भारतकोश
संग्रह पर लौटें

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

बुरा, असाधु, असत्य आदि असत् के पर्यायवाची शब्द हैं। सत्य की ही सदैव जय होती है- सत्येनैव जयति (मै०ब्रा०४.३.८)। सत्य में प्रमाद नहीं करना चाहिए-सत्यान्न प्रमदितव्यम् (तैत्ति०१.११.१)। इस लोक में सत् ही परमेश्वर है। सत् के आधार पर ही सृष्टि और धर्म का अस्तित्व है। गीता में कहा है कि असत् का कोई अस्तित्व नहीं है और सत् का अभाव नहीं है- नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः (गी०२.१६)। यज्ञ, तप और दान की स्थिति सत् है- यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते (गी०१७.२७)। सद्भाव और सज्जनता में 'सत्' शब्द प्रयुक्त होता है-सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते (गी०१७.२६)। मुण्डकोपनिषद् का प्रसिद्ध वाक्य, जो सत्य के विजयी होने और असत्य के पराभूत होने का संकेत करता है, को भारत सरकार ने अपने राजचिह्न में स्वीकार किया है- सत्यमेव जयते नानृतम्। सत्येन पन्था विततो देवयानः (मुण्ड०३.१.६)। २३२. सत्त्व-रज-तम- सांख्य दर्शन के अनुसार समूची सृष्टि त्रिगुणात्मक है। ये तीन गुण हैं- सत्त्व, रज और तम। सत्त्व सबसे उत्तम है, इसके लक्षण हैं-ज्ञान, शान्ति, विवेक, सत्प्रवृत्ति आदि। यह आत्म तत्त्व, मूल तत्त्व तथा चेतन तत्त्व का भी बोधक है। वह परम पुरुष परमात्मा इन तीनों गुणों से परे है, अतः उसे त्रिगुणातीत भी कहा गया है। सत्त्व, रज और तम ये तीनों गुण प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं, ये अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं-सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः। निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् (गी०१४.५)। जब तक तीनों गुण समान रूप से विद्यमान रहते हैं, तब तक प्रकृति में हलचल-परिवर्तन नहीं होता। प्रकृति मूलरूप में विद्यमान रहती है-साम्यावस्था प्रकृतिः (सां०सू० १.६१)। गीता में ही आगे भगवान् ने वर्णन किया है कि सत्त्वगुण सुख में, रजोगुण कर्म में और तमोगुण ज्ञान की ढँककर प्रमाद में लगाता है-सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत। ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत (गी०१४.९)। सत्त्व से ज्ञान, रज से लोभ तथा तम से प्रमाद, मोह, अज्ञान उत्पन्न होता है-सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च। प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च (गी०१४.१७)। २३३. सप्तचक्र- योग साधना ग्रन्थों में 'षट्चक्र वेधन' प्रक्रिया का प्रायः उल्लेख पाया जाता है। मान्यता है कि षट्चक्र वेधन प्रक्रिया द्वारा कुण्डलिनी जागरण की क्रिया सम्पन्न होती है और वह जाग्रत् कुण्डलिनी ऊर्ध्वगमन करती हुई सहस्रार स्थित शिवतत्त्व से जब मिल जाती है, तो योग (शिव-शक्तियोग) सिद्ध हो जाता है। साधक में अनेकानेक चमत्कारिक शक्तियाँ विकसित हो जाती हैं और अन्त में वह मुक्ति का अधिकारी भी हो जाता है- षट्चक्राणि परिज्ञात्वा प्रविशेत् सुखमण्डलम् (यो०शि०६.७४, यो०कु०३.९,१२), षट्चक्रं षोडशाधारं त्रिलक्ष्यं व्योम पञ्चकम्। स्व देहे यो न जानाति तस्य सिद्धिः कथं भवेत् (यो०चू०३)। योग साधना ग्रन्थों में जिन षट्चक्रों की प्रसिद्धि है, वे इस प्रकार हैं-१. मूलाधार, २.स्वाधिष्ठान, ३.मणिपूर, ४.अनाहत, ५.विशुद्धाख्य, ६.आज्ञाचक्र। इन षट्चक्रों के वेधन की प्रक्रिया सम्पन्न होने के बाद इससे परे सातवें चक्र तक कुण्डलिनी शक्ति का ऊर्ध्वगमन होता है, तो साधक पूर्णता की स्थिति में पहुँच जाता है। वह सातवाँ चक्र 'सहस्रार चक्र' है, जिसमें सहस्र दल कमल होने को बात कही जाती है। इन सप्तचक्रों का विशद वर्णन तन्त्रसार, हठयोग प्रदीपिका जैसे योग साधना के ग्रन्थों में मिलता है। २३४. सप्त जिह्वाएँ- यज्ञीय विधि-विधान के अन्तर्गत जहाँ अग्नि, समिधा, आज्य आदि का वर्णन पाया जाता है, वहीं 'अग्नि' का मानवीकरण (आधिदैविक) रूप भी प्राप्त होता है। 'अग्नि' जो उष्णता, ऊर्जा एवं प्रकाश आदि गुण विशिष्ट पदार्थ के रूप में देखा जाता है, वहीं 'अग्निदेव' के रूप में भी प्रतिष्ठित है। सामान्य प्राणी जिस प्रकार मुख- जिह्वा आदि अंगावयवों से युक्त हो भोजन आदि क्रियाएँ सम्पन्न करता है, उसी प्रकार अग्निदेव अपनी जिह्वाओं से आज्य आदि हव्य सामग्रियों को ग्रहण करते हैं- ऐसी प्रसिद्धि है। यह अग्नि का आधिदैविक-आलंकारिक स्वरूप है। 'अग्नि' की लपटें ही उसकी जिह्वाएँ हैं। पौराणिक ग्रन्थों के साथ ही उपनिषदों में भी अग्नि की सात जिह्वाओं (ज्वालाओं) का वर्णन मिलता है। मुण्डकोपनिषद् (१.२.४) में कहा गया है- काली कराली च मनोजवा च, सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा। स्फुलिंगिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥ अर्थात् काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिंगिनी और विश्वरुची-ये उस (अग्नि) की लपलपाती हुई सात जिह्वाएँ हैं। वस्तुतः ये जिह्वाएँ ही अग्नि की लपटें-ज्वालाएँ है। इनके नामों से लगता है कि ये लाल, धुएँ युक्त, चिनगारी युक्त आदि गुण विशिष्ट अग्नि की लपटें हैं। इन्हें अग्निदेव की सात जिह्वाएँ कहा गया है। इसी को आगे सात दीप्तियाँ भी कहा गया है- सप्तार्चिषः (मुण्ड०२.१.८)।

सप्तयज्ञ | परिशिष्ट | ४८३ २३५. सप्तयज्ञ - भारतीय संस्कृति में यज्ञ का बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान है। वेदों-स्मृतियों में इसका विशद वर्णन प्राप्त होता है। इसी आधार पर यज्ञ के प्रमुखतः दो विभाग हैं- १. श्रौत यज्ञ, २. स्मार्त यज्ञ। इन दोनों विभागों के अन्तर्गत अनेकानेक प्रकार के यज्ञ आते हैं। यहाँ जिन सात यज्ञों का उल्लेख है, वे प्रायः दार्शनिक स्तर के हैं। मुण्डकोपनिषद् (२.१.८) में यह प्रकरण व्याख्यायित है- सप्ताचिंषः समिधः सप्त होमाः । सप्तहोम (यज्ञ) का तात्पर्य स्पष्ट करते हुए शंकराचार्यजी लिखते हैं- सप्त होमास्तदविषयविज्ञानानि 'यदस्य विज्ञानं तज्जुहोति (महानारायण० २५.१) इति श्रुत्यन्तरात्' अर्थात् सात होम यानी अपने विषयों के विज्ञान, जैसा कि 'इसका जो विज्ञान है, उसी को हवन करता है', इस अन्य श्रुति से सिद्ध होता है। यहाँ 'विषयों के विज्ञान' का तात्पर्य 'सप्तप्राण' (शीर्षस्थ इन्द्रियवर्ग) के विषयों का विशिष्ट ज्ञान है। इस विशिष्ट ज्ञान को जब आत्मलाभ-आत्मदर्शन के उद्देश्य से साधक होम्यता है- समर्पण करता है-त्यागता है, तो इसे ही सप्तयज्ञ या सप्तहोम कहा जाता है। यह दार्शनिक पहलू हुआ। इसका व्यावहारिक पहलू सात स्थूल यज्ञ वाला है- २ प्रातः-सायं का यज्ञ, १ दर्श (अमावस्या), १ पौर्णमास, १ चातुर्मास्य, १ आग्रयण, १ सांवत्सरिक- इस प्रकार कुल सात यज्ञ हुए। २३६. सप्तलोक - द्र०-लोक। २३७. सप्त समिधाएँ - यज्ञ में अग्नि को प्रदीप्त करने के लिए समिधाओं की आवश्यकता पड़ती है। यज्ञीय प्रयोग शास्त्रों में विशिष्ट समिधाओं का उल्लेख मिलता है, यथा- आम्र, पलाश, खदिर, उदुम्बर (गूलर) आदि। उपनिषदों में ऐसे उल्लेख प्रायः दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में ही पाये जाते हैं। मुण्डकोपनिषद् (२.१.८) में 'इन्द्रियों के विषय' के लिए 'समिधा' शब्द का प्रयोग है और इस प्रयोग का कारण बताया गया है कि 'इन्द्रिय वर्ग' अपने विषयों से ही समिद्ध-प्रदीप्त हुआ करते है। वस्तुतः यह प्रकरण सृष्टि प्रक्रिया के अन्तर्गत आया है, जिसमें कहा गया है कि उस (विराट्) पुरुष (ब्रह्म) से ही सात प्राण (शीर्षस्थ सात इन्द्रियाँ- २ नेत्र, २ श्रवण, २ घ्राण और १ रसना) उत्पन्न हुए हैं। उसी से सात किरणें (दीप्तियाँ), सात समिधा, सात होम और जिनमें वे संचार करते हैं, वे सात स्थान प्रकट हुए हैं- सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् सप्ताचिंषः समिधः सप्त होमाः । सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥ आचार्य शंकर ने 'सप्त समिधः' का भाष्य करते हुए लिखा है-सप्त समिधः सप्त विषयाः, विषयैर्हि समिध्यन्ते प्राणाः अर्थात् सप्त समिधा-सात शीर्षस्थ इन्द्रियों-प्राणों के विषय हैं, क्योंकि इन विषयों से ही प्राण-इन्द्रिय वर्ग समिद्ध-प्रदीप्त-सक्रिय होते हैं। इस प्रकार 'सप्त समिधा' यहाँ दार्शनिक परिप्रेक्ष्य (नेत्र, श्रोत्र, घ्राण एवं रसना के विषय रूप, शब्द, गन्ध एवं रस के अर्थ) में प्रयुक्त है। २३८. समाधि - सामान्यतः चित्त की एकाग्रता को समाधि कहते हैं। चित्तवृत्तियाँ जब विकारों से रहित विशुद्ध अवस्था को प्राप्त होती हैं, यह समाधि योग तभी लगता है। ऐसी अवस्था में चित्त विक्षेपरहित हो जाता है और लक्ष्य विशेष में समाहित और स्थिर हो जाता है। ध्यान की पराकाष्ठा को भी समाधि कहा गया है। योग के आठ अंगों में अन्तिम अंग समाधि है। इसे योग का चरम फल भी कहते है। इसमें साधक अपने चित्त को बाह्य जगत् से मोड़कर आत्मा में स्थित कर लेता है, ऐसी अवस्था में वह विविध शक्तियों को धारण करता है और अन्त मे कैवल्य पद को प्राप्त होता है। योग दर्शन में समाधि के चार भेद बताये गये है- १. सम्प्रज्ञात, २. सवितर्क, ३. सविचार और ४. सानंद समाधि। हठयोग प्रदीपिका के अनुसार जैसे नमक जल में मिलने पर जल के समान हो जाता है, उसी प्रकार चित्त आत्मा के साथ मिलकर आत्मरूप हो जाता है। यह समाधि की पराकाष्ठा है- सलिले सैन्धवं यद्वत् साम्यं भजति योगतः । तथात्ममनसोरैक्यं समाधिरभिधीयते (ह०प्र०४.५)। समाधि के प्रायः दो भेदों का निरूपण किया जाता है- १. सविकल्पक और २.निर्विकल्पक। जब साधक की चित्तवृत्ति अद्वितीय ब्रह्म में स्थिर हो जाती है, तब उसे कुछ काल के लिए अपने विषय मे, ब्रह्म के विषय में तथा ज्ञान के विषय में बोध बना रहता है। जब तक ध्याता, ध्यान और ध्येय के विषय में पृथक् प्रतीति होती रहती है, उसे सविकल्पक समाधि कहते हैं और जब साधक समस्त चित्तवृत्तियों का निरोध कर एकीभाव (अद्वैत भाव) से ध्येय में अवस्थित हो जाता है, उसे निर्विकल्पक समाधि कहते हैं। उपनिषद् के अनुसार जो 'अहं ब्रह्मास्मि' का निश्चय करके निर्विकल्प समाधि में लीन रहकर परम स्वतंत्र और यति स्वरूप होता है, वह पुरुष संन्यासी, वही मुक्त कहलाता है- ब्रह्मैवाहमस्मीति निश्चित्य निर्विकल्पसमाधिना स्वतन्त्रो यतिश्चरति स संन्यासी स मुक्तः (निरा०३९)।

