१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
खण्ड ९ मन्त्र २ ११३ की, जठरानल में बाह्य अग्नितत्त्व की, देहगत जल के अंश में बाह्य जल तत्त्व की एवं शरीर के पार्थिव भाग में ही सम्पूर्ण पृथ्वी की धारणा करनी चाहिए तथा हर एक तत्त्व की धारणा के समय क्रमश: हं, यं, रं, वं, लं-इन बीजमंत्रों का उच्चारण करे। इस धारणा को सर्वोत्तम बताया है। यह पापों का विनाश करने वाली क्रिया है॥ जान्वन्तं पृथिवी ह्यांशो ह्यापां पाखन्तमुच्यते। हृदयांशस्तथाग्न्यंशो भ्रूमध्यान्तोऽनिलांशकः ॥४॥ आकाशांशस्तथा प्राज्ञ मूर्द्धांशः परिकीर्तितः। ब्रह्माणं पृथिवीभागे विष्णुं तोयांशके तथा ॥५॥ अग्न्यंशे च महेशानमीश्वरं चानिलांशके। आकाशांशे महाप्राज्ञ धारयेत्तु सदाशिवम् ॥ ६ ॥ पैर से लेकर घुटने तक का भाग पृथिवी का अंश कहा गया है। घुटने से लेकर गुदा तक का भाग जल का अंश बतलाया गया है। गुदा भाग से ऊपर हृदय प्रदेश तक का क्षेत्र अग्नि अंश माना गया है। हृदय से ऊपर भौंहों के मध्यभाग तक वायु का अंश निश्चित किया गया है और मस्तक का क्षेत्र आकाश तत्त्व का अंश कहा गया है। हे महाप्राज्ञ ! पृथ्वी तत्त्व के अंश में ब्रह्माजी का, जल-तत्त्व के अंश में विष्णुजी का, अग्नि तत्त्व के अंश में महादेवजी का, वायु तत्त्व के अंश में ईश्वर का और आकाश तत्त्व के अंश में सदाशिव का चिन्तन करना चाहिए॥ ४-६॥ अथवा तव वक्ष्यामि धारणां मुनिपुङ्गव । पुरुषे सर्वशास्तारं बोधानन्दमयं शिवम् ॥ ७॥ धारयेद्बुद्धिमान्नित्यं सर्वपापविशुद्धये। ब्रह्मादिकार्यरूपाणि स्वे स्वे संहृत्य कारणे ॥ ८ ॥ सर्वकारणमव्यक्तमनिरूप्यमचेतनम् । साक्षादात्मनि संपूर्णे धारयेत्प्रणवे मनः। इन्द्रियाणि समाहृत्य मनसात्मनि योजयेत् ॥ ९ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! अब तुम्हारे लिए एक और दूसरी धारणा का वर्णन करता हूँ। ज्ञानी मनुष्य अन्तर्यामी पुरुष (आत्मा) में सभी पर शासन करने वाले बोधमय, आनन्दस्वरूप तथा कल्याणमय अविनाशी परमात्मतत्त्व की प्रत्येक दिन धारणा करे। इससे सभी तरह के पापों का शमन हो जाता है। कार्यस्वरूप ब्रह्मा आदि का अपने-अपने कारण में लय करके सभी के परम कल्याण, अनिर्वचनीय एवं बुद्धि से परे जो अव्यक्त परमात्मतत्त्व है, ऐसे उन श्रेष्ठ परमात्मा को अपनी आत्मा में धारण करे अर्थात् ये साक्षात् पूर्ण परब्रह्म परमात्मा ही अन्तर्यामी आत्मा के रूप में विद्यमान हैं, ऐसा दृढ़ निश्चय करे और इस प्रकार से आत्म धारणा करते समय अपने मन को सभी कलाओं से युक्त प्रणवस्वरूप परमात्मा में ही स्थित करे। इसके साथ ही मन के द्वारा समस्त इन्द्रियों को भी अपने-अपने विषयों से अलग कर के आत्मा में नियोजित कर दे॥ ७-९॥ ॥ नवमः खण्डः ॥ यहाँ दो प्रकार के ध्यान तथा उनका फल बताया जा रहा है- अथातः संप्रवक्ष्यामि ध्यानं संसारनाशनम्। ऋतं सत्यं परं ब्रह्म सर्वसंसारभेषजम् ॥ १ ॥ ऊर्ध्वरेतं विरूपाक्षं विश्वरूपं महेश्वरम्। सोऽहमित्यादरेणैव ध्यायेद्योगीश्वरेश्वरम् ॥२॥ अब मैं जगत् के बन्धनों का विनाश करने वाले ध्यान का वर्णन करता हूँ, जो समस्त संसाररूपी रोग के एक मात्र औषध रूप, ऊर्ध्वरेता, विषम नेत्रों वाले, योगीश्वरों के भी ईश्वर, विश्वरूप एवं महेश्वररूप हैं, उन ऋत एवं सत्यस्वरूप अविनाशी परब्रह्म परमात्मा का अपनी आत्मा के रूप में आदरपूर्वक ध्यान करे। अपनी बुद्धि में यह भाव पूर्ण निष्ठा से प्रतिष्ठित करे कि वह अविनाशी परमात्मस्वरूप परब्रह्म मैं ही हूँ॥ १-२॥
११४ जाबालदर्शनोपानषद अथवा सत्यमीशानं ज्ञानमानन्दमद्वयम्। अत्यर्थममलं नित्यमादिमध्यान्तवर्जितम् ॥३॥ तथाऽस्थूलमनाकाशमसंस्पृश्यमचाक्षुषम् । न रसं न च गन्धाख्यमप्रमेयमनूपमम् ॥४॥ आत्मानं सच्चिदानन्दमनन्तं ब्रह्म सुव्रत। अहमस्मीत्यभिध्यायेद्ध्येयातीतं विमुक्तये ॥ ५ ॥ ध्यान का दूसरा भेद इस प्रकार है-जो सत्यरूप, सर्वेश्वर, ज्ञानमय, आनन्दस्वरूप, अनुपम, अतिनिर्मल, नित्य एवं आदि, मध्य तथा अन्त रहित है, स्थूल प्रपञ्च से वह सर्वथा परे है, आकाश से अलग, स्पर्श में आने वाली वायु से भी विलक्षण है, चक्षुओं से दृष्टिगोचर होने वाले अग्नितत्त्व से भी हमेशा पृथक् है, रसस्वरूप जल एवं गन्धस्वरूप पृथिवी से भी सर्वथा विलक्षण है, जिसकी स्वयं प्रत्यक्ष प्रमाणों के द्वारा जानकारी नहीं प्राप्त की जा सकती, जो अनुपम है, शरीर से अतीत है, ऐसे उस सत्-चित्, आनन्दमय एवं अन्तरहित परब्रह्म का अपनी आत्मा के रूप में चिन्तन करे, बुद्धि के द्वारा यह निश्चित करे कि वह परब्रह्म परमात्मा मैं स्वयं ही हूँ। इस तरह से किया हुआ ध्यान मोक्ष प्रदान करने वाला होता है ॥ ३-५ ॥ एवमभ्यासयुक्तस्य पुरुषस्य महात्मनः । क्रमाद्वेदान्तविज्ञानं विजायेत न संशयः ॥ ६ ॥ इस प्रकार से ध्यान के अभ्यास में जो भी बुद्धिमान् पुरुष लगा रहता है, उसे वेदान्त वर्णित ब्रह्म तत्त्व का निःसन्देह ही विशेष ज्ञान प्राप्त हो जाता है-इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥ ६ ॥ ॥ दशमः खण्डः ॥ यहाँ समाधि एवं उसके फल का वर्णन प्रस्तुत है- अथातः संप्रवक्ष्यामि समाधिं भवनाशनम्। समाधिः संविदुत्पत्तिः परजीवैकतां प्रति ॥१॥ अब मैं इन समस्त सांसारिक-बन्धनों का विनाश कर देने वाली समाधि का वर्णन करता हूँ। परमात्मा तथा जीवात्मा के एकीभाव के सम्बन्ध में निश्चयात्मक बुद्धि का प्राकट्य होना ही समाधि है ॥ १ ॥ नित्यः सर्वगतो ह्यात्मा कूटस्थो दोषवर्जितः । एकः संभिद्यते भ्रान्त्या मायया न स्वरूपतः ॥२ यह आत्मा अविनाशी, नित्य, सर्वव्यापी, एकरस एवं सर्वदोषहीन है। यह एक होते हुए भी माया द्वारा उत्पन्न हुए भ्रम के कारण इसकी पृथक्-पृथक् प्रतीति होती है। यथार्थ में उसमें कोई भी भेद नहीं है ॥२॥ तस्मादद्वैतमेवास्ति न प्रपञ्चो न संसृतिः । यथाकाशो घटाकाशो मठाकाश इतीरितः ॥ ३ ॥ तथा भ्रान्तैर्द्विधा प्रोक्तो ह्यात्मा जीवेश्वरात्मना। नाहं देहो न च प्राणो नेन्द्रियाणि मनो नहि ॥४॥ सदा साक्षिस्वरूपत्वाच्छिव एवास्मि केवलः। इति धीर्या मुनिश्रेष्ठ सा समाधिरिहोच्यते ॥५॥ इस कारण केवल अद्वैत ही सत्य स्वरूप है। प्रपञ्च या संसार नामक कोई भी वस्तु नहीं है। जिस प्रकार आकाश को घटाकाश एवं मठाकाश भी कहा जाता है, उसी प्रकार अज्ञानी मनुष्य एक ही परमात्मा को जीव एवं ईश्वर-इन दो रूपों में मानते हैं। न मैं शरीर हूँ, न प्राण हूँ, न इन्द्रिय समूह हूँ और न ही मैं मन हूँ, सदैव साक्षीरूप में स्थित होने के कारण मैं एक मात्र शिवस्वरूप परमात्म तत्त्व हूँ। हे श्रेष्ठ मुने ! इस प्रकार की जो श्रेष्ठ निश्चयात्मिका बुद्धि है, उसी को यहाँ समाधि कहा गया है ॥ ३-५ ॥ सोऽहं ब्रह्म न संसारी न मत्तोऽन्यः कदाचन। यथा फेनतरङ्गादि समुद्रादुत्थितं पुनः ॥ ६ ॥ समुद्रे लीयते तद्वज्जगन्मय्यन्युलीयते । तस्मान्मनः पृथङ्नास्ति जगन्माया च नास्ति हि ॥७॥
खण्ड १० मन्त्र १३ १९५ मैं ही वह परमेश्वर हूँ, संसार के बन्धनों में पड़ा हुआ जीव नहीं हूँ, अतः मुझसे भिन्न किसी वस्तु का किसी भी काल में अस्तित्व नहीं रहा है। जिस प्रकार फेन और लहरें समुद्र से उठते ही फिर समुद्र में विलीन हो जाते हैं, उसी प्रकार यह जगत् मुझसे ही प्रकट होता है और मुझमें ही विलीन हो जाता है। इसलिए सृष्टि का कारणभूत मन भी मुझसे पृथक् नहीं है। इस जगत् और माया का भी मुझसे भिन्न अस्तित्व नहीं है ॥ ६-७॥ यस्यैवं परमात्माऽयं प्रत्यग्भूतः प्रकाशितः । स तु याति च पुंभावं स्वयं साक्षात्परा मृतम् ॥८ ॥ इस प्रकार से जिस पुरुष को यह परमात्मा अपनी आत्मा के रूप में अनुभव होने लगता है, वह परम पुरुषार्थरूप साक्षात् परम अमृतस्वरूप परमात्मभाव को प्राप्त कर लेता है ॥ ८ ॥ यदा मनसि चैतन्यं भाति सर्वत्रगं सदा । योगिनोऽव्यवधानेन तदा संपद्यते स्वयम् ॥ ९ ॥ यदा सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येव हि पश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ब्रह्म संपद्यते तदा ॥ १० ॥ जिस समय योगी के मन में सर्वत्र व्यापक आत्म चैतन्यस्वरूप का अपरोक्ष रूप में अनुभव होने लगता है, तब उस समय वह स्वयं ही परमात्मस्वरूप में स्थापित हो जाता है। जब वह श्रेष्ठ ज्ञानी मनुष्य सब भूत- प्राणियों को अपने में ही अवलोकन करता है तथा अपने को ही सम्पूर्ण भूतों में प्रतिष्ठित देखता है, तब वह साक्षात् स्वयं ब्रह्मरूप ही हो जाता है ॥ ९-१० ॥ यदा सर्वाणि भूतानि समाधिस्थो न पश्यति । एकीभूतः परेणाऽसौ तदा भवतिकेवलः ॥११॥ यदा पश्यति चात्मानं केवलं परमार्थतः । मायामात्रं जगत्कृत्स्नं तदा भवति निर्वृतिः ॥१२॥ जब समाधिस्थ पुरुष परमात्मा से एकत्व प्राप्त करके अपने से अलग किसी भी भूत-प्राणी को नहीं देखता, तब वह केवल परमात्मरूप से ही प्रतिष्ठित हो जाता है। जब पुरुष केवल अपनी आत्मा को ही परमार्थ सत्यस्वरूप में देखता है, सम्पूर्ण विश्व को माया का विलास मात्र मानता है, तब वह परमानन्द को प्राप्त कर लेता है ॥ ११-१२ ॥ एवमुक्त्वा स भगवान्दत्तात्रेयो महामुनिः । सांकृतिः स्वस्वरूपेण सुखमास्तेऽतिनिर्भयः ॥१३ इस प्रकार महाज्ञानी भगवान् दत्तात्रेय जी उपदेश देकर मौन हो गये एवं मुनीश्वर सांकृति उस उपदेश को हृदयंगम करके अपने यथार्थ स्वरूप में स्थित एवं भयमुक्त होकर आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ १३ ॥ ॐ आप्यायन्तु................................ इति शान्तिः ॥ ॥ इति जाबालदर्शनोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ जाबालोपनिषद् ॥ यह उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसमें कुल छः खण्ड हैं। प्रथम खण्ड में भगवान् बृहस्पति एवं याज्ञवल्क्य का संवाद है, जिसमें प्राण विद्या का विवेचन है। याज्ञवल्क्य ने प्राण का स्थान, ब्रह्म सदन तथा देवयजन का एक मात्र स्थान, 'अविमुक्त' (ब्रह्मरन्ध्र-काशी) कहा है। वहीं रुद्रदेव विद्यमान रह कर अन्तिम क्षणों में तारक ब्रह्म का उपदेश देकर जीव को विमुक्त करते हैं। द्वितीय खण्ड में अत्रि मुनि एवं याज्ञवल्क्य का संवाद है, जिसमें 'अविमुक्त' क्षेत्र को भुकुटि-मध्य में बताया गया है। इसकी उपासना से प्राप्त ज्ञान के आधार पर दूसरों को आत्मज्ञान का उपदेश देना सम्भव होता है। तृतीय खण्ड में याज्ञवल्क्य द्वारा अमृतत्व प्राप्ति का उपाय बताया गया है। वह उपाय है शतरुद्रीय का जप। साधक इससे मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है। चतुर्थखण्ड में विदेहराज के द्वारा संन्यास के सम्बन्ध में पूछे जाने पर ऋषि याज्ञवल्क्य ने संन्यास ग्रहण करने का क्रम, उसकी विधि-व्यवस्था, उसके करणीय कृत्य आदि का वर्णन किया है। पंचम खण्ड में पुनः अत्रि मुनि ने संन्यासी के यज्ञोपवीत, वस्त्र, मुण्डन, भिक्षा आदि विषयों पर याज्ञवल्क्य से मार्गदर्शन प्राप्त किया है, जिसका निष्कर्ष है, संन्यासी को मन-वाणी से पूर्णतया विषय-विकार से दूर रहना चाहिए। षष्ठ खण्ड में प्रसिद्ध संन्यासियों- संवर्तक, आरुणि, श्वेतकेतु, दुर्वासा, ऋभु आदि के आचरण की समीक्षा की गई है और अन्त में दिगम्बर परमहंस का लक्षण बताया गया है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ पूर्णमदः .................इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य- अध्यात्मोपनिषद् ) ॥ प्रथमःखण्डः ॥ बृहस्पतिरुवाच याज्ञवल्क्यं यदनु कुरुक्षेत्रं देवानां देवयजनं सर्वेषां भूतानां ब्रह्मसदनम्। अविमुक्तं वै कुरुक्षेत्रं देवानां देवयजनं सर्वेषां भूतानां ब्रह्मसदनम्। तस्माद्यत्र क्वचन गच्छति तदेव मन्येत तदविमुक्तमेव । इदं वै कुरुक्षेत्रं देवानां देवयजनं सर्वेषां भूतानां ब्रह्मसदनम्। अत्र हि जन्तोः प्राणेषूत्क्रममाणेषु रुद्रस्तारकं ब्रह्म व्याचष्टे येनासावमृतीभूत्वा मोक्षीभवति । तस्मादविमुक्तमेव निषेवेत अविमुक्तं न विमुञ्चेदेवमेवैतद्याज्ञवल्क्यः ॥ १ ॥ भगवान् बृहस्पति ऋषि याज्ञवल्क्य से बोले-प्राणों का कौन सा स्थान (क्षेत्र) है ? इन्द्रियों के देवयजन का क्या अभिप्राय है? एवं समस्त प्राणियों का ब्रह्मसदन क्या है? याज्ञवल्क्य ने उत्तर देते हुए कहा- अविमुक्त ही प्राणों का क्षेत्र है। उसे ही इन्द्रियों का देवयजन कहा गया है और वही समस्त प्राणियों का ब्रह्मसदन है। अस्तु, किसी भी स्थान पर जाने वाले को यही समझना चाहिए। वही (कुरुक्षेत्र) प्राण-स्थान इन्द्रियों का देवयजन है और समस्त प्राणियों का ब्रह्मसदन (ब्रह्मस्थान) है। जब इस जगत् में जीव के प्राण का उत्क्रमण होता है, उस समय रुद्रदेव तारक ब्रह्म के सम्बन्ध में उपदेश करते हैं, जिससे वह जीव अमृतत्व पाकर मोक्ष पद की प्राप्ति करता है। इसीलिए प्राणी के लिए उचित है कि वह सदैव अविमुक्त की उपासना करता रहे, उसे कभी न छोड़े। इस प्रकार ऋषि याज्ञवल्क्य ने यह तथ्य प्रतिपादित किया ॥ १ ॥ ॥ द्वितीयः खण्डः ॥ अथ हैनमत्रिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्यं य एषोऽनन्तोऽव्यक्त आत्मा तं कथमहं विजानीयामिति । स होवाच याज्ञवल्क्यः सोऽविमुक्त उपास्यो य एषोऽनन्तोऽव्यक्त आत्मा सोऽविमुक्ते प्रतिष्ठित इति ॥ १ ॥
११७ जाबालोपनिषद इसके पश्चात् अत्रि मुनि ने याज्ञवल्क्य ऋषि से पूछा- 'इस अनन्त और अव्यक्त आत्मा को किस प्रकार जाना जा सकता है'? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- 'इसका ज्ञान प्राप्त करने के लिए अविमुक्त की ही उपासना करनी चाहिए, क्योंकि वह अनन्त और अव्यक्त आत्मा अविमुक्त में ही प्रतिष्ठित है'॥ १॥ सोऽविमुक्तः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति वरणायां नास्यां च मध्ये प्रतिष्ठित इति। का वै वरणा का च नासीति सर्वानिन्द्रियकृतान्दोषान्वारयतीति तेन वरणा भवति। सर्वानिन्द्रियकृतान्या- पात्राशयतीति तेन नासी भवतीति। कतमच्चास्य स्थानं भवतीति। भ्रुवोर्घाणस्य च यः संधिः स एष द्यौर्लोकस्य परस्य च संधिर्भवतीति। एतद्वै संधिं संध्यां ब्रह्मविद उपासत इति सोऽविमुक्त उपास्य इति। सोऽविमुक्तं ज्ञानमाचष्टे यो वै तदेतदेवं वेदेति ॥ २ ॥ यह अविमुक्त किसमें प्रतिष्ठित है? यह पूछे जाने पर ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा- 'यह वरणा और नासी के मध्य में विराजमान है।' अत्रि मुनि ने पुनः पूछा-यह वरणा और नासी क्या है? ऋषि ने उत्तर दिया-'समस्त इन्द्रियों (ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों) द्वारा किये गये पापों (दोषों) का जो निवारण करती है, वह वरणा है तथा जो समस्त इन्द्रियों द्वारा किये गये पापों को विनष्ट करतो है, वह नासी है।' उनके पुनः यह पूछने पर कि इसका स्थान कौन सा है? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- 'भ्रुकुटी और नासिका का सन्धि स्थल ही इसका स्थान है। इसी को इस द्यु लोक और परलोक का संगम स्थल भी कहा गया है। ब्रह्मविद् इस सन्धि स्थल (भ्रू-घ्राण सन्धि) की उपासना करते हैं। अस्तु, वह अविमुक्त ही उपास्य है। इस प्रकार अविमुक्त की उपासना के फलस्वरूप जिसने ज्ञान प्राप्त कर लिया है, वही दूसरों को आत्मा के सन्दर्भ में उपदेश करने में समर्थ है'॥ ॥ तृतीयः खण्डः ॥ अथ हैनं ब्रह्मचारिण ऊचुः किं जप्येनामृतत्वं ब्रूहीति। स होवाच याज्ञवल्क्यः। शतरुद्रियेणेत्येतानि ह वा अमृतनामधेयान्येतैर्ह वा अमृतो भवतीति ॥ १॥ इसके पश्चात् ब्रह्मचारी शिष्यों ने ऋषि याज्ञवल्क्य से पूछा-किसका जप करने से अमृतत्व प्राप्त किया जा सकता है? ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा- 'शतरुद्रीय जप के द्वारा अमृतत्व प्राप्त होता है। इसके द्वारा वह (साधक) मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकता है' ॥ १ ॥ ॥ चतुर्थः खण्डः॥ अथ ह जनको ह वैदेहो याज्ञवल्क्यमुपसमेत्योवाच भगवन् संन्यासमनुब्रूहीति। स होवाच याज्ञवल्क्यो ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेत्, गृही भूत्वा वनी भवेत्, वनी भूत्वा प्रव्रजेत्। यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद्गृहाद्वा वनाद्वा। अथ पुनरव्रती वा व्रती वा स्नातको वाऽस्नातको वा उत्सन्नाग्निरनग्निको वा यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत् ॥ १ ॥ एक बार विदेहराज जनक ने ऋषि याज्ञवल्क्य के समीप पहुँचकर सविनय यह कहा-'हे भगवन्! मुझे संन्यास के सम्बन्ध में बताइये।' ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा- 'सर्वप्रथम ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहिए। उसे समाप्त करके गृहस्थ बनना चाहिए। गृहस्थ बनकर तब वानप्रस्थ (वानप्रस्थी) बनना चाहिए। वानप्रस्थ होकर प्रव्रज्या अर्थात् संन्यास ग्रहण करना चाहिए। यदि (विषयों से) विरक्ति हो जाये, तो ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ किसी भी आश्रम के पश्चात् प्रव्रज्या अर्थात् संन्यास में प्रवेश किया जा सकता है। इसी प्रकार
