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१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

१३३ नारदपरिव्राजकोपनिषद् इन्द्रियों के विषयों में आसक्त हो जाने पर व्यक्ति निःसन्देह दुर्गुणों से लिप्त हो जाता है; परन्तु इन्हीं इन्द्रियों को वह सम्यक् रूप से वश में कर ले, तो (मुक्ति रूप) सिद्धि को प्राप्त करता है। सांसारिक भोगों का निरन्तर उपभोग करने से, उन्हें भोगने की कामना कभी शान्त नहीं होती, वह उसी तरह और बढ़ती जाती है, जैसे अग्नि में घृत डालने पर वह और अधिक प्रज्वलित होती है। जो (साधक) मृदु या कटु वचनों का श्रवण करके, स्वादिष्ट या स्वादरहित भोजन करके, सुन्दर या कुरूप दृश्य देखकर तथा सुगन्धित या दुर्गन्धपूर्ण पदार्थ सूँघ कर न तो हर्षोल्लसित होता है और न ही ग्लानि का अनुभव करता है, उसी को जितेन्द्रिय जानना चाहिए। जिसका मन और वाणी पवित्रता से ओत-प्रोत है, जो सभी प्रकार के दोषों से सर्वथा मुक्त है, वही वेदान्त सुनने का फल प्राप्त करता है। ब्राह्मण को चाहिए कि वह सम्मान को विष तुल्य उद्विग्नकारी तथा अपमान को अमृत तुल्य मानकर सदा उसकी कामना करे॥ ३३-४० ॥ सुखं ह्यवमतः शेते सुखं च प्रतिबुध्यते। सुखं चरति लोकेऽस्मिन्नवमन्ता विनश्यति ॥ ४१॥ अतिवादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कंचन। न चेमं देहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत केनचित् ॥ ४२ ॥ क्रुध्यन्तं न प्रतिक्रुध्येदाक्रुष्टः कुशलं वदेत्। सप्तद्वारावकीर्णां च न वाचमनृतां वदेत् ॥ ४३ ॥ अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निराशिषः। आत्मनैव सहायेन सुखार्थी विचरेदिह ॥ ४४ ॥ इन्द्रियाणां निरोधेन रागद्वेषक्षयेण च। अहिंसया च भूतानाममृतत्वाय कल्पते ॥ ४५ ॥ अस्थिस्थूणं स्नायुबद्धं मांसशोणितलेपितम्। चर्मावबद्धं दुर्गन्धि पूर्णं मूत्रपुरीषयोः ॥ ४६ ॥ जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमातुरम्। रजस्वलमनित्यं च भूतावासमिमं त्यजेत् ॥ ४७ ॥ मांसासृक्पूयविण्मूत्रस्नायुमज्जास्थिसंहतौ। देहे चेत्प्रीतिमान्मूढो भविता नरकेऽपि सः ॥ ४८ ॥ सा कालपुत्रपदवी सा महावीचिवागुरा। सासिपत्रवनश्रेणी या देहेऽहमिति स्थितिः ॥ ४९ ॥ सा त्याज्या सर्वयत्नेन सर्वनाशेऽप्युपस्थिते। स्प्रष्टव्या सा न भव्येन सश्वमांसेव पुल्कसी ॥ ५० ॥ प्रियेषु स्वेषु सुकृतमप्रियेषु च दुष्कृतम्। विसृज्य ध्यानयोगेन ब्रह्माप्येति सनातनम् ॥ ५१ ॥ अनेन विधिना सर्वांस्त्यक्त्वा सङ्गान्शनैः शनैः। सर्वद्वन्द्वैर्विनिर्मुक्तो ब्रह्मण्येवावतिष्ठते ॥ ५२ ॥ एक एव चरेन्नित्यं सिद्ध्यर्थमसहायकः। सिद्धिमेकस्य पश्यन्हि न जहाति न हीयते ॥ ५३ ॥ अपमान प्राप्त करने वाला पुरुष सुखपूर्वक शयन करता, सुखपूर्वक जागता और इस संसार में सुखी होकर विचरता है, परन्तु (किसी का) अपमान करने वाला व्यक्ति अपने आप ही विनष्ट हो जाता है। दूसरों के कठोर वचनों (अतिवादों) को सहन करने का अभ्यास करे, किसी का भी अनादर न करे तथा इस नाशवान् शरीर के लिए किसी से वैर न करे। जो अपने ऊपर क्रोध करे, उसके प्रति क्रोधित न हो, यदि कोई अपशब्द कहे तो उसके प्रति भी मधुर वचन कहे। सप्तद्वारों (दो आँख, दो कान, दो नासिका छिद्र और एक मुख) से सम्बद्ध जिह्वा को कभी अनृत भाषण (झूठ बोलने) के लिए प्रयुक्त न करे। सुख प्राप्ति की इच्छा वाले को चाहिए कि वह आध्यात्मिक विषयों में मन को संलग्न करके, स्थिर भाव से बैठे,किसी से कुछ अपेक्षा न रखे, मन से समस्त कामनाओं को निष्कासित कर दे और अपने आप अपनी सहायता करते हुए इस संसार में एकाकी ही विचरता रहे। इन्द्रियों को नियन्त्रण में रखे, राग-द्वेष को समाप्त कर दे एवं किसी की भी हिंसा न करे। ऐसा करने से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त करता है। यह काया रोगों का आगार है, जिसमें अस्थिरूपी स्तम्भ लगे हैं, जिसमें स्नायुओं का जाल डोरियों के रूप में पूरित है, जिस पर रक्त और मांस का लेपन (प्लास्टर) है तथा जिसे चर्म से मानो मढ़ दिया गया है। यह सदैव मल-मूत्र से पूरित रहता है, जिसमें दुर्गन्ध भरी है। इस (शरीर)

उपदेश ३ मन्त्र ६१ १३४ में जरावस्था और रोगों के कारण निरन्तर संताप और आतुरता रहती है। रज और वीर्य से उत्पन्न होने के कारण यह शरीर रजस्वल (रजोगुण प्रधान अथवा धूलि से भरा-विकारों से भरा) है। यह शरीर अनित्य है अर्थात् किस दिन इसका अवसान हो जायेगा, यह पता नहीं है। पञ्च महाभूत (पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश) सदैव डेरा डाले रहते हैं, अतः इसे त्याग देना चाहिए अर्थात् इसके प्रति मोह को त्याग देना चाहिए। यदि कोई मनुष्य रक्त, रस, मांस, मज्जा, अस्थि, मल-मूत्र और नाड़ियों से निर्मित इस शरीर से प्रेम करता है, तो वह नरक से भी अवश्य प्रेम करेगा। शरीर में स्थित अहम्भाव ही कालसूत्र नामक नरक को ले जाने वाला है, वही कालवीचि नरक में भी ले जाने वाले जाल के रूप में भी बिछा है। वही (अहं) असिपत्र वन नामक नरक की कोटि का है। शरीर में स्थित अहंता कुत्ते का मांस भक्षण करने वाली चण्डालिनी के समान है। सभी प्रकार के उपाय करके इस अहंता को त्याग देना चाहिए। कल्याण कामी पुरुष को चाहिए कि वह सर्वनाश उपस्थित हो जाने पर भी इस अहंता का स्पर्श तक न होने दे। अपने प्रिय जनों में स्थित पुण्य और अप्रियजनों में स्थित दुष्कृत्यों (पाप) के अतिरिक्त स्वयं उनसे किसी प्रकार भी सम्बन्ध न रखे। ऐसा करने वाला साधक ध्यान योग के द्वारा सनातन पुरुष ब्रह्म की प्राप्ति करता है। इस तरह समस्त विषयों से धीरे-धीरे आसक्ति का परित्याग करके संन्यासी समस्त द्वन्द्वों से मुक्त होकर परब्रह्म परमेश्वर में स्थित हो जाता है। सिद्धि के इच्छुक साधक को चाहिए कि वह असहायक बनकर सतत एकाकी ही विचरण करे। संन्यासी किसी की सिद्धि को देखकर अपनी साधना नहीं छोड़ता और वह सिद्धि से वञ्चित भी नहीं होता ॥ ४१-५३ ॥ कपालं वृक्षमूलानि कुचेलान्यसहायता। समता चैव सर्वस्मिन्नेतन्मुक्तस्य लक्षणम् ॥ ५४ ॥ सर्वभूतहितः शान्तस्त्रिदण्डी सकमण्डलुः। एकारामः परिव्रज्य भिक्षार्थं ग्राममाविशेत् ॥ ५५ ॥ एको भिक्षुर्यथोक्तः स्याद्द्वावेव मिथुनं स्मृतम्। त्रयो ग्रामः समाख्यात ऊर्ध्वं तु नगरायते ॥५६॥ नगरं नहि कर्त्तव्यं ग्रामो वा मिथुनं तथा। एतत्रयं प्रकुर्वाणः स्वधर्माच्च्यवते यतिः ॥ ५७ ॥ राजवार्तादि तेषां स्याद्भिक्षावार्ता परस्परम्। स्नेहपैशुन्यमात्सर्यं संनिकर्षान्न संशयः ॥ ५८ ॥ एकाकी निःस्पृहस्तिष्ठेन्न हि केन सहाल्पेत्। दद्यान्नारायणेत्येव प्रतिवाक्यं सदा यतिः ॥ ५९ ॥ एकाकी चिन्तयेद्ब्रह्म मनोवाक्कायकर्मभिः। मृत्युं च नाभिनन्देत जीवितं वा कथंचन ॥ ६० ॥ कालमेव प्रतीक्षेत यावदायुः समाप्यते । नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देत जीवितम्। कालमेव प्रतीक्षेत निर्देशं भृतको यथा ॥ ६१ ॥ जल पीने के लिए कपाल (नारियल अथवा लकड़ी का पात्र), निवास करने के लिए किसी वृक्ष का मूल, धारण करने के लिए जीर्ण-शीर्ण वस्त्र, सदैव अकेले रहने का स्वभाव एवं समस्त जीव-धारियों के प्रति समत्व का भाव ये सभी जीवनमुक्त पुरुष के लक्षण हैं। संन्यासी को समस्त प्राणियों का हितैषी होना चाहिए। उसे शान्तचित्त रहकर सतत त्रिदण्ड और कमण्डलु धारण करके केवल आत्मा में ही रमण करते रहना चाहिए। वह सब कुछ त्यागकर अकेला ही विचरण करे, जब भिक्षा लेना हो तभी ग्राम में प्रवेश करे। शास्त्रों में एकाकी रहने वाले संन्यासी को ही भिक्षु कहा गया है; क्योंकि एक से दो होते ही उसे मिथुन (युगल) माना जाता है। दो से तीन हो, तो ग्राम और इससे अधिक व्यक्तियों का समुदाय एक साथ हो जाय, तब तो नगर ही कहा जायेगा। संन्यासी को अपने पास किसी अन्य को आने का अवसर नहीं देना चाहिए; ताकि मिथुन, ग्राम या नगर की स्थिति न बने। ऐसा करने से वह अपने धर्म से पतित हो जाता है। अनेक व्यक्तियों का एक साथ संयोग होने से उनमें विभिन्न चर्चाएँ प्रारम्भ हो जायेंगी और उनमें राजा, सेठ आदि के विषय में तथा कहाँ-कैसी

१३५ नारदपरिव्राजकोपनिषद् भिक्षा मिलती है, इस पर चर्चा होगी। इसके पश्चात् विभिन्न बातों के फलस्वरूप परस्पर राग-द्वेष, चुगली आदि के भाव उत्पन्न होंगे ही, इसमें कोई संशय नहीं है। इसीलिए शास्त्रों ने संन्यासी को निस्पृह भाव से एकाकी ही रहने का आदेश दिया है। वह किसी के साथ व्यर्थ बातचीत न करे। दूसरों की बात या नमन का उत्तर नारायण कहकर दे। निर्जन स्थान में अकेले रहकर मन, वचन, शरीर और क्रिया द्वारा एकमात्र ब्रह्म का ही ध्यान करता रहे। जीवन अथवा मृत्यु का कभी अभिनन्दन न करे। मृत्युकाल आने तक की प्रतीक्षा करता रहे। संन्यासी जीवन और मृत्यु में से किसी की प्रतीक्षा न करे। साधक को चाहिए कि वह भृतक (वैतनिक कर्मचारी) के द्वारा अपने स्वामी के आदेश की प्रतीक्षा करने की तरह एकमात्र काल की प्रतीक्षा करता रहे ॥ ५४-६१ ॥ अजिह्वः षण्डकः पङ्गुरन्धो बधिर एव च। मुग्धश्च मुच्यते भिक्षुः षड्भिरेतैर्न संशयः ॥ ६२ ॥ इदमिष्टमिदं नेति योऽश्नन्नपि न सज्जति । हितं सत्यं मितं वक्ति तमजिह्वं प्रचक्षते ॥ ६३ ॥ अद्यजातां यथा नारीं तथा षोडशवार्षिकीम्। शतवर्षां च यो दृष्ट्वा निर्विकारः स षण्डकः ॥६४॥ भिक्षार्थमटनं यस्य विण्मूत्रकरणाय च। योजनान्न परं याति सर्वथा पङ्गुरेव सः ॥ ६५ ॥ तिष्ठतो व्रजतो वापि यस्य चक्षुर्न दूरगम्। चतुर्युगां भुवं मुक्त्वा परिव्राट् सोऽन्ध उच्यते ॥ ६६ ॥ हिताहितं मनोरमं वचः शोकावहं तु यत्। श्रुत्वापि न शृणोतीव बधिरः स प्रकीर्तितः ॥ ६७॥ सान्निध्ये विषयाणां यः समर्थो विकलेन्द्रियः। सुप्तवद्वर्तते नित्यं स भिक्षुर्मुग्ध उच्यते ॥ ६८ ॥ नटादिप्रेक्षणं द्यूतं प्रमदासुहृदं तथा। भक्ष्यं भोज्यमुदक्यां च षण्ण पश्येत्कदाचन ॥ ६९ ॥ रागं द्वेषं मदं मायां द्रोहं मोहं परात्मसु। षडेतानि यतिर्नित्यं मनसापि न चिन्तयेत् ॥ ७० ॥ मञ्चकं शुक्लवस्त्रं च स्त्रीकथालौल्यमेव च। दिवा स्वापं च यानं च यतीनां पातनानि षट् ॥७१॥ दूरयात्रां प्रयत्नेन वर्जयेदात्मचिन्तकः । सदोपनिषदं विद्यामभ्यसेन्मुक्तिहैतुकीम् ॥ ७२ ॥ न तीर्थसेवी नित्यं स्यान्नोपवासपरो यतिः। न चाध्ययनशीलः स्यान्न व्याख्यानपरो भवेत् ॥७३ ॥ अपापमशठं वृत्तमजिह्वं नित्यमाचरेत्। इन्द्रियाणि समाहृत्य कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ॥ ७४ ॥ क्षीणेन्द्रियमनोवृत्तिर्निराशीर्निष्परिग्रहः। निर्द्वन्द्वो निर्ममस्कारो निःस्वधाकार एव च ॥ ७५ ॥ निर्ममो निरहंकारो निरपेक्षो निराशिषः। विविक्तदेशसंसक्तो मुच्यते नात्र संशय इति ॥ ७६ ॥ नपुंसक (काम भाव शून्य), अन्धे, लूले, बहरे, मुग्ध (जड़) और अजिह्व के समान रहने वाला भिक्षु उपर्युक्त छः गुणों से सम्पन्न होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। जो स्वाद-अस्वाद को न देखकर भोजन ग्रहण करता है और हितकर, मृदु तथा सत्य बोलता है उसे 'अजिह्व' कहा जाता है। जो पुरुष नवजात कन्या, षोडशी युवती और शतवर्षा वृद्धा को देखकर मन में किसी प्रकार का राग-द्वेष उत्पन्न नहीं होने देता, उसे 'षण्डक' कहते हैं। जो भिक्षु मात्र भिक्षा अथवा मल-मूत्र त्याग के लिए ही भ्रमण करता है तथा एक दिन में एक योजन (चार कोस) से अधिक गमन नहीं करता (शेष समय ध्यानादि करते हुए खड़े होकर व्यतीत करता है) वह पङ्गु ही है। चलते हुए या खड़े होकर जिसकी आँखें चार युग (प्रायः दस हाथ) भूमि की दूरी तक ही देखती हैं, उसे 'अन्ध' कहते हैं। हित अथवा अहित की तथा सुख अथवा दुःख की बात को जो नहीं सुनता (इस प्रकार की बात सुनकर भी उससे प्रभावित होकर कोई ध्यान नहीं देता), वह 'बधिर' (बहरे के समान) है। विषयों की समीपता, शरीर में सामर्थ्य और इन्द्रियों में स्वस्थता होते हुए भी जो भिक्षु सोये हुए के समान उन विषयों की ओर आकृष्ट नहीं होता, उसे 'मुग्ध' (जड़ या भोला-भाला) कहा गया है। भिक्षु (संन्यासी) को चाहिए कि वह

