१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
१५० छान्दोग्योपनिषद् [ उस समय कोई भी जानकार होने का दम्भ नहीं करता था। स्वयं की कमियाँ अपने प्रशंसकों के बीच भी स्वीकार करके, योग्य पुरुषों के सान्निध्य लाभ का प्रयास किया जाता था। ] तान्होवाचाश्वपतिर्वै भगवन्तोऽयं कैकेयः संप्रतीममात्मानं वैश्वानरमध्यति तग् हन्ताभ्यागच्छामेति तग् हाभ्याजग्मुः ॥ ४ ॥ तत्पश्चात् आरुणि ने उनसे कहा कि हे पूजनीय गण ! इस समय केकय के पुत्र कैकेय कुमार अश्वपति इस आत्मरूप वैश्वानर को पूर्णरूपेण जानते हैं। अतः हम सब उन्हीं के पास चलें। इस प्रकार कहते हुए वे सभी श्रेष्ठ महागृहस्थ एवं परम श्रोत्रिय कैकेय कुमार (अश्वपति) के पास चले गये ॥ ४ ॥ तेभ्यो ह प्राप्तेभ्यः पृथगर्हाणि कारयांचकार स ह प्रातःसंजिहान उवाच न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपो नानाहिताग्निर्नाविद्वान्न स्वैरी स्वैरिणी कुतो यक्ष्यमाणो वै भगवन्तोऽहमस्मि यावदेकैकस्मा ऋत्विजे धनं दास्यामि तावद्भगवद्भ्यो दास्यामि वसन्तु भगवन्त इति ॥ ५ ॥ राजा अश्वपति ने अपने पास उपस्थित हुए उन सभी श्रेष्ठ ऋषियों का अलग-अलग स्वागत-सत्कार किया। दूसरे दिन प्रातःकाल होते ही राजा अश्वपति ने उनसे कहा कि 'मेरे राज्य में न कोई चोर है, न कोई मद्यपान करने वाला है, न कोई अनाहिताग्नि है, न कोई यहाँ अल्पज्ञानी है और न ही कोई पर स्त्री गमन करने वाला है, तो कुलटा स्त्री कैसे हो सकती है। हे पूज्य ऋषियो ! मैं (स्वयं) भी यज्ञ करने वाला हूँ। अतः आपसे प्रार्थना है कि हमारे यज्ञानुष्ठान तक यहीं निवास करने की कृपा करें। शास्त्रानुसार मैंने एक-एक ऋत्विक् को जितना धन प्रदान करने का संकल्प लिया है, उतना ही धन आप सभी को भी प्रदान करूँगा ॥ ते होचुर्येन हैवार्थेन पुरुषश्चरेत्तग् हैव वदेदात्मानमेवेमं वैश्वानरग् संप्रत्यध्येषि तमेव नो ब्रूहीति ॥ ६ ॥ वे समस्त ऋषिगण राजा अश्वपति से बोले कि 'जिस कार्य विशेष से कोई व्यक्ति कहीं प्रस्थान करता है, तो वहाँ उसे अपने उसी उद्देश्य को पूर्ण करना चाहिए'। अतः इस समय तो आप कृपा करके वैश्वानर आत्मा के सम्बन्ध में ही बताएँ ॥ ६ ॥ तान्होवाच प्रातर्वः प्रतिवक्तास्मीति ते ह समित्पाणयः पूर्वाह्ने प्रतिचक्रमिरे तान्हानुपनीयैवैतदुवाच ॥ ७ ॥ तब उन ऋषियों से राजा अश्वपति ने कहा कि 'अच्छा, मैं कल प्रातःकाल आप सभी को इसके सन्दर्भ में बताऊँगा। दूसरे दिन पूर्वाह्नकाल में वे सभी ऋषि हाथ में समिधाएँ ग्रहण किये हुए पहुँचे। उन सभी का बिना उपनयन किये ही (सुपात्र समझकर) राजा ने उन्हें वैश्वानर विज्ञान से युक्त उस विद्या को बताया ॥ ॥ द्वादशः खण्डः ॥ औपमन्यव कं त्वमात्मानमुपास्स इति दिवमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै सुतेजा आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्तव सुतं प्रसुतमासुतं कुले दृश्यते ॥ १ ॥ राजा अश्वपति ने उपमन्यु कुमार औपमन्यव से प्रश्न किया कि हे औपमन्यव ! आप किस आत्मा की उपासना करते हैं ? उत्तर देते हुए ऋषिकुमार प्राचीनशाल ने राजा से कहा कि हे भगवन् ! मैं द्युलोक की ही उपासना करता हूँ। राजा ने कहा कि "आप जिस आत्मा की उपासना करते हैं, वह निश्चय ही 'सुतेजा'
अध्याय ५ खण्ड १४ मन्त्र १ १५१
अध्याय ५ खण्ड १४ मन्त्र १ १५१ नाम से प्रसिद्ध श्रेष्ठ तेज युक्त वैश्वानर रूप आत्मा ही है, इसीलिए आपके कुल में सुत (अभिषुत सोम), प्रसूत (विशेषरूप से अभिषुत सोम) और आसुत (सर्वतोभावेन अभिषुत सोम) दृष्टिगोचर होते हैं, अर्थात् आपके परिवारी जन बड़े ही कर्मनिष्ठ (यज्ञनिष्ठ) हैं ॥ १ ॥ अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते मूर्धा त्वेष आत्मन इति होवाच मूर्धा ते व्यपतिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ राजा अश्वपति ने इसी क्रम में आगे फिर कहा कि आप अन्न का भक्षण करते हैं और पुत्र-पौत्रादि अपने प्रिय को देखते हैं। जो भी इस वैश्वानर रूप आत्मा की इस प्रकार उपासना करते हैं, वे अन्न का भक्षण और अपने श्रेष्ठ इष्ट का दर्शन करते हुए अपने कुल में ब्रह्मतेज से युक्त होते हैं। राजा ने यह भी कहा कि 'यदि आप हमारे पास न आये होते, तो आपका मस्तक गिर जाता' ॥ २ ॥ ॥ त्रयोदशः खण्डः ॥ अथ होवाच सत्ययज्ञं पौलूषिं प्राचीनयोग्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यादित्यमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै विश्वरूप आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्तव बहु विश्वरूपं कुले दृश्यते ॥ १ ॥ तत्पश्चात् राजा अश्वपति ने सत्ययज्ञ से प्रश्न किया कि हे प्राचीन योग्य ! आप किस आत्मा की उपासना करते हैं ? तब उस ऋषिकुमार ने कहा- 'हे पूज्य भगवन् ! मैं आदित्य की उपासना करता हूँ। राजा ने आश्वस्त होते हुए कहा कि अवश्य ही वह विश्वरूप वैश्वानर आत्मा है, जिसकी कि आप स्वयं उपासना करते हैं। यही कारण है कि आपके वंश में पर्याप्त मात्रा में विश्वरूप साधन दृष्टिगोचर होते हैं ॥ १ ॥ प्रवृत्तोऽश्वतरीरथो दासीनिष्कोऽत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते चक्षुष्टे तदात्मन इति होवाचान्धो- ऽभविष्यो यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ राजा ने कहा कि आपके पास हार से सुसज्जित दासियाँ एवं खच्चरों से जुता हुआ रथ भी विद्यमान है। आप अन्न का भक्षण और प्रिय-इष्ट का दर्शन करते हैं। ऐसे श्रेष्ठ वंश में ब्रह्मतेज का निवास रहता है, लेकिन यह आत्मा का ही चक्षु है। राजा अश्वपति ने पुनः कहा कि यदि आप मेरे पास न आये होते, तो निश्चित ही अपने दोनों नेत्रों से रहित हो जाते ॥ २ ॥ ॥ चतुर्दशः खण्डः ॥ अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं भाल्लवेयं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इति वायुमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै पृथग्वर्त्मात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वां पृथग्बलय आयन्ति पृथग्रथश्रेणयोऽनुयन्ति ॥ १ ॥ इसके बाद राजा अश्वपति ने भाल्लवेय इन्द्रद्युम्न से पूछा कि- हे वैयाघ्रपद्य ! आप किस आत्मा की उपासना करते हैं ? उसने कहा- 'हे भगवन् ! मैं वायुदेव की उपासना करता हूँ।' राजा ने पुनः कहा कि आप जिस श्रेष्ठ आत्मा की उपासना करते हैं, वह निश्चय ही पृथग्वर्त्मा (अलग-अलग मार्गों वाला आवह, उद्वह आदि भेदों से युक्त) वैश्वानर आत्मा है। इस कारण से आपके पास भिन्न- भिन्न (अन्न, वस्त्र आदि) उपहार आते हैं तथा आपके पीछे अलग-अलग रथ की श्रेणियाँ चलती हैं ॥ १ ॥
१५२ छान्दोग्योपनिषद अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते प्राणस्त्वेष आत्मन इति होवाच प्राणस्त उदक्रमिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ राजा ने उस ऋषि कुमार से कहा कि आप अन्न का भक्षण और अपने प्रिय-इष्ट का दर्शन करते हैं। जो भी कोई उचित रीति से इस वैश्वानर आत्मा की उपासना करता है, वह प्रिय का दर्शन एवं अन्न का भक्षण करता है तथा उसके कुल में ब्रह्मतेज का निवास रहता है। यह आत्मा का प्राण ही है, ऐसा कहते हुए राजा अश्वपति ने कहा कि यदि आप मेरे पास न आते, तो आपका प्राण ही निकल जाता' ॥ २ ॥ ॥ पञ्चदशः खण्डः॥ अथ होवाच जनः शार्कराक्ष्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्याकाशमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै बहुल आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वं बहुलोऽसि प्रजया च धनेन च ॥ १ ॥ इसके अनन्तर राजा अश्वपति ने शार्कराक्ष के पुत्र जन से कहा- हे शार्कराक्ष्य! आप किस आत्मा की उपासना करते हैं ? तब उस ऋषिकुमार ने कहा- 'हे पूज्य राजन्! मैं आकाश तत्त्व की ही उपासना करता हूँ। राजा ने पुन: कहा कि यह निश्चय ही बहुल संज्ञक (विभिन्न संज्ञाओं से युक्त) वैश्वानर आत्मा है। इसी से आप पुत्र -पौत्रादि के रूप में प्रजा और स्वर्णादि धन से परिपूर्ण हैं ॥ १ ॥ अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते संदेहस्त्वेष आत्मन इति होवाच संदेहस्ते व्यशीर्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ राजा ने फिर कहा कि आप अन्न का भक्षण और अपने प्रिय अर्थात् इष्ट का दर्शन करते हैं। जो इस वैश्वानर आत्मा की इस भाँति से उपासना करता है, वह अन्न का भक्षण एवं प्रिय का दर्शन करता है और उसके कुल में ब्रह्मतेज का निवास होता है। यह आत्मा का उदर (शरीर का मध्य भाग) ही है। आगे राजा अश्वपति ने यह भी कहा कि 'यदि आप मेरे पास न आते, तो आपका संदेह (शरीर का मध्य भाग अर्थात् उदर) ही नष्ट हो जाता' ॥ २ ॥ ॥ षोडशः खण्डः॥ अथ होवाच बुडिलमाश्वतराश्विं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यप एव भगवो राजन्निति होवाचैष वै रयिरात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वꣳ रयिमान्पुष्टिमानसि ॥ १ ॥ इसके पश्चात् राजा अश्वपति ने बुडिल से प्रश्न किया कि हे वैयाघ्रपद्य ! आप किस आत्मा की उपासना करते हैं ? तब उन ऋषि कुमार ने कहा- हे पूज्य भगवन् ! मैं तो जल तत्त्व की उपासना करता हूँ। राजा ने पुन: कहा कि 'आप जिस जल तत्त्व की उपासना करते हैं, वह निश्चय ही रयिवान् (धनवान् ) वैश्वानर आत्मा है। इसी कारण आप (धनवान्) रयिमान् एवं पुष्टिमान् हैं ॥ १ ॥ अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते बस्तिस्त्वेष आत्मन इति होवाच बस्तिस्ते व्यभेत्स्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ आप अन्न का भक्षण एवं प्रिय (इष्ट) का दर्शन करते हैं। जो मनुष्य इस वैश्वानर रूप आत्मा की उपासना इस तरह से करता है, वह अन्न का भक्षण एवं प्रिय का दर्शन करता है। उसके कुटुम्ब में ब्रह्मतेज का सान्निध्य होता है, किन्तु यह आत्मा का बस्ति (मूत्राशय) ही है। राजा अश्वपति ने यह भी कहा कि 'यदि आप हमारे पास न आते. तो आपका बस्ति स्थान (मत्राशय) ही फटकर नष्ट हो जाता' ॥२॥
अध्याय ५ खण्ड १८ मन्त्र २ १५३
अध्याय ५ खण्ड १८ मन्त्र २ १५३ ॥ सप्तदशः खण्डः ॥ अथ होवाचोद्दालकमारुणिं गौतम कं त्वमात्मानमुपास्स इति पृथिवीमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै प्रतिष्ठात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्त्वं प्रतिष्ठितोऽसि प्रजया च पशुभिश्च ॥ १॥ तदनन्तर राजा अश्वपति ने अरुण के पुत्र उद्दालक से प्रश्न किया कि 'हे गौतम ! आपने किस आत्मा की उपासना की है'? तब उन ऋषिकुमार ने उत्तर दिया कि हे राजन् ! मैं पृथ्वी तत्त्व की उपासना करता हूँ। राजा ने फिर कहा कि आप जिस तत्त्व की उपासना करते हैं, वह निश्चय ही प्रतिष्ठा संज्ञक (पगरूप) वैश्वानर आत्मा है। इसकी कृपा से आपको प्रजा एवं पशुओं की प्राप्ति हुई ॥ १ ॥ अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते पादौ त्वेतावात्मन इति होवाच पादौ ते व्यम्लास्येतां यन्मां नागमिष्य इति ॥ राजा ने कहा कि हे ऋषि कुमार ! आप अन्न का भक्षण करते हैं और प्रिय (इष्ट) का दर्शन करते हैं। आत्मा रूप वैश्वानर की जो इस भाँति उपासना करता है। वह अन्न का भक्षण और प्रिय का दर्शन करता है। उसके कुल में ब्रह्मतेज भी रहता है, किन्तु यह आत्मा के चरण ही हैं, इस प्रकार अश्वपति ने कहते हुए आगे यह भी कहा- यदि आप मेरे समक्ष न आते, तो आपके चरण अत्यन्त निष्क्रिय हो जाते ॥ २॥ ॥ अष्टादशः खण्डः ॥ तान्होवाचैते वै खलु यूयं पृथगिवेममात्मानं वैश्वानरं विद्वाꣳसोऽन्नमत्थ यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते स सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मस्वन्नमत्ति ॥ १ ॥ राजा अश्वपति ने उन सभी ऋषि कुमारों की संबोधित करते हुए कहा कि आप सभी इस वैश्वानर स्वरूप आत्मा को पृथक्-पृथक् जानते हुए अन्न खाते हैं। जो भी मनुष्य 'यही मैं हूँ' इस प्रकार अपने अहं का हेतु होने वाले इस प्रादेश मात्र (अर्थात् द्यु मूर्धा से लेकर पृथ्वी पाद पर्यन्त) अर्थात् वैश्वानर आत्मा की उपासना करता है, वह सभी लोकों में, सभी प्राणियों में और सभी आत्माओं में अन्न का भक्षण करता है॥ १ ॥ तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा संदेहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ॥ २ ॥ आगे राजा ने कहा कि इस वैश्वानर आत्मा का मस्तक ही द्युलोक है, नेत्र ही सूर्य है, प्राण ही वायु है, शरीर के बीच का भाग ही आकाश है, बस्ति ही जल है, पृथ्वी ही दोनों पैर हैं, वक्ष ही वेदी है, रोमकूप ही दर्भ (कुश) हैं, हृदय ही गार्हपत्याग्नि है, मन ही दक्षिणाग्नि है और मुँह ही आहवनीय अग्नि के समान है, क्योंकि इसी में अन्न का हवन होता है ॥ २ ॥ [ऋषि पुत्र विराट् वैश्वानर के एक-एक अंग की ही उपासना करते थे। किसी एक अंग में स्थित आत्मा की उपासना से आत्म तत्त्व की अनुभूति तो की जा सकती है, किन्तु उसे वहीं तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उस विराट् को यदि किसी अंग में सीमित करने की भूल की जायेगी, तो वह विराट् अपने सतत प्रवाह को बनाए रखने के लिए उस अंग विशेष को क्षति पहुँचा सकता है। इसीलिए राजा अश्वपति द्वारा ऋषि पुत्रों के अंग-विशेषों की हानि की संभावना व्यक्त की गयी थी।]
॥ एकोनविंशः खण्डः ॥
१५४ छान्दोग्योपनिषद् ॥ एकोनविंशः खण्डः ॥ तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीय०स यां प्रथमामाहुतिं जुहुयात्तां जुहुयात्प्राणाय स्वाहेति प्राणस्तृप्यति ॥ १ ॥ इस प्रकार जो पक्वान्न (पकाया हुआ भोजन) भोजनार्थ सर्वप्रथम आये, उससे यज्ञ करना चाहिए। वह प्रथम आहुति जो "प्राणाय स्वाहा" मन्त्र के साथ समर्पित की जाती है, उससे प्राण तृप्त होता है ॥ १ ॥ प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति चक्षुषि तृप्यत्यादित्यस्तृप्यत्यादित्ये तृप्यति द्यौस्तृप्यति दिवि तृप्यन्त्यां यत्किंच द्यौश्चादित्यश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ प्राण के तृप्त होते ही चक्षु तृप्त होते हैं, चक्षुओं के तृप्त होने पर सूर्य तृप्त होता है, सूर्य के तृप्त होते ही द्युलोक तृप्त होता है। द्युलोक के तृप्त होते ही जिस किसी पर द्युलोक और आदित्य (स्वामिभाव से) प्रतिष्ठित हैं, वह भी तृप्त होता है। उसके तृप्त होने पर स्वयं भोजन करने वाला प्रजा, पशु, अन्न आदि के साथ तेज (शारीरिक) कान्ति और ब्रह्मतेज (ज्ञानजन्य तेज) द्वारा तृप्त होता है ॥ २ ॥ ॥ विंशः खण्डः ॥ अथ यां द्वितीयां जुहुयात्तां जुहुयाद्व्यानाय स्वाहेति व्यानस्तृप्यति ॥ १ ॥ इसके पश्चात् जो दूसरी आहुति समर्पित की जाए, उस समय 'व्यानाय स्वाहा' मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। इस प्रकार से व्यान को तृप्ति प्राप्त होती है ॥ १ ॥ व्याने तृप्यति श्रोत्रं तृप्यति श्रोत्रे तृप्यति चन्द्रमास्तृप्यति चन्द्रमसि तृप्यति दिशस्तृप्यन्ति दिक्षु तृप्यन्तीषु यत्किंच दिशश्च चन्द्रमाश्चाधितिष्ठन्ति तत्तृप्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ व्यान के तृप्त होते ही कर्णेन्द्रिय तृप्त होती है, श्रोत्र के तृप्त होने पर चन्द्रमा तृप्त होता है, चन्द्रमा के तृप्त होने पर दिशाएँ एवं दिशाओं के तृप्त होने पर जिस किसी पर चन्द्रमा एवं दिशाएँ (स्वामिभाव से) स्थित हैं, वह निश्चय ही तृप्त होता है। उसकी तृप्ति के बाद वह भोक्ता (भोजन करने वाला) प्रजा, पशु, अन्न आदि के साथ तेज एवं ब्रह्मतेज द्वारा तृप्ति को प्राप्त करता है ॥ २ ॥ ॥ एकविंशः खण्डः ॥ अथ यां तृतीयां जुहुयात्तां जुहुयादपानाय स्वाहेत्यपानस्तृप्यति ॥ १ ॥ तत्पश्चात् तृतीय आहुति 'अपानाय स्वाहा' मंत्र के साथ देनी चाहिए। इससे अपान तृप्त होता है ॥ १ ॥ अपाने तृप्यति वाक्तृप्यति वाचि तृप्यन्त्यामग्निस्तृप्यत्यग्नौ तृप्यति पृथिवी तृप्यति पृथिव्यां तृप्यन्त्यां यत्किंच पृथिवी चाग्निश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ 'अपान' के तृप्त होते ही वागिन्द्रिय तृप्ति को प्राप्त होती है, वाणी के तृप्त होने पर अग्नि को तृप्ति मिलती है, अग्नि के तृप्त होते ही पृथ्वी को तृप्ति प्राप्त होती है एवं पृथ्वी के तृप्त होने पर जिस किसी पर पृथिवी और अग्नि (स्वामिभाव से) स्थित हैं, वह तृप्त होता है, तत्पश्चात् प्रजा, पशु, अन्न, तेज और ब्रह्मतेज के द्वारा तृप्ति को प्राप्त करता है ॥ २ ॥
