१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
॥ क्षुरिकापनिषद् ॥ यह उपनिषद् कृष्णयजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसमें कुल २५ मन्त्र हैं। यह उपनिषद् तत्त्व-ज्ञान के प्रति- बन्धक घटकों को काटने में क्षुरिका (छुरी-चाकू) सदृश समर्थ है। योग के अष्टांगों (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) में से धारणा की सिद्धि और उसके प्रतिफल की यहाँ विशेष रूप से चर्चा है। इस उपनिषद् में कहा गया है कि सर्वप्रथम योग साधना के लिए दृढ़ आसन पर बैठकर प्राणायाम की विशेष क्रियाओं का अभ्यास करते हुए शरीर के सभी मर्म स्थानों में प्राण का संचार उसी प्रकार करे, जिस प्रकार मकड़ी अपने द्वारा निर्मित अति सूक्ष्म तन्तुओं पर गतिशील रहती है। तत्पश्चात् क्रमशः नीचे से ऊपर की ओर बढ़ते हुए हृदय कमल स्थित सुषुम्ना नाड़ी से प्राण तत्त्व का संचार करते हुए तथा अन्य ७२ हजार नाड़ियों का छेदन करते हुए उस परब्रह्म स्थान तक पहुँचा जा सकता है, जहाँ पहुँचने पर जीव (हंस) समस्त बन्धनों को काट डालने में समर्थ हो जाता है। उस समय वह अपने समस्त कर्म बन्धनों को जलाकर परम तत्त्व में उसी प्रकार लय को प्राप्त हो जाता है, जिस प्रकार दीपक निर्वाण (बुझने) के समय तेल-बाती सभी को जलाकर परम ज्योति में विलीन हो जाता है। इस प्रकार वह (जीव) पुनः कर्म बन्धन में नहीं बँधता- जीवन मुक्त हो जाता है। यही इस उपनिषद् का सार है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ सह नाववतु.....................इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अवधूतोपनिषद्) क्षुरिकां संप्रवक्ष्यामि धारणां योगसिद्धये। यां प्राप्य न पुनर्जन्म योगयुक्तस्य जायते ॥१॥ योग की सिद्धि हेतु मैं धारणा रूपी क्षुरिका के सम्बन्ध में यहाँ वर्णन करता हूँ, जिसे प्राप्त करके योग युक्त हो जाने वाले मनुष्य को पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता अर्थात् वह आवागमन के बन्धन से मुक्त हो जाता है ॥१॥ [ सुझाई गयी धारणा का उपयोग करके मनुष्य बन्धन मुक्त होता है, इसलिए उसे बन्धन काटने वाली छुरी कहा गया है। संसारी व्यक्ति लौकिक कामनाओं के वशीभूत होकर भव-बन्धनों में बँधते हैं। योगी जन अष्टांग योग के अन्तर्गत यम, नियम, आसन, प्राणायाम एवं प्रत्याहार की साधना करते हुए धारणा तक पहुँचते हैं, तो आत्म सत्ता, परमात्म सत्ता और दोनों के बीच आदान-प्रदान, इन तीन में अपने चित्त को बाँध लेते हैं। इस धारणा के प्रभाव से सांसारिक बन्धन छिन्न हो जाते हैं। ] मन्त्र क्र० २ से ५ तक निर्धारित धारणा के पूर्व प्राणायाम का वर्णन है— वेदतत्त्वार्थविहितं यथोक्तं हि स्वयंभुवा। निःशब्दं देशमास्थाय तत्रासनमवस्थितः॥ २॥ कूर्मोऽङ्गानीव संहृत्य मनो हृदि निरुध्य च। मात्राद्वादशयोगेन प्रणवेन शनैः शनैः ॥ ३॥ पूरयेत्सर्वमात्मानं सर्वद्वारं निरुध्य च। उरोमुखकटिग्रीवं किंचिद्धृदयमुन्नतम् ॥ ४॥ प्राणान्संधारयेत्तस्मिन्नासाभ्यन्तरचारिणः। भूत्वा तत्र गतप्राणः शनैरथ समुत्सृजेत् ॥ ५॥
९२ क्षुरिकोपनिषद् जैसा कि स्वयंभू ब्रह्माजी का कथन है और जो भाव वेद के तत्त्वार्थ में सन्निहित है, तदनुसार कोलाहल रहित स्थान में इसके लिए उचित आसन में स्थित होकर जैसे कछुआ अपने अंगों को अपने संकल्प से समेट लेता है, वैसे ही मन और हृदय (के भावों) को निरुद्ध (बिखरने से रोक) करे तथा ॐ कार की बारह मात्राओं के माध्यम से (उतने समय में) धीरे-धीरे प्राण रूप सर्वात्मा को (पूरक द्वारा) अपने अन्दर पूरित करे। इस समय (प्राण के) सभी द्वारों को (बन्धों के माध्यम से) रोक करके छाती, मुख, कमर, गर्दन (को ऊपर की ओर खींचकर सीधा) तथा हृदय को कुछ उन्नत रखे। इस स्थिति में नासिका द्वारा संचरित प्राण को (कुम्भक के द्वारा) सभी स्थानों में धारण करे। जहाँ-तहाँ प्राणों का संचरण हो जाने पर फिर धीरे-धीरे वायु को (रेचक क्रिया द्वारा) बाहर छोड़ दे॥ २-५ ॥ [ ॐ कार में तीन मात्राएँ होती हैं। १२ मात्रा का अर्थ हुआ, ४ बार ओंकार के सहज उच्चारण जितना समय लगाकर पूरक करे। उसी अनुसार कुम्भक एवं रेचक की मात्रा निश्चित करे।] स्थिरमात्रादृढं कृत्वा अङ्गुष्ठेन समाहितः। द्वे तु गुल्फे प्रकुर्वीत जङ्घे चैव त्रयस्त्रयः ॥ ६ ॥ द्वे जानुनी तथोरुभ्यां गुदे शिश्ने त्रयस्त्रयः। वायोरायतनं चात्र नाभिदेशे समाश्रयेत् ॥ ७ ॥ धारणा युक्त उक्त प्राणायाम का अभ्यास दृढ़ हो जाने पर, पूरी सावधानी के साथ पैर के अंगूठे सहित टखनों में दो-दो बार, (टखनों और घुटनों के बीच के भाग) जंघाओं या पिंडलियों में तीन-तीन बार, घुटनों और ऊरु (जाँघों) में दो-दो बार तथा गुदा एवं जननेन्द्रिय में तीन-तीन बार (प्राणायाम द्वारा) प्राणों के संचार की धारणा करे। इसके बाद नाभि प्रदेश में प्राणों की धारणा करे॥ ६-७॥ कटि प्रदेश से नीचे का भाग, जो मूलाधार एवं स्वाधिष्ठान चक्रों से सम्बद्ध है, उसमें प्राण-प्रवाह की धारणा स्थिर होने के बाद क्रमशः नाभि, हृदय, कण्ठ एवं उससे ऊपर मन-बुद्धि (आज्ञा-सहस्रार आदि) तक प्राण-प्रवाह द्वारा धारणा को दृढ़ करने का संकेत आगे के मंत्रों में किया गया है- तत्र नाडी सुषुम्ना तु नाडीभिर्बहुभिर्वृता। अणुरक्ताश्च पीताश्च कृष्णास्ताम्रविलोहिताः ॥ ८ ॥ वहाँ पर इड़ा, पिङ्गला आदि दस नाड़ियों से आवृत सुषुम्ना नाम की ब्रह्म नाड़ी स्थित है। वहाँ भी अनेक नाड़ियाँ स्थित हैं, जो अति सूक्ष्म, लाल, पीली, काली एवं ताँबे के रंग की हैं॥ ८॥ अतिसूक्ष्मां च तन्वीं च शुक्लां नाडीं समाश्रयेत्। ततः संचारयेत्प्राणानूर्णनाभीव तन्तुना ॥ ९ ॥ वहाँ पर जो नाड़ी अति सूक्ष्म, पतली एवं शुक्ल वर्ण की है, उसका आश्रय प्राप्त करना चाहिए। जिस प्रकार ऊर्णनाभि (मकड़ी) अपनी लार के तन्तुओं द्वारा गतिशील होती है, उसी प्रकार योगी को उस नाड़ी मण्डल में प्राणों को संचरित करना चाहिए॥ ९॥ [मकड़ी अपने ही अंश से सूक्ष्म तन्तु पैदा करती है, फिर उन्हीं तन्तुओं के सहारे से इच्छित दिशाओं में गमन करती है। नाड़ी तन्तु प्राण द्वारा ही सृजित होते हैं और उन्हीं के माध्यम से प्राणशक्ति को काया तन्त्र में गतिशील किया जाता है।] ततो रक्तोत्पलाभासं हृदयायतनं महत्। दहरं पुण्डरीकं तद् वेदान्तेषु निगद्यते ॥ १० ॥ तद्भित्त्वा कण्ठमायाति तां नाडीं पूरयन्यतः। मनसस्तु परं गुह्यं सुतीक्ष्णं बुद्धिनिर्मलम् ॥ ११ ॥
मन्त्र २१ ९३
उस (नाभि) के बाद वेदान्त में जिसे दहर या पुण्डरीक कहा गया है, वह महत् आयतन वाला हृदय क्षेत्र है। वह क्षेत्र रक्त कमल की तरह सदा प्रकाशित रहता है। उस (हृदयक्षेत्र) के बाद नाड़ियों को पूरित करता हुआ (प्राण-प्रवाह) कण्ठ में आता है। उसके बाद मनःक्षेत्र और उससे परे गुह्य, निर्मल और तीक्ष्ण बुद्धि का स्थान है॥ १०-११॥ पादस्योपरि यन्मर्म तद्रूपं नाम चिन्तयेत्। मनोद्वारेण तीक्ष्णेन योगमाश्रित्य नित्यशः ॥१२॥ इन्द्रवज्र इति प्रोक्तं मर्मजङ्घानुकृन्तनम्। तद्ध्यानबलयोगेन धारणाभिर्निकृन्तयेत्॥१३॥ ऊर्वोर्मध्ये तु संस्थाप्य मर्मप्राणविमोचनम्। चतुरभ्यासयोगेन छिन्देदनभिशङ्कितः॥१४॥ इस प्रकार पैरों के ऊपर जो मर्म स्थान हैं, उनके नाम-रूप का चिन्तन करे। नित्य योगाभ्यास का आश्रय लेकर तीक्ष्ण मन के द्वारा जंघाओं से लगा हुआ जो 'इन्द्रवज्र' नामक क्षेत्र है, उसका छेदन करे। वहाँ उरुओं के बीच मर्म स्थलों का विमोचन करने वाले प्राण को ध्यान बल और धारणा के योग से स्थापित करके योगाभ्यास द्वारा मन की तीक्ष्ण धारणा रो, निःशंक होकर (मूलाधार से हृदय पर्यन्त) चारों मर्म स्थलों का छेदन (भेदन) करे॥ १२-१४॥ ततः कण्ठान्तरे योगी समूहं नाडिसंचयम्। एकोत्तरं नाडिशतं तासां मध्ये परा स्थिरा ॥१५॥ सुषुम्ना तु परे लीना विरजा ब्रह्मरूपिणी। इडा तिष्ठति वामेन पिङ्गला दक्षिणेन च ॥१६॥ इसके बाद योगी कण्ठ के अन्दर स्थित नाड़ी समूह में प्राणों को संचरित करे। उस नाड़ी समूह में एक सौ एक नाड़ियाँ हैं। उनके मध्य में पराशक्ति स्थित है। सुषुम्ना नाड़ी परम तत्त्व में लीन रहती है और विरजा नाड़ी ब्रह्ममय है। इड़ा का निवास बायीं ओर है और पिङ्गला दाहिनी ओर स्थित है॥ १५-१६॥ तयोर्मध्ये वरं स्थानं यस्तं वेद स वेदवित्। द्वासप्ततिसहस्राणि प्रति नाडीषु तैतिलम् ॥ १७॥ इन (इड़ा एवं पिङ्गला) दोनों नाड़ियों के मध्य में जो श्रेष्ठ स्थान है, उसे जो जानता है, वह वेद (अर्थात् शाश्वत ज्ञान) को जानने में समर्थ होता है। सभी सूक्ष्म नाड़ियों की संख्या बहत्तर हजार बतायी गयी है, जिन्हें तैतिल कहा गया है॥ १७॥ छिन्द्यते ध्यानयोगेन सुषुम्नैका न छिद्यते। योगनिर्मलधारेण क्षुरेणानलवर्चसा ॥