१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
संन्यास [परिशिष्ट] ४८१ (बृह०२.४.११)। शिवसङ्कल्पोपनिषद् के प्रत्येक श्लोक में मन के शिव अथवा कल्याणकारी संकल्प से युक्त होने की कामना की गई है। जो हमारा मन प्रकृष्ट ज्ञान का साधनभूत है, जो स्मरण और धारण शक्ति से युक्त है, जो ज्योति की भाँति अन्तः को प्रकाशित करता है, जो सभी कर्मों का सम्पादक है, वह हमारा मन शिव संकल्प से युक्त हो- यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु। यस्मान्न ऋते किञ्चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु (१ शि०सं० ३)। कामनाएँ संकल्प से उत्पन्न होती हैं। गीता (६.२४) में संकल्प से उत्पन्न सब कामनाओं को छोड़ने की बात कही गयी है। उपनिषद् में कहा गया है कि संकल्प ही मन का स्वरूप है, अतः सङ्कल्प को ही मन समझना चाहिए। आज तक कोई भी संकल्प और मन को पृथक् न कर सका। सभी संकल्पों के विनष्ट होने पर आत्मस्वरूप ही शेष रहता है-सङ्कल्पमनसी भिन्ने न कदाचन केनचित्। सङ्कल्पजाते गलिते स्वरूपमवशिष्यते (महो० ४.५३)। २२७. संन्यास - द्र० चतुर्थाश्रम। २२८. संन्यासी-यति - जो अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर चुका हो और संसार के सभी आकर्षणों से वैराग्य लेकर मोक्ष प्राप्ति का प्रयास कर रहा हो। इन्हें परिव्राजक, यति, अवधूत, हंस, योगी आदि कहते हैं। संन्यासी को सभी प्रकार की आसक्ति का त्याग करना चाहिए। एक जगह पर अधिक समय नहीं रहना चाहिए। उसके अन्दर आत्मज्ञान का प्रकाश होना चाहिए। सर्वत्र समबुद्धि रखने वाला, हिंसा तथा माया से रहित, क्रोध एवं अहंभाव से विमुक्त संन्यासी कहलाता है। उपनिषद् के अनुसार सब कर्मों को छोड़कर अहन्ता और ममता को त्यागकर ब्रह्म की शरण में जाना और तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि, सर्वं खल्विदं ब्रह्म आदि महावाक्यों द्वारा 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा निश्चय करके निर्विकल्प समाधि में रहना और स्वतंत्र यति के रूप में व्यवहार करना, ऐसा पुरुष संन्यासी है, मुक्त है, वही पूज्य योगी, परमहंस, अवधूत और वही ब्राह्मण है (निरा०३९)। संसार से विरक्त होकर केवल ब्रह्म प्राप्ति का यत्न करते हुए स्वतंत्र विचरण करने वाले यति कहलाते हैं। संन्यासियों के छः भेद प्रमुख रूप से वर्णित हैं- कुटीचक, बहूदक, हंस, परमहंस, तुरीयातीत और अवधूत। कर्मों को छोड़ देना या मैं संन्यासी हूँ, ऐसा कह देने से कोई संन्यासी नहीं हो जाता। समाधि अवस्था में जीव और ब्रह्म की एकता का अनुभव होना ही संन्यास है। (मैत्रा० २.१७)। २२९. सकाम-निष्काम कर्म - फल प्राप्ति की कामना से किया गया कर्म सकाम कर्म कहलाता है। इसके विपरीत कर्म में फल की इच्छा न करना निष्काम कर्म कहलाता है। निष्काम कर्म करने से पुरुष कर्म के बन्धन में बँधता नहीं है। गीता में कर्मफल की इच्छा न करने का निर्देश है, क्योंकि मनुष्य का अधिकार कर्म करने तक है, फल में नहीं-कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफल हेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि (गी०२.४७)। जो कर्मफल की आसक्ति (सकाम कर्म) को छोड़कर नित्य तृप्त और आश्रय रहित है, वह कर्म करता हुआ भी कुछ नहीं करता अर्थात् कर्म बन्धन में नहीं पड़ता- त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः। कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः (गी०४.२०)। योगी पुरुष कर्मफल को त्यागकर (निष्काम कर्म द्वारा) निष्ठा से भरी शान्ति को प्राप्त होता है-युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् (गी०५.१२)। ध्यान से कर्मफल का त्याग (निष्कामकर्म) श्रेष्ठ है, त्याग से शीघ्र शान्ति प्राप्त होती है-ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् (गी०१२.१२)। २३०. सच्चिदानन्द - आत्मा अथवा परमात्मा को सच्चिदानन्द कहा गया है, क्योंकि यह सत्, चित् और आनन्द स्वरूप है। शंकराचार्यजी ने तत्वबोध में लिखा है, जो तीनों कालों में विद्यमान रहता है, वह सत् है-कालत्रयेऽपि तिष्ठतीति सत्। आत्मा का सद्रूप होने का तात्पर्य उसका अमर, नित्य, शाश्वत, अजन्मा आदि होना है- अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे (कठ०१.२.१८)। जिसकी सत्ता सदैव स्थापित रही है, वही सत् है। वह आत्मा चिद्रूप है। चित् का तात्पर्य है-चैतन्यता (ज्ञानयुक्त होना)। वह ज्ञानस्वरूप होने से प्रकाशस्वरूप भी है। उसी का प्रकाश सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है- तस्य भासा सर्वमिदं विभाति (कठ०२.२.१५)। यह आनन्द रूप है-निरतिशय अथवा सम्यक् सुखस्वरूप है। शंकराचार्य ने लिखा है- आनन्दमय आत्मा ही ब्रह्म है-आनन्दमय आत्मा ब्रह्मेति गम्यते (ब्र०सू०-शाङ्कर भा०१.१.१२)। २३१. सत्-असत् - सत् शब्द के पर्याय कोश ग्रन्थों में इस प्रकार हैं- ब्रह्म, अस्तित्व, सत्ता, सत्य, साधन, सद्गुणी व्यक्ति, सज्जन, नित्य, स्थायी, श्रेष्ठ, पवित्र, अच्छा, सत्य धर्म। इसके विपरीत मिथ्या, अस्तित्वविहीन, सतारहित,
बुरा, असाधु, असत्य आदि असत् के पर्यायवाची शब्द हैं। सत्य की ही सदैव जय होती है- सत्येनैव जयति (मै०ब्रा०४.३.८)। सत्य में प्रमाद नहीं करना चाहिए-सत्यान्न प्रमदितव्यम् (तैत्ति०१.११.१)। इस लोक में सत् ही परमेश्वर है। सत् के आधार पर ही सृष्टि और धर्म का अस्तित्व है। गीता में कहा है कि असत् का कोई अस्तित्व नहीं है और सत् का अभाव नहीं है- नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः (गी०२.१६)। यज्ञ, तप और दान की स्थिति सत् है- यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते (गी०१७.२७)। सद्भाव और सज्जनता में 'सत्' शब्द प्रयुक्त होता है-सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते (गी०१७.२६)। मुण्डकोपनिषद् का प्रसिद्ध वाक्य, जो सत्य के विजयी होने और असत्य के पराभूत होने का संकेत करता है, को भारत सरकार ने अपने राजचिह्न में स्वीकार किया है- सत्यमेव जयते नानृतम्। सत्येन पन्था विततो देवयानः (मुण्ड०३.१.६)। २३२. सत्त्व-रज-तम- सांख्य दर्शन के अनुसार समूची सृष्टि त्रिगुणात्मक है। ये तीन गुण हैं- सत्त्व, रज और तम। सत्त्व सबसे उत्तम है, इसके लक्षण हैं-ज्ञान, शान्ति, विवेक, सत्प्रवृत्ति आदि। यह आत्म तत्त्व, मूल तत्त्व तथा चेतन तत्त्व का भी बोधक है। वह परम पुरुष परमात्मा इन तीनों गुणों से परे है, अतः उसे त्रिगुणातीत भी कहा गया है। सत्त्व, रज और तम ये तीनों गुण प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं, ये अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं-सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः। निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् (गी०१४.५)। जब तक तीनों गुण समान रूप से विद्यमान रहते हैं, तब तक प्रकृति में हलचल-परिवर्तन नहीं होता। प्रकृति मूलरूप में विद्यमान रहती है-साम्यावस्था प्रकृतिः (सां०सू० १.६१)। गीता में ही आगे भगवान् ने वर्णन किया है कि सत्त्वगुण सुख में, रजोगुण कर्म में और तमोगुण ज्ञान की ढँककर प्रमाद में लगाता है-सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत। ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत (गी०१४.९)। सत्त्व से ज्ञान, रज से लोभ तथा तम से प्रमाद, मोह, अज्ञान उत्पन्न होता है-सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च। प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च (गी०१४.१७)। २३३. सप्तचक्र- योग साधना ग्रन्थों में 'षट्चक्र वेधन' प्रक्रिया का प्रायः उल्लेख पाया जाता है। मान्यता है कि षट्चक्र वेधन प्रक्रिया द्वारा कुण्डलिनी जागरण की क्रिया सम्पन्न होती है और वह जाग्रत् कुण्डलिनी ऊर्ध्वगमन करती हुई सहस्रार स्थित शिवतत्त्व से जब मिल जाती है, तो योग (शिव-शक्तियोग) सिद्ध हो जाता है। साधक में अनेकानेक चमत्कारिक शक्तियाँ विकसित हो जाती हैं और अन्त में वह मुक्ति का अधिकारी भी हो जाता है- षट्चक्राणि परिज्ञात्वा प्रविशेत् सुखमण्डलम् (यो०शि०६.७४, यो०कु०३.९,१२), षट्चक्रं षोडशाधारं त्रिलक्ष्यं व्योम पञ्चकम्। स्व देहे यो न जानाति तस्य सिद्धिः कथं भवेत् (यो०चू०३)। योग साधना ग्रन्थों में जिन षट्चक्रों की प्रसिद्धि है, वे इस प्रकार हैं-१. मूलाधार, २.स्वाधिष्ठान, ३.मणिपूर, ४.अनाहत, ५.विशुद्धाख्य, ६.आज्ञाचक्र। इन षट्चक्रों के वेधन की प्रक्रिया सम्पन्न होने के बाद इससे परे सातवें चक्र तक कुण्डलिनी शक्ति का ऊर्ध्वगमन होता है, तो साधक पूर्णता की स्थिति में पहुँच जाता है। वह सातवाँ चक्र 'सहस्रार चक्र' है, जिसमें सहस्र दल कमल होने को बात कही जाती है। इन सप्तचक्रों का विशद वर्णन तन्त्रसार, हठयोग प्रदीपिका जैसे योग साधना के ग्रन्थों में मिलता है। २३४. सप्त जिह्वाएँ- यज्ञीय विधि-विधान के अन्तर्गत जहाँ अग्नि, समिधा, आज्य आदि का वर्णन पाया जाता है, वहीं 'अग्नि' का मानवीकरण (आधिदैविक) रूप भी प्राप्त होता है। 'अग्नि' जो उष्णता, ऊर्जा एवं प्रकाश आदि गुण विशिष्ट पदार्थ के रूप में देखा जाता है, वहीं 'अग्निदेव' के रूप में भी प्रतिष्ठित है। सामान्य प्राणी जिस प्रकार मुख- जिह्वा आदि अंगावयवों से युक्त हो भोजन आदि क्रियाएँ सम्पन्न करता है, उसी प्रकार अग्निदेव अपनी जिह्वाओं से आज्य आदि हव्य सामग्रियों को ग्रहण करते हैं- ऐसी प्रसिद्धि है। यह अग्नि का आधिदैविक-आलंकारिक स्वरूप है। 'अग्नि' की लपटें ही उसकी जिह्वाएँ हैं। पौराणिक ग्रन्थों के साथ ही उपनिषदों में भी अग्नि की सात जिह्वाओं (ज्वालाओं) का वर्णन मिलता है। मुण्डकोपनिषद् (१.२.४) में कहा गया है- काली कराली च मनोजवा च, सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा। स्फुलिंगिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥ अर्थात् काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिंगिनी और विश्वरुची-ये उस (अग्नि) की लपलपाती हुई सात जिह्वाएँ हैं। वस्तुतः ये जिह्वाएँ ही अग्नि की लपटें-ज्वालाएँ है। इनके नामों से लगता है कि ये लाल, धुएँ युक्त, चिनगारी युक्त आदि गुण विशिष्ट अग्नि की लपटें हैं। इन्हें अग्निदेव की सात जिह्वाएँ कहा गया है। इसी को आगे सात दीप्तियाँ भी कहा गया है- सप्तार्चिषः (मुण्ड०२.१.८)।