४८४ | [परिशिष्ट] | साम २३९. सम्भूति - द्र०-असम्भूति । २४०. सर्ग-प्रतिसर्ग - सर्ग का सामान्य अर्थ सृष्टि या संसार से लिया जाता है। जगत् की उत्पत्ति या मूल-उद्गम को भी सर्ग कहा गया है। इसके विपरीतार्थक रूप में जगत् के प्रलय को प्रतिसर्ग कहते हैं। पुराणों में सृष्टि और प्रलय अर्थात् सर्ग-प्रतिसर्ग का उल्लेख अनेक स्थानों पर हुआ है। महाभारत में विष्णु और शिव भगवान् के सहस्रनाम में सर्ग नाम उल्लिखित है। श्रीमद्भागवत पुराण (३.१०.१४-२६) में सर्ग का विस्तृत विवरण मिलता है। सृष्टि या कल्प के अर्थ में मनुस्मृति में भी सर्ग शब्द उपन्यस्त है-हिंस्राहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते। यद्यस्य सोऽदधात् सर्गे तत्तस्य स्वयमाविशत् (मनु०स्मृ०१.२९)। पुराणों के पाँच लक्षण, विषय या प्रकरण माने गये हैं- १. सर्ग (सृष्टि), २. प्रतिसर्ग अर्थात् सृष्टि का विस्तार, प्रलय और पुनः सृष्टि, ३. सृष्टि की आदि वंशावली, ४. मन्वन्तर और ५. वंशानुचरित। जगत् रचना के अन्तर्गत सृष्टि और प्रलय को सतत चलते रहने वाली परम्परा सर्ग-प्रतिसर्ग के रूप में वर्णित हुई है। उस ब्रह्म के संकोच से प्रलय तथा विकास से सृष्टि को रचना होती है- यत्संकोच विकासाभ्यां जगत्प्रलय सृष्टयः (महो०२.१०)। २४१. सविता - सूर्य, आदित्य, दिवाकर को ही सविता कहा गया है। इन्हें जगत् के रचयिता, उत्पादक या स्रष्टा भी कहा गया है। वैदिक साहित्य में ये देवता रूप में प्रख्यात हैं। सूर्य के उदय होने वाले रूप को सविता कहते हैं। सविता सबके उत्पत्ति कर्त्ता होने के रूप में प्रख्यात हैं-सवितारमाह सर्वस्य प्रसवितारम् (निरु०८.३१)। अमरकोश में सविता के पर्याय इस प्रकार हैं-भानुर्हंसः सहस्त्रांशुस्तपनः सविता रविः (अ०को०१.३.३१)। सविता द्युलोक में स्थित हैं। आदित्य ही सविता और द्युलोक सावित्री है-आदित्य एव सविता द्यौः सावित्री (सावि०६)। सविता को देवों के भी उत्पत्तिकर्त्ता के रूप में स्वीकार किया गया है-सविता वै देवानां प्रसविता (जैमि०३.१८.३)। यही प्रजा का भरण-पोषण करने से 'भर्ग' कहलाता है। शत्रुओं का नाश करने से 'सूर्य', सबको उत्पन्न करने से सविता, सबको प्रकाश देने से 'आदित्य', सबको पवित्र करने से 'पवमान'और सबका अयन (आश्रय स्थान) होने से आदित्य कहलाता है-इमाः प्रजास्तस्माद्भर्गत्वाद्भर्गः। शश्वत्सूर्यमानत्वात्सूर्यः सवनात्सविताऽऽदानादादित्यः पवनात्पावमानोऽथायनादादित्यः (मैत्रा० ५.७)। २४२. साक्षात्कार - साक्षात्कार शब्द के पर्याय ज्ञान, अनुभूति, मिलन, प्रत्यक्ष दर्शन आदि उल्लिखित है। आत्म साक्षात्कार अथवा ब्रह्म साक्षात्कार के दिव्य लक्ष्य को पाने के अभीप्सु साधक उपासना, यज्ञ, दान आदि कर्म में निरत रहते हैं। 'अयमात्मा ब्रह्म' 'तत्त्वमसि' आदि वेदान्त महावाक्यों का चिन्तन करते हुए अनुभूति की अवस्था से होकर साधक ब्रह्म तत्त्व का साक्षात्कार करता है। वह अनुभव करने लगता है कि मैं ही नित्यशुद्धबुद्धमुक्त स्वभाव अद्वयरूप ब्रह्म हूँ। २४३. साक्षी - द्र० अन्तर्यामी । २४४. सांख्य - छः दर्शनों में एक दर्शन सांख्य दर्शन है, जिसके रचयिता महर्षि कपिल हैं। इसमें सृष्टि की उत्पत्ति का सिद्धान्त निरूपित है। यह सृष्टि त्रिगुणात्मक (सत्त्व, रज, तम के योग से) विनिर्मित है। जगत् की उत्पत्ति का मूल यह प्रकृति ही है। पाँचों तत्त्व और ग्यारह इन्द्रियाँ- ये प्रकृति है। सृष्टि के चार प्रमुख विधान हैं- प्रकृति-विकृति, विकृति-प्रकृति और अनुभव। आत्मा को पुरुष कहा गया है। इसमें ईश्वर की सत्ता न मानकर पुरुष और प्रकृति दो तत्त्वों को ही प्रधान माना गया है। पुरुष जगत् से अनासक्त होते हुए भी प्रकृति के कार्यों में बँधा हुआ प्रतीत होता है, जब वह ज्ञान से इस बन्धन को दूर करके यथार्थ अनुभव प्राप्त कर लेता है, तो यही मोक्ष कहलाता है। गीता में विवेचित है कि कितने ही पुरुष ध्यान योग के द्वारा परमात्मा को अपने अन्तःकरण में देखते हैं, दूसरे सांख्य योग द्वारा और कितने ही कर्मयोग के द्वारा देखते हैं- ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना। अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे (गी० १३.२४)। २४५. साम - चारों वेदों में से एक वेद जिसका सम्बन्ध गायन से है, सामवेद कहलाया। मान्यता यह है कि वेद के पद्यबद्ध मन्त्रों को जब गायन विद्या से अनुप्राणित किया गया तो "सामवेद" बन गया। इसमें पद्य मन्त्रों की गान विद्या से जोड़ने से ज्ञान और भावना का सर्वोत्कृष्ट संयोग हुआ है। सामवेद के मन्त्रों को भी साम कहा गया है। साम की महत्ता गीता में भी प्रतिपादित हुई है, जिसमें भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है- वेदानां सामवेदोऽस्मि। वेद है ज्ञान,

सालोक्य [परिशिष्ट] ४८५ साम है गान। इसलिए ब्राह्मण ग्रन्थों में कहा गया है- गायन्ति हि साम (शत०ब्रा०४.४.५.६)। वाणी को साम की प्रतिष्ठा कहकर निरूपित किया गया है-वाग्वाव साम्नः प्रतिष्ठा (जैमि० १.३९.३)। छान्दोग्योपनिषद् में साम की पञ्चविध उपासना का निर्देश है। ये पाँच प्रकार हैं- १. हिंकार, २. प्रस्ताव, ३.उद्गीथ, ४. प्रतिहार और ५. निधन- लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत। पृथिवी हिंकारः। अग्निः प्रस्तावः। अन्तरिक्षमुद्गीथः। आदित्यः प्रतिहारः। द्यौर्निधनम् (छान्दो०२.२.१)। २४६. सालोक्य— द्र०-पञ्चविध मुक्ति। २४७. सावित्री— गायत्री की लौकिक शक्ति 'सावित्री' कहलाती है, जिसका सम्बन्ध स्थूल जगत् की शक्तियों से है। पारलौकिक शक्ति या ब्रह्मविद्या को गायत्री और वर्चस् या तेजस् को सावित्री माना गया है। आदित्य सविता है, तो प्रकाशमान द्यौ सावित्री है- आदित्य एव सविता द्यौः सावित्री (सावि० ६)। अग्नि सविता है, तो पृथिवी सावित्री है-अग्निरेव सविता पृथिवी सावित्री (सावि० १)। वरुण सविता है, तो आपः सावित्री है-वरुण एव सविता ऽऽपः सावित्री (सावि० २)। सावित्री को जानने वाला मृत्यु बन्धन से तर जाता है और उसी लोक को प्राप्त होता है-यो वा एतां सावित्रीमेवं वेदाऽप पुनर्मृत्युं तरति सावित्र्या एव सलोकतां जयति (जैमि०४.२८.६)। ब्रह्म से वायु, वायु से ओंकार, ओंकार से सावित्री, सावित्री से गायत्री और गायत्री से लोकों की उत्पत्ति होती है-ब्रह्मणो वायुः वायोरोंकारः ॐकारात्सावित्री सावित्र्या गायत्री गायत्र्या लोका भवन्ति (अ०शि०६)। २४८. सिद्धि —द्र०-ऋद्धि। २४९. सुषुप्ति —द्र०-जाग्रत्। २५०. सुषुम्ना नाड़ी— उपनिषद् ज्ञान के अनुसार हृदयरूपी केन्द्र से सम्पूर्ण शरीर में नाड़ियों का जाल बिखरा हुआ है। हृदय देश में १०१ नाड़ियाँ है। हर नाड़ी की सौ-सौ शाखाएँ हैं और उनमें प्रत्येक की बहत्तर-बहत्तर हजार प्रतिशाखाएँ है। इन सब नाड़ियों में व्यान वायु संचार करता है। इसे ही विज्ञानी नाड़ी संस्थान कहते है। हठयोग के अनुसार शरीर को तीन प्रधान नाड़ियों (इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना) में से एक सुषुम्ना नाड़ी है, जो नाभि के मध्य में इड़ा, दक्षिण भाग में पिंगला और मध्य में सुषुम्ना नाड़ी स्थित है। इसे त्रिगुणमयी अर्थात् सूर्य, चन्द्र और अग्निरूपिणी माना गया है। वैद्यक के अनुसार चौदह प्रधान नाड़ियों में से एक सुषुम्ना नाड़ी है, जो नाभि के मध्य स्थित है, जिससे अन्य सब नाड़ियाँ सम्बन्धित हैं। क्षुरिकोपनिषद् में सुषुम्ना नाड़ी का वर्णन दृष्टिगोचर होता है। सुषुम्ना परम तत्त्व में लीन है और विरजा (विशुद्ध) ब्रह्मरूपिणी है। वाम नाड़ी इड़ा और दक्षिण नाड़ी पिंगला के बीच जो उत्तम स्थान है, उसे (सुषुम्ना को) जो जानता है, वह वेदविद् कहा जाता है-सुषुम्ना तु परे लीना विरजा ब्रह्मरूपिणी। इडा तिष्ठति वामेन पिङ्गला दक्षिणेन तु। तयोर्मध्ये परं स्थानं यस्तं वेद स वेदवित् (क्षुरि०१६- १७)। ध्यानयोग से सब नाड़ियाँ छेदी जाती हैं, परन्तु एक सुषुम्ना नहीं छेदी जाती-छिद्यन्ते ध्यानयोगेन सुषुम्नैका न छिद्यते (क्षुरि०१८)। योग दर्शन में इस ऊर्ध्वगामिनी नाड़ी को कुण्डलिनी नाड़ी भी कहते है। २५१. सूक्ष्मद्रष्टा— अत्यन्त छोटी-छोटी बातें समझ लेने वाला, विशिष्ट बुद्धिमान्, ऋषि, परमेश्वर, शिव आदि को सूक्ष्मद्रष्टा कहा गया है। तीव्र या बेधक दृष्टि रखने वाले, सूक्ष्म विषय को समझने वाले, कुशाग्र बुद्धि वाले सूक्ष्मद्रष्टा रूप में मान्य है। वह आत्मा समस्त प्राणियों में छिपा होने के कारण प्रत्यक्ष नहीं होता, केवल सूक्ष्मदर्शियों के द्वारा अतिसूक्ष्म बेधक दृष्टि से देखा जाता है-एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते। दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः (कठ०१.३.१२)। वह परमात्मा सूक्ष्म से भी अतिसूक्ष्म, हृदयगुहा के गुहास्थान में स्थित है और वही सम्पूर्ण विश्व की रचना करने वाला तथा अनेक रूप धारण करने वाला है-सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् (श्वेता०४.१४)। २५२. सृष्टि-अतिसृष्टि— जगत् का आविर्भाव या संसार की उत्पत्ति को सृष्टि कहा जाता है। इस शब्द के अन्य पर्यायवाची शब्द हैं-उत्पत्ति, निर्माण, प्रकृति, उदारता, त्याग आदि। सृष्टि के आरम्भ में एक ही चेतन तत्त्व था, उसने इच्छा को कि मैं बहुत हो जाऊँ और प्रजा उत्पन्न करूँ-तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय (छान्दो०६.२.३)। वह ब्रह्म (परमेश्वर) ही जगत् का कारण है। वह सर्वज्ञ और सर्वविद् ईश्वर जिसका तप ज्ञानमय है, उसी से हिरण्यगर्भ ब्रह्मा, नाम, रूप और अन्न आदि उत्पन्न होते हैं- यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्य ज्ञानमयं तपः। तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं

४८६ [परिशिष्ट] स्वयम्भू-परिभू च जायते (मुण्ड०१.१.९)। उपनिषद् का कथन है कि जिससे ये सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं, जिसके सहारे जीवित रहते हैं और अन्त में जिसमें विलीन हो जाते हैं, वह ब्रह्म है-यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति। यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद् विजिज्ञासस्व तद् ब्रह्मेति (तैत्ति०३.१.१)। वह ब्रह्म जगत् की रचना कर उसमें अनुप्रविष्ट हो गया-तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् (तैत्ति०२.६.१)। कुछ विद्वानों का मत है कि भगवान् ने अपनी योगमाया से सृष्टि की रचना को। कुछ इसे जड़-चेतन के संयोग या पुरुष-प्रकृति के संयोग से उद्भूत मानते हैं। उत्कृष्ट सृष्टि या उत्कृष्ट रचना की अतिसृष्टि कहा गया है। २५३. सोऽहं— जीव और ब्रह्म की एकता या अभेदता को प्रदर्शित करने वाले अनेक वाक्य वेदान्त शास्त्र में दृष्टिगोचर होते हैं। जीव अज्ञान भाव से ग्रसित होकर अपने को ब्रह्म से पृथक् समझने लगता है। सोऽहं, शिवोऽहं, तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि प्रभृति वाक्यों के उपदेश वेदान्त शिक्षा में मिलते हैं। ये भाव अनुभूति के स्तर पर आने से ही इनसे अज्ञान तिमिर का नाश होता है। सोऽहं साधना से साधक को 'जीवो ब्रह्मैव नापरः' तथ्य का बोध हो जाता है। वह चैतन्य ईश्वर 'सोऽहं' स्वरूप में एक होते पर भी शरीरों की भिन्नता के कारण वह 'जीव' बहुविध बन जाता है- सोऽहमेकोऽपि देहारम्भक भेदवशाद्बहुजीवः (निरा०५)। यह देह ही देवालय है, उसमें जीव केवल शिव ही है। जब मनुष्य का अज्ञानरूप निर्माल्य दूर हो जाता है, तब 'सोऽहं' भाव से उसको पूजना चाहिए- देहो देवालयः प्रोक्तः स जीवः केवलः शिवः। त्यजेदज्ञान निर्माल्यं सोऽहंभावेन पूजयेत् (स्क०१०)। २५४. स्तोम— स्तोम शब्द के पर्यायवाची शब्द हैं-स्तुति, गुणगान, यज्ञ, समूह, राशि। वैदिक संहिताओं में प्रायः देवों के प्रति स्तोम ही संगृहीत हैं। साम गान के अन्तर्गत स्तुतिपरक छन्दों को स्तोम कहा गया है। इस तथ्य की पुष्टि निम्न प्रतिपादन से होती है-यद्यूचि तद्गेथा३ इति स्तोमो वा एष तस्य साम्नो यद्गयं सामोपास्मह इति (जैमि०१.४३.६)। स्तोम को प्रतिहार और छन्द को निधनरूप माना गया है-ऋचः प्रस्तावं सामान्युद्गीथं स्तोमं प्रतिहारं छन्दो निधनम् (जैमि०१.१३.३)। २५५. स्थितता— अपने ही हृदय की दिव्य भावनाओं में सन्तुष्ट एवं शान्त बने रहने वाले साधक को स्थिति को 'स्थितता' कहा जा सकता है। ऐसा साधक किसी भी भौतिक लिप्सा-लालसा से दूर रहता है और किसी भी बाह्य सुख की अपेक्षा नहीं करता। उपनिषद् में जनक-याज्ञवल्क्य संवाद में राजा जनक पूछते हैं-हे याज्ञवल्क्य! स्थितता क्या है? हे सम्राट्! हृदय ही स्थितता है-ऐसा याज्ञवल्क्य ने कहा (बृह०४.१.७)। स्थिर प्रज्ञा या बुद्धि वाले साधकों को गीता में स्थितप्रज्ञ या स्थितधी कहकर निरूपित किया गया है। गीता के अनुसार जब साधक मन में स्थित कामनाओं को त्याग देता है, तब आत्मा से हो आत्मा में सन्तुष्ट हुआ वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है-प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञः तदोच्यते (गी०२.५५)। २५६. स्वधा— द्र०-स्वाहा। २५७. स्वप्न— निद्रावस्था में कुछ मूर्तियों, चित्रों, व्यक्तियों और विचारों आदि का सम्बद्ध या असम्बद्ध श्रृंखला का मन में आना या कोई घटना आदि दिखाई देना स्वप्न कहलाता है। ऋग्वेद तथा अन्य संहिताओं में स्वप्न का उल्लेख हुआ है। ऋ०२.५८.१० में दुःस्वप्न का वर्णन है। ब्रह्मवैवर्त पुराण (अ० ७७) में शुभाशुभ स्वप्नफल का विस्तृत वर्णन है। रात्रि में स्वप्नावस्था में पितृराज मनुष्यों में प्रविष्ट होते हैं-अश्मसु सोमो राजा निशायां पितृराजः स्वप्ने मनुष्यान् प्रविशसि पयसा पशून् (जैमि०४.५.२)। जाग्रत् अवस्था और उसके अधिष्ठाता की स्थिति नेत्र के भीतर है। स्वप्न और उसके अधिष्ठाता तैजस का कण्ठ में समावेश है। सुषुप्ति और उसके अधिष्ठाता प्राज्ञ हृदय में स्थित हैं और तुरीय परमात्मा मूर्धा (मस्तिष्क) में स्थित हैं- नेत्रस्थं जागरितं विद्यात् कण्ठे स्वप्नं समाविशेत्। सुषुप्तं हृदयस्थं तु तुरीयं मूर्ध्नि संस्थितम् (ना०प०५.२५)। जैसे स्वच्छ दर्पण में वस्तु स्पष्ट दीखती है, वैसे शुद्ध अन्तःकरण में परमात्मा के दर्शन होते हैं। जैसे स्वप्न में वस्तु अस्पष्ट दीखती है, वैसे ही पितृलोक में परमात्मा - यथाऽऽदर्शे तथात्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके (कठ०२.३.५)। २५८. स्वयम्भू-परिभू— स्वयम्भू का शाब्दिक अर्थ है, जो स्वयं उत्पन्न हुआ हो-ब्रह्मा,विष्णु,शिव,बुद्ध,कामदेव आदि देवों को स्वयम्भू कहा गया है। यह शब्द ईश्वर के विशेषण रूप में प्रयुक्त होता है। इसी रूप में 'परिभू' शब्द भी है, जिसका अर्थ है-जो चारों ओर से आच्छादित किये हो। प्रथम मनु को भी स्वयम्भू या स्वयम्भुव कहा गया है।

स्वर्ग्य अग्नि [परिशिष्ट] ४८७ २५९. स्वर्ग्य अग्नि— स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाली अग्निविद्या को कठोपनिषद् में स्वर्ग्य अग्नि कहा गया है। यह अग्नि- विद्या यमराज ने नचिकेता को प्रदान की। नचिकेता ने दूसरे वर के रूप में यही माँगा था-स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वं श्रद्दधानाय मह्यम् (१.१.१३)। यमराज ने इस स्वर्ग्य अग्नि को नाचिकैताग्नि नाम प्रदान किया। इसका तीन बार अनुष्ठान करने वाला ऋक्, यजु, साम तीनों से सम्बन्ध जोड़कर यज्ञ, दान, तप रूप त्रिकर्म करने वाला मनुष्य जन्म-मृत्यु से तर जाता है-त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य संधिं त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू (कठ०१.१.१७)। २६०. स्वस्ति— स्वस्ति शब्द के पर्याय कुशल-क्षेम, शुभकामना, कल्याण, आशीर्वाद आदि हैं। वैदिक संहिताओं में कई सूक्त माङ्गलिक पाठ या स्वस्ति पाठ के हैं, इन्हें स्वस्तिवाचन कहते हैं। सोम देवता से कल्याण करने की प्रार्थना की गई है-सोमः स्वस्त्या (तै०ब्रा०१.४.८.६)। ब्राह्मण से भी कल्याण की कामना की जाती है-नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मे (कठ०१.१.९)। उपनिषद् का निर्देश है कि परमात्मा का ओम् अक्षर के द्वारा स्मरण करो। अज्ञानमय अन्धकार से परे भवसागर के पार होने के लिए तुम्हारा कल्याण हो-ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानं स्वस्ति वः पाराय तमसः परस्तात् (मुण्ड०२.२.६)। संन्यासी सब जीवों का कल्याण हो, इस भाव से परमात्मा का अनन्य स्मरण करते हुए विचरण करे-स्वस्ति सर्वजीवेभ्य इत्युक्त्वाऽऽत्मानमनन्यं ध्यायन् (क०रु०४)। २६१. स्वाहा-स्वधा— स्वाहा का शाब्दिक अर्थ 'स्व+आ+हा' अपना सम्यक् रूप से त्याग या विसर्जन है। यज्ञ में याजक स्वाहा शब्द के उच्चारण के साथ आहुतियाँ देते हैं, हव्य पदार्थ विसर्जित करते हैं, इसे स्वाहाकार कहते हैं। पितरों को श्रद्धापूर्वक भोज्य पदार्थ पिंड या जल अर्पित करते समय स्वधा शब्द का उच्चारण करते हैं, इसे स्वधाकार कहते हैं। निरुक्तकार यास्क ने स्वाहा शब्द के व्युत्पत्तिपरक अर्थ इस प्रकार दिये हैं-स्वाहेत्येतत्सु आहेति वा, स्वाहुतं हविर्जुहोति ('स्वाहा' इस शब्द का सु=सुन्दर, आह=कथन तथा स्व=स्वत्व=आ= भली प्रकार, हा = समर्पण अर्थात् आहुति के रूप में सम्यक् समर्पण) (नि०८.२०)। पितर स्वधारूपी अन्न से ही आयु (जीवन) पाते हैं- स्वधो वै पितॄणामन्नम् (शत०ब्रा० १३.८.१.४), पितर आयुष्यन्तस्ते स्वधयायुष्मन्तः (तै०सं०२.३.१०.४), स्वधां पितृभ्यः (आगायानि) (छान्दो० २.२२.२)। उपनिषद् में वाणी को धेनुरूप मानकर उसके चार स्तन स्वाहाकार, वषट्कार, हन्तकार और स्वधाकार उपन्यस्त हैं- वाचं धेनुमुपासीत। तस्याश्चत्वारः स्तनाः-स्वाहाकारो वषट्कारो हन्तकारः स्वधाकारः। तस्या द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति, स्वाहाकारं च वषट्कारञ्च। हन्तकारं मनुष्याः। स्वधाकारं पितरः (बृह० ५.८.१)। पुराणों में स्वाहा और स्वधा को अग्निदेव को दो पत्नियां माना गया है। देवों तक आहुति पहुँचाने का कार्य 'स्वाहा' तथा पितरों तक 'स्वधा' करती हैं- ऐसी प्रसिद्धि है। २६२. हंस-परमहंस— हंस झीलों में रहने वाला एक जल पक्षी है। मान्यता है कि यह दूध में से पानी अलग कर देता है। ब्रह्म, आत्मा तथा प्रकाश स्वरूप जीवात्मा को भी हंस कहकर निरूपित किया गया है। अपने परम आराध्य या इष्ट, महात्मा, गुरु को भी आदर भाव से परमहंस कहा जाता है। इसे अध्यात्म तथा साहित्य क्षेत्र में नीर-क्षीर विवेक का प्रतीक माना गया है। सबके जीवन आधार और सबके आश्रयरूप विस्तृत ब्रह्मचक्र (व्यवस्था) में हंस रूप जीवात्मा भ्रमण करता रहता है-सर्वाजीवे सर्वसंस्थे बृहन्ते अस्मिन्हंसो भ्राम्यते ब्रह्मचक्रे (श्वेता० १.६)। वह हंस रूप परमात्मा ज्योतिर्मय परमधाम में रहने वाला है-हंसः शुचिषद (कठ० २.२.२)। उपनिषद् में परमात्मतत्त्व ही हंस के रूप में वर्णित है-जो इस हृदय में स्थित अनाहत ध्वनियुक्त प्रकाशयुक्त चिदानन्द हंस को जानता है, वह हंस ही कहा जाता है-अनाहतध्वनियुतं हंसं यो वेद हृद्गतम्। स्वप्रकाशचिदानन्दं स हंस इति गीयते (ब्र०बि० २०-२१)। आदित्य को भी हंस कहा गया है-एष (आदित्यः) वै हंसः शुचिषद् (ऐत० ब्रा०४.२०)। संन्यासियों की चार श्रेणियाँ मानी गई हैं-कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस। हंस शब्द का आशय है-सद् और असद् के विवेक को शक्ति से परिपूर्ण आत्मा। जिस आत्मा का परम विकास हो गया हो, उसे परमहंस कहा गया है। २६३. हन्तकार — द्र०- वषट्कार । २६४. हय — द्र०-अश्व। २६५. हर्ष-शोक - प्रिय या इष्ट वस्तु या व्यक्ति से उत्पन्न होने वाला सुखात्मक भाव हर्ष कहलाता है। इसका पर्याय आनंद, प्रसन्नता, रोमांच, कामोत्तेजना आदि है। इसके विपरीत अर्थ में 'शोक' शब्द का प्रयोग होता है। साधक साधना पथ से परमात्मा के निकट बढ़ने पर हर्ष को और उससे दूर होने पर शोक को प्राप्त होता है। उस परमात्मा को विवेकवान् पुरुष अध्यात्म योग के द्वारा समझकर हर्षशोक को त्याग देता है - अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं

४८८ (परिशिष्ट) होता मत्वाधीरो हर्षशोकौ जहाति (कठ० १.२.१२)। किसी इष्ट वस्तु अथवा प्रिय व्यक्ति के वियोग अथवा मृत्यु से उत्पन्न भारी मानसिक व्यथा अथवा विषादजन्य स्थिति को शोक कहा जाता है। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं, जीवात्मा बार-बार जन्मने और मरने वाला है, सो उसका शोक करना उचित नहीं-अथ चैनं नित्यजातं, नित्यं वा मन्यसे मृतम्। तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि (गी० २.२६)। २६६. हिरण्यगर्भ— ऐसी मान्यता है कि इस सृष्टि में सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ (स्वर्णिम या ज्योतिर्मय अण्ड या गर्भ) रूप प्रजापति ब्रह्मा उत्पन्न हुए, उन्हीं से समस्त सृष्टि का विस्तार हुआ। कहीं-कहीं हिरण्यगर्भ शब्द भगवान् विष्णु और आत्मा के लिए भी प्रयुक्त हुआ है। सृष्टि संरचना की परिकल्पना करते हुए परमात्मा की एक शक्ति की कल्पना की गयी। सृजन करने वाली इस शक्ति को पुरुष, विश्वकर्मा, हिरण्यगर्भ, प्रजापति और ब्रह्मा आदि की संज्ञाएँ दी गयीं। भागवत पुराण में वर्णन मिलता है कि सृष्टि के आदि में भगवान् नारायण की प्रेरणा से ब्रह्माण्ड स्वर्ण जैसा प्रकाशमान गोलाकार अण्ड रूप में प्रकट हुआ था। उसके ऊर्ध्व और अधः दो भाग हो गये। उसी के बीच से ब्रह्मा जी प्रकट हुए। सम्पूर्ण विश्व की सृष्टि करने वाले, प्राणियों के ईश्वर रूप में यह मान्यता है-एष हि खल्वात्मेशानः शम्भुर्भुवो रुद्रः प्रजापतिर्विश्वसृग्धिरण्यगर्भः (मैत्रा० ५.८)। उस विराट् परमेश्वर ने सबसे पहले हिरण्यगर्भ को उत्पन्न किया था-हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु (श्वेता० ३.४)। २६७. हुत-प्रहुत— हवनीय द्रव्य को हवि, हविष्य या हुत कहते हैं। हवनादि कृत्य के लिए प्रयुक्त खाद्यान्न तिल, चावल, जौ आदि तथा घृत ये हुत के पर्याय हैं। यह यज्ञीय पदार्थ देवों का अन्न या देवात्र कहलाता है। देवों के लिए ही भोज्य पदार्थ या बलि अर्पित करना प्रहुत कहलाता है। उपनिषद् का कथन है कि परमात्मा ने दो अन्न देवों को बाँटे-वे हुत और प्रहुत हैं, इसलिए लोग देवों के लिए आहुति और बलि अर्पित करते हैं- द्वे (अन्ने) देवानभाजयदिति। हुतं च प्रहुतं च। तस्माद् देवेभ्यो जुह्वति च प्र च जुह्वति (बृह० १.५.२)। २६८. हृदय गुहा— प्रत्येक जीव या मनुष्य की हृदय गुहा में परम पुरुष परमात्मा का निवास है, ऐसी प्रसिद्धि है। प्रजापति आदि सम्पूर्ण देवताओं का निवास हृदय में माना गया है- एष प्रजापतिर्यद्धृदयम्। एतद्ब्रह्म (बृह० ५.३.१), हृदिस्था देवताः सर्वा हृदि प्राणाः प्रतिष्ठिताः (अ०शि०४३)। देवी अदिति प्राणों के सहित हृदय गुहा में प्रवेश करके वहीं रहती है- या प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी। गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत (कठ० २.१.७)। वह परमात्मा अन्नमय स्थूल शरीर में हृदयगुहा के आश्रय में प्रतिष्ठित है- प्रतिष्ठितोऽन्ने हृदयं सन्निधाय (मुण्ड०२.२.७), एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा (श्वेता० ६.११)। वास्तविक धर्म का-ज्ञान का तत्त्व हृदय गुहा में स्थित माना जाता है- धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम् (महा०वनपर्व ३१३.११७)। २६९. हृदय ग्रन्थि— हृदय ग्रन्थि का सामान्य अर्थ है- हृदय की गाँठ। द्वेष, कपट, कुटिलता के अर्थ में यह लिया जाता है। सम्मोह या अविद्या से उत्पन्न होने वाले आन्तरिक विकार जो गाँठों की तरह न सुलझने वाले होते हैं और अन्तर् में पीड़ा देते रहते हैं, ये हृदय ग्रन्थियाँ कहे जाते हैं। विषय-विकारों, वासनाओं, इच्छाओं, तृष्णाओं को बन्धनरूप माना गया है, सो इन्हें भी हृदय ग्रन्थियों के रूप में माना जाता है। कठोपनिषद् का कथन है कि जब हृदय की सब ग्रन्थियाँ भली-भाँति खुल जाती हैं, तब मनुष्य अमरत्व को प्राप्त करता है-यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम् (कठ० २.३.१५)। मुण्डकोपनिषद् में कहा गया है कि जब परम तत्त्व (परब्रह्म) का साक्षात्कार हो जाता है, तो हृदयग्रन्थि खुल जाती है और सारे भ्रम-सन्देह दूर हो जाते हैं। समस्त प्रारब्ध कर्म क्षीण हो जाते हैं और अन्ततः वह (जीवात्मा) मुक्त हो जाता है-भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे (मुण्ड० २.२.८)। २७०. होता— यज्ञ कर्त्ता या यज्ञ कराने वाले पुरोहित को होता कहा गया है। यज्ञ में मन्त्रोच्चारण करने वाला ऋत्विक् 'होता' रूप में मान्य है। यज्ञ में प्रमुख चार ऋत्विकों में एक 'होता' है- ब्रह्मा, अध्वर्यु, होता और उद्गाता-इन चारों ऋत्विकों के तीन-तीन सहयोगी मिलाने से कुल सोलह ऋत्विक् बड़े यज्ञों में होते थे। होता के तीन सहयोगी मैत्रावरुण, अच्छावाक् और ग्रावस्तुत् कहलाते हैं। अग्निदेव यज्ञ सम्पन्न करते हैं, सो उन्हें भी होता कहकर निरूपित किया गया है- अग्निर्वेव होताऽऽसीत् (जै०ब्रा० ३.३७४)। अमरकोश (२.७.१७) के अनुसार ऋग्वेदवेत्ता 'होता' कहा जाता है। यज्ञ में यह ऋग्वेद के मंत्रों का पाठ करता है तथा देवों की स्तुति और आवाहन करता हैं।