१८॥ छिन्देन्नाडीशतं धीरः प्रभावादिह जन्मनि। जातीपुष्पसमायोगैर्यथा वास्यति वै तिलम्॥१९॥ ध्यान योग के द्वारा समस्त नाड़ियों का छेदन किया जा सकता है; किन्तु एक सुषुम्ना ही ऐसी है, जिसका कि छेदन नहीं किया जाता। धीर पुरुष को इस जन्म में आत्मा के प्रभाव से अग्निवत् तेजोमयी एवं योग रूपी निर्मल धार से युक्त (धारणा रूपी) छुरी से सैकड़ों (सभी) नाड़ियों का छेदन करना चाहिए। इससे नाड़ियाँ उसी तरह से सुवास युक्त हो जाती हैं, जिस तरह जाती (चमेली) के पुष्प से तिल (का तैल) सुवासित हो जाते हैं॥ १८-१९॥ एवं शुभाशुभैर्भावैः सा नाडी तां विभावयेत्। तद्भाविताः प्रपद्यन्ते पुनर्जन्मविवर्जिताः॥२०॥ इस प्रकार योगी को चाहिए कि वह शुभाशुभ भावों से युक्त विभिन्न नाड़ियों को समझे। उनसे परे सुषुम्ना नाड़ी में धारणा स्थिर करने से योगी पुनर्जन्म से रहित होकर शाश्वत परमब्रह्म को प्राप्त कर लेता है॥ २० तपोविजितचित्तस्तु निःशब्दं देशमास्थितः। निःसङ्गस्तत्त्वयोगज्ञो निरपेक्षः शनैः शनैः ॥२१॥ जिस व्यक्ति ने तप के द्वारा अपने चित्त को जीत लिया है, वह व्यक्ति शब्दरहित, एकान्त, निर्जन स्थान में स्थित होकर निःसङ्ग तत्त्व के योग का अभ्यास करे तथा शनैः-शनैः निरपेक्ष हो जाए॥ २१॥
९४ क्षुरिकोपनिषद् पाशं छित्त्वा यथा हंसो निर्विशङ्कः खमुत्क्रमेत्। छिन्नपाशस्तथा जीवः संसारं तरते सदा ॥२२॥ जिस प्रकार बन्धन-जाल को काटकर हंस निःशंक होकर आकाश में गमन कर जाता है, उसी प्रकार योगी मनुष्य इस योग के अभ्यास द्वारा सभी बन्धनों के कट जाने के पश्चात् बन्धन-मुक्त होकर संसार-सागर से सदा के लिए पार हो जाता है॥ २२॥ यथा निर्वाणकाले तु दीपो दग्ध्वा लयं व्रजेत्। तथा सर्वाणि कर्माणि योगी दग्ध्वा लयं व्रजेत्॥ २३॥ जिस प्रकार निर्वाण काल में (बुझने के समय) दीप ज्योति (दीपक की तेल-बाती) सभी को जलाकर स्वयं परम प्रकाश में लीन हो जाती है, वैसे ही योगी मनुष्य अपने सभी कर्मों को योगाग्नि से भस्म करके अविनाशी परमात्म तत्त्व में लीन हो जाता है॥ २३॥ प्राणायामसुतीक्ष्णेन मात्राधारेण योगवित्। वैराग्योपलगृष्टेन छित्त्वा तं तु न बध्यते॥ २४॥ वैराग्य रूपी पत्थर पर ॐकार युक्त प्राणायाम से घिसकर तीक्ष्ण की गयी धारणा रूपी छुरी से संसार के (विषयादि) सूत्रों के काटने वाले योगी को सांसारिक बन्धन बाँध नहीं पाते॥ २४॥ अमृतत्वं समाप्नोति यदा कामात्प्रमुच्यते। सर्वैषणाविनिर्मुक्तश्छित्त्वा तन्तुं न बध्यते छित्त्वा तन्तुं न बध्यते। इत्युपनिषत्॥ २५॥ जब वह (योगी मनुष्य) कामनाओं से छूट जाता है तथा एषणाओं से रहित हो जाता है, तभी (वह) अमृतत्व को प्राप्त कर सकता है और पुनः बन्धनों में नहीं बँधता। क्षुरिकोपनिषद् का यही रहस्य है॥ २५॥ ॐ सह नाववतु ............इति शान्तिः॥ ॥ इति क्षुरिकोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ जाबालदर्शनापानषद् ॥ यह उपनिषद् सामवेदीय है। इसे 'दर्शनोपनिषद्' भी कहा जाता है। इसमें कुल दस खण्ड हैं, जिसमें भगवान् विष्णु के अवतार दत्तात्रेय जी और उनके शिष्य सांकृति का 'अष्टांगयोग' के विषय में विस्तृत प्रश्नोत्तर रूप में वर्णन हुआ है। प्रथम खण्ड में योग के आठ अंगों तथा दस यमों का उल्लेख हुआ है। द्वितीय खण्ड में दस नियमों का वर्णन है। तृतीय खण्ड में नौ प्रकार के यौगिक आसन बताए गये हैं। चतुर्थ खण्ड में नाड़ियों का परिचय तथा आत्मतीर्थ और आत्मज्ञान की महिमा वर्णित की गई है। पंचम खण्ड में नाड़ी शोधन की प्रक्रिया एवं आत्मशोधन की विधियों का वर्णन है। छठे खण्ड में प्राणायाम की विधि, उसके प्रकार, फल तथा प्रयोग का उल्लेख किया गया है। सातवें में प्रत्याहार के विविध प्रकारों तथा उसके फल का विवरण है। आठवें एवं नवें में धारणा तथा ध्यान का वर्णन है। दोनों के दो-दो प्रकारों का भी उल्लेख किया गया है। अन्तिम दसवें खण्ड में समाधि अवस्था का वर्णन हुआ है। साथ ही उसके फल का भी वर्णन किया गया है। इस प्रकार इस उपनिषद् को पूर्णतया 'योगपरक' कहा जा सकता है। ॐ आप्यायन्तु...................इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-आरुण्युपनिषद् ) ॥ प्रथमः खण्डः ॥ दत्तात्रेयो महायोगी भगवान्भूतभावनः। चतुर्भुजो महाविष्णुर्योगसाम्राज्यदीक्षितः ॥ १ ॥ तस्य शिष्यो मुनिवरः सांकृतिर्नाम भक्तिमान् । पप्रच्छ गुरुमेकान्ते प्राञ्जलिर्विनयान्वितः ॥२ ॥ भगवन्ब्रूहि मे योगं साष्टाङ्गं सप्रपञ्चकम् । येन विज्ञातमात्रेण जीवन्मुक्तो भवाम्यहम् ॥३ ॥ समस्त भूत-प्राणियों के पालक चतुर्भुज भगवान् विष्णु, योगिराज भगवान् दत्तात्रेय के रूप में प्रादुर्भूत हुए। भगवान् दत्तात्रेय जी योग-साम्राज्य (के अधिपति रूप) में दीक्षित हैं। उनके शिष्य मुनिश्रेष्ठ साङ्कृति नाम से प्रख्यात हैं। वे गुरु के परम भक्त हुए। उन्होंने एक दिन एकान्त में अपने गुरुदेव से विनयावनत होकर पूछा-'हे भगवन्! अष्टांगयोग का मेरे लिए सविस्तार वर्णन कीजिए ,जिसे जानकर मैं जीवन्मुक्त हो सकूँ' ॥ सांकृते शृणु वक्ष्यामि योगं साष्टाङ्गदर्शनम्। यमश्च नियमश्चैव तथैवासनमेव च ॥ ४ ॥ प्राणायामस्तथा ब्रह्मन्प्रत्याहारस्ततः परम्। धारणा च तथा ध्यानं समाधिश्चाष्टमं मुने ॥ ५ ॥ अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं दयार्जवम्। क्षमा धृतिर्मिताहारः शौचं चैव यमा दश ॥ ६ ॥ महायोगी दत्तात्रेय जी ने अपने शिष्य से कहा- 'हे साङ्कृते ! मैं अष्टांग योग दर्शन का वर्णन करता हूँ। तुम उसका श्रवण करो। हे ब्रह्मन् ! यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि ही योग के आठ अंग हैं। इनमें यम के दस भेद बताये गये हैं। वे इस प्रकार हैं- १. अहिंसा, २. सत्य, ३. अस्तेय, ४.ब्रह्मचर्य, ५. दया, ६. क्षमा, ७. सरलता, ८. धृति, ९. मिताहार एवं १०. बाह्याभ्यन्तर की पवित्रता॥ ४-६॥ वेदोक्तेन प्रकारेण विना सत्यं तपोधन। कायेन मनसा वाचा हिंसा हिंसा न चान्यथा ॥ ७ ॥ आत्मा सर्वगतोऽच्छेद्यो न ग्राह्य इति या मतिः। सा चाहिंसा वरा प्रोक्ता मुने वेदान्तवेदिभिः ॥ हे तपोधन ! वेद में वर्णित विधि के अतिरिक्त मन, वाणी एवं शरीर के द्वारा यदि किसी को किसी भी तरह से पीड़ित किया जाता है अथवा उससे प्राणों को शरीर से अलग कर दिया जाता है, तो वही वास्तविक हिंसा कही गयी है। इससे भिन्न और कोई हिंसा नहीं है। हे मुने ! यह भाव रखना चाहिए कि आत्म तत्त्व सर्वत्र
९६ जाबालदर्शनोपनिषद् व्याप्त है, शस्त्र आदि के द्वारा वह नष्ट नहीं हो सकता। हाथों या अन्य इन्द्रियों के द्वारा भी आत्मा का ग्रहण होना असम्भव ही है। अतः इस तरह से जो श्रेष्ठ बुद्धि है, उसे ही वेदान्त के मर्मज्ञ विद्वानों ने श्रेष्ठ अहिंसा कहा है॥ चक्षुरादीन्द्रियैर्दृष्टं श्रुतं घ्रातं मुनीश्वर। तस्यैवोक्तिर्भवेत्सत्यं विप्र तन्नान्यथा भवेत् ॥ ९॥ सर्वं सत्यं परं ब्रह्म न चान्यदिति या मतिः। तच्च सत्यं वरं प्रोक्तं वेदान्तज्ञानपारगैः ॥ १० ॥ अन्यदीये तृणे रत्ने काञ्चने मौक्तिकेऽपि च। मनसा विनिवृत्तिर्या तदस्तेयं विदुर्बुधाः ॥११॥ आत्मन्यानात्मभावेन व्यवहारविवर्जितम् । यत्तदस्तेयमित्युक्तमात्मविद्भिर्महामुने ॥ १२॥ हे सांकृते! चक्षु आदि इन्द्रियों के माध्यम से जो जिस रूप में देखा, सुना, सूँघा और समझा हुआ विषय है, उसको उसी रूप में वाक्-इन्द्रिय के द्वारा या फिर संकेत आदि के द्वारा कहना ही 'सत्य' है। इसके अतिरिक्त सत्य का और कोई भी स्वरूप नहीं है। सभी कुछ सत्य रूप परब्रह्म परमात्मा ही है, परमात्मा के अतिरिक्त अन्य और कोई दूसरी वस्तु नहीं है। इस तरह का जो दृढ़ निश्चय है, उसी को वेदान्त ज्ञान के विशेषज्ञों ने सर्वश्रेष्ठ सत्य बताया है। दूसरे (व्यक्ति) के रत्न-आभूषण, सुवर्ण अथवा मणिमुक्तक आदि से लेकर तृण आदि के लिए मन में भी कभी प्राप्त करने की इच्छा न करना, दूसरों की बड़ी अथवा छोटी वस्तु के लिए मन में कभी लोभ-लालच न लाना ही अस्तेय है। विद्वज्जनों ने इसी को ही 'अस्तेय' अर्थात्- चोरी न करना कहा है। हे मुने! इस संसार के समस्त व्यवहारों में अनात्म बुद्धि रखकर आत्मा से दूर रखने का जो भाव है, उसी को आत्मज्ञानी जनों ने अस्तेय कहा है॥ ९-१२॥ कायेन वाचा मनसा स्त्रीणां परिविवर्जनम्। ऋतौ भार्या तदा स्वस्य ब्रह्मचर्यं तदुच्यते ॥१३॥ ब्रह्मभावे मनश्चारं ब्रह्मचर्यं परन्तप ॥ १४॥ स्वात्मवत्सर्वभूतेषु कायेन मनसा गिरा। अनुज्ञा या दया सैव प्रोक्ता वेदान्तवेदिभिः ॥ १५॥ मन, वचन एवं शरीर के द्वारा स्त्रियों के सहवास का त्याग और ऋतुकाल में मात्र अपनी ही पत्नी से सम्बन्ध रखना 'ब्रह्मचर्य' कहा गया है या फिर काम-क्रोधादि रिपुओं को कष्ट पहुँचाने वाले मन को परब्रह्म अविनाशी परमात्म तत्त्व के ध्यान में लगाये रखना सबसे श्रेष्ठ 'ब्रह्मचर्य' है। समस्त भूतप्राणियों को अपनी ही भाँति जानकर उनके प्रति मन, वचन एवं शरीर द्वारा आत्मीयता का अनुभव करना (अर्थात् अपनी ही तरह उनके दुःखों को दूर करने तथा अधिक से अधिक सुख पहुँचाने का प्रयास करना) ही वेदवेत्ता विद्वज्जनों के द्वारा 'दया' बताई गयी है॥ १३-१५॥ पुत्रे मित्रे कलत्रे च रिपौ स्वात्मनि संततम्। एकरूपं मुने यत्तदार्जवं प्रोच्यते मया ॥ १६॥ पुत्र, मित्र, स्त्री, रिपु एवं स्व-आत्मा में भी सदैव मन का समान भाव रखना ही आर्जव (सरलता) है॥ कायेन मनसा वाचा शत्रुभिः परिपीडिते। बुद्धिक्षोभनिवृत्तिर्या क्षमा सा मुनिपुङ्गव ॥ १७॥ हे श्रेष्ठ मुने! रिपुओं के द्वारा मन, वचन एवं शरीर से कष्ट दिये जाने पर भी बुद्धि में थोड़ा भी क्षोभ न आने देना ही 'क्षमा' कहलाता है॥ १७॥ वेदादेव विनिर्मोक्षः संसारस्य न चान्यथा। इति विज्ञाननिष्पत्तिर्धृतिः प्रोक्ता हि वैदिकैः । अहमात्मा न चान्योऽस्मीत्येवमप्रच्युता मतिः ॥ १८ ॥ वेद-ज्ञान से ही सम्पूर्ण जगत् मोक्ष को प्राप्त होता है और अन्य किन्हीं भी कारणों से नहीं। ऐसा जो दृढ़ संकल्प है, उसी को ही वेदज्ञों ने धृति की उपाधि प्रदान की है या फिर 'मैं आत्मा हूँ,' आत्मा से पृथक् दूसरा और कुछ भी नहीं हूँ। इस प्रकार से कभी भी विचलित न होने वाली बुद्धि ही श्रेष्ठ-उत्तम 'धृति' है ॥१८॥
खण्ड २ मन्त्र ४ ९७ अल्पमृष्टाशनाभ्यां च चतुर्थांशावशेषकम्। तस्माद्योगानुगुण्येन भोजनं मितभोजनम् ॥ १९ ॥ अल्प मात्रा में शुद्ध-सात्त्विक भोजन ग्रहण करना,पेट के दो भाग भोजन से,तृतीय भाग को जल से तथा चौथे भाग को वायु केलिए खाली छोड़ना ही योगमार्ग के अनुकूल भोजन है,वही मिताहार कहलाता है ॥ १९ ॥ स्वदेहमलनिर्मोक्षो मृज्जलाभ्यां महामुने। यत्तच्छौचं भवेद्बाह्यं मानसं मननं विदुः। अहं शुद्ध इति ज्ञानं शौचमाहुर्मनीषिणः ॥ २० ॥ हे महामुने ! अपने शरीर के मल को मिट्टी एवं जल से परिमार्जित किया जाता है, इस कृत्य को 'बाह्य शौच' कहते हैं और मन के माध्यम से श्रेष्ठ, पवित्र भावों का जो चिन्तन-मनन किया जाता है, उसे 'मानसिक शौच' कहा गया है। इसके अतिरिक्त विद्वज्जन 'मैं विशुद्ध आत्मा हूँ,' इस श्रेष्ठ ज्ञान को ही शौच कहते हैं ॥ २० अत्यन्तमलिनो देहो देही चात्यन्तनिर्मलः। उभयोरन्तरं ज्ञात्वा कस्य शौचं विधीयते ॥ २१ ॥ यह शरीर अन्तः एवं बाह्य दोनों ओर से ही अत्यन्त मलिन है और शरीर को धारण करने वाला आत्मा अत्यन्त पवित्र, मलरहित है। इस प्रकार देह एवं आत्मा के अन्तर का ज्ञान प्राप्त हो जाने पर फिर किसको पवित्रतम बनाया जाये ॥ २१ ॥ ज्ञानशौचं परित्यज्य बाह्ये यो रमते नरः। स मूढः काञ्चनं त्यक्त्वा लोष्टं गृह्णाति सुव्रत ॥ २२ ॥ ज्ञानामृतेन तृप्तस्य कृतकृत्यस्य योगिनः। न चास्ति किंचित्कर्तव्यमस्ति चेन्न स तत्त्ववित् ॥२३ ॥ हे श्रेष्ठव्रती मुने ! ज्ञानरूप पवित्रता को भुलाकर जो साधक केवल बाहरी पवित्रता में ही रमा रहता है, वह सुवर्ण का त्याग करके मिट्टी के ढेलों का संग्रह करने वाले मूर्ख की ही भाँति है। जो योगी ज्ञानरूप अमृत से तृप्त एवं कृतार्थ हो जाता है, उसके लिए इस जगत् में कोई भी कर्तव्य शेष नहीं रहता है और यदि रह जाता है, तो वह तत्त्ववेत्ता नहीं है ॥ २२-२३ ॥ लोकत्रयेऽपि कर्तव्यं किंचिन्नास्त्यात्मवेदिनाम् ॥ २४॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मुनेऽहिंसादि साधनैः। आत्मानमक्षरं ब्रह्म विद्धि ज्ञानात्तु वेदनात् ॥ २५ ॥ आत्मज्ञानी महान् आत्माओं के लिए तीनों लोकों में भी कहीं कोई कर्तव्य नहीं है। अतः हे मुनीश्वर ! तुम सभी तरह से प्रयत्न करके अहिंसा आदि साधनों के माध्यम से अनुभवयुक्त ज्ञान को प्राप्त करके आत्मा को अविनाशी ब्रह्म के रूप में जानो ॥ २४-२५ ॥ ॥ द्वितीयः खण्डः ॥ तपः संतोषमास्तिक्यं दानमीश्वरपूजनम्। सिद्धान्तश्रवणं चैव ह्रीर्मतिश्च जपो व्रतम् ॥ १ ॥ एते च नियमाः प्रोक्तास्तान्वक्ष्यामि क्रमाच्छृणु ॥ २ ॥ तप, संतोष, आस्तिकता, दान, ईश्वर की पूजा, लज्जा, जप, मति, व्रत एवं सिद्धान्त श्रवण करना-ये दस नियम बताये गये हैं। नीचे क्रमानुसार इनका उल्लेख करता हूँ ॥ १-२ ॥ वेदोक्तेन प्रकारेण कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः। शरीरशोषणं यत्तत्तपं इत्युच्यते बुधैः ॥३॥ वेद में वर्णित कृच्छ्र चान्द्रायण आदि व्रतों के द्वारा शरीर क्षीण करने को ही विद्वज्जन तप कहते हैं ॥ ३ ॥ को वा मोक्षः कथं तेन संसारं प्रतिपन्नवान्। इत्यालोकनमर्थज्ञास्तपः शंसन्ति पण्डिताः ॥४॥
९८ जाबालदर्शनापानिषद् मोक्ष क्या है और आत्मा कैसे तथा किस कारण से संसार-बन्धन को प्राप्त हुआ है, इन सभी बातों के विचार को ही तत्त्वज्ञानी जन 'तप' कहते हैं ॥ ४ ॥ यदृच्छालाभतो नित्यं प्रीतिर्या जायते नृणाम्। तत्संतोषं विदुः प्राज्ञाः परिज्ञानैकतत्पराः ॥५॥ ब्रह्मादिलोकपर्यन्ताद्विरक्त्या यल्लभेतप्रियम्। सर्वत्र विगतस्नेहः संतोषं परमं विदुः। श्रौते स्मार्ते च विश्वासो यत्तदास्तिक्यमुच्यते ॥ ६ ॥ दैव-इच्छा से जो भी कुछ प्राप्त हो जाए, उतने मात्र से ही हृदय में जो प्रसन्नता सदैव बनी रहती है, ज्ञानी जन उसी को 'संतोष' मानते हैं अथवा सर्वत्र अनासक्त रहकर ब्रह्मा आदि देवताओं के लोक तक के सुखों से विरक्त होने के कारण मन में जो प्रसन्नता बनी रहती है, महान् पुरुष उसी को श्रेष्ठ संतोष मानते हैं। वेदों एवं स्मृति-ग्रन्थों में कहे हुए धर्म में दृढ़ आत्मविश्वास होने को ही 'आस्तिकता' कहते हैं ॥ ५-६॥ न्यायार्जितधनं श्रान्ते श्रद्धया वैदिके जने। अन्यद्वा यत्प्रदीयन्ते तद्दानं प्रोच्यते मया ॥ ७॥ न्यायोपार्जित जो धन संकटग्रस्त, क्लेश आदि से पीड़ित वेदज्ञ पुरुषों अथवा श्रेष्ठ आचरण वालों को श्रद्धापूर्वक दिया जाता है, उसी धन को मैं 'दान' की श्रेणी में मानता हूँ ॥ ७ ॥ रागाद्यपेतं हृदयं वाग्दुष्टानृतादिना। हिंसादिरहितं कर्म यत्तदीश्वरपूजनम् ॥८॥ राग आदि विकारों से मुक्त हृदय, असत्य भाषण आदि दोषों से परे वाणी एवं हिंसा आदि दोषों से मुक्त (श्रेष्ठ भगवत्-प्रीत्यर्थ) कर्म ही 'ईश्वर-पूजन' है ॥ ८ ॥ सत्यं ज्ञानमनन्तं च परानन्दं परं ध्रुवम्। प्रत्यगित्यवगन्तव्यं वेदान्तश्रवणं बुधाः ॥ ९॥ यह सत्य, ज्ञानस्वरूप, अनन्त, सर्वोत्कृष्ट एवं नित्य है। अविचल एवं परमानन्द स्वरूप यही अन्तर्यामी आत्मा है। इस सिद्धान्त को बारम्बार श्रवण कर उसके अनुकूल विश्वास करना ही 'सिद्धान्त-श्रवण' है॥ ९॥ वेदलौकिकमार्गेषु कुत्सितं कर्म यद्भवेत्। तस्मिन्भवति या लज्जा हीः सैवेति प्रकीर्तिता। वैदिकेषु च सर्वेषु श्रद्धा या सा मतिर्भवेत् ॥ १० ॥ वैदिक एवं लौकिक मार्गों में जो निन्दित कार्य कहे गये हैं, उनको करने में जो स्वभावतः संकोच होता है, उसे ही लज्जा के रूप में जाना जाता है। वेदोक्त उपदेशों में पूर्णतः श्रद्धा रखना ही मति है॥ १० ॥ गुरुणा चोपदिष्टोऽपि तत्र संबन्धवर्जितः। वेदोक्तेनैव मार्गेण मन्त्राभ्यासो जपः स्मृतः ॥११॥ गुरुजनों के द्वारा अनुमति मिल जाने पर भी वेद के विरुद्ध मार्ग का अवलम्बन न प्राप्त कर वेदोक्त विधि से मन्त्रों का बारम्बार उच्चारण करना ही 'जप' कहा गया है॥ ११ ॥ कल्पसूत्रे तथा वेदे धर्मशास्त्रे पुराणके। इतिहासे च वृत्तिर्या स जपः प्रोच्यते मया ॥ १२॥ जपस्तु द्विविधः प्रोक्तो वाचिको मानसस्तथा ॥१३॥ वेद, कल्पसूत्र, धर्मशास्त्र, पुराण एवं इतिहास आदि में मन की वृत्तियों को लगाये रखना, मेरे विचार से 'जप' है। जप के दो प्रकार कहे गये हैं, प्रथम वाचिक जप एवं द्वितीय मानसिक जप ॥ १२-१३ वाचिकोपांशुरुच्चैश्च द्विविधः परिकीर्तितः। मानसो मननध्यानभेदाद्वैविध्यमाश्रितः ॥ १४॥ वाचिक जप के दो प्रकार माने गये हैं, प्रथम 'उच्चस्वरयुक्त' और द्वितीय 'उपांशु' (फुसफुसाहट युक्त)। इसी तरह से मानसिक जप भी 'मनन' एवं 'ध्यान' के भेद से दो प्रकार का है॥ १४॥ उच्चैर्जपादुपांशुश्च सहस्त्रगुणमुच्यते । मानसश्च तथोपांशोः सहस्त्रगुणमुच्यते ॥ १५ ॥ उच्चैर्जपश्च सर्वेषां यथोक्तफलदो भवेत्। नीचैः श्रोत्रेण चेन्मन्त्रः श्रुतश्चेत्रिष्फलं भवेत् ॥१६ ॥
॥ तृतीयः खण्डः ॥