सप्तयज्ञ | परिशिष्ट | ४८३ २३५. सप्तयज्ञ - भारतीय संस्कृति में यज्ञ का बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान है। वेदों-स्मृतियों में इसका विशद वर्णन प्राप्त होता है। इसी आधार पर यज्ञ के प्रमुखतः दो विभाग हैं- १. श्रौत यज्ञ, २. स्मार्त यज्ञ। इन दोनों विभागों के अन्तर्गत अनेकानेक प्रकार के यज्ञ आते हैं। यहाँ जिन सात यज्ञों का उल्लेख है, वे प्रायः दार्शनिक स्तर के हैं। मुण्डकोपनिषद् (२.१.८) में यह प्रकरण व्याख्यायित है- सप्ताचिंषः समिधः सप्त होमाः । सप्तहोम (यज्ञ) का तात्पर्य स्पष्ट करते हुए शंकराचार्यजी लिखते हैं- सप्त होमास्तदविषयविज्ञानानि 'यदस्य विज्ञानं तज्जुहोति (महानारायण० २५.१) इति श्रुत्यन्तरात्' अर्थात् सात होम यानी अपने विषयों के विज्ञान, जैसा कि 'इसका जो विज्ञान है, उसी को हवन करता है', इस अन्य श्रुति से सिद्ध होता है। यहाँ 'विषयों के विज्ञान' का तात्पर्य 'सप्तप्राण' (शीर्षस्थ इन्द्रियवर्ग) के विषयों का विशिष्ट ज्ञान है। इस विशिष्ट ज्ञान को जब आत्मलाभ-आत्मदर्शन के उद्देश्य से साधक होम्यता है- समर्पण करता है-त्यागता है, तो इसे ही सप्तयज्ञ या सप्तहोम कहा जाता है। यह दार्शनिक पहलू हुआ। इसका व्यावहारिक पहलू सात स्थूल यज्ञ वाला है- २ प्रातः-सायं का यज्ञ, १ दर्श (अमावस्या), १ पौर्णमास, १ चातुर्मास्य, १ आग्रयण, १ सांवत्सरिक- इस प्रकार कुल सात यज्ञ हुए। २३६. सप्तलोक - द्र०-लोक। २३७. सप्त समिधाएँ - यज्ञ में अग्नि को प्रदीप्त करने के लिए समिधाओं की आवश्यकता पड़ती है। यज्ञीय प्रयोग शास्त्रों में विशिष्ट समिधाओं का उल्लेख मिलता है, यथा- आम्र, पलाश, खदिर, उदुम्बर (गूलर) आदि। उपनिषदों में ऐसे उल्लेख प्रायः दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में ही पाये जाते हैं। मुण्डकोपनिषद् (२.१.८) में 'इन्द्रियों के विषय' के लिए 'समिधा' शब्द का प्रयोग है और इस प्रयोग का कारण बताया गया है कि 'इन्द्रिय वर्ग' अपने विषयों से ही समिद्ध-प्रदीप्त हुआ करते है। वस्तुतः यह प्रकरण सृष्टि प्रक्रिया के अन्तर्गत आया है, जिसमें कहा गया है कि उस (विराट्) पुरुष (ब्रह्म) से ही सात प्राण (शीर्षस्थ सात इन्द्रियाँ- २ नेत्र, २ श्रवण, २ घ्राण और १ रसना) उत्पन्न हुए हैं। उसी से सात किरणें (दीप्तियाँ), सात समिधा, सात होम और जिनमें वे संचार करते हैं, वे सात स्थान प्रकट हुए हैं- सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् सप्ताचिंषः समिधः सप्त होमाः । सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥ आचार्य शंकर ने 'सप्त समिधः' का भाष्य करते हुए लिखा है-सप्त समिधः सप्त विषयाः, विषयैर्हि समिध्यन्ते प्राणाः अर्थात् सप्त समिधा-सात शीर्षस्थ इन्द्रियों-प्राणों के विषय हैं, क्योंकि इन विषयों से ही प्राण-इन्द्रिय वर्ग समिद्ध-प्रदीप्त-सक्रिय होते हैं। इस प्रकार 'सप्त समिधा' यहाँ दार्शनिक परिप्रेक्ष्य (नेत्र, श्रोत्र, घ्राण एवं रसना के विषय रूप, शब्द, गन्ध एवं रस के अर्थ) में प्रयुक्त है। २३८. समाधि - सामान्यतः चित्त की एकाग्रता को समाधि कहते हैं। चित्तवृत्तियाँ जब विकारों से रहित विशुद्ध अवस्था को प्राप्त होती हैं, यह समाधि योग तभी लगता है। ऐसी अवस्था में चित्त विक्षेपरहित हो जाता है और लक्ष्य विशेष में समाहित और स्थिर हो जाता है। ध्यान की पराकाष्ठा को भी समाधि कहा गया है। योग के आठ अंगों में अन्तिम अंग समाधि है। इसे योग का चरम फल भी कहते है। इसमें साधक अपने चित्त को बाह्य जगत् से मोड़कर आत्मा में स्थित कर लेता है, ऐसी अवस्था में वह विविध शक्तियों को धारण करता है और अन्त मे कैवल्य पद को प्राप्त होता है। योग दर्शन में समाधि के चार भेद बताये गये है- १. सम्प्रज्ञात, २. सवितर्क, ३. सविचार और ४. सानंद समाधि। हठयोग प्रदीपिका के अनुसार जैसे नमक जल में मिलने पर जल के समान हो जाता है, उसी प्रकार चित्त आत्मा के साथ मिलकर आत्मरूप हो जाता है। यह समाधि की पराकाष्ठा है- सलिले सैन्धवं यद्वत् साम्यं भजति योगतः । तथात्ममनसोरैक्यं समाधिरभिधीयते (ह०प्र०४.५)। समाधि के प्रायः दो भेदों का निरूपण किया जाता है- १. सविकल्पक और २.निर्विकल्पक। जब साधक की चित्तवृत्ति अद्वितीय ब्रह्म में स्थिर हो जाती है, तब उसे कुछ काल के लिए अपने विषय मे, ब्रह्म के विषय में तथा ज्ञान के विषय में बोध बना रहता है। जब तक ध्याता, ध्यान और ध्येय के विषय में पृथक् प्रतीति होती रहती है, उसे सविकल्पक समाधि कहते हैं और जब साधक समस्त चित्तवृत्तियों का निरोध कर एकीभाव (अद्वैत भाव) से ध्येय में अवस्थित हो जाता है, उसे निर्विकल्पक समाधि कहते हैं। उपनिषद् के अनुसार जो 'अहं ब्रह्मास्मि' का निश्चय करके निर्विकल्प समाधि में लीन रहकर परम स्वतंत्र और यति स्वरूप होता है, वह पुरुष संन्यासी, वही मुक्त कहलाता है- ब्रह्मैवाहमस्मीति निश्चित्य निर्विकल्पसमाधिना स्वतन्त्रो यतिश्चरति स संन्यासी स मुक्तः (निरा०३९)।
४८४ | [परिशिष्ट] | साम २३९. सम्भूति - द्र०-असम्भूति । २४०. सर्ग-प्रतिसर्ग - सर्ग का सामान्य अर्थ सृष्टि या संसार से लिया जाता है। जगत् की उत्पत्ति या मूल-उद्गम को भी सर्ग कहा गया है। इसके विपरीतार्थक रूप में जगत् के प्रलय को प्रतिसर्ग कहते हैं। पुराणों में सृष्टि और प्रलय अर्थात् सर्ग-प्रतिसर्ग का उल्लेख अनेक स्थानों पर हुआ है। महाभारत में विष्णु और शिव भगवान् के सहस्रनाम में सर्ग नाम उल्लिखित है। श्रीमद्भागवत पुराण (३.१०.१४-२६) में सर्ग का विस्तृत विवरण मिलता है। सृष्टि या कल्प के अर्थ में मनुस्मृति में भी सर्ग शब्द उपन्यस्त है-हिंस्राहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते। यद्यस्य सोऽदधात् सर्गे तत्तस्य स्वयमाविशत् (मनु०स्मृ०१.२९)। पुराणों के पाँच लक्षण, विषय या प्रकरण माने गये हैं- १. सर्ग (सृष्टि), २. प्रतिसर्ग अर्थात् सृष्टि का विस्तार, प्रलय और पुनः सृष्टि, ३. सृष्टि की आदि वंशावली, ४. मन्वन्तर और ५. वंशानुचरित। जगत् रचना के अन्तर्गत सृष्टि और प्रलय को सतत चलते रहने वाली परम्परा सर्ग-प्रतिसर्ग के रूप में वर्णित हुई है। उस ब्रह्म के संकोच से प्रलय तथा विकास से सृष्टि को रचना होती है- यत्संकोच विकासाभ्यां जगत्प्रलय सृष्टयः (महो०२.१०)। २४१. सविता - सूर्य, आदित्य, दिवाकर को ही सविता कहा गया है। इन्हें जगत् के रचयिता, उत्पादक या स्रष्टा भी कहा गया है। वैदिक साहित्य में ये देवता रूप में प्रख्यात हैं। सूर्य के उदय होने वाले रूप को सविता कहते हैं। सविता सबके उत्पत्ति कर्त्ता होने के रूप में प्रख्यात हैं-सवितारमाह सर्वस्य प्रसवितारम् (निरु०८.३१)। अमरकोश में सविता के पर्याय इस प्रकार हैं-भानुर्हंसः सहस्त्रांशुस्तपनः सविता रविः (अ०को०१.३.३१)। सविता द्युलोक में स्थित हैं। आदित्य ही सविता और द्युलोक सावित्री है-आदित्य एव सविता द्यौः सावित्री (सावि०६)। सविता को देवों के भी उत्पत्तिकर्त्ता के रूप में स्वीकार किया गया है-सविता वै देवानां प्रसविता (जैमि०३.१८.३)। यही प्रजा का भरण-पोषण करने से 'भर्ग' कहलाता है। शत्रुओं का नाश करने से 'सूर्य', सबको उत्पन्न करने से सविता, सबको प्रकाश देने से 'आदित्य', सबको पवित्र करने से 'पवमान'और सबका अयन (आश्रय स्थान) होने से आदित्य कहलाता है-इमाः प्रजास्तस्माद्भर्गत्वाद्भर्गः। शश्वत्सूर्यमानत्वात्सूर्यः सवनात्सविताऽऽदानादादित्यः पवनात्पावमानोऽथायनादादित्यः (मैत्रा० ५.७)। २४२. साक्षात्कार - साक्षात्कार शब्द के पर्याय ज्ञान, अनुभूति, मिलन, प्रत्यक्ष दर्शन आदि उल्लिखित है। आत्म साक्षात्कार अथवा ब्रह्म साक्षात्कार के दिव्य लक्ष्य को पाने के अभीप्सु साधक उपासना, यज्ञ, दान आदि कर्म में निरत रहते हैं। 'अयमात्मा ब्रह्म' 'तत्त्वमसि' आदि वेदान्त महावाक्यों का चिन्तन करते हुए अनुभूति की अवस्था से होकर साधक ब्रह्म तत्त्व का साक्षात्कार करता है। वह अनुभव करने लगता है कि मैं ही नित्यशुद्धबुद्धमुक्त स्वभाव अद्वयरूप ब्रह्म हूँ। २४३. साक्षी - द्र० अन्तर्यामी । २४४. सांख्य - छः दर्शनों में एक दर्शन सांख्य दर्शन है, जिसके रचयिता महर्षि कपिल हैं। इसमें सृष्टि की उत्पत्ति का सिद्धान्त निरूपित है। यह सृष्टि त्रिगुणात्मक (सत्त्व, रज, तम के योग से) विनिर्मित है। जगत् की उत्पत्ति का मूल यह प्रकृति ही है। पाँचों तत्त्व और ग्यारह इन्द्रियाँ- ये प्रकृति है। सृष्टि के चार प्रमुख विधान हैं- प्रकृति-विकृति, विकृति-प्रकृति और अनुभव। आत्मा को पुरुष कहा गया है। इसमें ईश्वर की सत्ता न मानकर पुरुष और प्रकृति दो तत्त्वों को ही प्रधान माना गया है। पुरुष जगत् से अनासक्त होते हुए भी प्रकृति के कार्यों में बँधा हुआ प्रतीत होता है, जब वह ज्ञान से इस बन्धन को दूर करके यथार्थ अनुभव प्राप्त कर लेता है, तो यही मोक्ष कहलाता है। गीता में विवेचित है कि कितने ही पुरुष ध्यान योग के द्वारा परमात्मा को अपने अन्तःकरण में देखते हैं, दूसरे सांख्य योग द्वारा और कितने ही कर्मयोग के द्वारा देखते हैं- ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना। अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे (गी० १३.२४)। २४५. साम - चारों वेदों में से एक वेद जिसका सम्बन्ध गायन से है, सामवेद कहलाया। मान्यता यह है कि वेद के पद्यबद्ध मन्त्रों को जब गायन विद्या से अनुप्राणित किया गया तो "सामवेद" बन गया। इसमें पद्य मन्त्रों की गान विद्या से जोड़ने से ज्ञान और भावना का सर्वोत्कृष्ट संयोग हुआ है। सामवेद के मन्त्रों को भी साम कहा गया है। साम की महत्ता गीता में भी प्रतिपादित हुई है, जिसमें भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है- वेदानां सामवेदोऽस्मि। वेद है ज्ञान,
