अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
उत्तरकाण्ड - सर्ग ९: महाप्रयाण
सर्ग ९] उत्तरकाण्ड ३८१
| शास्त्राणि शस्त्राणि धनुश्च बाणां<br>जग्मुः पुरस्ताद्धृतविग्रहास्ते ॥४०॥<br>वेदाश्च सर्वे धृतविग्रहाश्च<br>ययुश्च सर्वे मुनयश्च दिव्याः ।<br>माता श्रुतीनां प्रणवेन साध्वी<br>ययौ हरिं व्याहृतिभिः समेता ॥४१॥ | चली । भगवान्के आगे सम्पूर्ण शास्त्र, शस्त्र और उनके धनुष-बाण मूर्तिमान् होकर चले ॥ ४० ॥ इसी प्रकार समस्त वेद, समस्त दिव्य मुनिजन तथा ॐकार और व्याहृतियोंके सहित वेदमाता गायत्री—ये सब भी शरीर धारण कर श्रीहरिके साथ चले ॥ ४१ ॥ |
| गच्छन्तमेवानुगता जनास्ते<br>सपुत्रदाराः सह बन्धुवर्गैः ।<br>अनावृतद्वारमिवापवर्गं<br>रामं व्रजन्तं ययुराप्तकामाः ।<br>सान्तःपुरः सानुचरः सभार्यः<br>शत्रुघ्नयुक्तो भरतोऽनुयातः ॥४२॥ | इस प्रकार रघुनाथजीके चलनेपर अपने बन्धु-बान्धव और स्त्री-पुत्रादिके सहित समस्त पुरजन इस प्रकार चले मानो सफलमनोरथ हो स्वर्गके खुले द्वारको जाते हों । फिर रनवास, सेवकगण, स्त्री और शत्रुघ्नके सहित भरतजी भी चले ॥ ४२ ॥ |
| गच्छन्तमालोक्य रमासमेतं<br>श्रीराघवं पौरजनाः समस्ताः ।<br>सवालवृद्धाश्च ययुर्द्विजाग्र्याः<br>सामात्यवर्गाश्च समन्त्रिणो ययुः ॥४३॥ | रघुनाथजीको लक्ष्मीजीके सहित जाते देख बालक और वृद्धोंके सहित समस्त पुरजन तथा अमात्य और मन्त्रियोंके सहित समस्त ब्राह्मणगण चले ॥ ४३ ॥ |
| सर्वे गताः क्षत्रमुखाः प्रहृष्टा<br>वैश्याश्च शूद्राश्च तथा परे च ।<br>सुग्रीवमुख्या हरिपुङ्गवाश्च<br>स्नाता विशुद्धाः शुभशब्दयुक्ताः ॥४४॥ | उनके पश्चात् मुख्य-मुख्य क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अन्य अन्त्यजादि सभी लोग अति हर्षपूर्वक चले । फिर सुग्रीवादि श्रेष्ठ वानरगण स्नानादिसे शुद्ध हो ('श्रीरामचन्द्रजीकी' जय आदि) मंगलमय शब्द करते हुए चले ॥४४॥ |
| न कश्चिदासीद्भवदुःखयुक्तो<br>दीनोऽथवा बाह्यसुखेषु सक्तः ।<br>आनन्दरूपानुगता विरक्ता<br>ययुश्च रामं पशुभृत्यवर्गैः ॥४५॥ | (उनमेंसे) कोई भी संसार-दुःखसे दुःखी, दीन अथवा बाह्य विषयोंमें आसक्त नहीं था । वे सभी परमानन्दरूप भगवान् रामके अनुगामी संसारसे उपराम होकर अपने पशु और नौकर-चाकरोंके सहित रघुनाथजीके साथ चले गये ॥ ४५ ॥ |
| भूतान्यदृश्यानि च यानि तत्र<br>ये प्राणिनः स्थावरजङ्गमाश्च ।<br>साक्षात्परात्मानमनन्तशक्तिं<br>जग्मुर्विरक्ताः परमेकमीशम् ॥४६॥ | जो प्राणी कभी दिखलायी नहीं पड़ते थे तथा जितने स्थावर और जंगम जीव थे वे सभी संसारसे विरक्त होकर एकमात्र परमेश्वर अनन्तशक्ति साक्षात् परमात्मा रामके साथ चले ॥ ४६ ॥ |
| नासीदयोध्यानगरे तु जन्तुः<br>कश्चित्तदा राममना न यातः ।<br>शून्यं बभूवाखिलमेव तत्र<br>पुरं गते राजनि रामचन्द्रे ॥४७॥ | उस समय अयोध्यामें ऐसा कोई जीव नहीं था जो भगवान् राममें चित्त लगाकर उनका अनुगामी न हुआ हो । महाराज रामचन्द्रके कूच करते ही वह सारा नगर सूना हो गया ॥ ४७ ॥ |