उपदेश ३ मन्त्र ७९ १३६ अपने सम्बन्धियों, नटों के खेल, द्यूतक्रीड़ा, युवती स्त्री, भोज्य पदार्थ तथा रजस्वला स्त्री इन छः की ओर कभी दृष्टिपात न करे। दूसरों के प्रति द्रोह, अपनों के प्रति मोह, मद, माया और राग-द्वेष इन (दोषों) से सदैव अलग रहे तथा मन में भी इनके प्रति कभी विचार तक न आने दे। मञ्च (कुर्सी आदि), श्वेत वस्त्र, स्त्रीचर्चा, इन्द्रियलोलुपता, दिवा-शयन और सवारी पर यात्रा करना-ये छः (दोष) संन्यासी के लिए पातक रूप हैं। .आत्म चिन्तन की कामना वाले संन्यासी के लिए उचित है कि वह दूर की यात्रा न करने का प्रयत्न करता रहे और मोक्ष प्रदायिनी उपनिषद् विद्या का सतत अभ्यास करे। संन्यासी के लिए अधिक तीर्थ सेवन तथा अधिक उपवास उचित नहीं है। अधिक विद्याओं के पठन-पाठन का स्वभाव भी वह न बनाए। सभाओं में व्याख्यान भी न दे और पाप, दुष्टता तथा कुटिलता पूर्ण व्यवहार न करे। जिस प्रकार कछुआ सभी तरफ से अपने अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार संन्यासी भी सभी विषयों की ओर से अपनी इन्द्रियों को समेट ले तथा इन्द्रियों और मन के कार्य-व्यापारों को क्षीण कर दे। कामना और परिग्रह को त्यागकर हर्ष-शोक से विरत हो जाए। वह नमस्कार (देव स्तुति) और स्वधा (श्राद्ध-तर्पण) को भी त्याग दे। वह ममता और अहंकार से शून्य होकर किसी भी वस्तु की अपेक्षा न करे। सदैव एकान्तवास करे। इस प्रकार उपर्युक्त ढंग से जीवनयापन करने से वह संसार के बन्धन से मुक्त हो जाता है॥६२-७६॥ अप्रमत्तः कर्मभक्तिज्ञानसंपन्नः स्वतन्त्रो वैराग्यमेत्य ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थो वा मुख्यवृत्तिका चेद्ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेद्गृहाद्वनी भूत्वा प्रव्रजेद्यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद्गृहाद्वा वनाद्वाऽथ पुनरव्रती वा व्रती वा स्नातको वाऽस्नातको वोत्सन्नाग्निरनग्निको वा यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत्तद्धैके प्राजापत्यामेवेष्टिं कुर्वन्त्यथवा न कुर्यादाग्नेय्यामेव कुर्यादग्निर्हि प्राणः प्राणमेवैतया करोति तस्मात्त्रैधातवीयामेव कुर्यादेतयैव त्रयो धातवो यदुत सत्त्वं रजस्तम इति ॥७७॥ अयं ते योनिर्ऋत्वियो यतो जातो अरोचथाः। तं जानन्नग्न आरोहाथानो वर्धया रयिम् ॥७८॥ इत्यनेन मन्त्रेणाग्निमाजिघ्रेदेष वा अग्नेर्योनिर्यः प्राणः प्राणं गच्छ स्वां योनिं गच्छ स्वाहेत्येवमेवैतदाहवनीयादग्निमाहृत्य पूर्ववदग्निमाजिघ्रेद्यदग्निं न विन्देदप्सु जुहुयादापो वै सर्वा देवताः सर्वाभ्यो देवताभ्यो जुहोमि स्वाहेति हुत्वोद्धृत्य तदुदकं प्राश्रीयात्साज्यं हविरनामयं मोदमिति शिखां यज्ञोपवीतं पितरं पुत्रं कलत्रं कर्म चाध्ययनं मन्त्रान्तरं विसृज्यैव परिव्रजत्यात्म- विन्मोक्षमन्त्रैस्त्रैधातवीयैर्विधेस्तद्ब्रह्म तदुपासितव्यमेवैतदिति ॥७९॥ कोई भी ब्रह्मचारी, गृहस्थ अथवा वानप्रस्थी जो ज्ञान, कर्म, और भक्ति से युक्त है तथा प्रमादरहित होकर आत्मा के अधीन रहता है, उसे यदि वैराग्य उत्पन्न हो जाए, तो वह संन्यास ग्रहण कर सकता है। यदि वैराग्य परिपक्व न हुआ हो, तो क्रमशः ब्रह्मचर्याश्रम की अवधि पूरी करके गृहस्थ में प्रविष्ट हो, तत्पश्चात् वानप्रस्थ आश्रम में जाए और उसकी भी अवधि पूर्ण करके संन्यास ग्रहण करे। यदि वैराग्य तीव्र हो जाए, तो ब्रह्मचर्याश्रम के बाद सीधे ही संन्यास ग्रहण कर ले। गृहस्थाश्रम अथवा वानप्रस्थाश्रम में यदि तीव्र वैराग्य हो जाए, तो उसके बाद भी सीधे ही संन्यास ग्रहण किया जा सकता है। ब्रह्मचारी-अब्रह्मचारी, स्नातक-अस्नातक, अग्निहोत्री-अनग्निहोत्री (अग्निहोत्र का त्याग कर चुकने वाला कोई भी हो), जब उसे तीव्र वैराग्य उत्पन्न हो जाये, तभी गृह-त्याग करके संन्यास ग्रहण कर लेना चाहिए। संन्यास आश्रम में प्रविष्ट होते समय कुछ विद्वान् प्राजापत्य इष्टि सम्पन्न करते हैं, (तीव्र वैराग्य होने पर) उसे भी करना आवश्यक नहीं है अथवा केवल आग्नेयी इष्टि ही सम्पन्न करे। अग्नि ही प्राण है, इस इष्टि से साधक प्राण का ही पोषण करता है अथवा त्रैधातवी (जो

१३७ नारदपरिव्राजकोपनिषद् इन्द्र से सम्बन्धित है) इष्टि ही सम्पन्न करे। सत्त्व, रज और तम ये तीन ही धातुएँ हैं। इस इष्टि द्वारा साधक इन्हीं तीनों का हवन करता है। विधिवत् इष्टि करके 'अयं ते योनिः' इस मंत्र से अग्नि को सूँघे। मन्त्रार्थ इस प्रकार है- 'हे अग्निदेव ! यह समष्टिगत प्राण ही तुम्हारी उत्पत्ति का मूल है। इसी कारण तुम उत्तम कान्ति से सुशोभित हो रहे हो। तुम अपने उत्पादक प्राण को जानकर इसमें विराजो। इस प्रकार हमारे प्राण में प्रतिष्ठित होकर हमारे ज्ञान-धन को समृद्ध करो।' निश्चय ही यह प्राणतत्त्व अग्नि के प्राकट्य का हेतु है। अतः इस कारण मन्त्र में अग्नि एवं प्राण की एकात्मता सिद्ध हुई है। आहवनीय अग्नि में से अग्नि प्राप्त कर उपर्युक्त तरीके से इष्टि करके अग्नि का अवघ्राण करे। यदि किसी कारणवश अग्नि प्राप्त न हो सके, तो जल में ही यजन कृत्य पूर्ण कर लेना चाहिए। अवश्य ही समस्त देवगण जलरूप हैं। समस्त देवों के लिए मैं यजन-कृत्य कर रहा हूँ, यह हवि उन देवों को प्राप्त हो (ऐसा भाव करना चाहिए)। तत्पश्चात् उस जल-राशि में से थोड़ा सा जल लेकर उससे आचमन कर लेना चाहिए। वह घृत मिश्रित जल आरोग्यप्रद एवं मोक्षप्रदाता होता है। तदनन्तर शिखा (चोटी), यज्ञोपवीत, पिता, पुत्र, स्त्री, कर्म, अध्ययन-अध्यापन तथा अन्यान्य विभिन्न तरह के मन्त्रों का परित्याग कर देने वाला ही आत्मवेत्ता मनुष्य परिव्राजक होता है। त्रैधातवीय मोक्ष से सम्बन्धित मन्त्रों से ब्रह्म को जानना चाहिए। जो शाश्वत सत्य एवं ज्ञान आदि श्रेष्ठ लक्षणों से सम्पन्न है, वही परब्रह्म परमेश्वर है, वही उपासना के अनुकूल है। उसी की ही उपासना करनी चाहिए। यह ठीक इसी प्रकार ही है॥ ७७-७९॥ पितामहं पुनः पप्रच्छ नारदः कथमयज्ञोपवीती ब्राह्मण इति। तमाह पितामहः ॥ ८० ॥ सशिखं वपनं कृत्वा बहिःसूत्रं त्यजेद्बुधः । यदक्षरं परं ब्रह्म तत्सूत्रमिति धारयेत् ॥ ८१ ॥ सूचनात्सूत्रमित्याहुः सूत्रं नाम परं पदम् । तत्सूत्रं विदितं येन स विप्रो वेदपारगः ॥ ८२ ॥ येन सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव । तत्सूत्रं धारयेद्योगी योगवित्तत्त्वदर्शनः ॥ ८३ ॥ बहिः सूत्रं त्यजेद्विद्वान्योगमुत्तममास्थितः । ब्रह्मभावमिदं सूत्रं धारयेद्यः सचेतनः । धारणात्तस्य सूत्रस्य नोच्छिष्टो नाशुचिर्भवेत् ॥ ८४ ॥ सूत्रमन्तर्गतं येषां ज्ञानयज्ञोपवीतिनाम् । ते वै सूत्रविदो लोके ते च यज्ञोपवीतिनः ॥ ८५ ॥ ज्ञानशिखा ज्ञाननिष्ठा ज्ञानयज्ञोपवीतिनः । ज्ञानमेव परं तेषां पवित्रं ज्ञानमुच्यते ॥ ८६ ॥ अग्नेरिव शिखा नान्या यस्य ज्ञानमयी शिखा । स शिखीत्युच्यते विद्वानेतरे केशधारिणः ॥८७॥ कर्मण्यधिकृता ये तु वैदिके ब्राह्मणादयः । तैर्विधार्यमिदं सूत्रं क्रियाङ्गं तद्धि वै स्मृतम् ॥ ८८ ॥ शिखा ज्ञानमयी यस्य उपवीतं च तन्मयम् । ब्राह्मण्यं सकलं तस्य इति ब्रह्मविदो विदुरिति ॥८९॥ देवर्षि नारद जी ने पितामह ब्रह्माजी से पुनः प्रश्न किया- 'हे ब्रह्मन् ! मनुष्य यज्ञोपवीत को धारण न किये रहने से ब्राह्मण कैसे हो सकता है? तब पितामह ने उन देवर्षि नारद से कहा-हे नारद ! ज्ञानवान् पुरुषों को शिखा के सहित सिर के सभी केशों का मुण्डन कराके शरीर पर यज्ञोपवीत के रूप में धारण किये हुए बाह्य सूत्र का परित्याग कर देना चाहिए तथा जो अविनाशी शाश्वत परब्रह्म परमेश्वर है, उसी को सभी में व्याप्त सूत्र रूप में जान करके अपने अन्तः में धारण करे। जो सूचना अर्थात् जानकारी का कारण हो, उसे ही सूत्र कहते हैं। इसके कारण से 'सूत्र' परमपद का नाम है। जिस ज्ञानी पुरुष ने उस परमपद रूप सूत्र को जान लिया, वही वेदों का जानने वाला श्रेष्ठ ब्राह्मण है। जिस प्रकार सूत्र (धागे) में मनके (दाने) पिरोये होते हैं, उसी प्रकार जिस अविनाशी परमात्मतत्त्व में यह सम्पूर्ण संसार पिरोया हुआ है, वही सूत्र है। योग-विद्या का जानकार तत्त्वज्ञ योगी उस श्रेष्ठ सूत्र को अपने अन्तः में धारण करे। ज्ञानी मनुष्य श्रेष्ठ योग का आश्रय प्राप्त करके बाह्य सूत्र का त्याग