सालोक्य [परिशिष्ट] ४८५ साम है गान। इसलिए ब्राह्मण ग्रन्थों में कहा गया है- गायन्ति हि साम (शत०ब्रा०४.४.५.६)। वाणी को साम की प्रतिष्ठा कहकर निरूपित किया गया है-वाग्वाव साम्नः प्रतिष्ठा (जैमि० १.३९.३)। छान्दोग्योपनिषद् में साम की पञ्चविध उपासना का निर्देश है। ये पाँच प्रकार हैं- १. हिंकार, २. प्रस्ताव, ३.उद्गीथ, ४. प्रतिहार और ५. निधन- लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत। पृथिवी हिंकारः। अग्निः प्रस्तावः। अन्तरिक्षमुद्गीथः। आदित्यः प्रतिहारः। द्यौर्निधनम् (छान्दो०२.२.१)। २४६. सालोक्य— द्र०-पञ्चविध मुक्ति। २४७. सावित्री— गायत्री की लौकिक शक्ति 'सावित्री' कहलाती है, जिसका सम्बन्ध स्थूल जगत् की शक्तियों से है। पारलौकिक शक्ति या ब्रह्मविद्या को गायत्री और वर्चस् या तेजस् को सावित्री माना गया है। आदित्य सविता है, तो प्रकाशमान द्यौ सावित्री है- आदित्य एव सविता द्यौः सावित्री (सावि० ६)। अग्नि सविता है, तो पृथिवी सावित्री है-अग्निरेव सविता पृथिवी सावित्री (सावि० १)। वरुण सविता है, तो आपः सावित्री है-वरुण एव सविता ऽऽपः सावित्री (सावि० २)। सावित्री को जानने वाला मृत्यु बन्धन से तर जाता है और उसी लोक को प्राप्त होता है-यो वा एतां सावित्रीमेवं वेदाऽप पुनर्मृत्युं तरति सावित्र्या एव सलोकतां जयति (जैमि०४.२८.६)। ब्रह्म से वायु, वायु से ओंकार, ओंकार से सावित्री, सावित्री से गायत्री और गायत्री से लोकों की उत्पत्ति होती है-ब्रह्मणो वायुः वायोरोंकारः ॐकारात्सावित्री सावित्र्या गायत्री गायत्र्या लोका भवन्ति (अ०शि०६)। २४८. सिद्धि —द्र०-ऋद्धि। २४९. सुषुप्ति —द्र०-जाग्रत्। २५०. सुषुम्ना नाड़ी— उपनिषद् ज्ञान के अनुसार हृदयरूपी केन्द्र से सम्पूर्ण शरीर में नाड़ियों का जाल बिखरा हुआ है। हृदय देश में १०१ नाड़ियाँ है। हर नाड़ी की सौ-सौ शाखाएँ हैं और उनमें प्रत्येक की बहत्तर-बहत्तर हजार प्रतिशाखाएँ है। इन सब नाड़ियों में व्यान वायु संचार करता है। इसे ही विज्ञानी नाड़ी संस्थान कहते है। हठयोग के अनुसार शरीर को तीन प्रधान नाड़ियों (इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना) में से एक सुषुम्ना नाड़ी है, जो नाभि के मध्य में इड़ा, दक्षिण भाग में पिंगला और मध्य में सुषुम्ना नाड़ी स्थित है। इसे त्रिगुणमयी अर्थात् सूर्य, चन्द्र और अग्निरूपिणी माना गया है। वैद्यक के अनुसार चौदह प्रधान नाड़ियों में से एक सुषुम्ना नाड़ी है, जो नाभि के मध्य स्थित है, जिससे अन्य सब नाड़ियाँ सम्बन्धित हैं। क्षुरिकोपनिषद् में सुषुम्ना नाड़ी का वर्णन दृष्टिगोचर होता है। सुषुम्ना परम तत्त्व में लीन है और विरजा (विशुद्ध) ब्रह्मरूपिणी है। वाम नाड़ी इड़ा और दक्षिण नाड़ी पिंगला के बीच जो उत्तम स्थान है, उसे (सुषुम्ना को) जो जानता है, वह वेदविद् कहा जाता है-सुषुम्ना तु परे लीना विरजा ब्रह्मरूपिणी। इडा तिष्ठति वामेन पिङ्गला दक्षिणेन तु। तयोर्मध्ये परं स्थानं यस्तं वेद स वेदवित् (क्षुरि०१६- १७)। ध्यानयोग से सब नाड़ियाँ छेदी जाती हैं, परन्तु एक सुषुम्ना नहीं छेदी जाती-छिद्यन्ते ध्यानयोगेन सुषुम्नैका न छिद्यते (क्षुरि०१८)। योग दर्शन में इस ऊर्ध्वगामिनी नाड़ी को कुण्डलिनी नाड़ी भी कहते है। २५१. सूक्ष्मद्रष्टा— अत्यन्त छोटी-छोटी बातें समझ लेने वाला, विशिष्ट बुद्धिमान्, ऋषि, परमेश्वर, शिव आदि को सूक्ष्मद्रष्टा कहा गया है। तीव्र या बेधक दृष्टि रखने वाले, सूक्ष्म विषय को समझने वाले, कुशाग्र बुद्धि वाले सूक्ष्मद्रष्टा रूप में मान्य है। वह आत्मा समस्त प्राणियों में छिपा होने के कारण प्रत्यक्ष नहीं होता, केवल सूक्ष्मदर्शियों के द्वारा अतिसूक्ष्म बेधक दृष्टि से देखा जाता है-एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते। दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः (कठ०१.३.१२)। वह परमात्मा सूक्ष्म से भी अतिसूक्ष्म, हृदयगुहा के गुहास्थान में स्थित है और वही सम्पूर्ण विश्व की रचना करने वाला तथा अनेक रूप धारण करने वाला है-सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् (श्वेता०४.१४)। २५२. सृष्टि-अतिसृष्टि— जगत् का आविर्भाव या संसार की उत्पत्ति को सृष्टि कहा जाता है। इस शब्द के अन्य पर्यायवाची शब्द हैं-उत्पत्ति, निर्माण, प्रकृति, उदारता, त्याग आदि। सृष्टि के आरम्भ में एक ही चेतन तत्त्व था, उसने इच्छा को कि मैं बहुत हो जाऊँ और प्रजा उत्पन्न करूँ-तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय (छान्दो०६.२.३)। वह ब्रह्म (परमेश्वर) ही जगत् का कारण है। वह सर्वज्ञ और सर्वविद् ईश्वर जिसका तप ज्ञानमय है, उसी से हिरण्यगर्भ ब्रह्मा, नाम, रूप और अन्न आदि उत्पन्न होते हैं- यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्य ज्ञानमयं तपः। तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं
४८६ [परिशिष्ट] स्वयम्भू-परिभू च जायते (मुण्ड०१.१.९)। उपनिषद् का कथन है कि जिससे ये सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं, जिसके सहारे जीवित रहते हैं और अन्त में जिसमें विलीन हो जाते हैं, वह ब्रह्म है-यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति। यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद् विजिज्ञासस्व तद् ब्रह्मेति (तैत्ति०३.१.१)। वह ब्रह्म जगत् की रचना कर उसमें अनुप्रविष्ट हो गया-तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् (तैत्ति०२.६.१)। कुछ विद्वानों का मत है कि भगवान् ने अपनी योगमाया से सृष्टि की रचना को। कुछ इसे जड़-चेतन के संयोग या पुरुष-प्रकृति के संयोग से उद्भूत मानते हैं। उत्कृष्ट सृष्टि या उत्कृष्ट रचना की अतिसृष्टि कहा गया है। २५३. सोऽहं— जीव और ब्रह्म की एकता या अभेदता को प्रदर्शित करने वाले अनेक वाक्य वेदान्त शास्त्र में दृष्टिगोचर होते हैं। जीव अज्ञान भाव से ग्रसित होकर अपने को ब्रह्म से पृथक् समझने लगता है। सोऽहं, शिवोऽहं, तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि प्रभृति वाक्यों के उपदेश वेदान्त शिक्षा में मिलते हैं। ये भाव अनुभूति के स्तर पर आने से ही इनसे अज्ञान तिमिर का नाश होता है। सोऽहं साधना से साधक को 'जीवो ब्रह्मैव नापरः' तथ्य का बोध हो जाता है। वह चैतन्य ईश्वर 'सोऽहं' स्वरूप में एक होते पर भी शरीरों की भिन्नता के कारण वह 'जीव' बहुविध बन जाता है- सोऽहमेकोऽपि देहारम्भक भेदवशाद्बहुजीवः (निरा०५)। यह देह ही देवालय है, उसमें जीव केवल शिव ही है। जब मनुष्य का अज्ञानरूप निर्माल्य दूर हो जाता है, तब 'सोऽहं' भाव से उसको पूजना चाहिए- देहो देवालयः प्रोक्तः स जीवः केवलः शिवः। त्यजेदज्ञान निर्माल्यं सोऽहंभावेन पूजयेत् (स्क०१०)। २५४. स्तोम— स्तोम शब्द के पर्यायवाची शब्द हैं-स्तुति, गुणगान, यज्ञ, समूह, राशि। वैदिक संहिताओं में प्रायः देवों के प्रति स्तोम ही संगृहीत हैं। साम गान के अन्तर्गत स्तुतिपरक छन्दों को स्तोम कहा गया है। इस तथ्य की पुष्टि निम्न प्रतिपादन से होती है-यद्यूचि तद्गेथा३ इति स्तोमो वा एष तस्य साम्नो यद्गयं सामोपास्मह इति (जैमि०१.४३.६)। स्तोम को प्रतिहार और छन्द को निधनरूप माना गया है-ऋचः प्रस्तावं सामान्युद्गीथं स्तोमं प्रतिहारं छन्दो निधनम् (जैमि०१.१३.३)। २५५. स्थितता— अपने ही हृदय की दिव्य भावनाओं में सन्तुष्ट एवं शान्त बने रहने वाले साधक को स्थिति को 'स्थितता' कहा जा सकता है। ऐसा साधक किसी भी भौतिक लिप्सा-लालसा से दूर रहता है और किसी भी बाह्य सुख की अपेक्षा नहीं करता। उपनिषद् में जनक-याज्ञवल्क्य संवाद में राजा जनक पूछते हैं-हे याज्ञवल्क्य! स्थितता क्या है? हे सम्राट्! हृदय ही स्थितता है-ऐसा याज्ञवल्क्य ने कहा (बृह०४.१.७)। स्थिर प्रज्ञा या बुद्धि वाले साधकों को गीता में स्थितप्रज्ञ या स्थितधी कहकर निरूपित किया गया है। गीता के अनुसार जब साधक मन में स्थित कामनाओं को त्याग देता है, तब आत्मा से हो आत्मा में सन्तुष्ट हुआ वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है-प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञः तदोच्यते (गी०२.५५)। २५६. स्वधा— द्र०-स्वाहा। २५७. स्वप्न— निद्रावस्था में कुछ मूर्तियों, चित्रों, व्यक्तियों और विचारों आदि का सम्बद्ध या असम्बद्ध श्रृंखला का मन में आना या कोई घटना आदि दिखाई देना स्वप्न कहलाता है। ऋग्वेद तथा अन्य संहिताओं में स्वप्न का उल्लेख हुआ है। ऋ०२.५८.१० में दुःस्वप्न का वर्णन है। ब्रह्मवैवर्त पुराण (अ० ७७) में शुभाशुभ स्वप्नफल का विस्तृत वर्णन है। रात्रि में स्वप्नावस्था में पितृराज मनुष्यों में प्रविष्ट होते हैं-अश्मसु सोमो राजा निशायां पितृराजः स्वप्ने मनुष्यान् प्रविशसि पयसा पशून् (जैमि०४.५.२)। जाग्रत् अवस्था और उसके अधिष्ठाता की स्थिति नेत्र के भीतर है। स्वप्न और उसके अधिष्ठाता तैजस का कण्ठ में समावेश है। सुषुप्ति और उसके अधिष्ठाता प्राज्ञ हृदय में स्थित हैं और तुरीय परमात्मा मूर्धा (मस्तिष्क) में स्थित हैं- नेत्रस्थं जागरितं विद्यात् कण्ठे स्वप्नं समाविशेत्। सुषुप्तं हृदयस्थं तु तुरीयं मूर्ध्नि संस्थितम् (ना०प०५.२५)। जैसे स्वच्छ दर्पण में वस्तु स्पष्ट दीखती है, वैसे शुद्ध अन्तःकरण में परमात्मा के दर्शन होते हैं। जैसे स्वप्न में वस्तु अस्पष्ट दीखती है, वैसे ही पितृलोक में परमात्मा - यथाऽऽदर्शे तथात्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके (कठ०२.३.५)। २५८. स्वयम्भू-परिभू— स्वयम्भू का शाब्दिक अर्थ है, जो स्वयं उत्पन्न हुआ हो-ब्रह्मा,विष्णु,शिव,बुद्ध,कामदेव आदि देवों को स्वयम्भू कहा गया है। यह शब्द ईश्वर के विशेषण रूप में प्रयुक्त होता है। इसी रूप में 'परिभू' शब्द भी है, जिसका अर्थ है-जो चारों ओर से आच्छादित किये हो। प्रथम मनु को भी स्वयम्भू या स्वयम्भुव कहा गया है।
स्वर्ग्य अग्नि [परिशिष्ट] ४८७ २५९. स्वर्ग्य अग्नि— स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाली अग्निविद्या को कठोपनिषद् में स्वर्ग्य अग्नि कहा गया है। यह अग्नि- विद्या यमराज ने नचिकेता को प्रदान की। नचिकेता ने दूसरे वर के रूप में यही माँगा था-स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वं श्रद्दधानाय मह्यम् (१.१.१३)। यमराज ने इस स्वर्ग्य अग्नि को नाचिकैताग्नि नाम प्रदान किया। इसका तीन बार अनुष्ठान करने वाला ऋक्, यजु, साम तीनों से सम्बन्ध जोड़कर यज्ञ, दान, तप रूप त्रिकर्म करने वाला मनुष्य जन्म-मृत्यु से तर जाता है-त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य संधिं त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू (कठ०१.१.१७)। २६०. स्वस्ति— स्वस्ति शब्द के पर्याय कुशल-क्षेम, शुभकामना, कल्याण, आशीर्वाद आदि हैं। वैदिक संहिताओं में कई सूक्त माङ्गलिक पाठ या स्वस्ति पाठ के हैं, इन्हें स्वस्तिवाचन कहते हैं। सोम देवता से कल्याण करने की प्रार्थना की गई है-सोमः स्वस्त्या (तै०ब्रा०१.४.८.६)। ब्राह्मण से भी कल्याण की कामना की जाती है-नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मे (कठ०१.१.९)। उपनिषद् का निर्देश है कि परमात्मा का ओम् अक्षर के द्वारा स्मरण करो। अज्ञानमय अन्धकार से परे भवसागर के पार होने के लिए तुम्हारा कल्याण हो-ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानं स्वस्ति वः पाराय तमसः परस्तात् (मुण्ड०२.२.६)। संन्यासी सब जीवों का कल्याण हो, इस भाव से परमात्मा का अनन्य स्मरण करते हुए विचरण करे-स्वस्ति सर्वजीवेभ्य इत्युक्त्वाऽऽत्मानमनन्यं ध्यायन् (क०रु०४)। २६१. स्वाहा-स्वधा— स्वाहा का शाब्दिक अर्थ 'स्व+आ+हा' अपना सम्यक् रूप से त्याग या विसर्जन है। यज्ञ में याजक स्वाहा शब्द के उच्चारण के साथ आहुतियाँ देते हैं, हव्य पदार्थ विसर्जित करते हैं, इसे स्वाहाकार कहते हैं। पितरों को श्रद्धापूर्वक भोज्य पदार्थ पिंड या जल अर्पित करते समय स्वधा शब्द का उच्चारण करते हैं, इसे स्वधाकार कहते हैं। निरुक्तकार यास्क ने स्वाहा शब्द के व्युत्पत्तिपरक अर्थ इस प्रकार दिये हैं-स्वाहेत्येतत्सु आहेति वा, स्वाहुतं हविर्जुहोति ('स्वाहा' इस शब्द का सु=सुन्दर, आह=कथन तथा स्व=स्वत्व=आ= भली प्रकार, हा = समर्पण अर्थात् आहुति के रूप में सम्यक् समर्पण) (नि०८.