खण्ड ३ मन्त्र ८ ९९ 'उच्च' अर्थात् ऊँचे स्वर से किये जाने वाले जप की अपेक्षा 'उपांशु' अर्थात् फुसफुसाकर किया गया जप सहस्रगुना श्रेष्ठ कहा गया है। इसी तरह उपांशु की अपेक्षा मानसिक जप सहस्रगुना अधिक उत्तम कहा गया है। उच्च स्वर से सम्पन्न किया गया जप सभी लोगों को भली-भाँति फल प्रदान करने वाला होता है, किन्तु यदि उस मन्त्र को निम्न स्तर के व्यक्तियों ने श्रवण कर लिया, तो वह व्यर्थ हो जाता है॥ १५-१६॥ ॥ तृतीयः खण्डः ॥ स्वस्तिकं गोमुखं पद्मं वीरसिंहासने तथा। भद्रं मुक्तासनं चैव मयूरासनमेव च ॥१॥ सुखासनसमाख्यं च नवमं मुनिपुङ्गव । जानूर्वोरन्तरे कृत्वा सम्यक् पादतले उभे ॥२॥ समग्रीवशिरःकायः स्वस्तिकं नित्यमभ्यसेत् । सव्ये दक्षिणगुल्फं तु पृष्ठपार्श्वे नियोजयेत् ॥३॥ दक्षिणेऽपि तथा सव्यं गोमुखं तत्प्रचक्षते । अङ्गुष्ठावधि गृह्णीयाद्धस्ताभ्यां व्युत्क्रमेण तु ॥४॥ ऊर्वोरुपरि विप्रेन्द्र कृत्वा पादतलद्वयम् । पद्मासनं भवेत्प्राज्ञ सर्वरोगभयापहम् ॥५॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! आसन नौ प्रकार के कहे गये हैं-स्वस्तिक आसन, गोमुख आसन, पद्मासन, वीरासन, सिंहासन, मुक्तासन, भद्रासन, मयूरासन तथा सुखासन । घुटनों एवं जाँघों के मध्य में अपने दोनों पैरों को भली- भाँति रखकर ग्रीवा, मस्तिष्क एवं शरीर को समान भाव से बनाये रखना ही स्वस्तिक आसन कहा जाता है; इस आसन का प्रतिदिन अभ्यास करने का प्रयास करना चाहिए। दाहिने पैर के टखने को बायीं ओर के पीछे भाग तक तथा बायें पैर के टखने को दाहिनी ओर के पीछे भाग तक ले जाये, इसी को गोमुखासन कहते हैं। हे विप्र ! दोनों पैरों को दोनों जाँघों पर रखकर उनके अँगुठों को दोनों हाथों से पीठ के पृष्ठ भाग से पकड़ ले। इसी को पद्मासन कहा जाता है। यह आसन सभी तरह के रोगों का भय हटाने वाला है॥ १-५॥ दक्षिणेतरपादं तु दक्षिणोरुणि विन्यसेत् । ऋजुकायः समासीनो वीरासनमुदाहृतम् ॥ ६॥ बायें पैर को दाहिनी जाँघ के ऊपर रखे तथा शरीर को सीधा करके बैठे, यही वीरासन है ॥ ६ ॥ गुल्फौ च वृषणस्याधः सीवन्याः पार्श्वयोः क्षिपेत् । दक्षिणं सव्यगुल्फेन दक्षिणेन तथेतरत् ॥ हस्तौ जानौ समास्थाप्य स्वाङ्गुलींश्च प्रसार्य च ! व्यक्तवक्त्रो निरीक्षेत नासाग्रं सुसमाहितः ॥ सिंहासनं भवेदेतत् पूजितं योगिभिःसदा ॥ ६.१-३॥ दोनों टखनों को अण्डकोष के नीचे सीवनी के दोनों पार्श्वों में ले जाकर उन्हें इस तरह से रखे कि बायें टखने से सीवनी का दक्षिण पार्श्व और दक्षिण टखने से सीवनी का बायाँ पार्श्व सटा रहे। तदनन्तर दोनों हाथों को घुटनों पर रखकर अँगुलियों को फैला दे। मुँह खोलकर एकाग्रचित्त हो घ्राणेन्द्रिय के अग्रभाग पर दृष्टि स्थिर रखे यही सिंहासन है ॥ ६-१ से ३॥ गुल्फौ तु वृषणस्याधः सीवन्याः पार्श्वयोः क्षिपेत् । पार्श्वपादौ च पाणिभ्यां दृढं बद्ध्वा सुनिश्चलम्। भद्रासनं भवेदेतद्विषरोगविनाशनम् ॥७॥ दोनों टखनों को अण्डकोष के नीचे सीवनी के दोनों पार्श्वभागों में लगाकर रखे तथा दोनों हाथों से पार्श्वभाग एवं पैरों को दृढ़तापूर्वक बाँध करके एकाग्रतापूर्वक बैठे, इस स्थिति को भद्रासन कहते हैं। यह समस्त विषयुक्त रोगों का शमन करने वाला है॥ ७॥ निपीड्य सीवनीं सूक्ष्मं दक्षिणेतरगुल्फ़तः। वामं याम्येन गुल्फेन मुक्तासनमिदं भवेत् ॥ ८ ॥
१०० जाबालदर्शनोपनिषद् सीवनी की सूक्ष्म रेखा को बायें टखने से दबाकर, दायें टखने से बायें को दबाने पर मुक्तासन होता है ॥ मेढ्रादुपरि निक्षिप्य सव्यं गुल्फं तथोपरि। गुल्फान्तरं च संक्षिप्य मुक्तासनमिदं मुने ॥ ९ ॥ हे मुने ! मेढ़्र (जननेन्द्रिय) के ऊपर बायें टखने को रखे तथा उसके ऊपर दायाँ टखना रखे, यह स्थिति भी मुक्तासन कहलाती है ॥ ९ ॥ कूर्पराग्रे मुनिश्रेष्ठ निक्षिपेन्नाभिपाश्र्वयोः । भूम्यां पाणितलद्वन्द्वं निक्षिप्यैकाग्रमानसः ॥ १० ॥ समुन्नतशिरःपादो दण्डवद्व्योम्नि संस्थितः । मयूरासनमेतत्स्यात्सर्वपापप्रणाशनम् ॥ ११ ॥ हे मुनि श्रेष्ठ ! अपनी दोनों हथेलियों को भूमि पर रखकर कुहनियों के अग्रभाग को नाभि के दोनों पाश्र्वों में लगाये। तत्पश्चात् सिर एवं पैरों को ऊँचा करके आकाश में दण्ड के सदृश स्थित हो जाये। यह मयूर आसन है, जो सभी तरह के पापों को विनष्ट करने वाला है ॥ १०-११ ॥ येन केन प्रकारेण सुखं धैर्यं च जायते । तत्सुखासनमित्युक्तमशक्तस्तत्समा Obligatory line: येन केन प्रकारेण सुखं धैर्यं च जायते। तत्सुखासनमित्युक्तमशक्तस्तत्समा Obligatory line: येन केन प्रकारेण सुखं धैर्यं च जायते। तत्सुखासनमित्युक्तमशक्तस्तत्समा Obligatory line: येन केन प्रकारेण सुखं धैर्यं च जायते। तत्सुखासनमित्युक्तमशक्तस्तत्समा Obligatory line: येन केन प्रकारेण सुखं धैर्यं च जायते। तत्सुखासनमित्युक्तमशक्तस्तत्समाश्रयेत् ॥ १२ ॥ जिस किसी भी तरह से बैठने में सुख एवं धैर्य बना रहे, वह आसन ही सुखासन है। अशक्त साधकों को इसी सुखासन का ही आश्रय लेना चाहिए ॥ १२ ॥ आसनं विजितं येन जितं तेन जगत्त्रयम्। अनेन विधिना युक्तः प्राणायामं सदा कुरु ॥ १३ ॥ जिसने इन आसनों को जीत लिया, उसने सम्पूर्ण त्रिलोकी को अपने वश में कर लिया। अतः हे सांकृते ! इसी विधि से (योग) युक्त होकर तुम सदा ही प्राणायाम किया करो ॥ १३ ॥
॥ चतुर्थः खण्डः ॥ इस खण्ड में नाड़ी-परिचय, आत्मतीर्थ तथा आत्मज्ञान की महिमा का वर्णन है- शरीरं तावदेव स्यात्षण्णवत्यङ्गुलात्मकम्। देहमध्ये शिखिस्थानं तप्तजाम्बूनदप्रभम् ॥ १ ॥ त्रिकोणं मनुजानां तु सत्यमुक्तं हि सांकृते । गुदात्तु द्व्यङ्गुलादूर्ध्वं मेढ्रात्तु द्व्यङ्गुलादधः ॥ २ ॥ देहमध्यं मुनिप्रोक्तमनुजानीहि सांकृते । कन्दस्थानं मुनिश्रेष्ठ मूलाधारान्नवाङ्गुलम् ॥ ३॥ हे सांकृते ! यह मानव शरीर अपने हाथ की माप से ९६ अंगुल का होता है। इस शरीर के मध्य भाग में अग्नि का स्थान निहित है। उसका वर्ण तपाये हुए स्वर्ण के सदृश कहा गया है। उसकी त्रिकोण आकृति है। यह हमने यथार्थ बात ही तुमसे बतायी है। गुदा भाग से दो अंगुल ऊर्ध्व की ओर तथा लिङ्ग से दो अंगुल नीचे की ओर जो स्थान है, उसे ही मनुष्य-देह का मध्य भाग समझना चाहिए। वही मूलाधार है, पर हे मुनिश्रेष्ठ ! इस स्थान से नौ अंगुल ऊर्ध्व में कन्द स्थान है ॥ १-३ ॥ चतुरङ्गुलमायामविस्तारं मुनिपुङ्गव । कुक्कुटाण्डसमाकारं भूषितं तु त्वचादिभिः ॥ ४ ॥ उस कन्द की लम्बाई-चौड़ाई चार-चार अंगुल की है तथा उसकी आकृति मुर्गी के अण्डे की भाँति है। वह ऊपर से चमड़े आदि के द्वारा सुसज्जित है ॥ ४ ॥ तन्मध्ये नाभिरित्युक्तं योगज्ञैर्मुनिपुङ्गव । कन्दमध्यस्थिता नाडी सुषुम्नेति प्रकीर्तिता ॥ ५ ॥ हे मुनि पुङ्गव ! उस कन्द स्थान के मध्य भाग में नाभि केन्द्र है, ऐसा योग विज्ञानियों ने कहा है। कन्द के बीच में जो नाड़ी स्थित है, उसका सुषुम्ना के नाम से उल्लेख किया गया है ॥ ५॥ तिष्ठन्ति परितस्तस्या नाड्यो हि मुनिपुङ्गव । द्विसप्ततिसहस्त्राणि तासां मुख्याश्चतुर्दश ॥ ६ ॥
खण्ड ४ मन्त्र २० १०१ सुषुम्ना पिङ्गला तद्वदिडा चैव सरस्वती। पूषा च वरुणा चैव हस्तिजिह्वा यशस्विनी ॥ ७ ॥ अलम्बुसा कुहूश्चैव विश्वोदरी पयस्विनी। शङ्खिनी चैव गान्धारा इति मुख्याश्चतुर्दश ॥ ८ ॥ उस कन्द के चारों तरफ ७२ हजार नाड़ियों का समूह स्थित है। उनमें सुषुम्ना, पिङ्गला, इड़ा, सरस्वती, वरुणा, पूषा, यशस्विनी, हस्तिजिह्वा, अलम्बुसा, कुहू, विश्वोदरा, पयस्विनी, शंखिनी और गान्धारी- ये चौदह नाड़ियाँ प्रमुख मानी गयी हैं ॥ ६-८ ॥ आसां मुख्यतमास्तिस्रस्तिसृष्वेकोत्तमोत्तमा। ब्रह्मनाडीति सा प्रोक्ता मुने वेदान्तवेदिभिः ॥९ ॥ इन चौदह नाड़ियों में भी प्रथम तीन ही सबसे प्रमुख हैं। इन तीनों में भी एक ही नाड़ी सुषुम्ना सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। शास्त्रज्ञों ने इसे 'ब्रह्मनाड़ी' के नाम से सम्बोधित किया है ॥ ९ ॥ पृष्ठमध्यस्थितेनास्थ्ना वीणादण्डेन सुव्रत। सह मस्तकपर्यन्तं सुषुम्ना सुप्रतिष्ठिता ॥ १० ॥ पीठ के मध्य में जो वीणा दण्ड (मेरुदण्ड) नाम से प्रसिद्ध है, वही हड्डियों का समुच्चय है। इससे होकर सुषुम्ना नाड़ी मस्तिष्क तक पहुँचती है ॥ १० ॥ नाभिकन्दादधः स्थानं कुण्डल्या द्व्यङ्गुलं मुने। अष्टप्रकृतिरूपा सा कुण्डली मुनिसत्तम ॥११ ॥ यथावद्वायुचेष्टां च जलान्नादीनि नित्यशः। परितः कन्दपार्श्वेषु निरुध्यैव सदा स्थिता ॥१२ ॥ हे मुनीश्वर ! नाभि-कन्द से दो अंगुल नीचे कुण्डलिनी स्थित है। इसको अष्टप्रकृति रूपा (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकारयुक्त) कहा गया है। वह वायु-चेष्टा, जल और अन्न आदि का अवरोध करके सदैव नाभिकन्द के पार्श्वों को चारों ओर से आच्छादित करके विद्यमान रहती है ॥ ११-१२ ॥ स्वमुखेन समावेष्ट्य ब्रह्मरन्ध्रमुखं मुने। सुषुम्नाया इडा सव्ये दक्षिणे पिङ्गला स्थिता ॥ १३ ॥ सरस्वती कुहूश्चैव सुषुम्नापार्श्वयोः स्थिते। गान्धारा हस्तिजिह्वा च इडायाः पृष्ठपूर्वयोः ॥ १४ ॥ पूषा यशस्विनी चैव पिङ्गला पृष्ठपूर्वयोः। कुहोश्च हस्तिजिह्वाया मध्ये विश्वोदरी स्थिता ॥