मन्त्रानुक्रमणिका-ज्ञान खण्ड

{|l l|l l|} \hline मन्त्र-प्रतीक & उपनिषद् विवरण & मन्त्र प्रतीक & उपनिषद् विवरण

\hline ॐअस्य श्री महावाक्य० & शु०२० २० & अत्र यजमानः ..... वसवः & छान्दो० २.२४.६

ॐ अकारो दक्षिणः & ना०बि० १ & अत्रैते श्लोका & मैत्रा० ४ (क)

अकर्मेति च .....यत्तदकर्म & निरा० १२ & अत्रैष देवःस्वप्ने & प्रश्न० ४.५

अग्नये स्वाहेत्यग्रौ हुत्वा & बृह० ६.३.३ & अत्यस्यंतं ..... पादौ & छान्दो० ५.१७.२

अग्निरेव सविता & गाय० ३.२ & अत्यस्यंतं ..... प्राणस्त्वेष & छान्दो० ५.१४.२

अग्निर्मूर्धा चक्षुषी & मुण्ड० २.१.४ & अत्यस्यंतं ..... बस्तिस्त्वेष & छान्दो० ५.१६.२

अग्नियंत्राभिमथ्यते & श्वेता० २.६ & अत्यस्यंतं ..... मूर्धा त्वेष & छान्दो० ५.१२.२

अग्निर्यथैको & कठ० २.२.९ & अत्यस्यंतं ..... संदेहस्त्वेष & छान्दो० ५.१५.२

अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं & ऐत० १.२.४ & अथ कबन्धी कात्यायन & प्रश्न० १.३

अग्निर्हिङ्कारो वायुः & छान्दो० २.२०.१ & अथ कर्मणामात्मेत्येतेदषा... & बृह० १.६.३

अग्निष्टे पादं वक्तेति & छान्दो० ४.६.१ & अथ किमेतैर्वा .... गन्धर्वा... & मैत्रा० १.६

अग्ने नय सुपथा & ईश० १८ & अथ किमेतैर्वा .... महाधनुर्धरा.. & मैत्रा० १.५

अग्राह्यमिति.... ग्राह्यात् & निरा० ३८ & अथ किमेतैर्वा शोषणम् & मैत्रा० १.७

अघोषमव्यञ्जनमस्वरम् & अमृ० २५ & अथ खलु..... असौ & छान्दो० १.५.१

अङ्गहीनानि वाक्यानि & शु०२० १६ & अथ खलु व्यानमेवोद्गीथम् & छान्दो० १.३.३

अङ्गुष्ठमात्रः & श्वेता० ३.१३ & अथ खलु.... होतृ.... & छान्दो० १.५.५

अङ्गुष्ठमात्रः.... ज्योतिः & कठ० २.१.१३ & अथ खलूद्गीथाक्षराणि & छान्दो० १.३.६

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो & कठ० २.३.१७ & अथ खल्वमुमादित्यः & छान्दो० २.९.१

अङ्गुष्ठमात्रः...... मध्य & कठ० २.१.१२ & अथ खल्वात्मसंमितम् & छान्दो० २.१०.१

अङ्गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः & श्वेता० ५.८ & अथ खल्वाशीः & छान्दो० १.३.८

अच्युतोऽस्मि महादेव & स्कन्द० १ & अथ खल्वियम् & मैत्रा० २.३

अजात इत्येवम् & श्वेता० ४.२१ & अथ खल्वेतयर्चा पच्छ & छान्दो० ५.२.७

अजामेकां लोहित..... & श्वेता० ४.५ & अथ चक्षुरत्यवहत्तद्यदा & बृह० १.३.१४

अजा हिङ्कारोऽवयः & छान्दो० २.१८.१ & अथ जुहोति नमः & छान्दो० २.२४.१४

अजीर्यताममृतानामुपेत्य & कठ० १.१.२८ & अथ जुहोति नमोऽग्नये & छान्दो० २.२४.५

अज्ञानजन बोधार्थं & ना०बि० २९ & अथ जुहोति नमो वायवे & छान्दो० २.२४.९

अज्ञानं चेति & ना०बि० २६ & अथ तत ऊर्ध्व उदेत्य & छान्दो० ३.११.१

अज्ञानमिति .... ज्ञानमज्ञानम् & निरा० १४ & अथ तथा मुद्गलोपनिषदि & मुद्ग० २.१

अणिमाद्यष्टैश्च .... बन्धः & निरा० २१ & अथ त्रयो वाव लोकाः & बृह० १.५.१६

अणोरणीयान्महतो महीयानात्मा & श्वेता०३.२० & अथ प्रतिसृप्याञ्जलौ & छान्दो० ५.२.६

अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य & कठ०१.२.२० & अथ भगवाञ्छाकायन्यः & मैत्रा० २.१

अतः समुद्रा गिरयश्च & मुण्ड० २.१.९ & अथ मनोऽत्यवहत्तद्यदा & बृह० १.३.१६

अतीन्द्रियं गुणातीतं & ना०बि० १८ & अथ महावाक्यानि & शु०२० २२

अतो यान्यन्यानि & छान्दो० १.३.५ & अथ य आत्मा स सेतु & छान्दो० ८.४.१

अत्र पिताऽपिता भवति & बृह० ४.३.२२ & अथ य इच्छेत्पुत्रो मे कपिलः & बृह० ६.४.१५

अत्र यजमानः .... रुद्रा & छान्दो० २.२४.१० & अथ य इच्छेत्पुत्रो मे पण्डितो & बृह० ६.४.१८

\hline

मन्त्रानुक्रमणिका ४९० मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण अथ य इच्छेत्पुत्रो मे श्यामो बृह० ६.४.१६ अथ यदि सखिलोक छान्दो० ८.२.५ अथ य इच्छेद्दुहिता मे बृह० ६.४.१७ अथ यदि सामतो छान्दो० ४.१७.६ अथ य इमे ग्रामे छान्दो० ५.१०.३ अथ यदि स्त्रीलोक कामो छान्दो० ८.२.९ अथ य एतदेवम् छान्दो० ५.२४.२ अथ यदि स्वसृलोक कामो छान्दो० ८.२.४ अथ य एतदेवं विद्वान् छान्दो० १.७. ७ अथ यदु चैवास्मिञ्छ्रव्यं छान्दो० ४.१५.५ अथ य एष सम्प्रसादो० छान्दो० ८.३.४ अथ यदूर्ध्वं मध्यम् छान्दो० २.९.६ अथ य एषोऽन्तरक्षिणि छान्दो० १.७.५ अथ यदूर्ध्वमपराह्नात् छान्दो०२.९.७ अथ य एषो बाह्या मैत्रा० २.२ अथ यदेतदक्षणः शुक्लम् छान्दो० १.७.४ अथ य एषोऽन्तरे मैत्रा० ५.२ अथ यदेतदादित्यस्य छान्दो० १.६.५ अथ यच्चतुर्थममृतम् छान्दो० ३.९.१ अथ यदेवैतदादित्यस्य छान्दो० १.६.६ अथ यत्तदजायत छान्दो० ३.१९.३ अथ यद्द्वितीयममृतं छान्दो० ३.७.१ अथ यत्तपो दानम् छान्दो० ३.१७.४ अथ यद्धसति छान्दो० ३.१७.३ अथ यत्तृतीयममृतम् छान्दो० ३.८.१ अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते छान्दो० ८.५.१ अथ यत्पञ्चमममृतम् छान्दो० ३.१०.१ अथ यद्यन्नपानलोक कामो छान्दो० ८.२.७ अथ यत्प्रथमास्तमिते छान्दो० २.९.८ अथ यद्यप्येनानुक्रान्त० छान्दो० ७.१५.३ अथ यत्प्रथमोदिते छान्दो० २.९.३ अथ यद्युदक आत्मानम् बृह० ६.४.६ अथ यत्रैतत्पुरुषः छान्दो० ६.८.५ अथ यद्येनमूष्मसूपालभेत छान्दो० २.२२.४ अथ यत्रैतदबलिमानम् छान्दो० ८.६.४ अथ यस्य जायामर्तवम् बृह० ६.४.१३ अथ यत्रैदस्माच्छरीराद् छान्दो० ८.६.५ अथ यस्य जायायै बृह० ६.४.१२ अथ यत्रैतदाकाशम् छान्दो० ८.१२.४ अथ य...... हृत्पुष्कर मैत्रा० ५.२ अथ यत्रोपाकृते छान्दो० ४.१६.४ अथ या एता हृदयस्य छान्दो० ८.६.१ अथ यत्सङ्गववेलाया छान्दो० २.९.४ अथ यां चतुर्थीम् छान्दो० ५.२२.१ अथ यत्सत्रायणमित्याचक्षते छान्दो० ८.५.२ अथ यां तृतीयाम् छान्दो० ५.२१.१ अथ यत्सम्प्रति मध्यन्दिने छान्दो० २.९.५ अथ यां द्वितीयाम् छान्दो० ५.२०.१ अथ यथेयं कौत्सायनी मैत्रा० ४.४ (ठ) अथ यानि चतुश्चत्वारि छान्दो० ३.१६.३ अथ यदतः परो छान्दो० ३.१३.७ अथ यान्यष्टाचत्वारि छान्दो० ३.१६.५ अथ यदनाशकायनामित्या छान्दो० ८.५.३ अथ यां पञ्चमीम् छान्दो० ५.२३.१ अथ यदवोच ० छान्दो० ३.१५.७ अथ यामिच्छेद्दधीतेति बृह० ६.४.११ अथ यदवोचं भुवः छान्दो० ३.१५.६ अथ यामिच्छेत्र गर्भंदधीत बृह० ६.४.१० अथ यदवोचं भूः छान्दो० ३.१५.५ अथ ये चास्येह छान्दो० ८.३.२ अथ यदश्नाति छान्दो० ३.१७.२ अथ ये यज्ञेन दानेन बृह० ६.२.१६ अथ यदा सुषुप्तो भवति बृह० २.१.१९ अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मय छान्दो० ३.२.१ अथ यदास्य वाङ् छान्दो० ६.१५.२ अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो छान्दो० ३.३.१ अथ यदि गन्धमाल्य छान्दो० ८.२.६ अथ येऽस्योदञ्चो छान्दो० ३.४.१ अथ यदि गीतवादित्र छान्दो० ८.२.८ अथ येऽस्योर्ध्वा रश्मयस्ता छान्दो० ३.५.१ अथ यदि तस्याः कर्ता छान्दो० ६.१६.२ अथ योऽयमूर्ध्वा मैत्रा० २.७ अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे छान्दो० ८.१.१ यो वेदेदं मन्वानीति छान्दो० ८.१२.५ अथ यदि द्विमात्रेण प्रश्न० ५.४ अथ योऽस्य दक्षिणः छान्दो० ३.१३.२ अथ यदि महज्जिगमिषेद् छान्दो० ५.२.४ अथ योऽस्य प्रत्यङ् सुषिः छान्दो० ३.१३.३ अथ यदि भ्रातृलोक कामो छान्दो० ८.२.३ अथ योऽस्योदङ् सुषिः छान्दो० ३.१३.४ अथ यदि मातृलोक छान्दो० ८.२.२ अथ योऽस्योर्ध्वः छान्दो० ३.१३.५ अथ यदि यजुष्टो छान्दो० ४.१७.५ अथ रहस्योपनिषद्.... शु०र० ३०