२०)। पितर स्वधारूपी अन्न से ही आयु (जीवन) पाते हैं- स्वधो वै पितॄणामन्नम् (शत०ब्रा० १३.८.१.४), पितर आयुष्यन्तस्ते स्वधयायुष्मन्तः (तै०सं०२.३.१०.४), स्वधां पितृभ्यः (आगायानि) (छान्दो० २.२२.२)। उपनिषद् में वाणी को धेनुरूप मानकर उसके चार स्तन स्वाहाकार, वषट्कार, हन्तकार और स्वधाकार उपन्यस्त हैं- वाचं धेनुमुपासीत। तस्याश्चत्वारः स्तनाः-स्वाहाकारो वषट्कारो हन्तकारः स्वधाकारः। तस्या द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति, स्वाहाकारं च वषट्कारञ्च। हन्तकारं मनुष्याः। स्वधाकारं पितरः (बृह० ५.८.१)। पुराणों में स्वाहा और स्वधा को अग्निदेव को दो पत्नियां माना गया है। देवों तक आहुति पहुँचाने का कार्य 'स्वाहा' तथा पितरों तक 'स्वधा' करती हैं- ऐसी प्रसिद्धि है। २६२. हंस-परमहंस— हंस झीलों में रहने वाला एक जल पक्षी है। मान्यता है कि यह दूध में से पानी अलग कर देता है। ब्रह्म, आत्मा तथा प्रकाश स्वरूप जीवात्मा को भी हंस कहकर निरूपित किया गया है। अपने परम आराध्य या इष्ट, महात्मा, गुरु को भी आदर भाव से परमहंस कहा जाता है। इसे अध्यात्म तथा साहित्य क्षेत्र में नीर-क्षीर विवेक का प्रतीक माना गया है। सबके जीवन आधार और सबके आश्रयरूप विस्तृत ब्रह्मचक्र (व्यवस्था) में हंस रूप जीवात्मा भ्रमण करता रहता है-सर्वाजीवे सर्वसंस्थे बृहन्ते अस्मिन्हंसो भ्राम्यते ब्रह्मचक्रे (श्वेता० १.६)। वह हंस रूप परमात्मा ज्योतिर्मय परमधाम में रहने वाला है-हंसः शुचिषद (कठ० २.२.२)। उपनिषद् में परमात्मतत्त्व ही हंस के रूप में वर्णित है-जो इस हृदय में स्थित अनाहत ध्वनियुक्त प्रकाशयुक्त चिदानन्द हंस को जानता है, वह हंस ही कहा जाता है-अनाहतध्वनियुतं हंसं यो वेद हृद्गतम्। स्वप्रकाशचिदानन्दं स हंस इति गीयते (ब्र०बि० २०-२१)। आदित्य को भी हंस कहा गया है-एष (आदित्यः) वै हंसः शुचिषद् (ऐत० ब्रा०४.२०)। संन्यासियों की चार श्रेणियाँ मानी गई हैं-कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस। हंस शब्द का आशय है-सद् और असद् के विवेक को शक्ति से परिपूर्ण आत्मा। जिस आत्मा का परम विकास हो गया हो, उसे परमहंस कहा गया है। २६३. हन्तकार — द्र०- वषट्कार । २६४. हय — द्र०-अश्व। २६५. हर्ष-शोक - प्रिय या इष्ट वस्तु या व्यक्ति से उत्पन्न होने वाला सुखात्मक भाव हर्ष कहलाता है। इसका पर्याय आनंद, प्रसन्नता, रोमांच, कामोत्तेजना आदि है। इसके विपरीत अर्थ में 'शोक' शब्द का प्रयोग होता है। साधक साधना पथ से परमात्मा के निकट बढ़ने पर हर्ष को और उससे दूर होने पर शोक को प्राप्त होता है। उस परमात्मा को विवेकवान् पुरुष अध्यात्म योग के द्वारा समझकर हर्षशोक को त्याग देता है - अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं
४८८ (परिशिष्ट) होता मत्वाधीरो हर्षशोकौ जहाति (कठ० १.२.१२)। किसी इष्ट वस्तु अथवा प्रिय व्यक्ति के वियोग अथवा मृत्यु से उत्पन्न भारी मानसिक व्यथा अथवा विषादजन्य स्थिति को शोक कहा जाता है। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं, जीवात्मा बार-बार जन्मने और मरने वाला है, सो उसका शोक करना उचित नहीं-अथ चैनं नित्यजातं, नित्यं वा मन्यसे मृतम्। तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि (गी० २.२६)। २६६. हिरण्यगर्भ— ऐसी मान्यता है कि इस सृष्टि में सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ (स्वर्णिम या ज्योतिर्मय अण्ड या गर्भ) रूप प्रजापति ब्रह्मा उत्पन्न हुए, उन्हीं से समस्त सृष्टि का विस्तार हुआ। कहीं-कहीं हिरण्यगर्भ शब्द भगवान् विष्णु और आत्मा के लिए भी प्रयुक्त हुआ है। सृष्टि संरचना की परिकल्पना करते हुए परमात्मा की एक शक्ति की कल्पना की गयी। सृजन करने वाली इस शक्ति को पुरुष, विश्वकर्मा, हिरण्यगर्भ, प्रजापति और ब्रह्मा आदि की संज्ञाएँ दी गयीं। भागवत पुराण में वर्णन मिलता है कि सृष्टि के आदि में भगवान् नारायण की प्रेरणा से ब्रह्माण्ड स्वर्ण जैसा प्रकाशमान गोलाकार अण्ड रूप में प्रकट हुआ था। उसके ऊर्ध्व और अधः दो भाग हो गये। उसी के बीच से ब्रह्मा जी प्रकट हुए। सम्पूर्ण विश्व की सृष्टि करने वाले, प्राणियों के ईश्वर रूप में यह मान्यता है-एष हि खल्वात्मेशानः शम्भुर्भुवो रुद्रः प्रजापतिर्विश्वसृग्धिरण्यगर्भः (मैत्रा० ५.८)। उस विराट् परमेश्वर ने सबसे पहले हिरण्यगर्भ को उत्पन्न किया था-हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु (श्वेता० ३.४)। २६७. हुत-प्रहुत— हवनीय द्रव्य को हवि, हविष्य या हुत कहते हैं। हवनादि कृत्य के लिए प्रयुक्त खाद्यान्न तिल, चावल, जौ आदि तथा घृत ये हुत के पर्याय हैं। यह यज्ञीय पदार्थ देवों का अन्न या देवात्र कहलाता है। देवों के लिए ही भोज्य पदार्थ या बलि अर्पित करना प्रहुत कहलाता है। उपनिषद् का कथन है कि परमात्मा ने दो अन्न देवों को बाँटे-वे हुत और प्रहुत हैं, इसलिए लोग देवों के लिए आहुति और बलि अर्पित करते हैं- द्वे (अन्ने) देवानभाजयदिति। हुतं च प्रहुतं च। तस्माद् देवेभ्यो जुह्वति च प्र च जुह्वति (बृह० १.५.२)। २६८. हृदय गुहा— प्रत्येक जीव या मनुष्य की हृदय गुहा में परम पुरुष परमात्मा का निवास है, ऐसी प्रसिद्धि है। प्रजापति आदि सम्पूर्ण देवताओं का निवास हृदय में माना गया है- एष प्रजापतिर्यद्धृदयम्। एतद्ब्रह्म (बृह० ५.३.१), हृदिस्था देवताः सर्वा हृदि प्राणाः प्रतिष्ठिताः (अ०शि०४३)। देवी अदिति प्राणों के सहित हृदय गुहा में प्रवेश करके वहीं रहती है- या प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी। गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत (कठ० २.१.७)। वह परमात्मा अन्नमय स्थूल शरीर में हृदयगुहा के आश्रय में प्रतिष्ठित है- प्रतिष्ठितोऽन्ने हृदयं सन्निधाय (मुण्ड०२.२.७), एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा (श्वेता० ६.११)। वास्तविक धर्म का-ज्ञान का तत्त्व हृदय गुहा में स्थित माना जाता है- धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम् (महा०वनपर्व ३१३.११७)। २६९. हृदय ग्रन्थि— हृदय ग्रन्थि का सामान्य अर्थ है- हृदय की गाँठ। द्वेष, कपट, कुटिलता के अर्थ में यह लिया जाता है। सम्मोह या अविद्या से उत्पन्न होने वाले आन्तरिक विकार जो गाँठों की तरह न सुलझने वाले होते हैं और अन्तर् में पीड़ा देते रहते हैं, ये हृदय ग्रन्थियाँ कहे जाते हैं। विषय-विकारों, वासनाओं, इच्छाओं, तृष्णाओं को बन्धनरूप माना गया है, सो इन्हें भी हृदय ग्रन्थियों के रूप में माना जाता है। कठोपनिषद् का कथन है कि जब हृदय की सब ग्रन्थियाँ भली-भाँति खुल जाती हैं, तब मनुष्य अमरत्व को प्राप्त करता है-यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम् (कठ० २.३.१५)। मुण्डकोपनिषद् में कहा गया है कि जब परम तत्त्व (परब्रह्म) का साक्षात्कार हो जाता है, तो हृदयग्रन्थि खुल जाती है और सारे भ्रम-सन्देह दूर हो जाते हैं। समस्त प्रारब्ध कर्म क्षीण हो जाते हैं और अन्ततः वह (जीवात्मा) मुक्त हो जाता है-भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे (मुण्ड० २.२.८)। २७०. होता— यज्ञ कर्त्ता या यज्ञ कराने वाले पुरोहित को होता कहा गया है। यज्ञ में मन्त्रोच्चारण करने वाला ऋत्विक् 'होता' रूप में मान्य है। यज्ञ में प्रमुख चार ऋत्विकों में एक 'होता' है- ब्रह्मा, अध्वर्यु, होता और उद्गाता-इन चारों ऋत्विकों के तीन-तीन सहयोगी मिलाने से कुल सोलह ऋत्विक् बड़े यज्ञों में होते थे। होता के तीन सहयोगी मैत्रावरुण, अच्छावाक् और ग्रावस्तुत् कहलाते हैं। अग्निदेव यज्ञ सम्पन्न करते हैं, सो उन्हें भी होता कहकर निरूपित किया गया है- अग्निर्वेव होताऽऽसीत् (जै०ब्रा० ३.३७४)। अमरकोश (२.७.१७) के अनुसार ऋग्वेदवेत्ता 'होता' कहा जाता है। यज्ञ में यह ऋग्वेद के मंत्रों का पाठ करता है तथा देवों की स्तुति और आवाहन करता हैं।
मन्त्रानुक्रमणिका-ज्ञान खण्ड
{|l l|l l|} \hline मन्त्र-प्रतीक & उपनिषद् विवरण & मन्त्र प्रतीक & उपनिषद् विवरण
\hline ॐअस्य श्री महावाक्य० & शु०२० २० & अत्र यजमानः ..... वसवः & छान्दो० २.२४.६
ॐ अकारो दक्षिणः & ना०बि० १ & अत्रैते श्लोका & मैत्रा० ४ (क)
अकर्मेति च .....यत्तदकर्म & निरा० १२ & अत्रैष देवःस्वप्ने & प्रश्न० ४.५
अग्नये स्वाहेत्यग्रौ हुत्वा & बृह० ६.३.३ & अत्यस्यंतं ..... पादौ & छान्दो० ५.१७.२
अग्निरेव सविता & गाय० ३.२ & अत्यस्यंतं ..... प्राणस्त्वेष & छान्दो० ५.१४.२
अग्निर्मूर्धा चक्षुषी & मुण्ड० २.१.४ & अत्यस्यंतं ..... बस्तिस्त्वेष & छान्दो० ५.१६.२
अग्नियंत्राभिमथ्यते & श्वेता० २.६ & अत्यस्यंतं ..... मूर्धा त्वेष & छान्दो० ५.१२.२
अग्निर्यथैको & कठ० २.२.९ & अत्यस्यंतं ..... संदेहस्त्वेष & छान्दो० ५.१५.२
अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं & ऐत० १.२.४ & अथ कबन्धी कात्यायन & प्रश्न० १.३
अग्निर्हिङ्कारो वायुः & छान्दो० २.२०.१ & अथ कर्मणामात्मेत्येतेदषा... & बृह० १.६.३
अग्निष्टे पादं वक्तेति & छान्दो० ४.६.१ & अथ किमेतैर्वा .... गन्धर्वा... & मैत्रा० १.६
अग्ने नय सुपथा & ईश० १८ & अथ किमेतैर्वा .... महाधनुर्धरा.. & मैत्रा० १.५
अग्राह्यमिति.... ग्राह्यात् & निरा० ३८ & अथ किमेतैर्वा शोषणम् & मैत्रा० १.७
अघोषमव्यञ्जनमस्वरम् & अमृ० २५ & अथ खलु..... असौ & छान्दो० १.५.१
अङ्गहीनानि वाक्यानि & शु०२० १६ & अथ खलु व्यानमेवोद्गीथम् & छान्दो० १.३.३
अङ्गुष्ठमात्रः & श्वेता० ३.१३ & अथ खलु.... होतृ.... & छान्दो० १.५.५
अङ्गुष्ठमात्रः.... ज्योतिः & कठ० २.१.१३ & अथ खलूद्गीथाक्षराणि & छान्दो० १.३.६
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो & कठ० २.३.१७ & अथ खल्वमुमादित्यः & छान्दो० २.९.१
अङ्गुष्ठमात्रः...... मध्य & कठ० २.१.१२ & अथ खल्वात्मसंमितम् & छान्दो० २.१०.१
अङ्गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः & श्वेता० ५.८ & अथ खल्वाशीः & छान्दो० १.३.८
अच्युतोऽस्मि महादेव & स्कन्द० १ & अथ खल्वियम् & मैत्रा० २.३
अजात इत्येवम् & श्वेता० ४.२१ & अथ खल्वेतयर्चा पच्छ & छान्दो० ५.२.७
अजामेकां लोहित..... & श्वेता० ४.५ & अथ चक्षुरत्यवहत्तद्यदा & बृह० १.३.१४
अजा हिङ्कारोऽवयः & छान्दो० २.१८.१ & अथ जुहोति नमः & छान्दो० २.२४.१४