१५ ॥ यशस्विन्याः कुहोर्मध्ये वरुणा सुप्रतिष्ठिता। पूषायाश्च सरस्वत्या मध्ये प्रोक्ता यशस्विनी ॥१६ ॥ हे मुने ! यह अपने मुख से ब्रह्मरन्ध्र के मुख को ढक कर रखती है। सुषुम्ना के बायें भाग में इड़ा और दाहिने भाग में पिङ्गला स्थित है। सरस्वती और कुहू सुषुम्ना के दोनों पार्श्वों में स्थित हैं। इड़ा के पृष्ठ भाग में गान्धारी तथा पूर्व भाग में हस्तिजिह्वा प्रतिष्ठित है। पिङ्गला के पृष्ठ भाग में पूषा और पूर्व भाग में यशस्विनी स्थित है। कुहू और हस्तिजिह्वा के मध्य विश्वोदरी नाड़ी विद्यमान है। यशस्विनी और कुहू के मध्य भाग में वरुणा नाड़ी स्थित है। पयस्विनी नाड़ी की स्थिति पूषा और सरस्वती के बीच में कही गई है ॥ १३-१६ ॥ गान्धारायाःसरस्वत्या मध्ये प्रोक्ता च शङ्खिनी। अलम्बुसा स्थिता पायुपर्यन्तं कन्दमध्यगा ॥१७ पूर्वभागे सुषुम्नाया राकायाः संस्थिता कुहूः। अधश्चोर्ध्वं स्थिता नाडी याम्यनासान्तमिष्यते ॥ इडा तु सव्यनासान्तं संस्थिता मुनिपुङ्गव। यशस्विनी च वामस्य पादाङ्गुष्ठान्तमिष्यते ॥ १९ ॥ पूषा वामाक्षिपर्यन्ता पिङ्गलायास्तु पृष्ठतः। पयस्विनी च याम्यस्य कर्णान्तं प्रोच्यते बुधैः ॥२० ॥ शङ्खिनी का स्थान गान्धारी और सरस्वती के बीच में है। अलम्बुसा नाभिकन्द के मध्य भाग से होती हुई गुदा तक व्याप्त है। सुषुम्ना का द्वितीय नाम राका है, उसके पूर्वी क्षेत्र में कुहू नाम की नाड़ी है। यह नाड़ी ऊर्ध्व एवं अधः दोनों ओर प्रतिष्ठित है। इसकी स्थिति दाहिनी नासिका तक कही गयी है। इड़ा नामक नाड़ी बायीं नासिका तक स्थित है। यशस्विनी नाड़ी बायें पैर के अँगूठे तक व्याप्त है। पूषा पिङ्गला के पृष्ठ भाग से होती हुई बायें नेत्र तक पहुँचती है और पयस्विनी विद्वज्जनों द्वारा दाहिने कान तक फैली हुई बताई गयी है ॥
१०२ जाबालदर्शनोपनिषद् सरस्वती तथा चोर्ध्वगता जिह्वा तथा मुने। हस्तिजिह्वा तथा सव्यपादाङ्गुष्ठान्तमिष्यते॥ २१॥ शङ्खिनी नाम या नाडी सव्यकर्णान्तमिष्यते। गान्धारा सव्यनेत्रान्ता प्रोक्ता वेदान्तवेदिभिः॥ सरस्वती नाड़ी ऊपर की ओर जिह्वा तक व्याप्त है। हस्तिजिह्वा नाड़ी बायें पैर के अँगूठे तक फैली है। शङ्खिनी नाम की नाड़ी बायें कान तक स्थित है। वेदज्ञों के द्वारा गान्धारी नाड़ी की स्थिति बायें नेत्र तक व्याप्त बतायी गई है॥ २१-२२॥ विश्वोदराभिधा नाडी कन्दमध्ये व्यवस्थिता। प्राणोऽपानस्तथा व्यानः समानोदान एव च ॥२३॥ नागः कूर्मश्च कृकरो देवदत्तो धनंजयः। एते नाडीषु सर्वासु चरन्ति दश वायवः ॥ २४ ॥ तेषु प्राणादयः पञ्च मुख्याः पञ्चसु सुव्रत। प्राणसंज्ञस्तथापानः पूज्यः प्राणस्तयोर्मुने ॥ २५ ॥ विश्वोदरा की स्थिति नाभिकन्द के बीच में कही गयी है। प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान, नाग, कूर्म, कृकर (कृकल), देवदत्त और धनञ्जय-ये दस प्राण वायु बताये गये हैं। ये प्राण समस्त नस-नाड़ियों में संचरित होते हैं। इन दसों में प्राण आदि पाँच वायु ही प्रमुख हैं। हे मुने! इन पाँचों में भी प्राण और अपान को ही सर्वाधिक महत्त्व प्रदान किया गया है॥ २३-२५॥ आस्यनासिकयोर्मध्ये नाभिमध्ये तथा हृदि। प्राणसंज्ञोऽनिलो नित्यं वर्तते मुनिसत्तम ॥ २६ ॥ अपानो वर्तते नित्यं गुदमध्योरुजानुषु। उदरे सकले कट्यां नाभौ जङ्घे च सुव्रत ॥ २७॥ व्यानः श्रोत्राक्षिमध्ये च ककुद्द्वयां गुल्फयोरपि। प्राणस्थाने गले चैव वर्तते मुनिपुङ्गव ॥२८॥ उदानसंज्ञो विज्ञेयः पादयोर्हस्तयोरपि। समानः सर्वदेहेषु व्याप्य तिष्ठत्यसंशयः ॥ २९ ॥ इनमें से प्राण नामक वायु नासिका एवं मुख के बीच में, नाभि के मध्यभाग में और हृदय में हमेशा निवास करता है। अपान वायु गुदा, लिङ्ग, जाँघों, घुटनों, समस्त उदर, कटि, नाभि तथा पिण्डलियों में भी सदा स्थित रहता है। व्यान वायु दोनों कानों, दोनों चक्षुओं, दोनों कन्धों, दोनों टखनों, प्राण के स्थानों और कंठ में भी व्याप्त रहता है। उदान वायु की स्थिति दोनों हाथों एवं पैरों में समझनी चाहिए। समान वायु निःसन्देह समस्त शरीर में फैल कर रहता है॥ २६-२९॥ नागादिवायवः पञ्च त्वगस्थ्यादिषु संस्थिताः। निःश्वासोच्छ्वासकासाश्च प्राणकर्म हि सांकृते ॥ अपानाख्यस्य वायोस्तु विण्मूत्रादिविसर्जनम्। समानः सर्वसामीप्यं करोति मुनिपुङ्गव ॥ ३१ ॥ नाग आदि पाँचों वायु त्वचा एवं अस्थि में निवास करते हैं। हे सांकृते! उच्छ्वास अर्थात् श्वास को अन्दर की ओर खींचना, निःश्वास अर्थात् श्वास को बाहर निकालना तथा खाँसना, ये तीनों कार्य प्राण वायु के द्वारा सम्पन्न होते हैं। मल-मूत्रादि कार्य का परित्याग अपान वायु के द्वारा होता है। हे मुनि पुङ्गव! समान वायु सम्पूर्ण शरीर को सम अवस्था में बनाये रखता है॥ ३०-३१॥ उदान ऊर्ध्वगमनं करोत्येव न संशयः। व्यानो विवादकृत्प्रोक्तो मुने वेदान्तवेदिभिः ॥ ३२ ॥ उद्गारादिगुणः प्रोक्तो नागाख्यस्य महामुने। धनंजयस्य शोभादि कर्म प्रोक्तं हि सांकृते ॥ ३३ ॥ निमीलनादि कूर्मस्य क्षुधा तु कृकरस्य च। देवदत्तस्य विप्रेन्द्र तन्द्रीकर्म प्रकीर्तितम् ॥ ३४ ॥ उदान वायु ही ऊर्ध्व की ओर प्रस्थान करता है। वेदान्त तत्त्व के विशेषज्ञ विद्वज्जनों का मानना है कि व्यान वायु ही ध्वनि का व्यञ्जक है। हे श्रेष्ठ मुने! डकार, वमन आदि का कार्य नाग वायु के द्वारा पूर्ण होता है। इस सम्पूर्ण देह में सौन्दर्य आदि का सम्पादन धनञ्जय वायु का कार्य कहा गया है। आँखों का खोलना एवं
खण्ड ४ मन्त्र ४७ १०३ मूँदना आदि कूर्म नामक वायु की प्रेरणा से सम्पन्न होता है। कृकर (कृकल) नामक वायु के द्वारा भूख-प्यास की इच्छा होती है तथा तन्द्रा-आलस्य देवदत्त वायु का कार्य कहा गया है॥ ३२-३४॥ सुषुम्नायाः शिवो देव इडाया देवता हरिः। पिङ्गलाया विरञ्चिः स्यात्सरस्वत्या विराण्मुने॥ पूषाधिदेवता प्रोक्तो वरुणा वायुदेवता। हस्तिजिह्वाभिधायास्तु वरुणो देवता भवेत्॥३६॥ हे मुनीश्वर ! सुषुम्ना नाड़ी के अधिष्ठाता देव शिव और इड़ा के देवता विष्णु तथा पिङ्गला नाड़ी के देवता भगवान् ब्रह्माजी हैं। सरस्वती नाड़ी के देवता विराट् हैं। पूषा नाड़ी के देवता पूषा नाम से युक्त आदित्य हैं। वरुणा के वायु देवता हैं। हस्तिजिह्वा नाड़ी के देवता वरुण हैं॥ ३५-३६॥ यशस्विन्या मुनिश्रेष्ठ भगवान्भास्करस्तथा। अलम्बुसाया अम्ब्वात्मा वरुणः परिकीर्तितः॥ कुहोः क्षुद्देवता प्रोक्ता गान्धारी चन्द्रदेवता। शङ्खिन्याश्चन्द्रमास्तद्वत्पयस्विन्याः प्रजापतिः ॥३८॥ हे श्रेष्ठ मुने ! भगवान् भास्कर यशस्विनी नाड़ी के देवता हैं। अलम्बुसा नाड़ी के देवता भी जलस्वरूप वरुण कहे गये हैं। कुहू नाड़ी की अधिष्ठात्री क्षुधा देवी हैं। गान्धारी के देवता चन्द्रमा हैं। ऐसे ही शंखिनी नाड़ी के देवता भी चन्द्रमा को कहा गया है। पयस्विनी नामक नाड़ी के देवता प्रजापति हैं॥ ३७-३८॥ विश्वोदराभिधायास्तु भगवान्पावकः पतिः। इडायां चन्द्रमा नित्यं चरत्येव महामुने ॥ ३९॥ पिङ्गलायां रविस्तद्वन्मुने वेदविदां वर। पिङ्गलायामिडायां तु वायोः संक्रमणं तु यत् ॥ ४० ॥ तदुत्तरायणं प्रोक्तं मुने वेदान्तवेदिभिः। इडायां पिङ्गलायां तु प्राणसंक्रमणं मुने ॥ ४१ ॥ दक्षिणायनमित्युक्तं पिङ्गलायामिति श्रुतिः। इडापिङ्गलयोः संधिं यदा प्राणः समागतः ॥४२॥ अमावास्या तदा प्रोक्ता देहे देहभृतां वर। विश्वोदरा नाड़ी के देवता भगवान् अग्निदेव हैं। हे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षे ! चन्द्रमा देवता सदा ही इड़ा नामक नाड़ी में और सूर्य देवता पिङ्गला नाम वाली नाड़ी में संचरित होते हैं। पिङ्गला नाड़ी से इड़ा नाड़ी में जो संवत्सरात्मक प्राणमय सूर्य का संक्रमण होता है, उसे विद्वज्जन महर्षियों ने उत्तरायण की संज्ञा प्रदान की है। इसी भाँति इड़ा से पिङ्गला में जो प्राणमय सूर्य का संक्रमण होता है, उसे दक्षिणायन के नाम से व्यक्त किया है। जब प्राण इड़ा और पिङ्गला की संधि में गमन करता है, तब उस समय हे महर्षे ! इस देह के अन्दर अमावस्या कही गयी है॥ ३९-४२॥ मूलाधारं यदा प्राणः प्रविष्टः पण्डितोत्तम ॥ ४३ ॥ तदाद्यं विषुवं प्रोक्तं तापसैस्तापसोत्तम। प्राणसंज्ञो मुनिश्रेष्ठ मूर्धानं प्राविशद्यदा॥ ४४॥ तदन्यं विषुवं प्रोक्तं तापसैस्तत्त्वचिन्तकैः। निःश्वासोच्छ्वासनं सर्व मासानां संक्रमो भवेत् ॥ ४५ ॥ इडायाः कुण्डलीस्थानं यदा प्राणः समागतः। सोमग्रहणमित्युक्तं तदा तत्त्वविदां वर ॥ ४६ ॥ यदा पिङ्गलया प्राणः कुण्डलीस्थानमागतः। तदा तदा भवेत्सूर्यग्रहणं मुनिपुङ्गव ॥ ४७॥ जब प्राण मूलाधार में प्रविष्ट होता है, तब हे विद्वद्वर ! तपस्वियों ने आद्य विषुव नामक योग का प्राकट्य कहा है। हे श्रेष्ठ मुने ! जब प्राणवायु सहस्रार चक्र में प्रविष्ट होता है, तब उस समय श्रेष्ठ तत्त्व का विचार करते हुए महान् ऋषियों ने अन्तिम विषुव योग की स्थिति कही है। सभी उच्छ्वास एवं निःश्वास मास-संक्रान्ति माने गये हैं। हे तत्त्वज्ञ शिरोमणे ! जब प्राण इड़ा नाड़ी के माध्यम से कुण्डलिनी के पास आ जाता है, तब उस समय को चन्द्रग्रहण-काल कहा जाता है। ठीक ऐसे ही जब प्राण पिङ्गला नाड़ी के माध्यम से कुण्डलिनी के क्षेत्र में आता है, तभी हे मुने ! सूर्य ग्रहण का समय होता है॥ ४३-४७॥