४११ मन्त्रानुक्रमणिका मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण अथ रूपाणां चक्षुः बृह० १.६.२ अथ हैनमुद्गातोपससाद छान्दो० १.११.६ अथर्वणे यां प्रवदेत मुण्ड० १.१.२ अथ हैनमुद्दालक आरुणिः बृह० ३.७.१ अथ वंशः । पौतिभाषी बृह० ६.५.१ अथ हैनमुषस्तश्चाक्रा० बृह० ३.४.१ अथ वंशः पौतिमाष्यात् बृह० ४.६.१ अथ हैनमुषभोऽभ्युवाद छान्दो० ४.५.१ अथ वंशः पौतिमाष्यो बृह० २.६.१ अथ हौनं यजमान उवाच छान्दो० १.११.१ अथ वायुमब्रुवन् केन० ३.७ अथ हौनं वागुवाच छान्दो० ५.१.१३ अथ श्रोत्रमन्ववहत्तद्यदा बृह० १.३.१५ अथ हौनं विदग्धः शाकल्यः बृह० ३.९.१ अथ सप्तविधस्य वाचि छान्दो० २.८.१ अथ हौनं शैब्यः प्रश्नो० ५.१ अथ ह चक्षुरुद्गीथम् छान्दो० १.२.४ अथ हौनं श्रोत्रमुवाच छान्दो० ५.१.१४ अथ ह चक्षुरूचुस्त्वम् बृह० १.३.४ अथ हौनं सुकेशा प्रश्नो० ६.१ अथ ह प्राण उच्चिक्रमिष छान्दो० ५.१.१२ अथ हौनं सौर्यायणी प्रश्नो० ४.१ अथ ह प्राणं उत्क्रमि- बृह० ६.१.१३ अथ होवाच जनः शार्क छान्दो० ५.१५.१ अथ ह प्राणमन्ववहत् बृह० १.३.१३ अथ होवाच बुडिलमाश्व छान्दो० ५.१६.१ अथ ह प्राणमूचुस्त्वं न बृह० १.३.३ अथ होवाच ब्राह्मणाः बृह० ३.९.२७ अथ ह प्राणा अह१ श्रेयसि छान्दो० ५.१.६ अथ होवाच सत्ययज्ञम् छान्दो० ५.१३.१ अथ ह मन उद्गीथम् छान्दो० १.२.६ अथ होवाचेन्द्र द्युम्नम् छान्दो० ५.१४.१ अथ ह मन ऊचुस्त्वम् बृह० १.३.६ अथ होवाचोद्दालकम् छान्दो० ५.१७.१ अथ ह य एतानेवम् छान्दो० ५.१०.१० अथात आत्मादेश एवा छान्दो० ७.२५.२ अथ ह य एवायं मुख्यः छान्दो० १.२.६ अथातः पवमानानामे० बृह० १.३.२८ अथ ह याज्ञवल्क्यस्य द्वे बृह० ४.५.१ अथातः शौव उद्गीथः छान्दो० १.१२.१ अथ ह वाचक्रव्युवाच बृह० ३.८.१ अथातः सम्प्रत्तिर्यदा बृह० १.५.१७ अथ ह वाचमुद्गीथम् छान्दो० १.२.३ अथातो रहस्योपनिषदम् शु०२० १ अथ ह शौनकं च छान्दो० ४.३.५ अथातो व्रतमीमा १ सा बृह० १.५.२१ अथ ह श्रोत्रमूचुस्त्वम् बृह० १.३.५ अथात्मनेऽन्नाद्यमागा० बृह० १.३.१७ अथ ह श्रोत्रमुद्गीथम् छान्दो० १.२.५ अथादित्य उदयन् प्रश्नो० १.६ अथ ह हंसो निशायाम् छान्दो० ४.१.२ अथाधिदैवतं ज्वलिष्यामि बृह० १.५.२२ अथ हाग्नयः समूदिरे छान्दो० ४.१०.४ अथाधिदैवतं य एवासौ छान्दो० १.३.१ अथ हेन्द्रोऽप्राप्यैव छान्दो० ८.९.१ अथाध्यात्मं अधरा तैत्ति० १.३.४ अथ हेममासन्यम् बृह० १.३.७ अथाध्यात्मं प्राणो वाव छान्दो० ४.३.३ अथ हौनं कहोलः बृह० ३.५.१ अथाध्यात्ममिदमेव मूर्तम् बृह० २.३.४ अथ हौनं कौसल्यः प्रश्नो० ३.१ अथाध्यात्मं य एवायम् छान्दो० १.५.३ अथ हौनं गार्गी वाच० बृह० ३.६.१ अथाध्यात्मं यदेतद् केन० ४.५ अथ हौनं गार्हपत्यो० छान्दो० ४.११.१ अथाध्यात्मं वागेवर्वाणः छान्दो० १.७.१ अथ हौनं जारत्कारव बृह० ३.२.१ अथानु किमनुशिष्टः छान्दो० ५.३.४ अथ हौनं प्रतिहर्तोपससाद छान्दो० १.११.८ अथानेनैव ये चैतस्मात् छान्दो० १.७.८ अथ हौनं प्रस्तोतोपससाद छान्दो० १.११.४ अथान्यत्राप्युक्तं-अथखलु मैत्रा० ५.४ अथ हौनं भार्गवो प्रश्नो० २.१ अथान्यत्राप्युक्तं - महानदी- मैत्रा० ४.२ अथ हौनं भुज्युर्लाह्यायनिः बृह० ३.३.१ अथान्यत्राप्युक्तं - यः कर्ता मैत्रा० ३.३ अथ हौनं मनुष्या ऊचुः बृह० ५.२.२ अथान्यत्राप्युक्तं - शरीरमिदं मैत्रा० ३.४ अथ हौनमन्वाहार्यपचनो छान्दो० ४.१२.१ अथान्यत्राप्युक्तं - संमोहो मैत्रा० ३.५ अथ हौनमसुरा ऊचुः बृह० ५.२.३ अथान्यत्राप्युक्तं - स्वनवत्येषा० मैत्रा० ५.५ अथ हौनमाहवनीयः छान्दो० ४.१३.१ अथाभिप्रायरेव स्थाली बृह० ६.४.१९

मन्त्रानुक्रमणिका ४९८

मन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरणमन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरण
अथामूर्तं प्राणश्च यश्चबृह० २.३.५अन्ते तु किंकिणी वंशना०बि० ३५
अथामूर्त वायुश्चान्तरिक्षम्बृह० २.३.३अन्तेवास्युत्तररूपम्तैत्ति० १.३.३
अथावृतेषु चोर्हिङ्कारःछान्दो० २.२.२अन्धं तमः प्रविशन्तिबृह० ४.४.१०
अथाव्यात्तम् वामैत्रा० ५.६अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्याम्ईश० ९
अथास्य दक्षिणं कर्णम०बृह० ६.४.२५अन्धन्तमः प्रविशन्ति ये सम्भूतिम्ईश० १२
अथास्य नाम करोतिबृह० ६.४.२६अन्धवत्पश्य रूपाणिअमृ० १५
अथास्य मातरमभिम.बृह० ६.४.२८अन्नकार्याणां कोशानांसर्व० ५
अथास्या ऊरू विहापयतिबृह० ६.४.२१अन्नं न निन्द्यात्तैत्ति० ३.७.१
अथेत्यभ्यमन्थत्स मुखाच्चबृह० १.४.६अन्नं न परिचक्षीततैत्ति० ३.८.१
अथेन्द्रमब्रुवन्केन० ३.११अन्नं ब्रह्मेतितैत्ति० ३.२.१
अथैकयोर्ध्व उदानःप्रश्न० ३.७अन्नं ब्रह्मेत्येक आहु.बृह० ५.१२.१
अथैतद्वामेऽक्षणिबृह० ४.२.३अन्नं बहु कुर्वीततैत्ति० ३.९.१
अथैतयोः पथोर्न कतरेणछान्दो० ५.१०.८अन्नमय प्राणमय०मुद्र० ४.५
अथैतस्य प्राणस्यापःबृह० १.५.१३अन्नमयः हि सोम्यछान्दो० ६.५.४
अथैतस्य मनसो द्यौःबृह० १.५.१२अन्नमयः हि सोम्य मनःछान्दो० ६.६.५
अथैनमग्नयेबृह० ६.२.१४अन्नमशितं त्रेधा विधीयतेछान्दो० ६.५.१
अथैनमभिमृशतिबृह० ६.३.४अन्नमिति होवाचछान्दो० १.११.९
अथैनमाचामतिबृह० ६.३.६अन्नं वाव बलाद् भूयस्त-छान्दो० ७.९.१
अथैनं मात्रे प्रदायबृह० ६.४.२७अन्नं वै प्रजापतिःप्रश्न० १.१४
अथैनमुद्गच्छत्यामबृह० ६.३.५अन्नाद्वै प्रजाःतैत्ति० २.२.१
अथैनामभिपद्यतेबृह० ६.४.२०अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैवकठ० १.२.१
अथैनं वसतयोपमन्त्रया.बृह० ६.२.३अन्यतरामेव वर्तनीछान्दो० ४.१६.३
अथैष श्लोको भवतिबृह० १.५.२३अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्माद्कठ० १.२.१४
अथो अयं वा आत्माबृह० १.४.१६अन्येदेवाहुःईश० १३
अथोताप्याहुःछान्दो० २.१.३अन्यदेवाहुर्विद्ययाईश० १०
अथोपाँशुरन्तर्यामिमैत्रा० २.८अन्यविद्यापरिज्ञानमवश्यंशु०२० ४४
अथोत्तरेणप्रश्न० १.१०अपां का गतिरित्यसौछान्दो० १.८.५
अद्यभ्यश्चैनं चन्द्रमसश्चबृह० १.५.२०अपाणिपादो जवनोश्वेता० ३.१९
अधिष्ठाने तथाना०बि० २८अपाने तृप्यति वाक्तृप्यतिछान्दो० ५.२१.२
अधीहि भगव इतिछान्दो० ७.१.१अपामपोग्निःमैत्रा० ४.४(ञ)
अध्यस्तस्य कुतोना०बि० २५अपाꣳ सोम्य पीयमानानाम्छान्दो० ६.६.३
अनन्दानाम ते लोकाबृह० ४.४.११अप्राणो ह्यमनाःसर्व० १७
अनात्मदृष्टेरविवेक-शु०२० ३९अम्भमेव सवितागाय० ३.८
अनाद्यनन्तम्श्वेता० ५.१३अभिमन्थति स हिङ्काराछान्दो० २.१२.१
अनिरुक्तस्त्रयोदशःछान्दो० १.१३.३अभेददर्शनं ज्ञानम्स्कन्द० ११
अनुपश्य यथाकठ० १.१.६अभ्यस्यमानो नादोऽयम्ना०बि० ३२
अनुवजन्नाजुहावशु०२० ५१अभ्रं भूत्वा मेघो भवतिछान्दो० ५.१०.६
अनेजदेकं मनसोईश० ४अभ्राणि संप्लवन्तेछान्दो० २.१५.१
अनेन विधिनाअमृ० २९अमात्राश्चतुर्थोऽव्यवहार्यःमाण्डू० १२
अन्तरङ्गं समुद्रस्यना०बि० ४६अमृतत्वं देवेभ्यःछान्दो० २.२२.२
अन्तरिक्षमेवार्वायुःछान्दो० १.६.२अयं चन्द्रः सर्वेषाम्बृह० २.५.७
अन्तरिक्षोदरः कोशोछान्दो० ३.१५.१अयं धर्मः सर्वेषां भूतानाम्बृह० २.५.११

४९३ मन्त्रानुक्रमणिका

मन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरणमन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरण
अयमग्निवैश्वानरोबृह० ५.९.१अस्तीत्येवोपलब्ध-कठ० २.३.१३
अयमग्निः सर्वेषां भूतानाम्बृह० २.५.३अस्य यदेकाः शाखाम्छान्दो० ६.११.२
अयमाकाशः सर्वेषाम्बृह० २.५.१०अस्य लोकस्य काछान्दो० १.९.१
अयमात्मा सर्वेषां भूतानाम्बृह० २.५.१४अस्य विस्रंसमानस्यकठ० २.२.४
अयमादित्यः सर्वेषाम्बृह० २.५.५अस्य सोम्य महतोछान्दो० ६.११.१
अयं वाव खल्वस्यमैत्रा० ४.३अहमन्नमहमन्नमन्न-तैत्ति०३.१०.६
अयं वाव लोकोछान्दो० १.१३.१अहरेव सवितागाय० ३.६
अयं वाव स ......पुरुषछान्दो० ३.१२.८अहर्वा अश्वं पुरस्तात्बृह० १.१.२
अयं वाव स ......हृदयछान्दो० ३.१२.९अह्निकेति होवाचबृह० ३.९.२५
अयं वायुः सर्वेषाम्बृह० २.५.४अहं वृक्षस्य रेरिवातैत्ति०१.१०.१
अयं वै लोकोऽग्निर्गौतमबृह० ६.२.११अहोरात्रो वै प्रजापतिःप्रश्न० १.१३
अयः स्तनयित्नुः सर्वेषाम्बृह० २.५.९आकाश एव यस्यायबृह०३.९.१३
अरण्योर्निहितोकठ० २.१.८आकाशो वाव तेजसोछान्दो० ७.१२.१
अरा इव रथनाभौ कलाप्रश्न० ६.६आकाशो वै नामछान्दो० ८.१४.१
अरा इव रथनाभौ प्राणेप्रश्न० २.६आगमस्याविरोधेनअमृ० १७
अरा इव स्थनाभौ संहतामुण्ड० २.२.६आगाता ह वै कामानांछान्दो०१.२.१४
अरिष्टं कोशम्छान्दो० ३.१५.३आग्नि वेश्यादाग्निवेश्योबृह०४.६.२
अविद्यायां बहुधामुण्ड० १.२.९आग्निवेश्यादाग्निवेश्यःबृह० २.६.२
अविद्यायामन्तरेमुण्ड० १.२.८आज्ञाभय....बन्धःनिरा० २५
अविद्यायामन्तरेकठ० १.२.५आत्मन एष प्राणोप्रश्न० ३.३
अव्यक्तात्तुकठ० २.३.८आत्मानं चेद्विजानीयाद०बृह०४.४.१२
अविः संनिहितम्मुण्ड० २.२.१आत्मानमन्तत उपसृत्यछान्दो० १.३.१२
अशक्यः सोऽन्यथामन्त्रि० ३आत्मानं रथिनंकठ० १.३.३
अशनापिपासे मे सोम्यछान्दो० ६.८.३आत्मानं सततंना० बि० २१
अशनायापिपासा.मुद्ग० ४.७आत्मा वा इदमेकऐत० १.१.१
अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययंकठ० १.३.१५आत्मेश्वर जीवःसर्व० २
अशरीर शरीरेषुकठ० १.२.२२आत्मैवेदमग्र आसीत्बृह० १.४.१
अशरीरो वायुरभ्रं विद्युत्छान्दो० ८.१२.२आत्मैवेदमग्र आसीदेकबृह० १.४.१७
अशीतिश्च शतम्अमृ० ३४आत्रेयी पुत्रादात्रेयीपुत्रोबृह० ६.५.२
अष्टपादं शुचिम्मन्त्रि० १आदित्यवस्य रेतसःछान्दो० ३.१७.७
असद्वा इदमग्रतैत्ति० २.७.१आदित्य इति होवाचछान्दो० १.११.७
असन्नेव स भवतितैत्ति० २.६.१आदित्य ऊकारोछान्दो० १.१३.२
असिपद महामन्त्रस्यशु०२० २७आदित्य एव सवितागाय० ३.४
असूर्या नाम तेईश० ३आदित्यमथ वैश्वदेवम्छान्दो० २.२४.१३
असौ वा आदित्योछान्दो० ३.१.१आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशःछान्दो० ३.१९.१
असौ वाव लोकोछान्दो० ५.४.१आदित्यो ह वै प्राणःप्रश्न० १.५
असौ वै लोकोऽग्निर्गौतमबृह० ६.२.९आदित्यो ह वै बाह्यःप्रश्न० ३.८
अस्तमित आदित्ये.... चन्द्रःबृह० ४.३.४आदिरिति द्वयक्षरम्छान्दो० २.१०.२
अस्तमित आदित्ये याज्ञ-बृह० ४.३.३आदिः स संयोग-श्वेता० ६.५
अस्तमित आदित्ये.... शान्ते-बृह० ४.३.६आदौ जलधिजीमूतभेरीना० बि० ३४
अस्तमित आदित्ये.... शान्तेबृह० ४.३.५आनन्दो ब्रह्मेतितैत्ति० ३.६.१
अस्ति खल्वन्योऽपरोमैत्रा०३.२आप एव ... हृदयमबृह० ३.९.१६