उपदेश ३ मन्त्र ९० १३८ कर दे; क्योंकि इस ब्रह्मरूप सूत्र के धारण करने से परिव्राजक न तो कभी उच्छिष्ट (जूठा) होता है और न ही कभी अपवित्र होता है। सद्ज्ञान रूप यज्ञोपवीत धारण करने वाले जिन परिव्राजकों के अन्तःकरण में वह ब्रह्मरूप सूत्र प्रतिष्ठित है, वे ही इस जगत् में सूत्र के यथार्थ रूप को जानने वाले तथा यज्ञोपवीत धारण करने वाले हैं। परिव्राजक (संन्यासी) ज्ञानरूपी शिखा को धारण करते हैं, ज्ञान में ही प्रतिष्ठित होते हैं तथा ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत को ही धारण करते हैं। उन परिव्राजकों के लिए ज्ञान ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ होता है। ज्ञान को ही सबसे पवित्र कहा गया है। जिस तरह से अग्नि की शिखा उसके स्वरूप से अलग नहीं होती, उसी तरह जिस श्रेष्ठज्ञानी परिव्राजक ने ज्ञानरूपी शिखा को धारण कर रखा है, वही शिखाधारी कहा जाता है; दूसरे अन्य लोग जो मात्र केश को धारण करते हैं, वे वास्तविक शिखा को धारण करने वाले नहीं होते। जो ब्राह्मण आदि द्विज वैदिक कर्मादि के श्रेष्ठ अधिकारी माने जाते हैं, उन्हीं श्रेष्ठजनों को यह बाह्य सूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वही कर्म का श्रेष्ठ अंग माना गया है। जिन परिव्राजकों के पास ज्ञानरूपी शिखा एवं ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत है, उसी परिव्राजक में पूर्णरूपेण ब्राह्मणत्व विद्यमान है। ब्रह्मज्ञानी जन ऐसा ही मानते हैं ॥ ८०-८९ ॥ तदेतद्विज्ञाय ब्राह्मणः परिव्रज्य परिव्राडेकशाटी मुण्डोऽपरिग्रहः शरीरक्लेशासहिष्णुश्चेदथवा यथाविधिश्चैजातरूपधरो भूत्वा सपुत्रमित्रकलत्राप्तबन्ध्वादीनि स्वाध्यायं सर्वकर्माणि संन्यस्यायं ब्रह्माण्डं च सर्वं कौपीनं दण्डमाच्छादनं च त्यक्त्वा द्वन्द्वसहिष्णुर्न शीतं न चोष्णं न सुखं न दुःखं न निद्रा न मानापमाने च षडूर्विवर्जितो निन्दाहंकारमत्सरगर्वदम्भेर्ष्यासूयेच्छाद्वेषसुखदुःख- कामक्रोधलोभमोहादीन्विसृज्य स्ववपुः शवाकारमिव स्मृत्वा स्वव्यतिरिक्तं सर्वमन्तर्बहिर्मन्य- मानः कस्यापि वन्दनमकृत्वा न नमस्कारो न स्वाहाकारो न स्वधाकारो न निन्दास्तुतिर्यादृच्छिको भवेद्यदृच्छालाभसंतुष्टः सुवर्णादीन्न परिग्रहेन्नावाहनं न विसर्जनं न मन्त्रं नामन्त्रं न ध्यानं नोपासनं न लक्ष्यं नालक्ष्यं न पृथक् नापृथक् न त्वन्यत्र सर्वत्रानिकेतः स्थिरमतिः शून्यागारवृक्षमूलदेवगृह तृणकूटकुलालशालाग्निहोत्रशालाग्निदिगन्तरनदीतटपुलिनभूगृहकन्दरनिर्झरस्थण्डिलेषु वने वा श्वेतकेतुऋभुनिदाघऋषभदुर्वासःसंवर्तकदत्तात्रेय रैवतकवदव्यक्तलिङ्गोऽव्यक्ताचारो बालो- न्मत्तपिशाचवदुन्मत्तोन्मत्तवदाचरंस्त्रिदण्डं शिक्यं पात्रं कमण्डलुं कटिसूत्रं कौपीनं च तत्सर्वं भूःस्वाहेत्यप्सु परित्यज्य ॥ ९० ॥ इस प्रकार से ब्राह्मण उपर्युक्त सभी नियमोपनियम जानकर घर का परित्याग करके संन्यासी हो जाए; मात्र एक ही वस्त्र धारण करे, सिर के बालों का मुण्डन करा ले तथा किसी भी तरह की वस्तुओं, पदार्थों आदि का संग्रह न करे। यदि वह शारीरिक क्लेशों को सहने में सक्षम न हो, तो उसे कौपीन (लँगोटी) धारण कर लेनी चाहिए और यदि शारीरिक क्लेशों-परेशानियों को सहने में समर्थ हो, तो विधिवत् संन्यास धर्म को ग्रहण कर वस्त्र रहित हो, जीवन-यापन करे। (वह) अपने मित्र, पुत्र, स्त्री, श्रेष्ठ गुरुजन एवं बन्धु-बान्धव, भाई आदि को त्यागकर विचरण करे। स्वाध्याय तथा वैदिक कर्मों के अनुष्ठान को छोड़कर सम्पूर्ण विश्व ब्रह्माण्ड के साथ अपना सम्बन्ध परित्याग कर दे। अपने पास कौपीन, दण्ड एवं अंगाच्छादन हेतु वस्त्रादि ही रखे। सभी तरह के द्वन्द्वों को पूर्णरूपेण सहन करते हुए सर्दी-गर्मी आदि पर ध्यान न दे; न कभी सुख को इच्छा करे और न ही कभी दुःख आदि द्वन्द्वों से परेशान हो। निद्रा की भी चिन्ता न करे। मान-अपमान में सदैव सम भाव से रहे। छहों प्रकार को ऊर्मियों से वह कभी भी प्रभावित न हो। निन्दा, मत्सर (डाह), अहंकार, गर्व, दम्भ, ईर्ष्या, दोष- दृष्टि, इच्छा, द्वेष, सुख-दुःख, काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि का परित्याग कर अपने शरीर को मृतवत् मानकर, आत्मा के अलावा दूसरी अन्य किसी भी वस्तु को बाह्य एवं अन्तः से स्वीकार न करते हुए कभी भी किसी के

१३९ नारदपरिव्राजकोपनिषद् समक्ष सिर न झुकाये और न ही यज्ञ एवं श्राद्धादि करे, किसी की निन्दा एवं स्तुति ( अनुनय-विनय ) आदि भी न करे। एकाकी ही स्वच्छन्द सर्वत्र विचरण करता रहे। ईश्वरेच्छा से जो कुछ भी भोजन आदि मिले, उस पर ही सन्तोष रखे। स्वर्णाभूषण आदि रत्नों का कभी भी अपने पास संग्रह न करे। न कभी किसी का आवाहन करे और न ही कभी विसर्जन। मन्त्रादि का न तो प्रयोग करे और न ही उसका त्याग करे। ध्यान एवं उपासनादि भी न करे। न कोई उसका लक्ष्य हो तथा लक्ष्यहीनता भी नहीं होनी चाहिए। न कभी किसी से अलग रहे और न ही कभी किसी के साथ रहे। न कभी किसी एक स्थान पर निवास करने का आग्रह करे और न ही किसी दूसरी जगह जाने का अनुरोध करे। उस ब्राह्मण का अपना निज का कोई आश्रम अथवा घर आदि भी नहीं होना चाहिए। उसकी बुद्धि सदैव स्थिर रहनी चाहिए। परिजनों से रहित भवन, वृक्ष की जड़, मन्दिर, पर्णकुटी, कुलालशाला, अग्निहोत्रशाला, अग्निदिगन्तर ( आग्नेयदिशा), नदी का किनारा, कछार, भूगृह अर्थात् गुफा, पर्वतीय गुफा, झरने के समीप चबूतरे या वेदी या फिर जंगल में निवास करे। ऋभु, श्वेतकेतु, निदाघ, ऋषभ, संवर्तक, दुर्वासा, दत्तात्रेय एवं रैवतक की भाँति न कोई चिह्न स्वीकार करे और न ही अपने आचरण को ही किसी पर प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होने दे। उन्मत्त बालक अथवा पिशाच की तरह से व्यवहार करे। उन्मत्त न होते हुए भी उन्मत्त की तरह से आचरण करे। त्रिदण्ड, पात्र, झोली, कमण्डलु, कटिसूत्र एवं कौपीन आदि सभी कुछ 'भूः स्वाहा' कहकर के जल में विसर्जित कर दे॥ ८९-९०॥ कटिसूत्रं च कौपीनं दण्डं वस्त्रं कमण्डलुं। सर्वमप्सु विसृज्याथ जातरूपधरश्चरेत् ॥ ९१ ॥ आत्मानमन्विच्छेद्यथा जातरूपधरो निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहस्तत्त्वब्रह्ममार्गे सम्यक्सम्पन्नः शुद्धमानसः प्राणसंधारणार्थं यथोक्तकाले करपात्रेणान्येन वा याचिताहारमाहरन् लाभालाभे समो भूत्वा निर्ममः शुक्लध्यानपरायणोऽध्यात्मनिष्ठः शुभाशुभकर्मनिर्मूलनपरः संन्यस्य पूर्णानन्दैकबोधस्त- द्ब्रह्माहमस्मीति ब्रह्मप्रणवमनुस्मरन्भ्रमरकीटन्यायेन शरीरत्रयमुत्सृज्य संन्यासेनैव देहत्यागं करोति स कृतकृत्यो भवतीत्युपनिषत् ॥ ९२ ॥ परिव्राजक कटिसूत्र, कौपीन, दण्ड, वस्त्र एवं कमण्डलु आदि सभी को (नदी या सरोवर के) जल में विसर्जित करके वस्त्र रहित हो सर्वत्र विचरण करे। अपनी ही आत्मा का सतत अनुसंधान करता रहे, दिगम्बर (वस्त्र रहित) होकर द्वन्द्वों (विकारों) को सहन करता रहे। उन द्वन्द्वों से प्रभावित न हो। किसी भी तरह की वस्तुओं का संग्रह कदापि न करे। आत्मतत्त्व एवं परब्रह्म परमात्मा का बोध कराने वाले ज्ञान-मार्ग में दृढ़निश्चय होकर प्रतिष्ठित रहे। अपने मन को सदा पवित्र रखे। (अपने) प्राणों की रक्षा के लिए निश्चित समय पर कर (हाथ) रूपी पात्र से या फिर किसी पात्र से, बिना किसी से याचना किये ही जो कुछ मिल जाए, उसी आहार (भोजन) को स्वीकार करे। हानि-लाभ को समान समझते हुए ममता से विलग हो जाए। मात्र अविनाशी शाश्वत परब्रह्म का ही सतत चिन्तन करे। अध्यात्म के चिन्तन में ही अपनी निष्ठा को सतत नियोजित किया करे। शुभ एवं अशुभ कर्मों का मूल्यांकन करता हुआ सदैव अपने आत्मा के उत्थान के अतिरिक्त सभी प्रिय वस्तुओं-पदार्थों का हमेशा के लिए परित्याग कर दे। एक मात्र आनन्द स्वरूप परब्रह्म परमात्मा के साक्षात्कार से युक्त हो, 'अहं ब्रह्मास्मि' अर्थात् मैं ही ब्रह्म हूँ, इस प्रकार दृढ़निश्चयी हो भ्रमर का ध्यान करने वाले कृमि- कीट की भाँति एक मात्र परब्रह्म स्वरूप ॐकार का ही ध्यान करता रहे। तीनों शरीरों (स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीर) के प्रति अहंकार एवं मोह के भाव का परित्याग करके, सर्वस्व विसर्जित करके ही परिव्राजक अपने शरीर का परित्याग करे। इस तरह से उपर्युक्त बताये हुए नियमों को जो भी संन्यासी अपनाता है, वह कृतार्थ हो जाता है। ईश्वर सान्निध्य को प्राप्त कर लेता है, यह ऐसा ही उपनिषद् है ॥ ९१-९२॥