अध्याय ५ खण्ड २४ मन्त्र ३ १५५
अध्याय ५ खण्ड २४ मन्त्र ३ १५५ ॥ द्वाविंशः खण्डः ॥ अथ यां चतुर्थीं जुहुयात्तां जुहुयात्समानाय स्वाहेति समानस्तृप्यति ॥ १ ॥ तत्पश्चात् चतुर्थ आहुति 'समानाय स्वाहा' मन्त्र के साथ देनी चाहिए। इससे 'समान' तृप्त होता है ॥ समाने तृप्यति मनस्तृप्यति मनसि तृप्यति पर्जन्यस्तृप्यति पर्जन्ये तृप्यति विद्युत्तृप्यति विद्युति तृप्यन्त्यां यत्किंच विद्युच्च पर्जन्यश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ समान के तृप्त होते ही मन को तृप्ति मिलती है, मन के तृप्त होते ही पर्जन्य तृप्त होता है और पर्जन्य के तृप्त होने पर विद्युत् को तृप्ति प्राप्त होती है। विद्युत् के तृप्त होने पर वह स्वयं भी तृप्त हो जाता है, जिस पर पर्जन्य एवं विद्युत् आश्रित हैं। उसकी तृप्ति के पश्चात् प्रजा, पशु, अन्न के साथ तेज एवं ब्रह्मतेज द्वारा उपभोग करने वाला (भोक्ता) भी तृप्त हो जाता है ॥ २ ॥ ॥ त्रयोविंशः खण्डः ॥ अथ यां पञ्चमीं जुहुयात्तां जुहुयादुदानाय स्वाहेत्युदानस्तृप्यति ॥ १ ॥ तदनन्तर पाँचवीं आहुति समर्पित की जाए। यह आहुति 'उदानाय स्वाहा' मंत्र से देनी चाहिए। इस प्रकार के यजन कृत्य से उदान तृप्त होता है ॥ १ ॥ उदाने तृप्यति त्वक् तृप्यति त्वचि तृप्यन्त्यां वायुस्तृप्यति वायौ तृप्यत्याकाश- स्तृप्यत्याकाशे तृप्यति यत्किंच वायुश्चाकाशश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानुतृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ तदनन्तर उदान के तृप्त होने से त्वचा की तृप्ति होती है, त्वचा के तृप्त होने से वायु तृप्त होता है, वायु के तृप्त होने पर आकाश को तृप्ति मिलती है और आकाश के तृप्त होने से जिस किसी पर वायु और आकाश (स्वामिभाव से) स्थित होते हैं, वह निश्चय ही तृप्त हो जाता है। उसके तृप्त होने पर वह स्वयं भोक्ता (भोजन करने वाला) प्रजा, पशु, अन्न, तेज और ब्रह्मतेज द्वारा तृप्त हो जाता है ॥ २ ॥ ॥ चतुर्विंशः खण्डः ॥ स य इदमविद्वानग्निहोत्रं जुहोति यथाङ्गारानपोह्य भस्मनि जुहुयात्तादृक्तत्स्यात् ॥ १ ॥ जो कोई इस उपर्युक्त वैश्वानर विद्या को बिना जाने ही यजन कृत्य करता है, उसके द्वारा किया हुआ यजन कृत्य ठीक उसी प्रकार है, जैसे कि आग के अंगारों को हटाकर भस्म में किया गया यज्ञ कार्य ॥ १ ॥ अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मसु हुतं भवति ॥ २ ॥ उपर्युक्त बताये हुए क्रम के अनुसार जो इस वैश्वानर विद्या को भली-भाँति जानकर यज्ञ कार्य (अग्निहोत्र) सम्पन्न करता है, उसके द्वारा सभी लोक, समस्त प्राणिसमुदाय एवं सम्पूर्ण आत्माओं के निमित्त यजन कार्य सम्पन्न हो जाता है ॥ २ ॥ तद्यथेषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवं हास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति ॥ ३ ॥
१५६ छान्दोग्योपनिषद् इस सन्दर्भ में यह उल्लेख भी है कि जिस तरह सींक का अग्रभाग अग्नि में प्रवेश करा देने से अतिशीघ्र जल जाता है, ठीक उसी तरह से जो यजमान इस भाँति जानने में समर्थ होकर यज्ञ कृत्य सम्पन्न करता है, उसके सभी प्रकार के पाप जलकर नष्ट हो जाते हैं ॥ ३ ॥ तस्मादु हैवंविद्यद्यपि चण्डालायोच्छिष्टं प्रयच्छेदात्मनि हैवास्य तद्वैश्वानरे हुतꣳस्यादिति तदेष श्लोकः ॥ ४ ॥ इस विद्या का जानकार यदि भोजन से उच्छिष्ट (बचा हुआ) पदार्थ चाण्डाल को दे, तो वह कृत्य आत्मा रूप वैश्वानर में यज्ञ करने के समान है। प्रस्तुत विषय में यह मन्त्र कहा गया है॥ ४ ॥ यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते। एवꣳसर्वाणि भूतान्यग्निहोत्रमुपासत इत्यग्निहोत्रमुपासत इति ॥ ५ ॥ जिस भाँति इस संसार में क्षुधित बालक सब प्रकार से माँ की उपासना (प्रतीक्षा) करते हैं। ठीक उसी भाँति संसार के समस्त प्राणि-समुदाय इस ज्ञानी के हव्य रूप यजन कृत्य की उपासना करते हैं ॥ ५ ॥ ॥ अथ षष्ठोऽध्यायः ॥ ॥ प्रथमः खण्डः ॥ पाँचवें अध्याय में यह बताया गया है कि अग्निहोत्र के यथार्थ स्वरूप की जानकारी रखने वाले एक विशेषज्ञ के कार्य से सभी प्राणि-समुदाय तृप्त हो जाते हैं; किन्तु ऐसी सम्भावना तभी की जा सकती है, जब समस्त प्राणियों में एक ही आत्मा का आधिपत्य स्थापित हो। प्रस्तुत विषय का विस्तार से इस छठे अध्याय में उल्लेख किया गया है- श्वेतकेतुर्हारुणेय आस तꣳ ह पितोवाच श्वेतकेतो वस ब्रह्मचर्यम्। न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ॥ १ ॥ अरुण के पौत्र श्वेतकेतु को उसके पिता (उद्दालक) ने ब्रह्मचर्य के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए उसे ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश की अनुमति प्रदान की। उसके पिता ने उसे संबोधित करते हुए कहा कि हमारे वंश में जन्म लेने वाला कोई भी बालक ब्रह्म विद्या के अध्ययन के बिना ब्रह्मबन्धु की भाँति नहीं होता ॥ [ ब्रह्म बन्धु उसे कहते हैं, जो ब्राह्मणों जैसा आचरण नहीं कर पाता; किन्तु उनसे सम्बद्ध होता है। ऋषि के कथन का भाव है कि उनके कुल में सभी आचरण निष्ठा ब्रह्मज्ञ होते हैं। ] स ह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः सर्वान्वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय तꣳ ह पितोवाच श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यः ॥ इस प्रकार से उसके पिता द्वारा उपदेश दिये जाने पर श्वेतकेतु ने मात्र १२ वर्ष की उम्र में ही अपने आचार्य के सान्निध्य में उपस्थित रहकर २४ वर्ष की उम्र तक वेदों का अध्ययन-अनुशीलन किया। तत्पश्चात् वह स्वयं को बड़ा अध्ययनरत एवं विद्वान् अनुभव करते हुए स्वाभिमान के साथ पिता के सामने उपस्थित हुआ। पिता ने विपरीत स्वभाव वाले उद्दण्ड श्वेतकेतु से कहा- “क्या तुमने अपने आचार्य से परब्रह्म का उपदेश (ज्ञान) प्राप्त कर लिया है।" ॥ २ ॥ येनाश्रुतꣳ श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति। कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति ॥ ३ ॥
अध्याय ६ खण्ड २ मन्त्र २ १५७
अध्याय ६ खण्ड २ मन्त्र २ १५७ श्वेतकेतु के पिता उद्दालक ने पुनः उससे पूछा कि जिसके द्वारा अश्रुत (न सुना हुआ) श्रुत (सुना हुआ) हो जाता है, तर्क न करने वाला तर्क की विद्या में पारंगत हो जाता है; अविज्ञात (रहस्य से युक्त) विशेष रूप से ज्ञात हो जाता है, क्या यह सभी उपदेश तुम्हारे आचार्य ने तुम्हें प्रदान किए हैं। यह सुनकर श्वेतकेतु ने पूछा- भगवन् ! यह उपदेश कैसा है? ॥ ३ ॥ यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातँस्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥ ४ ॥ उसके पिता ने पुनः कहा - हे सोम्य ! जिस प्रकार एक मृत्तिका पिण्ड से समस्त मिट्टी के बने हुए पदार्थों का बोध हो जाता है। वस्तुतः विभिन्न प्रकार के नाम तो केवल वाणी के ही विकार हैं। सत्य तो केवल एक मृत्तिका ही है॥ ४॥ यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातँस्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं लोहमित्येव सत्यम् ॥ ५ ॥ उन्होंने कहा- हे सोम्य ! जैसे एक सुवर्ण पिण्ड द्वारा दूसरे अन्य सुवर्ण के पदार्थों (आभूषणों) का विशेष ज्ञान प्राप्त हो जाता है, क्योंकि विकार तो केवल वाणी के आश्रित नाम मात्र ही हैं, सुवर्ण ही एक मात्र सत्य है॥ ५ ॥ यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञातः स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं कृष्णायसमित्येव सत्यमेवँ सोम्य स आदेशो भवतीति ॥ ६ ॥ हे सोम्य ! जिस तरह एक नख कर्तन करने वाली लोहे की नहनी के ज्ञान से समस्त लौह पदार्थों को भली- भाँति जान लिया जाता है। विकार (नाम) तो वाणी के निमित्त विषय हैं, सत्य तो केवल एक लोहा ही है॥ ६ ॥ न वै नूनं भगवन्तस्त एतदवेदिषुर्यद्ध्येतदवेदिष्यन् कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवाँस्त्वेवमेतद्ब्रवीत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७॥ अपने पिता के इस प्रकार के वचनों को सुन कर श्वेतकेतु ने कहा- हे भगवन् ! वे मेरे पूज्य गुरुदेव इस ज्ञान को निश्चित ही नहीं जानते। यदि वे जानते, तो मुझसे क्यों न कहते। अतः हे भगवन् ! आप ही इसका उपदेश करें। तब उद्दालक ने कहा- ' अच्छा सोम्य ! मैं तुम्हें बतलाता हूँ' ॥ ७॥ ॥ द्वितीयः खण्डः ॥ सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेक- मेवाद्बितीयं तस्मादसत: सज्जायत ॥ १ ॥ उद्दालक ने श्वेतकेतु को उपदेश करते हुए कहा- हे प्रिय सोम्य ! प्रारम्भ में एक मात्र अद्वितीय सत् ही था। उसके संदर्भ में कुछ लोग इस प्रकार कहते हैं कि आरम्भ में मात्र अद्वितीय असत् ही था और उस असत् से ही सत् की उत्पत्ति हुई ॥ १ ॥ कुतस्तु खलु सोम्यैव ः स्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति। सत्त्वेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ॥ २ ॥ उद्दालक ने कहा- हे सोम्य ! परन्तु यह कैसे हो सकता है? असत् से सत् की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? हे सोम्य ! वास्तव में प्रारम्भिक अवस्था में यह एक मात्र अद्वितीय सत् ही था ॥ २ ॥
१५८ छान्दोग्योपनिषद् तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत। तत्तेज ऐक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति तदपोऽसृजत। तस्माद्यत्र क्वच शोचति स्वेदते वा पुरुषस्तेजस एव तदध्यापो जायन्ते ॥ ३ ॥ आगे उसके पिता ने कहा- "उस (सत्) ने संकल्प किया कि मैं विभिन्न रूपों में उत्पन्न हो जाऊँ।" इस प्रकार इच्छा करते ही उस (सत्) से तेज की उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् उस तेज ने संकल्प किया कि 'मैं भी बहुत हो जाऊँ।" ऐसा संकल्प लेते ही उस (तेज) ने अप् तत्त्व (जल) की रचना की। अतः जब किसी को सन्ताप होता है, तो पसीना आ जाता है। उस समय उस तेज से ही जल की उत्पत्ति हो जाती है ॥ ३ ॥ ता आप ऐक्षन्त बह्व्यः स्याम प्रजायेमहीति ता अन्नमसृजन्त। तस्माद्यत्र क्वच वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवत्यद्भ्य एव तदध्यन्नाद्यं जायते ॥ ४ ॥ तदनन्तर उस आपः (जल) ने अपनी इच्छा व्यक्त की "मैं बहुत होकर उत्पन्न हो जाऊँ।" उस (जल) ने पृथ्वी रूपी अन्न की रचना की। इस कारण से जहाँ- कहीं वर्षा होती है, वहीं बहुत से अन्न की उत्पत्ति होती है। अतः विभिन्न प्रकार के अन्न जल से ही उत्पन्न होते हैं ॥ ४ ॥ [ऋषि पहले (अध्याय ५ में) स्पष्ट कर चुके हैं कि सृष्टि सृजनक्रम में पहली आहुति द्युलोक में हुई। सत् तेज बना- द्युलोक तेजस् का ही लोक कहा गया है। इस सृजन संकल्प युक्त तेजस् को ही वेद ने हिरण्यगर्भ कहा है। संकल्प पूर्वक उस तेजस् के विभाजन से अप् तत्त्व का प्रादुर्भाव हुआ। इसे वेद ने सृष्टि का मूल क्रियाशील प्रवाह माना है। जिसे द्युलोक का जल भी कह सकते हैं। इस अप् प्रवाह के संकल्प से अति सूक्ष्म पदार्थ कण (सब एटामिक पार्टिकल्स) बने, जिन्हें द्युलोक का पृथ्वी तत्त्व कह सकते हैं। दूसरे चरण में तेजस् सूर्यादि के रूप में व्यक्त हुआ। उस तेजस् के अप् तत्त्व में संघात से अन्तरिक्ष में परमाणु कणों और जल की उत्पत्ति हुई। उस जल और सूक्ष्म कणों के संयोग से स्थूल कणों के रूप में पृथ्वी तत्त्व बना। ऋषि दोनों चरणों की प्रक्रिया देखते हैं, इसलिए उनके कथन में, तेज, अप्, पृथ्वी आदि के सूक्ष्म-स्थूल, दृश्य-अदृश्य दोनों भाव मिले हुए हैं। उसी दृष्टि से उनके कथन का अर्थ स्पष्ट हो सकता है।] ॥ तृतीयः खण्डः ॥ तेषां खल्वेषां भूतानां त्रीण्येव बीजानि भवन्त्याण्डजं जीवजमुद्भिज्जमिति ॥ १ ॥ (तदनन्तर उद्दालक ने सृष्टि क्रम समझाते हुए श्वेतकेतु से और स्पष्ट करते हुए कहा-) इन ख्याति प्राप्त प्राणियों के तीन ही बीज अण्डज, जरायुज और उद्भिज्ज होते हैं ॥ १ ॥ सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणीति ॥ २ ॥ उस (सत्रूपी) देवता ने अपनी प्रचण्ड इच्छाशक्ति के माध्यम से संकल्प किया कि मैं इस "जीवात्मरूप से" इन तीनों (तेज, अप् एवं पृथ्वी) देवताओं में अनुप्रवेश कर नाम एवं उसके रूप को प्रकट करूँ ॥ २ ॥ तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणीति सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत् ॥ ३ ॥ और उन सभी में से एक-एक देवता को त्रिवृत् अर्थात् तीन-तीन भागों में विभाजित करूँ। इस प्रकार का संकल्प करते हुए इस देवता ने जीवात्मरूप से उन तीनों देवों में प्रवेश करते हुए उनके नाम एवं रूप को स्पष्ट किया ॥ ३ ॥
अध्याय ६ खण्ड ४ मन्त्र ६ १५९
अध्याय ६ खण्ड ४ मन्त्र ६ १५९ तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकामकरोद्यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवतास्त्रि- वृत्तृिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥४॥ उस देवता ने उन सभी में से हर एक को अलग-अलग त्रिवृत् अर्थात् तीन भागों में किया। हे पुत्र! जिस प्रकार ये तीनों देवता एक-एक करके (हर एक) त्रिवृत् (कारण, सूक्ष्म एवं स्थूल रूप ) हैं, वह मैं जानता हूँ ॥४॥ ॥ चतुर्थः खण्डः ॥ यदग्ने रोहितꣳ रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागादग्नेरग्नित्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ १॥ तीन प्रकार से अलग-अलग की हुई अग्नि का जो रोहित (लाल) वर्ण है, वह तेज प्रकाश का ही रूप है। जो श्वेत वर्ण है, वह जल तत्त्व का रूप है और जो कृष्ण वर्ण है, वह अन्न तत्त्व का रूप है। इस भाँति अग्नि से अग्नित्व पृथक् हो गया, क्योंकि 'अग्नि' शब्द तो मात्र विकार वाणी से कहने के लिए नाम मात्र है। सत्य तो मात्र तीन रूप ही हैं॥ १॥ यदादित्यस्य रोहितꣳरूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्या- पागादादित्यादादित्यत्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ २॥ आदित्य का जो रोहित (लालिमा युक्त) वर्ण है, वह प्रकाश का ही रूप है, जो शुक्ल वर्ण है, वह जल तत्त्व का रूप है और जो कृष्ण वर्ण है, वह अन्न (पृथ्वी) का रूप है। अतः आदित्य से आदित्यत्व अलग हो गया, क्योंकि आदित्य रूप विकार वाणी पर आश्रित नाम मात्र है, मात्र तीन रूप ही सत्य स्वरूप हैं॥ २॥ यच्चन्द्रमसो रोहितꣳ रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापा- गाच्चन्द्राच्चन्द्रत्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ ३ ॥ चन्द्रमा में जो रोहित वर्ण है, वह प्रकाश का रूप है, जो श्वेत वर्ण है, वह जल का है और जो कृष्ण वर्ण है, वह अन्न (पृथ्वी) का रूप है। इस तरह चन्द्रमा चन्द्रत्व से निवृत्त हो गया। अतः विकार वाणी पर आश्रित नाम मात्र ही है, सत्य तो मात्र केवल तीन रूप ही हैं॥ ३॥ यद्विद्युतो रोहितꣳ रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागाद्विद्युतो विद्युत्त्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ ४ ॥ विद्युत् का जो लाल वर्ण है, वह एक मात्र तेज (प्रकाश) का ही रूप है। जो शुक्ल वर्ण है, वह जल का स्वरूप है और जो काला वर्ण है वह अन्न (पृथ्वी) का रूप है। इसलिए विद्युत् से विद्युत्त्व अलग हो गया, क्योंकि विद्युत् रूप विकार वाणी पर आश्रित नाम मात्र ही है, तीन रूप ही केवल सत्य हैं॥ ४॥ एतद्ध स्म वै तद्विद्वाꣳस आहुः पूर्वे महाशाला महाश्रोत्रिया न नोऽद्य कश्चनाश्रुत- ममतमविज्ञातमुदाहरिष्यतीति ह्येभ्यो विदांचक्रुः ॥ ५॥ इस प्रकार (त्रिवृत् के वर्गीकरण) का ज्ञान रखने वाले अतीतकालीन महागृहस्थ और महाश्रोत्रियों ने कहा कि वर्तमान काल में हमारे वंश में कोई बात अश्रुत और अविज्ञात है- ऐसा कोई भी नहीं कहेगा। अतः इन अग्नि आदि तत्त्वों के उदाहरण द्वारा वे लोग सभी कुछ जानते थे ॥ ५॥ यदु रोहितमिवाभूदिति तेजसस्तद्रूपमिति तद्विदाञ्चक्रुर्यदु शुक्लमिवाभूदित्यपां रूपमिति तद्विदाञ्चक्रुर्यदु कृष्णमिवाभूदित्यन्नस्य रूपमिति तद्विदांचक्रुः ॥ ६॥