मन्त्रानुक्रमणिका [४९४]

मन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरणमन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरण
आप एवेदमग्र आसुस्ताबृह० ५.५.१ईश्वर उवाच एवमुक्त्वाशु०र० ४६
आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्तेछान्दो० ६.५.२ईश्वर उवाच– मयोपदिष्टेशुक० ६
आपयिता ह वै कामानाम्छान्दो० १.१.७उक्थं प्राणो वा उक्थम्बृह० ५.१३.१
आपो वा अर्कस्तद्यदपांबृह० १.२.२उत्क्षिप्य वायुमाकाशम्अमृत० १२
आपो वावान्नाद्भूयस्यःछान्दो० ७.१०.१उत्तिष्ठत जाग्रतकठ० १.३.१४
आप्रोतिहादित्यस्यछान्दो० २.१०.६उत्पत्तिमायतिं स्थानंप्रश्न० ३.१२
आ मा यन्तु ब्रह्मचारिणःतैत्ति० १.४.२उत्पन्ने तत्त्वविज्ञानेना० बिन्दु० २२
आरभ्य कर्माणिश्वेता० ६.४उदशराव आत्मानमवेक्ष्यछान्दो० ८.८.१
आराममस्य पश्यन्तिबृह० ४.३.१४उदाने तृप्यति त्वक्तृप्यतिछान्दो० ५.२३.२
आविः संनिहितंमुण्ड० २.२.१उदासीनस्ततोना० बिन्दु० ४०
आशा प्रतीक्षेकठ० १.१.८उद्गीतमैतत्परमम्श्वेता० १.७
आशा वाव स्मराद्भूयस्या०छान्दो० ७.१४.१उद्गीथ इति त्र्यक्षरम्छान्दो० २.१०.३
आसीनो दूरंकठ० १.२.२१उद्गृह्णाति तन्निधनंछान्दो० २.३.२
आसुरमिति.... आसुरम्निरा० ३४उद्दालको हाऽऽरुणिःछान्दो० ६.८.१
इति तु पञ्चम्यामाहुतावापःछान्दो० ५.९.१उद्यन्हिङ्कार उदितःछान्दो० २.१४.१
इदं निरालम्बोप.....इत्युपनिषत्निरा० ४०उपकोसलो ह वैछान्दो० ४.१०.१
इदं मानुषः सर्वेषाम्बृह० २.५.१३उपदिष्टं परम्ब्रह्मशु० र० १२
इदमिति ह प्रतिजज्ञेछान्दो० ४.१४.३उपदिष्टः शिवेनेतिशु० र० ४९
इदं वाव तज्ज्येष्ठायछान्दो० ३.११.५उपनिषदं भोकेन० ४.७
इदं वै तन्मधु... तद्वामबृह० २.५.१६उपमन्त्रयते स हिङ्कारोछान्दो० २.१३.१
इदं वै तन्मधु– दधीचे.बृह० २.५.१७उपास्य इति... गुरुरुपास्यःनिरा० ३०
इदं वै तन्मधु... द्रूपबृह० २.५.१९उशन् ह वैकठ० १.१.१
इदं वै तन्मधु.. पुरश्चक्रेबृह० २.५.१८उषा वा अश्वस्यमेध्यस्यबृह० १.१.१
इदं सत्यं सर्वेषामबृह० २.५.१२उष्णमेव सवितागाय० ३.७
इन्द्रस्त्वं प्राणप्रश्न० २.९ऊर्ध्वं प्राणमुन्न०कठ० २.२.३
इन्द्रियाणां पृथग्भाव०कठ० २.३.६ऊर्ध्वमूलोऽवाक् शाखकठ० २.३.१
इन्द्रियाणि हयानाहुःकठ० १.३.४ऋग्भिरेतं यजुर्भिःप्रश्न० ५.७
इन्द्रियेभ्यः परंकठ० २.३.७ऋग्वेदो गार्हपत्यम्प्रणव० ४
इन्द्रियेभ्यः पराःकठ० १.३.१०ऋचो अक्षरे परमेश्वेता० ४.८
इन्धो ह वै नामैषबृह० ४.२.२ऋचो यजूंषि प्रसवन्तिएका० ७
इमा आपः सर्वेषाम्बृह० २.५.२ऋचो यजूंषि सामा.बृह० ५.१४.२
इमा दिशः सर्वेषाम्बृह० २.५.६ऋतं च स्वाध्याय प्रवचनेतैत्ति० १.९.१
इमामेव गोतमभरद्वाजा.बृह० २.२.४ऋतं पिबन्तौकठ० १.३.१
इमाः सोम्य नद्यःछान्दो० ६.१०.१ऋतुषु पञ्चविधछान्दो०२.५.१
इयं पृथिवी सर्वेषाम्बृह० २.५.१एक धैवानुद्रष्टव्यमेतदप्र०बृह० ४.४.२०
इयमेवर्गाग्निःछान्दो० १.६.१एकमात्रस्तथाकाशोअमृ० ३२
इयं विद्युतत्सर्वेषां भूतानाम्बृह० २.५.८एकमेवाद्वितीयम्शुक०र० ३५
इष्टापूर्तं मन्यमानामुण्ड०१.२.१०एकविंशत्यादित्यम्छान्दो० १.१०.५
इह चेदवेदीदथकेन० २.५एकाक्षरं त्वक्षरेएका० १
इह चेदशकद्बोद्धुंकठ० २.३.४एकीभवति न पश्यती०बृह० ४.४.२
इहैव सन्तोऽथ विद्म.बृह० ४.४.१४एकैकं जालं बहुधाश्वेता० ५.३
ईशावास्यमिदम्ईश० १एको देवः सर्वभूतेषुश्वेता० ६.११

४९५ मन्त्रानुक्रमणिका

मन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरणमन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरण
एको देवो बहुधामुद्ग० ३.१एवमेषां लोकानामासाम्छान्दो० ४.१७.८
एको वशीकठ० २.२.१२एवं यथाश्मानमाखणमृत्वाछान्दो० १.२.८
एको वशी निष्क्रियाणाम्श्वेता० ६.१२एवं महावाक्याशु० २० ३०
एको ह ऽ सो भुवन.श्वेता० ६.१५एवः सोम्य ते षोडशानाम्छान्दो० ६.७.६
एको हि रुद्रोश्वेता० ३.२एष उ एव बृहस्पति.बृह० १.३.२०
एतच्छ्रुत्वाकठ० १.२.१३एष उ एव ब्रह्मणस्पति.बृह० १.३.२१
एतज्ज्ञेयम्श्वेता० १.१२एष उ एव भामनीरेष हिछान्दो० ४.१५.४
एतत्तुल्यंकठ० १.१.२४एष उ एव वामनीरेष हिछान्दो० ४.१५.३
एतदालम्बन ऽकठ० १.२.१७एष उ एव साम वाग्वैबृह० १.३.२२
एतद्ध वै तज्जनकोबृह० ५.१४.८एष उ वा उद्गीथःबृह० १.३.२३
एतद्धस्म वै तद्विद्वान्.बृह० ६.४.४एष तु वा अतिवदतिछान्दो० ७.१६.१
एतद्धस्म वै तद्विद्वानाहछान्दो० ३.१६.७एष तेऽग्निर्नचिकेतकठ० १.१.१९
एतद्धस्म वैतद्विद्वांसःछान्दो० ६.४.५एष देवो विश्वकर्माश्वेता० ४.१७
एतद्ध स्मैत.गाय० ३.१३एष प्रजापतिर्यङ्ग.बृह० ५.३.१
एतद्ध स्मैतद्गाय०१.१एष ब्रह्मैष इन्द्रऐत० ३.१.३
एतद्धयेवाक्षरंकठ० १.२.१६एष म आत्मान्तर्हृदयेछान्दो० ३.१४.३
एतद्योगेन परम पुरुषोमुद्ग० ४.९एष वै यजमानस्यछान्दो० २.२४.१५
एतद्वस्तुचतुष्टयंसर्व० १३एष सर्वेश्वर एषमाण्डू० ६
एतद्वै परमं तपोबृह० ५.११.१एष सर्वेषु भूतेषुकठ० १.३.१२
एतमु एवाहमभ्य... प्राणाछान्दो० १.५.४एष ह वा उदक्प्रवणोछान्दो० ४.१७.९
एतमु एवाहमभ्य...रश्मीछान्दो० १.५.२एष ह वै यज्ञो योऽयम्छान्दो० ४.१६.१
एतमु हैव चूलोबृह० ६.३.१०एष हि खल्वात्मेशानःमैत्रा० ५.८
एतमु हैव जानकिरायबृह० ६.३.११एष हि द्रष्टाप्रश्न० ४.९
एतमु हैव मधुकःबृह० ६.३.९एषां भूतानां पृथिवी रसःछान्दो० १.१.२
एतमु हैव वाजसनेयोबृह० ६.३.८एषां वै भूतानांबृह० ६.४.१
एतमु हैव सत्यकामोबृह० ६.३.१२एषामज्ञानजन्तूनांनिरा० २
एतम्मृग्वेदमम्यतपत् स्तस्याभि०छान्दो० ३.१.३एषोऽग्निस्तपत्येषप्रश्न० २.५
एतः संयद्वाम इत्याचक्षतछान्दो० ४.१५.२एषोऽणुरारत्मा चेतसामुण्ड० ३.१.९
एतस्माज्जायतेमुण्ड० २.१.३एषो ह देवः प्रदिशोश्वेता० २.१६
एतस्य वा अक्षरस्यबृह० ३.८.९एह्येहीति तमाहुतयमुण्ड० १.२.६
एतेन जीवात्मनोर्योगेनमुद्ग० २.६ओङ्काररथमारुह्यअमृ० २
एतेनैव च मन्त्रेणमुद्ग० १.४ओ३मदा३मोछान्दो० १.१२.५
एतेषां मे देहीतिछान्दो० १.१०.३ओमिति ब्रह्मतैत्तिरीय० १.८.१
एतेषु यश्चरतेमुण्ड० १.२.५ओमित्येकाक्षरम्प्रण० २
एवं बद्धस्तथा जीवःस्कन्द० ७ओमित्येकाक्षरम् ब्रह्मअमृ० २१
एवमेव खलु सोम्य.छान्दो० ६.६.२ओमित्येतदक्षरमिदंमाण्डू० १
एवमेव खलु सोम्येमाःछान्दो० ६.१०.२ओमित्येतदक्षरमुद्गीथम्छान्दो० १.१.१
'एवमेव प्रतिहर्तारमुवाचछान्दो० १.१०.११ओममित्येतदक्षर.....ह्युद्गायतिछान्दो० १.४.१
एवमेवैष मघवन्नितिछान्दो० ८.९.३औपमन्यव कं त्वमात्में.छान्दो० ५.१२.१
एवमेवैष मघवन्निति होवाचैतंछान्दो० ८.११.३कं ते कामपागायानी नील्येषछान्दो० १.७.९
एवमेवैष सम्प्रसादो.छान्दो० ८.१२.३कतम आत्मेति योऽयम्बृह० ४.३.७
एवमेवोद्गातारमुवाच.छान्दो० १.१०.१०कतम आदित्या इतिबृह० ३.९.५

यहाँ पृष्ठ का लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:

मन्त्रानुक्रमणिका [पृष्ठ ४९६]


मन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरणमन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरण
कतम इन्द्रः कतमःबृह० ३.९.६क्षरं प्रधानममृताक्षरम्श्वेता० १.१०
कतमा कतमर्कतमतूछान्दो० १.१.४क्षेत्राज्ञाधिष्ठितंमन्त्रि० १९
कतमे ते त्रयो देवाबृह० ३.९.८गताः कलाः पञ्चदशमुंड० ३.२.७
कतमे रुद्रा इतिबृह० ३.९.४गायत्री वा इदःसर्वम्छान्दो० ३.१२.१
कतमे वसव इत्यग्निश्चबृह० ३.९.३गुणान्वयो यः फलकर्मकर्ताश्वेता० ५.७
कतमे षडित्यग्निश्चबृह० ३.९.७गुरुर्प्येवंविच्छुचौमुद्ग० ४.१२
कथं बन्धः कथं मोक्षःसर्व० १गो अश्वमिह महिमेत्याकचक्षतेछान्दो० ७.२४.२
कर्तृत्वाद्व... बन्धःनिरा० २०गौरनाद्यन्तवती सामन्त्रि० ५
कर्मेति च.... कर्मनिरा० ११ग्राह्यमिति.... ग्राह्यम्निरा० ३७
कल्पन्ते हास्मा ऋतवछान्दो० २.५.२धनमुत्सृज्य वाना०ब्रि० ३७
कल्पन्ते हास्मैछान्दो० २.२.३घृतकौशिकाद् घृतकौशिकःबृह० २.६.३, ४.६.३
कस्मिन्नु त्वं चात्माबृह० ३.९.२६घृतात्परं मण्डमिवा.श्वेता० ४.१६
कांस्य घण्टानिनादःप्रण० १२घोषिणी प्रथमा मात्राना०बि० ९
काम एव यस्रायतनबृह० ३.९.११चक्षुरेव ब्रह्मणश्चतुर्थःछान्दो० ३.१८.५
काम क्रोध लोभमयमैत्रा० १.३चक्षुरेवात्माछान्दो० १.७.२
काम क्रोध लोभमोहमुद्ग० ४.४चक्षुर्वै ग्रहःबृह० ३.२.५
कामस्याप्तिंकठ० १.२.११चक्षुर्होच्चक्रामबृह० ६.१.९
कामान् यः कामयतेमुण्ड० ३.२.२चक्षुर्होच्चक्रामछान्दो० ५.१.९
कार्योपाधिरयम्शु०र० ४२चतुरौदुम्बरो भवत्यौदु.बृह० ६.३.१३
कालत्रयेऽपिना०बि० ८चतुर्णामपि वेदानाम्शु०र० १७
कालः प्राणश्चमन्त्रि० १२चतुर्भिः पश्यतेअमृ० ३०
कालः स्वभावोश्वेता० १.२चतुर्मुखेन्द्र देवेषुशु०र० ३२
काली कराली चमुण्ड० १.२.४चतुर्विंशति संख्यातंमन्त्रि० १५
काष्ठवज्जायते देहना०बि० ५३चन्द्रमा एव सवितागाय० ३.५
का साम्नो गतिरितिछान्दो० १.८.४चिज्जडानां तु योस्क० ४
किं देवतोऽस्यां दक्षिणायाम्बृह० ३.९.२१चित्तमेव हि संसारःमैत्रा० ४.४ (ग)
किं देवतोऽस्यां ध्रुवायाम्बृह० ३.९.२४चित्तं वाव सङ्कल्पाद्भूयोछान्दो० ७.५.१
किं देवतोऽस्यां प्रतीच्याम्बृह० ३.९.२२चित्तस्य हि प्रसादेनमैत्रा० ४.४ (घ)
किं देवतोऽस्यां प्राच्याम्बृह० ३.९.२०छन्दांसि यज्ञाःश्वेता० ४.९
किं ब्रह्म... ब्रह्मेतिनिरा० ३जनकःह वैदेहं यज्ञ.बृह० ४.३.१
किं देवतोऽस्यामुदीच्यांबृह० ३.९.२३जनको ह वैदेह आसां चबृह० ४.१.१
किल्विषं हि क्षयम्अमृ० ९जनको ह वैदेहः कूर्चा.बृह० ४.२.१
कुतस्तु खलुछान्दो० ६.२.२जनको ह वैदेहो बहु.बृह० ३.१.१
कुर्वन्नेवेह कर्माणिईश० २जनोलोकस्तुना०बि० ४
कुलगोत्र जातिवर्णाश्रम०मुद्ग० ४.८जागरित स्थानो बहिःमाण्डू० ३
कूटस्थोपहित भेदानांसर्व० ११जागरित स्थानो वैश्वा.माण्डू० ९
कृतकृत्यःशु०र० १०जाग्रन्निद्राविनिर्मुक्तःना०बि० ५५
केनेषितं पततिकेन० १.१जातिरिति... प्रकल्पितानिरा० १०
केवलमोक्ष... बन्धःनिरा० २७जातेऽग्निमुपसमाधायाङ्कबृह० ६.४.२४
कोऽयमात्मेतिऐत० ३.१.१जानश्रुतिर्ह पौत्रायणःछान्दो० ४.१.१
क्व तर्हि यजमानस्यछान्दो० २.२४.२जानाम्यहम्कठ० १.२.१०
क्षत्रं प्राणो वै क्षत्रम्बृह० ५.१३.४जिह्वा वै ग्रहःबृह० ३.२.४

