन वृक्ष एव पुरुषस्य भावाभावप्रतीतेः । यदि प्रदेशस्य संयोगो न प्रदेशिनस्तदा प्रदेशस्यापि स्वप्रदेशापेक्षया प्रदेशित्वात्रिष्प्रदेशे परमाणुमात्रे संयोगः स्यात् । तद्वृत्तिस्तु संयोगो न प्रत्यक्ष इति संयोगप्रतीत्यभाव एव पर्यवस्यति । यथा च रूपादि- भेदेऽप्येकोऽवयवी न भिद्यते तथा संयोगतदभावाभ्यामपि, उभयत्रापि तदेकत्वस्य प्रत्यक्ष- सिद्धत्वात् । यद्यप्युभयाश्रयः संयोगस्तयोरुपलब्धावुपलभत एव, तथापि तस्य रूपादिवद् गृह्यमाणाखिलावयवावच्छेदेनानुपलम्भादव्यापकत्वम् । एवं शब्दोऽप्याकाशं न व्याप्नोति, तत्रैवास्य देशभेदनोपलम्भानुपलम्भाभ्यां युगपद्भावाभावसम्भवात् । बुद्ध्यादयो ह्यन्तर्बहि- श्चोपलम्भानुपलम्भाभ्यामव्यापकाः । कथं तर्हि धर्माधर्माभ्यामग्न्यादिषु क्रिया, तयोस्त- देशेऽभावादिति चेत्, न, तत्रासतोरपि तयोः स्वाश्रयसन्निधिमात्रेण निमित्तत्वात् । यथा वस्त्रस्यैकान्ते चाण्डालस्पर्शोऽपरान्तसंयुक्तस्य त्रैवर्णिकस्य प्रत्यवायहेतुस्तथेदमपि द्रष्टव्यम् । अभाव की भी प्रतीति होती है । अगर प्रदेशों (अवयवों) में ही संयोग मानें, प्रदेशी (अवयवी) में संयोग न मानें तो उन प्रदेशों में भी संयोग का मानना सम्भव न होगा; क्योंकि वे प्रदेश भी अपने अवयवों की अपेक्षा अवयवी हैं ही, फलतः अवयवों (प्रदेशों) से शून्य परमाणुओं में ही संयोग मानना पड़ेगा । जिससे संयोग का प्रत्यक्ष ही असम्भव हो जायगा; क्योंकि उसका आश्रय परमाणु अतीन्द्रिय है । अतः (अवयवों में ही संयोग है, अवयवियों में नहीं) इस पक्ष में संयोग का प्रत्यक्ष ही न हो पायेगा । जैसे रूप-रसादि के परस्पर भिन्न होने पर भी उनके आश्रय रूप अवयवी परस्पर भिन्न नहीं होते, उसी प्रकार संयोग और संयोगाभाव के आश्रय दो वस्तुओं के आधार होने के कारण ही परस्पर भिन्न नहीं हैं; क्योंकि इन दोनों के आश्रयों में एकता की प्रतीति प्रत्यक्ष प्रमाण से होती है । यद्यपि संयोग अपने प्रतियोगी एवं अनुयोगी दोनों में ही आश्रित है, क्योंकि उसके प्रत्यक्ष के लिए दोनों का प्रत्यक्ष आवश्यक है, तथापि जिस प्रकार रूपादि की उपलब्धि प्रत्यक्ष होनेवाले अवयवी के सभी अवयवों में होती है, संयोग की उपलब्धि उस प्रकार से सभी अवयवों में नहीं होती । अतः संयोग 'अव्यापक' अर्थात् अव्याप्यवृत्ति है । इसी प्रकार शब्द भी (अपने आश्रय) आकाश के समूचे प्रदेश में नहीं रहता है, अतः एक ही समय आकाश में प्रदेश भेद से शब्द की सत्ता और असत्ता दोनों की ही सम्भावना है । ज्ञानादि गुणों की प्रतीति अन्तर्मुखी होती है, बहिर्मुखी नहीं होती, अतः वे भी अव्यापक अर्थात् प्रादेशिक हैं । (प्र.) तो फिर धर्म और अधर्म से वह्नि प्रभृति