खण्ड ५ मन्त्र २ ११८ व्रती हो या अव्रती, स्नातक हो या अस्नातक, स्त्री की मृत्यु हो जाने पर अग्नि ग्रहण करके त्याग किया हो अथवा अग्नि ग्रहण करके संस्कार न किया गया हो, चाहे जो भी स्थिति हो, जब मन विषयों से पूर्ण विरक्त हो जाए, तभी प्रव्रज्या अर्थात् संन्यास ग्रहण कर लेना चाहिए' ॥ १ ॥ तद्धैके प्राजापत्यामेवेष्टिं कुर्वन्ति। तदु तथा न कुर्यादाग्नेयीमेव कुर्यात्। अग्निर्ह वै प्राणः। प्राणमेवैतया करोति पश्चान्त्रैधातवीयामेव कुर्यात्। एतस्यैव त्रयो धातवो यदुत सत्त्वं रजस्तम इति। अयं ते योनिर्ऋत्वियो यतो जातो अरोचथाः। तं जानन्नग्न आरोहाथा नो वर्धयर्यायम् इत्यनेन मन्त्रेणाग्निमाजिघ्रेत्। एष ह वा अग्नेर्योनिर्यः प्राणः। प्राणं गच्छ स्वाहेत्येव मेवैतदाह ॥ (इस अवसर पर) कुछ लोग प्राजापत्य इष्टि करते हैं; किन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए। उन्हें आग्नेयी इष्टि करनी चाहिए; क्योंकि अग्नि ही प्राण है। इसकी इष्टि करने से प्राणाभिवर्धन होता है। इसके पश्चात् त्रिधातु इष्टि करनी चाहिए। सत, रज और तम ये तीन धातुएँ हैं (सत शुक्ल वर्ण है, रज लोहित वर्ण है और तम कृष्ण वर्ण है)। इन इष्टियों के पश्चात् इस मन्त्र से अग्नि का अवघ्राण करना चाहिए-हे अग्ने ! यह प्राण सामान्य कारण स्वरूप है, क्योंकि आपकी उत्पत्ति इस प्राण से ही हुई है। हे अग्ने ! आप प्राण को दग्ध करने वाले हैं, आप प्रकाश और वृद्धि को प्राप्त करने वाले हैं। आप हमारी भी वृद्धि करें। जो अग्नि की योनि (अग्नि का उत्पादक) है, वह प्राण है। अतः हे अग्निदेव ! आप उस प्राण में प्रविष्ट हों-यह कहकर आहुति दी जानी चाहिए ॥ २ ॥ ग्रामादग्निमाहृत्य पूर्ववदग्निमाघ्रापयेत्। यद्यग्निं न विन्देदप्सु जुहुयात्। आपो वै सर्वा देवताः। सर्वाभ्यो देवताभ्यो जुहोमि स्वाहेति हुत्वा समुद्धृत्य प्राश्नीयात्साज्यं हविरमामयं मोक्षमन्त्रस्त्रय्येवं विन्देत्। तद्ब्रह्मैतदुपासितव्यम्। एवमेवैतद्भगवन्निति वै याज्ञवल्क्यः ॥३॥ ग्राम से (गाँव के किसी श्रोत्रिय के गृह से ) अग्नि को लाकर पूर्व वर्णित मन्त्र द्वारा उसका अवघ्राण करना (सूँघना) चाहिए। यदि अग्नि प्राप्त न हो, तो जल में आहुति प्रदान करनी चाहिए, क्योंकि जल ही समस्त देवता रूप है। मैं समस्त देवताओं को आहुति प्रदान कर रहा हूँ, ऐसा भाव करके जल में आहुति प्रदान करके घृत युक्त उस अवशिष्ट हविष्यान्न को उठाकर ग्रहण करे। मोक्षमन्त्र तीन अक्षरों (अ उ म् – ॐ) वाला है, ऐसा जानना चाहिए। वही ब्रह्म है और वही उपासना के योग्य है। ऐसा भगवान् याज्ञवल्क्य ने कहा ॥ ३ ॥ ॥ पञ्चमः खण्डः ॥ अथ हैनमत्रिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्यम्। पृच्छामि त्वा याज्ञवल्क्य अयज्ञोपवीती कथं ब्राह्मण इति। स होवाच याज्ञवल्क्य इदमेवास्य तद्यज्ञोपवीतं य आत्मा अपः प्राश्याचम्यायं विधिः परिव्राजकानाम् ॥ १ ॥ इसके बाद अत्रि मुनि ने ऋषि याज्ञवल्क्य से प्रश्न किया-'मैं यह जानना चाहता हूँ कि जिसने यज्ञोपवीत धारण नहीं किया है, वह ब्राह्मण किस प्रकार हो सकता है?' याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- 'उसका आत्मा ही उसका यज्ञोपवीत होता है। वह जल से (तीन बार) प्राशन और आचमन करे। यह संन्यासियों (परिव्राजकों) की विधि है' ॥ १ ॥ वीराध्वाने वाऽनाशके वाऽपां प्रवेशे वाऽग्निप्रवेशे वा महाप्रस्थाने वाऽथ परिव्राड् - विवर्णवासा मुण्डोऽपरिग्रहः शुचिरद्रोही भैक्षाणो ब्रह्मभूयाय भवति। यद्यातुरः स्यान्मनसा वाचा संन्यसेत्। एष पन्था ब्रह्मणा हानुवित्तस्तेनैति संन्यासी ब्रह्मविदित्युवेमैवैष भगवन्निति वै याज्ञवल्क्यः ॥ २ ॥
११९ जाबालोपनिषद् वीर पथ में, अनशन की स्थिति में, (गंगा आदि के) जल में प्रवेश करने पर, अग्नि प्रवेश में और महाप्रस्थान में परिव्राजक संन्यासी के लिए यही धर्म निश्चित है कि वह भगवा वस्त्र धारण करके मुण्डित होकर, अपरिग्रही बनकर, पवित्र और द्रोहरहित होकर भिक्षावृत्ति (लोकमंगल के लिए) अपनाकर जीवित रहे। यदि कोई संन्यास के लिए आतुर है, तो उसे मन और वाणी से (विषयों का) परित्याग करना चाहिए (विषयों से संन्यस्त होना चाहिए)। यह ज्ञान का पन्थ वेद प्रतिपादित है। इसीलिए संन्यासी के लिए यह सर्वथा उपयुक्त है, क्योंकि संन्यासी ब्रह्मविद् होता है। इस प्रकार भगवान् याज्ञवल्क्य ने यह मत प्रकट किया ॥ २ ॥ ॥ षष्ठः खण्डः ॥ तत्र परमहंसा नाम संवर्तकारुणिश्वेतकेतुदुर्वासऋभुनिदाघजडभरतदत्तात्रेय रै- वतकप्रभृतयोऽव्यक्तलिङ्गा अव्यक्ताचारा अनुन्मत्ता उन्मत्तवदाचरन्तः ॥ १ ॥ संवर्तक, आरुणि, श्वेतकेतु, दुर्वासा, ऋभु, निदाघ, जड़भरत, दत्तात्रेय और रैवतक आदि जो परमहंस संन्यासी हुए हैं, वे सभी अव्यक्त लिङ्ग अर्थात् संन्यास के चिह्नों से रहित थे। उनका आचरण भी अव्यक्त था। वे अन्दर से उन्मत्त न होते हुए भी बाहर से उन्मत्त लगते थे ॥ १ ॥ त्रिदण्डं कमण्डलुं शिक्यं पात्रं जलपवित्रं शिखां यज्ञोपवीतं चेत्येतत्सर्वं भूः स्वाहेत्यप्सु परित्यज्यात्मानमन्विच्छेत् ॥ २ ॥ ऐसे (उपर्युक्त स्थिति वाले) संन्यासी को चाहिए कि वह त्रिदण्ड, कमण्डलु, शिक्य (छींका भिक्षाधार पात्र), जल-पवित्र, शिखा और यज्ञोपवीत आदि प्रतीकों को 'भूः स्वाहा', ऐसा कहते हुए जल में विसर्जित कर दे। इसके उपरान्त संन्यासी को आत्मा का ही अनुसन्धान करना चाहिए ॥ २ ॥ यथाजातरूपधरो निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहस्तत्त्वब्रह्ममार्गे सम्यक्संपन्नः शुद्धमानसः प्राणसंधारणार्थं यथोक्तकाले विमुक्तो भैक्षमाचरन्नुदरपात्रेण लाभालाभौ समौ भूत्वा शून्यागारदेवगृहतृणकूटवल्मीकवृक्षमूलकुलालशालाग्निहोत्रशालानदीपुलिन गिरिकुहरक- न्दरकोटरनिर्झरस्थण्डिलेष्वनिकेतवास्यप्रयत्नो निर्ममः शुक्लध्यानपरायणोऽध्यात्मनिष्ठः शुभाशुभकर्मनिर्मूलनपरः संन्यासेन देहत्यागं करोति स परमहंसो नाम स परमहंसो नामेति ॥३ ॥ संन्यासी (परमहंस) यथा जातरूप धारण करने वाला अर्थात् निश्छल-निःस्पृह होता है। वह निर्द्वन्द्व, अपरिग्रही, तत्त्व ब्रह्म मार्ग में निरन्तर गतिमान् तथा शुद्ध मन वाला होता है। जीवन्मुक्त होने पर भी वह प्राण धारणार्थ भिक्षा आदि के द्वारा आहार को उचित समय पर 'उदर' रूपी पात्र में डाल देता है। उसे किसी प्रकार के लाभ और अलाभ की चिन्ता नहीं होती ; अतः उन्हें समान समझता है। वह शून्य स्थल, देवगृह, तिनकों के समूह, सर्प की बाँबी (बिल), वृक्ष के मूल, कुम्हार के घर, अग्निहोत्र स्थल, नदी तट, पर्वत, खाई या गुफा, खोह और निर्झर आदि विशुद्ध प्रदेश में पूर्व घर का ध्यान न रख, ममता रहित होकर रहता है। वह सतत शुक्ल (सात्त्विक) ध्यान में तल्लीन रहकर अध्यात्मनिष्ठ होकर शुभ और अशुभ कर्मों को निर्मूल करता रहता है, ऐसा (संन्यास धर्म का पालन) करते हुए जो संन्यासी देह का परित्याग कर देता है, वह परमहंस कहलाता है॥ ३॥ ॐ पूर्णमदः ................................. इति शान्तिः ॥ ॥ इति जाबालोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ जाबाल्युपनिषद् ॥ यह उपनिषद् सामवेद से सम्बद्ध है। इसमें कुल २३ मन्त्र हैं, जिसमें पिप्पलाद पुत्र पैप्पलादि और भगवान् जाबालि का परम तत्त्व के विषय में प्रश्नोत्तर है। प्रमुख प्रश्न है, तत्त्व क्या है, जीव कौन है, पशु कौन है, ईश कौन है और मोक्ष प्राप्ति का उपाय क्या है ? इन्हीं सब प्रश्नों का उत्तर क्रमशः जाबालि मुनि ने दिया है। अन्त में उपनिषद्-प्रतिपादित ज्ञान की महिमा का वर्णन करते हुए प्रश्नोत्तर को विराम दिया गया है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ आप्यायन्तु ....................इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य- आरुण्युपनिषद्) अथ हैनँ भगवन्तं जाबालिं पैप्पलादिः पप्रच्छ भगवन्मे ब्रूहि परमतत्त्वरहस्यम् ॥ १ ॥ किं तत्त्वं को जीवः कः पशुः क ईशः को मोक्षोपाय इति ॥ २ ॥ स तं होवाच साधु पृष्टं सर्वं निवेदयामि यथाज्ञातमिति ॥ ३ ॥ पुनः स तमुवाच कुतस्त्वया ज्ञातमिति ॥ ४ ॥ पुनः स तमुवाच षडाननादिति ॥ ५ ॥ पुनः स तमुवाच तेनाथ कुतो ज्ञातमिति ॥ ६ ॥ पुनः स तमुवाच तेनेशानादिति ॥ ७ ॥ पुनः स तमुवाच कथं तस्मात्तेन ज्ञातमिति ॥ ८ ॥ पुनः स तमुवाच तदुपासनादिति ॥ ९ ॥ पुनः स तमुवाच भगवन्कृपया मे सरहस्यं सर्वं निवेदयेति ॥ १० ॥ ऋषि पैप्पलादि (पिप्पलाद के पुत्र) ने भगवान् जाबालि से प्रश्न किया-हे भगवन् ! मेरे प्रति परम तत्त्व के रहस्य का वर्णन कीजिए। तत्त्व क्या है ? जीव कौन है ? पशु कौन है ? ईश कौन है ? मोक्ष प्राप्ति का उपाय क्या है ? महर्षि जाबालि ने कहा-आपने बहुत श्रेष्ठ प्रश्न किया। जो मुझे ज्ञात है, वह सब मैं आपसे निवेदन करता हूँ। पैप्पलादि ने पूछा-यह सब आपको कहाँ से ज्ञात हुआ ? जाबालि ने कहा-षडानन से ज्ञात हुआ। पैप्पलादि ने पुनः पूछा-उन (षडानन) को कहाँ से यह ज्ञान प्राप्त हुआ ? जाबालि ने कहा-उन्हें यह ज्ञान ईशान से प्राप्त हुआ। पैप्पलादि ने पुनः प्रश्न किया कि उन्होंने यह कैसे प्राप्त किया ? जाबालि ने उत्तर दिया कि उन्होंने (ईशान ने) उपासना के द्वारा यह ज्ञान प्राप्त किया। (यह सुनकर) पैप्पलादि ने कहा-हे भगवन् ! मुझे यह सब कुछ रहस्य सहित बताइये ॥ १-१० ॥ स तेन पृष्टः सर्वं निवेदयामास तत्त्वम्। पशुपतिरहंकाराविष्टः संसारी जीवः स एव पशुः। सर्वज्ञः पञ्चकृत्यसंपन्नः सर्वेश्वर ईशः पशुपतिः ॥ ११ ॥ के पशव इति पुनः। स तमुवाच ॥ १२ ॥ जीवाः पशव उक्ताः । तत्पतित्वात्पशुपतिः ॥ १३ ॥ स पुनस्तं होवाच कथं जीवाः पशव इति । कथं तत्पतिरिति ॥ १४ ॥ स तमुवाच यथा तृणाशिनो विवेकहीनाः परप्रेष्याः कृष्यादिकर्मसु नियुक्ताः सकलदुःखसहाः स्वस्वामिबध्यमाना गवादयः पशवः । यथा तत्स्वामिन इव सर्वज्ञ ईशः पशुपतिः ॥ १५ ॥ तज्ज्ञानं केनोपायेन जायते ॥ १६ ॥ पुनः स तमुवाच विभूतिधारणादेव ॥ १७॥ तत्प्रकारः कथमिति। कुत्र कुत्र धार्यम् ॥१८॥
