भारतकोश
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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

सर्ग ५ ]अरण्यकाण्ड१२३


अत्र किञ्चिन्न वक्तव्यं शापितोऽसि ममोपरि।<br>तथेति सीतामादाय लक्ष्मणो गह्वरं ययौ ॥३१॥तुम्हें मेरी सौगन्ध है, इस विषयमें तुम और कुछ न कहना।” तब लक्ष्मणजी 'जो आज्ञा' कह सीताजीको लेकर एक गिरिगुहामें चले गये ॥ ३१ ॥
रामः परिकरं बद्ध्वा धनुरादाय निष्ठुरम् ।<br>तूणीरावक्षयशरौ बद्ध्वायत्तोऽभवत्प्रभुः ॥३२॥तब श्रीरामचन्द्रजीने अपनी कमर कसी और कठोर धनुष तथा दो अक्षय बाणवाले तरकश बाँधकर युद्धके लिये तैयार हो गये ॥ ३२ ॥
तत आगत्य रक्षांसि रामस्योपरि चिक्षिपुः ।<br>आयुधानि विचित्राणि पाषाणान्पादपानपि ॥३३॥तदनन्तर राक्षसगण वहाँ आकर रामके ऊपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र, पत्थर और वृक्षादिकी वर्षा करने लगे ॥ ३३ ॥
तानि चिच्छेद रामोऽपि लीलया तिलशः क्षणात् ।<br>ततो बाणसहस्रेण हत्वा तान् सर्वराक्षसान् ॥३४॥<br>खरं त्रिशिरसं चैव दूषणं चैव राक्षसम् ।<br>जघान प्रहरार्धेन सर्वानैव रघूत्तमः ॥३५॥श्रीरामचन्द्रजीने एक क्षणमात्रमें लीलासे ही उन अस्त्र-शस्त्रादिको तिल-तिल करके काट डाला । फिर सहस्रों बाणोंसे उन सम्पूर्ण राक्षसोंको मारकर खर, दूषण और त्रिशिराको भी मार डाला । इस प्रकार रघुवंशियोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने आधे पहरमें ही उन समस्त राक्षसोंका संहार कर दिया ॥ ३४-३५॥
लक्ष्मणोऽपि गुहामध्यात्सीतामादाय राघवे ।<br>समर्प्य राक्षसान्दृष्ट्वा हतान्विस्मयमाययौ ॥३६॥तब श्रीलक्ष्मणजीने गुहामेंसे सीताजीको लाकर श्रीरघुनाथजीको सौंप दिया । उस समय सम्पूर्ण राक्षसोंको मरे हुए देख वे बड़े विस्मित हुए ॥ ३६ ॥
सीता रामं समालिङ्ग्य प्रसन्नमुखपङ्कजा ।<br>शस्त्रव्रणानि चाङ्गेषु ममार्ज जनकात्मजा ॥३७॥जनकनन्दिनी श्रीसीताजीने प्रसन्नमुखसे श्रीरामचन्द्रजीका आलिंगन किया और उनके शरीरमें हुए घावोंपर हाथ फेरने लगीं ॥ ३७ ॥
साऽपि दुद्राव दृष्ट्वा तान्हतान् राक्षसपुङ्गवान् ।<br>लङ्कां गत्वा सभामध्ये क्रोशन्ती पादसन्निधौ ॥३८॥<br>रावणस्य पपातोर्व्यां भगिनी तस्य रक्षसः ।<br>दृष्ट्वा तां रावणः प्राह भगिनीं भयविह्वलाम् ॥३९॥उन सम्पूर्ण श्रेष्ठ राक्षसोंको मरे देख राक्षसराज रावणकी बहिन शूर्पणखा दौड़ती हुई लंकामें पहुँची और राजसभामें पहुँचकर रोती हुई रावणके पैरोंके समीप पृथ्वीपर गिर पड़ी। अपनी बहिनको इस प्रकार भयभीत देखकर रावण बोला-॥३८-३९॥ “अरी
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वत्से त्वं विरूपकरणं तव ।<br>कृतं शक्रेण वा भद्रे यमेन वरुणेन वा ॥४०॥<br>कुबेरेणाथवा ब्रूहि भस्मीकुर्यां क्षणेन तम् ।वत्से ! उठ, खड़ी हो । बता तो सही तुझे किसने विरूपा किया है ? हे भद्रे ! यह इन्द्रका काम है, अथवा यम, वरुण और कुबेरमेंसे किसीने किया है ? बता, एक क्षणमें ही मैं उसे भस्म कर डालूँगा।”
राक्षसी तमुवाचेदं त्वं प्रमत्तो विमूढधीः ॥४१॥<br>पानासक्तः स्त्रीविजितः षण्ढः सर्वत्र लक्ष्यसे ।<br>चारचक्षुर्विहीनस्त्वं कथं राजा भविष्यसि ॥४२॥तब राक्षसी शूर्पणखाने उससे कहा-"तुम बड़े ही उन्मत्त और मूढबुद्धि हो ॥ ४०-४१ ॥ तुम मद्यपानमें आसक्त, स्त्रीके वशीभूत और सब प्रकार नपुंसक-जैसे दिखायी पड़ते हो । तुम्हारे चर (खुफिया पुलिस) रूप नेत्र नहीं है; फिर तुम राजा
१२४अध्यात्मरामायण[सर्ग ५

खरश्च निहतः सङ्ख्ये दूषणस्त्रिशिरास्तथा ।<br>चतुर्दश सहस्राणि राक्षसानां महात्मनाम् ॥४३॥<br>निहतानि क्षणेनैव रामेणासुरशत्रुणा ।<br>जनस्थानमशेषेण मुनीनां निर्भयं कृतम् ।<br>न जानासि विमूढस्त्वमत एव मयोच्यते ॥४४॥ | कैसे रह सकोगे ? ॥४२॥ युद्धमें खर मारा गया तथा दूषण और त्रिशिरा आदि चौदह सहस्र मुख्य-मुख्य राक्षसोंको असुरशत्रु रामने एक क्षणमें ही मार डाला और सारे जनस्थानको मुनीश्वरोंके लिये सर्वथा निर्भय कर दिया । इतना उत्पात हो जानेपर भी तुम्हें अभीतक कुछ पता ही नहीं है इसीलिये मैं कहती हूँ कि 'तुम मूढ़ हो' ॥४३-४४॥ रावण उवाच | **रावण बोला—**अरी तू बता तो, वह राम कौन है ? उसने किसलिये और किस प्रकार इन राक्षसोंको मारा ? तू सब बात विस्तारपूर्वक कह, मैं उसका मूलोच्छेद कर डालूँगा ॥४५॥ को वा रामः किमर्थं वा कथं तेनासुरा हताः ।<br>सम्यक्कथय मे तेषां मूलघातं करोम्यहम् ॥४५॥ | शूर्पणखोवाच | **शूर्पणखा बोली—**एक दिन जनस्थानसे मैं गौतमीके किनारे जा रही थी, वहाँ पूर्वकालमें मुनिजनोंसे सेवित एक पञ्चवटी नामक आश्रम है ॥४६॥ उस आश्रममें मैंने जटा-वल्कलादिसे सुशोभित धनुर्बाणधारी कमलनयन शोभाधाम रामको देखा ॥४७॥ उसका छोटा भाई लक्ष्मण भी उसीके समान रूपवान् है तथा उसकी विशाललोचना भार्या भी रूपमें साक्षात् दूसरी लक्ष्मी-जैसी ही है ॥४८॥ हे राजन् ! देव, गन्धर्व, नाग और मनुष्य आदिमेंसे किसीकी भी स्त्री ऐसी रूपवती न देखी है और न सुनी है । वह शुभलक्षणा अपनी कान्तिसे सम्पूर्ण वनको प्रकाशित कर रही थी ॥४९॥ हे अनघ ! उसे तुम्हारी पत्नी बनानेके लिये मैंने लानेका प्रयत्न किया था, इसीसे रामके भाई लक्ष्मणने मेरी नाक काट डाली ॥५०॥ फिर रामकी प्रेरणासे महाबली लक्ष्मणने मेरे कान भी काट लिये । तब मैं अत्यन्त दुःखसे रोती हुई खरके पास गयी ॥५१॥ उसने भी अपने राक्षस-सेनापतियोंके साथ तुरन्त जाकर रामसे युद्ध ठाना; किन्तु उस बलशाली रामने एक क्षणमें ही वे समस्त भीमविक्रम राक्षस नष्ट कर दिये । हे प्रभो ! मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि यदि रामके मनमें आ जाय तो वह निस्सन्देह आधे निमेषमें ही सम्पूर्ण त्रिलोकीको भस्म कर सकता है । किन्तु यदि उसकी स्त्री सीता तुम्हारी भार्या हो जाय तो तुम्हारा जीवन सफल हो जायगा ॥५२–५४॥ जनस्थानादहं याता कदाचिद्गौतमीतटे ।<br>तत्र पञ्चवटी नाम पुरा मुनिजनाश्रया ॥४६॥<br>तत्राश्रमे मया दृष्टो रामो राजीवलोचनः ।<br>धनुर्बाणधरः श्रीमान् जटावल्कलमण्डितः ॥४७॥<br>कनीयाननुजस्तस्य लक्ष्मणोऽपि तथाविधः ।<br>तस्य भार्या विशालाक्षी रूपिणी श्रीरिवापरा ॥४८॥<br>देवगन्धर्वनागानां मनुष्याणां तथाविधा ।<br>न दृष्टा न श्रुता राजन्द्योतयन्ती वनं शुभा ॥४९॥<br>आनेतुमहमद्युक्ता तां भार्यार्थं तदानघ ।<br>लक्ष्मणो नाम तद्भ्राता चिच्छेद मम नासिकाम्॥५०॥<br>कर्णौ च नोदितस्तेन रामेण स महाबलः ।<br>ततोऽहमतिदुःखेन रुदती खरमन्वगाम् ॥५१॥<br>सोऽपि रामं समासाद्य युद्धं राक्षसयूथपैः ।<br>ततः क्षणेन रामेण तेनैव बलशालिना ॥५२॥<br>सर्वे तेन विनष्टा वै राक्षसा भीमविक्रमाः ।<br>यदि रामो मनः कुर्यात्त्रैलोक्यं निमिषार्धतः ॥५३॥<br>भस्मीकुर्यान्न सन्देह इति भाति मम प्रभो ।<br>यदि सा तव भार्या स्यात्सफलं तव जीवितम् ॥५४॥ |

सर्ग ५ ]
अरण्यकाण्ड
१२५


अतो यतस्व राजेन्द्र यथा ते वल्लभा भवेत् ।<br>सीता राजीवपत्राक्षी सर्वलोकैकसुन्दरी ॥५५॥<br>साक्षाद्रामस्य पुरतः स्थातुं त्वं न क्षमः प्रभो ।<br>मायया मोहयित्वा तु प्राप्स्यसे तां रघूत्तमम् ॥५६॥अतः हे राजेन्द्र ! तुम ऐसा प्रयत्न करो जिससे सम्पूर्ण लोकोंमें एकमात्र सुन्दरी कमलनयनी सीता तुम्हारी प्राणप्रिया हो जाय ॥५५॥ हे प्रभो ! तुम रामके सामने साक्षात् न ठहर सकोगे, इसलिये उन रघुश्रेष्ठको किसी प्रकार मायाजालसे मोहित कर तुम उसे प्राप्त कर सकते हो ॥५६॥
श्रुत्वा तत्सूक्तवाक्यैश्च दानमानादिभिस्तथा ।<br>आश्वास्य भगिनीं राजा प्रविवेश स्वकं गृहम् ।<br>तत्र चिन्तापरो भूत्वा निद्रां रात्रौ न लब्धवान् ५७यह सुनकर राक्षसराज रावणने सुन्दर वाक्यों और दान-मानादिसे बहिन शूर्पणखाको धैर्य बँधाकर अपने अन्तःपुरमें प्रवेश किया, किन्तु वहाँ चिन्ताके कारण उसे रात्रिको नींद नहीं आयी ॥५७॥ वह सोचने लगा—
एकेन रामेण कथं मनुष्य-<br>मात्रेण नष्टः सबलः खरो मे ।<br>भ्राता कथं मे बलवीर्यदर्प-<br>युतो विनष्टो वत राघवेण ॥५८॥‘बड़े आश्चर्यकी बात है, अकेले मनुष्यमात्र रघुवंशी रामने बल-वीर्य और साहससम्पन्न मेरे भाई खरको दल-बलके सहित कैसे मार डाला ? ॥५८॥
यद्वा न रामो मनुजः परेशो<br>मां हन्तुकामः सबलं बलौघैः ।<br>सम्प्राथितोऽयं द्रुहिणेन पूर्वं<br>मनुष्यरूपोऽद्य रघोः कुलेऽभूत् ॥५९॥अथवा यह राम मनुष्य नहीं हैं, साक्षात् परमात्माने ही पूर्वकालमें की हुई ब्रह्माकी प्रार्थनासे मेरी बल-वीर्य-सम्पन्न सेनाके सहित मुझे मारनेके लिये इस समय रघुवंशमें मनुष्यरूपसे अवतार लिया है ॥५९॥
वध्यो यदि स्यां परमात्मनाहं<br>वैकुण्ठराज्यं परिपालयेहम् ।<br>नो चेदिदं राक्षसराज्यमेव<br>भोक्ष्ये चिरं राममतो व्रजामि ॥६०॥किन्तु मुझे रामके पास अवश्य चलना चाहिये, क्योंकि यदि उन परमात्माद्वारा मैं मारा गया तब तो मैं वैकुण्ठका राज्य भोगूँगा नहीं तो चिरकालपर्यन्त राक्षसोंका राज्य तो भोगूँगा ही' ॥६०॥
इत्थं विचिन्त्याखिलराक्षसेन्द्रो<br>रामं विदित्वा परमेश्वरं हरिम् ।<br>विरोधयुद्धचैव हरिं प्रयामि<br>द्रुतं न भक्त्या भगवान्प्रसीदेत् ॥६१॥सम्पूर्ण राक्षसोंके स्वामी रावणने इस प्रकार विचारकर भगवान् रामको साक्षात् परमात्मा हरि जानकर यह निश्चय किया कि मैं विरोध-बुद्धिसे ही उनके पास जाऊँगा क्योंकि भक्तिके द्वारा भगवान् (मुझसे) शीघ्र प्रसन्न नहीं हो सकते ॥६१॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥५॥