उपदेश ४ मन्त्र १२ १४० ॥ चतुर्थोपदेशः ॥ [ संन्यास-धर्म के पालन का महत्त्व एवं संन्यास-धर्म को धारण करने की शास्त्रीय विधि ] त्यक्त्वा लोकांश्च वेदांश्च विषयानिन्द्रियाणि च । आत्मन्येव स्थितो यस्तु स याति परमां गतिम् ॥ १ ॥ नामगोत्रादिवरणं देशं कालं श्रुतं कुलम् । वयो वृत्तं शीलं ख्यापयेन्नैव सद्यतिः ॥ २ ॥ न संभाषेत्स्त्रियं कांचि त्पूर्वदृष्टां च न स्मरेत् । कथां च वर्जयेत्तासां न पश्येल्लिखितामपि ॥ ३ ॥ एतच्चतुष्टयं मोहात्स्त्रीणामाचरतो यतेः । चित्तं विक्रियतेऽवश्यं तद्विकारात्प्रणश्यति ॥ ४ ॥ तृष्णा क्रोधोऽनृतं माया लोभमोहौ प्रियाप्रिये । शिल्पं व्याख्यानयोगश्च कामो रागपरिग्रहः ॥ ५ ॥ अहंकारो ममत्वं च चिकित्सा धर्मसाहसम् । प्रायश्चित्तं प्रवासश्च मन्त्रौषधपराशिषः । प्रतिषिद्धानि चैतानि सेवमानो व्रजेदधः ॥ ६ ॥ आगच्छ गच्छ तिष्ठेति स्वागतं सुहृदोऽपि वा । सम्माननं च न ब्रूयान्मुनिर्मोक्षपरायणः ॥ ७ ॥ प्रतिग्रहं न गृह्णीयान्नैव चान्यं प्रदापयेत् । प्रेरयेद्वा तया भिक्षुः स्वप्नेऽपि न कदाचन ॥ ८ ॥ जायाभ्रातृसुतादीनां बन्धूनां च शुभाशुभम् । श्रुत्वा दृष्ट्वा न कम्पेत शोकहर्षौ त्यजेद्यतिः ॥ ९ ॥ अहिंसा सत्यमस्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहाः । अनौद्धत्यमदीनत्वं प्रसादः स्थैर्यमार्जवम् ॥ १० ॥ अस्नेहो गुरुशुश्रूषा श्रद्धा क्षान्तिर्दमः शमः । उपेक्षा धैर्यमाधुर्यं तितिक्षा करुणा तथा ॥ ११ ॥ ह्रीस्तथा ज्ञानविज्ञाने योगो लघ्वशनं धृतिः । एष स्वधर्मा विख्यातो यतीनां नियतात्मनाम् ॥ १२ ॥ जो ज्ञानी मनुष्य लोक, वेद, विषय-वासनाओं के भोग एवं समस्त इन्द्रियों की अधीनता का परित्याग करके एक मात्र अपने आत्मा के उत्थान में सतत स्थिर रहता है, वही परिव्राजक (संन्यासी) श्रेष्ठ गति को प्राप्त करता है। उत्तम परिव्राजक नाम, गोत्र आदि के वरण, देश, काल, शास्त्रीय ज्ञान, कुल, अवस्था, आचार, व्रत- उपवास एवं शील आदि का प्रकाशन (प्रचार-प्रसार) कदापि न करे। (वह) किसी भी स्त्री से वार्त्तालाप कभी न करे। पूर्व में देखी हुई किसी भी परिचित स्त्री का अपने मन में स्मरण तक भी न करे, उन स्त्रियों की चर्चा से सदैव दूर रहे और उनके चित्र आदि को भी कभी न देखे। भाषण-सम्भाषण, स्मरण, चर्चा एवं चित्रों को देखना, स्त्रियों से सम्बन्धित इन चार तरह की बातों का जो (मनुष्य) मोह के वश हुआ आचरण करता है, निश्चय ही उसके चित्त में विकार उत्पन्न हो जाते हैं और उन विकारों से उसका धर्म अवश्य ही नष्ट हो जाता है। संन्यासियों के लिए आसक्ति, क्रोध, झूठ, माया, मोह, लोभ, प्रिय, अप्रिय, शिल्पकला, व्याख्यान करना, कामना, राग, संग्रह, अहंकार, परगृह निवास, चिकित्सा का व्यवसाय, ममता, धर्म के लिए साहसिक कार्य, मन्त्र प्रयोग, औषधि-वितरण, जहर देना, आशीर्वाद देना आदि ये सभी कार्य वर्जित हैं। इनका उपयोग करने वाला परिव्राजक अपने धर्म (लक्ष्य) से पदच्युत हो जाता है। मोक्ष धर्म में सतत संलग्न रहने वाला ज्ञानी संन्यासी अपने किसी हितैषी (शुभचिन्तक) के लिए भी आओ, जाओ, रुको आदि स्वागत एवं सम्मान की बात कभी न करे। स्वप्न में भी कभी किसी के द्वारा दिया हुआ दान स्वीकार न करे। दूसरे अन्य किसी को भी न दिलवाए और न खुद ही किसी को देने-लेने के लिए बाध्य करे। स्त्री-पुरुष आदि भी आत्मीय स्वजनों के शुभ अथवा अशुभ समाचारों को सुनकर-देखकर कभी भी अपने लक्ष्य से विचलित न हो, दुःख-सुख को सदैव के लिए त्याग दे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, इन्द्रिय-निग्रह, अपरिग्रह (आदि का पालन करना), उद्दण्डता के भाव से रहित होना, किसी व्यक्ति विशेष के समक्ष दीन-हीन न होना, प्रसन्नता, स्थिरता, सरलता,

१४१ नारदपरिव्राजकोपनिषद् अस्नेह (किसी से अत्यधिक लगाव न रखना), गुरु की सेवा-शुश्रूषा करना, श्रद्धा, क्षमा, इन्द्रियों का संयम, मन का निग्रह, सभी प्रियजनों के प्रति उदासीनता का भाव, धीरता, मृदुलता, सहनशीलता, करुणा, लज्जा, ज्ञान- विज्ञान-परायणता , स्वल्प आहार एवं धृति (धैर्य), ये सभी मन को वश में रखने वाले परिव्राजकों (संन्यासियों) के श्रेष्ठ प्रख्यात धर्म हैं ॥ १-१२ ॥ निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थः सर्वत्र समदर्शनः । तुरीयः परमो हंसः साक्षान्नारायणो यतिः ॥ १३ ॥ एकरात्रं वसेद्ग्रामे नगरे पञ्चरात्रकम्। वर्षाभ्योऽन्यत्र वर्षासु मासांश्च चतुरो वसेत् ॥ १४ ॥ द्विरात्रं न वसेद्ग्रामे भिक्षुर्यदि वसेत्तदा। रागादयः प्रसज्येरंस्तेनासौ नारकी भवेत् ॥ १५ ॥ ग्रामान्ते निर्जने देशे नियतात्माऽनिकेतनः । पर्यटेत्कीटवद्भूमी वर्षास्वेकत्र संवसेत् ॥१६ ॥ एकवासा अवासा वा एकदृष्टिरलोलुपः । अदूषयन्सतां मार्गं ध्यानयुक्तो महीं चरेत् ॥ १७॥ शुचौ देशे सदा भिक्षुः स्वधर्ममनुपालयन्। पर्यटेत सदा योगी वीक्ष्यन्वसुधात लम्॥ १८॥ न रात्रौ न च मध्याह्ने संध्ययोर्नैव पर्यटन् । न शून्ये न च दुर्गे वा प्राणिबाधाकरे न च ॥ १९ ॥ एकरात्रं वसेद्ग्रामे पत्तने तु दिनत्रयम् । पुरे दिनद्वयं भिक्षुर्नगरे पञ्चरात्रकम् । वर्षास्वेकत्र तिष्ठेत स्थाने पुण्यजलावृते ॥ २० ॥ आत्मवत्सर्वभूतानि पश्यन्भिक्षुश्चरेन्महीम् । अन्धवत्कुब्जवच्चैव बधिरोन्मत्तमूकवत् ॥ २१ ॥ स्नानं त्रिश्रवणं प्रोक्तं बहूदकवनस्थयोः । हंसे तु सकृदेव स्यात्परहंसे न विद्यते ॥ २२ ॥ द्वन्द्व आदि विकारों से रहित होकर, सात्त्विक गुणों में सर्वदा प्रतिष्ठित रहकर सर्वत्र सम दृष्टि रखने वाला तुरीयावस्था में स्थित परमहंस संन्यासी साक्षात् भगवान् श्रीमन्नारायण का साकार रूप है। (वह) गाँव में एक रात्रि ही निवास के लिए रहे और बड़े नगर में मात्र पाँच रात्रि ही व्यतीत करे, परन्तु यह नियम वर्षाऋतु के अतिरिक्त समय के लिए ही निर्धारित है। वर्षाकाल में वह (संन्यासी) चार माह तक किसी एक निश्चित स्थान पर वास करे। संन्यासी एक गाँव में दो रात्रियाँ कभी न रहे। यदि वह रहता है, तो सम्भव है कि उसके अन्तःकरण में राग आदि विकारों का भाव आ जाय। इन विकारों से वह नरक में गमन करने वाला हो जाता है। गाँव से बाहर किसी एकान्त स्थल में मन एवं इन्द्रियों को संयमित करके निवास करे। कहीं पर भी (वह) अपने निवास के लिए आश्रम या कुटी (मठ) आदि न बनाये। जिस तरह से कृमि-कीट हमेशा यत्र-तत्र भ्रमण करते रहते हैं, उसी तरह से आठ मास तक परिव्राजक इस वसुन्धरा पर विचरण करता रहे। मात्र वर्षाकाल चार मास वह एक ही स्थल पर निवास करे। संन्यासी मात्र एक ही वस्त्र अपने शरीर पर धारण करे या फिर वस्त्ररहित होकर रहे। उस (संन्यासी) की दृष्टि यत्र-तत्र अस्थिर (चंचल) न होकर एक लक्ष्यविशेष पर ही केन्द्रित रहे। कभी भी विषयभोगों में आसक्त न होकर एवं सज्जन पुरुषों के मार्ग को कलुषित न करते हुए सतत परमात्मा के ध्यान में स्थित होकर पृथ्वी पर विचरण करे, वह अपने धर्म का निर्वाह करते हुए सदैव पवित्र स्थल पर ही निवास करे। योग-परायण परिव्राजक पृथ्वी तल पर (नीचे की ओर) दृष्टि रखते हुए ही सर्वदा विचरण करता रहे। रात्रि को, मध्याह्न में तथा दोनों सन्ध्याओं (प्रातः-सायं) के समय कभी भी इधर-उधर भ्रमण न करे और ऐसे स्थलों पर भी भ्रमण न करे, जो निर्जन, दुर्गम एवं समस्त प्राणियों के लिए बाधा पहुँचाने वाले हों। गाँव में एक रात्रि, पुरवे में दो दिन, पत्तन अर्थात् छोटे शहर-कस्बे में तीन दिन तथा नगर में पाँच रात्रियों तक परिव्राजक को ठहरना चाहिए। वर्षाकाल में किसी एक विशेष स्थल पर, जो चारों तरफ से शुद्ध जल से घिरा हुआ हो, अपना निवास बनाए। परिव्राजक समस्त भूत-प्राणियों को अपने ही सदृश देखता हुआ

उपदेश ४ मन्त्र ३६ १४२ अंधे, मूर्ख, बधिर, पागल तथा गूँगे की तरह से इच्छा रखता हुआ भूमि पर विचरता रहे। बहूदक एवं वन में स्थिर संन्यासियों के लिए त्रिकाल स्नान कहा गया है, लेकिन 'हंस' नामक संन्यासी के लिए दिन में मात्र एक ही बार स्नान करने का नियम है। 'हंस' नामक संन्यासी से श्रेष्ठ-उच्च स्थिति वाले 'परमहंस' नामक संन्यासी के लिए स्नान आदि का कोई विशेष नियम नहीं है ॥ १३-२३ ॥ मौनं योगासनं योगस्तितिक्षैकान्तशीलता। निःस्पृहत्वं समत्वं च सप्तैतान्येकदण्डिनाम् ॥ २३ ॥ परहंसाश्रमस्थो हि स्नानादेरविधानतः। अशेषचित्तवृत्तीनां त्यागं केवलमाचरेत् ॥ २४ ॥ त्वङ्‌मांसरुधिरस्नायुमज्जामेदोस्थिसंहतौ । विण्मूत्रपूये रमंतां क्रिमीणां कियदन्तरम् ॥ २५ ॥ क्व शरीरमशेषाणां श्लेष्मादीनां महाचयः। क्व चाङ्गशोभा सौभाग्यकमनीयादयो गुणाः ॥ २६ ॥ मांसासृक्पूयविण्मूत्रस्नायुमज्जास्थिसंहतौ। देहे चेत्प्रीतिमान्मूढो भविता नरकेऽपि सः ॥ २७ ॥ स्त्रीणामवाच्यदेशस्य क्लिन्ननाडीव्रणस्य च । अभेदेऽपि मनोभेदाज्जनः प्रायेण वञ्च्यते ॥ २८ ॥ चर्मखण्डं द्विधा भिन्नमपानोद्गारधूपितम्। ये रमन्ति नमस्तेभ्यः साहसं किमतः परम् ॥ २९ ॥ न तस्य विद्यते कार्यं न लिङ्गं वा विपश्चितः। निर्ममो निर्भयः शान्तो निर्द्वन्द्वोऽवर्णभोजनः ॥ ३० ॥ मुनिः कौपीनवासाः स्यान्नग्नो वा ध्यानतत्परः। एवं ज्ञानपरो योगी ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ३१ ॥ लिङ्गे सत्यपि खल्वस्मिञ्ज्ञानमेव हि कारणम्। निर्मोक्षायेह भूतानां लिङ्गग्रामो निरर्थकः ॥३२ ॥ यन्न सन्तं न चासन्तं नाश्रुतं न बहुश्रुतम्। न सुवृत्तं न दुर्वृत्तं वेद कश्चित्स ब्राह्मणः ॥ ३३ ॥ तस्मादलिङ्गो धर्मज्ञो ब्रह्मवृत्तमनुव्रतम्। गूढधर्माश्रितो विद्वानज्ञातचरितं चरेत् ॥ ३४ ॥ संदिग्धः सर्वभूतानां वर्णाश्रमविवर्जितः। अन्धवज्जडवच्चापि मूकवच्च महीं चरेत् ॥ ३५ ॥ तं दृष्ट्वा शान्तमनसं स्पृहयन्ति दिवौकसः। लिङ्गाभावात्तु कैवल्यमिति ब्रह्मानुशासनमिति ॥३६ ॥ एकदण्डी संन्यासियों के पालन करने योग्य ये सात प्रकार के नियम- 'वाणी का मौन, योगासन, योग, तप-तितिक्षा, एकान्तवास, निःस्पृहभाव एवं समभाव' बतलाये गये हैं। जो परिव्राजक परमहंस की उच्च श्रेणी में पहुँच चुका है, उसके लिए स्नान आदि आवश्यक न होने के कारण केवल वह समस्त चित्त-वृत्तियों का त्याग मात्र करे। त्वचा, मांस, रक्त, नाड़ी, मेद, मज्जा एवं अस्थि सहित इस देह में रमण करने वाले पुरुषों और मल-मूत्र एवं पीप में रहने वाले कृमि-कीटकों में कितना अन्तर है ? कहाँ समस्त कफ आदि घृणित पदार्थों का एकत्रित विशाल रूप यह शरीर और कहाँ अंग-अवयवों की शोभा, विशेष सौन्दर्य एवं कमनीयता आदि गुण। अज्ञानी मनुष्य रक्त, मांस, पीप, मल-मूत्र, मज्जा, नाड़ी एवं अस्थियों के सहित इस देह में यदि प्रीति करता है, तो उसे नरक की निश्चय ही प्राप्ति होगी। उच्चारण न करने योग्य स्त्रियों के गुह्याङ्ग तथा सड़े हुए नाड़ी के घाव में विशेष कोई अन्तर न होने पर भी व्यक्ति अपने अन्तःकरण की मान्यता के भेद से प्रायः वंचित किया जाता है। आखिर स्त्रियों का वह गुह्याङ्ग क्या है ?- दो भागों में विदीर्ण हुआ चर्मखण्ड मात्र और वह भी अपान वायु के निष्क्रमण से दुर्गन्धयुक्त रहता है। जो मनुष्य सतत उसमें रमण करते रहते हैं, उन्हें नमस्कार है। इससे अधिक बड़ा दुस्साहस और क्या हो सकता है ? ज्ञानी परिव्राजक के लिए न कोई कर्त्तव्य शेष रहता है और न ही चिह्न विशेष को धारण करने की कोई विशेष आवश्यकता। वह संन्यासी ममता-विहीन, भय रहित, शान्त, द्वन्द्वरहित, जाति-वर्ग आदि के अहं से रहित तथा भोजन आदि के उपार्जन की चेष्टा से रहित होता है। संन्यासी मुनि लँगोटी धारण करके ही रहे या फिर वस्त्र रहित होकर नग्नावस्था में रहता हुआ परमात्मा के चिन्तन में सदा लगा रहे। इस तरह से ज्ञानपरायण यति ब्रह्म के भाव की प्राप्ति में सक्षम होता है। परिव्राजक का