१६० छान्दोग्योपनिषद् जो कुछ उन्हें रोहित सा (लाल रंग की भाँति) प्रतीत होता है, वह तेज का ही रूप है, जो कुछ शुक्ल सा प्रतीत होता है, वह जल का रूप है तथा जो काला रंग है, वह अन्न (पृथ्वी) का रूप है, ऐसे सभी रूपों की जानकारी उन्होंने प्राप्त की ॥ ६ ॥ यद्विज्ञातमिवाभूदित्येतासामेव देवतानाः समास इति तद्विदांचक्रुर्यथा नु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥ ७ ॥ इसके अतिरिक्त जो कुछ भी विशेष रूप से स्वीकार नहीं किया गया, वह भी इन तीनों देवों का ही समूह है, ऐसी जानकारी उन्होंने प्राप्त की। उद्दालक ने कहा- हे सोम्य ! मेरे द्वारा यह जानो, कि किस प्रकार ये तीनों देवता शरीर एवं इन्द्रियों के संघात रूप पुरुषत्व को प्राप्त करके तीन प्रकार से पृथक्-पृथक् हो जाते हैं। (यह क्रम अगले खण्ड में स्पष्ट किया गया है।) ॥ ७ ॥ ॥ पञ्चमः खण्डः ॥ अन्नमशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तत्पुरीषं भवति यो मध्यमस्तन्मांसं योऽणिष्ठस्तन्मनः ॥ १ ॥ जो अन्न भोजन के रूप में ग्रहण किया जाता है, वह तीन भागों में बँट जाता है। उस अन्न का जो स्थूलतम पदार्थ है, वह मल रूप में परिवर्तित हो जाता है, जो मध्यम अंश है, वह रसादि से युक्त होकर मांस के रूप में परिवर्तित हो जाता है और जो अति सूक्ष्म है, वह मन के रूप में परिणत हो जाता है ॥१॥ आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते तासां यः स्थविष्ठो धातुस्तन्मूत्रं भवति यो मध्यमस्तल्लोहितं योऽणिष्ठः स प्राणः ॥ २ ॥ जो जल ग्रहण किया जाता है, वह तीन प्रकार से विभक्त हो जाता है। उस (जल) का स्थूल भाग मूत्र बनता है, मध्यम अंश रक्त के रूप में परिवर्तित हो जाता है और सूक्ष्म अंश प्राण बन जाता है ॥ २ ॥ तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तदस्थि भवति यो मध्यमः स मज्जा योऽणिष्ठः सा वाक् ॥ ३ ॥ जो तेज ग्रहण किया जाता है, वह भी तीन रूपों में विभाजित हो जाता है। उस (तेज) का स्थूल भाग हड्डी के रूप में, मध्यम भाग मज्जा के रूप में और अत्यन्त सूक्ष्म अंश वाणी के रूप में परिणत हो जाता है ॥ अन्नमयः हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ४ ॥ उद्दालक ने पुनः कहा- 'हे सोम्य ! अन्न का कार्य मन, जल का कार्य प्राण और तेज का कार्य वाणी है।' श्वेतकेतु ने कहा- 'हे भगवन् ! आप कृपा करके यह बात पुनः स्पष्ट करने की कृपा करें।' तब उद्दालक ने फिर से मार्गदर्शन देने हेतु उसे आश्वस्त किया ॥ ४ ॥ ॥ षष्ठः खण्डः ॥ दध्नः सोम्य मध्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तत्सर्पिर्भवति ॥ १ ॥ श्वेतकेतु के पिता उद्दालक ने पुनः कहा- हे सोम्य ! दही को मथने के पश्चात् उसका जो सूक्ष्म भाग एकत्रित होता है, वही ऊर्ध्व की ओर गमन करते हुए घृत के रूप में परिणत होता है ॥ १ ॥
अध्याय ६ खण्ड ७ मन्त्र ३ १६१
अध्याय ६ खण्ड ७ मन्त्र ३ १६१ एवमेव खलु सोम्यान्नस्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तन्मनो भवति ॥ २ ॥ हे सोम्य ! ठीक इसी तरह अन्न को पूर्ण रूप से ग्रहण करने के पश्चात् उसका जो सूक्ष्मतम भाग एकत्रित होता है, वही ऊर्ध्व की ओर गमन करते हुए मन रूप में परिणत होता है ॥ २ ॥ अपा१५ सोम्य पीयमानानां योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति स प्राणो भवति ॥ ३ ॥ हे सोम्य ! पान किये हुए जल का जो सूक्ष्मतम भाग है, वही ऊपर आकर एकत्रित होता है। तत्पश्चात् वही ऊपर आया हुआ भाग प्राण तत्त्व के रूप में परिवर्तित हो जाता है ॥ ३ ॥ तेजसः सोम्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति सा वाग्भवति ॥ ४ ॥ हे सोम्य ! इसी प्रकार ग्रहण किये हुए तेज का सूक्ष्मतम भाग सार रूप से ऊपर आ जाता है, वही वाणी के रूप में प्रकट होता है ॥ ४ ॥ अन्नमय१५हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ५ ॥ इस प्रकार उद्दालक ने श्वेतकेतु से कहा- हे प्रिय सोम्य ! मन अन्न के रूप में, प्राण जल के रूप में और वाणी तेजोमय रूप में है। तदनन्तर ऐसा श्रवण करते हुए श्वेतकेतु ने पुनः निवेदन किया- हे भगवन् ! कृपया आप मुझे पुनः समझाने की कृपा करें। इस पर उसके पिता ने बताने का पुनः आश्वासन दिया ॥ ५ ॥ ॥ सप्तमः खण्डः ॥ षोडशकलः सोम्य पुरुषः पञ्चदशाहानि माशीः काममपः पिबापोमयः प्राणो न पिबतो विच्छेत्स्यत इति ॥ १ ॥ (उद्दालक ने कहा) - हे सोम्य ! यह मनुष्य सोलह कलाओं से युक्त है। इसलिए तुम पन्द्रह दिन तक भोजन न ग्रहण करते हुए इच्छानुसार मात्र जल का ही सेवन करो। चूँकि प्राण, जल रूप है, अतः मात्र जल के सेवन से उस (प्राण) का नाश नहीं होगा ॥ १ ॥ स ह पञ्चदशाहानि नाशाथ हैनमुपससाद किं ब्रवीमि भो इत्यृचः सोम्य यजूं१षि सामानीति स होवाच न वै मा प्रतिभान्ति भो इति ॥ २ ॥ तदनन्तर श्वेतकेतु ने पंद्रह दिन तक भोजन नहीं ग्रहण किया। इसके बाद वह अपने पिता के समीप आकर बोला- हे भगवन् ! मैं क्या करूँ। तब उसके पिता आरुणि ने कहा- हे सोम्य ! तुम ऋक्, यजुः और साम के मन्त्रों का उच्चारण करो । उसने कहा- भगवन् ! मेरे मन में उन सभी की प्रतीति नहीं हो रही है ॥२ ॥ त१५ होवाच यथा सोम्य महतो ऽभ्याहितस्यैकोऽङ्गारः खद्योतमात्रः परिशिष्टः स्यात्तेन ततोऽपि न बहु दहेदेव१५सोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलातिशिष्टा स्यात्तयैतर्हि वेदान्नानुभवस्यशानाथ मे विज्ञास्यसीति ॥ ३ ॥ तब उद्दालक ने कहा - हे सोम्य ! जैसे पर्याप्त परिमाण में ईंधन के प्रज्वलित होने पर आग का खद्योत के समान एक छोटा सा अंगारा शेष रह जाए, तो वह अधिक गर्मी नहीं प्रदान कर सकता। वैसे ही तुम्हारी षोडश (सोलह) कलाओं में से मात्र एक ही कला शेष है। इसलिए मात्र एक कला से तुम वेद का अध्ययन- अनुशीलन नहीं कर सकते हो। अतः अब तुम भोजन ग्रहण करो, तभी तुम्हारी समझ में आयेगा ॥ ३ ॥
१६२ छान्दोग्योपनिषद् स हाशाथ हैनमुपससाद तꣳह यत्किञ्च पप्रच्छ सर्वꣳह प्रतिपेदे ॥ ४ ॥ तत्पश्चात् श्वेतकेतु ने अपने पिता के कहने पर भोजन ग्रहण किया। भोजन करने के उपरान्त वह अपने पिता के पास उपस्थित हुआ। पिता ने जो भी पूछा, उसे सब कुछ स्मरण हो गया॥ ४॥ तꣳहोवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकमङ्गारं खद्योतमात्रं परिशिष्टं तं तृणैरुपसमाधाय प्राज्वलयेत्तेन ततोऽपि बहु दहेत् ॥ ५॥ तदनन्तर आरुणि ने कहा- 'हे सोम्य! जब विशाल अग्नि शान्त हो जाए और उसका एक छोटा सा अंगारा मात्र शेष रह जाए, उस समय बचे हुए अंगारे पर तृण रखकर उसे धीरे-धीरे सुलगाया जाए, तो वह पहले की तरह ही सबको प्रज्वलित कर सकता है' ॥ ५ ॥ एवꣳ सोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलातिशिष्टाभूत्सान्नेनोपसमाहिता प्राज्वालीत्तयैतर्हि वेदाननुभवस्यन्नमयꣳहि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति ॥ ६ ॥ वैसे ही हे प्रिय सोम्य! तुम्हारी सोलह कलाओं में से एक ही कला शेष रह गयी थी। तत्पश्चात् वह अन्न द्वारा पुनः प्रज्वलित हो गई। उसी के माध्यम से तुम वेदों को जानने में समर्थ हो सके। हे प्रिय सोम्य! इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि मन अन्न रूप है, प्राण जल रूप है और वाणी तेज स्वरूप है। इस प्रकार श्वेतकेतु ने अपने पिता द्वारा कहे हुए उपदेश पूर्णरूपेण आत्मसात् कर लिये ॥ ६ ॥ ॥ अष्टमः खण्डः ॥ उद्दालको हारुणिः श्वेतकेतुं पुत्रमुवाच स्वप्नान्तं मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा संपन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनꣳ स्वपितीत्याचक्षते स्वꣳ ह्यपीतो भवति ॥ १ ॥ अरुण के पुत्र आरुणि जो उद्दालक के नाम से प्रसिद्ध हैं। उन्होंने अपने पुत्र श्वेतकेतु से कहा- हे सोम्य! तुम हमारे द्वारा बताये गये स्वप्न के स्वरूप को ठीक प्रकार समझ लो। जिस अवस्था में यह पुरुष शयन करता है, ऐसा कहा जाता है कि उस समय सत् से युक्त हो जाता है, अर्थात् अपने स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। इसलिए इसको 'स्वपित' कहा जाता है, क्योंकि उस समय यह स्व अर्थात् अपने आप को ही प्राप्त कर लेता ॥ १ ॥ स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धो दिशं दिशं पतित्वान्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपश्रयत एवमेव खलु सोम्य तन्मनो दिशं दिशं पतित्वान्यत्रायतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपश्रयते प्राणबन्धनꣳ हि सोम्य मन इति ॥ २ ॥ हे सोम्य! जैसे कोई शकुनि (बाज पक्षी) सूत्र में बँधने के बाद चतुर्दिक उड़ते हुए कहीं आश्रय न प्राप्त कर अपने ही बन्धन के स्थान पर आ जाता है। ठीक वैसे ही, यह मन भी हर दिशा का भ्रमण करके कहीं भी अपना विश्रामालय न पाकर प्राण का ही अवलम्बन ग्रहण करता है। इसलिए हे सोम्य! यह मन, प्राण रूप बन्धन वाला है ॥ २ ॥ अशनापिपासे मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषोऽशिशिषति नामाप एव तदशितं नयन्ते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तदप आचक्षतेऽशनायेति तत्रैतच्छुङ्गमनुत्प- तितꣳ सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ३ ॥
अध्याय ६ खण्ड ८ मन्त्र ७ १६३
अध्याय ६ खण्ड ८ मन्त्र ७ १६३ आरुणि ने कहा- 'हे सोम्य! अब तुम क्षुधा और पिपासा के रहस्य को समझो'। जिस समय पुरुष भोजन ग्रहण करने की इच्छा करता है, उस समय खाये हुए भोजन (अन्न) को जल ही ले जाता है। जैसे गौ ले जाने वाले को गोनाय, अश्व ले जाने वाला अश्वानाय और पुरुष को ले जाने वाले राजा को पुरुषनाय कहते हैं। ठीक वैसे ही जल को भोजन (अशन) ले जाने के कारण 'अशनाय' कहकर बुलाते हैं। हे प्रिय सोम्य! उस जल के द्वारा ही तुम इस शरीर रूपी अङ्कुर को प्रकट हुआ समझो ॥ ३ ॥ तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्रान्नादेवमेव खलु सोम्यान्नेन शुङ्गेनापो मूलमन्विच्छाद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः ॥ ४ ॥ अन्न के अतिरिक्त इस शरीर का मूल और क्या है ? हे सोम्य ! तुम तेज को अन्न रूप कर्म का मूल समझो। तेजरूपी कार्य का मूल सत् तत्त्व को जानो। इस प्रकार से ये समस्त प्राणी सत् रूप मूल वाले ही हैं अर्थात् सत् ही एक मात्र आश्रय तथा प्रतिष्ठा है ॥ ४ ॥ अथ यत्रैतत्पुरुषः पिपासति नाम तेज एव तत्पीतं नयते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तत्तेज आचष्ट उदन्येति तत्रैतदेव शुङ्गमभ्युत्पतितं सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ५ ॥ जब मनुष्य पिपासित (प्यासा) होकर जल ग्रहण करता है, तब उस (जल) को तेज ही अन्दर ले जाता है। अतः जैसे 'गोनाय', 'अशनाय', 'पुरुषनाय' कहे गये हैं, ठीक वैसे ही तेज को उस समय जल को ले जाने वाला कहते हैं। हे सोम्य ! इस कारण से इस शरीर को जलरूपी मूल से प्रकट हुआ समझो, क्योंकि बिना क्रिया के प्रतिक्रिया नहीं हो सकती ॥ ५ ॥ [ शरीर की चयापचय प्रक्रिया (मैटाबालिज्म) में शरीर के प्रत्येक कोश तक अन्न को जल तथा जल को काय विद्युत् (बायो इलैक्ट्रीसिटी) द्वारा संचरित किये जाने का तथ्य वर्तमान शरीर विज्ञान स्वीकार कर चुका है। उसी प्रक्रिया को ऋषि अपने ढंग से समझा रहे हैं।] तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्राद्भ्योऽद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजो मूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठा यथा नु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तदुक्तं पुरस्तादेव भवत्यस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि संपद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम् ॥ ६ ॥ हे प्रिय सोम्य ! जल द्वारा प्रकट हुए शरीर का मूल स्थान कहाँ हो सकता है ? जल का मूल तेज में और तेज का मूल सत् में होता है। ये सभी प्राणी सत् रूपी मूल वाले, सत् रूपी उद्गम स्थल वाले और सत् रूपी अत्र वाले हैं। हे सोम्य ! तीनों (अन्न, जल और तेजरूपी) देवता पुरुष के शरीर में प्रविष्ट होकर विभिन्न भागों में बँट जाते हैं। उद्दालक ने कहा- यह मैंने पूर्व में स्पष्ट कर दिया था। इसी कारण से मृत्यु के समीप पहुँचने वाले पुरुष की वाणी मन में लीन हो जाती है, मन प्राण में विलीन हो जाता है। प्राण तेज में और तेज परदेवता में मिल जाता है ॥ ६ ॥ स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥
॥ नवमः खण्डः ॥
१६४ छान्दोग्योपनिषद् हे सोम्य! वह अणिमा (सूक्ष्मविद्या) है, वही सब कुछ है। वही आत्मा है एवं तुम भी वही हो। तत्पश्चात् श्वेतकेतु ने पुनः निवेदन किया- हे भगवन्! फिर से समझाने की कृपा करें। तब उसके पिता ने 'अच्छा' कहते हुए पुनः समझाने का आश्वासन दिया॥ ७॥ ॥ नवमः खण्डः ॥ यथा सोम्य मधु मधुकृतो निस्तिष्ठन्ति नानात्ययानां वृक्षाणाँरसान्समवहारमेकताँ रसं गमयन्ति ॥ १ ॥ उद्दालक ने पुनः श्वेतकेतु से कहा- हे सोम्य! जिस तरह मधुमक्खियाँ शहद प्राप्त करने के लिए विभिन्न दिशाओं के वृक्षों, पुष्पों से रस लाकर मधु के रूप में एकत्रित कर देती हैं॥ १॥ ते यथा तत्र न विवेकं लभन्तेऽमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्म्यमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मीत्येवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सति संपद्य न विदुः सति संपद्यामह इति ॥ २ ॥ मधु के रूप में एकता को प्राप्त हुए, वे सभी रस जिस प्रकार यह ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते कि मैं अमुक वृक्ष का रस हूँ। ठीक इसी भाँति यह समस्त प्रजा सत् को प्राप्त करने के उपरान्त यह नहीं कहती, कि हमने सत् तत्त्व प्राप्त कर लिया है॥ २॥ त इह व्याघ्रो वा सिँहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दँशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तदाभवन्ति ॥ ३ ॥ इस समस्त लोक में व्याघ्र, सिंह, भेड़िया, बराह, कीट- पतङ्गे, दंश अथवा मच्छर आदि जो पहले प्रादुर्भूत होते हैं, वे ही बार-बार उत्पन्न होते हैं॥ ३॥ स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदँ सर्वं तत्सत्यँ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ४ ॥ वह जो यह अणिमा (सूक्ष्म प्रक्रिया) आदि है, यह सब तदनुरूप ही है। वह ही सत्य है, वही आत्मा है और हे श्वेतकेतो! वही तुम भी हो। ऐसा अपने पिता के द्वारा कहे जाने पर उसने कहा- हे भगवन्! मुझे पुनः बताने की कृपा करें। इस प्रकार से उसके पिता उद्दालक ने उसे फिर से समझाने का आश्वासन दिया॥ ॥ दशमः खण्डः ॥ इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात्प्राच्यः स्यन्दन्ते पश्चात्प्रतीच्यस्ताः समुद्रात्समुद्रमेवापियन्ति स समुद्र एव भवति ता यथा तत्र न विदुरियमहमस्मीति ॥ १ ॥ उद्दालक ने पुनः समझाते हुए कहा- हे सोम्य! ये पूरब एवं पश्चिम दिशा की ओर प्रवाहित होने वाली नदियाँ अपने अनुकूल मार्गों से प्रवाहित होती हैं। उनका समुद्र से ही आगमन होता है और अन्त में उसी समुद्र में ही समाहित हो जाती हैं। जिस तरह वे नदियाँ, सागर में विलीन होकर यह नहीं जानतीं कि मैं अमुक-अमुक नदी हूँ॥ १॥ एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सत आगत्य न विदुः सत आगच्छामह इति त इह व्याघ्रो वा सिँहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दँशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तदाभवन्ति ॥ २ ॥
अध्याय ६ खण्ड ११ मन्त्र ३ १६५