१०४ जाबालदर्शनापानषद श्रीपर्वतं शिरःस्थाने केदारं तु ललाटके। वाराणसीं महाप्राज्ञ भ्रुवोर्घ्राणस्य मध्यमे ॥ ४८ ॥ अपने इस देह में सिर के स्थान पर श्रीशैल नाम से युक्त तीर्थ स्थित है। ललाट में केदार तीर्थ प्रतिष्ठित है। हे महाप्राज्ञ ! नासिका एवं भृकुटी (दोनों भौहों) के बीच में काशीपुरी स्थित है ॥ ४८ ॥ कुरुक्षेत्रं कुचस्थाने प्रयागं हृत्सरोरुहे। चिदम्बरं तु हृन्मध्ये आधारे कमलालयम् ॥ ४९ ॥ स्तन-द्वय मण्डलों में कुरुक्षेत्र का निवास है। कमलरूपी हृदय में तीर्थराज प्रयाग स्थापित है। हृदय के मध्यक्षेत्र में चिदम्बर तीर्थ विद्यमान है। मूलाधार-स्थान में कमलालय तीर्थ की स्थापना की गयी है ॥ ४९ ॥ आत्मतीर्थं समुत्सृज्य बहिस्तीर्थानि यो व्रजेत्। करस्थं स महारत्नं त्यक्त्वा काचं विमार्गते ॥५०॥ जो ऐसे श्रेष्ठ आत्मतीर्थ का त्याग करके बाह्य क्षेत्र के तीर्थों में भ्रमण करता रहता है, वह हाथ में रखे हुए बहुमूल्य रत्न का परित्याग करके काँच को ही ढूँढ़ता रहता है ॥ ५० ॥ भावतीर्थं परं तीर्थं प्रमाणं सर्वकर्मसु। अन्यथालिङ्ग्यते कान्ता अन्यथालिङ्ग्यते सुता ॥ ५१ ॥ तीर्थानि तोयपूर्णानि देवान्काष्ठादिनिर्मितान्। योगिनो न प्रपूज्यन्ते स्वात्मप्रत्ययकारणात् ॥५२॥ भावतीर्थ ही सबसे उत्तम तीर्थ है। पत्नी एवं पुत्री दोनों का ही आलिङ्गन किया जाता है; किन्तु दोनों में भावना का बहुत अधिक अन्तर होता है, पत्नी का आलिङ्गन दूसरे भाव से और पुत्री का आलिङ्गन दूसरे भाव से किया जाता है। योगी मनुष्य अपने आत्मा के तीर्थ में ज्यादा से ज्यादा विश्वास एवं श्रद्धा रखने के कारण जल से पूर्ण तीर्थों एवं काष्ठ आदि से विनिर्मित देव-प्रतिमाओं की शरण नहीं प्राप्त करते ॥ ५१-५२ ॥ बहिस्तीर्थात्परं तीर्थमन्तस्तीर्थं महामुने। आत्मतीर्थं महातीर्थमन्यत्तीर्थं निरर्थकम् ॥ ५३ ॥ बाह्य जगत् के तीर्थ से अन्तः क्षेत्र के तीर्थ अति श्रेष्ठ हैं, ये महातीर्थ हैं, इन आन्तरिक तीर्थों के समक्ष अन्य सभी तीर्थ व्यर्थ हैं ॥ ५३ ॥ चित्तमन्तर्गतं दुष्टं तीर्थस्नानैर्न शुध्यति। शतशोऽपि जलैधौतं सुराभाण्डमिवाशुचि ॥ ५४ ॥ विषुवायनकालेषु ग्रहणे चान्तरे सदा। वाराणस्यादिके स्थाने स्नात्वा शुद्धो भवेन्नरः ॥ ५५ ॥ शरीर के अन्दर निवास करने वाला प्रदूषित चित्त बाहर के तीर्थों में गोते लगाने मात्र से पवित्र नहीं होता; क्योंकि मदिरा से भरा हुआ घड़ा ऊपर से सैकड़ों बार पवित्र जल में धोया जाये, तब भी उस घड़े के अन्दर मदिरा के रहने से वह अपवित्र ही बना रहता है। अपने शरीर में ही जो विषुव योग, उत्तरायण एवं दक्षिणायन काल तथा सूर्य-चन्द्रमा के ग्रहण हैं, उनमें नासिका एवं भौंहों के मध्य में वाराणसी आदि तीर्थों में भावनापूर्वक स्नान करके मनुष्य पवित्र हो सकता है ॥ ५४-५५ ॥ ज्ञानयोगपराणां तु पादप्रक्षालितं जलम्। भावशुद्ध्यर्थमज्ञानां तत्तीर्थं मुनिपुङ्गव ॥ ५६ ॥ अज्ञानियों के अन्तःकरण की शुद्धि के लिए ज्ञानयोगियों के चरणों का जल ही उत्तम तीर्थ रूप है ॥ ५६ तीर्थे दाने जपे यज्ञे काष्ठे पाषाणके सदा। शिवं पश्यति मूढात्मा शिवे देहे प्रतिष्ठिते ॥ ५७ ॥ इसी शरीर में भगवान् शिव के रूप में परमात्मसत्ता विद्यमान है। इन भगवान् शिव को न जानने वाला मूढ़, अज्ञानी मनुष्य तीर्थ, दान, जप, यज्ञ, काष्ठ एवं पत्थर में ही सदैव भगवान् को ढूँढ़ता रहता है ॥ ५७ ॥ अन्तःस्थं मां परित्यज्य बहिष्ठं यस्तु सेवते। हस्तस्थं पिण्डमुत्सृज्य लिहेत्कूर्परमात्मनः ॥ ५८ ॥ हे साङ्कृते! जो अपने अन्तःकरण में नित्य-सतत स्थिर रहने वाले मुझ परमात्मतत्त्व की अवहेलना करके केवल मात्र बाहर की स्थूल प्रतिमाओं का ही सेवन करता है, वह हाथ में रखे हुए अन्न के ग्रास को फेंककर केवल अपनी कोहनी ही चाटता रहता है ॥ ५८ ॥
खण्ड ५ मन्त्र ६ १०५ शिवमात्मनि पश्यन्ति प्रतिमासु न योगिनः । अज्ञानां भावनार्थाय प्रतिमाः परिकल्पिताः ॥५९ योगी मनुष्य अपनी आत्मा में ही भगवान् शिव का दर्शन करते हैं, प्रस्तर खण्ड एवं काष्ठ से विनिर्मित प्रतिमाओं में नहीं। अज्ञानी मनुष्यों के हृदयों में भगवान् शिव के प्रति भावना जाग्रत् करने के लिए ही प्रतिमाओं की कल्पना की गयी है॥५९॥ अपूर्वमपरं ब्रह्म स्वात्मानं सत्यमद्वयम्। प्रज्ञानघनमानन्दं यः पश्यति स पश्यति ॥६०॥ नाडीपुञ्जं सदाऽसारं नरभावं महामुने। समुत्सृज्यात्मनाऽऽत्मानमहमित्येव धारय ॥६१॥ जिससे भिन्न न कोई पूर्व (कारण) है और न ही पर (कार्य) ही है। जो सत्यस्वरूप, अनुपम और प्रज्ञान घनस्वरूप है,ऐसे उस आनन्दमय ब्रह्म को जो स्वयं अपने आत्मा के रूप में दृष्टिपात करता है,वही वास्तव में यथार्थ देखता है। हे महामुने ! यह मानव शरीर नाड़ियों का समुदाय मात्र है,जो सदा ही सारहीन है। इसके प्रति आत्मभाव का परित्याग करके बुद्धि के द्वारा यह निश्चय करो कि मैं स्वयं ही परमात्म स्वरूप हूँ॥ अशरीरं शरीरेषु महान्तं विभुमीश्वरम्। आनन्दमक्षरं साक्षान्मत्वा धीरो न शोचति ॥ ६२ ॥ विभेदजनके ज्ञाने नष्टे ज्ञानबलान्मुने। आत्मनो ब्रह्मणो भेदमसन्तं किं करिष्यति ॥६३॥ जो इस शरीर में रहकर भी इससे सदा ही पृथक् है, महान् है, व्यापक है तथा सभी का ईश्वर है, उस आनन्दस्वरूप शाश्वत परमात्म तत्त्व को जानकर बुद्धिमान् धीर पुरुष कभी भी शोक को नहीं प्राप्त होता। हे श्रेष्ठ मुने! सद्ज्ञान के बल से भेदजनक अज्ञान का विनाश हो जाने पर कौन आत्मा एवं ब्रह्म में मिथ्या भेद की बात कहेगा ॥ ६२-६३ ॥ ॥ पञ्चमःखण्डः ॥ यहाँ आत्मशोधन की विधि कही जा रही है- सम्यक्कथय मे ब्रह्मन्नाडीशुद्धिं समासतः। यथा शुद्ध्यो सदा ध्यायञ्जीवन्मुक्तो भवाम्य-हम् ॥१॥ साङ्कृति ने भगवान् दत्तात्रेय जी से पुनः प्रश्न किया- 'हे ब्रह्मन् ! नाड़ी शोधन की क्या प्रक्रिया है, यह मुझे ठीक तरह से एवं अति संक्षेप में बताइये, जिससे कि मैं नाड़ी शुद्धिपूर्वक सदा ही परमात्मतत्त्व का ध्यान करते हुए इस जीवन से मुक्ति प्राप्त कर सकूँ ॥ १॥' सांकृते शृणु वक्ष्यामि नाडीशुद्धिं समासतः। विध्युक्तकर्मसंयुक्तः कामसंकल्पवर्जितः ॥२॥ तब भगवान् दत्तात्रेय जी ने कहा-हे साङ्कृते ! मैं अति संक्षेप से नाड़ी शुद्धि का वर्णन आपके सम्मुख करता हूँ। शास्त्रादि के विधि वाक्यों द्वारा जो भी कर्म कहे गये हैं, उनके प्रति कर्त्तव्य बुद्धि से संलग्न रहना चाहिए। कामना एवं फलप्राप्ति के संकल्प को त्याग देना चाहिए ॥ २ ॥ यमाद्यष्टाङ्गसंयुक्तः शान्तः सत्यपरायणः। स्वात्मन्यवस्थितः सम्यग्ज्ञानिभिश्च सुशिक्षितः ॥३॥ योग के यम आदि आठों अंगों का उपयोग करते हुए शान्त एवं सत्य परायण रहना चाहिए। अपने आत्मा के ध्यान में सतत लगा रहे तथा ज्ञानी विद्वज्जनों की सेवा में उपस्थित होकर उनसे भली-भाँति शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए ॥ ३ ॥ पर्वताग्रे नदीतीरे बिल्वमूले वनेऽथवा। मनोरमे शुचौ देशे मठं कृत्वा समाहितः ॥ ४॥ आरभ्य चासनं पश्चात्प्राङ्मुखोदङ्मुखोऽपि वा। समग्रग्रीवशिरः कायः संवृतास्यः सुनिश्चलः ॥ नासाग्रे शशभृद्विम्बे बिन्दुमघ्ये तुरीयकम्। स्रवन्तममृतं पश्येन्नेत्राभ्यां सुसमाहितः ॥ ६ ॥