अरण्यकाण्ड - सर्ग ६: रावणका मारीचके पास जाना

१२६अध्यात्मरामायणं[ सर्ग ६

षष्ठ सर्ग

रावणका मारीचके पास जाना ।


श्रीमहादेव उवाच**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! रात्रिके समय इस प्रकार विचारकर प्रातःकाल होनेपर रावण रथमें सवार हुआ और अपने मन-ही-मन एक कार्य निश्चय कर वह समुद्रके दूसरे तटपर मारीचके घर गया । वहाँ मारीच मुनियोंके समान जटा-वल्कलादि धारण-कर प्राकृत गुणोंके प्रकाशक निर्गुण भगवान्‌का ध्यान कर रहा था । समाधि भंग होनेपर उसने रावणको अपने घर आया देखा ॥ १–३ ॥
विचिन्त्यैवं निशायां स प्रभाते रथमास्थितः ।<br>रावणो मनसा कार्यमेकं निश्चित्य बुद्धिमान् ॥१॥<br>ययौ मारीचसदनं परं पारमुदन्वतः ।<br>मारीचस्तत्र मुनिवज्जटावल्कलधारकः ॥२॥<br>ध्यायन् हृदि परात्मानं निर्गुणं गुणभासकम् ।<br>समाधिविरमेऽपश्यद्रावणं गृहमागतम् ॥३॥
द्रुतमुत्थाय चालिङ्ग्य पूजयित्वा यथाविधि ।<br>कृतातिथ्यं सुखासीनं मारीचो वाक्यमब्रवीत् ॥४॥रावणको देखते ही वह शीघ्रतासे उठ खड़ा हुआ और उससे गले मिलकर उसकी विधिपूर्वक पूजा की । तथा आतिथ्य-सत्कारके अनन्तर जब रावण स्वस्थ होकर बैठा तो मारीच उससे बोला—॥ ४ ॥
समागमनमेतत्ते रथेनैकेन रावण ।<br>चिन्तापर इवाभासि हृदि कार्यं विचिन्तयन् ॥५॥“हे रावण ! इस समय तुम अकेले ही रथमें बैठकर आये हो और तुम्हारा चित्त किसी कार्यके विचारमें चिन्ताग्रस्त-सा प्रतीत होता है ॥ ५ ॥
ब्रूहि मे नहि गोप्यं चेत्करवाणि तव प्रियम् ।<br>न्याय्यं चेद् ब्रूहि राजेन्द्र वृजिनं मां स्पृशेन्न हि ॥६॥यदि गोपनीय न हो तो मुझे वह कार्य बताइये । हे राजेन्द्र ! यदि उसके करनेमें मुझे पाप न लगे और वह न्यायानुतूल हो तो कहो, मैं तुम्हारा वह प्रिय कार्य अवश्य करूँगा” ॥ ६ ॥
रावण उवाच**रावण बोला—**कहते हैं राजा दशरथ अयोध्यापुरी-का अधिपति है, उसका ज्येष्ठ पुत्र सत्यपराक्रमी राम है ॥ ७ ॥
अस्ति राजा दशरथः साकेताधिपतिः किल ।<br>रामनामा सुतस्तस्य ज्येष्ठः सत्यपराक्रमः ॥७॥
विवासयामास सुतं वनं वनजनप्रियम् ।<br>भार्यया सहितं भ्रात्रा लक्ष्मणेन समन्वितम् ॥८॥उस अपने मुनिजनप्रिय पुत्रको दशरथने स्त्री और छोटे भाई लक्ष्मणके सहित वनमें भेज दिया है ॥ ८ ॥
स आस्ते विपिने घोरे पञ्चवट्याश्रमे शुभे ।<br>तस्य भार्या विशालाक्षी सीता लोकविमोहिनी ॥९॥इस समय वह घोर दण्डकारण्यके पञ्चवटी नामक शुभ आश्रममें रहता है । सुना है, उसकी भार्या विशाल-नयना सीता त्रिलोकीको मोहित करनेवाली है ॥ ९ ॥
रामो निरपराधान्मे राक्षसान् भीमविक्रमान् ।<br>खरं च हत्वा विपिने सुखमास्तेऽतिनिर्भयः ॥१०॥वह राम, मेरे बड़े पराक्रमी निरपराध राक्षसोंको भाई खरके सहित मारकर उस तपोवनमें निर्भयता-पूर्वक बड़े आनन्दसे रहता है ॥ १० ॥
भगिन्याः शूर्पणखाया निर्दोषायाश्च नासिकाम् ।<br>कर्णौ चिच्छेद दुष्टात्मा वने तिष्ठति निर्भयः ॥११॥मेरी बहिन शूर्पणखाने उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ा था किन्तु उस दुष्टने उसके नाक-कान काट डाले और अब निर्भयतापूर्वक उस वनमें रहता है ॥ ११ ॥
अतस्त्वया सहायेन गत्वा तत्राणवल्लभाम् ।<br>आनयिष्यामि विपिने रहिते राघवेण ताम् ॥१२॥इसलिये अब तुम्हारी सहायतासे मैं रामके तपोवनमें न रहनेपर उसकी प्राणप्रिया सीताको ले आना चाहता हूँ ॥ १२ ॥

सर्ग ६ ] अरण्यकाण्ड १२७


त्वं तु मायामृगो भूत्वा ह्याश्रमादपनेष्यसि ।<br>रामं च लक्ष्मणं चैव तदा सीतां हराम्यहम् ॥ १३॥<br>त्वं तु तावत्सहायं मे कृत्वा स्थास्यसि पूर्ववत् ।<br>इत्येवं भाषमाणं तं रावणं वीक्ष्य विस्मितः ॥ १४॥<br>केनेदमुपदिष्टं ते मूलघातकरं वचः ।<br>स एव शत्रुर्बध्यश्च यस्तवन्नाशं प्रतीक्षते ॥ १५॥<br>रामस्य पौरुषं स्मृत्वा चित्तमद्यापि रावण ।<br>बालोऽपि मां कौशिकस्य यज्ञसंरक्षणाय सः ॥ १६॥<br>आगतस्तिग्मपुङ्खेन पातयामास सागरे ।<br>योजनानां शतं रामस्तदादि भयविह्वलः ॥ १७॥<br>स्मृत्वा स्मृत्वा तदेवाहं रामं पश्यामि सर्वतः ॥ १८॥<br>दण्डकेऽपि पुनरप्यहं वने<br>$\hspace{1em}$पूर्ववैरमनुचिन्तयन् हृदि ।<br>तीक्ष्णशृङ्गमृगरूपमेकदा<br>$\hspace{1em}$मादृशैर्बहुभिरानृतोऽभ्ययाम् ॥ १९॥<br>राघवं जनकजासमन्वितं<br>$\hspace{1em}$लक्ष्मणेन सहितं त्वरान्वितः ।<br>आगतोऽहमथ हन्तुमुद्यतो<br>$\hspace{1em}$मां विलोक्य शरमेकमाक्षिपत् ॥ २०॥<br>तेन विद्धहृदयोऽहमुद्भ्रमन्<br>$\hspace{1em}$राक्षसेन्द्र पतितोऽस्मि सागरे ।<br>तत्प्रभृत्यहमिदं समाश्रितः<br>$\hspace{1em}$स्थानमूर्जितमिदं भयार्दितः ॥ २१॥<br>राममेव सततं विभावये<br>$\hspace{1em}$भीत भीत इव भोगराशितः ।<br>राजरत्नरमणीरथादिकं<br>$\hspace{1em}$श्रोत्रयोर्यदि गतं भयं भवेत् ॥ २२॥<br>राम आगत इहेति शङ्कया<br>$\hspace{1em}$बाह्यकार्यमपि सर्वमत्यजम् ।<br>निद्रया परिगतो यदा स्वपे<br>$\hspace{1em}$राममेव मनसाऽनुचिन्तयन् ॥ २३॥<br>स्वप्नदृष्टगतराघवं तदा<br>$\hspace{1em}$बोधितो विगतनिद्र आस्थितः ।तुम मायासे मृगरूप होकर राम और लक्ष्मणको आश्रमसे दूर ले जाना। उसी समय मैं सीताको हर लाऊँगा ॥ १३ ॥ इस प्रकार मेरी सहायता करके तुम फिर पूर्ववत् अपने आश्रममें आ रहना ।<br>$\hspace{1em}$रावणको इस प्रकार कहते देख मारीचने विस्मित होकर कहा—॥ १४ ॥ "रावण ! ये सर्वनाश करने-वाली बातें तुम्हें किसने बतायी हैं ? इस प्रकार जो कोई तुम्हारा नाश करना चाहता है, निश्चय ही वह तुम्हारा शत्रु है और वध करने योग्य है ॥ १५ ॥ हे रावण ! उनके बाल्यकालके पौरुषको याद करके, जब वे विश्वामित्रजीकी यज्ञ-रक्षाके लिये आये थे और उन्होंने एक बाणसे ही मुझे सौ योजन दूर समुद्रके तटपर फेंक दिया था, आजतक मेरा हृदय भयसे व्याकुल हो जाता है। बारम्बार उसी बातका स्मरण हो आनेसे मुझे सब ओर राम-ही-राम दिखलायी देने लगते हैं ॥ १६–१८ ॥ एक दिन अपने पूर्व-वैरका स्मरण कर मैं दण्डकारण्यमें भी अपने-जैसे बहुत-से मृगोंके साथ मिलकर एक तीखे सींगोंवाले मृगका रूप बनाकर गया था ॥ १९ ॥ जब मैं बड़ी फुर्तीसे सीता और लक्ष्मणके सहित श्रीरघुनाथजीको मारनेकी इच्छासे आगे बढ़ा तो मुझे देखकर उन्होंने केवल एक बाण छोड़ दिया ॥ २० ॥ हे राक्षसेन्द्र ! उसीसे हृदय विंध जानेके कारण मैं आकाशमें चक्कर काटता हुआ समुद्रमें आकर गिरा। तबसे मैं भयभीत होकर इस पवित्र स्थानमें आश्रम बनाकर बड़ी सावधानीसे रहता हूँ ॥ २१ ॥ राज, रत्न, रमणी और रथ आदि (भोग-सामग्रियोंके प्रथम अक्षर 'र') के कानोंमें पड़ते ही मुझे (रामकी याद आ जानेसे) भय उत्पन्न हो जाता है, इसलिये मैं भोग-समुदायसे भयभीत होकर निरन्तर 'राम' का ही ध्यान करता रहता हूँ ॥ २२ ॥ 'यहाँ राम न आ गये हों' इस आशंकासे मैंने समस्त बाह्य कार्य छोड़ दिये हैं। जिस समय मैं निद्राके वशीभूत होकर सोता हूँ उस समय मन-ही-मन रामका ही स्मरण करता रहता हूँ ॥ २३ ॥ इस प्रकार स्वप्नमें देखे हुए श्रीरघुनाथजीको जब निद्रा टूटनेपर जागता हूँ तब भी नहीं भूलता। अतः हे रावण ! तुम भी