चिह्न विशेष होते हुए भी उसमें ज्ञान ही विशेष रूप से मुक्ति का माध्यम होता है। प्राणियों के लिए विभिन्न तरह के चिह्नों का धारण मोक्ष साधक ज्ञान के अभाव में व्यर्थ ही होता है। जिस (व्यक्ति) के सन्दर्भ में कोई भी यह न जानने में समर्थ हो कि वह साधु है या असाधु, अज्ञानी है या ज्ञानवान् या फिर वह सदाचारी है या दुराचारी, वास्तव में वही सच्चा ब्रह्मपरायण ब्राह्मण है। इस कारण ज्ञानी परिव्राजक चिह्न विशेष को न धारण करके अपने धर्म का ज्ञान रखते हुए सर्वश्रेष्ठ अविनाशी परमात्म सत्ता के ध्यान-व्रत का पालन करे। वह गूढ़ातिगूढ़ धर्म का आश्रय प्राप्त करके ऐसा आचरण करे, जिससे उस संन्यासी के आचरण के सम्बन्ध में कोई भी बात दूसरे अन्य लोगों पर परिलक्षित न हो। समस्त प्राणिजनों के लिए संदेह का विषय बना हुआ वह वर्ण-जाति एवं आश्रय से विहीन होकर अन्धे, जड़ एवं गूँगे के सदृश भूमि पर विचरण करता रहे। ऐसे श्रेष्ठ शान्तचित्त परिव्राजक का दर्शन करके देवगण भी उसके जैसी स्थिति पाने के लिए सर्वदा आतुर होते रहते हैं। जब अपनी आत्मसत्ता के सिवाय दूसरी अन्य किसी वस्तु के अस्तित्व का चिह्न भी शेष न रह जाए, तभी कैवल्य की प्राप्ति होती है। ऐसा ही यह ब्रह्मतत्त्व का विशेष दिव्य सन्देश है॥ २३-३६ ॥ अथ नारदः पितामहं संन्यासविधिं नो ब्रूहीति पप्रच्छ। पितामहस्तथेत्यङ्गीकृत्यातुरे वा क्रमे वापि तुरीयाश्रमस्वीकारार्थं कृच्छ्रप्रायश्चित्तपूर्वकमष्टश्राद्धं कुर्याद्देवर्षिदिव्यमनुष्यभूत पितृमात्रात्मेत्यष्टश्राद्धानि कुर्यात्। प्रथमं सत्यवसुसंज्ञकान्विश्वान्देवान्देवश्राद्धे ब्रह्मविष्णुमहेश्व- रानृषिश्राद्धे देवर्षिक्षत्रियर्षिमनुष्यर्षीन् दिव्यश्राद्धे वसुरुद्रादित्यरूपान्मनुष्यश्राद्धे सनकसनन्दन- सनत्कुमारसनत्सुजातान्भूतश्राद्धे पृथिव्यादिपञ्चमहाभूतानि चक्षुरादिकरणानि चतुर्विधभूत- ग्रामान्पितृश्राद्धे पितृपितामहप्रपितामहान्मातृश्राद्धे मातृपितामहीप्रपितामहीरात्मश्राद्धे आत्म- पितृपितामहाञ्जीवत्पितृकश्चेत्पितरं त्यक्त्वा आत्मपितामहप्रपितामहानिति सर्वत्र युग्मक्लृप्त्या ब्राह्मणानर्चयेदेकाध्वरपक्षेऽष्टाध्वरपक्षे वा स्वशाखानुगतमन्त्रैरष्टश्राद्धान्यष्टदिनेषु वा एकदिने वा पितृयागोक्तविधानेन ब्राह्मणानभ्यर्च्य भुक्त्यन्तं यथाविधि निर्वर्त्य पिण्डप्रदानानि निर्वर्त्य दक्षिणाताम्बूलैस्तोषयित्वा ब्राह्मणान्प्रेषयित्वा शेषकर्मसिद्ध्यर्थं सप्तकेशान्विसृज्य- 'शेषकर्मप्रसिद्ध्यर्थं केशान्सप्ताष्ट वा द्विजः। संक्षिप्य वापयेत्पूर्वं केशश्मश्रुनखानि च' इति सप्तकेशान्संरक्ष्य कक्षोपस्थवर्जं क्षौरपूर्वकं स्नात्वा सायंसंध्यावन्दनं निर्वर्त्य सहस्रगायत्रीं जप्त्वा ब्रह्मयज्ञं निर्वर्त्य स्वाग्नीनाग्निमुपस्थाप्य स्वशाखोपसंहारं कृत्वा तदुक्तप्रकारेणाज्याहुतिमा- ज्यभागान्तं हुत्वाहुतिविधिं समाप्यात्मादिभिस्त्रिवारं सक्तुप्राशनं कृत्वाचमनपूर्वकमाग्निं संरक्ष्य स्वयमग्नेरुत्तरतः कृष्णाजिनोपरि स्थित्वा पुराणश्रवणपूर्वकं जागरणं कृत्वा चतुर्थयामान्ते स्नात्वा तदग्नौ चरुं श्रपयित्वा पुरुषसूक्तेनाग्नस्य षोडशाहुतीर्हुत्वा विरजाहोमं कृत्वा अथाचम्य सदक्षिणं वस्त्रं सुवर्णपात्रं धेनुं दत्त्वा समाप्य ब्रह्मोद्वासनं कृत्वा। सं मा सिञ्चन्तु मरुतः समिन्द्रः सं बृहस्पतिः। सं मायमग्निः सिञ्चत्वायुषा च धनेन च बलेन चायुष्मन्तं करोतु मा इति। या ते अग्ने यज्ञिया तनूस्तयेह्यारोहात्मानम्। अच्छा वसूनि कृण्वन्नस्मे नर्या पुरूणि। यज्ञो भूत्वा यज्ञमासीद स्वां योनिं जातवेदो भुव आजायमानः स क्षय एधीत्यनेनाग्निमात्मन्यारोप्य ध्यात्वाग्निं प्रदक्षिणनमस्कारपूर्वकमुद्वास्य प्रातःसंध्यामुपास्य सहस्रगायत्रीपूर्वकं सूर्योपस्थानं कृत्वा

उपदेश ४ मन्त्र ३९ १४६ प्राणियों को अभयदान प्रदान किया गया है, मुझमें ही सबकी प्रवृत्ति होती है।) जल का आचमन करके पूर्व दिशा की ओर पूरी अञ्जलि भरकर जल डालकर 'ॐ स्वाहा' कहकर शेष बचे हुए शिखा के बालों को उखाड़ डाले। इसके पश्चात् अगले मन्त्र "यह यज्ञोपवीत परम पवित्र है। यह पूर्वकाल में प्रजापति भगवान् ब्रह्मा जी के साथ ही प्रादुर्भूत हुआ है। यह सर्वश्रेष्ठ एवं आयुष्य की वृद्धि करने वाला है। यज्ञोपवीत को बाहर न रखना चाहिए। हे यज्ञमय सूत्र ! आप मेरे अन्तः में प्रविष्ट होकर आत्मा के साथ निरन्तर एकाकार होकर रहें। आप परम पवित्र हैं। मुझे सुयश, बल, ज्ञान, वैराग्य एवं धारण शक्ति प्रदान करें।" (यह मन्त्र पढ़कर) यज्ञोपवीत को तोड़ डाले और जलाञ्जलि के साथ उसे हाथ में लेकर 'ॐ भूः समुद्रं गच्छ स्वाहा' - इस मन्त्र के द्वारा जल में हवन (विसर्जन) कर दे। तदनन्तर 'ॐ भूः संन्यस्तं मया' 'ॐ भुवः संन्यस्तं मया'' ॐ सुवः संन्यस्तं मया' -इस प्रकार तीन बार इस मन्त्र को पढ़कर तीन बार जल को अभिमन्त्रित करके उसका आचमन करे। इसके बाद 'ॐ भूः स्वाहा' कहता हुआ वस्त्र एवं कटि सूत्र को भी जल में समर्पित कर दे। तत्पश्चात् इस बात को याद करते हुए कि मैं समस्त कर्मों का त्यागी हूँ, दिगम्बर (वस्त्र रहित) होकर अपने आत्म-स्वरूप का चिन्तन करते हुए ऊपर की ओर बाँह उठाये हुए उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान कर जाए ॥ ३७॥ पूर्ववद्विद्वात्सन्न्यासी चेद्गुरोः सकाशात्प्रणवमहावाक्योपदेशं प्राप्य यथासुखं विहरन्मत्तः कश्चिन्नान्यो व्यतिरिक्त इति फलपत्रोदकाहारः पर्वतवनदेवतालयेषु संचरेत्संन्यस्याथ दिगम्बरः सकलसञ्चारकः सर्वदानन्दस्वानुभवैकपूर्णहृदयः कर्मातिदूरलाभः प्राणायामपरायणः फलर- सत्वक्पत्रमूलोदकैर्मोक्षार्थी गिरिकन्दरेषु विसृजेद्देहं स्मरंस्तारकम्॥ ३८ ॥ यदि पूर्व की भाँति विद्वान्-संन्यासी हो, तो वह गुरु से ॐकार एवं महावाक्यों का उपदेश ग्रहण करके, मेरे से भिन्न और दूसरा कोई नहीं है, इस निश्चय दृष्टिकोण के साथ आनन्दपूर्वक भ्रमण करता रहे। पत्र, पुष्प, फल एवं जल का ही आहार ग्रहण करे। पर्वत, वन एवं देवालयों में ही विचरण करता हुआ निवास करे। संन्यास के पश्चात् यदि वह दिगम्बर (वस्त्र रहित) हो गया हो, तो वह अपने हृदय कमल में स्थित सदैव आनन्द-स्वरूप आत्मा की ही अनुभूति को भरकर, कर्मों के द्वारा अत्यधिक दूर रहने में ही लाभ मानता हुआ, प्राणायाम का अभ्यास करता हुआ (फल-फूलों के) रस, छिलके, पत्ते, मूल (जड़) तथा जल के माध्यम से प्राण तत्त्व को धारण करे एवं मात्र मोक्ष की ही इच्छा रखकर पर्वत की गुफाओं में रहकर तारक मन्त्र (अथवा परब्रह्म) का सतत जप एवं चिन्तन करते हुए अपने शरीर का परित्याग कर दे ॥ ३८ ॥ विविदिषासंन्यासी चेच्छतपथं गत्वाचार्यादिभिर्विप्रैस्तिष्ठ तिष्ठ महाभाग दण्डं वस्त्रं कमण्डलुं गृहाण प्रणवमहावाक्यग्रहणार्थं गुरुनिकटमागच्छेत्याचार्यैर्दण्डकटिसूत्रकौपीनं शाटीमेकां कमण्डलुं पादादिमस्तकप्रमाणमव्रणं समं सौम्यमकालपृष्ठं सलक्षणं वैणवं दण्डमेकमाचमनपूर्वकं सखा मा गोपायौजः सखायोऽसीन्द्रस्य वज्रोऽसि वार्त्रघ्नः शर्म मे भव यत्पापं तन्निवारयेति दण्डं परिगृह्येजज्जजीवनं जीवनाधारभूतं माते मा मन्त्रयस्व सर्वदा सर्वसौम्येति प्रणवपूर्वकं कमण्डलुं परिगृह्य कौपीनाधारं कटिसूत्रमोमिति गुह्याच्छादकं कौपीनमोमिति शीतवातोष्णत्राणकरं देहैकरक्षणमोमिति कटिसूत्रकौपीनवस्त्रमाचमनपूर्वकं योगपट्टाभिषिक्तो भूत्वा कृतार्थोऽहमिति मत्वा स्वाश्रमाचारपरो भवेदित्युपनिषत् ॥ ३९ ॥ 'यदि ज्ञान को प्राप्त करने की आकांक्षा से परिव्राजक (संन्यास) धर्म का वरण किया हो, तो वह सौ कदम आगे की ओर चलने के पश्चात् आचार्य आदि गुरुजनों-ब्राह्मणों के द्वारा यों कहकर बुलाये जाने पर कि