| ततोऽतिदूरं नगरात्स गत्वा<br>दृष्ट्वा नदीं तां हरिनेत्रजाताम् ।<br>ननन्द रामः स्मृतपावनोऽतो<br>ददर्श चाशेषमिदं हृदिस्थम् ॥४८॥ | नगरसे बहुत दूर निकल जानेपर श्रीरघुनाथजीने विष्णुभगवान्के नेत्रसे प्रकट हुई (सरयू) नदी देखी । उसे देखकर भगवान् बड़े प्रसन्न हुए और उन्हें अपने विशुद्ध स्वरूपकी स्मृति हो आयी; अतः वे इस सम्पूर्ण जगत्को अपने हृदयमें स्थित देखने लगे ॥ ४८ ॥ |
| ३८२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ९ |
|---|
| अथागतस्तत्र पितामहो महान्<br>देवाश्च सर्वे ऋषयश्च सिद्धाः ।<br>विमानकोटीभिरपारपारं<br>समावृतं खं सुरसेविताभिः ॥४९॥<br>रविप्रकाशाभिरभिस्फुरत्स्वं<br>ज्योतिर्मयं तत्र नभो बभूव ।<br>स्वयंप्रकाशैर्महतां महद्भिः<br>समावृतं पुण्यकृतां वरिष्ठैः ॥५०॥ | इसी समय, वहाँ पितामह ब्रह्माजी तथा अन्य समस्त देवता, ऋषि और सिद्धगण आये । उस समय जिनमें देवगण विराजमान थे ऐसे सूर्यके समान तेजस्वी करोड़ों विमानोंसे अनन्तपार आकाश खचाखच भर गया । (उनके प्रकाशसे) प्रज्वलित होकर वह स्वयं भी देदीप्यमान हो उठा । (इनके अतिरिक्त पुण्यलोकोंसे आये हुए) पुण्यवानोंमें श्रेष्ठ तथा महात्माओंमें महान् स्वयंप्रकाशमय दिव्य पुरुषोंसे भी आकाश मानो ढँक गया ॥४९-५०॥ |
| ववुश्च वाताश्च सुगन्धवन्तो<br>ववर्ष वृष्टिः कुसुमावलीनाम् ।<br>उपस्थिते देवमृदङ्गनादे<br>गायत्सु विद्याधरकिन्नरेषु ॥५१॥<br>रामस्तु पद्भ्यां सरयूजलं सकृ-<br>त्स्पृष्ट्वा परिक्रामदनन्तशक्तिः ॥५२॥ | उस समय सुगन्धमय वायु चलने लगा और कुसुमसमूहोंकी (निरन्तर) वर्षा होने लगी । तब देवताओंका मृदंगनाद और विद्याधर तथा किन्नरोंका गान होते हुए अनन्तशक्ति भगवान् रामने एक बार सरयूजलका स्पर्श (आचमन) कर चरणोंसे उसकी परिक्रमा की ॥ ५१-५२ ॥ |
| ब्रह्मा तदा प्राह कृताञ्जलिस्तं<br>रामं परात्मन् परमेश्वरस्त्वम् ।<br>विष्णुः सदानन्दमयोऽसि पूर्णो<br>जानासि तत्त्वं निजमैशमेकम् ।<br>तथापि दासस्य ममाखिलेश<br>कृतं वचो भक्तपरोऽसि विद्वन् ॥५३॥ | उस समय,ब्रह्माजी हाथ जोड़कर भगवान् रामसे कहने लगे—"हे परमात्मन् ! आप सबके स्वामी, नित्यानन्दमय, सर्वत्र परिपूर्ण और साक्षात् विष्णुभगवान् हैं। अपने एकमात्र ईश्वरीय तत्त्वको आप ही जानते हैं। तथापि हे अखिलेश्वर ! आपने मुझ दासका निवेदन पूर्ण कर दिया, (सो ठीक ही है, क्योंकि) हे विद्वन् ! आप भक्तवत्सल हैं॥ ५३ ॥ |
| त्वं भ्रातृभिर्वैष्णवमेवमाद्यं<br>प्रविश्य देहं परिपाहि देवान् ।<br>यद्वा परो वा यदि रोचते तं<br>प्रविश्य देहं परिपाहि नस्त्वम् ॥५४॥ | हे प्रभो ! अब आप भाइयोंसहित अपने आदिविग्रह विष्णुदेहमें प्रविष्ट होकर देवताओंकी रक्षा कीजिये, अथवा यदि आपको कोई और शरीर प्रिय हो तो उसीमें प्रवेश करके हम सबका पालन कीजिये ॥ ५४ ॥ |
| त्वमेव देवाधिपतिश्च विष्णु-<br>र्जानान्ति न त्वां पुरुषा विना माम् ।<br>सहस्रकृत्वस्तु नमो नमस्ते<br>प्रसीद देवेश पुनर्नमस्ते ॥५५॥ | आप ही देवाधिपति विष्णुभगवान् हैं। इस बातको मेरे सिवा और कोई पुरुष नहीं जानता। हे देवेश ! आपको हजारों बार नमस्कार है, आप प्रसन्न होइये, आपको पुनः-पुनः नमस्कार है" ॥ ५५ ॥ |