अजीर्यताममृतानामुपेत्य & कठ० १.१.२८ & अथ जुहोति नमोऽग्नये & छान्दो० २.२४.५
अज्ञानजन बोधार्थं & ना०बि० २९ & अथ जुहोति नमो वायवे & छान्दो० २.२४.९
अज्ञानं चेति & ना०बि० २६ & अथ तत ऊर्ध्व उदेत्य & छान्दो० ३.११.१
अज्ञानमिति .... ज्ञानमज्ञानम् & निरा० १४ & अथ तथा मुद्गलोपनिषदि & मुद्ग० २.१
अणिमाद्यष्टैश्च .... बन्धः & निरा० २१ & अथ त्रयो वाव लोकाः & बृह० १.५.१६
अणोरणीयान्महतो महीयानात्मा & श्वेता०३.२० & अथ प्रतिसृप्याञ्जलौ & छान्दो० ५.२.६
अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य & कठ०१.२.२० & अथ भगवाञ्छाकायन्यः & मैत्रा० २.१
अतः समुद्रा गिरयश्च & मुण्ड० २.१.९ & अथ मनोऽत्यवहत्तद्यदा & बृह० १.३.१६
अतीन्द्रियं गुणातीतं & ना०बि० १८ & अथ महावाक्यानि & शु०२० २२
अतो यान्यन्यानि & छान्दो० १.३.५ & अथ य आत्मा स सेतु & छान्दो० ८.४.१
अत्र पिताऽपिता भवति & बृह० ४.३.२२ & अथ य इच्छेत्पुत्रो मे कपिलः & बृह० ६.४.१५
अत्र यजमानः .... रुद्रा & छान्दो० २.२४.१० & अथ य इच्छेत्पुत्रो मे पण्डितो & बृह० ६.४.१८
\hline
मन्त्रानुक्रमणिका ४९० मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण अथ य इच्छेत्पुत्रो मे श्यामो बृह० ६.४.१६ अथ यदि सखिलोक छान्दो० ८.२.५ अथ य इच्छेद्दुहिता मे बृह० ६.४.१७ अथ यदि सामतो छान्दो० ४.१७.६ अथ य इमे ग्रामे छान्दो० ५.१०.३ अथ यदि स्त्रीलोक कामो छान्दो० ८.२.९ अथ य एतदेवम् छान्दो० ५.२४.२ अथ यदि स्वसृलोक कामो छान्दो० ८.२.४ अथ य एतदेवं विद्वान् छान्दो० १.७. ७ अथ यदु चैवास्मिञ्छ्रव्यं छान्दो० ४.१५.५ अथ य एष सम्प्रसादो० छान्दो० ८.३.४ अथ यदूर्ध्वं मध्यम् छान्दो० २.९.६ अथ य एषोऽन्तरक्षिणि छान्दो० १.७.५ अथ यदूर्ध्वमपराह्नात् छान्दो०२.९.७ अथ य एषो बाह्या मैत्रा० २.२ अथ यदेतदक्षणः शुक्लम् छान्दो० १.७.४ अथ य एषोऽन्तरे मैत्रा० ५.२ अथ यदेतदादित्यस्य छान्दो० १.६.५ अथ यच्चतुर्थममृतम् छान्दो० ३.९.१ अथ यदेवैतदादित्यस्य छान्दो० १.६.६ अथ यत्तदजायत छान्दो० ३.१९.३ अथ यद्द्वितीयममृतं छान्दो० ३.७.१ अथ यत्तपो दानम् छान्दो० ३.१७.४ अथ यद्धसति छान्दो० ३.१७.३ अथ यत्तृतीयममृतम् छान्दो० ३.८.१ अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते छान्दो० ८.५.१ अथ यत्पञ्चमममृतम् छान्दो० ३.१०.१ अथ यद्यन्नपानलोक कामो छान्दो० ८.२.७ अथ यत्प्रथमास्तमिते छान्दो० २.९.८ अथ यद्यप्येनानुक्रान्त० छान्दो० ७.१५.३ अथ यत्प्रथमोदिते छान्दो० २.९.३ अथ यद्युदक आत्मानम् बृह० ६.४.६ अथ यत्रैतत्पुरुषः छान्दो० ६.८.५ अथ यद्येनमूष्मसूपालभेत छान्दो० २.२२.४ अथ यत्रैतदबलिमानम् छान्दो० ८.६.४ अथ यस्य जायामर्तवम् बृह० ६.४.१३ अथ यत्रैदस्माच्छरीराद् छान्दो० ८.६.५ अथ यस्य जायायै बृह० ६.४.१२ अथ यत्रैतदाकाशम् छान्दो० ८.१२.४ अथ य...... हृत्पुष्कर मैत्रा० ५.२ अथ यत्रोपाकृते छान्दो० ४.१६.४ अथ या एता हृदयस्य छान्दो० ८.६.१ अथ यत्सङ्गववेलाया छान्दो० २.९.४ अथ यां चतुर्थीम् छान्दो० ५.२२.१ अथ यत्सत्रायणमित्याचक्षते छान्दो० ८.५.२ अथ यां तृतीयाम् छान्दो० ५.२१.१ अथ यत्सम्प्रति मध्यन्दिने छान्दो० २.९.५ अथ यां द्वितीयाम् छान्दो० ५.२०.१ अथ यथेयं कौत्सायनी मैत्रा० ४.४ (ठ) अथ यानि चतुश्चत्वारि छान्दो० ३.१६.३ अथ यदतः परो छान्दो० ३.१३.७ अथ यान्यष्टाचत्वारि छान्दो० ३.१६.५ अथ यदनाशकायनामित्या छान्दो० ८.५.३ अथ यां पञ्चमीम् छान्दो० ५.२३.१ अथ यदवोच ० छान्दो० ३.१५.७ अथ यामिच्छेद्दधीतेति बृह० ६.४.११ अथ यदवोचं भुवः छान्दो० ३.१५.६ अथ यामिच्छेत्र गर्भंदधीत बृह० ६.४.१० अथ यदवोचं भूः छान्दो० ३.१५.५ अथ ये चास्येह छान्दो० ८.३.२ अथ यदश्नाति छान्दो० ३.१७.२ अथ ये यज्ञेन दानेन बृह० ६.२.१६ अथ यदा सुषुप्तो भवति बृह० २.१.१९ अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मय छान्दो० ३.२.१ अथ यदास्य वाङ् छान्दो० ६.१५.२ अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो छान्दो० ३.३.१ अथ यदि गन्धमाल्य छान्दो० ८.२.६ अथ येऽस्योदञ्चो छान्दो० ३.४.१ अथ यदि गीतवादित्र छान्दो० ८.२.८ अथ येऽस्योर्ध्वा रश्मयस्ता छान्दो० ३.५.१ अथ यदि तस्याः कर्ता छान्दो० ६.१६.२ अथ योऽयमूर्ध्वा मैत्रा० २.७ अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे छान्दो० ८.१.१ यो वेदेदं मन्वानीति छान्दो० ८.१२.५ अथ यदि द्विमात्रेण प्रश्न० ५.४ अथ योऽस्य दक्षिणः छान्दो० ३.१३.२ अथ यदि महज्जिगमिषेद् छान्दो० ५.२.४ अथ योऽस्य प्रत्यङ् सुषिः छान्दो० ३.१३.३ अथ यदि भ्रातृलोक कामो छान्दो० ८.२.३ अथ योऽस्योदङ् सुषिः छान्दो० ३.१३.४ अथ यदि मातृलोक छान्दो० ८.२.२ अथ योऽस्योर्ध्वः छान्दो० ३.१३.५ अथ यदि यजुष्टो छान्दो० ४.१७.५ अथ रहस्योपनिषद्.... शु०र० ३०
४११ मन्त्रानुक्रमणिका मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण अथ रूपाणां चक्षुः बृह० १.६.२ अथ हैनमुद्गातोपससाद छान्दो० १.११.६ अथर्वणे यां प्रवदेत मुण्ड० १.१.२ अथ हैनमुद्दालक आरुणिः बृह० ३.७.१ अथ वंशः । पौतिभाषी बृह० ६.५.१ अथ हैनमुषस्तश्चाक्रा० बृह० ३.४.१ अथ वंशः पौतिमाष्यात् बृह० ४.६.१ अथ हैनमुषभोऽभ्युवाद छान्दो० ४.५.१ अथ वंशः पौतिमाष्यो बृह० २.६.१ अथ हौनं यजमान उवाच छान्दो० १.११.१ अथ वायुमब्रुवन् केन० ३.७ अथ हौनं वागुवाच छान्दो० ५.१.१३ अथ श्रोत्रमन्ववहत्तद्यदा बृह० १.३.१५ अथ हौनं विदग्धः शाकल्यः बृह० ३.९.१ अथ सप्तविधस्य वाचि छान्दो० २.८.१ अथ हौनं शैब्यः प्रश्नो० ५.१ अथ ह चक्षुरुद्गीथम् छान्दो० १.२.४ अथ हौनं श्रोत्रमुवाच छान्दो० ५.१.१४ अथ ह चक्षुरूचुस्त्वम् बृह० १.३.४ अथ हौनं सुकेशा प्रश्नो० ६.१ अथ ह प्राण उच्चिक्रमिष छान्दो० ५.१.१२ अथ हौनं सौर्यायणी प्रश्नो० ४.१ अथ ह प्राणं उत्क्रमि- बृह० ६.१.१३ अथ होवाच जनः शार्क छान्दो० ५.१५.१ अथ ह प्राणमन्ववहत् बृह० १.३.१३ अथ होवाच बुडिलमाश्व छान्दो० ५.१६.१ अथ ह प्राणमूचुस्त्वं न बृह० १.३.३ अथ होवाच ब्राह्मणाः बृह० ३.९.२७ अथ ह प्राणा अह१ श्रेयसि छान्दो० ५.१.६ अथ होवाच सत्ययज्ञम् छान्दो० ५.१३.१ अथ ह मन उद्गीथम् छान्दो० १.२.६ अथ होवाचेन्द्र द्युम्नम् छान्दो० ५.१४.१ अथ ह मन ऊचुस्त्वम् बृह० १.३.६ अथ होवाचोद्दालकम् छान्दो० ५.१७.१ अथ ह य एतानेवम् छान्दो० ५.१०.१० अथात आत्मादेश एवा छान्दो० ७.२५.२ अथ ह य एवायं मुख्यः छान्दो० १.२.६ अथातः पवमानानामे० बृह० १.३.२८ अथ ह याज्ञवल्क्यस्य द्वे बृह० ४.५.१ अथातः शौव उद्गीथः छान्दो० १.१२.१ अथ ह वाचक्रव्युवाच बृह० ३.८.१ अथातः सम्प्रत्तिर्यदा बृह० १.५.१७ अथ ह वाचमुद्गीथम् छान्दो० १.२.३ अथातो रहस्योपनिषदम् शु०२० १ अथ ह शौनकं च छान्दो० ४.३.५ अथातो व्रतमीमा १ सा बृह० १.५.२१ अथ ह श्रोत्रमूचुस्त्वम् बृह० १.३.५ अथात्मनेऽन्नाद्यमागा० बृह० १.३.१७ अथ ह श्रोत्रमुद्गीथम् छान्दो० १.२.५ अथादित्य उदयन् प्रश्नो० १.६ अथ ह हंसो निशायाम् छान्दो० ४.१.२ अथाधिदैवतं ज्वलिष्यामि बृह० १.५.२२ अथ हाग्नयः समूदिरे छान्दो० ४.१०.४ अथाधिदैवतं य एवासौ छान्दो० १.३.१ अथ हेन्द्रोऽप्राप्यैव छान्दो० ८.९.१ अथाध्यात्मं अधरा तैत्ति० १.३.४ अथ हेममासन्यम् बृह० १.३.७ अथाध्यात्मं प्राणो वाव छान्दो० ४.३.३ अथ हौनं कहोलः बृह० ३.५.१ अथाध्यात्ममिदमेव मूर्तम् बृह० २.३.४ अथ हौनं कौसल्यः प्रश्नो० ३.१ अथाध्यात्मं य एवायम् छान्दो० १.५.३ अथ हौनं गार्गी वाच० बृह० ३.६.१ अथाध्यात्मं यदेतद् केन० ४.५ अथ हौनं गार्हपत्यो० छान्दो० ४.११.१ अथाध्यात्मं वागेवर्वाणः छान्दो० १.७.१ अथ हौनं जारत्कारव बृह० ३.२.१ अथानु किमनुशिष्टः छान्दो० ५.३.४ अथ हौनं प्रतिहर्तोपससाद छान्दो० १.११.८ अथानेनैव ये चैतस्मात् छान्दो० १.७.८ अथ हौनं प्रस्तोतोपससाद छान्दो० १.११.४ अथान्यत्राप्युक्तं-अथखलु मैत्रा० ५.४ अथ हौनं भार्गवो प्रश्नो० २.१ अथान्यत्राप्युक्तं - महानदी- मैत्रा० ४.२ अथ हौनं भुज्युर्लाह्यायनिः बृह० ३.३.१ अथान्यत्राप्युक्तं - यः कर्ता मैत्रा० ३.३ अथ हौनं मनुष्या ऊचुः बृह० ५.२.२ अथान्यत्राप्युक्तं - शरीरमिदं मैत्रा० ३.४ अथ हौनमन्वाहार्यपचनो छान्दो० ४.१२.१ अथान्यत्राप्युक्तं - संमोहो मैत्रा० ३.५ अथ हौनमसुरा ऊचुः बृह० ५.२.३ अथान्यत्राप्युक्तं - स्वनवत्येषा० मैत्रा० ५.५ अथ हौनमाहवनीयः छान्दो० ४.१३.१ अथाभिप्रायरेव स्थाली बृह० ६.४.१९
मन्त्रानुक्रमणिका ४९८
| मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण |
|---|---|---|---|
| अथामूर्तं प्राणश्च यश्च | बृह० २.३.५ | अन्ते तु किंकिणी वंश | ना०बि० ३५ |
| अथामूर्त वायुश्चान्तरिक्षम् | बृह० २.३.३ | अन्तेवास्युत्तररूपम् | तैत्ति० १.३.३ |
| अथावृतेषु चोर्हिङ्कारः | छान्दो० २.२.२ | अन्धं तमः प्रविशन्ति | बृह० ४.४.१० |
| अथाव्यात्तम् वा | मैत्रा० ५.६ | अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्याम् | ईश० ९ |
| अथास्य दक्षिणं कर्णम० | बृह० ६.४.२५ | अन्धन्तमः प्रविशन्ति ये सम्भूतिम् | ईश० १२ |
| अथास्य नाम करोति | बृह० ६.४.२६ | अन्धवत्पश्य रूपाणि | अमृ० १५ |
| अथास्य मातरमभिम. | बृह० ६.४.२८ | अन्नकार्याणां कोशानां | सर्व० ५ |
| अथास्या ऊरू विहापयति | बृह० ६.४.२१ | अन्नं न निन्द्यात् | तैत्ति० ३.७.१ |
| अथेत्यभ्यमन्थत्स मुखाच्च | बृह० १.४.६ | अन्नं न परिचक्षीत | तैत्ति० ३.८.१ |
| अथेन्द्रमब्रुवन् | केन० ३.११ | अन्नं ब्रह्मेति | तैत्ति० ३.२.१ |
| अथैकयोर्ध्व उदानः | प्रश्न० ३.७ | अन्नं ब्रह्मेत्येक आहु. | बृह० ५.१२.१ |
| अथैतद्वामेऽक्षणि | बृह० ४.२.३ | अन्नं बहु कुर्वीत | तैत्ति० ३.९.१ |
| अथैतयोः पथोर्न कतरेण | छान्दो० ५.१०.८ | अन्नमय प्राणमय० | मुद्र० ४.५ |
| अथैतस्य प्राणस्यापः | बृह० १.५.१३ | अन्नमयः हि सोम्य | छान्दो० ६.५.४ |
| अथैतस्य मनसो द्यौः | बृह० १.५.१२ | अन्नमयः हि सोम्य मनः | छान्दो० ६.६.५ |
| अथैनमग्नये | बृह० ६.२.१४ | अन्नमशितं त्रेधा विधीयते | छान्दो० ६.५.१ |
| अथैनमभिमृशति | बृह० ६.३.४ | अन्नमिति होवाच | छान्दो० १.११.९ |
| अथैनमाचामति | बृह० ६.३.६ | अन्नं वाव बलाद् भूयस्त- | छान्दो० ७.९.१ |
| अथैनं मात्रे प्रदाय | बृह० ६.४.२७ | अन्नं वै प्रजापतिः | प्रश्न० १.१४ |
| अथैनमुद्गच्छत्याम | बृह० ६.३.५ | अन्नाद्वै प्रजाः | तैत्ति० २.२.१ |
| अथैनामभिपद्यते | बृह० ६.४.२० | अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव | कठ० १.२.१ |
| अथैनं वसतयोपमन्त्रया. | बृह० ६.२.३ | अन्यतरामेव वर्तनी | छान्दो० ४.१६.३ |
| अथैष श्लोको भवति | बृह० १.५.२३ | अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्माद् | कठ० १.२.१४ |
| अथो अयं वा आत्मा | बृह० १.४.१६ | अन्येदेवाहुः | ईश० १३ |
| अथोताप्याहुः | छान्दो० २.१.३ | अन्यदेवाहुर्विद्यया | ईश० १० |
| अथोपाँशुरन्तर्यामि | मैत्रा० २.८ | अन्यविद्यापरिज्ञानमवश्यं | शु०२० ४४ |