४१७ मन्त्रानुक्रमणिका मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण जीव इति च ब्रह्म० निरा० ५ तत्रापरा ऋग्वेदो. मुण्ड० १.१.५ जीवः शिवः शिवो स्क० ६ तत्रोद्गातृनास्तावे. छान्दो० १.१०.८ जीवापेतं वाव किलेदम् छान्दो० ६.११.३ तत्सवितुर्वरेण्यमित्यसौ मैत्रा० ५.७ ज्ञाज्ञो द्वाव जावीशानीशावजा श्वेता० १.९ तत् स्त्रिया आत्मभूयं ऐत० २.१.२ ज्ञातृज्ञानज्ञेय सर्व० ९ तथामुष्मिँल्लोके छान्दो० १.९.४ ज्ञात्वा देवम् श्वेता० १.११ तथेति ह समुपविविशुः छान्दो० १.८.२ ज्ञानमिति ... ज्ञानम् निरा० १३ तदपानेनाजिघृक्षत् ऐत० १.३.१० ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय बृह० ६.३.२ तदभिमृशेदन् वा बृह० ६.४.५ तं चेदेतस्मिन्वयसि..आदित्या छान्दो० ३.१६.६ तदभ्यद्रवत्... अग्निंर्वा केन० ३.४ तं चेदेतस्मिन्वयसि... रुद्रा छान्दो० ३.१६.४ तदभ्यद्रवत्... वायुर्वा केन० ३.८ तं चेदेतस्मिन्वयसि... वसव छान्दो० ३.१६.२ तदाहुर्यदयमेक इवैव बृह० ३.९.९ तं चेद्ब्रूयुरास्मिँश्चेदिदम् छान्दो० ८.१.४ तदाहुर्यद्ब्रह्मविद्यया बृह० १.४.९ तं चेद्ब्रूयुर्यदिदमस्मिन् छान्दो० ८.१.२ तदुक्तमृषिणा ऐत० २.१.५ तं जायोवाच तप्तो छान्दो० ४.१०.२ तदुताप्याहुः सान्नैन्नमुपा. छान्दो० २.१.२ तं जायोवाच हन्त छान्दो० १.१०.७ तदु ह जानश्रुतिः छान्दो० ४.१.५ तं दुर्दर्शं कठ० १.२.१२ तदु ह जानश्रुतिः पौत्रायणः छान्दो० ४.२.१ तं मद्गुरुपनिपत्याभ्युवाद छान्दो० ४.८.२ तदुह शौनकः कापेयः छान्दो० ४.३.७ तं यज्ञमिति मुद्र० १.७ तदेजति तन्नैजति ईश० ५ तं यज्ञायथोपासते मुद्र० ३.३ तदेतच्चतुष्पादद्ब्रह्म छान्दो० ३.१८.२ तं षड्विंशक इत्येते मन्त्रि० १४ तदेतत्प्रेयः पुत्रात्प्रेयो बृह० १.४.८ तं ह स्मैतमेवम् गा० ८.१ तदेतत्सल्यं मन्त्रेषु मुण्ड० १.२.१ त इमे सत्याः कामा छान्दो० ८.३.१ तदेतत् सत्यमृषिरङ्गिराः मुण्ड० ३.२.११ त इह व्याघ्रो वा सिंह हो छान्दो० ६.९.३ तदेतत्सत्यं यथा मुण्ड० २.१.१ त एतदेव रूपमभि- छान्दो० ३.६.२,७.२, तदेतत्सृष्टं ऐत० १.३.३ ८.२,९.२,१०.२ तदेतदिति मन्यन्ते कठ० २.२.१४ तच्चक्षुषाजिघृक्षत् ऐत० १.३.५ तदेतदृचाऽभ्युक्तम् मुण्ड० ३.२.१० तच्छ्रोत्रेनाजिघृक्षत् ऐत० १.३.९ तदेतदृचाभ्युक्तं.....एष बृह० ४.४.२३ तच्छ्रुत्वा व्यासवचनं शु०२० ९ तदेतद्ब्रह्म क्षत्रं विट् बृह० १.४.१५ तच्छ्रुत्वा सकलाकारं शु०२० ५२ तदेतन्मिथुनमोमित् छान्दो० १.१.६ तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत् ऐत० १.३.६ तदेतन्मूर्त्तं यदन्यद्वा. बृह० २.३.२ ततः परतरं शुद्धं ना०बि० १७ तदेते श्लोका... अणुः पन्था बृह० ४.४.८ ततः परं ब्रह्मापरम् श्वेता० ३.७ तदेते... स्वप्नेन बृह० ४.३.११ ततो ब्रह्मोपदिष्टम् शु०२० ४७ तदेवाग्निस्तदादित्य. श्वेता० ४.२ ततो यदुत्तरतरम् श्वेता० ३.१० तदेष... तदेव सक्तः सह बृह० ४.४.६ ततो विलीनपाशोऽसौ ना०बि० २० तदेष... यदा सर्वे बृह० ४.४.७ तत्कर्म कृत्वा श्वेता० ६.३ तदेष श्लोकः यदा छान्दो० ५.२.९ तत्तु जन्मान्तर ना०बि० २४ तदेष श्लोकः । यानि छान्दो० २.२१.३ तत्पदमहामन्त्रस्य शु०२० २३ तदेष श्लोकः शतम् छान्दो० ८.६.६ तत्त्वचाजिघृक्षत् ऐत० १.३.७ तदेष श्लोको न पश्यो छान्दो० ७.२६.२ तत्प्राणेनाजिघृक्षत् ऐत० १.३.४ तदेष श्लोको भवति बृह० २.२.३ तत्र देवास्त्रयः प्रण० ३ तदैक्षत बहु स्याम् छान्दो० ६.२.३ तत्र यत्प्रकाशाते सर्व० ८ तद्व तद्वनं नाम केन० ४.६

मन्त्रानुक्रमणिका ४९८ मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण

तद्धापि ब्रह्मदस्तश्चैकिता. | बृह० १.३.२४ | तद्यक्षरत्तदादित्यम् | छान्दो० ३.१.४ तद्धि मौद्गल्य | गाय० १.२ | तद्यक्षरत्तदादित्य.. कृष्णः | छान्दो० ३.३.३ तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् | बृह० १.४.७ | तद्यक्षरत्तदादित्यम्.. परं | छान्दो० ३.४.३ तद्धैतत् सत्यकामो | छान्दो० ५.२.३ | तद्यक्षरत्तदादित्य.. मध्ये | छान्दो० ३.५.३ तद्धैतद्धोर आङ्गिरसः | छान्दो० ३.१७.६ | तद्यक्षरत्तदादित्य.. शुक्लः | छान्दो० ३.२.३ तद्धैतद्ब्रह्मा... आचार्य | छान्दो० ८.१५.१ | तन्नम इत्युपासीत | तैत्ति० ३.१०.४ तद्धैतद्ब्रह्मा... ज्येष्ठाय | छान्दो० ३.११.४ | तन्मनसाजिघृक्षत् | ऐत० १.३.८ तद्धैषां विजज्ञौ | केन० ३.२ | तप इति च... तपः | निरा० ३५ तद्धोभये देवासुरा | छान्दो० ८.७.२ | तपः प्रभावाद्देवप्रसादाच्च | श्वेता० ६.२१ तद्ब्रह्म तापत्रयातीतम् | मुद्ग० ४.१ | तपः श्रद्धे ये | मुण्ड० १.२.११ तद्य इत्थं विदुः ये चेमे. | छान्दो० ५.१०.१ | तपसा चीयते ब्रह्म | मुण्ड० १.१.८ तद्य इह रमणीयचरणा | छान्दो० ५.१०.७ | तम एव यस्यायतन | बृह० ३.९.१४ तद्य एवैतं ब्रह्मलोकम् | छान्दो० ८.४.३ | तमग्निरभ्युवाद सत्यकाम | छान्दो० ४.६.२ तद्य एवैतावरं च | छान्दो० ८.५.४ | तमब्रवीत्प्रीयमाणो | कठ० १.१.१६ तद्यत्तत्सत्यमसौ | बृह० ५.५.२ | तमभ्यतपत्तस्य | ऐत० १.१.४ तद्यत्प्रथमममृतम् | छान्दो० ३.६.१ | तमशना पिपासे | ऐत० १.२.५ तद्यत्रैतत्सुप्तः समस्तः | छान्दो० ८.११.१ | तमाजुहाव तमभ्युवाचा | गाय० १.४ तद्यत्रैतत्सुप्तः | छान्दो० ८.६.३ | तमीश्वराणां परमम् | श्वेता० ६.७ तद्यथा तृणजलायुका | बृह० ४.४.३ | तमुपसङ्गृह्य | गाय० २.८ तद्यथाऽनः सुसमाहित | बृह० ४.३.३५ | तमु ह परः प्रत्युवाच | छान्दो० ४.१.३ तद्यथा पेशस्कारी पेशसो | बृह० ४.४.४ | तमु ह परः प्रत्युवाचाह | छान्दो० ४.२.३ तद्यथा महापंथ आतत | छान्दो० ८.६.२ | तमेकनेमिं त्रिवृतं | श्वेता० १.४ तद्यथा महामत्स्य उभे | बृह० ४.३.१८ | तमेतमग्निरित्यध्वर्यव | मुद्ग० ३.२ तद्यथा राजानं प्रयि० | बृह० ४.३.३८ | तमेताः सप्ताक्षितय | बृह० २.२.२ तद्यथा राजानमायन्त० | बृह० ४.३.३७ | तमेव धीरो विज्ञाय | बृह० ४.४.२१ तद्यथा लवणेन | छान्दो० ४.१७.७ | तमो वा इदमेकमास | मैत्रा० ४.५ तद्यथास्मिन्नाकाशे | बृह० ४.३.१९ | तयोरन्यतरां मनसा | छान्दो० ४.१६.२ तद्यथेषीकातूलमग्नौ | छान्दो० ५.२४.३ | तस्मा आदित्याश्च | छान्दो० २.२४.१६ तद्यथेह कर्मजितो लोकः | छान्दो० ८.१.६ | तस्मा उ ह ददुस्ते | छान्दो० ४.३.८ तद्यद्भक्तं प्रथमम् | छान्दो० ५.१९.१ | तस्मा एतत् प्रोवाच | गा० २.७ तद्यद्वृक्नो रिष्येद् भूः | छान्दो० ४.१७.४ | तस्माच्च देवा | मुण्ड० २.१.७ तद्यद्रजतःसेयं पृथिवी | छान्दो० ३.१९.२ | तस्मादग्निः समिधो | मुण्ड० २.१.५ तद्युक्तस्तन्मयो | ना० बि० १९ | तस्मादप्यद्येहाददान. | छान्दो० ८.८.५ तद्ये ह वै | प्रश्न० १.१५ | तस्मादाहुः सोष्य. | छान्दो० ३.१७.५ तद्वत्सत्यमविज्ञाय | ना०बि० २७ | तस्मादिति च मन्त्रेण | मुद्ग० १.८ तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दा | बृह० ४.३.२१ | तस्मादिदन्द्रो | ऐत० १.३.१४ तद्वा एतदक्षरं गार्ग्यदृष्टं | बृह० ३.८.११ | तस्मादु हैवं विद्द्यद्यपि | छान्दो० ५.२४.४ तद्वा एतदनुज्ञाक्षरं | छान्दो० १.१.८ | तस्मादृचः साम | मुण्ड० २.१.६ तद्विप्रासो विपन्धवो | स्क० १५ | तस्मादेतत्पुरुषम्. | मुद्ग० ४.११ तद्विष्णोः परमं पदम् | स्क० १४ | तस्माद्वा इन्द्रो | केन० ४.३ तद्देगुह्योपनिषत्सु | श्वेता० ५.६ | तस्माद्वा एतं सेतुम् | छान्दो० ८.४.२ तद्वै तदेतदेव तदास | बृह० ५.४.१ | तस्माद्वा एते | केन० ४.२