१४७ नारदपरिव्राजकोपनिषद् 'हे महाभाग! रुको, रुको; यह ब्रह्मदण्ड, वस्त्र एवं कमण्डलु धारण करो। तुम्हें ॐकार एवं महावाक्य का उपदेश स्वीकार (ग्रहण) करने के लिए गुरु के समीप आ जाना चाहिए। गुरु के समीप आ जाने के पश्चात् गुरुजनों एवं आचार्यों द्वारा प्रदान किये जाने पर ही दण्ड, कटिसूत्र, कौपीन, एक शाटी (चादर) तथा एक कमण्डलु अपने पास धारण करे। दण्ड बाँस का ही हो। उसकी ऊँचाई पैरों से लेकर सिर तक ही होनी चाहिए। वह खरोंच अथवा छेद से रहित, बराबर, चिकना तथा श्रेष्ठ लक्षणों से सम्पन्न हो। उस दण्ड का रंग काला न हो। इन सभी वस्तुओं को ग्रहण करने से पूर्व आचमन आदि कृत्य पूर्ण कर ले, तत्पश्चात् निर्धारित मन्त्र- 'सखा मा गोपायौजः ...............तन्त्रिवाय।' (अर्थात्-'हे दण्ड ! आप मेरे सखा अर्थात् प्राण शक्ति की रक्षा करें। आप ही मेरे सखा हैं, जो इन्द्र के हाथ में वज्र के रूप में रहते हैं। आपने ही वज्ररूप से आहत करके वृत्रासुर का विनाश किया है। आप हमारे लिए कल्याण रूप बनें। हमारे अन्दर जो भी पाप हों, उनका शमन करें)' का उच्चारण करके दण्ड को हाथ में धारण करे, तदनन्तर 'जगज्जीवनं ............सर्वसौम्य' मन्त्र के साथ ॐकार का उच्चारण करते हुए कमण्डलु को धारण करे। तदुपरान्त 'कौपीनाधारं कटिसूत्रमोम्' ऐसा कहकर कटिसूत्र धारण करे। 'गुह्याच्छादकं कौपीनमोम्', यह कहकर कौपीन (लँगोटी) धारण करे और 'शीतवातोष्ण त्राणकरं देहैक रक्षणमोम्' इस मन्त्र का उच्चारण करने के पश्चात् ही वस्त्र धारण करे। इसके बाद पुनः आचमन करके योगपट्टाभिषिक्त हो 'मैं कृतार्थ हो गया,' ऐसा मानता हुआ अपने आश्रम के उचित सदाचार के पालन में संलग्न हो जाए। ऐसी ही है यह उपनिषद् ॥ ३९ ॥ ॥ पञ्चमोपदेशः ॥ अथ हैन पितामहं नारदः पप्रच्छ भगवन्सर्वकर्मनिवर्तकः संन्यास इति त्वयैवोक्तः पुनः स्वाश्रमाचारपरो भवेदित्युच्यते। ततः पितामह उवाच। शरीरस्य देहिनो जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ति- तुरीयावस्थाः सन्ति। तदधीनाः कर्मज्ञानवैराग्यप्रवर्तकाः पुरुषा जन्तवस्तदनुकूलाचाराः सन्ति। तथैव चेद्भगवन्संन्यासाः कतिभेदास्तदनुष्ठानभेदाः कीदृशास्तत्त्वतोऽस्माकं वक्तुमर्हसीति। तथेत्यङ्गीकृत्य तं पितामहेन ॥ १ ॥ (संन्यास एवं संन्यासी के प्रकार और संन्यास धर्म तथा उसके पालन का महत्त्व) इसके पश्चात् भगवान् ब्रह्माजी से देवर्षि नारद ने पूछा- 'हे भगवन् ! आप ने ही कहा है कि संन्यास आश्रम समस्त कर्मों का निवृत्तिकारक है; पुनः यह भी कहते हैं कि संन्यासी अपने आश्रमोचित आचार-विचार के पालन में संलग्न हो जाएँ। इस विषय में समाधान करने की कृपा करें। तदनन्तर ब्रह्मा जी ने कहा-'हे नारद ! शरीर में प्रतिष्ठित देहधारी प्राणी की जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुरीय-ये चार अवस्थाएँ होती हैं। इन्हीं अवस्थाओं के अधीन रहकर पुरुष कर्म, ज्ञान तथा वैराग्य के प्रवर्तक होते हैं। सभी प्राणी इन्हीं चारों अवस्थाओं के अधीन रहकर जब-जब जिस अवस्था में स्थित होते हैं, उसी के अनुकूल रहते हुए आचरण करते हैं। संन्यासी, ब्रह्मचारी, गृहस्थ तथा वानप्रस्थ के द्वारा आवश्यक रूप से सेवनीय तथा श्रौत-स्मार्त कर्मों का ही संन्यासी अपने आश्रमोचित सदाचार के पालन में संलग्न हो जाए। ऐसा सुनकर नारद जी ने कहा-'हे भगवन् ! आप अब कृपा करके यथार्थ रूप से संन्यास के कितने प्रकार हैं तथा उनके अनुष्ठान में क्या अन्तर है, बतलाएँ ? ॥ १ ॥ संन्यासभेदैराचारभेदः कथमिति चेत्तत्त्वतस्त्वेक एव संन्यासः अज्ञानेनाशक्तिवशात्क- र्मलोपतश्च त्रैविध्यमेत्य वैराग्यसंन्यासो ज्ञानसंन्यासो ज्ञानवैराग्यसंन्यासः कर्मसंन्यासश्चेति

उपदेश ५ मन्त्र १० १४८ चातुर्विध्यमुपागतः ॥ २ ॥ तद्यथेति दुष्टमदनाभावाच्चेति विषयवैतृष्ण्यमेत्य प्राक्पुण्यकर्मव- शात्संन्यस्तः स वैराग्यसंन्यासी ॥ ३ ॥ शास्त्रज्ञानात्पाप पुण्येल्लोकानुभवश्रवणात्प्रपञ्चोपरतः क्रोधेष्र्यासूयाहङ्काराभिमानात्मकसर्वसंसारं निर्वृत्य दारेषणाधनेषणालोकेषणात्मकदेहवासनां शास्त्रवासनां लोकवासनां त्यक्त्वा वमनान्नमिव प्रकृतीयं सर्वमिदं हेयं मत्वा साधनचतुष्टयसंपन्नो यः संन्यस्यति स एव ज्ञानसंन्यासी ॥ ४ ॥ क्रमेण सर्वमभ्यस्य सर्वमनुभूय ज्ञानवैराग्याभ्यां स्वरूपानुसंधानेन देहमात्रावशिष्टः संन्यस्य जातरूपधरो भवति स ज्ञानवैराग्यसंन्यासी ॥ ५ ॥ ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भूत्वा वानप्रस्थाश्रममेत्य वैराग्यभावेऽप्याश्रमक्रमानुसारेण यः संन्यस्यति स कर्मसंन्यासी ॥ ६ ॥ ब्रह्मचर्येण संन्यस्य संन्यासाज्जातरूपधरो वैराग्यसंन्यासी । विद्वत्संन्यासी ज्ञानसंन्यासी विविदिषासंन्यासी कर्मसंन्यासी ॥ ७॥ ब्रह्माजी ने कहा- 'हे नारद ! संन्यास के भेद से आचरण के भेद में क्या अन्तर पड़ता है, यह मैं तुम्हें बतलाता हूँ; श्रवण करो। वास्तव में संन्यास एक ही प्रकार का है; किन्तु ज्ञानरहित होने के कारण, असमर्थतावश तथा कर्मलोप के कारण तीन भेदों में बँटकर वैराग्य-संन्यास, ज्ञान-संन्यास, ज्ञान-वैराग्य-संन्यास तथा कर्म- संन्यास' इन चार भेदों को प्राप्त होता है। जो मन में दूषित भावनाओं का अभाव होने पर विषय वासनाओं में आसक्त न होकर पूर्व जन्म के पुण्य कर्म के प्रभाव से संन्यास ग्रहण कर लेता है, वह वैराग्य संन्यासी कहलाता है। जो मनुष्य शास्त्रों की जानकारी प्राप्त करने से तथा पापरूप और पुण्यरूप लोकों का अनुभव तथा श्रवण करने के कारण प्रपञ्चादि से स्वभावतः विरक्त हो गया है; क्रोध, ईर्ष्या, असूया (दृष्टिदोष), अहंकार तथा अभिमान ही जिसके प्रत्यक्ष स्वरूप हैं, ऐसे इस सम्पूर्ण जगत् को अपने मन से रहित करके, स्त्री कामना, धन कामना तथा लोक में प्रसिद्धि की कामना आदि त्रिविध रूपों वाली दैहिक-वासना, शास्त्र-वासना एवं लोक- वासना का परित्याग कर देता है और जैसे सामान्यजन वमन किए हुए भोजन को त्याज्य समझते हैं, वैसे ही इन सभी तरह के भोगों को त्याज्य मानते हुए जो व्यक्ति साधन-चतुष्टय से युक्त हो, वही संन्यास ग्रहण करता है, वही ज्ञान संन्यासी कहलाने का अधिकारी होता है। जो मनुष्य क्रमानुसार (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ आदि का) अभ्यास करता हुआ, सभी कुछ अनुभव में लाकर के ज्ञान तथा वैराग्य के द्वारा निरन्तर अपने ही स्वरूप- मात्र का ध्यान करता हुआ जातरूपधर (बालकवत् निश्छल) हो जाता है, वही ज्ञान-वैराग्य-संन्यासी कहलाता है। जो ब्रह्मचर्य धर्म को पूर्ण करके गृहस्थ होकर एवं गृहस्थ से वानप्रस्थ-धर्म में प्रविष्ट हो करके पूर्ण वैराग्य न होने पर भी आश्रम-क्रमानुसार सबसे बाद में जो संन्यास ग्रहण करता है, वही कर्म-संन्यासी है अथवा ब्रह्मचर्य के पश्चात् ही संन्यास ग्रहण कर संन्यास-धर्म से जो जातरूपधर हो जाता है, वही वैराग्य संन्यासी कहलाता है। विद्वान् संन्यासी ही ज्ञान संन्यासी है और विविदिषा संन्यासी ही कर्म संन्यासी बतलाया गया है॥ कर्मसंन्यासोऽपि द्विविधः निमित्तसंन्यासोऽनिमित्तसंन्यासश्चेति । निमित्तस्त्वातुरः । अनिमित्तः क्रमसंन्यासः । आतुरः सर्वकर्मलोपः प्राणस्योत्क्रमणकालसंन्यासः सनिमित्त- संन्यासः । दृढाङ्गो भूत्वा सर्वं कृतकं नश्वरमिति देहादिकं सर्वं हेयं प्राप्य ॥ ८-९॥ हंसः शुचिषद्द्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । नृषद्वरसदुतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ १० ॥ “कर्म संन्यास के भी दो भेद होते हैं-प्रथम निमित्त संन्यास तथा द्वितीय अनिमित्त संन्यास। आतुर- संन्यास ही निमित्त संन्यास कहा जाता है तथा क्रम-संन्यास को अनिमित्त संन्यास कहते हैं। रोगादि के कारण

१४९ नारदपरिव्राजकोपनिषद् जिसमें समस्त कर्म लुप्त हो जाते हैं, अर्थात् जिसमें नित्य-नैमित्तिक आदि कोई भी कर्म निर्मित नहीं हो सकते एवं जो प्राण के परित्याग करने के समय ग्रहण किया जाता है, ऐसा वह संन्यास ही निमित्त संन्यास कहा गया है, इसे ही आतुर-संन्यास भी कहते हैं। शरीर के बलवान् होने पर जो विचार द्वारा यह दृढ़-निश्चय करके कि प्रादुर्भूत होने वाली सम्पूर्ण वस्तुएँ नाशवान् हैं और इसी तरह से शरीर को भी त्याज्य मान लेता है "वह परमात्मा आकाश में विचरण करने वाला हंस (सूर्य) है, वही अन्तरिक्ष में स्वेच्छापूर्वक विचरण करने वाला वसु है। वही होता तथा यज्ञ-वेदी पर प्रतिष्ठित रहने वाला अग्नि रूप है। सद्गृहस्थों के भवनों में आतिथ्यरूप में आश्रय प्राप्त करने वाला भी वही है। पुरुषों में उसकी ही सत्ता सर्वश्रेष्ठ है। अत्यधिक श्रेष्ठ एवं अनुपम वस्तुओं में उसका ही अस्तित्व है। शाश्वत सत्य में उसी का निवास है। आकाश में वही सत्य रूप है! वही जल से प्रादुर्भूत होता है। वही गौ अर्थात् पृथ्वी एवं वाणी से उत्पन्न होने वाला है। सत्य से भी उसी का प्राकट्य होता है। वही पर्वतों से उत्पन्न होकर इन सभी से भिन्न एवं अति विलक्षण एक मात्र महान् सत्य है" ॥ ८-१०॥ ब्रह्मव्यतिरिक्तं सर्वं नश्वरमिति निश्चित्याथो क्रमेण यः संन्यस्यति स संन्यासोऽनिमित्त- संन्यासः ॥ ११ ॥ संन्यासः षड्विधो भवति । कुटीचको बहूदको हंसः परमहंसः तुरीयातीतोऽ- वधूतश्चेति ॥ १२ ॥ कुटीचकः शिखायज्ञोपवीती दण्डकमण्डलुधरः कौपीनकन्थाधरः पितृमातृगुर्वाराधनपरः पिठरखनित्रशिक्यादिमन्त्रसाधनपर एकत्रान्नादनपरः श्वेतोर्ध्वपुण्ड्रधारी त्रिदण्डः । बहूदकः शिखादिकन्थाधरस्त्रिपुण्ड्रधारी कुटीचकवत्सर्वसमो मधुकरवृत्त्याष्टक- वलाशी ॥ १३ ॥ हंसो जटाधारी त्रिपुण्ड्रोर्ध्वपुण्ड्रधारी असंक्लृप्तमाधूकरान्नाशी कौपीनखण्ड- तुण्डधारी ॥ १४॥ परमहंसः शिखायज्ञोपवीतरहितः पञ्चगृहेष्वेकरात्रान्नादनपरः करपात्री एककौपीनधारी शाटीमेकामेकं वैणवं दण्डमेकशाटीधरो वा भस्मोद्धूलनपरः सर्वत्यागी ॥१५॥ (इस प्रकार उपर्युक्त मन्त्र के भावार्थानुसार) जो केवल परब्रह्म परमात्मा को ही सत्य-स्वरूप जानता है तथा ब्रह्म से अलग और सभी कुछ नाशवान् है, ऐसा दृढ़-निश्चय करता हुआ क्रमशः संन्यास-आश्रम में प्रविष्ट होता है। उसका यही संन्यास अनिमित्त संन्यास कहलाता है। संन्यासी के छह भेद इस प्रकार कहे गये हैं-१ कुटीचक, २. बहूदक, ३. हंस, ४. परमहंस, ५. तुरीयातीत, तथा ६. अवधूत। कुटीचक संन्यासी शिखा एवं सूत्र (यज्ञोपवीत) से सम्पन्न होता है। वह दण्ड, कमण्डलु, कौपीन एवं कन्था (कथरी) को धारण करता है। माता, पिता तथा गुरु की सेवा में निरन्तर लगा रहता है। पात्र, खनती (मिट्टी खोदने वाला) तथा झोली आदि को सतत अपने साथ रखता है और मन्त्रादि की साधना में सदैव तत्परतापूर्वक लगा रहता है। एक ही स्थान पर भोजन करता है, श्वेत ऊर्ध्वपुण्ड्र (ऊर्ध्वमुख तिलक) धारण करता तथा त्रिदण्ड को भी धारण किये रहता है। बहूदक भी कुटीचक की तरह से शिखा (चोटी) यज्ञोपवीत, दण्ड, कमण्डलु, कौपीन (लंगोटी) और कन्था (कथरी) को धारण करता है। मस्तक में त्रिपुण्ड्र धारण किये रहता है। सभी के प्रति समान भाव रखने वाला होता है और मधुकरी वृत्ति से विभिन्न गृहों से अन्न प्राप्त करके मात्र आठ ग्रास भोजन ही ग्रहण करता है। हंस नाम वाला संन्यासी जटा-जूट धारण करने वाला होता है, त्रिपुण्ड्र एवं ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करता है, अनिश्चित गृहों से मधुकरी (भिक्षा) लाकर भोजन करने वाला तथा कौपीन खण्ड एवं तुम्बी धारण करने वाला होता है। परमहंस नामक संन्यासी शिखा और यज्ञोपवीत को धारण नहीं करता है। यह संन्यासी पाँच घरों से अन्न (भोजन) प्राप्त करके केवल एक रात ही भोजन करता है अर्थात् दूसरे दिन दूसरे अन्य पाँच घरों से अन्न प्राप्त करता है। एक कौपीन, एक ओढ़ने का वस्त्र तथा एक बाँस का दण्ड अपने पास में रखता है। यह संन्यासी या