अध्याय ६ खण्ड ११ मन्त्र ३ १६५ ठीक उसी तरह यह सम्पूर्ण प्रजा भी सत् तत्त्व से प्रकट होकर, यह नहीं समझ पाती कि हम सभी का सत् तत्त्व से ही आगमन हुआ है। वे सभी यहाँ पर व्याघ्र, सिंह, भेड़िया, वराह, कीट-पतङ्गे, डाँस अथवा मच्छर आदि के रूप में प्रकट होते हैं, पुनः अपने पूर्व स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं ॥ २ ॥ स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳ सर्वं तत्सत्यꣳ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ आरुणि ने कहा- हे श्वेतकेतु ! यही अणिमा (अणुरूप) आदि से युक्त आत्मा वाला जगत् है तथा तुम भी वही हो। उसने अपने पिता से पुनः समझाने की प्रार्थना की। पिता उद्दालक ने 'अच्छा' कहते हुए फिर से समझाने के लिए कहा ॥ ३ ॥ ॥ एकादशः खण्डः ॥ अस्य सोम्य महतो वृक्षस्य यो मूलेऽभ्याहन्याज्जीवन् स्रवेद्यो मध्येऽभ्या- हन्याज्जीवन्स्रवेद्योऽग्रेऽभ्याहन्याज्जीवन्स्रवेत्स एष जीवेनात्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति ॥ १ ॥ (उन्होंने वृक्ष के दृष्टान्त द्वारा पुनः समझाते हुए कहा-) हे सोम्य! यदि किसी विशाल वृक्ष की जड़ में प्रहार करें, तो वह शुष्क न होकर जीवन धारण करते हुए मात्र रस ही स्रवित करेगा। ठीक वैसे ही यदि उस (वृक्ष) के मध्य भाग पर आघात किया जाए, तब भी वह जीवित रहते हुए रस टपकाता रहेगा और यदि इसके ऊर्ध्व भाग में प्रहार किया जाए, तब भी वह जीवित रहते हुए रस-स्राव ही करता रहेगा। (इससे यह सिद्ध होता है कि) यह वृक्षरूपी जीव-आत्मा से परिपूर्ण जल का पान करता हुआ आनन्दानुभूति करते हुए स्थिर रहता है ॥ १ ॥ अस्य यदेकाꣳ शाखां जीवो जहात्यथ सा शुष्यति द्वितीयां जहात्यथ सा शुष्यति तृतीयां जहात्यथ सा शुष्यति सर्वं जहाति सर्वः शुष्यत्येवमेव खलु सोम्य विद्धीति होवाच ॥ २ ॥ हे सोम्य! किसी वृक्ष की एक शाखा को जीव परित्याग कर देता है, तो वह शुष्क हो जाती है। यदि दूसरी शाखा चेतना शून्य हो जाए, तो वह भी शुष्क हो जाती है। यदि तृतीय शाखा को जीव आघात करने पर छोड़ दे, तो वह भी सूख जाती है और यदि ऐसे ही सम्पूर्ण वृक्ष का ही जीव उत्क्रमण कर जाता है, तो वह वृक्ष पूर्णरूपेण शुष्क हो जाएगा ॥ २ ॥ जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियत इति स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳ सर्वं तत्सत्यꣳ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ हे सोम्य! ठीक ऐसे ही यह वृक्षरूपी शरीर जीवन तत्त्व से रहित होते ही नष्ट हो जाता है, किन्तु जीव का नाश नहीं होता, ऐसे सूक्ष्म भाव से सम्पन्न आत्म-तत्त्व से परिपूर्ण यह जगत् है। यह सत्य है और हे सोम्य! इसी तरह तुम भी सत्य तत्त्व से पूर्ण हो। श्वेतकेतु ने निवेदन किया- भगवन्! पुनः समझाएँ। पिता ने 'अच्छा' कहकर उसे आश्वस्त किया ॥ ३ ॥
॥ द्वादशः खण्डः ॥
१६६ छान्दोग्योपनिषद् ॥ द्वादशः खण्डः ॥ न्यग्रोधफलमत आहरेतीदं भगव इति भिन्द्धीति भिन्नं भगव इति किमत्र पश्यसीत्यण्व्य इवेमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्द्धीति भिन्ना भगव इति किमत्र पश्यसीति न किंचन भगव इति ॥ १ ॥ हे सोम्य ! इस सामने विद्यमान महान् वट वृक्ष से एक फल तोड़कर ले आओ। ऐसा सुनते ही वह (श्वेतकेतु) शीघ्रता से फल को ले आया। आरुणि ने पुनः कहा- 'इसे तोड़ दो।' तोड़ते हुए श्वेतकेतु बोला- 'भगवन् ! तोड़ दिया'। आरुणि ने कहा इसके अन्दर क्या दिखाई दे रहा है? श्वेतकेतु बोला- इसके भीतर ये अणु के सदृश दाने दिखाई दे रहे हैं। आरुणि ने फिर कहा- इन दानों में से एक को लेकर तोड़ दो। श्वेतकेतु बोला- भगवन् ! तोड़ दिया। आरुणि ने कहा कि 'इसके अन्दर क्या देखते हो?' श्वेतकेतु ने उत्तर दिया- हे भगवन् ! मुझे इसके अन्दर कुछ भी नहीं दिखाई पड़ रहा है ॥ १ ॥ तꣳ होवाच यं वै सोम्यैतमणिमानं न निभालयस एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्न एवं महान्न्यग्रोधस्तिष्ठति श्रद्धत्स्व सोम्येति ॥ २ ॥ तब उद्दालक ने कहा- हे सोम्य ! इस वट के बीज के अन्दर जिस अति सूक्ष्म अणु रूप को तुम नहीं देख सकते हो, उसमें इतना विशाल वृक्ष स्थिर है। अतः हे सोम्य ! मेरे द्वारा बताये हुए इस कथन पर श्रद्धापूर्वक विश्वास करो ॥ स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳ सर्वं तत्सत्यꣳ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ हे सोम्य ! इस वट वृक्ष का जो यह अणु रूप है, तदनुरूप ही यह सब सूक्ष्म जगत् है। वही सत्य है और हे श्वेतकेतो ! वही तत्त्व तुम स्वयं हो। उद्दालक के ऐसा कहने पर श्वेतकेतु ने पुनः निवेदन किया- भगवन् ! कृपया मुझे फिर से बताने का अनुग्रह करें। तब उद्दालक ने उसे 'अच्छा' कहते हुए पुनः आश्वस्त किया ॥ ॥ त्रयोदशः खण्डः ॥ लवणमेतदुदकेऽवधायाथ मा प्रातरुपसीदथा इति स ह तथा चकार तꣳ होवाच यद्दोषा लवणमुदकेऽवाधा अङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य न विवेद ॥ १ ॥ उद्दालक ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को फिर से समझाते हुए कहा-'हे सोम्य ! इस पिण्ड रूपी नमक के टुकड़े को जल-पात्र में डालकर अगले दिन प्रातःकालीन वेला में पुनः उपस्थित होना।' ऐसा सुनकर अपने पिता के आदेशानुसार वह दूसरे दिन उपस्थित हुआ। तब उद्दालक ने कहा- हे पुत्र ! विगत रात्रि में जिस लवण को तुमने जल में मिश्रित किया था, 'उसे ले आओ।' परन्तु ढूंढने पर उस नमक को वह नहीं प्राप्त कर सका ॥ १ ॥ यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्तादाचामेति कथमिति लवणमिति मध्यादाचामेति कथमिति लवणमित्यन्तादाचामेति कथमिति लवणमित्यभिप्रास्यैनदथ मोपसीदथा इति तद्ध तथा चकार तच्छश्वत्संवर्तते तꣳहोवाचात्र वाव किल सत्सोम्य न निभालयसेऽत्रैव किलेति ॥ २ ॥ हे सोम्य ! तुम इस जल में मिले हुए नमक के अंश को नहीं देख सकते हो, फिर भी यदि जिज्ञासा हो तो इस जल को ऊपर से लेकर आचमन के रूप में ग्रहण करो। आचमन के उपरान्त पिता द्वारा पूछने पर उसने कहा 'नमकीन' अर्थात् खारा है। पिता ने कहा कि अब जल पात्र के मध्य में से जल लेकर पीते हुए बताओ कैसा है? उसने फिर कहा
अध्याय ६ खण्ड १५ मन्त्र १ १६७
अध्याय ६ खण्ड १५ मन्त्र १ १६७ 'नमकीन है।' तत्पश्चात् पिता के कहने पर जल पात्र के नीचे से जल लेकर पान किया। पिता के द्वारा 'कैसा है?' पूछने पर उसने बताया कि 'नमकीन है।' उद्दालक ने कहा- 'अच्छा तुम इस जल को बाहर फेंक कर हमारे पास आ जाओ।' उसने पिता के कहने पर वैसा ही किया और कहा उस सम्पूर्ण जल में नमक पूर्ण रूप से मिला हुआ था। तत्पश्चात् आरुणि ने कहा- हे सोम्य ! ठीक इसी प्रकार तुम सत् तत्त्व को देखने में असमर्थ हो, फिर भी वह यहाँ पर पूर्ण रूप से विद्यमान है ॥ २ ॥ स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ आरुणि ने कहा- हे सोम्य ! इसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् अति सूक्ष्म रूप से सत् तत्त्व आत्मा में विद्यमान है, यही सत्य है। हे श्वेतकेतो ! ठीक वैसे ही तुम स्वयं भी सत्य स्वरूप हो। तब उसने फिर कहा भगवन् ! आप पुनः समझाएँ। पिता ने अच्छा कहकर पुनः उसे आश्वस्त किया ॥ ३ ॥ ॥ चतुर्दशः खण्डः ॥ यथा सोम्य पुरुषं गन्धारेभ्योऽभिनद्धाक्षमानीय तं ततोऽतिजने विसृजेत्स यथा तत्र प्राङ्वोदङ्वाधराङ्वा प्रत्यङ्वा प्रध्मायीताभिनद्धाक्ष आनीतोऽभिनद्धाक्षो विसृष्टः ॥ १ ॥ उद्दालक ने पुनः एक पुरुष के दृष्टान्त द्वारा श्वेतकेतु को समझाते हुए कहा- हे सोम्य ! जिस प्रकार किसी पुरुष की आँखें बाँधकर गान्धार देश से अन्यत्र किसी निर्जन क्षेत्र में लाकर छोड़ दें, तो वह वहाँ चतुर्दिक् पूर्व, उत्तर, दक्षिण तथा पश्चिम दिशा की ओर मुँह करके करुण क्रन्दन करता है। वह चिल्लाते हुए कहता है कि मुझे आँखें बाँधकर यहाँ लाकर छोड़ दिया गया है ॥ १ ॥ तस्य यथाभिनहनं प्रमुच्य प्रब्रूयादेतां दिशं गन्धारा एतां दिशं व्रजेति स ग्रामाद्ग्रामं पृच्छन् पण्डितो मेधावी गन्धारानेवोपसंपद्येतैवमेवेहाचार्यवान् पुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्य इति ॥ २ ॥ यदि कोई दूसरा पुरुष वहाँ आकर उसकी आँखों के बन्धन खोलकर उसे यह बतलाये कि 'गान्धार' अमुक दिशा में है। अमुक की ओर प्रस्थान कर जाओ। तब वह बुद्धिमान् एवं उपदिष्ट हुआ व्यक्ति एक गाँव से दूसरे गाँव को पूछते हुए क्रमशः अपने मूल स्थान यानी गान्धार देश को प्राप्त कर लेता है। ठीक वैसे ही इस लोक में सदाचारवान् व्यक्ति ही सत् को समझ पाता है। उस व्यक्ति को मोक्ष प्राप्ति में उतनी ही देर लगती है, जितने तक शरीर के बन्धन से मुक्ति नहीं मिल जाती। इसके अनन्तर तो वह पुरुष सत् युक्त ब्रह्म के अनुरूप हो जाता है अर्थात् ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है ॥ २ ॥ स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ हे सोम्य ! यह समस्त जगत् अणु रूप सूक्ष्म सत् तत्त्व से युक्त है। वह ही सत् स्वरूप है। वह ही आत्म स्वरूप है। हे श्वेतकेतो ! तुम भी उसी सत् तत्त्व से युक्त हो। इस प्रकार सुनते ही उस (श्वेतकेतु) ने कहा- भगवन् ! पुनः बताने की कृपा करें। तब उद्दालक ने अच्छा कहते हुए उसे पुनः आश्वस्त किया ॥३ ॥ ॥ पञ्चदशः खण्डः ॥ पुरुषं सोम्योतोपतापिनं ज्ञातयः पर्युपासते जानासि मां जानासि मामिति। तस्य यावन्न वाङ्मनसि संपद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायां तावज्जानाति ॥ १ ॥