अरण्यकाण्ड - सर्ग ७: मारीचवध और सीताहरण

१२८अध्यात्मरामायण[सर्ग ६

तद्भवानपि विमुच्य चाग्रहं
राघवं प्रति गृहं प्रयाहि भोः ॥२४॥
रक्ष राक्षसकुलं चिरागतं
तत्स्मृतौ सकलमेव नश्यति।
तव हितं वदतो मम भाषितं
परिगृहाण परात्मनि राघवे ॥२५॥
त्यज विरोधमतिं भज भक्तितः
परमकारुणिको रघुनन्दनः।
अहमशेषमिदं मुनिवाक्यतो-
ऽशृणवमादियुगे परमेश्वरः ॥२६॥
ब्रह्मणाऽर्थित उवाच तं हरिः
किं तवेप्सितमहं करवाणि तत्।
ब्रह्मणोक्तमरविन्दलोचन
त्वं प्रयाहि भुवि मानुषं वपुः।
दशरथात्मजभावमञ्जसा
जहि रिपुं दशकन्धरं हरे ॥२७॥
अतो न मानुषो रामः साक्षान्नारायणोऽव्ययः।
मायामानुषवेषेण वनं यातोऽतिनिर्भयः ॥२८॥
भूभारहरणार्थाय गच्छ तात गृहं सुखम्।
श्रुत्वा मारीचवचनं रावणः प्रत्यभाषत ॥२९॥
परमात्मा यदा रामः प्रार्थितो ब्रह्मणा किल।
मां हन्तुं मानुषो भूत्वा यत्नादिह समागतः ॥३०॥
करिष्यत्यचिरादेव सत्यसङ्कल्प ईश्वरः।
अतोऽहं यत्नतः सीतामानेष्याम्येव राघवात् ॥३१॥
वधे प्राप्ते रणे वीर प्राप्स्यामि परमं पदम्।
यद्वा रामं रणे हत्वा सीतां प्राप्स्यामि निर्भयः ॥३२॥
तदुत्तिष्ठ महाभाग विचित्रमृगरूपधृक्।
रामं सलक्ष्मणं शीघ्रमाश्रमादतिदूरतः ॥३३॥
आक्रम्य गच्छ त्वं शीघ्रं सुखं तिष्ठ यथा पुरा।
अतः परं चेद्यत्किञ्चिद्व्यापसे माद्विभीषणम् ॥३४॥
हनिष्याम्यसिनाऽनेन त्वामत्रैव न संशयः। | श्रीरामघवसे हठ छोड़कर अपने घर चले जाओ ॥ २४ ॥ और चिरकालसे बढ़े हुए अपने राक्षस-वंशकी रक्षा करो। श्रीरामचन्द्रजीसे बैर न करो, उनका तो (वैर-भावसे) स्मरण करनेसे भी सर्वस्व नष्ट हो जाता है। मैं तुम्हारे हितके लिये जो कुछ कहता हूँ वह मानो। तुम परमात्मा श्रीरघुनाथजीसे विरोध-बुद्धि छोड़ दो और भक्तिभावसे उनका भजन करो, क्योंकि श्रीरामचन्द्र-जी बड़े दयालु हैं। मैंने मुनीश्वरोंके मुखसे ये सभी बातें सुनी हैं कि सत्ययुगमें ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर परमात्मा श्रीहरिने कहा था कि तुम अपना मनोरथ बताओ, मैं उसे पूर्ण करूँगा। तब ब्रह्माजीने भगवान्‌से कहा—"हे कमललोचन हरे! आप मनुष्य-रूपसे पृथिवीमें अवतार लीजिये और शीघ्र ही दशरथ-नन्दन श्रीराम होकर देवद्रोही दशाननका वध कीजिये ॥२५-२७॥ अतः तुम निश्चय मानो, राम मनुष्य नहीं हैं; वे साक्षात् अव्ययपुरुष श्रीनारायण हैं, मायासे मनुष्यरूप होकर वे निर्भयतापूर्वक पृथिवीका भार उतारनेके लिये वनमें आये हैं। अतः हे तात! तुम सुखपूर्वक घर लौट जाओ।"<br><br>मारीचके ये वचन सुनकर रावण बोला—॥२८-२९॥ “यदि ब्रह्माकी प्रार्थनासे परमात्मा ही राम होकर मनुष्यरूपसे मुझे प्रयत्नपूर्वक मारनेके लिये यहाँ आये हैं, तो वे शीघ्र ही अवश्य वैसा ही करेंगे, क्योंकि ईश्वर सत्य-संकल्प हैं। इसलिये मैं अवश्य यत्नपूर्वक रघुनाथ-जीके पाससे सीताको ले आऊँगा ॥ ३०-३१॥ हे वीर! यदि मैं युद्धमें उनके हाथसे मारा गया तो परमपद प्राप्त करूँगा और यदि मैंने ही रामको रणक्षेत्रमें मार डाला तो निर्भयतापूर्वक सीताको पाऊँगा ॥ ३२ ॥ अतः हे महाभाग! उठो और शीघ्र ही विचित्र मृगरूप धारण कर राम और लक्ष्मणको आश्रमसे अति दूर ले जाओ, फिर पूर्ववत् अपने आश्रममें आकर सुखपूर्वक रहो। यदि मुझे भयभीत करनेके लिये अब और कुछ कहोगे तो निश्चय मानो, मैं अभी इसी खड्गसे तुम्हें यहीं मार डालूँगा।"

सर्ग ७ ] अरण्यकाण्ड [ १२९


| मारीचस्तद्वचः श्रुत्वा स्वात्मन्येवान्वचिन्तयत् ।३५। <br><br> यदि मां राघवो हन्यात्तदा मुक्तो भवार्णवात्। <br> मां हन्याद्यदि चेद्दुष्टस्तदा मे निरयो ध्रुवम् ॥३६॥ <br><br> इति निश्चित्य मरणं रामादुत्थाय वेगतः। <br> ऽब्रवीद्रावणं राजन्करोम्याज्ञां तव प्रभो ॥३७॥ <br><br> इत्युक्त्वा रथमास्थाय गतो रामाश्रमं प्रति। <br> शुद्धजाम्बूनदप्रख्यो मृगोऽभूद्रौप्यविन्दुकः॥३८॥ <br> रत्नशृङ्गो मणिखुरो नीलरत्नविलोचनः। <br> विद्युत्प्रभो विमुग्धास्यो विचचार वनान्तरे ॥३९॥ <br> रामाश्रमपदस्यान्ते सीतादृष्टिपथे चरन् ॥४०॥ <br><br> क्षणं च धावत्यवतिष्ठते क्षणं <br> समीपमागत्य पुनर्भयावृतः। <br> एवं स मायामृगवेषरूपधृक् <br> चचार सीतां परिमोहयन्खलः ॥४१॥ | उसका यह कथन सुनकर मारीचने मन-ही-मन सोचा— ॥३३-३५॥ 'यदि श्रीरघुनाथजीने मुझे मारा तो मैं संसार-सागरसे पार हो जाऊँगा और जो कहीं इस दुष्टने मुझे मार दिया तो निश्चय ही मुझे नरकमें पड़ना होगा' ॥ ३६ ॥ इस प्रकार श्रीरामके हाथसे ही अपना मरना निश्चय कर वह शीघ्रतासे उठा और रावणसे बोला—"हे राजन् ! हे प्रभो ! मैं आपकी आज्ञा पालन करूँगा" ॥ ३७ ॥ <br><br> ऐसा कह वह (रावणके) रथपर चढ़कर श्रीरामचन्द्रके आश्रममें आया और चाँदीकी बूँदोंके सहित शुद्ध सुवर्ण-वर्ण विचित्र मृग-रूप धारण किया ॥ ३८ ॥ उसके सींग रत्नमय, खुर मणिमय और नेत्र नीलरत्नमय थे। इस प्रकार बिजलीकी-सी छटा और मनोहर मुखवाला वह मृग रामचन्द्रजीके आश्रमके पास सीताजीके सामने वनमें विचरने लगा ॥ ३९-४० ॥ किसी क्षण तो वह चौकड़ी मारने लगता और कभी पास आकर भयसे ठिठक जाता। इस प्रकार वह दुष्ट मायामृगरूप धारणकर सीताजीको मोहित करता हुआ घूमने लगा ॥ ४१ ॥ |


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥


सप्तम सर्ग

मारीचवध और सीताहरण।

| श्रीमहादेव उवाच <br><br> अथ रामोऽपि तत्सर्वं ज्ञात्वा रावणचेष्टितम्। <br> उवाच सीतामेकान्ते शृणु जानकि मे वचः ॥ १ ॥ <br> रावणो भिक्षुरूपेण आगमिष्यति तेऽन्तिकम्। <br> त्वं तु छायां त्वदाकारां स्थापयित्वोटजे विश ॥२॥ <br> अग्नावदृश्यरूपेण वर्षं तिष्ठ ममाज्ञया। <br> रावणस्य वधान्ते मां पूर्ववत्प्राप्स्यसे शुभे ॥ ३ ॥ <br> श्रुत्वा रामोदितं वाक्यं सापि तत्र तथाकरोत्। | श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! इधर श्रीरामचन्द्रजीने भी रावणका सारा षड्यन्त्र जानकर एकान्तमें श्रीजानकीजीसे कहा—"हे सीते ! मैं जो कुछ कहता हूँ वह सुनो ॥ १ ॥ हे शुभे ! रावण तुम्हारे पास भिक्षुका रूप धारण कर आयेगा, अतः तुम अपने ही समान आकृतिवाली अपनी छायाको कुटीमें छोड़कर अग्निमें प्रवेश कर जाओ, और मेरी आज्ञासे वहाँ अदृश्यरूपसे एक वर्ष रहो। तदनन्तर, रावणके मारे जानेपर तुम मुझे पूर्ववत् पा लोगी" ॥ २-३ ॥ रामचन्द्रजीके वचन सुनकर सीताजीने भी वैसा ही किया। |


१७

१३०अध्यात्मरामायण[ सर्ग ७

मायासीतां वहिः स्थाप्य स्वयमन्तर्दधेऽनले ॥४॥ | वे मायामयी सीताको बाहर कुटीमें छोड़कर स्वयं अग्निमें अन्तर्धान हो गयीं ॥ ४ ॥ मायासीता तदाऽपश्यन्मृगं मायाविनिर्मितम् ।<br>हसन्ती राममभ्येत्य प्रोवाच विनयान्विता ॥ ५ ॥ | तत्र उस मायासीतान मायामय मृगको देखकर श्रीरामचन्द्रजीके पास आकर हँसते हुए बड़ी नम्रतासे कहा—॥ ५ ॥ "हे राम ! यह रत्न-विभूषित विचित्र सुवर्ण-मृग देखिये । अहो ! इसके शरीरमें कैसे अद्भुत विन्दु हैं और यह कैसी निर्भयतासे विचर रहा है ? हे प्रभो ! आप इसे बाँधकर मुझे ला दीजिये; यह सुन्दर हरिण मेरा क्रीड़ामृग होने योग्य है" ॥ ६ ॥ पश्य राम मृगं चित्रं कनकं रत्नभूषितम् ।<br>विचित्रविन्दुभिर्युक्तं चरन्तमकुतोभयम् ।<br>बद्ध्वा देहि मम क्रीडामृगो भवतु सुन्दरः ॥ ६ ॥ तथेति धनुरादाय गच्छन् लक्ष्मणमब्रवीत् ।<br>रक्ष त्वमतियत्नेन सीतां मत्प्राणवल्लभाम् ॥ ७ ॥ | तत्र रामचन्द्रजीने 'बहुत अच्छा' कह अपना धनुष उठा लिया और जाते समय लक्ष्मणजीसे कहा— "लक्ष्मण ! तुम प्राण-प्रिया सीताकी यत्नपूर्वक देख-भाल करना ॥ ७ ॥ आजकल वनमें बड़े मायावी भयंकर राक्षस विचर रहे हैं। अतः तुम अनिन्दिता साध्वी सीताकी बहुत सावधान रहकर रक्षा करना" ॥ ८ ॥ मायिनः सन्ति विपिने राक्षसा घोरदर्शनाः ।<br>अतोऽत्रावहितः साध्वीं रक्ष सीतामनिन्दिताम् ॥८॥ लक्ष्मणो राममाहेदं देवोयं मृगरूपधृक् ।<br>मारीचोऽत्र न सन्देह एवंभूतो मृगः कुतः ॥ ९ ॥ | तव लक्ष्मणजीने श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— "देव ! यह मृगरूपधारी मारीच है, इसमें सन्देह नहीं, क्योंकि भला मृग ऐसा कहाँ हो सकता है ?" ॥ ९ ॥ श्रीराम उवाच | **श्रीरामचन्द्रजी बोले—**यदि यह मारीच है तो, इसमें सन्देह नहीं, मैं इसे अवश्य मार डालूँगा । और यदि मृग ही है तो सीताका मन रखनेके लिये ले आऊँगा ॥ १० ॥ मैं अभी जाकर बहुत शीघ्र ही इस मृगको बाँधकर लिये आता हूँ, तबतक तुम सीताजीकी रखवाली करते हुए बहुत सावधान रहना ॥ ११ ॥ यदि मारीच एवायं तदा हन्मि न संशयः ।<br>मृगश्चेदानयिष्यामि सीताविश्रमहेतवे ॥१०॥ गमिष्यामि मृगं बध्वा ह्यानायिष्यामि सत्वरः ।<br>त्वं प्रयत्नेन सन्तिष्ठ सीतासंरक्षणोद्यतः ॥११॥ इत्युक्त्वा प्रययौ रामो मायामृगमलुद्रुतः ।<br>माया यदाश्रया लोकमोहिनी जगदाकृतिः ॥१२॥ | यह संसाररूपिणी जगन्मोहिनी माया जिनके आश्रित है वे रामचन्द्रजी ऐसा कह उस मायामृगके पीछे दौड़ते चले गये ॥ १२ ॥ वे निर्विकार चिदात्मा और सर्व-व्यापक होकर भी उस मृगके पीछे दौड़े, इससे यह वाक्य सर्वथा सत्य ही है कि 'भगवान् हरि बड़े भक्त-वत्सल हैं' ॥ १३ ॥ भगवान् सब कुछ जानते थे, तथापि सीताजीको प्रसन्न करनेके लिये वे मृगके पीछे गये। नहीं तो पूर्णकाम आत्मज्ञ भगवान् रामको मृग अथवा स्त्रीसे क्या काम था ? वह मृग कभी तो पास ही दिखलायी देने लगता, कभी एक क्षणमें ही दूर भागकर छिप जाता ॥ १४-१५॥ और फिर बहुत दूरीपर दिखलायी देता। इस प्रकार वह रामचन्द्रजीको बहुत दूर ले गया । निर्विकारश्चिदात्मापि पूर्णोऽपि मृगमन्वगात् ।<br>भक्तानुकम्पी भगवानिति सत्यं वचो हरिः ॥१३॥ कर्तुं सीताप्रियार्थाय जानन्नपि मृगं ययौ ।<br>अन्यथा पूर्णकामस्य रामस्य विदितात्मनः ॥१४॥ मृगेण वा स्त्रिया वापि किं कार्य परमात्मनः ।<br>कदाचिद्दृश्यतेऽभ्याशे क्षणं धावति लीयते॥१५॥<br>दृश्यते च ततो दूराद्देवं राममपाहरत् ।