में क्रिया कैसे होती है ? क्योंकि वे तो वहाँ नहीं हैं ? (उ) क्रिया के प्रदेश में धर्मादि के न रहने पर भी धर्मादि आत्मा में रहते हैं, आत्मा का क्रिया प्रदेश से सान्निध्य है, इसी परम्परा सम्बन्ध के द्वारा धर्मादि क्रिया के कारण हैं । जिस प्रकार कपड़े के एक छोर में चाण्डाल का स्पर्श उसी कपड़े के दूसरे छोर से संयुक्त त्रैवर्णिकों के प्रत्यवाय का कारण होता है, वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिए ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २४९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २४९ प्रशस्तपादभाष्यम् शेषाणामाश्रयव्यापित्वम् । अपाकजरूपरसगन्धस्पर्शपरिमाणैकपृथक्त्वसांसिद्धिकद्रवत्वगुरुत्वस्नेहानां यावद्- द्रव्यभावित्वम् । शेषाणामयावद्द्रव्यभावित्वञ्चेति । अवशिष्ट सभी गुण अपने आश्रय के सभी अंशों में रहते हैं । अपाकज रूप, अपाकज रस, अपाकज गन्ध, अपाकज स्पर्श, परिमाण, एकत्व, एकपृथक्त्व, सांसिद्धिक द्रवत्व, गुरुत्व और स्नेह इन दश गुणों का 'यावद्द्रव्यभावित्व' साधर्म्य है । 'शेष' अर्थात् कथित अपाकज रूपादि से भिन्न सभी गुणों का 'अया- वद्द्रव्यभावित्व' साधर्म्य है । न्यायकन्दली शेषाणामाश्रयव्यापित्वम् । उक्तेभ्यो येऽन्ये ते शेषाः । तेषामाश्रयव्यापित्वं संयोगा- दिवदव्यापकं न भवतीत्यर्थः । अपाकजरूपादीनां यावद्द्रव्यभावित्वम् । यावदाश्रयद्रव्यं तावद्रूपादयो विद्यन्ते । पाकजरूपादयः सत्येवाश्रये नश्यन्तीत्यपाकजग्रहणम् । शेषाणामयावद्द्रव्यभावित्वम् । अपाकजरूपादिव्यतिरिक्ता गुणा यावद्द्रव्यं न सन्ति, सत्येवाश्रये नश्यन्तीत्यर्थः । शेष सभी गुणों का 'आश्रयव्यापित्व' साधर्म्य है । ऊपर जितने भी गुण कहे गये हैं, उनसे भिन्न सभी गुण यहाँ 'शेष' शब्द से अभिप्रेत हैं । उन सबों का 'आश्रय- व्यापित्व' (साधर्म्य है), अर्थात् वे संयोगादि गुणों की तरह अव्याप्यवृत्ति नहीं हैं । कथित अपाकज रूपादि गुणों का 'यावद्द्रव्यभावित्व' (साधर्म्य है), अर्थात् जब तक आश्रयरूप द्रव्य रहते हैं, तब तक ये अपाकज रूपादि रहते हैं । इसमें 'अपाकज' पद का उपादान इसलिए किया गया है कि पाकज रूपादि आश्रय के रहते हुए ही नष्ट हो जाते हैं । 'शेष' गुणों का 'अयावद्द्रव्यभावित्व' साधर्म्य है । अर्थात् उक्त अपाकज रूपादि से भिन्न जितने भी गुण हैं, वे तब तक नहीं रहते, जब तक उनके आश्रय द्रव्य रहते हैं, किन्तु उनके रहते ही नष्ट हो जाते हैं । अब प्रत्येक गुण का असाधारण धर्म कहना है, अतः 'रूपादीनाम्' इत्यादि वाक्य लिखते हैं । 'रूपमादिर्येषाम्' इस व्युत्पत्ति से सिद्ध 'रूपादि' शब्द से युक्त प्रकृत