मन्त्र २० १२१ पैप्पलादि द्वारा पूछे जाने पर जाबालि ने कहा-मैं सम्पूर्ण तत्त्व कहता हूँ। स्वयं पशुपति ही अहंकार युक्त होकर संसारी जीव हो जाता है। वही पशु है। सर्वज्ञ और पञ्च कृत्यों से सम्पन्न, सर्वेश्वर ईश ही पशुपति है। पैप्पलादि ने पुनः प्रश्न किया-पशु कौन है ? जाबालि ने कहा-जीव को ही पशु कहा गया है। जीवों के पति होने के कारण उन्हें पशुपति कहते हैं। उन्होंने फिर पूछा-जीव पशु किस तरह है ? और (पशुपति) उनके पति कैसे हैं? महर्षि जाबालि ने उत्तर दिया-जिस प्रकार घास का सेवन करने वाले, विवेक हीन, किसी अन्य के दास, कृषि आदि कार्यों में नियोजित अनेक प्रकार के दुःखों को सहन करने वाले, अपने स्वामी के बन्धन में बँधे हुए गौ आदि पशु होते हैं (उसी प्रकार ये जीव भी ईश्वर के बन्धन में बँधे रहते हैं)। जैसे-उन पशुओं के स्वामी (कोई मनुष्य) होते हैं उसी प्रकार समस्त जीवों के स्वामी (पति) सर्वज्ञ, ईश्वर-पशुपति होते हैं। पैप्पलादि ने पुनः पूछा- वह ज्ञान किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है ? जाबालि ने कहा-विभूति धारण के द्वारा उस ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है। पैप्पलादि ने पूछा-उसे धारण करने की विधि क्या है ? उसे कहाँ- कहाँ धारण करना चाहिए ? ॥ ११-१८ ॥ पुनः स तमुवाच सद्योजातादिपञ्चब्रह्ममन्त्रैर्भस्म संगृह्याग्निरिति भस्मेत्यनेनाभिमन्त्र्य मानस्तोक इति समुद्धृत्य जलेन संसृज्य त्र्यायुषमिति शिरोललाटवक्षःस्कन्धेष्विति तिसृभिस्त्र्यायुषैस्त्र्यम्बकैस्तिस्रो रेखाः प्रकुर्वीत। व्रतमेतच्छांभवं सर्वेषु वेदेषु वेदवादिभिरुक्तं भवति। तत्समाचरेन्मुमुक्षुर्न पुनर्भावाय ॥ १९ ॥ ऋषि जाबालि ने कहा- 'सद्योजात' आदि पाँच ब्रह्म मन्त्रों से भस्म का संग्रह करे, फिर 'अग्निरिति' इस मन्त्र से उसे अभिमन्त्रित करे, 'मानस्तोक' (यजु० १६.१६) इस मंत्र से उसे उठाये, तत्पश्चात् उसे जल से गीला करके 'त्र्यायुषम्' (यजु० ३.६२) इस मंत्र से सिर, ललाट, वक्षस्थल, कन्धों पर धारण करे। इसके बाद तीन त्र्यायुष और तीन त्र्यम्बक (यजु० ३.६०) मन्त्रों से तीन रेखायें खींचे। वेदों में यह शाम्भव व्रत वेदवादियों के द्वारा बतलाया गया है। इसका (इस व्रत का) आचरण करने वाले मुमुक्षु का पुनर्जन्म नहीं होता ॥ १९ ॥ [ यहाँ जिन मन्त्रों का संक्षिप्तांश दिया है, उनमें जो मन्त्र यजुर्वेद के हैं, उनके सन्दर्भ दे दिये गये हैं। शेष के मन्त्र इस प्रकार हैं- सद्योजातादि पाँच मन्त्र- ॐ सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः। भवेभवे नाति भवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः ॥ १ ॥ वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः। श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः। कालाय नमः कल विकरणाय नमो बल विकरणाय नमः ॥ २ ॥ बलाय नमो बल प्रमथनाय नमः। सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः ॥ ३ ॥ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्व शर्वेभ्यो नमस्तेऽअस्तु रुद्ररूपेभ्यः ॥ ४ ॥ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥५ ॥ (रुद्राष्टाध्यायी) अग्निरिति-ॐ अग्निरिति भस्म। वायुरिति भस्म। जलमिति भस्म। स्थलमिति भस्म। व्योमेति भस्म। सर्व ः ह वा इदं भस्म। मन एतानि चक्षूंषि भस्मानि इति ॥ (आह्निक सूत्रावलिः पृ. ६५)] अथ सनत्कुमारः प्रमाणं पृच्छति । त्रिपुण्ड्रधारणस्य त्रिधा रेखा आललाटादाचक्षुषोराभ्रुवोर्मध्यतश्च ॥ २० ॥ प्रमाण के विषय में पूछने पर सनत्कुमार ने बताया कि त्रिपुण्ड्र धारण करने के लिए तीन आड़ी रेखायें सम्पूर्ण ललाट के मध्य, भौंहों और नेत्रों तक खींचे ॥ २० ॥ याऽस्य प्रथमा रेखा सा गार्हपत्यश्चाकारो रजो भूर्लोकः स्वात्मा क्रियाशक्तिः ऋग्वेदः प्रातःसवनं प्रजापतिर्देवो देवतेति। याऽस्य द्वितीया रेखा सा दक्षिणाग्निरूकारः सत्त्वमन्तरिक्षमन्तरात्मा चेच्छाशक्तिर्यजुर्वेदो माध्यन्दिनसवनं विष्णुर्देवो देवतेति। याऽस्य
१२२ जाबाल्युपनिषद् तृतीया रेखा साऽऽहवनीयो मकारस्तमो द्यौर्लोकः परमात्मा ज्ञानशक्तिः सामवेदस्तृतीयसवनं महादेबो देवतेति ॥ २१ ॥ जो इसकी प्रथम रेखा है, वह गार्हपत्य अग्नि रजोगुण 'अ' कार भूलोक, अपनी आत्मा की क्रिया - शक्ति स्वरूप, ऋग्वेद रूप और प्रातः सवन स्वरूप है, इसके देवता स्वयं प्रजापति हैं। जो इसकी द्वितीय रेखा है, वह दक्षिणाग्नि स्वरूप, सत्त्वगुण रूप, 'उ' कार रूप, अन्तरिक्ष स्वरूप, अपनी अन्तरात्मा की इच्छा-शक्ति रूप, यजुर्वेद रूप और माध्यन्दिन संवनरूप है, इसके देवता विष्णु हैं। जो इसकी तृतीय रेखा है, वह आहवनीय अग्निरूप, 'म' कार रूप, तमोगुण स्वरूप, द्युलोकरूप, परमात्मा की ज्ञान-शक्ति स्वरूप, सामवेद रूप तथा तृतीय सवन स्वरूप है, इसके देवता स्वयं महादेव (शिव) हैं ॥ २१ ॥ त्रिपुण्ड्रं भस्मना करोति यो विद्वान्ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थो यतिर्वा स महापातको- पपातकेभ्यः पूतो भवति। स सर्वान् वेदानधीतो भवति। स सर्वान्देवान्ध्यातो भवति। स सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो भवति। स सकलरुद्रमन्त्रजापी भवति। न स पुनरावर्तते न स पुनरावर्तते ॥ इति ॥ २२ ॥ ॐ सत्यमित्युपनिषत् ॥ २३ ॥ जो विद्वान् ब्रह्मचारी, गृहस्थी, वानप्रस्थी या यति भस्म का त्रिपुण्ड्र धारण करता है, (पूर्वमंत्र में दर्शाये गये त्रिपुण्ड्र के मर्म को आत्मसात् करता है।) वह महापातकों और उपपातकों से विमुक्त हो जाता है। वह समस्त वेदों का अवगाहन करने वाला, समस्त देवताओं का ध्यान करने वाला, समस्त तीर्थों के स्नान का पुण्य प्राप्त करने वाला और सकल रुद्र मन्त्रों का जप कर्ता हो जाता है। उसका (ऐसा करने वाले का) इस जगत् में पुनरावर्तन नहीं होता, पुनरावर्तन नहीं होता। यह सत्य है (इस प्रकार) यह उपनिषद् पूर्ण हुई ॥ २२-२३ ॥ ॐ आप्यायन्तु .....................इति शान्तिः ॥ ॥ इति श्रीजाबाल्युपनिषत्समाप्ता ॥
॥ तुरीयातीतोपनिषद् ॥ यह उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसे तुरीयातीतावधूतोपनिषद् भी कहा जाता है। इस उपनिषद् में पितामह ब्रह्माजी तथा आदिनारायण का प्रश्नोत्तर विद्यमान है, जिसमें पितामह ब्रह्माजी ने अपने पिता आदिनारायण से तुरीयातीत अवधूत का मार्ग पूछा है। आदिनारायण ने इस मार्ग पर चलने वालों की दुर्लभता बताते हुए अवधूत का आचरण-व्यवहार, चिन्तन-मनन आदि की वह कार्यपद्धति बताई है, जिस पर चल कर व्यक्ति अपने जीवन का चरम लक्ष्य प्राप्त कर लेता है। अन्त में इस उपनिषद् की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए इसे पूर्णता प्रदान की गई है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ पूर्णमदः ................ इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य- अध्यात्मोपनिषद् ) अथ तुरीयातीतावधूतानां कोऽयं मार्गस्तेषां का स्थितिरिति सर्वलोक पितामहो भगवन्तं पितरमादिनारायणं परिसमेत्योवाच। तमाह भगवात्रारायणो योऽयमवधूतःमार्गस्थो लोके दुर्लभतरो नतु बाहुल्यो यद्येको भवति स एव नित्यपूतः स एव वैराग्यमूर्तिः स एव ज्ञानाकारः स एव वेदपुरुष इति ज्ञानिनो मन्यन्ते। महापुरुषो यस्तच्चित्तं मय्येवावतिष्ठते। अहं च तस्मिन्नेवावस्थितः। सोऽयमादौ तावत्क्रमेण कुटीचको बहूदकत्वं प्राप्य बहूदको हंसत्वमवलम्ब्य हंसः परमहंसो भूत्वा स्वरूपानुसंधानेन सर्वप्रपञ्चं विदित्वा दण्डकमण्डलु कटिसूत्र कौपीनाच्छादनं स्वविद्युक्तक्रियादिकं सर्वमप्सु संन्यस्य दिगम्बरो भूत्वा विवर्णजीर्णवल्कलाजिनपरिग्रहमपि संत्यज्य तदूर्ध्वममन्त्रवदाचरञ्छौचाभ्यङ्गस्नानोर्ध्व- पुण्ड्रादिकं विहाय लौकिकवैदिकमप्युपसंहृत्य सर्वत्र पुण्यापुण्यवर्जितो ज्ञानाज्ञानमपि विहाय शीतोष्णसुखदुःखानापमानं निर्जित्य वासनात्रयपूर्वकं निन्दाऽनिन्दागर्वमत्सर- दम्भदर्पेच्छाद्वेषकामक्रोधलोभमोहहर्षामर्षासूयात्मसंरक्षणादिकं दग्ध्वा स्ववपुः कुणपाकारमिव पश्यन्नयत्नेनानियमेन लाभालाभौ समौ कृत्वा गोवृत्त्या प्राणसंधारणं कुर्वन्यत्प्राप्तं तेनैव निर्लोलुपः सर्वविद्यापाण्डित्यप्रपञ्चं भस्मीकृत्य स्वरूपं गोपयित्वा ज्येष्ठा ज्येष्ठत्वानपलापकः सर्वोत्कृष्टत्वसर्वात्मकत्वाद्वैतं कल्पयित्वा मत्तो व्यतिरिक्तः कश्चिन्नान्योऽस्तीति देवगुह्यादिध- नमात्मन्युपसंहृत्य दुःखेन नोद्विग्नः सुखेन नानुमोदको रागे निःस्पृहः सर्वत्र शुभाशुभयोरनभिखेहः सर्वेन्द्रियोपरमः स्वपूर्वापन्ना श्रमाचारविद्याधर्म-प्राभवमननुस्मरन्त्यक्तवर्णाश्रमाचारः सर्वदा दिवानक्तसमत्येनास्वप्नः सर्वत्र सर्वदा संचारशीलो देहमात्रावशिष्टो जलस्थलकमण्डलुः सर्वदानुन्मत्तो बालोन्मत्तपिशाचवदेकाकी संचरन्नसंभाषणपरः स्वरूपध्यानेन निरालम्बम- वलम्ब्य स्वात्मनिष्ठानुकूलेन सर्वं विस्मृत्य तुरीयातीतावधूतवेषेणाद्वैतनिष्ठापरः प्रणवात्मकत्वेन देहत्यागं करोति यः सोऽवधूतः स कृतकृत्यो भवतीत्युपनिषत् ॥