सर्ग ७ ] अरण्यकाण्ड १३१


ततो रामोऽपि विज्ञाय राक्षसोऽयमिति स्फुटम् १६
विव्याध शरमादाय राक्षसं मृगरूपिणम् ।
पपात रुधिराक्तास्यो मारीचः पूर्वरूपधृक् ॥१७॥
हा हतोऽस्मि महाबाहो त्राहि लक्ष्मण मां द्रुतम् ।
इत्युक्त्वा रामवद्वाचा पपात रुधिराशनः ॥१८॥

यन्नामाज्ञोऽपि मरणे स्मृत्वा तत्साम्यमाप्नुयात् ।
किमुताग्रे हरिं पश्यंस्तेनैव निहतोऽसुरः ॥१९॥

तद्देहादुत्थितं तेजः सर्वलोकस्य पश्यतः ।
राममेवाविशद्देवा विस्मयं परमं ययुः ॥२०॥

किं कर्म कृत्वा किं प्राप्तः पातकी मुनिहिंसकः ।
अथवा राघवस्यायं महिमा नात्र संशयः ॥२१॥

रामबाणेन संविद्धः पूर्वं राममनुस्मरन् ।
भयात्सर्वं परित्यज्य गृहवित्तादिकं च यत् ॥२२॥
हृदि रामं सदा ध्यात्वा निर्धूताशेषकल्मषः ।
अन्ते रामेण निहतः पश्यन् राममवाप सः ॥२३॥

द्विजो वा राक्षसो वाऽपि पापी वा धार्मिकोऽपि वा
त्यजन्कलेवरं रामं स्मृत्वा यान्ति परं पदम् ॥२४॥

इति तेऽन्योन्यमाभाष्य ततो देवा दिवं ययुः ।

रामस्तच्चिन्तयामास म्रियमाणोऽसुराधमः ॥२५॥
हा लक्ष्मणेति मद्वाक्यमनुकुर्वन्ममार किम् ।
श्रुत्वा मद्वाक्यसदृशं वाक्यं सीताऽपि किं भवेत् २६
इति चिन्तापरीतात्मा रामो दूरान्न्यवर्तत ।

सीता तद्भाषितं श्रुत्वा मारीचस्य दुरात्मनः ॥२७॥
भीताऽतिदुःखसंविग्ना लक्ष्मणं त्विदमब्रवीत् ।
गच्छ लक्ष्मण वेगेन भ्राता तेऽसुरपीडितः ॥२८॥


तब रामचन्द्रजीने यह निश्चयपूर्वक जानकर कि यह राक्षस ही है, उस मृगरूप राक्षसको एक बाण छोड़कर बींध डाला । बाणके लगते ही मारीच अपना पूर्वरूप धारणकर लोहू भरे मुखसे पृथिवीपर गिर पड़ा ॥ १६-१७ ॥ वह रक्तपायी दैत्य रामकी-सी बोलीमें यह कहता हुआ कि 'हे महाबाहो लक्ष्मण ! मैं मारा गया; मेरी शीघ्र ही रक्षा करो' पृथिवीपर गिरा ॥१८॥

मरण-समयमें जिनके नामका स्मरण करनेसे अज्ञ-जन भी जिनके समान हो जाते हैं उन्हीं हरिंको देखते-देखते उन्हींके हाथसे मरे हुए उस राक्षसके विषयमें तो कहना ही क्या है ? ॥ १९ ॥ उसके शरीरसे निकला हुआ तेज सबके देखते-देखते श्रीराममें ही समा गया । यह देखकर देवताओंको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥२०॥ वे कहने लगे—"अहो ! इस मुनिजनहिंसक पापी निशाचरने कैसे-कैसे कुकर्म किये और फिर कैसी शुभ गति प्राप्त की । निस्सन्देह यह श्रीरघुनाथजीकी ही महिमा है ॥ २१ ॥ रामके बाणसे बींधे जानेपर यह पहलेसे ही भयसे अपना सब गृह और धन आदि छोड़ें रामचन्द्रजीके स्मरणमें लगा हुआ था ॥ २२ ॥ निरन्तर रामका ध्यान करनेसे इसके सारे पाप नष्ट हो गये थे, तथा अन्तमें यह रामको देखते-देखते उन्हींके हाथसे मारा भी गया; इसलिये इसने रामहीको प्राप्त कर लिया ॥ २३ ॥ जो श्रीरामका स्मरण करते हुए शरीर छोड़ते हैं, वे ब्राह्मण हों या राक्षस, पापी हों या धार्मिक—परम पदको ही प्राप्त होते हैं" ॥ २४ ॥ परस्पर इस प्रकार कहते हुए फिर देवगण स्वर्गको चले गये ।

तब रामचन्द्रजी सोचने लगे कि 'इस अधम राक्षसने मरते समय मेरी-सी बोलीमें 'हा लक्ष्मण !' कहकर प्राण क्यों छोड़े ? इन मेरे-से वाक्योंको सुनकर सीताकी क्या दशा होगी ?' ॥ २५-२६ ॥ इस प्रकार चिन्ता करते हुए राम बड़ी दूरसे लौटे ।

इधर सीताने दुरात्मा मारीचका वह शब्द सुनकर अत्यन्त भय और दुःखसे व्याकुल हो लक्ष्मणसे यों कहा—"लक्ष्मण ! तुम बहुत शीघ्र जाओ, तुम्हारे भाई राक्षसोंसे कष्ट पा रहे हैं ॥ २७-२८ ॥ क्या

१३२अध्यात्मरामायण[सर्ग ७

हा लक्ष्मणेति वचनं भ्रातुस्ते न शृणोषि किम् ।
तामाह लक्ष्मणो देवि रामवाक्यं न तद्भवेत् ॥ २९ ॥
यः कश्चिद्राक्षसो देवि म्रियमाणोऽब्रवीद्वचः ।
रामस्त्रैलोक्यमपि यः क्रुद्धो नाशयति क्षणात् ॥ ३० ॥
स कथं दीनवचनं भाषतेऽमरपूजितः ।
क्रुद्धा लक्ष्मणमालोक्य सीता वाष्पविलोचना ॥ ३१ ॥
प्राह लक्ष्मण दुर्बुद्धे भ्रातुर्व्यसनमिच्छसि ।
प्रेषितो भरतेनैव रामनाशाभिकाङ्क्षिणा ॥ ३२ ॥
मां नेतुमागतोऽसि त्वं रामनाशे उपस्थिते ।
न प्राप्स्यसे त्वं मामद्य पश्य प्राणांस्त्यजाम्यहम् ॥
न जानातीदृशं रामस्त्वां भार्याहरणोद्यतम् ।
रामादन्यं न स्पृशामि त्वां वा भरतमेव वा ॥ ३४ ॥

इत्युक्त्वा वध्यमाना सा स्वबाहुभ्यां रुरोद ह ।
तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणः कर्णौ पिधायातीव दुःखितः ३५
मामेवं भाषसे चण्डि धिक् त्वां नाशमुपैष्यसि ।
इत्युक्त्वा वनदेवीभ्यः समर्प्य जनकात्मजाम् ॥ ३६ ॥
ययौ दुःखादतिसंविग्नो राममेव शनैः शनैः ।
ततोऽन्तरं समालोक्य रावणो भिक्षुवेषधृक् ॥ ३७ ॥
सीतासमीपमगमत्स्फुरद्दण्डकमण्डलुः ।
सीता तमवलोक्याशु नत्वा सम्पूज्य भक्तितः । ३८ ।
कन्दमूलफलादीनि दत्त्वा स्वागतमब्रवीत् ।
मुने भुङ्क्ष्व फलादीनि विश्रमस्व यथासुखम् ॥ ३९ ॥
इदानीमेव भर्ता मे ह्यागमिष्यति ते प्रियम् ।
करिष्यति विशेषेण तिष्ठ त्वं यदि रोचते ॥ ४० ॥


हिन्दी अनुवाद:

तुम अपने भाईका 'हा लक्ष्मण' यह वाक्य नहीं सुनते ?"

लक्ष्मणजीने कहा—"देवि ! यह वाक्य श्रीरामचन्द्रजीका नहीं है ॥ २९ ॥ किसी राक्षसने मरते-मरते ये वचन कहे हैं । जो रामजी क्रोधित होनेपर एक क्षणमें सम्पूर्ण त्रिलोकीको भी नष्ट कर सकते हैं ॥ ३० ॥ वे देववन्दित प्रभु भला ऐसा दीन-वचन कैसे बोल सकते हैं ?"

तब सीताजीने नेत्रोंमें जल भरकर क्रोधपूर्वक लक्ष्मणजीकी ओर देखते हुए कहा—"रे लक्ष्मण ! क्या तू अपने भाईको विपत्तिमें पड़े देखना चाहता है ? अरे दुर्बुद्धे ! मालूम होता है, तुझे रामका नाश चाहनेवाले भरतने ही भेजा है ॥ ३१-३२ ॥ क्या तू रामके नष्ट हो जानेपर मुझे ले जानेके लिये ही आया है, किन्तु तू मुझे पा न सकेगा । देख मैं अभी प्राण त्याग किये देती हूँ ॥ ३३ ॥ राम तुझे इस प्रकार स्त्रीहरणके लिये उद्यत नहीं जानते थे । रामके अतिरिक्त मैं भरत या तुझे किसीको भी नहीं छू सकती" ॥ ३४ ॥

ऐसा कहकर वे अपनी भुजाओंसे छाती पीटती हुई रोने लगीं । उनके ऐसे कठोर शब्द सुन लक्ष्मणजीने अति दुःखित हो अपने दोनों कान मूँद लिये और कहा—"हे चण्डि ! तुम्हें धिक्कार है, तुम मुझे ऐसी बातें कह रही हो ! इससे तुम नष्ट हो जाओगी ।" ऐसा कह लक्ष्मणजी सीताको वनदेवियोंको सौंपकर दुःखसे अत्यन्त खिन्न हो धीरे-धीरे रामके पास चले ।

इसी समय सूना देखकर रावण भिक्षुका वेष बना दण्ड-कमण्डलु घुमाता हुआ सीताके पास आया । सीताने उसे देखकर तुरन्त ही प्रणाम किया और भक्तिपूर्वक उसका पूजन कर कन्द-मूल-फल आदि देकर स्वागत करते हुए कहा—"हे मुने ! ये फल आदि पाकर सुखपूर्वक विश्राम कीजिये । अभी थोड़ी देरमें ही मेरे पतिदेव आते होंगे । यदि आपकी इच्छा हो तो कुछ देर ठहरिये । वे आपका कुछ विशेष सत्कार कर सकेंगे" ॥ ३५-४० ॥