१६८ छान्दोग्योपनिषद् हे सौम्य ! ज्वरादि से अत्यधिक संतप्त एवं मरणासन्न स्थिति में पहुँचते हुए पुरुष के चारों ओर उसके बन्धु-बान्धव एवं निकट परिवारीजन बैठकर पूछते हैं- क्या तुम मुझे पहचानते हो ? क्या तुम मुझे जानते हो ? तो उस व्यक्ति की वाणी जब तक मन में लीन नहीं होती, मन प्राण में, प्राण तेज में तथा तेज परमदेव तत्त्व में विलीन नहीं हो जाता, तब तक वह सबको जानता रहता है ॥ १ ॥ अथ यदास्य वाङ्मनसि संपद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायामथ न जानाति । तदनन्तर जब उस व्यक्ति की वाणी मन में विलीन हो जाती है, मन प्राण में, प्राण तेज में एवं तेज उस परमदेव तत्त्व में मिल जाता है, तब वह व्यक्ति किसी को भी पहचान पाने में असमर्थ रहता है ॥ २ ॥ स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ हे सौम्य ! वह (अणुरूप) जो अणिमा आदि तत्त्व है, तदनुरूप ही यह सब कुछ है। वही सत्य है और वही आत्मतत्त्व है। हे सौम्य ! उसी सत् तत्त्व से युक्त स्वयं तुम भी हो। उद्दालक के इस तरह कहने पर श्वेतकेतु ने कहा- हे भगवन् ! पुनः बताने की कृपा करें। तब उसके पिता ने 'अच्छा' कहते हुए उसे आश्वस्त किया ॥ ३ ॥ ॥ षोडशः खण्डः ॥ पुरुषं सोम्योत हस्तगृहीतमानयन्त्यपहार्षीत्स्तेयमकार्षीत्परशुमस्मै तपतेति स यदि तस्य कर्ता भवति तत एवानृतमात्मानं कुरुते सोऽनृताभिसन्धोऽनृतेनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स दह्यतेऽथ हन्यते ॥ १ ॥ (आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को अपराधी व्यक्ति द्वारा तप्त कुल्हाड़े को ग्रहण करने के उदाहरण द्वारा समझाते हुए कहते हैं)- हे सौम्य ! जब किसी दोषी व्यक्ति को हाथ बाँधकर (राज्य कर्मचारी) लाते हुए कहते हैं कि 'इसने चोरी की है', इसके लिए परशु तप्त करो। वह यदि सचमुच उसका (चोरी का) करने वाला होता है तथा असत्य भाषण कर, अपने किये हुए कृत्य को आवरण में रखता है, तो उस तप्त परशु को ग्रहण करते ही, वह जलते हुए मृत्यु को प्राप्त होता है ॥ १ ॥ अथ यदि तस्याकर्ता भवति तत एव सत्यमात्मानं कुरुते स सत्याभिसन्धः सत्येना- त्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स न दह्यतेऽथ मुच्यते ॥ २ ॥ यदि वह व्यक्ति चोरी करने वाला नहीं होता, तो उसी परशु से स्वयं को सत्य प्रमाणित करता है। वह अपने आप को सत्य से ढककर उस परशु को पकड़ लेता है और जब उस परशु से नहीं जलता, तो छोड़ दिया जाता है ॥ [ इस समय अपने भाव से स्वयं को आवृत कर लेने की क्षमता लुप्तप्राय हो गयी है, फिर भी उसके प्रमाण मिलते हैं। किसी पीड़ित व्यक्ति को सहायता करते समय वास्तविक प्रेम सम्पन्न व्यक्ति को कष्ट नहीं होता; किन्तु प्रेम का ढोंग करने वाले को कष्ट अनुभव होता है।] स यथा तत्र नादाह्यैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति ॥ ३ ॥ हे सौम्य ! जैसे वह व्यक्ति उस परीक्षा के समय तप्त परशु से नहीं जलता है, वैसे ही सत् तत्त्व को प्राप्त करने वाले विद्वान् पुनर्जन्म से मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं। यह समस्त विश्व सत् स्वरूप है। वह ही आत्मा है। हे श्वेतकेतो ! उसी सत् तत्त्व से सम्पन्न तुम स्वयं हो। तब श्वेतकेतु ने कहा भगवन् ! मैं उस सत् तत्त्व को जान गया हूँ-जान गया हूँ ॥
अध्याय ७ खण्ड १ मन्त्र ५ १६९
अध्याय ७ खण्ड १ मन्त्र ५ १६९ ॥ अथ सप्तमोऽध्यायः ॥ ॥ प्रथमः खण्डः ॥ अधीहि भगव इति होपससाद सनत्कुमारं नारदस्तꣳ होवाच यद्वेत्थ तेन मोपसीद ततस्त ऊर्ध्वं वक्ष्यामीति ॥ १ ॥ एक बार ब्रह्मर्षि नारद जी ब्रह्मनिष्ठ योगेश्वर सनत्कुमार जी के समक्ष उपस्थित होकर बोले- हे भगवन् ! मुझे उपदेश प्रदान करने की कृपा करें। उनसे सनत्कुमार जी ने कहा- सर्वप्रथम जो तुम जानते हो, उसे बतलाते हुए हमारे पास उपदेश श्रवण करने के लिए आओ, तो उससे आगे का ज्ञान मैं तुम्हें दूँगा ॥१ ॥ स होवाचर्ग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदꣳ सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यꣳ राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्याꣳ सर्पदेवजनविद्यामेतद्भगवोऽध्येमि ॥ २ ॥ (नारद जी ने कहा-) हे भगवन् ! मैंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद का अध्ययन कर लिया है। इसके अतिरिक्त इतिहास, पुराण के रूप में पञ्चम वेद, वेदों का वेद (व्याकरण), श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातविद्या, निधिशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, निरुक्त, वेद विज्ञान, भूततंत्र, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या, सर्पविद्या (गारुड़मन्त्र), देवजन विद्या (नृत्य-संगीत) आदि इन सभी विद्याओं का अध्ययन कर चुका हूँ॥ सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि नात्मविच्छ्रुतꣳ ह्येव मे भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकमात्मविदिति सोऽहं भगवः शोचामि तं मा भगवाञ्छोकस्य पारं तारयत्विति तꣳ होवाच यद्वै किंचैतदध्यगीष्ठा नामैवैतत् ॥ ३ ॥ हे भगवन् ! मैं तो केवल मंत्रों में ही पारंगत हूँ अर्थात् शब्दार्थ मात्र ही जानता हूँ। आत्मा के सम्बन्ध में मेरी जानकारी बिल्कुल नहीं है। मैंने आप जैसे श्रेष्ठ योगियों से सुना है कि आत्मज्ञानी शोक से पार करने में समर्थ होते हैं। हे भगवन् ! मैं आत्मज्ञान के अभाव में शोक में डूबा रहता हूँ। आप कृपा करके शोक सागर से पार कीजिए। ऐसा सुनकर सनत्कुमार जी ने नारद जी से कहा- हे महर्षे ! तुम जो कुछ जानते हो, वह सभी कुछ नाम ही है ॥ ३ ॥ नाम वा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेद आथर्वणश्चतुर्थ इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः पित्र्यो राशिर्देवो निधिर्वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्या ब्रह्मविद्या भूतविद्या क्षत्रविद्या नक्षत्रविद्या सर्पदेवजनविद्या नामैवैतन्नामोपास्स्वेति ॥ ४ ॥ ऋग्वेद भी नाम है तथा ऐसे ही यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास-पुराणादि, वेदों का वेद (व्याकरण) श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातविद्या, निधिशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, निरुक्त, वेदविज्ञान, भूतविद्या, धनुर्विद्या, ज्योतिष, सर्पविद्या, संगीत आदि कलाएँ शिल्प विद्या आदि ये सब नाम ही हैं। अतः हे नारद ! तुम नाम की ही उपासना करो ॥ ४ ॥ स यो नाम ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्नाम्नो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो नाम ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो नाम्नो भूय इति नाम्नो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ ५ ॥ जो व्यक्ति नामरूप ब्रह्म की उपासना करता है, उसकी जहाँ तक नाम की गति होती है, वहाँ तक