उपदेश ५ मन्त्र २० १५० तो एक चादर अपने शरीर में सदैव ओढ़कर रहता है अथवा सम्पूर्ण अंगों में भस्म धारण किये रहता है, परमहंस सर्वत्यागी होता है ॥ ११-१५ ॥ तुरीयातीतो गोमुखः फलाहारी। अन्नाहारी चेद्गृहत्रये देहमात्रावशिष्टो दिगम्बरः कुणपवच्छरीरवृत्तिकः॥ १६॥ अवधूतस्त्वनियमोऽभिशस्तपतितवर्जनपूर्वकं सर्ववर्णेष्व- जगरवृत्त्याहारपरः स्वरूपानुसंधानपरः ॥ १७ ॥ तुरीयातीत संन्यासी गौ के सदृश ईश्वरेच्छा से जो कुछ भी प्राप्त हो जाए, उसी में निर्वाह कर लेता है। यह संन्यासी कभी किसी से कुछ नहीं माँगता। यह प्रायः फलाहारी ही होता है और यदि अन्नाहार करता है, तो केवल तीन घरों से ही अन्न लेता है। शरीर के अतिरिक्त उसके पास और कुछ भी नहीं होता। वह दिगम्बर (नग्न) रहते हुए अपनी इन्द्रियों को मृतकों की भाँति चेष्टारहित बना लेता है। अवधूत नामक संन्यासी किसी भी तरह के बन्धन को नहीं मानता। कलंक युक्त और पथ-भ्रष्ट मनुष्यों को त्यागकर बिना-किसी वर्ण-भेद के अजगर वृत्ति से अन्न प्राप्त करते हुए अपने आत्मा के स्वरूप के चिन्तन में सतत संलग्न रहता है ॥ १६-१७ ॥ आतुरो जीवति चेत्क्रमसंन्यासः कर्तव्यः ॥ १८॥ आतुर मनुष्य संन्यास स्वीकार करने के बाद जीवित रहे, तो उसे क्रम-संन्यास ग्रहण कर लेना चाहिए ॥ कुटीचकबहूदकहंसानां ब्रह्मचर्याश्रमादितुरीयाश्रमवत् कुटीचकादीनां संन्यासविधिः ॥ १९ ॥ कुटीचक, बहूदक तथा हंस नामक इन तीन तरह के संन्यासियों को ब्रह्मचर्य, गृहस्थ एवं वानप्रस्थ के क्रमानुसार ही चतुर्थ आश्रम अर्थात् संन्यास आश्रम में प्रविष्ट होने का नियम है ॥ १९ ॥ परमहंसादित्रयाणां न कटिसूत्रं न कौपीनं न वस्त्रं न कमण्डलुर्न दण्डः। सार्ववर्णिकभैक्षा- टनपरत्वं जातरूपधरत्वं विधिः । संन्यासकालेऽप्यलं बुद्धिपर्यन्तमधीत्य तदनन्तरं कटिसूत्रं कौपीनं दण्डं वस्त्रं कमण्डलुं सर्वमप्सु विसृज्याथ जातरूपधरश्चरेन्न कन्थावेशो नाध्येतव्यो न वक्तव्यो न श्रोतव्यमन्यत्किंचित्प्रणवादन्यं न तर्कं पठेन्न शब्दमपि बृहच्छब्दान्नाध्यापयेन्न महद्वाचो विग्लापनं गिरा पाण्यादिना संभाषणं नान्यस्माद्वा विशेषेण न शूद्रस्त्रीपतितोदक्या संभाषणं न यतेर्देवपूजा नोत्सवदर्शनं तीर्थयात्रावृत्तिः ॥ २० ॥ परमहंस, तुरीयातीत एवं अवधूत संन्यासियों के लिए कटिसूत्र, कौपीन दण्ड, कमण्डलु एवं वस्त्रादि धारण करने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। वे जातरूपधर रहकर समस्त वर्ण-जाति के घरों से भिक्षा याचना के लिए स्वतन्त्र हैं। संन्यास धर्म स्वीकार करने के समय 'मैंने जितना भी कुछ अध्ययन किया है, वह अपने आप में पर्याप्त है' इस तरह का दृढ़-निश्चय जब तक न हो जाए, तब तक अध्ययन करते रहना चाहिए। तत्पश्चात् कौपीन, कटिसूत्र आदि को जल में विसर्जित कर देना चाहिए। यदि वह दिगम्बर (वस्त्र से रहित) हो, तो फिर वह कन्था (कथरी) आदि अपने पास न रखे, पठन-पाठन न करे, प्रवचन, कथा-स्तुति आदि श्रवण न करे तथा उसे व्याख्यान आदि भी नहीं देना चाहिए। तर्कशास्त्र एवं शब्दशास्त्र आदि कुछ भी पढ़ने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। उसे मात्र प्रणव रूपी ॐकार का ही जप करना चाहिए। वाणी का व्यर्थ में अपव्यय करना वर्जित है। संकेत मात्र से बात करना भी निषिद्ध है। वह शूद्र, पदच्युत एवं स्त्री से बात बिल्कुल न करे। रजस्वला स्त्री से तो भूलकर भी बात न करे। विशेष उत्सव समारोह-पूजा आदि देखना, तीर्थ यात्रा करना या देवताओं का पूजन-अर्चन आदि भी यति के लिए आवश्यक नहीं है ॥ २० ॥

१५१ नारदपारिव्राजकोपनिषद् पुनर्यतिविशेषः। कुटीचकस्यैकत्र भिक्षा बहूदकस्यासंकॢप्तं माधूकरं हंसस्याष्टगृहेष्वष्टक- वलं परमहंसस्य पञ्चगृहेषु करपात्रं फलाहारो गोमुखं तुरीयातीतस्यावधूतस्याजगरवृत्तिः सार्ववर्णिकेषु यतिर्नैकरात्रं वसेन्न कस्यापि नमेत्तुरीयातीतावधूतयोर्न ज्येष्ठो यो न स्वरूपज्ञः। स ज्येष्ठोऽपि कनिष्ठो हस्ताभ्यां नद्युत्तरणं न कुर्यान्न वृक्षमारोहेन्न यानादिरूढो न क्रयविक्रयपरो न किंचिद्विनिमयपरो न दाम्भिको नानृतवादी न यतेः किंचित्कर्तव्यमस्त्यस्ति चेत्सांकर्यम्। तस्मान्मननादौ संन्यासिनामधिकारः॥ २१॥ अब संन्यासियों के फिर से कुछ विशेष नियमोपनियम वर्णित किये जाते हैं। कुटीचक संन्यासी के लिए एक ही स्थान विशेष पर भिक्षा स्वीकार करने की विधि है। बहूदक संन्यासी के लिए निश्चयरहित घरों से मधुकरी (भिक्षा) प्राप्त करने का नियम है। हंस संन्यासी के लिए आठ गृहों से मात्र आठ ग्रास अन्न लेकर भोजन ग्रहण करने का विधान है। परमहंस के लिए पाँच गृहों से अन्न (भोजन) प्राप्त करने का विधान है। हाथ ही उसका पात्र है, इस कारण उसे 'करपात्री' भी कहते हैं। तुरीयातीत के लिए गोमुख-वृत्ति से फलाहार का ही विधान है। यानी जिस प्रकार गाय को जो कुछ भी भोजन कराया जाय, वह मुँह खोलकर ग्रहण कर लेती है, उसी प्रकार दैव इच्छा से जो भी कुछ फल-फूल प्राप्त हो जाए, उसे ही ले लेना चाहिए। अवधूत संन्यासी के लिए समस्त वर्ण-जाति के लोगों के यहाँ से अजगर-वृत्ति के अनुसार अन्न-प्राप्त करने का विधान है। यति (संन्यासी) किसी गृहस्थ के घर एक रात्रि भी निवास न करे। किसी को भी नमन-वंदन न करे। तुरीयातीत एवं अवधूत इन दोनों संन्यासियों में अवस्थानुसार न कोई बड़ा होता है और न ही कोई छोटा होता है। जिसे अपने स्वरूप का ही बोध नहीं है, वह अवस्था में बड़ा होते हुए भी छोटा ही कहा जायेगा। संन्यासी को कभी भी तैरकर नदी पार नहीं करनी चाहिए। वृक्षों पर भी नहीं चढ़ना चाहिए। सवारी पर न चले। क्रय-विक्रय आदि कुछ भी न करे। किसी भी वस्तु की अदला-बदली न करे। दम्भी (अहंकारी) एवं असत्यवादी कदापि न बने। यति के लिए कुछ भी करना कर्त्तव्य नहीं है। संन्यासियों का चिन्तन-मनन में ही समग्र रूप से पूर्ण अधिकार है॥ २१॥ आतुरकुटीचकयोर्भूर्लोकभुवर्लोकौ बहूदकस्य स्वर्गलोको हंसस्य तपोलोकः परमहंसस्य सत्यलोकस्तुरीयातीतावधूतयोः स्वात्मन्येव कैवल्यं स्वरूपानुसन्धानेन भ्रमरकीटन्यायवत् ॥२२ यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेव समाप्नोति नान्यथा श्रुतिशासनम्॥ २३॥ आतुर एवं कुटीचक नाम वाले संन्यासी पृथिवी लोक और भुवः लोक को प्राप्त करते हैं। बहूदक संन्यासी स्वर्ग को अर्थात् स्वः लोक को तथा हंस-संन्यासी को तपोलोक की प्राप्ति होती है। परमहंस संन्यासी को सत्यलोक की प्राप्ति होती है। तुरीयातीत एवं अवधूत संन्यासी अपनी अन्तरात्मा में एकमात्र कैवल्य प्राप्ति का ही अधिकारी होता है। वह भ्रमर का ध्यान करने वाले कृमि-कीटकों के सदृश सतत अपने स्वरूप का अनुसंधान करते रहने के कारण आत्मस्वरूप ही हो जाता है। व्यक्ति मृत्यु के समय जिस-जिस भाव का ध्यान करते हुए अपने शरीर का परित्याग करना है, वह उसी-उसी भाव को प्राप्त करता है, यह बात व्यर्थ नहीं है, यह श्रुति-सम्मत उपदेश है॥ २२-२३॥ तदेवं ज्ञात्वा स्वरूपानुसंधानं विनान्यथाचारपरो न भवेत्तदाचारवशात्तत्तल्लोकप्राप्तिर्ज्ञा- नवैराग्यसंपन्नस्य स्वस्मिन्नेव मुक्तिरिति न सर्वत्राचारप्रसक्तिस्तदाचारः। जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ति- ष्वेकशरीरस्य जाग्रत्काले विश्वः स्वप्नकाले तैजसः सुषुप्तिकाले प्राज्ञः अवस्थाभेदादवस्थेश्वरभेदः

उपदेश ५ मन्त्र २६ १५२ कार्यभेदात्कारणभेदस्तासु चतुर्दशकरणानां बाह्यवृत्तयोऽन्तर्वृत्तयस्तेषामुपादानकारणम्। वृत्तयश्चत्वारः मनोबुद्धिरहंकारश्चित्तं चेति । तत्तद्वृत्तिव्यापारभेदेन पृथगाचारभेदः ॥ २४॥ अतः इस तरह से समझकर संन्यासी को चाहिए कि वह अपने आत्मस्वरूप के चिन्तन के अतिरिक्त और किसी भी आचार में संलग्न न रहे। अलग-अलग आचारों का अनुष्ठान संकल्प लेने से तदनुकूल लोकों की प्राप्ति होती है; किन्तु ज्ञान-वैराग्य से युक्त संन्यासी की अपने आप में अर्थात् स्वयं में ही मुक्ति प्राप्त होती है। अन्य और किसी भी आचार में आसक्त न होना ही उसका अपना विशिष्ट आचार है। जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति इन तीनों स्थितियों में वह एक रूप होता है। जाग्रत् अवस्था में वही विश्वरूप, स्वप्नावस्था में तैजस-सम्पन्न तथा सुषुप्ति अवस्था में प्राज्ञ-स्वरूप कहलाता है। काल-भेद से उन-उन अवस्थाओं के स्वामी में भेद होता है, कार्यभेद से ही कारण भेद की जानकारी प्राप्त होती है। जाग्रदादि अवस्थाओं में चौदह करणों (पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय तथा चार अन्तःकरण) की जो बाह्य वृत्तियाँ हैं, उनका उपादान कारण एक ही है अन्तः की वृत्तियाँ। अन्तः की चार वृत्तियाँ-मन, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार बतलायी गई हैं। उन-उन वृत्तियों के व्यापार- भेद से अलग-अलग आचरण भेद होते हैं॥ २४॥ नेत्रस्थं जागरितं विद्यात्कण्ठे स्वप्नं समाविशेत् । सुषुप्तं हृदयस्थं तु तुरीयं मूर्ध्नि संस्थितम् ॥ २५ ॥ तुरीयमक्षरमिति ज्ञात्वा जागरिते सुषुप्त्यवस्थापन्न इव यद्यच्छ्रुतं यद्यद्दृष्टं तत्तत्सर्वमविज्ञातमिव यो वसेत्तस्य स्वप्नावस्थायामपि तादृगवस्था भवति । स जीवन्मुक्त इति वदन्ति । सर्वश्रुत्यर्थप्रति- पादनमपि तस्यैव मुक्तिरिति । भिक्षुर्नैहिकामुष्मिकापेक्षः । यद्यपेक्षास्ति तदनुरूपो भवति । स्वरूप- पानुसन्धानव्यतिरिक्तान्यशास्त्राभ्यासैरुष्ट्रकुङ्कुमभारवद्व्यर्थो न योगशास्त्रप्रवृत्तिर्न सांख्यशा- स्त्राभ्यासो न मन्त्रतन्त्रव्यापारः । इतरशास्त्रप्रवृत्तिर्यतेरस्ति चेच्छ्रवालांकारवच्चर्मकारवदतिविदूर- कर्माचारविद्यादूरो न प्रणवकीर्तनपरो यद्यत्कर्म करोति तत्तत्फलमनुभवति । एरण्डतैलफेनवदतः सर्वं परित्यज्य तत्प्रसक्तं मनोदण्डं करपात्रं दिगम्बरं दृष्ट्वा परिव्रजेद्भिक्षुः । बालोन्मत्तपिशाच- वन्मरणं जीवितं वा न काङ्क्षेत कालमेव प्रतीक्षेत निर्देशभृतकन्यायेन परिव्राडिति ॥ २६ ॥ जाग्रत् अवस्था तथा उसके नियन्ता विश्व की स्थिति नेत्र के अन्दर निहित है। स्वप्न एवं उसके अधिष्ठाता तैजस का कण्ठ में निवास है। सुषुप्ति तथा उसके स्वामी प्राज्ञ की स्थिति हृदय क्षेत्र में है और तुरीय तथा उसके स्वामी परमेश्वर का निवास ब्रह्मरन्ध्र (सिर) में कहा गया है। जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं का वर्णन करते हुए तुरीयरूप में जिसकी स्थिति कही गई है, वह तुरीय स्वरूप अविनाशी परमात्मतत्त्व मैं ही हूँ, ऐसा जानकर जो जाग्रत् अवस्था में ही सुषुप्त की स्थिति में रहता है; जो-जो सुनी तथा जो-जो दृष्टिपात की हुई वस्तुएँ हैं, वे सब मानों अपरिचित सी हैं। इस तरह से उनकी ओर चिन्तन न करते हुए, जो स्थित रहता है, उसकी स्वप्नावस्था में भी वैसी ही स्थिति बनी रहती है अर्थात् वह स्वप्न में उपलब्ध पदार्थों को भी स्वीकार नहीं करता है। इस तरह का पुरुष जीवन्मुक्त है, ऐसा विद्वज्जन कहते हैं। समस्त श्रुतियों का मन्तव्य भी यही है कि उसी की मुक्ति होती है। भिक्षु इस लोक एवं परलोक के विषयों की भी आकांक्षा नहीं रखता है; किन्तु यदि उसकी उसके प्रति आकांक्षा हो, तो वह तदनुरूप ही हो जायेगा। अपने स्वरूप के अनुसंधान को त्यागकर दूसरे शास्त्रों का अभ्यास उसके लिए उसी तरह से बेकार है, जिस तरह से ऊँट की पीठ पर लदा हुआ केसर का भार। उस यति की योगशास्त्र में रुचि नहीं रहनी चाहिए। उसको सांख्य-शास्त्र का अभ्यास एवं मन्त्र-तन्त्र का व्यापार भी उचित नहीं है। यदि संन्यासी की रुचि अन्यान्य-शास्त्रों में होती है, तो वह सभी कुछ उसके लिए