१०६ जाबालदर्शनापानषद तदनन्तर पर्वत शिखर, नदी-तट, बिल्व वृक्ष के पास में, एकान्त वन अथवा और अन्य किसी पवित्र एवं सुन्दर प्रदेश में आश्रम का निर्माण कर चित्त को एकाग्र करके वहाँ निवास करे। तत्पश्चात् वहाँ पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके किसी भी आसन से बैठे। ग्रीवा, मस्तक तथा शरीर को समान भाव से रखकर मुख बंद किये हुए ठीक प्रकार से स्थित हो जाये। नासिका के अग्र भाग पर चन्द्रमण्डल की भावना करनी चाहिए तथा वहाँ ओंकार रूप प्रणव के बिन्दु में तुरीयस्वरूप परमात्मतत्त्व को अमृत का स्रोत बहाते हुए आँखों के द्वारा प्रत्यक्ष देखना चाहिए। उस समय चित्त को पूर्णरूप से एकाग्र रखना चाहिए ॥ ४-६॥ इडया प्राणमाकृष्य पूरयित्वोदरे स्थितम्। ततोऽग्निं देहमध्यस्थं ध्यायञ्ज्वालावलीयुतम् ॥७॥ बिन्दुनादसमायुक्तमग्निबीजं विचिन्तयेत्। पश्चाद्विरेचयेत्सम्यक्प्राणं पिङ्गलया बुधः ॥८॥ पुनः पिङ्गलयापूर्य वह्निबीजमनुस्मरेत् । पुनर्विरेचयेद्धीमानिडयैव शनैः शनैः ॥९॥ त्रिचतुर्वासरं वाथ त्रिचतुर्वारमेव च । षट्कृत्वो विचरेन्नित्यं रहस्येवं त्रिसंधिषु ॥१०॥ इसके पश्चात् इड़ा नाड़ी के द्वारा अर्थात् नासिका के बायें छिद्र से प्राणवायु को आकृष्ट करके अंदर में ग्रहण कर लेना चाहिए और शरीर के बीच में प्रतिष्ठित जो अग्नि तत्त्व है, उसी का चिन्तन करते हुए ऐसा भाव करना चाहिए कि उस वायु का सान्निध्य प्राप्त करके अग्निदेव ज्वालाओं के सहित मानो प्रज्वलित हो उठे हों। इसके पश्चात् प्रणव के बिन्दु एवं नाद से संयुक्त होकर अग्नि-बीज (रं) का चिन्तन करना चाहिए। इसके बाद श्रेष्ठ साधक पिङ्गला नाड़ी (अर्थात् नासिका के दक्षिण छिद्र के द्वारा) प्राणवायु को विधिपूर्वक धीरे-धीरे बहिर्गमन करे। फिर पिङ्गला नाड़ी के माध्यम से पहले की भाँति प्राणवायु को अपने अन्दर धारण करके अग्नि बीज का चिन्तन करना चाहिए। इसके बाद इड़ा नाड़ी के द्वारा फिर उसे शनैः-शनैः बाहर निकाल देना चाहिए। इस तरह से इस प्रक्रिया द्वारा एकान्त में लगातार तीन-चार दिनों तक अथवा प्रतिदिन त्रिकाल समय की संध्याओं में तीन-चार अथवा छः बार यह क्रिया करनी चाहिए ॥ ७-१० ॥ नाडीशुद्धिमवाप्नोति पृथक्चिह्नोपलक्षितः । शरीरलघुता दीप्तिर्वह्नेर्जठरवर्तिनः ॥ ११ ॥ नादाभिव्यक्तिरित्येतच्चिह्नं तत्सिद्धिसूचकम्। यावदेतानि संपश्येत्तावदेवं समाचरेत् ॥ १२ ॥ इस क्रिया से उस (साधक) की नाड़ी पवित्र हो जाती है और इस नाड़ी शुद्धि के पृथक् चिह्न भी दृष्टिगोचर होने लगते हैं। शरीर हल्का हो जाता है, जठराग्नि तीव्र हो उठती है और अनाहत नाद की अभिव्यक्ति होने लगती है। ये लक्षण ही सिद्धि के प्राकट्य का बोध कराते हैं। जब तक ये लक्षण दिखाई न दें, तब तक इसी तरह अभ्यास करते रहना चाहिए ॥ ११-१२ ॥ अथवैतत्परित्यज्य स्वात्मशुद्धिं समाचरेत् । आत्मा शुद्धः सदा नित्यः सुखरूपः स्वयम्प्रभः ॥ अज्ञानान्मलिनो भाति ज्ञानाच्छुद्धो विभात्ययम्। अज्ञानमलपङ्कं यः क्षालयेज्ज्ञानतोयतः । स एव सर्वदा शुद्धो नान्यः कर्मरतो हि सः ॥ १४ ॥ अथवा इन सभी का परित्याग करके मात्र आत्मा की शुद्धि का ही अनुष्ठान करना चाहिए। यह आत्मा सदैव पवित्र, नित्य, सुखरूप एवं स्वप्रकाशित है। अज्ञानता के कारण ही इसमें मलिनता प्रतीत होती है। ज्ञान होने पर यह सदैव विशुद्ध रूप से प्रकाशित होने लगता है, जो मनुष्य अज्ञानरूपी मल एवं कीचड़ को ज्ञानरूपी जल से धो डालता है, वही मनुष्य परम पवित्र है; जो मनुष्य ज्ञान की उपेक्षा करके लौकिक कर्मों में आसक्त रहता है, वह पवित्र नहीं है ॥ १३-१४॥
॥ षष्ठः खण्डः ॥
खण्ड ६ मन्त्र ११ १०७ ॥ षष्ठः खण्डः ॥ यहाँ प्राणायाम की विधि, उसके प्रकार, फल एवं विनियोग का वर्णन है- प्राणायामक्रमं वक्ष्ये सांकृते शृणु सादरम्। प्राणायाम इति प्रोक्तो रेचपूरककुम्भकैः ॥१ ॥ वर्णत्रयात्मकाः प्रोक्ता रेचपूरककुम्भकाः । स एष प्रणवः प्रोक्तः प्राणायामस्तु तन्मयः ॥२ ॥ भगवान् दत्तात्रेय जी ने कहा- 'हे साङ्कृते ! अब मैं तुम्हारे लिए प्राणायाम का क्रमशः वर्णन करता हूँ, इस विधि का श्रद्धापूर्वक श्रवण करो। इन तीनों पूरक, कुम्भक एवं रेचक के द्वारा जो प्राणों का संयम पूर्ण होता है, उसे ही प्राणायाम बतलाया गया है। प्रणव के तीन वर्ण अकार, उकार तथा मकार हैं, उन्हें क्रमशः पूरक, रेचक एवं कुम्भक से समानता रखने वाला कहा गया है। इन तीनों वर्णों के समूह को ही ओंकार बताया गया है। इस कारण से प्राणायाम भी प्रणव रूप ही है'॥ १-२॥ इडया वायुमाकृष्य पूरयित्वोदरे स्थितम्। शनैः षोडशभिर्मात्रैरकारं तत्र संस्मरेत् ॥ ३॥ पूरितं धारयेत्पश्चाच्चतुःषष्ट्या तु मात्रया । उकारमूर्तिमत्रापि संस्मरन्प्रणवं जपेत् ॥ ४ ॥ यावद्वा शक्यते तावद्धारयेज्जपतत्परः। पूरितं रेचयेत्पश्चान्मकारेणानिलं बुधः ॥ ५॥ शनैः पिङ्गलया तत्र द्वात्रिंशन्मात्रया पुनः । प्राणायामो भवेदेवं ततश्चैवं समभ्यसेत् ॥ ६ ॥ इड़ा नाड़ी के माध्यम से वायु को शनैः-शनैः अन्दर की ओर खींचकर के उदर में धारण करे, उस (पूरक) काल में सोलह मात्राओं का प्रयोग करे और श्रेष्ठ अकार का ध्यान करे। तदनन्तर उदर में भरी हुई उस वायु को कुछ समय तक अन्दर धारण किये रहे। उस समय चौंसठ मात्राओं जितना समय लगाकर उकार प्रधान ॐकार का जप करे। जब तक सम्भव हो सके, तब तक जप में मन को एकाग्र करके वायु को आत्मसात् किये रहे। तत्पश्चात् विद्वान् पुरुष बत्तीस मात्राओं का समय लगाकर मकार प्रमुख ॐकार के भाव सहित पिङ्गला नाड़ी के माध्यम से शनैः-शनैः धारण की हुई वायु को बाहर निकाले। इस प्रकार से यह एक प्राणायाम हुआ। इसी भाँति नित्य अभ्यास करते रहना चाहिए॥ ३-६ ॥ पुनः पिङ्गलयापूर्य मात्रैः षोडशभिस्तथा। अकारमूर्तिमत्रापि स्मरेदेकाग्रमानसः ॥ ७॥ धारयेत्पूरितं विद्वान्प्रणवं संजपन्वशी। उकारमूर्तिं स ध्यायंच्श्रुतुःषष्ट्या तु मात्रया ॥८॥ इसके पश्चात् पुनः पिङ्गला नाड़ी के द्वारा वायु को शनैः-शनैः अन्दर खींचते हुए षोडश मात्रा से अकार स्वरूप प्रणव का ध्यान मन को एकाग्र करके करना चाहिए। जब वायु पूरी तरह से उदर में भर जाये, तब विद्वज्जन मन एवं इन्द्रियों को अपने वश में रखते हुए चौंसठ मात्राओं से उकार के ध्यान सहित ॐकार का जप करते हुए वायु को अन्दर धारण किये रहे ॥ ७-८॥ मकारं तु स्मरन्पश्चाद्रेचयेदिडयाऽनिलम्। एवमेव पुनः कुर्यादिडयापूर्य बुद्धिमान् ॥ ९ ॥ एवं समभ्यसेन्नित्यं प्राणायामं मुनीश्वर। एवमभ्यासतो नित्यं षण्मासाद् ज्ञानवान्भवेत् ॥ १० ॥ तत्पश्चात् बत्तीस मात्राओं से 'मकार' का ध्यान करते हुए इड़ा नाड़ी के द्वारा शनैः-शनैः वायु को बाहर निकाल दे। बुद्धिमान् मनुष्य इसी तरह बार-बार अभ्यास करे। हे श्रेष्ठ मुनीश्वर ! इस तरह से प्रत्येक दिन प्राणायाम का अभ्यास निरन्तर करते रहना चाहिए। इस प्रकार से प्रतिदिन अभ्यास करते रहने से साधक मात्र छः मास में ही ज्ञान-सम्पन्न हो जाता है ॥ ९-१०॥ वत्सराद्ब्रह्मविद्वान्स्यात्तस्मान्नित्यं समभ्यसेत् । योगाभ्यासरतो नित्यं स्वधर्मनिरतश्च यः ॥ ११॥
१०८ जाबालदर्शनोपनिषद् प्राणसंयमनेनैव ज्ञानान्मुक्तो भविष्यति। बाह्यादापूरणं वायोरुदरे पूरको हि सः॥१२॥ संपूर्णकुम्भवद्वायोर्धारणं कुम्भको भवेत्। बहिर्विरेचनं वायोरुदराद्रेचकः स्मृतः॥१३॥ एक वर्ष तक लगातार ऊपर कही हुई विधि से प्राणायाम करने से साधक को अविनाशी ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है। अतः प्राणायाम का नित्य ही अभ्यास किया जाना चाहिए। जो पुरुष योग के अभ्यास में संलग्न रहकर सदैव अपने धर्म के पालन में लगा रहता है। वह पुरुष प्राणायाम के द्वारा ही सद्ज्ञान रूपी प्रकाश को प्राप्त करके संसार-सागर से मुक्त हो जाता है। वायु को बाहर से खींचकर उदर के भीतर भरे जाने की प्रक्रिया को पूरक कहा गया है। जल से परिपूर्ण कुम्भ की भाँति वायु को उदर में स्थिर किये रहना ही कुम्भक कहा जाता है और उसे फिर उदर से बाहर निकालने की क्रिया को रेचक कहा जाता है॥११-१३॥ प्रस्वेदजनको यस्तु प्राणायामेषु सोऽधमः। कम्पनं मध्यमं विद्यादुत्थानं चोत्तमंविदुः ॥१४॥ पूर्वं पूर्वं प्रकुर्वीत यावदुत्थानसंभवः। संभवत्युत्तमे प्राज्ञः प्राणायामे सुखी भवेत् ॥१५॥ जिस प्राणायाम के करने से शरीर में पसीना आ जाए, उसे सभी प्राणायामों में निम्न श्रेणी का माना गया है। यदि प्राणायाम करते समय शरीर काँपने लगे, तो उसे मध्यम श्रेणी का प्राणायाम कहा गया है और यदि प्राणायाम के समय में देह ऊर्ध्व की ओर उठता हुआ-सा लगे, तो उसे उत्तम कोटि का माना गया है। जब तक ऊपर की ओर उठने की अनुभूति वाले प्राणायाम की सिद्धि प्राप्त न हो जाए, तब तक पूर्वोक्त विधि से दोनों तरह के प्राणायामों का ही अभ्यास करता रहे। उपर्युक्त उत्तम श्रेणी के प्राणायाम के पूर्ण हो जाने पर ज्ञानी मनुष्य सुखी हो जाता है॥१४-१५॥ प्राणायामेन चित्तं तु शुद्धं भवति सुव्रत। चित्ते शुद्धे शुचिः साक्षात्प्रत्यग्ज्योति व्यवस्थितः॥ प्राणाश्रितेन संयुक्तः परमात्मनि तिष्ठति। प्राणायामपरस्यास्य पुरुषस्य महात्मनः॥ १७॥ देहश्चोत्तिष्ठते तेन किंचिज्ज्ञानाद्विमुक्तता। रेचकं पूरकं मुक्त्वा कुम्भकं नित्यमभ्यसेत् ॥ १८॥ हे सुव्रत ! प्राणायाम के द्वारा चित्त पवित्र हो जाता है एवं उस पवित्र चित्त में अन्तः प्रकाशस्वरूप शुद्ध आत्म तत्त्व का धीरे-धीरे साक्षात्कार होने लगता है। प्राणायाम में सदा रत रहने वाले श्रेष्ठ पुरुष का प्राण चित्त के साथ संयुक्त होकर परमात्मा में स्थित हो जाता है और उसका शरीर क्रमशः धीरे-धीरे ऊपर को उठने लगता है। इस प्राणायाम से ज्ञान को प्राप्त करके वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है। रेचक एवं पूरक से मुक्त होकर विशेषरूप से कुम्भक का ही प्रतिदिन अभ्यास करना चाहिए॥ १६-१८॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः सम्यग्ज्ञानमवाप्नुयात्। मनोजवत्वमाप्नोति पलितादि च नश्यति ॥ १९॥ प्राणायामैकनिष्ठस्य न किंचिदपि दुर्लभम्। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन प्राणायामान्समभ्यसेत् ॥ २०॥ (इस प्रकार से नित्य प्राणायाम करने वाला योगी) सभी तरह के पापों से मुक्त होकर श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त कर लेता है। वह मनुष्य मन के सदृश वेगवान् एवं मनोजयी हो जाता है, बालों का पकना एवं अन्य दोष भी नष्ट हो जाते हैं। प्राणायाम में अटूट निष्ठा रखने वाले मनुष्य के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है। अतः मनुष्य को पूर्ण प्रयत्नशील रहते हुए प्राणायामों का अभ्यास करना चाहिए॥ १९-२०॥ विनियोगान्व्रवक्ष्यामि प्राणायामस्य सुव्रत। संध्ययोर्ब्राह्मकालेऽपि मध्याह्ने वाऽथवासदा ॥२१ बाह्यं प्राणं समाकृष्य पूरयित्वोदरेण च। नासाग्रे नाभिमध्ये च पादाङ्गुष्ठे च धारयेत् ॥ २२॥ हे सुव्रत ! अब हम प्राणायाम के विनियोग (विशेष प्रयोग) तुम्हें बतलाते हैं। दोनों सन्ध्याओं के समय में अथवा ब्राह्ममुहूर्त में या फिर मध्याह्न काल में सतत बाह्य क्षेत्र की प्राण वायु को अन्दर खींचकर उदर में
खण्ड ७ मन्त्र ५ १११ भगन्दरं च नष्टं स्यात्सर्वरोगाश्च सांकृते। पातकानि विनश्यन्ति क्षुद्राणि च महान्ति च ॥ ४५ ॥ नष्टे पापे विशुद्धं स्याच्चित्तदर्पणमद्भुतम्। पुनर्ब्रह्मादिभोगेभ्यो वैराग्यं जायते हृदि ॥ ४६ ॥ हे सांकृते ! (इस प्राणायाम से) भगन्दर एवं अन्य सभी तरह के रोगों का भी शमन हो जाता है। बड़े से बड़े एवं छोटे से छोटे सभी तरह के पातक भी विनष्ट हो जाते हैं। पापों के विनष्ट हो जाने से चित्त परम पवित्र एवं दर्पण की भाँति निर्मल हो जाता है। तदनन्तर हृदय में ब्रह्मा आदि समस्त देवों के लोकों तक में मिलने वाले भोगजनित सुखों के प्रति वैराग्य की उत्पत्ति हो जाती है ॥ ४५-४६ ॥ विरक्तस्य तु संसाराज्ज्ञानं कैवल्यसाधनम्। तेन पाशापहानिः स्याज्ज्ञात्वा देवं सदाशिवम् ॥४७ ज्ञानामृतरसो येन सकृदास्वादितो भवेत्। स सर्वकार्यमुत्सृज्य तत्रैव परिधावति ॥ ४८ ॥ ज्ञानस्वरूपमेवाहुर्जगदेतद्विचक्षणाः। अर्थस्वरूपमज्ञानात्पश्यन्त्यन्ये कुदृष्टयः ॥ ४९ ॥ आत्मस्वरूपविज्ञानादज्ञानस्य परिक्षयः। क्षीणेऽज्ञाने महाप्राज्ञ रागादीनां परिक्षयः ॥ ५० ॥ रागाद्यसंभवे प्राज्ञ पुण्यपापविमर्दनम्। तयोर्नाशे शरीरेण न पुनः संप्रयुज्यते ॥ ५१ ॥ इस भाँति से जो भी मनुष्य इस संसार-सागर से विरक्त होता है, उसे कैवल्य मोक्ष के साधनभूत ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। उस ज्ञान से नित्य कल्याणमय परमात्मदेव का तत्त्व ज्ञात कर लेने के कारण सभी तरह के बन्धनों का समूल विनाश हो जाता है। जिस पुरुष ने एक बार भी ज्ञानरूपी अमृत का रसास्वादन प्राप्त कर लिया, वह समस्त कर्मों का परित्याग करके उसी ओर चल पड़ता है। बुद्धिमान् मनुष्य इस सम्पूर्ण विश्व को ज्ञानस्वरूप ही कहते हैं, जिन मनुष्यों की दृष्टि कुत्सित है, वे दूसरे अज्ञानी मनुष्य इस विश्व को विषय रूप में ही देखते हैं। आत्मस्वरूप का सम्यक् ज्ञान हो जाने पर अज्ञान का नाश हो जाता है। अज्ञान के नष्ट हो जाने पर राग-द्वेष आदि का भी विनाश हो जाता है। राग आदि विषयों के न रहने से पाप-पुण्य का भी विलय हो जाता है और पुण्य-पाप आदि के न रहने से ज्ञानी मनुष्य को पुनः शरीर नहीं धारण करना पड़ता है ॥ ४७-५१ ॥ ॥ सप्तमःखण्डः ॥ यहाँ प्रत्याहार के विविध प्रकार एवं फल का वर्णन किया जा रहा है- अथातः संप्रवक्ष्यामि प्रत्याहारं महामुने। इन्द्रियाणां विचरतां विषयेषु स्वभावतः ॥ १ ॥ बलादाहरणं तेषां प्रत्याहारः स उच्यते। यत्पश्यति तु तत्सर्वं ब्रह्म पश्यन्समाहितः ॥ २ ॥ प्रत्याहारो भवेदेष ब्रह्मविद्भिः पुरोदितः। यद्यच्छुद्धमशुद्धं वा करोत्यामरणाान्तिकम् ॥ ३ ॥ तत्सर्वं ब्रह्मणे कुर्यात्प्रत्याहारः स उच्यते। अथवा नित्यकर्माणि ब्रह्माराधनबुद्धितः॥ ४ ॥ हे महामुने ! अब मैं प्रत्याहार का वर्णन करता हूँ। विषय-भोगों में स्वभाववश विचरण करने वाली समस्त इन्द्रियों को बलात् वहाँ से वापस लाने का जो प्रयत्न है, उसी को प्रत्याहार कहते हैं। 'मनुष्य जो कुछ भी देखता है', वह सब ब्रह्म ही है, इस प्रकार समझते हुए ब्रह्म में चित्त को एकाग्र कर लेना ही प्रत्याहार है, ऐसा ब्रह्मवेत्ता कहते हैं। मनुष्य मृत्यु पर्यन्त जो कुछ भी पवित्र अथवा अपवित्र कार्य करता है, वह सभी कुछ परमात्मा को ही समर्पित कर देना चाहिए, यह भी प्रत्याहार कहा गया है अथवा नित्य एवं काम्य सभी तरह के कर्मों को भगवान् की सेवा-प्रार्थना के भाव से करना चाहिए ॥१-४॥ काम्यानि च तथा कुर्यात्प्रत्याहारः स उच्यते। अथवा वायुमाकृष्य स्थानात्स्थानं निरोधयेत् ॥
११२ जाबालदर्शनोपनिषद् दन्तमूलात्तथा कण्ठे कण्ठादुरसि मारुतम्। उरोदेशात्समाकृष्य नाभिदेशे निरोधयेत् ॥ ६ ॥ नाभिदेशात्समाकृष्य कुण्डल्यां तु निरोधयेत्। कुण्डलीदेशतो विद्वान्मूलाधारे निरोधयेत् ॥७॥ अथापानात्कटिद्वन्द्वे तथोर्वौ च सुमध्यमे । तस्माज्जानुद्वये जङ्घे पादाङ्गुष्ठे निरोधयेत् ॥ ८ ॥ प्रत्याहारोऽयमुक्तस्तु प्रत्याहारस्मरैः पुरा। एवमभ्यासयुक्तस्य पुरुषस्य महात्मनः ॥ ९ ॥ सभी काम्य कर्मों के द्वारा भगवान् का पूजन करने को भी प्रत्याहार कहते हैं अथवा वायु को एक जगह से खींचकर दूसरी जगह पर प्रतिष्ठित करे, यथा-दाँत के मूलभाग से वायु को खींचकर के उसे कण्ठ में प्रतिष्ठित करे, कण्ठ से हृदय क्षेत्र में स्थिर करे, हृदय से खींचकर उसे नाभि-प्रदेश में ले जाये, नाभि प्रदेश से कुण्डलिनी में स्थापित करे, कुण्डलिनी क्षेत्र से हटाकर विद्वान् पुरुष उसे मूलाधार में रोके, तत्पश्चात् अपानवायु के स्थान से उस वायु को हटाकर कटि-प्रदेश के दोनों भागों में स्थिर करे और वहाँ से जाँघों के मध्य भाग में ले जाये। जाँघों से दोनों घुटनों में, घुटनों से पिण्डलियों में और पिण्डलियों से पैर के अँगूठे में उस प्राणवायु को स्थापित करे। प्रत्याहार में पारंगत विद्वानों ने प्राचीनकाल से उपर्युक्त इसी क्रिया को ही प्रत्याहार के नाम से बतलाया है॥५-९॥ सर्वपापानि नश्यन्ति भवरोगश्च सुव्रत । नासाभ्यां वायुमाकृष्य निश्चलः स्वस्तिकासनः ॥१०॥ पूरयेदनिलं विद्वानापादतलमस्तकम् । पश्चात्पादद्वये तद्वन्मूलाधारे तथैव च ॥११॥ नाभिकन्दे च हृन्मध्ये कण्ठमूले च तालुके । भ्रुवोर्मध्ये ललाटे च तथा मूर्धनि धारयेत् ॥ १२ ॥ इस भाँति प्रत्याहार की क्रिया में रत बुद्धिमान् पुरुष के सभी पाप एवं जन्म-मृत्युरूप समस्त व्याधियाँ स्वयमेव नष्ट हो जाती हैं। स्वस्तिक-आसन का आश्रय प्राप्त कर ज्ञानी मनुष्य शान्त चित्त से स्थान ग्रहण करे तथा नासिका के दोनों छिद्रों से प्राणवायु को भीतर खींचकर, उसे पैर से लेकर सिर तक के सभी स्थानों में पूरा कर दे। दोनों पैरों में, मूलाधार में, नाभिकेन्द्र में, हृदय के मध्य भाग में, कण्ठ के मूल में, तालु में, भौंहों के बीच में, ललाट में एवं सिर में वायु को प्रतिष्ठित करे, (यह वायु प्रतिष्ठितात्मक प्रत्याहार है) ॥ १०-१२ ॥ देहे स्वात्ममतिं विद्वान्समाकृष्य समाहितः । आत्मनाऽऽत्मनि निर्द्वन्द्वे निर्विकल्पे निरोधयेत् ॥ प्रत्याहारः समाख्यातः साक्षाद्वेदान्तवेदिभिः । एवमभ्यसतस्तस्य न किंचिदपि दुर्लभम् ॥१४॥ ज्ञानी पुरुष चित्त को एकाग्र करके शरीर से आत्म-बुद्धि को अलग कर उसे, खुद ही निर्द्वन्द्व एवं निर्विकल्प स्वरूप में अपने अन्तरात्मा में स्थित करे। वेदान्ततत्त्व के ज्ञाता विद्वानों ने इसी को ही वास्तविक प्रत्याहार कहा है। इस प्रकार प्रत्याहार का अभ्यास करने वाले मनुष्य के लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं है ॥ ॥ अष्टमः खण्डः ॥ यहाँ धारणा के भेद-उपभेद का वर्णन है- अथातः संप्रवक्ष्यामि धारणाः पञ्च सुव्रत । देहमध्यगते व्योम्नि बाह्याऽऽकाशं तु धारयेत् ॥ १ ॥ प्राणे बाह्यानिलं तद्वज्ज्वलने चाग्निमौदरे । तोयं तोयांशके भूमिं भूमिभागे महामुने ॥ २ ॥ हयरावलकाराख्यं मंत्रमुच्चारयेत्क्रमात् । धारणेषा परा प्रोक्ता सर्वपापविशोधिनी ॥ ३ ॥ हे सुव्रत ! अब मैं तुम्हारे लिए पञ्च धारणाओं के सम्बन्ध में बतलाता हूँ। अपने शरीर के अन्दर जो आकाश तत्त्व स्थित है, उसमें बाह्य आकाश की धारणा करनी चाहिए। इसी प्रकार प्राण में बाह्य वायु तत्त्व