| अथोत्तरेण | प्रश्न० १.१० | अपां का गतिरित्यसौ | छान्दो० १.८.५ |
| अद्यभ्यश्चैनं चन्द्रमसश्च | बृह० १.५.२० | अपाणिपादो जवनो | श्वेता० ३.१९ |
| अधिष्ठाने तथा | ना०बि० २८ | अपाने तृप्यति वाक्तृप्यति | छान्दो० ५.२१.२ |
| अधीहि भगव इति | छान्दो० ७.१.१ | अपामपोग्निः | मैत्रा० ४.४(ञ) |
| अध्यस्तस्य कुतो | ना०बि० २५ | अपाꣳ सोम्य पीयमानानाम् | छान्दो० ६.६.३ |
| अनन्दानाम ते लोका | बृह० ४.४.११ | अप्राणो ह्यमनाः | सर्व० १७ |
| अनात्मदृष्टेरविवेक- | शु०२० ३९ | अम्भमेव सविता | गाय० ३.८ |
| अनाद्यनन्तम् | श्वेता० ५.१३ | अभिमन्थति स हिङ्कारा | छान्दो० २.१२.१ |
| अनिरुक्तस्त्रयोदशः | छान्दो० १.१३.३ | अभेददर्शनं ज्ञानम् | स्कन्द० ११ |
| अनुपश्य यथा | कठ० १.१.६ | अभ्यस्यमानो नादोऽयम् | ना०बि० ३२ |
| अनुवजन्नाजुहाव | शु०२० ५१ | अभ्रं भूत्वा मेघो भवति | छान्दो० ५.१०.६ |
| अनेजदेकं मनसो | ईश० ४ | अभ्राणि संप्लवन्ते | छान्दो० २.१५.१ |
| अनेन विधिना | अमृ० २९ | अमात्राश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः | माण्डू० १२ |
| अन्तरङ्गं समुद्रस्य | ना०बि० ४६ | अमृतत्वं देवेभ्यः | छान्दो० २.२२.२ |
| अन्तरिक्षमेवार्वायुः | छान्दो० १.६.२ | अयं चन्द्रः सर्वेषाम् | बृह० २.५.७ |
| अन्तरिक्षोदरः कोशो | छान्दो० ३.१५.१ | अयं धर्मः सर्वेषां भूतानाम् | बृह० २.५.११ |
४९३ मन्त्रानुक्रमणिका
| मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण |
|---|---|---|---|
| अयमग्निवैश्वानरो | बृह० ५.९.१ | अस्तीत्येवोपलब्ध- | कठ० २.३.१३ |
| अयमग्निः सर्वेषां भूतानाम् | बृह० २.५.३ | अस्य यदेकाः शाखाम् | छान्दो० ६.११.२ |
| अयमाकाशः सर्वेषाम् | बृह० २.५.१० | अस्य लोकस्य का | छान्दो० १.९.१ |
| अयमात्मा सर्वेषां भूतानाम् | बृह० २.५.१४ | अस्य विस्रंसमानस्य | कठ० २.२.४ |
| अयमादित्यः सर्वेषाम् | बृह० २.५.५ | अस्य सोम्य महतो | छान्दो० ६.११.१ |
| अयं वाव खल्वस्य | मैत्रा० ४.३ | अहमन्नमहमन्नमन्न- | तैत्ति०३.१०.६ |
| अयं वाव लोको | छान्दो० १.१३.१ | अहरेव सविता | गाय० ३.६ |
| अयं वाव स ......पुरुष | छान्दो० ३.१२.८ | अहर्वा अश्वं पुरस्तात् | बृह० १.१.२ |
| अयं वाव स ......हृदय | छान्दो० ३.१२.९ | अह्निकेति होवाच | बृह० ३.९.२५ |
| अयं वायुः सर्वेषाम् | बृह० २.५.४ | अहं वृक्षस्य रेरिवा | तैत्ति०१.१०.१ |
| अयं वै लोकोऽग्निर्गौतम | बृह० ६.२.११ | अहोरात्रो वै प्रजापतिः | प्रश्न० १.१३ |
| अयः स्तनयित्नुः सर्वेषाम् | बृह० २.५.९ | आकाश एव यस्याय | बृह०३.९.१३ |
| अरण्योर्निहितो | कठ० २.१.८ | आकाशो वाव तेजसो | छान्दो० ७.१२.१ |
| अरा इव रथनाभौ कला | प्रश्न० ६.६ | आकाशो वै नाम | छान्दो० ८.१४.१ |
| अरा इव रथनाभौ प्राणे | प्रश्न० २.६ | आगमस्याविरोधेन | अमृ० १७ |
| अरा इव स्थनाभौ संहता | मुण्ड० २.२.६ | आगाता ह वै कामानां | छान्दो०१.२.१४ |
| अरिष्टं कोशम् | छान्दो० ३.१५.३ | आग्नि वेश्यादाग्निवेश्यो | बृह०४.६.२ |
| अविद्यायां बहुधा | मुण्ड० १.२.९ | आग्निवेश्यादाग्निवेश्यः | बृह० २.६.२ |
| अविद्यायामन्तरे | मुण्ड० १.२.८ | आज्ञाभय....बन्धः | निरा० २५ |
| अविद्यायामन्तरे | कठ० १.२.५ | आत्मन एष प्राणो | प्रश्न० ३.३ |
| अव्यक्तात्तु | कठ० २.३.८ | आत्मानं चेद्विजानीयाद० | बृह०४.४.१२ |
| अविः संनिहितम् | मुण्ड० २.२.१ | आत्मानमन्तत उपसृत्य | छान्दो० १.३.१२ |
| अशक्यः सोऽन्यथा | मन्त्रि० ३ | आत्मानं रथिनं | कठ० १.३.३ |
| अशनापिपासे मे सोम्य | छान्दो० ६.८.३ | आत्मानं सततं | ना० बि० २१ |
| अशनायापिपासा. | मुद्ग० ४.७ | आत्मा वा इदमेक | ऐत० १.१.१ |
| अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं | कठ० १.३.१५ | आत्मेश्वर जीवः | सर्व० २ |
| अशरीर शरीरेषु | कठ० १.२.२२ | आत्मैवेदमग्र आसीत् | बृह० १.४.१ |
| अशरीरो वायुरभ्रं विद्युत् | छान्दो० ८.१२.२ | आत्मैवेदमग्र आसीदेक | बृह० १.४.१७ |
| अशीतिश्च शतम् | अमृ० ३४ | आत्रेयी पुत्रादात्रेयीपुत्रो | बृह० ६.५.२ |
| अष्टपादं शुचिम् | मन्त्रि० १ | आदित्यवस्य रेतसः | छान्दो० ३.१७.७ |
| असद्वा इदमग्र | तैत्ति० २.७.१ | आदित्य इति होवाच | छान्दो० १.११.७ |
| असन्नेव स भवति | तैत्ति० २.६.१ | आदित्य ऊकारो | छान्दो० १.१३.२ |
| असिपद महामन्त्रस्य | शु०२० २७ | आदित्य एव सविता | गाय० ३.४ |
| असूर्या नाम ते | ईश० ३ | आदित्यमथ वैश्वदेवम् | छान्दो० २.२४.१३ |
| असौ वा आदित्यो | छान्दो० ३.१.१ | आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः | छान्दो० ३.१९.१ |
| असौ वाव लोको | छान्दो० ५.४.१ | आदित्यो ह वै प्राणः | प्रश्न० १.५ |
| असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम | बृह० ६.२.९ | आदित्यो ह वै बाह्यः | प्रश्न० ३.८ |
| अस्तमित आदित्ये.... चन्द्रः | बृह० ४.३.४ | आदिरिति द्वयक्षरम् | छान्दो० २.१०.२ |
| अस्तमित आदित्ये याज्ञ- | बृह० ४.३.३ | आदिः स संयोग- | श्वेता० ६.५ |
| अस्तमित आदित्ये.... शान्ते- | बृह० ४.३.६ | आदौ जलधिजीमूतभेरी | ना० बि० ३४ |
| अस्तमित आदित्ये.... शान्ते | बृह० ४.३.५ | आनन्दो ब्रह्मेति | तैत्ति० ३.६.१ |
| अस्ति खल्वन्योऽपरो | मैत्रा०३.२ | आप एव ... हृदयम | बृह० ३.९.१६ |
मन्त्रानुक्रमणिका [४९४]
| मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण |
|---|---|---|---|
| आप एवेदमग्र आसुस्ता | बृह० ५.५.१ | ईश्वर उवाच एवमुक्त्वा | शु०र० ४६ |
| आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते | छान्दो० ६.५.२ | ईश्वर उवाच– मयोपदिष्टे | शुक० ६ |
| आपयिता ह वै कामानाम् | छान्दो० १.१.७ | उक्थं प्राणो वा उक्थम् | बृह० ५.१३.१ |
| आपो वा अर्कस्तद्यदपां | बृह० १.२.२ | उत्क्षिप्य वायुमाकाशम् | अमृत० १२ |
| आपो वावान्नाद्भूयस्यः | छान्दो० ७.१०.१ | उत्तिष्ठत जाग्रत | कठ० १.३.१४ |
| आप्रोतिहादित्यस्य | छान्दो० २.१०.६ | उत्पत्तिमायतिं स्थानं | प्रश्न० ३.१२ |
| आ मा यन्तु ब्रह्मचारिणः | तैत्ति० १.४.२ | उत्पन्ने तत्त्वविज्ञाने | ना० बिन्दु० २२ |
| आरभ्य कर्माणि | श्वेता० ६.४ | उदशराव आत्मानमवेक्ष्य | छान्दो० ८.८.१ |
| आराममस्य पश्यन्ति | बृह० ४.३.१४ | उदाने तृप्यति त्वक्तृप्यति | छान्दो० ५.२३.२ |
| आविः संनिहितं | मुण्ड० २.२.१ | उदासीनस्ततो | ना० बिन्दु० ४० |
| आशा प्रतीक्षे | कठ० १.१.८ | उद्गीतमैतत्परमम् | श्वेता० १.७ |
| आशा वाव स्मराद्भूयस्या० | छान्दो० ७.१४.१ | उद्गीथ इति त्र्यक्षरम् | छान्दो० २.१०.३ |
| आसीनो दूरं | कठ० १.२.२१ | उद्गृह्णाति तन्निधनं | छान्दो० २.३.२ |
| आसुरमिति.... आसुरम् | निरा० ३४ | उद्दालको हाऽऽरुणिः | छान्दो० ६.८.१ |
| इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः | छान्दो० ५.९.१ | उद्यन्हिङ्कार उदितः | छान्दो० २.१४.१ |
| इदं निरालम्बोप.....इत्युपनिषत् | निरा० ४० | उपकोसलो ह वै | छान्दो० ४.१०.१ |
| इदं मानुषः सर्वेषाम् | बृह० २.५.१३ | उपदिष्टं परम्ब्रह्म | शु० र० १२ |
| इदमिति ह प्रतिजज्ञे | छान्दो० ४.१४.३ | उपदिष्टः शिवेनेति | शु० र० ४९ |
| इदं वाव तज्ज्येष्ठाय | छान्दो० ३.११.५ | उपनिषदं भो | केन० ४.७ |
| इदं वै तन्मधु... तद्वाम | बृह० २.५.१६ | उपमन्त्रयते स हिङ्कारो | छान्दो० २.१३.१ |
| इदं वै तन्मधु– दधीचे. | बृह० २.५.१७ | उपास्य इति... गुरुरुपास्यः | निरा० ३० |
| इदं वै तन्मधु... द्रूप | बृह० २.५.१९ | उशन् ह वै | कठ० १.१.१ |
| इदं वै तन्मधु.. पुरश्चक्रे | बृह० २.५.१८ | उषा वा अश्वस्यमेध्यस्य | बृह० १.१.१ |
| इदं सत्यं सर्वेषाम | बृह० २.५.१२ | उष्णमेव सविता | गाय० ३.७ |
| इन्द्रस्त्वं प्राण | प्रश्न० २.९ | ऊर्ध्वं प्राणमुन्न० | कठ० २.२.३ |
| इन्द्रियाणां पृथग्भाव० | कठ० २.३.६ | ऊर्ध्वमूलोऽवाक् शाख | कठ० २.३.१ |
| इन्द्रियाणि हयानाहुः | कठ० १.३.४ | ऋग्भिरेतं यजुर्भिः | प्रश्न० ५.७ |
| इन्द्रियेभ्यः परं | कठ० २.३.७ | ऋग्वेदो गार्हपत्यम् | प्रणव० ४ |
| इन्द्रियेभ्यः पराः | कठ० १.३.१० | ऋचो अक्षरे परमे | श्वेता० ४.८ |
| इन्धो ह वै नामैष | बृह० ४.२.२ | ऋचो यजूंषि प्रसवन्ति | एका० ७ |
| इमा आपः सर्वेषाम् | बृह० २.५.२ | ऋचो यजूंषि सामा. | बृह० ५.१४.२ |
| इमा दिशः सर्वेषाम् | बृह० २.५.६ | ऋतं च स्वाध्याय प्रवचने | तैत्ति० १.९.१ |
| इमामेव गोतमभरद्वाजा. | बृह० २.२.४ | ऋतं पिबन्तौ | कठ० १.३.१ |
| इमाः सोम्य नद्यः | छान्दो० ६.१०.१ | ऋतुषु पञ्चविध | छान्दो०२.५.१ |
| इयं पृथिवी सर्वेषाम् | बृह० २.५.१ | एक धैवानुद्रष्टव्यमेतदप्र० | बृह० ४.४.२० |
| इयमेवर्गाग्निः | छान्दो० १.६.१ | एकमात्रस्तथाकाशो | अमृ० ३२ |
| इयं विद्युतत्सर्वेषां भूतानाम् | बृह० २.५.८ | एकमेवाद्वितीयम् | शुक०र० ३५ |
| इष्टापूर्तं मन्यमाना | मुण्ड०१.२.१० | एकविंशत्यादित्यम् | छान्दो० १.१०.५ |
| इह चेदवेदीदथ | केन० २.५ | एकाक्षरं त्वक्षरे | एका० १ |
| इह चेदशकद्बोद्धुं | कठ० २.३.४ | एकीभवति न पश्यती० | बृह० ४.४.२ |
| इहैव सन्तोऽथ विद्म. | बृह० ४.४.१४ | एकैकं जालं बहुधा | श्वेता० ५.३ |
| ईशावास्यमिदम् | ईश० १ | एको देवः सर्वभूतेषु | श्वेता० ६.११ |
४९५ मन्त्रानुक्रमणिका
| मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण |
|---|---|---|---|
| एको देवो बहुधा | मुद्ग० ३.१ | एवमेषां लोकानामासाम् | छान्दो० ४.१७.८ |
| एको वशी | कठ० २.२.१२ | एवं यथाश्मानमाखणमृत्वा | छान्दो० १.२.८ |
| एको वशी निष्क्रियाणाम् | श्वेता० ६.१२ | एवं महावाक्या | शु० २० ३० |
| एको ह ऽ सो भुवन. | श्वेता० ६.१५ | एवः सोम्य ते षोडशानाम् | छान्दो० ६.७.६ |
| एको हि रुद्रो | श्वेता० ३.२ | एष उ एव बृहस्पति. | बृह० १.३.२० |
| एतच्छ्रुत्वा | कठ० १.२.१३ | एष उ एव ब्रह्मणस्पति. | बृह० १.३.२१ |
| एतज्ज्ञेयम् | श्वेता० १.१२ | एष उ एव भामनीरेष हि | छान्दो० ४.१५.४ |
| एतत्तुल्यं | कठ० १.१.२४ | एष उ एव वामनीरेष हि | छान्दो० ४.१५.३ |
| एतदालम्बन ऽ | कठ० १.२.१७ | एष उ एव साम वाग्वै | बृह० १.३.२२ |
| एतद्ध वै तज्जनको | बृह० ५.१४.८ | एष उ वा उद्गीथः | बृह० १.३.२३ |
| एतद्धस्म वै तद्विद्वान्. | बृह० ६.४.४ | एष तु वा अतिवदति | छान्दो० ७.१६.१ |
| एतद्धस्म वै तद्विद्वानाह | छान्दो० ३.१६.७ | एष तेऽग्निर्नचिकेत | कठ० १.१.१९ |
| एतद्धस्म वैतद्विद्वांसः | छान्दो० ६.४.५ | एष देवो विश्वकर्मा | श्वेता० ४.१७ |
| एतद्ध स्मैत. | गाय० ३.१३ | एष प्रजापतिर्यङ्ग. | बृह० ५.३.१ |
| एतद्ध स्मैतद् | गाय०१.१ | एष ब्रह्मैष इन्द्र | ऐत० ३.१.३ |
| एतद्धयेवाक्षरं | कठ० १.२.१६ | एष म आत्मान्तर्हृदये | छान्दो० ३.१४.३ |