सर्ग ७ ]अरण्यकाण्डे१३३
भिक्षुरुवाच<br>का त्वं कमलपत्राक्षि को वा भर्ता तवानघे ।<br>किमर्थमत्र ते वासो वने राक्षससेविते ।<br>ब्रूहि भद्रे ततः सर्वं स्ववृत्तान्तं निवेदये ॥४१॥भिक्षु बोला— हे कमलोचने ! तुम कौन हो ? तुम्हारे पति कौन हैं ? हे अनघे ! इस राक्षससेवित वनमें तुम क्यों रहती हो ? हे कल्याणि ! ये सब बातें बताओ, तब मैं भी तुम्हें अपना सारा वृत्तान्त सुनाऊँगा ॥४१॥
सीतोवाच<br>अयोध्याधिपतिः श्रीमान् राजा दशरथो महान् ।<br>तस्य ज्येष्ठः सुतो रामः सर्वलक्षणलक्षितः ॥४२॥<br>तस्याहं धर्मतः पत्नी सीता जनकनन्दिनी ।<br>तस्य भ्राता कनीयांश्च लक्ष्मणो भ्रातृवत्सलः ॥४३॥<br>पितुराज्ञां पुरस्कृत्य दण्डके वस्तुमागतः ।<br>चतुर्दश समास्त्वां तु ज्ञातुमिच्छामि मे वद ॥४४॥सीताजी बोलीं— हे भिक्षो ! श्रीमान् महाराज दशरथ अयोध्याके राजा थे, उनके ज्येष्ठ पुत्र सर्व-सुलक्षणसम्पन्न राम हैं ॥४२॥ मैं जनकनन्दिनी सीता उन्हींकी धर्मपत्नी हूँ । उनका छोटा भाई लक्ष्मण है । वह अपने भाईका अत्यन्त स्नेही है ॥४३॥ (हम दोनोंके साथ) श्रीरामचन्द्रजी पिताकी आज्ञासे चौदह वर्ष दण्डकारण्यमें रहनेके लिये आये हैं । अब मैं तुम्हारे विषयमें जानना चाहती हूँ, तुम भी मुझे अपना परिचय दो ॥४४॥
भिक्षुरुवाच<br>पौलस्त्यतनयोऽहं तु रावणो राक्षसाधिपः ।<br>त्वत्कामपरितप्तोऽहं त्वां नेतुं पुरमागतः ॥४५॥<br>मुनिवेषेण रामेण किं करिष्यसि मां भज ।<br>भुङ्क्ष्व भोगान्मया सार्धं त्यज दुःखं वनोद्भवम् ४६भिक्षु बोला— मैं पुलस्त्यनन्दन विश्रवाका पुत्र राक्षसराज रावण हूँ । मैं तुम्हें पानेकी इच्छासे सन्तप्त था; अतः इस समय तुम्हें ले जानेके लिये यहाँ आया हूँ ॥४५॥ उस मुनिवेषधारी रामसे तुम्हें क्या मिलेगा । तुम मुझसे प्रेम करो और इन वनवासके दुःखोंसे छूटकर मेरे साथ नाना प्रकारके भोग भोगो ॥४६॥
श्रुत्वा तद्वचनं सीता भीता किञ्चिदुवाच तम् ।<br>यद्येवं भाषसे मां त्वं नाशमेष्यसि राघवात् ॥४७॥<br>आगमिष्यति रामोऽपि क्षणं तिष्ठ सहानुजः ।<br>मां को धर्षयितुं शक्तो हरेर्भार्यां शशो यथा ॥४८॥<br>रामवाणैर्विभिन्नस्त्वं पतिष्यसि महीतले ।<br>इति सीताचचः श्रुत्वा रावणः क्रोधमूर्च्छितः ॥४९॥<br>स्वरूपं दर्शयामास महापर्वतसन्निभम् ।<br>दशास्यं विंशतिभुजं कालमेघसमद्युतिम् ॥५०॥<br>तद्दृष्ट्वा वनदेव्यश्च भूतानि च वितत्रसुः ।<br>ततो विदार्य धरणीं नखैरुद्धृत्य बाहुभिः ॥५१॥उसके ये वचन सुनकर सीताजीने कुछ डरते हुए उससे कहा—"यदि तू मुझसे ऐसी बात कहेगा तो रामचन्द्रजी तुझे नष्ट कर देंगे ॥४७॥ जरा ठहर तो, भाईके सहित श्रीरामचन्द्रजी अभी आते होंगे ! मेरे साथ कौन बलात्कार कर सकता है ? क्या सिंह-पत्नी-के साथ खरहा भी बलप्रयोग कर सकता है ? ॥४८॥ रामजीके बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर तू अभी पृथिवीतलपर सोवेगा।" सीताजीके ऐसे वचन सुनकर रावणने क्रोधाकुल हो अपना महापर्वताकार रूप दिख-लाया, जिसके दश मुख और बीस भुजाएँ थीं तथा जिसकी काले मेघके समान आभा थी ॥४९-५०॥ उस भयंकर रूपको देखकर वनदेवियाँ और वन्य जीव भयभीत हो गये। तब रावणने (सीताजीके पैरोंके नीचेकी) पृथिवीको नखोंसे खोदकर*उन्हें अपने हाथोंसे उठा लिया

* वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड सर्ग १३ में रावण कहता है कि एक बार मैंने पुञ्जिकस्थली नामकी अप्सराको आकाशमार्गसे ब्रह्माजीके पास जाते देखा । तब मैंने कामातुर हो उसे बलात्कारसे वस्त्रहीन कर उसके साथ सम्भोग किया । जब उसने यह बात ब्रह्माजीसे जाकर कही तो उन्होंने मुझे शाप दिया कि 'यदि तू आजसे किसी स्त्रीसे बलात्कार करेगा तो तेरे मस्तकके सौ टुकड़े हो जायँगे ।' मालूम होता है इस शापके भयसे ही रावणने सीताजीको स्पर्श नहीं किया । किन्हीं-किन्हींका मत है कि रावणको इसी प्रकारका शाप कुबेरपुत्र नलकूबरने दिया था ।

१३४ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ७

तोलयित्वा रथे क्षिप्त्वा ययौ क्षिप्रं विहायसा । हा राम हा लक्ष्मणेति रुदती जनकात्मजा ॥५२॥ भयोद्विग्नमना दीना पश्यन्ती भुवमेव सा । श्रुत्वा तत्क्रन्दितं दीनं सीतायाः पक्षिसत्तमः ॥५३॥ जटायुरुत्थितः शीघ्रं नगाग्रात्तीक्ष्णतुण्डकः । तिष्ठ तिष्ठेति तं प्राह को गच्छति ममाग्रतः ॥५४॥ मुषित्वा लोकनाथस्य भार्यां शून्याद्वनालयात् । शुनको मन्त्रपूतं त्वं पुरोडाशमिवाध्वरे ॥५५॥ इत्युक्त्वा तीक्ष्णतुण्डेन चूर्णयामास तद्रथम् । वाहान्विभेद पादाभ्यां चूर्णयामास तद्धनुः ॥५६॥ ततः सीतां परित्यज्य रावणः खड्गमाददे । चिच्छेद पक्षौ सामर्षः पक्षिराजस्य धीमतः ॥५७॥ पपात किञ्चिच्छेषेण प्राणेन भुवि पक्षिराट् । पुनरन्यरथेनाशु सीतामादाय रावणः ॥५८॥ क्रोशन्ती रामरामेति त्रातारं नाधिगच्छति । हा राम हा जगन्नाथ मां न पश्यसि दुःखिताम् ॥५९॥ रक्षसा नीयमानां स्वां भार्या मोचय राघव । हा लक्ष्मण महाभाग त्राहि मामपराधिनीम् ॥६०॥ वाक्शरेण हतस्त्वं मे क्षन्तुमर्हसि देवर । इत्येवं क्रोशमानां तां रामागमनशङ्कया ॥६१॥ जगाम वायुवेगेन सीतामादाय सत्वरः । विहायसा नीयमाना सीतापश्यदधोमुखी ॥६२॥ पर्वताग्रे स्थितान्पञ्च वानरान्वारिजानना । उत्तरीयार्धखण्डेन विमुच्याभरणादिकम् ॥६३॥ बध्वा चिक्षेप रामाय कथयन्त्विति पर्वते । ततः समुद्रमुल्लङ्घ्य लङ्कां गत्वा स रावणः ॥६४॥

और रथमें डालकर तुरन्त आकाशमार्गसे चल दिया।

उस समय सीताजी अति भयभीत होकर दीन-दृष्टिसे पृथिवीकी ओर देखती हुई 'हा राम ! हा लक्ष्मण !' ऐसा कहकर रोने लगीं। सीताजीका वह आर्तक्रन्दन सुनकर तुरन्त ही तीखी चोंचवाला पक्षिश्रेष्ठ जटायु पहाड़ की चोटीपरसे उठा। और बोला—"अरे ! ठहर, ठहर, यज्ञके मन्त्रपूत पुरोडाशको ले जानेवाले कुत्तेके समान मेरे सामने ही जगन्नाथ श्रीरघुनाथजीकी भार्याको सूने तपोवनसे तू कौन लिये जाता है ? ॥५१-५५॥ जटायुने ऐसा कहकर अपनी तीक्ष्ण चोंचसे रावणके रथको चूर-चूर कर डाला और अपने पञ्जोंसे घोड़ोंको मारकर उसके धनुषके टुकड़े-टुकड़े कर दिये ५६

तब रावणने सीताजीको छोड़कर अपना खड्ग निकाला और झुँझलाकर मतिमान् जटायुके पंख काट डाले ॥ ५७॥ पंख कट जानेसे पक्षिराज जटायु अधमरे होकर पृथिवीपर गिर पड़े। फिर तुरन्त ही रावण सीताजीको दूसरे रथपर चढ़ाकर चलता बना ॥ ५८ ॥

उस समय वह सीता किसी रक्षकको न देखकर वारम्वार रामको पुकारती हुई रो-रोकर कह रही थीं—"हा राम ! हा जगन्नाथ ! क्या आप मुझ दुःखिनीको नहीं देखते ? ॥ ५९॥ हे राघव ! आपकी भार्याको राक्षस लिये जाता है, आप छुड़ाइये। हा महाभाग लक्ष्मण ! मुझ अपराधिनीकी रक्षा करो ॥ ६० ॥ हे देवर ! मैंने तुम्हें वाग्बाण मारे थे, तुम मुझे क्षमा करना।" सीताजीके इस प्रकार रुदन करनेसे रामके आनेकी आशंका करता हुआ रावण उन्हें लेकर वायुके समान अति तीव्र वेगसे चलने लगा।

इस प्रकार आकाशमार्गसे जाते हुए नीचेकी ओर देखती हुई कमलानना सीताजीने एक पर्वत-शिखरपर पाँच वानरोंको बैठे देखा। यह देखकर उन्होंने अपने आभूषणादि उतारकर अपने दुपट्टेके टुकड़ेमें बाँधे और यह कहकर कि 'रामको मेरा समाचार सुना देना' पर्वतपर फेंक दिये।

तदनन्तर रावणने समुद्र पारकर लंकामें पहुँचकर

अरण्यकाण्ड - सर्ग ८: सीताजीके वियोगमें भगवान् रामका विलाप और जटायुसे भेंट

सर्ग ८ ] अरण्यकाण्ड १३५


स्वान्तःपुरे रहस्येतामशोकविपिनेऽक्षिपत् ।
राक्षसीभिः परिवृतां मातृबुद्धयाऽन्वपालयत् ॥ ६५ ॥
कृशाऽतिदीना परिकर्मवर्जिता
दुःखेन शुष्यद्वदनाऽतिविह्वला ।
राम रामेति विलप्यमाना
सीता स्थिता राक्षसवृन्दमध्ये ॥ ६६ ॥

उन्हें अपने अन्तःपुरके एकान्त देश अशोकवनमें रखा और राक्षसियोंसे घेरे रखकर मातृबुद्धिसे उनकी रक्षा करने लगा ॥ ६१–६५ ॥ उस स्थानमें अति कृश और दीनवदना सीताजी सब प्रकारका श्रृंगार छोड़कर दुःखके कारण अति शुष्कवदन और विह्वल होकर 'हा राम ! हा राम !' ऐसे विलाप करती हुई राक्षसोंके बीचमें रहने लगीं ॥ ६६ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥


अष्टम सर्ग

सीताजीके वियोगमें भगवान् रामका विलाप और जटायुसे भेंट ।

श्रीमहादेव उवाच
रामो मायाविनं हत्वा राक्षसं कामरूपिणम् ।
प्रतस्थे स्वाश्रमं गन्तुं ततो दूराद्ददर्श तम् ॥ १ ॥
आयान्तं लक्ष्मणं दीनं मुखेन परिशुष्यता ।
राघवश्चिन्तयामास स्वात्मन्येव महामतिः ॥ २ ॥
लक्ष्मणस्तन्न जानाति मायासीतां मया कृताम् ।
ज्ञात्वाप्येनं वञ्चयित्वा शोचामि प्राकृतो यथा ॥ ३ ॥
यद्यहं विरतो भूत्वा तूष्णीं स्थास्यामि मन्दिरे ।
तदा राक्षसकोटीनां वधोपायः कथं भवेत् ॥ ४ ॥
यदि शोचामि तां दुःखसन्तप्तः कामुको यथा ।
तदा क्रमेणानुचिन्वन्सीतां यास्येऽसुरालयम् ।
रावणं सकुलं हत्वा सीतामग्नौ स्थितां पुनः ॥ ५ ॥
मयैव स्थापितां नीत्वा याताऽयोध्द्यामतन्द्रितः ।
अहं मनुष्यभावेन जातोऽस्मि ब्रह्मणाऽर्थितः ॥ ६ ॥
मनुष्यभावमापन्नः किञ्चित्कालं वसामि कौ ।
ततो मायामनुष्यस्य चरितं मेऽनुशृण्वताम् ॥ ७ ॥
मुक्तिः स्यादप्रयासेन भक्तिमार्गानुवर्तिनाम् ।