२५० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे रूपादि- प्रशस्तपादभाष्यम् रूपादीनां सर्वेषां गुणानां प्रत्येकम्परसामान्यसम्बन्धाद्रूपादिसंज्ञा भवन्ति । रूपादि सभी गुणों के रूपादि नाम इसलिए हैं कि उनमें (रूपत्वादि) अपर जातियों का सम्बन्ध है । न्यायकन्दली सम्प्रति प्रत्येकं गुणानां परस्परवैधर्म्यप्रतिपादनार्थमाह-रूपादीनामिति । रूपमादिर्येषां तेषामेकैकं प्रत्यपरजाते रूपत्वादिकायाः सम्बन्धाद्रूपादिसंज्ञा रूपमिति रस इति संज्ञा भवन्ति । रूपत्वाद्यपरसामान्यकृता रूपादिसंज्ञा रूपादीनां प्रत्येकं वैधर्म्यम् । रूपत्वसामान्यं नास्तीति केचित्, तदयुक्तम्, नीलपीतादिभेदेषु रूपं रूपमिति प्रत्ययानुवृत्तेः । चक्षुर्ग्राह्य- तोपाधिकृता तदनुवृत्तिरिति चेत्, न, तेषां रूपमित्येवं चक्षुषाऽग्रहणात् । तद्ग्राह्यतानिमित्तत्वे हि ग्रहणानन्तरं तथा प्रत्ययः स्यात् । चक्षुर्ग्राह्यता तद्ग्रहणयोग्यता, सा च नीलादिषु त्रिकालावस्थायिनीति चेत् ? अस्तु कामम्, किन्त्वेषा यदि प्रतिरूपं व्यावृत्ता, प्रत्ययानुगमो न स्यात्, एकनिमित्ताभावात् । अथानुवृत्ता, संज्ञाभेदमात्रम् । एवं रसादयोऽपि व्याख्याताः । वाक्य का अर्थ है कि रूपादि गुणों में से प्रत्येक में रूपत्वादि स्वरूप अपर जातियों के सम्बन्ध से रूप, रस आदि संज्ञायें होती हैं । रूपादि नाम ही रूपादि गुणों के असाधारण धर्म हैं, जिनकी मूल हैं रूपत्वादि जातियाँ । कोई कहते हैं कि (प्र.) रूपत्व नाम की कोई जाति नहीं है । (उ.) किन्तु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि नीलपीतादि विभिन्न रूपों में 'यह रूप है' इस एक प्रकार की (अनुवृत्ति) प्रतीति होती है । ( प्र.) सभी रूप आँख से देखे जाते हैं, इसी से सभी रूपों में एक आकार की प्रतीति होती है । (उ.) नीलपीतादि में 'यह रूप है' इस आकार की प्रतीति आँख से नहीं होती है, अगर चक्षु से गृहीत होने के कारण ही नीलादि में 'यह रूप है' इस प्रकार की प्रतीति हो, तो फिर चक्षु के द्वारा ग्रहण के बाद ही 'यह रूप है' इस प्रकार की प्रतीति होनी चाहिए । (प्र.) 'चक्षुर्ग्राह्यत्व' (चक्षु से गृहीत होने ) का अर्थ है-चक्षु के द्वारा गृहीत होने की स्वरूपयोग्यता, यह तो नीलादि में तीनों कालों में है ही । (उ.) मान लिया कि है; किन्तु यह योग्यता नीलादि प्रत्येक रूप से अगर अलग-अलग है तो फिर 'सभी रूपों में ये रूप है' इस एक आकार की प्रतीति नहीं होगी; क्योंकि उसका कोई एक कारण नहीं है । अगर चक्षुर्ग्राह्यता सभी रूपों में एक है, तो फिर जाति को मान लेने में कोई विवाद ही नहीं रह जाता है । इसी प्रकार से रसादि की भी व्याख्या हो जाती है ।