१२४ तुरीयातीतोपनिषद् (एक बार) समस्त लोकों के पितामह ब्रह्मा ने अपने पिता आदिनारायण के निकट जाकर उनसे पूछा-भगवन् तुरीयातीत अवधूत का मार्ग कौन सा है और उसकी कैसी स्थिति होती है ? भगवान् नारायण ने उनसे कहा-अवधूत पथ पर चलने वाले इस लोक में दुर्लभ हैं, वे बहुत नहीं होते, यदि एकाध होता भी है, तो वह नित्य पवित्र, वैराग्य मूर्ति, ज्ञानाकार और वेद पुरुष होता है, ऐसा विद्वज्जन मानते हैं। ऐसा महापुरुष अपने चित्त को मुझ में अवस्थित रखता है और मैं उसी में स्थित होता हूँ। वह प्रारम्भ में कुटीचक होता है, तत्पश्चात् बहूदकत्व प्राप्त करके हंसत्व का अवलम्बन लेता है। हंस होकर फिर परमहंस बनता है। वह निजस्वरूप के अनुसन्धान द्वारा समस्त प्रपञ्चों के रहस्य को जानकर, दण्ड, कमण्डलु, कटिसूत्र, कौपीन, आच्छादन वस्त्र और विधिपूर्वक की जाने वाली नित्य क्रियाओं को जल में विसर्जित कर देता है और दिगम्बर होकर जीर्ण वल्कल और अजिन (मृग) चर्म के भी परिग्रह को छोड़कर समस्त प्रकार का निषेध करके (अमन्त्रवत् होकर), क्षौर कर्म (केश-कर्तन-दाढ़ी बाल आदि बनवाने), अभ्यङ्ग स्नान (उबटन लगाकर स्नान करने) तथा ऊर्ध्व पुण्ड्र (मस्तक पर तिलक) लगाने को भी छोड़कर, वैदिक और लौकिक कर्मों का उपसंहार करके, सर्वत्र पुण्य और अपुण्य को भी त्याग कर ज्ञान और अज्ञान को भी छोड़ देता है। वह शीत-उष्ण (सर्दी-गर्मी), सुख-दुःख, मान-अपमान को भी जीत लेता है। वह शरीर की तीनों वासनाओं सहित निन्दा-अनिन्दा, गर्व, मत्सर, दम्भ, दर्प, इच्छा, द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, हर्ष, अमर्ष, असूया और आत्म संरक्षण आदि को (भावाग्नि में) जलाकर, अपनी काया को मुर्दे की तरह देखता हुआ, प्रयत्न और नियम के बिना लाभ और हानि को समान करके, गोवृत्ति से (गौ की तरह) जो कुछ मिल गया, उसी में सन्तोष करके प्राण धारण किए रहता है। वह सब प्रकार से लालचारहित होकर समस्त विद्याओं और पाण्डित्य को भस्मीभूत करके, अपने वास्तविक स्वरूप को छिपाते हुए, छोटे-बड़े के भाव को (बाह्य व्यवहार में) पूर्ववत् (अज्ञानी के समान) बनाये रखता है। सर्वोत्कृष्ट सर्वात्मक रूप अद्वैत की कल्पना करके उसका यह मानना होता है कि मेरे अतिरिक्त कुछ और नहीं है। वह देव रहस्य (गुह्य) आदि धन को अपने अन्दर समेट करके (अर्थात् देव रहस्यों को अपने में गोपनीय करके) न दुःख में उद्विग्न होता है और न सुख में प्रसन्न होता है। वह राग में स्पृहा नहीं रखता और न शुभ-अशुभ किसी बात से स्नेह रखता है। उसकी समस्त इन्द्रियाँ उपराम को प्राप्त हो जाती हैं। वह अपने पूर्व के आश्रम, विद्या, धर्म, प्रभाव का स्मरण नहीं करता और वर्णाश्रम आचार का परित्याग कर देता है। दिन और रात के प्रति समान भाव रखने के कारण वह कभी सोता नहीं (अर्थात् सदैव जाग्रत् रहकर सावधान रहता है)। वह सतत सर्वत्र विचरणशील रहता है। उसका शरीर मात्र अवशिष्ट रहता है (अर्थात् वह सदैव ब्रह्मरूप होकर शरीर में रहता है और शरीर द्वारा व्यवहार करता है)। जलस्थल (सरोवर-कूप आदि) उसका कमण्डलु होता है। वह सदा अनुन्मत्त रहता है, किन्तु बाहर से बालक, उन्मत्त और पिशाच आदि के समान एकाकी विचरण करता हुआ किसी से सम्भाषण नहीं करता और अपने वास्तविक रूप के ध्यान द्वारा निरालम्ब का अवलम्बन लेकर अपनी आत्मनिष्ठा की अनुकूलता से (अर्थात् आत्मनिष्ठ होकर) सब को भुला देता है। इस प्रकार से जो तुरीयातीत अवधूत के वेश वाला सतत अद्वैत निष्ठा परायण होकर 'प्रणव' भाव में निमग्न होकर शरीर का परित्याग करता है, वह कृतकृत्य हो जाता है, यही इस उपनिषद् का प्रतिपादन है॥ ॐ पूर्णमदः ................ इति शान्तिः ॥ ॥ इति तुरीयातीतोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ द्वयापानषद् ॥ यह उपनिषद् किस वेद से सम्बद्ध है, यह तथ्य अभी अज्ञात है। इस उपनिषद् में कुल सात मन्त्र हैं, जिसमें 'द्वय' की उत्पत्ति और स्वरूप का बड़े ही रहस्यमय ढंग से प्रतिपादन किया गया है। ॐ अथातः श्रीमद्द्रयोत्पत्तिः। वाक्यो द्वितीयः। षट्पदान्यष्टादश। पञ्चविंशत्यक्षराणि। पञ्चदशाक्षरं पूर्वम्। दशाक्षरं परम्। पूर्वो नारायणः प्रोक्तोऽनादिसिद्धो मन्त्ररत्नः सदाचार्यमूलः। अब श्रीमद्द्वय की उत्पत्ति विवेचित की जाती है (इसकी महत्ता वर्णित की जाती है)। द्वितीय वाक्य है। षट्पद अष्टादश संख्या वाले हैं। इसमें पच्चीस अक्षर हैं। पन्द्रह अक्षर पहले और दस अक्षर बाद में हैं। पूर्व में नारायण को अनादि सिद्ध कहा गया है, जो सदाचार के मूल और मंत्रों में रत्न स्वरूप हैं। [ यह उपनिषद् श्रीमद् (श्रीसम्पन्न) द्वय (दो) की उत्पत्ति के संकल्प के साथ प्रारम्भ होता है। 'वाक्य' को द्वितीय कहने से स्पष्ट होता है कि प्रथम 'अक्षर' को माना गया है। अक्षर अविनाशी-अव्यक्त भी है, जो सदैव से है, अतः प्रथम है; वाक्य उसकी अभिव्यक्ति होने से द्वितीय है। ऋषि ने उस प्रथम या पूर्व को अनादिसिद्ध-मन्त्ररत्न नारायण कहा है, इस आधार पर वह प्रथम अक्षर 'ॐ' कहा जा सकता है। ब्रह्म की प्रथम अभिव्यक्ति अक्षर या नारायण है, वह द्वितीय वाक्य या आचार्य रूप गुरु का मूल है। इस द्वितीय आचार्यरूप गुरु का विवेचन आगे के मन्त्रों में किया गया है।] आचार्यो वेदसंपन्नो विष्णुभक्तो विमत्सरः। मन्त्रज्ञो मन्त्रभक्तश्च सदामन्त्राश्रयः शुचिः॥ १॥ गुरुभक्तिसमायुक्तः पुराणज्ञो विशेषवित्। एवं लक्षणसंपन्नो गुरुरित्यभिधीयते ॥२॥ जो आचार्य वेद सम्पन्न, मंत्रों का ज्ञाता, मंत्रों का भक्त, मंत्रों का आश्रय लेने वाला, पुराणज्ञ, विशेषज्ञ, पवित्र, ईर्ष्यारहित, विष्णु भक्त और गुरु भक्त है, ऐसे लक्षणों से सम्पन्न व्यक्ति को 'गुरु' कहते हैं॥१-२॥ आचिनोति हि शास्त्रार्थान्नाचारस्थापनादपि। स्वयमाचरते यस्तु तस्मादाचार्य उच्यते ॥३॥ जो शास्त्रों के अर्थ को सम्यक् प्रकार से चुनता है (समझता है) और सदाचार की न केवल स्थापना करता है, वरन् स्वयं भी वैसा ही आचरण (सदाचरण) करता है, उसे आचार्य कहते हैं॥ ३॥ गुशब्दस्त्वन्धकारः स्यात् रुशब्दस्तन्निरोधकः। अन्धकारनिरोधित्वादगुरुरित्यभिधीयते ॥४॥ गुरु शब्द में 'गु' का अर्थ अन्धकार और 'रु' शब्द का अर्थ उसका (अन्धकार का) निरोधक है। (अज्ञान के) अन्धकार को रोकने के कारण ही (अन्धकार रोकने वाले व्यक्ति को) गुरु कहते हैं॥ ४॥ गुरुरेव परं ब्रह्म गुरुरेव परा गतिः। गुरुरेव परं विद्या गुरुरेव परं धनम् ॥५॥ गुरु ही परम ब्रह्म है, गुरु ही परागति है, गुरु ही परम विद्या है और गुरु को ही परम धन कहा गया है॥ गुरुरेव परः कामः गुरुरेव परायणः। यस्मात्तदुपदेष्टासौ तस्माद्गुरुतरो गुरुः ॥६॥ गुरु ही सर्वोत्तम अभिलषित वस्तु है, गुरु ही परम आश्रय स्थल है तथा परम ज्ञान का उपदेष्टा होने के कारण ही गुरु महान् (गुरुतर) होता है॥ ६॥ यस्सकृदुच्चारणः संसारविमोचनो भवति। सर्वपुरुषार्थसिद्धिर्भवति। न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तत इति। य एवं वेदेत्युपनिषत् ॥७॥ 'गुरु' शब्द का उच्चारण एक बार भी कर लेने से संसार से मुक्ति प्राप्त हो जाती है। उसके (गुरु उच्चारण से) सभी पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं। फिर वह कदापि इस संसार में पुनरागमन नहीं करता, कभी पुनरावर्तन नहीं करता, यह सत्य है। जो इसे ठीक प्रकार समझता है (उसे सभी फल प्राप्त होते हैं) ॥७॥ ॥ इति द्वयोपनिषत् समाप्ता ॥