**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! इधर रामचन्द्रजी जब कामरूपधारी मायावी राक्षसको मारकर अपने आश्रमपर चलनेको प्रस्तुत हुए तो उन्होंने दूरसे ही दीन और उदास मुखसे लक्ष्मणको आते देखा । तब महामति रघुनाथजी मन-ही-मन सोचने लगे ॥ १-२ ॥ 'लक्ष्मणको यह पता नहीं है कि मैंने मायामयी सीता बना दी है । मैं यह जानता हूँ तथापि लक्ष्मणसे यह बात छिपाकर मैं साधारण मनुष्यके समान शोक करूँगा ॥ ३ ॥ यदि मैं उपराम होकर चुपचाप अपनी कुटीमें बैठ गया तो इन करोड़ों राक्षसोंके नाशका उपाय कैसे होगा ? ॥ ४ ॥ यदि मैं उसके लिये दुःखातुर होकर कामी पुरुषके समान शोक करूँगा तो क्रमशः सीताकी खोज करता हुआ राक्षसराज रावणके यहाँ पहुँच जाऊँगा और उसे कुलसहित मारकर अपने आप ही अग्निमें स्थापित की हुई सीताको उसमेंसे निकालकर फिर तुरन्त अयोध्या चला जाऊँगा । ब्रह्माकी प्रार्थनासे मैंने मनुष्यावतार लिया है अतः मैं कुछ समय पृथिवीपर मनुष्य-भावसे ही रहूँगा । इससे मुझ माया-मानवके चरित्रोंको सुननेवाले भक्ति-परायण पुरुषोंकी अनायास ही मुक्ति हो जायगी ।'

१३६अध्यात्मरामायण[सर्ग. ८

निश्चित्यैवं तदा दृष्ट्वा लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत् ॥८॥
किमर्थमागतोऽसि त्वं सीतां त्यक्त्वा मम प्रियाम्।
नीता वा भक्षिता वापि राक्षसैर्जनकात्मजा ॥९॥

लक्ष्मणः प्राञ्जलिः प्राह सीताया दुर्वचो रुदन्।
हा लक्ष्मणेति वचनं राक्षसोक्तं श्रुतं तया ॥१०॥
त्वद्वाक्यसदृशं श्रुत्वा मां गच्छेति त्वराब्रवीत्।
रुदन्ती सा मया प्रोक्ता देवि राक्षसभाषितम्।
नेदं रामस्य वचनं स्वस्था भव शुचिस्मिते ॥११॥
इत्येवं सान्त्विता साध्वी मया प्रोवाच मां पुनः।
यदुक्तं दुर्वचो राम न वाच्यं पुरतस्तव ॥१२॥
कर्णौ पिधाय निर्गत्य यातोऽहं त्वां समीक्षितुम्।

रामस्तु लक्ष्मणं प्राह तथाऽप्यनुचितं कृतम् ॥१३॥
त्वया स्त्रीभाषितं सत्यं कृत्वा त्यक्ता शुभानना।
नीता वा भक्षिता वाऽपि राक्षसैर्नात्र संशयः ॥१४॥

इति चिन्तापरो रामः स्वाश्रमं त्वरितो ययौ।
तत्रादृष्ट्वा जनकतां विललापातिदुःखितः ॥१५॥
हा प्रिये क्व गताऽसि त्वं नासि पूर्ववदाश्रमे।
अथवा मन्विमोहार्थं लीलया क्व विलीयसे ॥१६॥

इत्याचिन्वन्वनं सर्वं नापश्यज्जानकीं तदा।
वनदेव्यः कुतः सीतां ब्रुवन्तु मम वल्लभाम् ॥१७॥
मृगाश्च पक्षिणो वृक्षा दर्शयन्तु मम प्रियाम्।
इत्येवं विलपन्नेव रामः सीतां न कुत्रचित् ॥१८॥
सर्वज्ञः सर्वथा क्वापि नापश्यद्रघुनन्दनः।
आनन्दोऽप्यन्वशोचत्तामचलोऽप्यनुधावति ॥१९॥


हिन्दी-अनुवाद:

श्रीरामचन्द्रजीने इसप्रकार निश्चयकर लक्ष्मणजीकी ओर देखकर कहा—॥५-८॥ “लक्ष्मण ! तुम प्राणप्रिया सीताको छोड़कर कैसे चले आये ? अब राक्षसगण जनकनन्दिनी सीताको हर ले गये होंगे अथवा उन्हें खा गये होंगे” ॥९॥

तब लक्ष्मणजीने हाथ जोड़कर रोते हुए सीताजीके दुर्वाक्य कह सुनाये। वे बोले— “आपके वाक्यके समान राक्षसके कहे हुए 'हा लक्ष्मण !' इस शब्दको सुनकर सीताजीने अति आतुरतासे रोते हुए मुझसे कहा 'फौरन जाओ'। तब मैंने उन्हें समझाया कि देवि ! यह रघुनाथजीका वाक्य नहीं है, राक्षसका शब्द है, हे शुचिस्मिते ! तुम निश्चिन्त रहो ॥१०-११॥ मेरे इस प्रकार ढाढस बँधानेपर भी साध्वी सीताजीने मुझसे जैसे दुर्बचन कहे हैं, हे रघुनाथजी ! वे आपके सामने कहने योग्य नहीं हैं ॥१२॥ अतः मैं कान मूँदकर वहाँसे आपको देखनेके लिये चला आया।”

इसपर श्रीरामचन्द्रजीने कहा—“लक्ष्मण ! ठीक है, तथापि तुमने उचित नहीं किया ॥१३॥ जो स्त्रीकी बातको सत्य मानकर शुभानना सीताको छोड़ दिया ! इसमें सन्देह नहीं अब राक्षसलोग या तो उन्हें हर ले गये होंगे या खा गये होंगे” ॥१४॥

इस प्रकार चिन्ता करते हुए श्रीरामचन्द्रजी बड़ी शीघ्रतासे अपने आश्रममें आये और वहाँ जानकीजीको न देखकर अति दुःखित होकर विलाप करने लगे—॥१५॥ 'हा प्रिये ! आज तुम पूर्ववत् आश्रममें दिखायी नहीं देती हो, सो कहाँ चली गयी हो ? अथवा मुझे मोहित करनेके लिये विनोदसे ही कहीं छिप रही हो ? ॥१६॥

इस प्रकार विलाप करते हुए उन्होंने सारा वन छान डाला किन्तु कहीं भी जानकीजीको न पाया। तब वे कहने लगे—“अयि वनदेवियो ! बताओ मेरी प्राणवल्लभा सीता कहाँ है ? अरे मृग, पक्षी और वृक्षो ! तुम्हीं मेरी प्रियाको दिखाओ।” ॥१७॥ इस प्रकार विलाप करते हुए सर्वज्ञ श्रीरघुनाथजीने सीताजीका कहीं कुछ भी पता न पाया ॥१८॥ अहो ! भगवान् रामने आनन्दस्वरूप होकर भी सीताजीके लिये शोक किया, निश्चल होनेपर भी उनकी खोजमें इधर-उधर

सर्ग ८ ]अरण्यकाण्ड१३७
निर्ममो निरहङ्कारोऽप्यखण्डानन्दरूपवान् ।<br>मम जायेति सीतेति विललापातिदुःखितः ॥२०॥दौड़ते फिरे तथा ममता और अहंकारसे शून्य अखण्डा- <br>नन्दस्वरूप होकर भी अत्यन्त दुःखित हो 'हे मेरी<br>प्रिये ! हे सीते !' ऐसा कहकर विलाप किया ॥१९-२०॥
एवं मायामनुचरन्नसक्तोऽपि रघूत्तमः ।<br>आसक्त इव मूढानां भाति तत्त्वविदां नहि ॥२१॥इस प्रकार मायाका अनुसरण करते हुए श्रीरघुनाथजी<br>अनासक्त होते हुए भी मूढ़ पुरुषोंको आसक्त-से प्रतीत<br>होते हैं किन्तु तत्त्वज्ञानियोंको ऐसा भ्रम नहीं<br>होता ॥ २१ ॥
एवं विचिन्वन्सकलं वनं रामः सलक्ष्मणः ।<br>भग्नं रथं छत्रचापं कूबरं पतितं भुवि ॥२२॥<br>दृष्ट्वा लक्ष्मणमाहेदं पश्य लक्ष्मण केनचित् ।<br>नीयमानां जनकतां तं जित्वान्यो जहार ताम् ॥२३॥इस प्रकार लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजीने सम्पूर्ण<br>वनमें सीताजीको ढूँढते-ढूँढते पृथिवीपर टूटे रथ-<br>छत्र, धनुष और कूबर पड़े देखे । उन्हें देखकर<br>भगवान् रामने लक्ष्मणजीसे कहा—"लक्ष्मण ! देखो<br>यहाँ सीताजीको ले जाते हुए किसी पुरुषको कोई अन्य<br>व्यक्ति (युद्धमें) जीतकर उन्हें हर ले गया है" ॥२२-२३॥
ततः कञ्चिद्भुवो मार्गं गत्वा पर्वतसन्निभम् ।<br>रुधिराक्तवपुर्दृष्ट्वा रामो वाक्यमथाब्रवीत् ॥२४॥<br>एष वै भक्षयित्वा तां जानकीं शुभदर्शनाम् ।<br>शेते विविक्तेऽतितृप्तः पश्य हन्मि निशाचरम् ॥२५॥<br>चापमानय शीघ्रं मे बाणं च रघुनन्दन ।फिर कुछ दूर जानेपर एक पर्वत-सदृश शरीरको<br>रुधिरसे लथपथ देखकर रामने कहा—॥ २४ ॥<br>"देखो, निस्सन्देह यही उस शुभदर्शना सीताको खाकर<br>अत्यन्त तृप्त हो यहाँ एकान्तमें सो रहा है; मैं इस<br>निशाचरको अभी मारे डालता हूँ ॥ २५ ॥ हे रघुश्रेष्ठ<br>लक्ष्मण ! शीघ्र ही मेरा धनुष-बाण लाओ ।"
तच्छ्रुत्वा रामवचनं जटायुः प्राह भीतवत् ॥२६॥<br>मां न मारय भद्रं ते म्रियमाणं स्वकर्मणा ।<br>अहं जटायुस्ते भार्याहारिणं समनुद्रुतः ॥२७॥<br>रावणं तत्र युद्धं मे बभूवारिचिमर्दन ।<br>| तस्य वाहान् रथं चापं च्छित्त्वाऽहं तेन घातितः ॥२८॥<br>पतितोऽस्मि जगन्नाथ प्राणांस्त्यक्ष्यामि पश्य माम् ॥रामका यह कथन सुन जटायुने भयभीत होकर<br>कहा—॥ २६ ॥ "मैं अपने ही कर्मसे मर रहा हूँ;<br>आपका कल्याण हो, आप मुझे न मारें । मैं जटायु<br>हूँ, मैंने आपकी भार्याको ले जानेवाले रावणका पीछा<br>किया था । हे शत्रुदमन ! मेरा उससे घोर युद्ध हुआ<br>और मैंने उसके रथ, घोड़े और धनुष आदि भी काट<br>डाले, किन्तु अब मैं उसका घायल किया हुआ पड़ा<br>हूँ । हे जगन्नाथ ! आप मेरी ओर देखिये, मैं अब प्राण<br>छोड़ना ही चाहता हूँ" ॥ २७-२९ ॥
तच्छ्रुत्वा राघवो दीनं कण्ठप्राणं ददर्श ह ।<br>हस्ताभ्यां संस्पृशन् रामो दुःखाश्रुप्लुतलोचनः ॥३०॥<br>जटायो ब्रूहि मे भार्या केन नीता शुभानना ।<br>मत्कार्यार्थं हतोऽसि त्वमतो मे प्रियबान्धवः ॥३१॥यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने (जटायुके पास जाकर)<br>उसे कण्ठगतप्राण और अति दीन अवस्थामें देखा ।<br>तब वे आँखोंमें आँसू भरकर उसपर हाथ फेरते हुए<br>बोले—॥ ३० ॥ "हे जटायो ! कहो, मेरी सुमुखी<br>भार्या सीताजीको कौन ले गया है ? अहो ! तुम मेरे<br>कार्यके लिये मारे गये ! अतः अवश्य ही तुम मेरे प्रिय<br>बन्धु हो" ॥ ३१ ॥
१३८अध्यात्मरामायण[सर्ग ८