| एतद्योगेन परम पुरुषो | मुद्ग० ४.९ | एष वै यजमानस्य | छान्दो० २.२४.१५ |
| एतद्वस्तुचतुष्टयं | सर्व० १३ | एष सर्वेश्वर एष | माण्डू० ६ |
| एतद्वै परमं तपो | बृह० ५.११.१ | एष सर्वेषु भूतेषु | कठ० १.३.१२ |
| एतमु एवाहमभ्य... प्राणा | छान्दो० १.५.४ | एष ह वा उदक्प्रवणो | छान्दो० ४.१७.९ |
| एतमु एवाहमभ्य...रश्मी | छान्दो० १.५.२ | एष ह वै यज्ञो योऽयम् | छान्दो० ४.१६.१ |
| एतमु हैव चूलो | बृह० ६.३.१० | एष हि खल्वात्मेशानः | मैत्रा० ५.८ |
| एतमु हैव जानकिराय | बृह० ६.३.११ | एष हि द्रष्टा | प्रश्न० ४.९ |
| एतमु हैव मधुकः | बृह० ६.३.९ | एषां भूतानां पृथिवी रसः | छान्दो० १.१.२ |
| एतमु हैव वाजसनेयो | बृह० ६.३.८ | एषां वै भूतानां | बृह० ६.४.१ |
| एतमु हैव सत्यकामो | बृह० ६.३.१२ | एषामज्ञानजन्तूनां | निरा० २ |
| एतम्मृग्वेदमम्यतपत् स्तस्याभि० | छान्दो० ३.१.३ | एषोऽग्निस्तपत्येष | प्रश्न० २.५ |
| एतः संयद्वाम इत्याचक्षत | छान्दो० ४.१५.२ | एषोऽणुरारत्मा चेतसा | मुण्ड० ३.१.९ |
| एतस्माज्जायते | मुण्ड० २.१.३ | एषो ह देवः प्रदिशो | श्वेता० २.१६ |
| एतस्य वा अक्षरस्य | बृह० ३.८.९ | एह्येहीति तमाहुतय | मुण्ड० १.२.६ |
| एतेन जीवात्मनोर्योगेन | मुद्ग० २.६ | ओङ्काररथमारुह्य | अमृ० २ |
| एतेनैव च मन्त्रेण | मुद्ग० १.४ | ओ३मदा३मो | छान्दो० १.१२.५ |
| एतेषां मे देहीति | छान्दो० १.१०.३ | ओमिति ब्रह्म | तैत्तिरीय० १.८.१ |
| एतेषु यश्चरते | मुण्ड० १.२.५ | ओमित्येकाक्षरम् | प्रण० २ |
| एवं बद्धस्तथा जीवः | स्कन्द० ७ | ओमित्येकाक्षरम् ब्रह्म | अमृ० २१ |
| एवमेव खलु सोम्य. | छान्दो० ६.६.२ | ओमित्येतदक्षरमिदं | माण्डू० १ |
| एवमेव खलु सोम्येमाः | छान्दो० ६.१०.२ | ओमित्येतदक्षरमुद्गीथम् | छान्दो० १.१.१ |
| 'एवमेव प्रतिहर्तारमुवाच | छान्दो० १.१०.११ | ओममित्येतदक्षर.....ह्युद्गायति | छान्दो० १.४.१ |
| एवमेवैष मघवन्निति | छान्दो० ८.९.३ | औपमन्यव कं त्वमात्में. | छान्दो० ५.१२.१ |
| एवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं | छान्दो० ८.११.३ | कं ते कामपागायानी नील्येष | छान्दो० १.७.९ |
| एवमेवैष सम्प्रसादो. | छान्दो० ८.१२.३ | कतम आत्मेति योऽयम् | बृह० ४.३.७ |
| एवमेवोद्गातारमुवाच. | छान्दो० १.१०.१० | कतम आदित्या इति | बृह० ३.९.५ |
यहाँ पृष्ठ का लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:
मन्त्रानुक्रमणिका [पृष्ठ ४९६]
| मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण |
|---|---|---|---|
| कतम इन्द्रः कतमः | बृह० ३.९.६ | क्षरं प्रधानममृताक्षरम् | श्वेता० १.१० |
| कतमा कतमर्कतमतू | छान्दो० १.१.४ | क्षेत्राज्ञाधिष्ठितं | मन्त्रि० १९ |
| कतमे ते त्रयो देवा | बृह० ३.९.८ | गताः कलाः पञ्चदश | मुंड० ३.२.७ |
| कतमे रुद्रा इति | बृह० ३.९.४ | गायत्री वा इदःसर्वम् | छान्दो० ३.१२.१ |
| कतमे वसव इत्यग्निश्च | बृह० ३.९.३ | गुणान्वयो यः फलकर्मकर्ता | श्वेता० ५.७ |
| कतमे षडित्यग्निश्च | बृह० ३.९.७ | गुरुर्प्येवंविच्छुचौ | मुद्ग० ४.१२ |
| कथं बन्धः कथं मोक्षः | सर्व० १ | गो अश्वमिह महिमेत्याकचक्षते | छान्दो० ७.२४.२ |
| कर्तृत्वाद्व... बन्धः | निरा० २० | गौरनाद्यन्तवती सा | मन्त्रि० ५ |
| कर्मेति च.... कर्म | निरा० ११ | ग्राह्यमिति.... ग्राह्यम् | निरा० ३७ |
| कल्पन्ते हास्मा ऋतव | छान्दो० २.५.२ | धनमुत्सृज्य वा | ना०ब्रि० ३७ |
| कल्पन्ते हास्मै | छान्दो० २.२.३ | घृतकौशिकाद् घृतकौशिकः | बृह० २.६.३, ४.६.३ |
| कस्मिन्नु त्वं चात्मा | बृह० ३.९.२६ | घृतात्परं मण्डमिवा. | श्वेता० ४.१६ |
| कांस्य घण्टानिनादः | प्रण० १२ | घोषिणी प्रथमा मात्रा | ना०बि० ९ |
| काम एव यस्रायतन | बृह० ३.९.११ | चक्षुरेव ब्रह्मणश्चतुर्थः | छान्दो० ३.१८.५ |
| काम क्रोध लोभमय | मैत्रा० १.३ | चक्षुरेवात्मा | छान्दो० १.७.२ |
| काम क्रोध लोभमोह | मुद्ग० ४.४ | चक्षुर्वै ग्रहः | बृह० ३.२.५ |
| कामस्याप्तिं | कठ० १.२.११ | चक्षुर्होच्चक्राम | बृह० ६.१.९ |
| कामान् यः कामयते | मुण्ड० ३.२.२ | चक्षुर्होच्चक्राम | छान्दो० ५.१.९ |
| कार्योपाधिरयम् | शु०र० ४२ | चतुरौदुम्बरो भवत्यौदु. | बृह० ६.३.१३ |
| कालत्रयेऽपि | ना०बि० ८ | चतुर्णामपि वेदानाम् | शु०र० १७ |
| कालः प्राणश्च | मन्त्रि० १२ | चतुर्भिः पश्यते | अमृ० ३० |
| कालः स्वभावो | श्वेता० १.२ | चतुर्मुखेन्द्र देवेषु | शु०र० ३२ |
| काली कराली च | मुण्ड० १.२.४ | चतुर्विंशति संख्यातं | मन्त्रि० १५ |
| काष्ठवज्जायते देह | ना०बि० ५३ | चन्द्रमा एव सविता | गाय० ३.५ |
| का साम्नो गतिरिति | छान्दो० १.८.४ | चिज्जडानां तु यो | स्क० ४ |
| किं देवतोऽस्यां दक्षिणायाम् | बृह० ३.९.२१ | चित्तमेव हि संसारः | मैत्रा० ४.४ (ग) |
| किं देवतोऽस्यां ध्रुवायाम् | बृह० ३.९.२४ | चित्तं वाव सङ्कल्पाद्भूयो | छान्दो० ७.५.१ |
| किं देवतोऽस्यां प्रतीच्याम् | बृह० ३.९.२२ | चित्तस्य हि प्रसादेन | मैत्रा० ४.४ (घ) |
| किं देवतोऽस्यां प्राच्याम् | बृह० ३.९.२० | छन्दांसि यज्ञाः | श्वेता० ४.९ |
| किं ब्रह्म... ब्रह्मेति | निरा० ३ | जनकःह वैदेहं यज्ञ. | बृह० ४.३.१ |
| किं देवतोऽस्यामुदीच्यां | बृह० ३.९.२३ | जनको ह वैदेह आसां च | बृह० ४.१.१ |
| किल्विषं हि क्षयम् | अमृ० ९ | जनको ह वैदेहः कूर्चा. | बृह० ४.२.१ |
| कुतस्तु खलु | छान्दो० ६.२.२ | जनको ह वैदेहो बहु. | बृह० ३.१.१ |
| कुर्वन्नेवेह कर्माणि | ईश० २ | जनोलोकस्तु | ना०बि० ४ |
| कुलगोत्र जातिवर्णाश्रम० | मुद्ग० ४.८ | जागरित स्थानो बहिः | माण्डू० ३ |
| कूटस्थोपहित भेदानां | सर्व० ११ | जागरित स्थानो वैश्वा. | माण्डू० ९ |
| कृतकृत्यः | शु०र० १० | जाग्रन्निद्राविनिर्मुक्तः | ना०बि० ५५ |
| केनेषितं पतति | केन० १.१ | जातिरिति... प्रकल्पिता | निरा० १० |
| केवलमोक्ष... बन्धः | निरा० २७ | जातेऽग्निमुपसमाधायाङ्क | बृह० ६.४.२४ |
| कोऽयमात्मेति | ऐत० ३.१.१ | जानश्रुतिर्ह पौत्रायणः | छान्दो० ४.१.१ |
| क्व तर्हि यजमानस्य | छान्दो० २.२४.२ | जानाम्यहम् | कठ० १.२.१० |
| क्षत्रं प्राणो वै क्षत्रम् | बृह० ५.१३.४ | जिह्वा वै ग्रहः | बृह० ३.२.४ |
४१७ मन्त्रानुक्रमणिका मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण जीव इति च ब्रह्म० निरा० ५ तत्रापरा ऋग्वेदो. मुण्ड० १.१.५ जीवः शिवः शिवो स्क० ६ तत्रोद्गातृनास्तावे. छान्दो० १.१०.८ जीवापेतं वाव किलेदम् छान्दो० ६.११.३ तत्सवितुर्वरेण्यमित्यसौ मैत्रा० ५.७ ज्ञाज्ञो द्वाव जावीशानीशावजा श्वेता० १.९ तत् स्त्रिया आत्मभूयं ऐत० २.१.२ ज्ञातृज्ञानज्ञेय सर्व० ९ तथामुष्मिँल्लोके छान्दो० १.९.४ ज्ञात्वा देवम् श्वेता० १.११ तथेति ह समुपविविशुः छान्दो० १.८.२ ज्ञानमिति ... ज्ञानम् निरा० १३ तदपानेनाजिघृक्षत् ऐत० १.३.१० ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय बृह० ६.३.२ तदभिमृशेदन् वा बृह० ६.४.५ तं चेदेतस्मिन्वयसि..आदित्या छान्दो० ३.१६.६ तदभ्यद्रवत्... अग्निंर्वा केन० ३.४ तं चेदेतस्मिन्वयसि... रुद्रा छान्दो० ३.१६.४ तदभ्यद्रवत्... वायुर्वा केन० ३.८ तं चेदेतस्मिन्वयसि... वसव छान्दो० ३.१६.२ तदाहुर्यदयमेक इवैव बृह० ३.९.९ तं चेद्ब्रूयुरास्मिँश्चेदिदम् छान्दो० ८.१.४ तदाहुर्यद्ब्रह्मविद्यया बृह० १.४.९ तं चेद्ब्रूयुर्यदिदमस्मिन् छान्दो० ८.१.२ तदुक्तमृषिणा ऐत० २.१.५ तं जायोवाच तप्तो छान्दो० ४.१०.२ तदुताप्याहुः सान्नैन्नमुपा. छान्दो० २.१.२ तं जायोवाच हन्त छान्दो० १.१०.७ तदु ह जानश्रुतिः छान्दो० ४.१.५ तं दुर्दर्शं कठ० १.२.१२ तदु ह जानश्रुतिः पौत्रायणः छान्दो० ४.२.१ तं मद्गुरुपनिपत्याभ्युवाद छान्दो० ४.८.२ तदुह शौनकः कापेयः छान्दो० ४.३.७ तं यज्ञमिति मुद्र० १.७ तदेजति तन्नैजति ईश० ५ तं यज्ञायथोपासते मुद्र० ३.३ तदेतच्चतुष्पादद्ब्रह्म छान्दो० ३.१८.२ तं षड्विंशक इत्येते मन्त्रि० १४ तदेतत्प्रेयः पुत्रात्प्रेयो बृह० १.४.८ तं ह स्मैतमेवम् गा० ८.१ तदेतत्सल्यं मन्त्रेषु मुण्ड० १.२.१ त इमे सत्याः कामा छान्दो० ८.३.१ तदेतत् सत्यमृषिरङ्गिराः मुण्ड० ३.२.११ त इह व्याघ्रो वा सिंह हो छान्दो० ६.९.३ तदेतत्सत्यं यथा मुण्ड० २.१.१ त एतदेव रूपमभि- छान्दो० ३.६.२,७.२, तदेतत्सृष्टं ऐत० १.३.३ ८.२,९.२,१०.२ तदेतदिति मन्यन्ते कठ० २.२.१४ तच्चक्षुषाजिघृक्षत् ऐत० १.३.५ तदेतदृचाऽभ्युक्तम् मुण्ड० ३.२.१० तच्छ्रोत्रेनाजिघृक्षत् ऐत० १.३.९ तदेतदृचाभ्युक्तं.....एष बृह० ४.४.२३ तच्छ्रुत्वा व्यासवचनं शु०२० ९ तदेतद्ब्रह्म क्षत्रं विट् बृह० १.४.१५ तच्छ्रुत्वा सकलाकारं शु०२० ५२ तदेतन्मिथुनमोमित् छान्दो० १.१.६ तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत् ऐत० १.३.६ तदेतन्मूर्त्तं यदन्यद्वा. बृह० २.३.२ ततः परतरं शुद्धं ना०बि० १७ तदेते श्लोका... अणुः पन्था बृह० ४.४.८ ततः परं ब्रह्मापरम् श्वेता० ३.७ तदेते... स्वप्नेन बृह० ४.३.११ ततो ब्रह्मोपदिष्टम् शु०२० ४७ तदेवाग्निस्तदादित्य. श्वेता० ४.२ ततो यदुत्तरतरम् श्वेता० ३.१० तदेष... तदेव सक्तः सह बृह० ४.४.६ ततो विलीनपाशोऽसौ ना०बि० २० तदेष... यदा सर्वे बृह० ४.४.७ तत्कर्म कृत्वा श्वेता० ६.३ तदेष श्लोकः यदा छान्दो० ५.२.९ तत्तु जन्मान्तर ना०बि० २४ तदेष श्लोकः । यानि छान्दो० २.२१.३ तत्पदमहामन्त्रस्य शु०२० २३ तदेष श्लोकः शतम् छान्दो० ८.६.६ तत्त्वचाजिघृक्षत् ऐत० १.३.७ तदेष श्लोको न पश्यो छान्दो० ७.२६.२ तत्प्राणेनाजिघृक्षत् ऐत० १.३.४ तदेष श्लोको भवति बृह० २.२.३ तत्र देवास्त्रयः प्रण० ३ तदैक्षत बहु स्याम् छान्दो० ६.२.३ तत्र यत्प्रकाशाते सर्व० ८ तद्व तद्वनं नाम केन० ४.६
मन्त्रानुक्रमणिका ४९८ मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण
तद्धापि ब्रह्मदस्तश्चैकिता. | बृह० १.३.२४ | तद्यक्षरत्तदादित्यम् | छान्दो० ३.१.४ तद्धि मौद्गल्य | गाय० १.२ | तद्यक्षरत्तदादित्य.. कृष्णः | छान्दो० ३.३.३ तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् | बृह० १.४.७ | तद्यक्षरत्तदादित्यम्.. परं | छान्दो० ३.४.३ तद्धैतत् सत्यकामो | छान्दो० ५.२.३ | तद्यक्षरत्तदादित्य.. मध्ये | छान्दो० ३.५.३ तद्धैतद्धोर आङ्गिरसः | छान्दो० ३.१७.६ | तद्यक्षरत्तदादित्य.. शुक्लः | छान्दो० ३.२.३ तद्धैतद्ब्रह्मा... आचार्य | छान्दो० ८.१५.१ | तन्नम इत्युपासीत | तैत्ति० ३.१०.४ तद्धैतद्ब्रह्मा... ज्येष्ठाय | छान्दो० ३.११.४ | तन्मनसाजिघृक्षत् | ऐत० १.३.८ तद्धैषां विजज्ञौ | केन० ३.२ | तप इति च... तपः | निरा० ३५ तद्धोभये देवासुरा | छान्दो० ८.७.२ | तपः प्रभावाद्देवप्रसादाच्च | श्वेता० ६.२१ तद्ब्रह्म तापत्रयातीतम् | मुद्ग० ४.१ | तपः श्रद्धे ये | मुण्ड० १.२.११ तद्य इत्थं विदुः ये चेमे. | छान्दो० ५.१०.१ | तपसा चीयते ब्रह्म | मुण्ड० १.१.८ तद्य इह रमणीयचरणा | छान्दो० ५.१०.७ | तम एव यस्यायतन | बृह० ३.९.१४ तद्य एवैतं ब्रह्मलोकम् | छान्दो० ८.४.३ | तमग्निरभ्युवाद सत्यकाम | छान्दो० ४.६.२ तद्य एवैतावरं च | छान्दो० ८.५.४ | तमब्रवीत्प्रीयमाणो | कठ० १.१.१६ तद्यत्तत्सत्यमसौ | बृह० ५.५.२ | तमभ्यतपत्तस्य | ऐत० १.१.४ तद्यत्प्रथमममृतम् | छान्दो० ३.६.१ | तमशना पिपासे | ऐत० १.२.५ तद्यत्रैतत्सुप्तः समस्तः | छान्दो० ८.११.१ | तमाजुहाव तमभ्युवाचा | गाय० १.४ तद्यत्रैतत्सुप्तः | छान्दो० ८.६.३ | तमीश्वराणां परमम् | श्वेता० ६.७ तद्यथा तृणजलायुका | बृह० ४.४.३ | तमुपसङ्गृह्य | गाय० २.८ तद्यथाऽनः सुसमाहित | बृह० ४.३.३५ | तमु ह परः प्रत्युवाच | छान्दो० ४.१.३ तद्यथा पेशस्कारी पेशसो | बृह० ४.४.४ | तमु ह परः प्रत्युवाचाह | छान्दो० ४.२.३ तद्यथा महापंथ आतत | छान्दो० ८.६.२ | तमेकनेमिं त्रिवृतं | श्वेता० १.४ तद्यथा महामत्स्य उभे | बृह० ४.३.१८ | तमेतमग्निरित्यध्वर्यव | मुद्ग० ३.२ तद्यथा राजानं प्रयि० | बृह० ४.३.३८ | तमेताः सप्ताक्षितय | बृह० २.२.२ तद्यथा राजानमायन्त० | बृह० ४.३.३७ | तमेव धीरो विज्ञाय | बृह० ४.४.२१ तद्यथा लवणेन | छान्दो० ४.१७.७ | तमो वा इदमेकमास | मैत्रा० ४.५ तद्यथास्मिन्नाकाशे | बृह० ४.३.१९ | तयोरन्यतरां मनसा | छान्दो० ४.१६.२ तद्यथेषीकातूलमग्नौ | छान्दो० ५.२४.३ | तस्मा आदित्याश्च | छान्दो० २.२४.१६ तद्यथेह कर्मजितो लोकः | छान्दो० ८.१.६ | तस्मा उ ह ददुस्ते | छान्दो० ४.३.८ तद्यद्भक्तं प्रथमम् | छान्दो० ५.१९.१ | तस्मा एतत् प्रोवाच | गा० २.७ तद्यद्वृक्नो रिष्येद् भूः | छान्दो० ४.१७.४ | तस्माच्च देवा | मुण्ड० २.१.७ तद्यद्रजतःसेयं पृथिवी | छान्दो० ३.१९.२ | तस्मादग्निः समिधो | मुण्ड० २.१.५ तद्युक्तस्तन्मयो | ना० बि० १९ | तस्मादप्यद्येहाददान. | छान्दो० ८.८.५ तद्ये ह वै | प्रश्न० १.१५ | तस्मादाहुः सोष्य. | छान्दो० ३.१७.५ तद्वत्सत्यमविज्ञाय | ना०बि० २७ | तस्मादिति च मन्त्रेण | मुद्ग० १.८ तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दा | बृह० ४.३.२१ | तस्मादिदन्द्रो | ऐत० १.३.१४ तद्वा एतदक्षरं गार्ग्यदृष्टं | बृह० ३.८.११ | तस्मादु हैवं विद्द्यद्यपि | छान्दो० ५.२४.४ तद्वा एतदनुज्ञाक्षरं | छान्दो० १.१.८ | तस्मादृचः साम | मुण्ड० २.१.६ तद्विप्रासो विपन्धवो | स्क० १५ | तस्मादेतत्पुरुषम्. | मुद्ग० ४.११ तद्विष्णोः परमं पदम् | स्क० १४ | तस्माद्वा इन्द्रो | केन० ४.३ तद्देगुह्योपनिषत्सु | श्वेता० ५.६ | तस्माद्वा एतं सेतुम् | छान्दो० ८.४.२ तद्वै तदेतदेव तदास | बृह० ५.४.१ | तस्माद्वा एते | केन० ४.२
४९९ मन्त्रानुक्रमणिका मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण तस्माद्विराडित्यनया मुद्ग० १.५ तस्यै तपोदमः केन० ४.८ तस्मिञ्छुक्लमृतनीलमाहुः बृह० ४.४.९ तस्यै वाचः पृथिवी बृह० १.५.११ तस्मिन्त्रिमानि सर्वाणि छान्दो० २.९.२ तस्यैष आदेशो केन० ४.४ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ... अन्नं छान्दो० ५.७.२ तं ह कुमार कठ० १.१.२ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ... रेतो छान्दो० ५.८.२ तं ह चिरं वसेत्याज्ञा- छान्दो० ५.३.७ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ.. वर्षम् छान्दो० ५.६.२ तं ह प्रवाहणो छान्दो० १.८.८ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ... श्रद्धां छान्दो० ५.४.२ तं ह शिलकः छान्दो० १.८.६ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ... सोम छान्दो० ५.५.२ तं हंस उपनिपत्याभ्युवाद छान्दो० ४.७.२ तस्मिन्द्यावत्संपातम् छान्दो० ५.१०.५ तं हाङ्गिरा उद्गीथम् छान्दो० १.२.१० तस्मिंस्त्वयि किं केन० ३.९ तं हाभ्युवाद रैकैद छान्दो० ४.२.४ तस्मै तृणं केन० ३.६ तं हैतमतिधन्वा छान्दो० १.९.३ तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति केन० ३.१० तं हैतमुद्दालक बृह० ६.३.७ तस्मै श्वा श्वेतः छान्दो० १.१२.२ तं होवाच किंगोत्रः छान्दो० ४.४.४ तस्मै स विद्वान् मुण्ड० १.२.१३ तं होवाच नैतदब्राह्मणो छान्दो० ४.४.५ तस्मै स होवाच इहैवान्तः प्रश्न० ६.२ तं होवाच...महतो ऽभ्याहित- छान्दो० ६.७.३ तस्मै स होवाच एतद्वै प्रश्न० ५.२ तं होवाच यथा सोम्य छान्दो० ६.७.५ तस्मै स होवाच द्वेविद्ये मुण्ड० १.१.४ तं होवाच यं वै सोम्यै- छान्दो० ६.१२.२ तस्मै स होवाच प्रजाकामो प्रश्न० १.४ तां योगमिति कठ० २.३.११ तस्मै स होवाच यथा प्रश्न० ४.२ तां भवान् प्रब्रवीत्विति गा० १.६ तस्मै स होवाचाकाशो प्रश्न० २.२ ताऽहैत्तामेके बृह० ५.१४.५ तस्मै स होवाचाति प्रश्न० ३.२ ता आप ऐक्षन्त छान्दो० ६.२.४ तस्य क्व मूलं ... खलु छान्दो० ६.८.४ ता एता देवताः ऐत० १.२.१ तस्य क्व मूल.... सोम्य छान्दो० ६.८.६ तानि वा एतानि यजूंषि छान्दो० ३.२.२ तस्य प्रथमया विष्णो- मुद्ग० १.२ तानि वा एतानि सामान्येत छान्दो० ३.३.२ तस्य प्राची दिक्प्राच्यः बृह० ४.२.४ तानि ह वा एतानि छान्दो० ७.४.२ तस्य प्राची दिग्जुहूर्नाम छान्दो० ३.१५.२ तानि ह वा एतानि चित्तं छान्दो० ७.५.२ तस्य यथा कप्यासम् छान्दो० १.६.७ तानि ह वा एतानि त्रीणि छान्दो० ८.३.५ तस्य यथाभिनहनम् छान्दो० ६.१४.२ तानु तत्र मृत्युरथा छान्दो० १.४.३ तस्य ये प्राञ्चो रश्मयस्ता छान्दो० ३.१.२ तान्यभ्यतपत्तेभ्यः छान्दो० २.२३.३ तस्यर्क् च साम छान्दो० १.६.८ तान्वरिष्ठः प्राण प्रश्न० २.३ तस्य वा एतस्य पुरुषस्य बृह० ४.३.९ तान्ह स ऋषिरुवाच प्रश्न० १.२ तस्य .... सुवर्णं वेद बृह० १.३.२६ तान् हैतैः श्लोकैः बृह० ३.९.२८ तस्य सौम्य यो गाय० १.३ तान्होवाच प्रातर्वः छान्दो० ५.११.७ तस्य .... स्वं वेद बृह० १.३.२५ तान् होवाच ब्राह्मणा बृह० ३.१.२ तस्य ह वा एतस्य छान्दो० ३.१३.१ तान्होवाचाश्वपतिर्वै छान्दो० ५.११.४ तस्य ह वा एतस्यात्मनो छान्दो० ५.१८.२ तान्होवाचैहैव छान्दो० १.१२.३ तस्य ह वा एतस्यैवम् छान्दो० ७.२६.१ तान्होवाचैतावत् प्रश्न० ६.७ तस्य हैतस्य पुरुषस्य बृह० २.३.६ तान्होवाचैते वै खलु छान्दो० ५.१८.१ तस्य हैतस्य साम्नो यः बृह० १.३.२७ तापत्रयं त्वाध्यात्मिक. मुद्ग० ४.२ तस्या उपस्थानं गायत्र्य बृह० ५.१४.७ ताभ्यः पुरुषमानयत्ता ऐत० १.२.३ तस्या वेदिरुपस्थो बृह० ६.४.३ ताभ्यो गामानयत्ता ऐतरेय० १.२.२ तस्या ह मुखमुपोद्गृह्णन् छान्दो० ४.२.५ तावदेव निरोद्धव्यं मैत्रा० ४.४ (ज)
मन्त्रानुक्रमणिका ५००
| मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण |
|---|---|---|---|
| तालमात्रविनिष्कम्पो | अमृ० २४ | ते होचुर्भगवन्यद्येवम् | मैत्रा० ३.१ |
| तावद्रथेन गन्तव्यम् | अमृ० ३ | ते होचुर्येन हैवाथैन | छान्दो० ५.११.६ |
| ता वा अस्यैता हितो | बृह० ४.३.२० | तौ वा एतौ द्वौ | छान्दो० ४.३.४ |
| तावानस्य महिमा | छान्दो० ३.१२.६ | तौहद्वात्रिंशतं वर्षाणि | छान्दो० ८.७.३ |
| तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकाम्.. | छान्दो० ६.३.३ | तौ ह प्रजापतिरुवाच | छान्दो० ८.७.४ |
| तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां नु | छान्दो० ६.३.४ | तौ ह प्रजापतिरुवाच साध्वलङ्कृतौ | छान्दो० ८.८.२ |
| तिर्यगूर्ध्वमधोदृष्टिं | अमृ० २३ | तौ हान्वीक्ष्य प्रजापतिः | छान्दो० ८.८.४ |
| तिलेषु तैलम् | श्वेता० १.१५ | तौ होचतुर्यथैवेद० | छान्दो० ८.८.३ |
| तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः | प्रश्न० ५.६ | त्रयं वा इदं नाम रूपम् | बृह० १.६.१ |
| तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे | कठ० १.१.९ | त्रयः प्राजापत्याः | बृह० ५.२.१ |
| तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेद | केन० ३.३ | त्रयी विद्या हिङ्कारस्त्रयः | छान्दो० २.२१.१ |
| तेजसः सोम्याश्यमानस्य | छान्दो० ६.६.४ | त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञः | छान्दो० २.२३.१ |
| तेजो वावादित्ये भूयः | छान्दो० ७.११.१ | त्रयो लोका एत एव | बृह० १.५.४ |
| तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते | छान्दो० ६.५.३ | त्रयो वेदा एत एव | बृह० १.५.५ |
| तेजो ह वाव उदानः | प्रश्न० ३.९ | त्रयो होद्गीथे | छान्दो० १.८.१ |
| ते तमर्चयन्तस्त्वं | प्रश्न० ६.८ | त्रिणाचिकेत | कठ० १.१.१७ |
| ते देवा अब्रुवन्नेतावद्वा | बृह० १.३.१८ | त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्वि | कठ० १.१.१८ |
| ते ध्यानयोगानुगता | श्वेता० १.३ | त्रिरुन्नतं स्थाप्य | श्वेता० २.८ |
| तेन तꣳह बको | छान्दो० १.२.१३ | त्रिंशत्सार्धाङ्गुलः | अमृ० ३३ |
| तेन तꣳ ह बृहस्पति | छान्दो० १.२.११ | त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेति | बृह० १.५.३ |
| तेन तꣳहायास्य | छान्दो० १.२.१२ | त्वावै ग्रहः | बृह० ३.२.९ |
| तेन हवा एवं विदुषा | गाय० ७.१ | त्वङ्मांसशोणिता. | मुद्ग० ४.३ |
| तेनेयं त्रयी विद्या | छान्दो० १.१.९ | त्वं पद महामन्त्रस्य | शु०२० २५ |
| तेनोभौ कुरुतो यश्चैत | छान्दो० १.१.१० | त्वं पदार्थादौपाधि० | सर्व० १४ |
| तेभ्यो ह प्रातेभ्यः | छान्दो० ५.११.५ | त्वं भूर्भुवः स्वस्त्वम् | एका० १३ |
| ते य एवमेतद्विदुर्यं | बृह० ६.२.१५ | त्वमिति तदिति | शु०२० ४१ |
| ते यथा तन्न विवेकम् | छान्दो० ६.९.२ | त्वं मनुष्यवं | मैत्रा० ४.४ (ङ) |
| ते वा एते गुह्या | छान्दो० ३.५.२ | त्वं वज्रभृद्भूत. | एका० ५ |
| ते वा एतेऽथर्वाङ्गिरस | छान्दो० ३.४.२ | त्वं स्त्री त्वं पुमानसि | श्वेता० ४.३ |
| ते वा एते पञ्च | छान्दो० ३.१३.६ | त्वं स्त्री पुमांस्त्वं | एका० ११ |
| ते वा एते रसानाꣳरसा | छान्दो० ३.५.४ | दध्नः सोम्य मध्यमानस्य | छान्दो० ६.६.१ |
| तेषां खल्वेषां भूतानाम् | छान्दो० ६.३.१ | दिवश्चैनमादित्याच्च | बृह० १.५.१९ |
| तेषामसौ विरजो | प्रश्न० १.१६ | दिव्यो ह्यमूर्तः | मुण्ड० २.१.२ |
| ते ह खल्वथोर्ध्वरेतसो | मैत्रा० ४.१ | दुःखमिति......स्वर्गः | निरा० १६ |
| ते ह नासिक्यं | छान्दो० १.२.२ | दुग्धेऽस्मै.....एतदेवम् | छान्दो० २.८.३ |
| ते ह प्राणाः प्रजापतिम् | छान्दो० ५.१.७ | दुग्धेऽस्मै.... एतामेव | छान्दो० १.१३.४ |
| ते ह यथैवेदं | छान्दो० १.१२.४ | दूरमेते विपरीते | कठ० १.२.४ |
| ते ह वाचमूचुस्त्वं न | बृह० १.३.२ | दृप्त बालाकिर्हानूचानो | बृह० २.१.१ |
| ते ह सम्पादयाञ्चक्रुः | छान्दो० ५.११.२ | दृश्यमानस्य सर्वस्य | शु०२० ३८ |
| ते हेमे प्राणा अहꣳश्रेयसे | बृह० ६.१.७ | दृष्टिः स्थिरा यस्य | ना०बि० ५६ |
| ते होचुः क्नु सोऽभूद्यो | बृह० १.३.८ | देवपितृकार्याभ्यां | तैत्ति० १.११.२ |
| ते होचुरुपकोसलेषा | छान्दो० ४.१४.१ | देवमनुष्य.....बन्धः | निरा० २२ |