॥ नारदपरिव्राजकोपनिषद् ॥ यह उपनिषद् अथर्ववेद से सम्बद्ध है। इसमें परिव्राजक-संन्यासी के सिद्धान्तों, आचरणों आदि का विस्तृत वर्णन है। इसके नाम से ही प्रकट है कि इस उपनिषद् के उपदेष्टा देवर्षि नारदजी हैं, जो परिव्राजकों (परितः व्रजन्ति इति परिव्राजकः) के सर्वोत्कृष्ट आदर्श हैं। इस उपनिषद् के कुल नौ प्रखण्ड हैं, जिन्हें 'उपदेश' की संज्ञा प्रदान की गई है। प्रथम उपदेश में शौनक आदि अनेक ऋषियों ने देवर्षि नारद जी से संसारबन्धन से मुक्ति का उपाय जानना चाहा है, उसी के उत्तर में नारद जी ने विस्तार से वर्णाश्रम धर्म का विवेचन किया है। द्वितीय उपदेश में शौनक जी ने 'संन्यास' की विधि के विषय में नारद जी से पूछा है। तृतीय उपदेश में नारदजी ने संन्यास का सच्चा अधिकारी कौन है? यह प्रश्न पितामह से पूछा है। इसके बाद आतुर संन्यास का विवेचन किया गया है। चतुर्थ-पंचम उपदेश में संन्यास धर्म के पालन का महत्त्व एवं संन्यास-धर्म ग्रहण करने की शास्त्रीय विधि का विस्तृत वर्णन किया गया है। साथ ही संन्यासी के भेद भी वर्णित किए गए हैं। षष्ठ उपदेश में तुरीयातीत पद की प्राप्ति के उपाय तथा परिव्राजक (संन्यासी) की जीवनचर्या पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। सातवें उपदेश में संन्यास धर्म के सामान्य नियमों का तथा कुटीचक, बहूदक आदि संन्यासियों के विशेष नियमों का उल्लेख किया गया है। अष्टम उपदेश में प्रणवानुसन्धान के क्रम में विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया गया है। अन्तिम नवें उपदेश में ब्रह्म के स्वरूप का विस्तृत वर्णन है, साथ ही आत्मवेत्ता संन्यासी का लक्षण बताकर उसके द्वारा परमपद प्राप्त करने की प्रक्रिया का निरूपण करते हुए उपनिषद् को पूर्णता प्रदान की गई है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ भद्रं कर्णेभिः .................... इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य- अथर्वशिर उपनिषद) ॥ प्रथमोपदेशः ॥ अथ कदाचित्परिव्राजकाभरणो नारदः सर्वलोकसंचारं कुर्वन्नपूर्वपुण्यस्थलानि पुण्यतीर्थानि तीर्थीकुर्वन्नवलोक्य चित्तशुद्धिं प्राप्य निर्वैरः शान्तो दान्तः सर्वतो निर्वेदमासाद्य स्वरूपानुसंधानमनुसंधाय नियमानन्दविशेषगण्यं मुनिजनैरुपसंकीर्णं नैमिषारण्यं पुण्यस्थलमवलोक्य सरिगमपधनिससंज्ञैर्वैराग्यबोधकरैः स्वरविशेषैःप्रापञ्चिकपराङ्- मुखैर्हरिकथालापैःस्थावरजङ्गमनामकैर्भगवद्भक्तिविशेषैर्नरमृगकिंपुरुषामरकिंनराप्सरो गणान्संमोहयन्नागतं ब्रह्मात्मजं भगवद्भक्तं नारदमवलोक्य द्वादशवर्षसत्रयागोपस्थिताः श्रुताध्ययनसंपन्नाः सर्वज्ञास्तपोनिष्ठापराश्च ज्ञानवैराग्यसंपन्नाः शौनकादिमहर्षयः प्रत्युत्थानं कृत्वा नत्वा यथोचितातिथ्यपूर्वकमुपवेशयित्वा स्वयं सर्वेऽप्युपविष्टा भो भगवन् ब्रह्मपुत्र कथं मुक्त्युपायोऽस्माकं वक्तव्यम् ॥ १ ॥ एक बार परिव्राजकों में सर्वश्रेष्ठ देवर्षि नारद जी समस्त लोकों में भ्रमण करते हुए अत्यन्त पुण्यदायी स्थानों एवं तीर्थ स्थलों में गये। वे समस्त स्थल उनके शुभागमन से और भी अधिक पवित्र हो गये। उन सभी तीर्थों के दर्शन मात्र से ही उन देवर्षि ने अपने चित्त की शुद्धि प्राप्त की। उन देव ऋषि का मन अत्यधिक शान्त था, सभी इन्द्रियाँ उनके वश में थीं, वे सभी तरफ से विरक्त थे तथा उनके मन में किसी भी जीव के प्रति द्वेष-
१२७ नारदपरिव्राजकापनिषद् भाव नहीं था। वे सभी तरफ से विरक्त हो, स्वयं के स्वरूप के अनुसंधान में लगे हुए थे। भ्रमण करते-करते वे नैमिषारण्य में आये, जो नियम-संयम से आनन्दित करने के कारण विशेष गणना करने योग्य पवित्र तीर्थ है। उस तीर्थ में अनेकों ऋषि-मुनि निवास करते थे। उन देवर्षि नारद जी ने उस पुण्य भूमि का दर्शन किया, वहाँ वैराग्य का बोध कराने वाले विशेष वीणा के स्वर झंकृत हो रहे थे। वे सांसारिक चर्चा से परे रहकर भगवान् की वीणा द्वारा मधुर कथा के गीतों में रस लेते थे। उन देवर्षि के गीतों का श्रवण करके समस्त स्थावर-जंगम प्राणिसमुदाय आनन्द से झूम उठता था। उनका भक्ति रस से परिपूर्ण संगीत मनुष्य, पशु, देवता, किन्नर, गन्धर्व एवं अप्सरा आदि को भी आकृष्ट कर रहा था। उस समय उस सुप्रसिद्ध स्थल पर बारह वर्षीय सत्र-याग सम्पन्न किया जा रहा था। उस महान् यज्ञ में समस्त देवगण, तपस्वीजन, ज्ञान-वैराग्य से ओत-प्रोत शौनक आदि महर्षि जन सम्मिलित हुए। उन महर्षिजनों ने परम भागवत देवर्षि नारद को आया देखकर अतिभव्य स्वागत-सत्कार किया। उनके चरणों में मस्तक झुकाया तथा उन्हें सर्वश्रेष्ठ आसन पर प्रतिष्ठित किया। तदनन्तर समस्त महर्षिजन अपने-अपने आसनों पर सुशोभित हुए, फिर शौनक आदि ऋषियों ने उनसे नम्रतापूर्वक प्रश्न किया-हे देवर्षे ! संसार के बन्धनों से मुक्ति का क्या उपाय है? कृपा करके हमें यह बताने का अनुग्रह करें ॥ १ ॥ इत्युक्तस्तान् स होवाच नारदः सत्कुलभवोपनीतः सम्यगुपनयनपूर्वकं चतुश्चत्वा- रिंशत्संस्कारसंपन्नः स्वाभिमतैकगुरुसमीपे स्वशाखाध्ययनपूर्वकं सर्वविद्याभ्यासं कृत्वा द्वादशवर्षशुश्रूषापूर्वकं ब्रह्मचर्यं पञ्चविंशतिवत्सरं गार्हस्थ्यं पञ्चविंशतिवत्सरं वानप्रस्थाश्रमं तद्विधिवत्क्रमात्रिर्वर्त्य चतुर्विधब्रह्मचर्यं षड्विधं गार्हस्थ्यं चतुर्विधं वानप्रस्थधर्मं सम्यगभ्यस्य तदुचितं कर्म सर्वं निर्वर्त्य साधनचतुष्टयसंपन्नः सर्वसंसारोपरि मनोवाक्कायकर्मभिर्यथा- शानिवृत्तस्तथा वासनैषणोपर्यपि निर्वैरः शान्तो दान्तः संन्यासी परमहंसाश्रमेणास्खलित- स्वस्वरूपध्यानेन देहत्यागं करोति स मुक्तो भवति स मुक्तो भवतीत्युपनिषत् ॥ २ ॥ उन शौनकादि महर्षिजनों के इस प्रकार प्रश्न करने पर उन त्रिलोक-प्रसिद्ध देवर्षि नारद जी ने कहा-श्रेष्ठ कुल में प्रादुर्भूत पुरुष यदि उपनयन संस्कार में संस्कृत न हुआ हो, तो सर्वप्रथम उसका विधिवत् उपनयन- संस्कार सम्पन्न कराये। तदनन्तर चवालीस संस्कारों से सम्पन्न होकर तथा अपने मनोनुरूप गुरु के समीप आश्रम में प्रतिष्ठित हो। वहाँ (आश्रम में) गुरु की सेवा-शुश्रूषा करते हुए सर्वप्रथम अपनी (वेद की) शाखा का अध्ययन करे। तदनन्तर क्रमानुसार समस्त विद्याओं का अभ्यास करते हुए बारह वर्षों तक गुरु सेवा करते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करता रहे। इसके पश्चात् क्रमशः पच्चीस वर्षों तक गृहस्थ-धर्म का तथा पच्चीस वर्षों तक वानप्रस्थ धर्म का विधिवत् पालन करना चाहिए। प्रबुद्धजन चार तरह का ब्रह्मचर्य बतलाते हैं, गार्हस्थ्य छः प्रकार का तथा वानप्रस्थ चार तरह का बतलाया गया है। इन सभी आश्रमों का भलीभाँति अभ्यास करते हुए उन-उन आश्रमों के सभी कर्मों का समुचित अनुष्ठान करे। तत्पश्चात् साधन चतुष्टय से युक्त होकर सम्पूर्ण विश्व से ऊपर उठकर मन, वाणी, कर्म, देह आदि के द्वारा सभी तरह की आशा का परित्याग करे और वासनाओं एवं एषणाओं का भी सर्वथा त्याग कर दे। इसके बाद सभी के प्रति वैरभाव का परित्याग करके मन एवं इन्द्रियों को वश में रखते हुए संन्यास ग्रहण कर लेना चाहिए तथा संन्यास आश्रम में रहकर अपने अविनाशी स्वरूप का ध्यान करते रहना चाहिए। इस प्रकार से चिन्तन में लीन हुआ जो पुरुष शरीर का परित्याग करता है वह मुक्ति प्राप्त कर लेता है, वह मुक्त हो जाता है। यही उपनिषद् (गूढ़ रहस्य युक्त विशिष्ट ज्ञान) है ॥ २ ॥
उपदेश २ मन्त्र १ १२८ ॥ द्वितीयोपदेशः ॥ अथ हैनँ भगवन्तं नारदं सर्वे शौनकादयः पप्रच्छुर्भो भगवन् संन्यासविधिं नो ब्रूहीति तानवलोक्य नारदस्तत्स्वरूपं सर्वं पितामहमुखेनैव ज्ञातुमुचितमित्युक्त्वा सत्रयागपूर्त्यनन्तरं तैः सह सत्यलोकं गत्वा विधिवद्ब्रह्मनिष्ठावरं परमेष्ठिनं नत्वा स्तुत्वा यथोचितं तदाज्ञया तैः सहोपविश्य नारदः पितामहमुवाच गुरुस्त्वं जनकस्त्वं सर्वविद्यारहस्यज्ञः सर्वज्ञस्त्वमतो मत्तो मदिष्टं रहस्यमेकं वक्तव्यं त्वद्विना मदभिमतरहस्यं वक्तुं कः समर्थः। किमिति चेत् पारिव्राज्यस्व- रूपक्रमं नो ब्रूहीति नारदेन प्रार्थितः परमेष्ठी सर्वतः सर्वानवलोक्य मुहूर्तमात्रं समाधिनिष्ठो भूत्वा संसारार्तिनिवृत्यन्वेषण इति निश्चित्य नारदमवलोक्य तमाह पितामहः। पुरा मत्पुत्र पुरुषसूक्तोपनिषद्रहस्यप्रकारं निरतिशायाकारावलम्बिना विराट्पुरुषेणोपदिष्टं रहस्यं ते विविच्योच्यते तत्क्रममतिरहस्यं बाढमवहितो भूत्वा श्रूयताम्। भो नारद विधिवदादावनुपनीतोपनयनानन्तरं तत्सत्कुलप्रसूतः पितृमातृविधेयः पितृस- मीपाद्न्यत्र सत्संप्रदायस्थं श्रद्धावन्तं सत्कुलभवं श्रोत्रियं शास्त्रवात्सल्यं गुणवन्तमकुटिलं सद्गुरु- मासाद्य नत्वा यथोपयोगशुश्रूषापूर्वकं स्वाभिमतं विज्ञाप्य द्वादशवर्षसेवापुरःसरं सर्वविद्याभ्यासं कृत्वा तदनुज्ञया स्वकुलानुरूपामाभिमतकन्यां विवाह्य पञ्चविंशतिवत्सरं गुरुकुलवासं कृत्वाथ गुर्वनुज्ञया गृहस्थोचितकर्म कुर्वन्दौर्ब्राह्मण्यनिवृत्तिमेत्य स्ववंशवृद्धिकामः पुत्रमेकमासाद्य गार्ह- स्थ्योचितपञ्चविंशतिवत्सरं तीर्त्वा ततः पञ्चविंशतिवत्सरपर्यन्तं त्रिषवणमुदकस्पर्शनपूर्वकं चतु- र्थकालमेकवारमाहारमाहरन्नयमेक एव वनस्थो भूत्वा पुरग्रामप्राक्तनसंचारं विहाय निकिर विर- हिततदाश्रितकर्मोचितकृत्यं दृष्टश्रवणविषयवैतृष्ण्यमेत्य चत्वारिंशत्संस्कारसंपन्नः सर्वतो विर- क्तश्चित्तशुद्धिमेत्याशासूयेर्ष्याहंकारं दग्ध्वा साधनचतुष्टयसंपन्नः संन्यस्तुमर्हतीत्युपनिषत् ॥ १ ॥ इसके पश्चात् वे शौनक आदि महर्षिजन पुनः देवर्षि नारद जी से प्रार्थना करते हुए कहने लगे-हे भगवन् ! आप हम सभी को संन्यास की विधि बताने की कृपा करें। नारद जी ने उन सभी पर स्नेहपूरित दृष्टिपात किया और कहने लगे- 'हे महर्षे ! संन्यास का सम्पूर्ण स्वरूप लोक पितामह ब्रह्माजी के श्रीमुख से ही श्रवण करना श्रेयस्कर होगा।' ऐसा कहकर सत्र-याग के सम्पन्न होने पर उन सभी के सहित वे देवर्षि नारद ब्रह्मलोक में आकर परब्रह्म का चिन्तन करते हुए, नमन-वन्दन करते हुए ब्रह्माजी की स्तुति करने लगे। तदनन्तर ब्रह्माजी ने सभी को यथोचित आसन पर बैठने को कहा। तत्पश्चात् नारद जी भगवान् ब्रह्माजी की स्तुति करते हुए कहने लगे- 'ब्रह्मन् ! आप हम सभी के गुरु एवं पिता हैं। आप सभी कुछ जानने वाले तथा सम्पूर्ण विद्याओं के ज्ञाता हैं। अतः आप हमारे एक अत्यन्त-प्रिय रहस्य को प्रकट करने का अनुग्रह करें। आपके अतिरिक्त ऐसा कोई भी नहीं है, जो हम सभी के इच्छित रहस्य को भली प्रकार से स्पष्ट कर सके। यदि आप हमारे अभीष्ट विषय के रहस्य को बताने के लिए तैयार हों, तो सर्वप्रथम कृपा करके आप 'परिव्राजक के स्वरूप एवं क्रम (नियम) को हम सभी के समक्ष उपदेश करने की कृपा करें। देवर्षि नारद के द्वारा इस प्रकार की जिज्ञासा व्यक्त किये जाने पर ब्रह्मा जी ने एक बार देखा तथा दो घड़ी के लिए समाधिस्थ होकर जन्म-मृत्यु रूप सांसारिक कष्टों से मुक्ति प्राप्त करने का उपाय खोजने लगे- "हे नारद ! पुरातन समय में 'पुरुषसूक्त' में तथा उपनिषदों में वर्णित
१२९ नारदपरिव्राजकोपनिषद् किये गये गूढ़ रहस्यानुकूल अति श्रेष्ठ दिव्य विग्रहधारी विराट् पुरुष ने जो मेरे लिए उपदेश किया था, उसी दिव्य ज्ञान को तुम सभी के समक्ष प्रकट कर रहा हूँ"। परिव्राजक का स्वरूप एवं क्रम अत्यधिक रहस्यमय है। उसको तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। माता- पिता की आज्ञा मानने वाले सर्वश्रेष्ठ कुल में प्रादुर्भूत बालक का यदि उपनयन संस्कार न सम्पन्न हुआ हो, तो सर्वप्रथम उस बालक का उपनयन (यज्ञोपवीत) संस्कार सम्पन्न कराना चाहिए। तदनन्तर उस बालक को अपने माता-पिता के समीप न रहकर किसी उच्चकुलीन उत्पन्न सद्गुरु के आश्रम में जाकर निवास करना चाहिए। वे महान् गुरु श्रोत्रिय शास्त्र के प्रति अनुराग रखने वाले श्रद्धावान् एवं गुणवान् हों। उन समर्थ गुरु की सेवा में उपस्थित होकर उनके चरणों में नमन-वन्दन करते हुए उन पर सर्वस्व समर्पित कर देना चाहिए। तत्पश्चात् उन की आज्ञा प्राप्त करके बारह वर्षों तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए गुरु की सेवा-शुश्रूषा करते हुए समस्त विद्याओं का अभ्यास करना चाहिए। अध्ययन पूर्ण हो जाने के पश्चात् कुलानुरूप किसी श्रेष्ठ कन्या से गुरु की आज्ञा प्राप्त करके विवाह करे तथा पच्चीस वर्षों तक गृहस्थाश्रम का पालन करना चाहिए। अपने वंश की अभिवृद्धि हेतु पुत्रोत्पत्ति कर्म पूर्ण करे। गृहस्थ के पच्चीस वर्ष पूर्ण करने के पश्चात् वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करे। इस आश्रम में सतत परिव्रज्या करते हुए पच्चीस वर्ष तक निवास करे। तीनों संध्याओं में स्नान एवं दिवस के चौथे प्रहर में एक बार भोजन ग्रहण करे। ग्राम या नगर के परिचित मार्गों का परित्याग करके अकेला ही वन में विचरण करे। बिना जोती-बोई हुई भूमि में उत्पन्न हुए चावल आदि इकट्ठा करके उसी से आश्रमा- नुरूप धर्म का पालन करते हुए दृश्य-श्रव्यादि विषयों से विरक्त होकर चालीस संस्कारों से युक्त होकर चित्त को सर्वतोभावेन सदैव के लिए पवित्र कर ले। आशा, असूया, ईर्ष्या, अहंकार आदि का परित्याग करके साधन चतुष्टय से परिपूर्ण हो जाए। इन सभी से युक्त होकर वह संन्यास ग्रहण करने का अधिकारी बन जाता है॥ १॥ ॥ तृतीयोपदेशः ॥ अथ हैन नारदः पितामहं पप्रच्छ भगवन् केन संन्यासाधिकारी वेत्येवमादौ संन्यासाधि- कारिणं निरूप्य पश्चात्संन्यासविधिरुच्यते अवहितः शृणु। अथ षण्ढः पतितोऽङ्गविकलः स्त्रैणो बधिरोऽर्भको मूकः पाषण्डश्चक्री लिङ्गी वैखानसहरद्विजौ भृतकाध्यापकः शिपिविष्टोऽनग्निको वैराग्यवन्तोऽप्येते न संन्यासार्हाः संन्यस्ता यद्यपि महावाक्योपदेशनाधिकारिणः पूर्वसंन्यासी परमहंसाधिकारी ॥ १ ॥ इसके पश्चात् देवर्षि नारद ने पितामह ब्रह्माजी से प्रश्न किया- भगवन्! संन्यास किसके द्वारा लिया जाता है तथा संन्यास का अधिकारी कौन है? ब्रह्माजी ने कहा- पहले यह निरूपण करते हैं कि संन्यास का अधिकारी कौन है? तत्पश्चात् संन्यास धारण करने की विधि पर प्रकाश डालेंगे। सावधानी पूर्वक सुनो- नपुंसक, पतित, अंगविहीन, अत्यधिक स्त्री आसक्त, बधिर, गूँगे, बालक, पाखण्डी, चक्री (कुचक्र रचने वाला), लिङ्गी (वेषधारण करने वाला), वैखानस (वानप्रस्थी), हरद्विज (शिवभक्त), वेतन लेकर शिक्षण करने वाले अध्यापक, शिपिविष्ट (गंजे या कोढ़ी), अग्निहोत्र न करने वाले ये सभी विरक्त होने पर भी संन्यास ग्रहण करने के अधिकारी नहीं हैं। यदि वे किसी प्रकार संन्यास ग्रहण कर भी लें, तो भी महावाक्यों का उपदेश ग्रहण करने के अधिकारी नहीं हैं। जो पूर्व से (ब्रह्मचर्य एवं गृहस्थाश्रम के समय से) ही संन्यासाश्रम के अनुसार आचरण करने वाले हैं, वे ही संन्यास धारण करने के अधिकारी हैं ॥ १ ॥
उपदेश ३ मन्त्र १३ १३० परेणैवात्मनश्चापि परस्यैवात्मना तथा। अभयं समवाप्नोति स परिव्राडिति स्मृतिः ॥२॥ जो दूसरों से न भयभीत होता है और न ही स्वयं दूसरों को भयभीत करता है, वही वस्तुतः परिव्राजक है, ऐसा स्मृतियों का कथन है ॥ २ ॥ षण्ढोऽथ विकलोऽप्यन्धो बालकश्चापि पातकी। पतितश्च परद्वारी वैखानसहरद्विजौ ॥ ३ ॥ चक्री लिङ्गी च पाषण्डी शिपिविष्टोऽप्यनग्निकः। द्वित्रिवारेण संन्यस्तो भृतकाध्यापकोऽपि च। एते नार्हन्ति संन्यासमातुरेण विना क्रमम् ॥ ४॥ नपुंसक, विकलाङ्ग, अन्धे, बालक, पातकी, पतित, परस्त्रीरत, वैखानस, हरद्विज (शिवभक्त), कुचक्र रचने वाले, लिङ्गी (वेषधारी), पाखण्डी, शिपिविष्ट, अयाज्ञिक, वेतनभोगी शिक्षक तथा दो-तीन बार संन्यास ले चुकने वाले ये सभी आतुर संन्यास लेने योग्य हो सकते हैं, क्रमशः संन्यास लेने योग्य नहीं ॥ ३-४ ॥ आतुरकालः कथमार्यसम्मतः। प्राणस्योत्क्रमणासन्नकालस्त्वातुरसंज्ञकः। नेतरस्त्वातुरः कालो मुक्तिमार्गप्रवर्तकः ॥ ५ ॥ आतुरेऽपि च संन्यासे तत्तन्मन्त्रपुरःसरम्। मन्त्रावृत्तिं च कृत्वैव संन्यसेद्विधिवद्बुधः ॥ ६ ॥ आतुरेऽपि क्रमे वापि प्रैषभेदो न कुत्रचित्। न मन्त्रं कर्मरहितं कर्म मन्त्रमपेक्षते ॥ ७ ॥ अकर्म मन्त्ररहितं नातो मन्त्रं परित्यजेत्। मन्त्रं विना कर्म कुर्याद्भस्मन्या- हुतिवद्भवेत् ॥ ८ ॥ विध्युक्तकर्म संक्षेपात्संन्यासस्त्वातुरःस्मृतः। तस्मादातुरसंन्यासे मन्त्रावृत्तिविधिर्मुने ॥ ९ ॥ (नारद का प्रश्न) आतुर संन्यास का कौन सा समय विद्वज्जनों द्वारा माना गया है? (ब्रह्मा का उत्तर-) प्राणों के निकलने का समय जब अत्यन्त निकट हो, तभी आतुर संन्यास लेने का उचित समय माना गया है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई समय उचित नहीं है। आतुर संन्यास यदि ठीक समय पर सम्पन्न हो जाये, तो वह मुक्ति प्रदायक होता है। आतुर संन्यास ग्रहण में भी विद्वान् पुरुष शास्त्र विहित मन्त्रों का विधिवत् उच्चारण करके ही संन्यास ग्रहण करे। आतुर संन्यास और क्रम संन्यास के विधान में प्रायः कोई भेद नहीं है। प्रत्येक मन्त्र कर्म से ही सम्बन्धित होता है और कर्म मन्त्र द्वारा प्रेरित होता है। मन्त्र के बिना किया गया कोई भी कर्म वस्तुतः कर्म नहीं है। अस्तु, मन्त्र का कभी परित्याग नहीं करना चाहिए। मन्त्ररहित किया गया कोई भी कर्म भस्म (राख) में छोड़ी हुई आहुति के समान व्यर्थ होता है। हे मुने! शास्त्र वर्णित कर्म के संक्षेप में करने से आतुर संन्यास की विधि पूर्ण होती है। इसलिए इस (प्रक्रिया) में मन्त्रों का बारम्बार उच्चारण शास्त्र सम्मत एवं उचित है ॥ ५-९ ॥ आहिताग्निविरक्तश्चेद्देशान्तरगतो यदि। प्राजापत्येष्टिमप्स्वेव निर्वृत्यैवाथ संन्यसेत् ॥ १० ॥ मनसा वाथ विध्युक्तमन्त्रावृत्त्याथ वा जले। श्रुत्यनुष्ठानमार्गेण कर्मानुष्ठानमेव वा। समाप्य संन्यसेद्विद्वान्नो चेत्पातित्यमाप्नुयात् ॥ ११ ॥ यदि अग्निहोत्र सम्पन्न करने वाला पुरुष किसी अन्य देश में गया हो और वहाँ उसे वैराग्य उत्पन्न हो जाए, तो जल में प्राजापत्य इष्टि सम्पन्न करके संन्यास ग्रहण कर ले। यह प्राजापत्य याग केवल मन से करे अथवा शास्त्र विहित मन्त्रों के उच्चारण पूर्वक अथवा वेदोक्त विधान से कर्मानुष्ठान पूर्वक सम्पन्न करे। यह सब करके ही विद्वान् पुरुष संन्यास ले, अन्यथा वह अपने धर्म से च्युत हो जाता है ॥ १०-११॥ यदा मनसि संजातं वैतृष्ण्यं सर्ववस्तुषु। तदा संन्यासमिच्छेत पतितः स्याद्विपर्यये ॥१२॥ विरक्तः प्रव्रजेद्धीमान्सरक्तस्तु गृहे वसेत् । सरागो नरकं याति प्रव्रजन्हि द्विजाधमः ॥१३॥