मूल श्लोक:

जटायुः सन्नया वाचा वक्त्राद्रक्तं समुद्वमन् ।
उवाच रावणो राम राक्षसो भीमविक्रमः ॥ ३२॥
आदाय मैथिलीं सीतां दक्षिणाभिमुखो ययौ ।
इतो वक्तुं न मे शक्तिः प्राणांस्त्यक्ष्यामि तेऽग्रतः ॥३३॥
दिष्ट्या दृष्टोऽसि राम त्वं म्रियमाणेन मेऽनघ ।
परमात्माऽसि विष्णुस्त्वं मायामानुषरूपधृक् ॥३४॥
अन्तकालेऽपि दृष्ट्वा त्वां मुक्तोऽहं रघुसत्तम ।
हस्ताभ्यां स्पृश मां राम पुनर्यास्यामि ते पदम् ॥ ३५॥
तथेति रामः पस्पर्श तदङ्गं पाणिना स्मयन् ।
ततः प्राणान्परित्यज्य जटायुः पतितो भुवि ॥३६॥
रामस्तमनुशोचित्वा बन्धुवत्साश्रुलोचनः ।
लक्ष्मणेन समानाय्य काष्ठानि प्रददाह तम् ॥३७॥
स्नात्वा दुःखेन रामोऽपि लक्ष्मणेन समन्वितः ।
हत्वा वने मृगं तत्र मांसखण्डान्समन्ततः ॥३८॥
शाद्वले प्राक्षिपद्रामः पृथक् पृथगनेकधा ।
भक्षन्तु पक्षिणः सर्वे तृप्तो भवतु पक्षिराट् ॥३९॥
इत्युक्त्वा राघवः प्राह जटायो गच्छ मत्पदम् ।
मत्सारूप्यं भजस्वाद्य सर्वलोकस्य पश्यतः ॥४०॥
ततोऽनन्तरमेवासौ दिव्यरूपधरः शुभः ।
विमानवरमारुह्य भास्वरं भानुसन्निभम् ॥४१॥
शङ्खचक्रगदापद्मकिरीटवरभूषणैः ।
द्योतयन्स्वप्रकाशेन पीताम्बरधरोऽमलः ॥४२॥
चतुर्भिः पार्षदैर्विष्णोस्तादृशैरेभिपूजितः ।
स्तूयमानो योगिगणै राममाभाष्य सत्वरः ।
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा तुष्टाव रघुनन्दनम् ॥४३॥

जटायुरुवाच
अगणितगुणमप्रमेयमाद्यं
सकलजगत्स्थितिसंयमादिहेतुम् ।


हिन्दी अनुवाद:

जटायुने रक्त वमन करते हुए लड़खड़ाती बोलीमें कहा—"हे राम ! महापराक्रमी राक्षसराज रावण मिथिलेशनान्दिनी सीताको दक्षिणकी ओर ले गया है। और अधिक कहनेकी मुझमें शक्ति नहीं है। मैं अभी आपके सामने ही प्राण छोड़ना चाहता हूँ ॥३२-३३॥ हे राम ! आज बड़े भाग्यसे मैंने मरते समय आपको देख पाया है। हे अनघ ! आप मायामानवरूप साक्षात् परमात्मा विष्णु ही हैं ॥ ३४ ॥ हे रघुश्रेष्ठ ! वैसे तो अन्त समय आपका दर्शन करनेसे ही मैं मुक्त हो गया, तथापि आप मुझे अपने करकमलोंसे स्पर्श कीजिये । फिर मैं आपके परमपदको जाऊँगा" ॥ ३५ ॥

तब रामचन्द्रजीने मुसकाते हुए 'बहुत अच्छा' कह उसका शरीर अपने करकमलोंसे छुआ । तदनन्तर जटायु प्राण छोड़कर पृथिवीपर गिर पड़ा ॥ ३६ ॥ रामचन्द्रजीने नेत्रोंमें जल भरकर उसके लिये अपने स्वजनके समान शोक करते हुए लक्ष्मणसे लकड़ियां मँगवा उसका दाह-कर्म किया ॥ ३७ ॥

तत्पश्चात् रामजीने लक्ष्मणके सहित दुःखितचित्तसे स्नान किया और वनमें एक मृग मारकर घासपर सब ओर अलग-अलग उसके अनेकों मांसखण्ड बिखेर दिये । 'इन्हें सब पक्षिगण खायँ और उनसे पक्षिराज जटायु तृप्त हों' ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजी बोले-“जटायो ! तुम मेरे परमपदको जाओ और आज सबके देखते-देखते मेरा सारूप्य प्राप्त करो" ॥ ३८-४० ॥ तदनन्तर वह तुरन्त ही सुन्दर दिव्य रूप धारण कर एक सूर्य-सदृश प्रकाशमान विमानपर आरूढ हुआ ॥ ४१ ॥

उस समय वह सुन्दर पीताम्बर धारण किये शंख, चक्र, गदा, पद्म और किरीट आदि श्रेष्ठ आभूषणोंके सहित अपने प्रकाशसे (सम्पूर्ण दिशाओंको) प्रकाशित कर रहा था ॥ ४२ ॥ वैसे ही वेष-भूषावाले चार विष्णु-पार्षद उसकी सेवा कर रहे थे तथा योगिगण उसकी स्तुति कर रहे थे। तदनन्तर वह हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजीको सम्बोधन कर उनकी स्तुति करने लगा।४३।

जटायु बोला—"जो अगणित गुणशाली हैं, अप्रमेय हैं, जगत्के आदिकारण हैं, तथा उसकी स्थिति और लय आदिके हेतु हैं उन परम शान्त-स्वरूप परमात्मा

सर्ग ८ ]अरण्यकाण्ड१३९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उपरमपरं परात्मभूतं<br>सततमहं प्रणतोऽस्मि रामचन्द्रम् ॥४४॥श्रीरामचन्द्रजीकी मैं निरन्तर वन्दना करता हूँ ॥ ४४ ॥
निरवधिसुखमिन्दिराकटाक्षं<br>क्षपितसुरेन्द्रचतुर्मुखादिदुःखम् ।<br>नरवरमनिशं नतोऽस्मि रामं<br>वरदमहं वरचापबाणहस्तम् ॥४५॥जो असीम आनन्दमय और श्रीकमलादेवीके कटाक्षके आश्रय हैं तथा जो ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवगणोंका दुःख दूर करनेवाले हैं उन धनुष-बाणधारी वरदायक नरश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीको मैं अहर्निश प्रणाम करता हूँ ॥ ४५ ॥
त्रिभुवनकमनीयरूपमीड्यं<br>रविशतभासुरमीहितप्रदानम् ।<br>शरणदमनिशं सुरागमूले<br>कृतनिलयं रघुनन्दनं प्रपद्ये ॥४६॥जो त्रिलोकीमें सबसे अधिक रूपवान् हैं, सबके स्तुत्य हैं, सैकड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी हैं तथा वाञ्छित फल देनेवाले हैं उन शरणप्रद और रागाश्रित हृदयमें रहनेवाले श्रीरघुनाथजीको मैं अहर्निश प्रणाम करता हूँ ॥ ४६ ॥
भवविपिनदवाग्निनामधेयं<br>भवमुखदैवतदैवतं दयालुम् ।<br>दनुजपतिसहस्रकोटिनाशं<br>रवितनयासदृशं हरिं प्रपद्ये ॥४७॥जिनका नाम संसाररूप वनके लिये दावानलके समान है, जो महादेव आदि देवताओंके भी पूज्य देव हैं तथा जो करोड़ों दानवेन्द्रोंका दलन करनेवाले और श्रीयमुनाजीके समान श्यामवर्ण हैं उन दयामय श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ ॥४७॥
अविरतभवभावनातिदूरं<br>भवविमुखैर्मुनिभिः सदैव दृश्यम् ।<br>भवजलधिसुतारणाङ्घ्रिपोतं<br>शरणमहं रघुनन्दनं प्रपद्ये ॥४८॥जो संसारमें निरन्तर वासना रखनेवालोंसे अत्यन्त दूर हैं और संसारसे उपराम मुनिजनोंके सदैव दृष्टिगोचर रहते हैं तथा जिनके चरणरूप पोत (जहाज) संसारसागरसे पार करनेवाले हैं उन रघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ४८ ॥
गिरिशगिरिसुतामनोनिवासं<br>गिरिवरधारिणमीहिताभिरामम् ।<br>सुरवरदनुजेन्द्रसेविताङ्घ्रिं<br>सुरवरदं रघुनायकं प्रपद्ये ॥४९॥जो श्रीमहादेव और पार्वतीजीके मन-मन्दिरमें निवास करते हैं, जिनकी लीलाएँ अति मनोहारिणी हैं तथा देव और असुरपतिगण जिनके चरण-कमलोंकी सेवा करते हैं उन गिरिवरधारी सुरवरदायक रघुनायककी मैं शरण लेता हूँ ॥ ४९ ॥
परधनपरदारवर्जितानां<br>परगुणभूतिषु तुष्टमानसानाम् ।<br>परहितनिरतात्मनां सुसेव्यं<br>रघुवरमम्बुजलोचनं प्रपद्ये ॥५०॥जो परधन और परस्त्रीसे सदा दूर रहते हैं तथा पराये गुण और परायी विभूतिको देखकर प्रसन्न होते हैं उन निरन्तर परोपकार-परायण महात्माओंसे सुसेवित कमलनयन श्रीरघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ५० ॥
स्मितरुचिरविकासिताननाब्ज-<br>मतिसुलभं सुरराजनीलनीलम् ।<br>सितजलरुहचारुनेत्रशोभं<br>रघुपतिमीशगुरोर्गुरुं प्रपद्ये ॥५१॥जिनका मुखकमल मनोहर मुसकानसे सुशोभित हो रहा है, जो भक्तोंके लिये अति सुलभ हैं, जिनके शरीरकी कान्ति इन्द्रनीलमणिके समान सुन्दर नीलवर्ण है; तथा जिनके मनोहर नेत्र श्वेत कमलकी-सी शोभावाले हैं उन महादेवजीके परम गुरु श्रीरघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ५१ ॥
हरिकमलजशम्भुरूपभेदा-<br>त्त्वमिह विभासि गुणत्रयानुवृत्तः ।हे प्रभो ! जलसे भरे हुए पात्रोंमें जैसे एक ही सूर्य प्रतिबिम्बित होता है वैसे ही सत्त्व, रज और तम-इन तीनों गुणोंकी वृत्तिके कारण

अरण्यकाण्ड - सर्ग ९: कबन्धोद्धार

१४०अध्यात्मरामायण[सर्ग ९
रविरिव जलपूरितोदपात्रे- <br>   ष्वामरपतिस्तुतिपात्रमीशमीडे ॥५२॥आप ही विष्णु, ब्रह्मा और महादेवके रूपसे भासित होते हैं। हे ईश ! आप देवराज इन्द्रकी भी स्तुतिके पात्र हैं, मैं आपकी स्तुति करता हूँ ॥ ५२ ॥
रतिपतिशतकोटिसुन्दराङ्गं <br>   शतपथगोचरभावनाविदूरम् । <br> यतिपतिहृदये सदा विभातं <br>   रघुपतिमार्तिहरं प्रभुं प्रपद्ये ॥५३॥आपका दिव्य शरीर करोड़ों कामदेवोंसे भी सुन्दर है, सैकड़ों मार्गोंमें फँसे हुए लोगोंसे आप अत्यन्त दूर हैं और योगिराजोंके हृदयमें आप सदा ही भासमान हैं। ऐसे आप आर्तिहर प्रभु रघुपतिकी मैं शरण लेता हूँ” ॥ ५३ ॥
इत्येवं स्तुवतस्तस्य प्रसन्नोऽभूद्रघूत्तमः । <br> उवाच गच्छ भद्रं ते मम विष्णोः परं पदम् ॥५४॥जटायुके इस प्रकार स्तुति करनेपर श्रीरघुनाथजी उसपर प्रसन्न होकर बोले, “जटायो ! तुम्हारा कल्याण हो तुम मेरे परमधाम विष्णुलोकको जाओ ॥ ५४ ॥
शृणोति य इदं स्तोत्रं लिखेद्वा नियतः पठेत् । <br> स याति मम सारूप्यं मरणे मत्स्मृतिं लभेत् ॥५५॥जो पुरुष मेरे इस स्तोत्रको एकाग्रचित्तसे सुनता, लिखता अथवा पढ़ता है वह मेरा सारूप्य-पद प्राप्त करता है और मरते समय उसे मेरा स्मरण होता है” ॥५५॥
इति राघवभाषितं तदा <br>   श्रुतवान् हर्षसमाकुलो द्विजः । <br> रघुनन्दनसाम्यमास्थितः <br>   प्रययौ ब्रह्मसुपूजितं पदम् ॥५६॥पक्षिराज जटायुने रघुनाथजीका यह कथन बड़े हर्षसे सुना और उन्हींके समान रूप धारण कर ब्रह्मा आदि लोकपालोंसे पूजित परमधामको चला गया ॥ ५६ ॥
<div align="center">