१५३ नारदपरिव्राजकोपनिषद् मृतक को धारण कराये हुए आभूषणों के सदृश हैं। चर्मकार की तरह से सभी से अत्यधिक दूर रहकर कर्म- आचरण एवं विद्या से भी दूर रहना चाहिए। ॐकार का भी ऊँचे स्वर से कीर्तन नहीं करना चाहिए; क्योंकि व्यक्ति जो-जो कार्य करता है, उन-उन सबका फल भी उसे भुगतना पड़ता है। इस कारण सभी को अंडी (एरण्ड) के तेल के फेन की तरह से साररहित जानकर छोड़ देना चाहिए और परमात्मा के ध्यान में रत रहकर मनोमय दण्ड तथा हाथ रूपी पात्रों को ग्रहण करने वाले दिगम्बर (वस्त्ररहित) संन्यासी का दर्शन करके उसके आदर्श को अपने समक्ष रखकर संन्यासी सर्वत्र भ्रमण करे। वह बालक, मतवाला तथा पिशाचों की तरह से जीवन अथवा मृत्यु की इच्छा न करे। आज्ञापालक भृत्य (नौकर) की तरह से परिव्राजक को मात्र काल की ही प्रतीक्षा करते रहना चाहिए अर्थात् समय के अनुसार चलना चाहिए ॥ २५-२६॥ तितिक्षाज्ञानवैराग्यशमादिगुणवर्जितः। भिक्षामात्रेण जीवी स्यात्स यतिर्यतिवृत्तिहा ॥२७॥ न दण्डधारणेन न मुण्डनेन न वेषेण न दम्भाचारेण मुक्तिः ।॥ २८॥ ज्ञानदण्डो धृतो येन एकदण्डी स उच्यते। काष्ठदण्डो धृतो येन सर्वाशी ज्ञानवर्जितः। स याति नरकान्घोरान्महारौर- वसंज्ञितान् ॥ २९॥ प्रतिष्ठा सूकरीविष्ठासमा गीता महर्षिभिः । तस्मादेनां परित्यज्य कीटवत्पर्यटेद्यतिः ॥ ३० ॥ अयाचितं यथालाभं भोजनाच्छादनं भवेत् । परेच्छया च दिग्वासाः स्नानं कुर्यात्परेच्छया ॥ ३१ ॥ स्वप्नेऽपि यो हि युक्तः स्याज्जाग्रतीव विशेषतः। ईदृक्चेष्टः स्मृतः श्रेष्ठो वरिष्ठो ब्रह्मवादिनाम् ॥ ३२ ॥ अलाभे न विषादी स्याल्लाभे चैव न हर्षयेत्। प्राणयात्रिकमात्रः स्यान्मात्रासङ्गविवर्जितः ॥ ३३॥ अभिपूजितलाभांश्च जुगुप्सेतैव सर्वशः। अभिपूजितलाभैस्तु यतिर्मुक्तोऽपि बध्यते ॥ ३४॥ जो संन्यासी सहनशील, ज्ञान, वैराग्य तथा शम-दम आदि श्रेष्ठ गुणों से रहित रहते हुए भिक्षा मात्र से ही जीवनयापन करता है, वह संन्यासी संन्यासवृत्ति का हनन करने वाला कहा गया है। केवल दण्ड ग्रहण करने, सिर मुँड़ाने, विभिन्न तरह के वेश बनाने तथा प्रदर्शनात्मक दृष्टि से किसी भी तरह के आचरण करने से मुक्ति नहीं मिलती। जिस यति ने ज्ञान-स्वरूप दण्ड को ग्रहण किया है, वही एकदण्डी होता है। जिस संन्यासी ने लकड़ी का दण्ड तो धारण कर लिया है; लेकिन मन में सभी तरह की इच्छाओं को स्थान दे रखा है और जो सर्वथा ज्ञान से रहित है, वह संन्यासी महारौरव आदि नाम वाले भयानक नरक को प्राप्त होता है। महान् ऋषि- मनीषियों ने प्रतिष्ठा को शूक़री के मल (विष्ठा) के सदृश बतलाया है। इस कारण से संन्यासी प्रतिष्ठा को छोड़कर कृमि-कीटकों की तरह से यत्र-तत्र भ्रमण करता रहे। दिगम्बर (वस्त्र रहित) संन्यासी बिना याचना के जो कुछ प्राप्त हो जाए, वही भोजन करे तथा वैसे ही वस्त्रादि से अपने तन को ढककर रहे। वह अन्य दूसरों के कहने से वस्त्रों को धारण करे तथा दूसरों की ही इच्छा से स्नानादि सम्पन्न करे। जो संन्यासी स्वप्नावस्था में भी जाग्रदवस्था के सदृश ही विशेष रूप से सतर्क होकर के वैसी ही चेष्टा निरन्तर करता है, वही ब्रह्मवादियों में श्रेष्ठ माना गया है। भिक्षा आदि न प्राप्त होने पर विषाद नहीं करना चाहिए तथा भिक्षा के प्राप्त हो जाने पर अत्यधिक हर्षान्वित न हो जाए। भिक्षा उतनी ही स्वीकार करे, जितने से प्राणों की रक्षा हो सके। रूप, रस और शब्दादि विषयों की आसक्ति से सदैव दूर रहे। सम्मान मिलने को वह सभी तरह से घृणा की दृष्टि से ही देखे। सम्मान का लाभ प्राप्त करने वाला संन्यासी मुक्ति प्राप्त करने पर भी आबद्ध हो जाता है॥ २७-३४॥ [ऋषि ने आन्तरिक स्तर पर वैराग्य भाव न होने पर भी संन्यासी जैसा वेश बनाने की प्रवृत्ति को नर्क का मार्ग कहा है। दण्ड आत्मानुशासन का प्रतीक है। यदि वह न हो, तो उसे धारण करना व्यर्थ है। प्रतिष्ठा-सम्मान प्राप्त करने की

उपदेश ५ मन्त्र ४६ १५४ इच्छा को लोकैषणा कहा जाता है। कामासक्ति और अर्थासक्ति से छुटकारा पा लेने पर भी यथाशक्ति पीछा, नहीं छोड़ती। सम्मान की आकांक्षा के कारण सम्मान-सुविधा देने वालों के प्रति भी आसक्ति होने लगती है। आसक्ति ही बन्धन है, जो मुक्ति में बाधक है।] प्राणयात्रानिमित्तं च व्यङ्गारे भुक्तवज्जने। काले प्रशस्ते वर्णानां भिक्षार्थं पर्यटेद्गृहान् ॥ ३५ ॥ पाणिपात्रश्चरन्योगी नासकृद्भैक्षमाचरेत्। तिष्ठन्भुञ्ज्याच्चरन्भुञ्ज्यान्मध्येनाचमनं तथा ॥ ३६॥ अब्धिवद्भूतमर्यादा भवन्ति विशदाशयाः। नियतिं न विमुञ्चन्ति महान्तो भास्करा इव ॥ ३७॥ आस्येन तु यदाहारं गोवन्मृगयते मुनिः। तदा समः स्यात्सर्वेषु सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ ३८ ॥ अनिन्द्यं वै व्रजेद्गेहं निन्द्यं गेहं तु वर्जयेत्। अनावृते विशेद्द्वारि गेहे नैवावृते व्रजेत् ॥ ३९ ॥ पांसुना च प्रतिच्छन्नशून्यागारप्रतिश्रयः। वृक्षमूलनिकेतो वा त्यक्तसर्वप्रियाप्रियः ॥४०॥ जब चूल्हे की अग्नि बुझ जाए अर्थात् भोजन बनकर तैयार हो जाए और घर के सभी सदस्य भोजन प्राप्त कर लें, तब ऐसे ही उपयुक्त समय में संन्यासी श्रेष्ठ वर्ण वाले गृहस्वामियों के घर भिक्षार्थ गमन करे। भिक्षा का उद्देश्य केवल प्राण यात्रा का निर्वाह ही होना चाहिए। हाथों को ही पात्र रूप निर्मित करके भ्रमण करने वाला करपात्री संन्यासी बार-बार भिक्षा की याचना न करे। एक ही बार में जो कुछ प्राप्त हो जाए, उसे खड़े-खड़े ही ग्रहण कर ले या फिर चलते-चलते ही भोजन ग्रहण कर ले। हाथ का भोजन जब तक पूर्ण न हो जाए, बीच में जल कदापि ग्रहण न करे। संन्यासी को समुद्र के सदृश मर्यादित होकर के रहना चाहिए। उन श्रेष्ठ महाभाग का आशय महान् होता है। वे महान् रहकर सूर्य के सदृश अपने नियमों का उल्लंघन कभी नहीं करते। जिस समय संन्यासी मुनि गौ की तरह मुख से भोजन स्वीकार करने लगता है अर्थात् यदि कोई भी व्यक्ति उस यति के मुख में कुछ डाल दे, तब ही वह भोजन ग्रहण करता है। उस समय समस्त प्राणि-समुदाय के प्रति उसका समान भाव हो जाता है तथा वह अमृतत्व अर्थात् मुक्ति का अधिकारी हो जाता है। जो घर निन्दनीय न हो, वहीं भिक्षा ग्रहण हेतु जाये। निन्दित गृहों का परित्याग कर दे। जिस भवन का दरवाजा खुला हो, उसी में प्रवेश करे। जिसका दरवाजा बन्द हो, उस घर में उसे नहीं जाना चाहिए। धूल आदि से आच्छादित निर्जन भवनों में उसे आश्रय प्राप्त करना चाहिए। सभी प्रकार प्रिय एवं अप्रिय का परित्याग कर देना चाहिए॥ ३५-४०॥ यत्रास्तमितशायी स्यान्निरग्निरनिकेतनः। यथालब्धोपजीवी स्यान्मुनिर्दान्तो जितेन्द्रियः ॥ ४१ ॥ निष्क्रम्य वनमास्थाय ज्ञानयज्ञो जितेन्द्रियः। कालकाङ्क्षी चरन्नेव ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ४२ ॥ अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा चरति यो मुनिः। न तस्य सर्वभूतेभ्यो भयमुत्पद्यते क्वचित् ॥ ४३ ॥ निर्मानश्चानहंकारो निर्द्वन्द्वश्छिन्नसंशयः। नैव क्रुध्यति न द्वेष्टि नानृतं भाषते गिरा ॥ ४४ ॥ पुण्यायतनचारी च भूतानामविहिंसकः। काले प्राप्ते भवेद्भैक्षं कल्पते ब्रह्मभूयसे ॥ ४५ ॥ वानप्रस्थगृहस्थाभ्यां न संसृज्येत कर्हिचित्। अज्ञातचर्यां लिप्सेत न चैनं हर्ष आविशेत्। अध्वा सूर्येण निर्दिष्टः कीटवद्विचरेन्महीम् ॥ ४६ ॥ जहाँ सूर्यास्त हो जाए, संन्यासी को वहीं पर शयन करना चाहिए। अपने पास न तो कोई अग्नि ही रखे तथा न ही अपना कोई घर ही निर्माण करे। ईश्वरेच्छा से जो भी कुछ मिल जाए, उसी पर आश्रित होकर जीवन- यापन करे। मन तथा इन्द्रियों को सदैव अपने अंकुश में रखे। जो 'यति' अपने घर का परित्याग करके, वन का आश्रय प्राप्त करता है, अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हुए ज्ञान-यज्ञ का अनुष्ठान सम्पन्न करता है तथा काल की प्रतीक्षा करता हुआ निरन्तर विचरण करता है, ऐसा वह संन्यासी निश्चय ही ब्रह्म भाव को प्राप्त करने का