४९९ मन्त्रानुक्रमणिका मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण तस्माद्विराडित्यनया मुद्ग० १.५ तस्यै तपोदमः केन० ४.८ तस्मिञ्छुक्लमृतनीलमाहुः बृह० ४.४.९ तस्यै वाचः पृथिवी बृह० १.५.११ तस्मिन्त्रिमानि सर्वाणि छान्दो० २.९.२ तस्यैष आदेशो केन० ४.४ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ... अन्नं छान्दो० ५.७.२ तं ह कुमार कठ० १.१.२ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ... रेतो छान्दो० ५.८.२ तं ह चिरं वसेत्याज्ञा- छान्दो० ५.३.७ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ.. वर्षम् छान्दो० ५.६.२ तं ह प्रवाहणो छान्दो० १.८.८ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ... श्रद्धां छान्दो० ५.४.२ तं ह शिलकः छान्दो० १.८.६ तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ... सोम छान्दो० ५.५.२ तं हंस उपनिपत्याभ्युवाद छान्दो० ४.७.२ तस्मिन्द्यावत्संपातम् छान्दो० ५.१०.५ तं हाङ्गिरा उद्गीथम् छान्दो० १.२.१० तस्मिंस्त्वयि किं केन० ३.९ तं हाभ्युवाद रैकैद छान्दो० ४.२.४ तस्मै तृणं केन० ३.६ तं हैतमतिधन्वा छान्दो० १.९.३ तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति केन० ३.१० तं हैतमुद्दालक बृह० ६.३.७ तस्मै श्वा श्वेतः छान्दो० १.१२.२ तं होवाच किंगोत्रः छान्दो० ४.४.४ तस्मै स विद्वान् मुण्ड० १.२.१३ तं होवाच नैतदब्राह्मणो छान्दो० ४.४.५ तस्मै स होवाच इहैवान्तः प्रश्न० ६.२ तं होवाच...महतो ऽभ्याहित- छान्दो० ६.७.३ तस्मै स होवाच एतद्वै प्रश्न० ५.२ तं होवाच यथा सोम्य छान्दो० ६.७.५ तस्मै स होवाच द्वेविद्ये मुण्ड० १.१.४ तं होवाच यं वै सोम्यै- छान्दो० ६.१२.२ तस्मै स होवाच प्रजाकामो प्रश्न० १.४ तां योगमिति कठ० २.३.११ तस्मै स होवाच यथा प्रश्न० ४.२ तां भवान् प्रब्रवीत्विति गा० १.६ तस्मै स होवाचाकाशो प्रश्न० २.२ ताऽहैत्तामेके बृह० ५.१४.५ तस्मै स होवाचाति प्रश्न० ३.२ ता आप ऐक्षन्त छान्दो० ६.२.४ तस्य क्व मूलं ... खलु छान्दो० ६.८.४ ता एता देवताः ऐत० १.२.१ तस्य क्व मूल.... सोम्य छान्दो० ६.८.६ तानि वा एतानि यजूंषि छान्दो० ३.२.२ तस्य प्रथमया विष्णो- मुद्ग० १.२ तानि वा एतानि सामान्येत छान्दो० ३.३.२ तस्य प्राची दिक्प्राच्यः बृह० ४.२.४ तानि ह वा एतानि छान्दो० ७.४.२ तस्य प्राची दिग्जुहूर्नाम छान्दो० ३.१५.२ तानि ह वा एतानि चित्तं छान्दो० ७.५.२ तस्य यथा कप्यासम् छान्दो० १.६.७ तानि ह वा एतानि त्रीणि छान्दो० ८.३.५ तस्य यथाभिनहनम् छान्दो० ६.१४.२ तानु तत्र मृत्युरथा छान्दो० १.४.३ तस्य ये प्राञ्चो रश्मयस्ता छान्दो० ३.१.२ तान्यभ्यतपत्तेभ्यः छान्दो० २.२३.३ तस्यर्क् च साम छान्दो० १.६.८ तान्वरिष्ठः प्राण प्रश्न० २.३ तस्य वा एतस्य पुरुषस्य बृह० ४.३.९ तान्ह स ऋषिरुवाच प्रश्न० १.२ तस्य .... सुवर्णं वेद बृह० १.३.२६ तान् हैतैः श्लोकैः बृह० ३.९.२८ तस्य सौम्य यो गाय० १.३ तान्होवाच प्रातर्वः छान्दो० ५.११.७ तस्य .... स्वं वेद बृह० १.३.२५ तान् होवाच ब्राह्मणा बृह० ३.१.२ तस्य ह वा एतस्य छान्दो० ३.१३.१ तान्होवाचाश्वपतिर्वै छान्दो० ५.११.४ तस्य ह वा एतस्यात्मनो छान्दो० ५.१८.२ तान्होवाचैहैव छान्दो० १.१२.३ तस्य ह वा एतस्यैवम् छान्दो० ७.२६.१ तान्होवाचैतावत् प्रश्न० ६.७ तस्य हैतस्य पुरुषस्य बृह० २.३.६ तान्होवाचैते वै खलु छान्दो० ५.१८.१ तस्य हैतस्य साम्नो यः बृह० १.३.२७ तापत्रयं त्वाध्यात्मिक. मुद्ग० ४.२ तस्या उपस्थानं गायत्र्य बृह० ५.१४.७ ताभ्यः पुरुषमानयत्ता ऐत० १.२.३ तस्या वेदिरुपस्थो बृह० ६.४.३ ताभ्यो गामानयत्ता ऐतरेय० १.२.२ तस्या ह मुखमुपोद्गृह्णन् छान्दो० ४.२.५ तावदेव निरोद्धव्यं मैत्रा० ४.४ (ज)

मन्त्रानुक्रमणिका ५००

मन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरणमन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरण
तालमात्रविनिष्कम्पोअमृ० २४ते होचुर्भगवन्यद्येवम्मैत्रा० ३.१
तावद्रथेन गन्तव्यम्अमृ० ३ते होचुर्येन हैवाथैनछान्दो० ५.११.६
ता वा अस्यैता हितोबृह० ४.३.२०तौ वा एतौ द्वौछान्दो० ४.३.४
तावानस्य महिमाछान्दो० ३.१२.६तौहद्वात्रिंशतं वर्षाणिछान्दो० ८.७.३
तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकाम्..छान्दो० ६.३.३तौ ह प्रजापतिरुवाचछान्दो० ८.७.४
तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां नुछान्दो० ६.३.४तौ ह प्रजापतिरुवाच साध्वलङ्कृतौछान्दो० ८.८.२
तिर्यगूर्ध्वमधोदृष्टिंअमृ० २३तौ हान्वीक्ष्य प्रजापतिःछान्दो० ८.८.४
तिलेषु तैलम्श्वेता० १.१५तौ होचतुर्यथैवेद०छान्दो० ८.८.३
तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यःप्रश्न० ५.६त्रयं वा इदं नाम रूपम्बृह० १.६.१
तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहेकठ० १.१.९त्रयः प्राजापत्याःबृह० ५.२.१
तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेदकेन० ३.३त्रयी विद्या हिङ्कारस्त्रयःछान्दो० २.२१.१
तेजसः सोम्याश्यमानस्यछान्दो० ६.६.४त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञःछान्दो० २.२३.१
तेजो वावादित्ये भूयःछान्दो० ७.११.१त्रयो लोका एत एवबृह० १.५.४
तेजोऽशितं त्रेधा विधीयतेछान्दो० ६.५.३त्रयो वेदा एत एवबृह० १.५.५
तेजो ह वाव उदानःप्रश्न० ३.९त्रयो होद्गीथेछान्दो० १.८.१
ते तमर्चयन्तस्त्वंप्रश्न० ६.८त्रिणाचिकेतकठ० १.१.१७
ते देवा अब्रुवन्नेतावद्वाबृह० १.३.१८त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विकठ० १.१.१८
ते ध्यानयोगानुगताश्वेता० १.३त्रिरुन्नतं स्थाप्यश्वेता० २.८
तेन तꣳह बकोछान्दो० १.२.१३त्रिंशत्सार्धाङ्गुलःअमृ० ३३
तेन तꣳ ह बृहस्पतिछान्दो० १.२.११त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेतिबृह० १.५.३
तेन तꣳहायास्यछान्दो० १.२.१२त्वावै ग्रहःबृह० ३.२.९
तेन हवा एवं विदुषागाय० ७.१त्वङ्मांसशोणिता.मुद्ग० ४.३
तेनेयं त्रयी विद्याछान्दो० १.१.९त्वं पद महामन्त्रस्यशु०२० २५
तेनोभौ कुरुतो यश्चैतछान्दो० १.१.१०त्वं पदार्थादौपाधि०सर्व० १४
तेभ्यो ह प्रातेभ्यःछान्दो० ५.११.५त्वं भूर्भुवः स्वस्त्वम्एका० १३
ते य एवमेतद्विदुर्यंबृह० ६.२.१५त्वमिति तदितिशु०२० ४१
ते यथा तन्न विवेकम्छान्दो० ६.९.२त्वं मनुष्यवंमैत्रा० ४.४ (ङ)
ते वा एते गुह्याछान्दो० ३.५.२त्वं वज्रभृद्भूत.एका० ५
ते वा एतेऽथर्वाङ्गिरसछान्दो० ३.४.२त्वं स्त्री त्वं पुमानसिश्वेता० ४.३
ते वा एते पञ्चछान्दो० ३.१३.६त्वं स्त्री पुमांस्त्वंएका० ११
ते वा एते रसानाꣳरसाछान्दो० ३.५.४दध्नः सोम्य मध्यमानस्यछान्दो० ६.६.१
तेषां खल्वेषां भूतानाम्छान्दो० ६.३.१दिवश्चैनमादित्याच्चबृह० १.५.१९
तेषामसौ विरजोप्रश्न० १.१६दिव्यो ह्यमूर्तःमुण्ड० २.१.२
ते ह खल्वथोर्ध्वरेतसोमैत्रा० ४.१दुःखमिति......स्वर्गःनिरा० १६
ते ह नासिक्यंछान्दो० १.२.२दुग्धेऽस्मै.....एतदेवम्छान्दो० २.८.३
ते ह प्राणाः प्रजापतिम्छान्दो० ५.१.७दुग्धेऽस्मै.... एतामेवछान्दो० १.१३.४
ते ह यथैवेदंछान्दो० १.१२.४दूरमेते विपरीतेकठ० १.२.४
ते ह वाचमूचुस्त्वं नबृह० १.३.२दृप्त बालाकिर्हानूचानोबृह० २.१.१
ते ह सम्पादयाञ्चक्रुःछान्दो० ५.११.२दृश्यमानस्य सर्वस्यशु०२० ३८
ते हेमे प्राणा अहꣳश्रेयसेबृह० ६.१.७दृष्टिः स्थिरा यस्यना०बि० ५६
ते होचुः क्नु सोऽभूद्योबृह० १.३.८देवपितृकार्याभ्यांतैत्ति० १.११.२
ते होचुरुपकोसलेषाछान्दो० ४.१४.१देवमनुष्य.....बन्धःनिरा० २२

५०१ मन्त्रानुक्रमणिका मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण देवनामसि प्रश्नो० २.८ न नरेणावरेण कठ० १.२.८ देवर्षयो ब्रह्माणं शु०र० २ न निजं निजवत् स्क० २ देवाः पितरो मनुष्या बृह० १.५.६ न प्राणेन कठ० २.२.५ देवा वै मृत्योर्बिभ्य्... छान्दो० १.४.२ न भिद्यते कर्मचारैः ना० बि० ६ देवासुरा ह वै छान्दो० १.२.१ नमः शिवाय गुरवे निरा० १ देवैरत्रापि...किल कठ० १.१.२२ नमः शान्तात्मने मैत्रा० ४.४ (ण) देवैरत्रापि... पुरा कठ० १.१.२१ न मान नावमानं ना०बि० ५४ देहादीनामसत्त्वात्तु ना० बि० २३ नरक इति .......एव नरकः निरा० १७ देहो देवालयः स्क० १० नवद्वारे पुरे देही श्वेता० ३.१८ द्यौरवगादित्यः छान्दो० १.६.३ न वधेनास्य... मध. छान्दो० ८.१०.४ द्यौरेवोदन्तरिक्षं छान्दो० १.३.७ न वधेनास्य हन्यते छान्दो० ८.१०.२ द्वया ह प्राजापत्या बृह० १.३.१ नवमी महती ना०बि० ११ द्वा सुपर्णा सयुजा श्वेता० ४.६ नवम्यां तु महर्लोकम् ना०बि० १६ द्वा सुपर्णा सयुजा मुण्ड० ३.१.१ न वित्तेन तर्पणीयो कठ० १.१.२७ द्वितीयायां समुत्क्रान्तो ना०बि० १३ न वै तत्र न निम्लोच छान्दो० ३.११.२ द्विधा वा एष आत्मानम् मैत्रा० ५.१ न वै नूनं भगवन्तस्त छान्दो० ६.१.७ द्विसप्ततिसहस्त्राणि प्रण० ११ न वै वाचो न चक्षू छान्दो० ५.१.१५ द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे श्वेता० ५.१ न संदृशे कठ० २.३.९ द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे मैत्रा० ५.३ न संदृशे तिष्ठति श्वेता० ४.२० द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे बृह० २.३.१ न सांपरायः प्रतिभाति कठ० १.२.६ द्वौ खण्डावुच्येते योऽयमुक्तः मुद्ग० २.२ न स्विदेतेऽप्युच्छिष्टा छान्दो० १.१०.४ धनुर्गृहीत्वौपनिषदं मुण्ड० २.२.३ न हवा अस्मा छान्दो० ३.११.३ धाता विधाता पवनः एका० ६ न हाप्सु प्रैत्यप्सुमान् छान्दो० २.४.२ धियो योनः गाय० ६.१ नाचिकेतमुपाख्यानं कठ० १.३.१६ ध्यानक्रियाभ्याम् मन्त्रि० ७ नान्तः प्रज्ञं न. माण्डू० ७ ध्यानं वाव चित्ताद्भूयो छान्दो० ७.६.१ नान्यस्मै कस्मैचन छान्दो० ३.११.६ ध्यानं-जीवत्वं सर्वभूतानां शु०र० २६ नाम वा ऋग्वेदो छान्दो० ७.१.४ ध्यानं- जीवो ब्रह्मैति शु०र० २८ नायमात्मा प्रवचनेन मुण्ड० ३.२.३ ध्यानं- ज्ञानं ज्ञेयं शु०र० २४ नायमात्मा प्रवचनेन कठ० १.२.२३ ध्यानं- नित्यानन्द शु०र० २१ नायमात्मा बलहीनेन मुण्ड० ३.२.४ ध्यायतेध्यासिता मन्त्रि० ४ नाविरतो दुश्चरितान् कठ० १.२.२४ न कंचन वसतौ तैत्ति० ३.१०.१ नासिकापुटमङ्गुल्या अमृ० २० नक्षत्राण्येवर्कूचन्द्रमाः छान्दो० १.६.४ नाहं कर्ता नैव भोक्ता सर्व० १८ न चक्षुषा गृह्यते मुण्ड० ३.१.८ नाहं देहो जन्ममृत्यू सर्व० २१ न जायते म्रियते कठ० १.२.१८ नाहं भवाम्यहं सर्व० १६ न तत्र चक्षुर्गच्छति केन० १.३ नाहं मन्ये सुवेदेति केन० २.२ न तत्र रथा न रथयोगा बृह० ४.३.१० नित्योऽनित्यानां कठ० २.२.१३ न तत्र सूर्यो कठ० २.२.१५ नित्यो नित्यानाम् श्वेता० ६.१३ न तत्र सूर्यो भाति मुण्ड० २.२.१० निधनमिति त्र्यक्षरम् छान्दो० २.१०.४ न तत्र सूर्यो भाति श्वेता० ६.१४ नियामनसमर्थोऽयम् ना०बि ४५ न तस्य कश्चित्पतिरस्ति श्वेता० ६.९ निरञ्जने विलीयेते ना०बि० ५० न तस्य कार्यं करणम् श्वेता० ६.८ निर्णिज्य क१ सं चमसं छान्दो० ५.२.८