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे अष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥

नवम सर्ग

कबन्धोद्धार ।

</div>
श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले—
ततो रामो लक्ष्मणेन जगाम विपिनान्तरम् । <br> पुनर्दुःखं समाश्रित्य सीतान्वेषणतत्परः ॥ १ ॥हे पार्वति ! तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी दुःखित-चित्तसे सीताजीको खोजते हुए लक्ष्मणजीके साथ दूसरे वनको गये ॥ १ ॥
तत्राद्भुतसमाकारो राक्षसः प्रत्यदृश्यत । <br> वक्षस्येव महावक्त्रश्चक्षुरादिविवर्जितः ॥ २ ॥वहाँ उन्होंने एक बड़े ही विचित्र आकारका राक्षस देखा, जिसके वक्षःस्थलमें ही नेत्रादिसे रहित एक बड़ा भारी मुख था ॥ २ ॥
बाहू योजनमात्रेण व्यापृतौ तस्य रक्षसः । <br> कबन्धो नाम दैत्येन्द्रः सर्वसत्वविहिंसकः ॥ ३ ॥इस राक्षसकी भुजाएँ एक-एक योजन-तक फैली हुई थीं। यह सम्पूर्ण प्राणियोंकी हिंसा करनेवाला 'कबन्ध' नामक दैत्यराज था ॥ ३ ॥
तद्बाहोर्मध्यदेशे तौ चरन्तौ रामलक्ष्मणौ । <br> ददर्शतुर्महासत्वं तद्बाहुपरिवेष्टितौ ॥ ४ ॥उसकी भुजाओंके बीचमें चलते हुए उनसे घिरे हुए राम और लक्ष्मणने उस महाबलवान् राक्षसको देखा ॥ ४ ॥
रामः प्रोवाच विहसन्पश्य लक्ष्मण राक्षसम् ।तब रामचन्द्रजीने हँसते हुए कहा—“लक्ष्मण !

सर्ग ९ ] अरण्यकाण्ड १४१

शिरःपादविहीनोऽयं यस्य वक्षसि चाननम् ॥ ५ ॥<br>बाहुभ्यां लभ्यते यद्यत्तत्तद्भक्षन् स्थितो ध्रुवम् ।<br>आवामप्येतयोर्बाह्वोर्मध्ये सङ्कलितौ ध्रुवम् ॥ ६ ॥<br>गन्तुमन्यत्र मार्गो न दृश्यते रघुनन्दन ।<br>किं कर्तव्यमितोऽस्माभिरिदानीं भक्षयेत्स नौ ॥७॥<br>लक्ष्मणस्तमुवाचेदं किं विचारेण राघव ।<br>आवामेकैकमन्यग्रौ छिन्द्यावास्य भुजौ ध्रुवम् ॥८॥<br>तथेति रामः खड्गेन भुजं दक्षिणमाच्छिनत् ।<br>तथैव लक्ष्मणो वामं चिच्छेद भुजमञ्जसा ॥ ९ ॥<br>ततोऽतिविस्मितो दैत्यः कौ युवां सुरपुङ्गवौ ।<br>मद्वाहुच्छेदकौ लोके दिवि देवेषु वा कुतः ॥१०॥इस राक्षसको देखो; यह शिर-पैरसे रहित है और इसकी छातीमें ही मुँह है ॥ ५ ॥ अपनी भुजाओंसे ही इसे जो कुछ मिल जाता है उसीको खाकर यह जीवित रहता है। हम भी निश्चय ही इसकी भुजाओंके बीचमें फँस गये हैं ॥ ६ ॥ हे रघुनन्दन ! इनके चंगुलमेंसे निकलनेका हमें कोई मार्ग दिखायी नहीं देता; अब हमें क्या करना चाहिये ? (जल्दी विचार करो नहीं तो) यह हमें अभी खा जायगा" ॥ ७ ॥<br>लक्ष्मणजीने कहा—"हे राघव ! इसमें अधिक विचारनेकी क्या बात है ? हम दोनों सावधान होकर अभी इसकी एक-एक भुजा काट डालें" ॥ ८ ॥ रामचन्द्रजीने कहा 'बहुत ठीक', और खड्ग निकालकर उसकी दायीं भुजा काट डाली। वैसे ही लक्ष्मणजीने भी तुरन्त ही उसकी बायीं भुजा उड़ा दी ॥ ९ ॥<br>तब उस दैत्यराजने अति विस्मयपूर्वक कहा—"मेरी भुजाओंको काटनेवाले तुम कौन देवश्रेष्ठ हो ? इस लोकमें अथवा स्वर्गवासी देवताओंमें भी कोई ऐसा (समर्थ) होना सम्भव नहीं" ॥ १० ॥
ततोऽब्रवीद्धसन्नेव रामो राजीवलोचनः ।<br>अयोध्याधिपतिः श्रीमान् राजा दशरथो महान् ११<br>रामोऽहं तस्य पुत्रोऽसौ भ्राता मे लक्ष्मणः सुधीः ।<br>मम भार्या जनकजा सीता त्रैलोक्यसुन्दरी ॥१२॥<br>आवां मृगयया यातौ तदा केनापि रक्षसा ।<br>नीतां सीतां विचिन्वन्तौ चागतौ घोरकानने ॥१३॥<br>बाहुभ्यां वेष्टितावत्र तव प्राणरिरक्षया ।<br>छिन्नौ तव भुजौ त्वं च को वा विकटरूपधृक् ॥१४॥इसपर कमलनयन श्रीरामचन्द्रजीने हँसते हुए कहा—"श्रीमान् महाराज दशरथ अयोध्याके स्वामी थे ॥ ११ ॥ मैं उन्हींका पुत्र 'राम' हूँ और यह बुद्धिमान् मेरा छोटा भाई 'लक्ष्मण' है तथा त्रैलोक्यसुन्दरी जनकनन्दिनी सीता मेरी भार्या है ॥ १२ ॥ हम मृगया (शिकार) के लिये बाहर गये हुए थे कि किसी राक्षसने सीताको चुरा लिया, उसीको ढूँढ़ते हुए हम यहाँ इस घोर वनमें आ गये। इतनेहीमें तुमने हमें अपनी भुजाओंसे घेर लिया। तब हमने अपने प्राण बचानेके लिये तुम्हारी भुजाएँ काट डालीं। अब यह बताओ—ऐसे विकट रूपवाले तुम कौन हो ? ॥ १३-१४ ॥
कबन्व उवाच<br>धन्योऽहं यदि रामस्त्वमागतोऽसि ममान्तिकम् ।<br>पुरा गन्धर्वराजोऽहं रूपयौवनदर्पितः ॥१५॥<br>विचरँल्लोकमखिलं वरनारीमनोहरः ।कबन्धनें कहा—"हे राम ! यदि आज आप स्वयं मेरे पास आये हैं तो मैं धन्य हूँ। पूर्वकालमें मैं रूप और यौवनके मदसे उन्मत्त एक गन्धर्वराज था ॥ १५ ॥ हे रघुकुलश्रेष्ठ ! मैंने तपस्याद्वारा ब्रह्माजीसे अवध्यता (किसीसे भी न मारे जा सकनेकी योग्यता) प्राप्त कर ली थी और मैं अपनी रूपकान्तिसे सुन्दर
१४२अध्यात्मरामायण[सर्ग ९

तपसा ब्रह्मणो लब्धमवध्यत्वं रघूत्तम ॥१६॥
अष्टावक्रं मुनिं दृष्ट्वा कदाचिदहसं पुरा ।
क्रुद्धोऽसावाह दुष्ट त्वं राक्षसो भव दुर्मते ॥१७॥
अष्टावक्रः पुनः प्राह वन्दितो मे दयापरः ।
शापस्यान्तं च मे प्राह तपसा द्योतितप्रभः ॥१८॥
त्रेतायुगे दाशरथिर्भूत्वा नारायणः स्वयम् ।
आगमिष्यति ते वाहू च्छेद्येते योजनायतौ ॥१९॥
तेन शापाद्विनिर्मुक्तो भविष्यसि यथा पुरा ।
इति शप्तोऽहमद्राक्षं राक्षसीं तनुमात्मनः॥२०॥
कदाचिद्देवराजानमभ्याद्रवमहं रुषा ।
सोऽपि वज्रेण मां राम शिरोदेशेऽभ्यताडयत् ॥२१॥
तदा शिरो गतं कुक्षिं पादौ च रघुनन्दन ।
ब्रह्मदत्तवरान्मृत्युर्नाभून्मे वज्रताडनात् ॥२२॥
मुखाभावे कथं जीवेदियमित्ममराधिपम् ।
ऊचुः सर्वे दयाविष्टा मां विलोक्यास्यवर्जितम् २३
ततो मां प्राह मघवा जठरे ते मुखं भवेत् ।
वाहू ते योजनायामौ भविष्यत इतो व्रज ॥२४॥
इत्युक्तोऽत्र वसन्नित्यं बाहुभ्यां वनगोचरान् ।
भक्षयाम्यधुना वाहू खण्डितौ मे त्वयाऽनघ ॥२५॥
इतःपरं मां श्वभ्रास्ये निक्षिप्याग्नीन्धनावृते ।
अग्निना दह्यमानोऽहं त्वया रघुकुलोत्तम ॥२६॥
पूर्वरूपमनुप्राप्य भार्यामार्गं वदामि ते ।
इत्युक्ते लक्ष्मणेनाशु श्वभ्रं निर्माय तत्र तम् ॥२७॥
निक्षिप्य प्रादहत्काष्ठैस्ततो देहात्समुत्थितः ।
कन्दर्पसदृशाकारः सर्वाभरणभूषितः ॥२८॥
रामं प्रदक्षिणं कृत्वा साष्टाङ्गं प्रणिपत्य च ।

स्त्रियोंके चित्तोंको चुराता हुआ सम्पूर्ण लोकोंमें भ्रमा करता था ॥ १६ ॥ एक बार अष्टावक्र मुनिको देखकर मैं हँस पड़ा, अतः उन्होंने क्रोधित होकर कहा— "अरे दुर्बुद्धे ! तू बड़ा दुष्ट है, अतः तू राक्षस हो जा" ॥ १७ ॥ उनके शापसे भयभीत होकर जब मैंने उनकी बहुत कुछ अनुनय-विनय की तो तपके कारण परम तेजस्वी उन दयालु मुनीश्वरने मेरे शापका अन्त इस प्रकार बताया ॥ १८ ॥ वे बोले, "त्रेतायुगमें स्वयं नारायण दशरथके यहाँ अवतार लेकर तेरे पास आयेंगे और वे तेरी एक-एक योजन लम्बी भुजाओंको काट डालेंगे ॥ १९ ॥ तब तू शापसे छूटकर अपना पूर्वरूप धारण करेगा।" उनके इस प्रकार शाप देनेसे मैंने अपनेको राक्षसरूपमें देखा ॥ २० ॥

एक बार मैं रोषपूर्वक देवराज इन्द्रके पीछे दौड़ा। तब उसने क्रोधित होकर मेरे शिरपर अपना वज्र मारा ॥ २१ ॥ हे रघुनन्दन ! उस वज्रके आघातसे मेरे शिर और पैर पेटमें घुस गये किन्तु ब्रह्माजीके वरके प्रभावसे मैं मरा नहीं ॥ २२ ॥ मुझे मुखहीन देखकर समस्त देवताओंने दयावश हो देवराजसे कहा— "यह बिना मुखके कैसे जीवित रह सकेगा ?" ॥ २३ ॥ तब इन्द्रने मुझसे कहा— "तेरे पेटमें ही मुख होगा और तेरी भुजाएँ एक-एक योजन लम्बी हो जायँगी, अब तू यहाँसे चला जा" ॥ २४ ॥ इन्द्रके ऐसा कहनेपर मैं यहीं रहकर नित्यप्रति अपनी भुजाओंसे वनके जीवोंको खींचकर खाता रहा हूँ। हे अनघ ! अब उन भुजाओंको आपने काट डाला ॥ २५ ॥ हे रघुकुलश्रेष्ठ ! अब आप मुझे एक अग्नि और ईंधनसे युक्त गड्ढेमें डाल दीजिये । आपके द्वारा अग्निसे दग्ध होनेपर अपना पूर्वरूप धारण कर मैं आपकी भार्याका पता बताऊँगा ।

उसके इस प्रकार कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे तुरन्त ही एक बड़ा गड्ढा तैयार कराया और उसे उसमें डालकर लकड़ियोंसे जला दिया। तब उसके शरीरसे एक सर्वालंकारविभूषित कामदेवके समान अति सुन्दर पुरुष प्रकट हुआ ॥ २६–२८ ॥ उसने रामचन्द्रजीकी परिक्रमा कर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और भक्तिसे