१३१ नारदपरिव्राजकोपनिषद् जब मन में सभी पदार्थों के प्रति वितृष्णा उत्पन्न हो जाए, तभी संन्यास ग्रहण करने की इच्छा करनी चाहिए। इससे विपरीत आचरण से मनुष्य पतित हो जाता है। जिसके मन में सम्पूर्ण वैराग्य हो, उसी बुद्धिमान् पुरुष को संन्यास लेकर प्रव्रज्या करनी चाहिए और रागवान् को घर में ही रहना चाहिए। जो अधम द्विज मन में राग रहते हुए भी संन्यास ग्रहण कर लेता है, वह नरक को प्राप्त होता है॥ १२-१३॥ यस्यैतानि सुगुप्तानि जिह्वोपस्थोदरं करः। संन्यसेदकृतोद्वाहो ब्राह्मणो ब्रह्मचर्यवान् ॥१४॥ संसारमेव निःसारं दृष्ट्वा सारदिदृक्षया। प्रव्रजन्त्यकृतोद्वाहः परं वैराग्यमाश्रितः ॥ १५ ॥ प्रवृत्तिलक्षणं कर्म ज्ञानं संन्यासलक्षणम्। तस्माज्ज्ञानं पुरस्कृत्य संन्यसेदिह बुद्धिमान् ॥ १६ ॥ जिसकी रसना (जिह्वा), उपस्थेन्द्रिय, उदर और हस्त-पाद आदि इन्द्रियाँ पूर्णरूपेण वश में हों अथवा जिसने विवाह न किया हो, ऐसा ब्रह्मचर्यवान् ब्राह्मण ही संन्यास ग्रहण करने का अधिकारी है। विद्वान् पुरुष संसार को निस्सार समझकर सार तत्त्व पाने की कामना से अविवाहित रहकर ही वैराग्याश्रित होकर संन्यास ग्रहण कर लेते हैं। कर्म प्रवृत्ति का लक्षण है तथा ज्ञान संन्यास का मुख्य लक्षण है। अस्तु, बुद्धिमान् पुरुष को चाहिए कि वह ज्ञान को लक्ष्य करके ही संन्यासाश्रम में प्रवेश करे॥ १४-१६ ॥ यदा तु विदितं तत्त्वं परं ब्रह्म सनातनम्। तदैकदण्डं संगृह्य सोपवीतां शिखां त्यजेत् ॥१७॥ परमात्मनि यो रक्तो विरक्तोऽपरमात्मनि। सर्वैषणाविनिर्मुक्तः स भैक्षं भोक्तुमर्हति ॥ १८॥ पूजितो वन्दितश्चैव सुप्रसन्नो यथा भवेत्। तथा चेत्ताड्यमानस्तु तदा भवति भैक्षभुक् ॥ १९ ॥ अहमेवाक्षरं ब्रह्म वासुदेवाख्यमद्वयम्। इति भावो ध्रुवो यस्य तदा भवति भैक्षभुक् ॥ २० ॥ यस्मिन्शान्तिः शमः शौचं सत्यं संतोष आर्जवम्। अकिंचनमदम्भश्च स कैवल्याश्रमे वसेत् ॥२१॥ यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेषु पापकम्। कर्मणा मनसा वाचा तदा भवति भैक्षभुक् ॥ २२॥ दशलक्षणकं धर्ममनुतिष्ठन्समाहितः। वेदान्तान्विधिवच्छ्रुत्वा संन्यसेदनृणो द्विजः ॥ २३॥ धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥ २४॥ अतीतान्न स्मरेद्भोगान्न तथानागतानपि। प्राप्तांश्च नाभिनन्देद्यः स कैवल्याश्रमे वसेत् ॥ २५ ॥ अन्तःस्थानीन्द्रियाण्यन्तर्बहिष्ठान्विषयान्बहिः। शक्नोति यः सदा कर्तुं स कैवल्याश्रमे वसेत् ॥२६ ॥ प्राणे गते यथा देहः सुखं दुःखं न विन्दति। तथा चेत्प्राणयुक्तोऽपि स कैवल्याश्रमे वसेत् ॥२७॥ जब परमतत्त्वरूप सनातन ब्रह्म का सम्यक् ज्ञान हो जाए, तब एक दण्ड धारण करके शिखा और यज्ञोपवीत का परित्याग कर देना चाहिए। जो परमात्मा में अनुरक्त है तथा उससे भिन्न समस्त वस्तुओं के प्रति विरक्त है, जो सभी एषणाओं (पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा) से मुक्त है, वही भिक्षा का अन्न ग्रहण करने का अधिकारी है। अपनी पूजा और वन्दना किये जाने पर जिस प्रकार सामान्य जन प्रसन्न होते हैं, डण्डों से पीटे जाने पर भी जिसे उसी प्रकार की प्रसन्नता हो, वही भिक्षु होने के योग्य है। जिसके मन में इस प्रकार का भाव दृढ़ हो गया है कि मैं ही वासुदेव नाम प्रख्यात अद्वितीय, अक्षर ब्रह्म हूँ; वही भिक्षात्र ग्रहण करने का अधिकारी है। जिसमें शान्ति, शम (शमन), दम (दमन), शौच (पवित्रता), सत्य, सन्तोष, सरलता, अपरिग्रह का भाव तथा दम्भ का अभाव हो, वही कैवल्याश्रम (संन्यासाश्रम) में प्रवेश करने का अधिकारी है। जो मन, वचन, कर्म से भी किसी के प्रति पाप का भाव नहीं रखता, वही भिक्षात्र ग्रहण करने का अधिकारी होता है। (मनुक- थित) धर्म के दस लक्षणों को जीवन में एकाग्रता पूर्वक उतार कर जो सविधि वेदान्त श्रवण, स्वाध्याय तथा ब्रह्मचर्य पालन करते हुए तीनों ऋणों (ऋषिऋण, देवऋण और पितृऋण) से मुक्त हो (ब्रह्मचर्य तथा स्वाध्याय
उपदेश ३ मन्त्र ४० १३२ द्वारा ऋषिऋण से, यज्ञानुष्ठान द्वारा देवऋण से तथा पुत्रोत्पत्ति द्वारा पितृऋण से मुक्ति का प्रयास करे) वही संन्यास ग्रहण करने का अधिकारी है। धैर्य, क्षमा, दमन (मन को वश में रखना), अस्तेय (चोरी न करना), पवित्रता, इन्द्रिय निग्रह, धी (सद्बुद्धि), विद्या, सत्य एवं अक्रोध ये धर्म के दस लक्षण कहे गये हैं। जो पुरुष अतीत के भोगों का चिन्तन नहीं करता, वर्तमान में प्राप्त भोगों का अभिनन्दन (स्वागत) नहीं करता तथा भविष्य में प्राप्त होने वाले भोगों की कामना नहीं करता, वही संन्यासाश्रम में प्रवेश करने का अधिकार रखता है। जो पुरुष अन्तःकरण में विराजमान इन्द्रियों तथा बाह्याभ्यन्तर के विषयों को मन में स्थान न दे, वही कैवल्याश्रम (संन्यास) में रहने के योग्य है। जिस प्रकार प्राणविहीन शरीर सुख-दुःख का अनुभव नहीं करता, उसी प्रकार जो व्यक्ति प्राणों के रहने पर भी सुख-दुःख का अनुभव न करे, वही संन्यास लेने के योग्य है ॥ १७-२७ ॥ कौपीनयुगलं कन्था दण्ड एकः परिग्रहः। यतेः परमहंसस्य नाधिकं तु विधीयते ॥ २८ ॥ यदि वा कुरुते रागादधिकस्य परिग्रहम् । रौरवं नरकं गत्वा तिर्यग्योनिषु जायते ॥ २९ ॥ विशीर्णान्यमलान्येव चेलानि ग्रथितानि तु । कृत्वा कन्थां बहिर्वासो धारयेद्धातुरञ्जितम् ॥ ३० ॥ एकवासा अवासा वा एकदृष्टिरलोलुपः । एक एव चरेन्नित्यं वर्षास्वेकत्र संवसेत् ॥ ३१ ॥ कुटुम्बं पुत्रदारांश्च वेदाङ्गानि च सर्वशः । यज्ञं यज्ञोपवीतं च त्यक्त्वा गूढश्चरेद्यतिः ॥ ३२ ॥ दो कौपीन, एक कन्था (गुदड़ी) तथा एक दण्ड इनसे अधिक वस्तुएँ संग्रह करने का परमहंस (संन्यासी) को अधिकार नहीं है। यदि वह इनसे अधिक वस्तुएँ संग्रह करता है, तो वह मरणोपरान्त रौरव नामक नरक में जाता है, तत्पश्चात् तिर्यक् (पशु-पक्षी आदि) योनियों में जाता है। संन्यासी को चाहिए कि वह शीत आदि से रक्षा के लिए जीर्ण-शीर्ण; किन्तु साफ-सुथरे वस्त्रों को सिलकर कन्था (गुदड़ी) बनाये और नगर या ग्राम से बाहर निर्जन स्थान में जाकर रहे तथा गेरुआ वस्त्र धारण करे। संन्यासी एक वस्त्र धारण करे अथवा वस्त्रहीन रहे। दृष्टि को इधर-उधर न रखकर एकाग्रचित्त रहे तथा समस्त वस्तुओं के प्रति अलोलुप रहे। वह सतत एकाकी ही विचरण करे और वर्षाकाल (चातुर्मास) में एक स्थान पर निवास करे। स्त्री-पुत्र, कुटुम्ब, वेदाङ्गों के ग्रन्थ (व्याकरण आदि), यज्ञ और यज्ञोपवीत को सर्वथा विसर्जित करके संन्यासी को सदैव अपने को गूढ़ बनाकर (अपना विज्ञापन किये बिना) विचरण करना चाहिए ॥ २८-३२ ॥ कामः क्रोधस्तथा दर्पो लोभमोहादयश्च ये । तांस्तु दोषान्परित्यज्य परिव्राणिनिर्ममो भवेत् ॥३३ ॥ रागद्वेषवियुक्तात्मा समलोष्टाश्मकाञ्चनः । प्राणिहिंसानिवृत्तश्च मुनिः स्यात्सर्वनिस्पृहः ॥३४॥ दम्भाहंकारनिर्मुक्तो हिंसापैशुन्यवर्जितः । आत्मज्ञानगुणोपेतो यतिर्मोक्षमवाप्नुयात् ॥३५॥ इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोषमृच्छत्यसंशयः। संनियम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं निगच्छति ॥ ३६ ॥ न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति। हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ ३७ ॥ श्रुत्वा स्पृष्ट्वा च भुक्त्वा च दृष्ट्वा घ्रात्वा च यो नरः। न हृष्यति ग्लायति वा स विज्ञेयो जितेन्द्रियः ॥ यस्य वाङ्मनसी शुद्धे सम्यग्गुप्ते च सर्वदा । स वै सर्वमवाप्नोति वेदान्तोपगतं फलम् ॥३९ ॥ संमानाद्ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव । अमृतस्येव चाकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा ॥४०॥ काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकारादि समस्त दोषों का परित्याग करके संन्यासी को सब ओर से निर्मम (ममतारहित) हो जाना चाहिए। उसे समस्त रागों से विरक्त होकर मिट्टी के ढेले, पत्थर और स्वर्ण में समान भाव रखना चाहिए। उसे हिंसा से परे और निस्पृह हो जाना चाहिए। जो संन्यासी दम्भ, अहंकार, हिंसा, परनिन्दा आदि दोषों से दूर है तथा आत्मज्ञान उपलब्ध कराने वाले गुणों से सुशोभित है, वही मुक्ति का अधिकारी है।