| पितामहप्रार्थनया स रामः<br>पश्यत्सु देवेषु महाप्रकाशः ।<br>मुष्णंश्च चक्षूंषि दिवौकसां तदा<br>बभूव चक्रादियुतश्चतुर्भुजः ॥५६॥ | तब पितामह ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे महातेजोमय भगवान् राम सब देवताओंके देखते-देखते उनकी दृष्टिको चुराते हुए चक्रादि आयुधोंसे युक्त चतुर्भुजरूप हो गये ॥ ५६ ॥ लक्ष्मणजी अद्भुत फणा धारण कर भगवान्- |
सर्ग ९] उत्तरकाण्ड ३८३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शेषो बभूवेश्वरतल्पभूतः<br>सौमित्रिरत्यद्भुतभोगधारी ।<br>बभूवतुश्चक्रदरौ च दिव्यौ<br>कैकेयिसूनुर्लवणान्तकश्च ॥५७॥ | की शय्यारूप शेषनाग हो गये, तथा कैकेयीपुत्र भरत और लवणान्तक शत्रुघ्न दिव्य चक्र और शंख हो गये ॥ ५७ ॥ |
| सीता च लक्ष्मीर्भवत्पुरैव<br>रामो हि विष्णुः पुरुषः पुराणः ।<br>सहानुजः पूर्वशरीरकेण<br>बभूव तेजोमयदिव्यमूर्तिः ॥५८॥ | सीताजी तो पहले ही लक्ष्मीजी हो गयी थीं। भगवान् राम पुराणपुरुष विष्णुभगवान् ही हैं। वे भाइयोंके सहित अपने पूर्व-शरीरसे तेजोमय दिव्य-स्वरूपवाले हो गये ॥ ५८ ॥ |
| विष्णुं समासाद्य सुरेन्द्रमुख्या<br>देवाश्च सिद्धा मुनयश्च यक्षाः ।<br>पितामहाद्याः परितः परेशं<br>स्तवैर्गृणन्तः परिपूजयन्तः ॥५९॥<br>आनन्दसम्प्लावितपूर्णचित्ता<br>बभूविरे प्राप्तमनोरथास्ते ।<br>तदाह विष्णुर्द्रुहिणं महात्मा<br>एते हि भक्ता मयि चानुरक्ताः ॥६०॥ | फिर उन विष्णुभगवान्के पास चारों ओरसे इन्द्रादि देवता, सिद्ध, मुनि, यक्ष और ब्रह्मा आदि प्रजापतिगण आकर उन परमेश्वरकी स्तोत्रोंद्वारा स्तुति करते हुए पूजा करने लगे और अपना मनोरथ पूर्ण हो जानेसे मन-ही-मन आनन्दमग्न हो गये। तब महात्मा विष्णुभगवान्ने ब्रह्माजीसे कहा—"ये सब मेरे भक्त और मुझमें प्रीति रखनेवाले हैं ॥ ५९-६० ॥ |
| यान्तं दिवं मामनुयान्ति सर्वे<br>तिर्यक्शरीरा अपि पुण्ययुक्ताः ।<br>वैकुण्ठसाम्यं परमं प्रयान्तु<br>समाविशस्वाशु ममाज्ञया त्वम् ॥६१॥ | मेरे साथ ये सब भी स्वर्गलोकको जाना चाहते हैं। इनमें जो तिर्यक्शरीरधारी हैं वे भी बड़े पुण्यात्मा हैं। ये सब वैकुण्ठके समान उत्तम लोकोंको प्राप्त हों; मेरी आज्ञासे तुम शीघ्र वहाँ इनका प्रवेश करा दो" ॥ ६१ ॥ |
| श्रुत्वा हरेर्वाक्यमथाब्रवीत्कः<br>सान्तानिकान्यान्तु विचित्रभोगान् ।<br>लोकान्मदीयोपरि दीप्यमानां-<br>स्त्वद्भक्तियुक्ताः कृतपुण्यपुञ्जाः ॥६२॥ | भगवान्के ये वचन सुनकर ब्रह्माजीने कहा—"भगवन् ! आपकी भक्तिसे युक्त ये महापुण्यशाली लोग मेरे लोकसे भी ऊपर अत्यन्त दीप्तिशाली और विचित्र भोगोंसे सम्पन्न सान्तानिक लोकोंको प्राप्त हों ॥ ६२ ॥ |
| ये चापि ते राम पवित्रनाम<br>गृणन्ति मर्त्या लयकाल एव ।<br>अज्ञानतो वापि भजन्तु लोकां-<br>स्तानेव योगैरपि चाधिगम्यान् ॥६३॥ | हे राम ! और भी जो लोग मरनेके समय ही आपका पवित्र नाम लेंगे अथवा जो भूलकर भी आपका भजन करेंगे वे भी योगियोंको प्राप्त होनेयोग्य उन्हीं लोकोंको जायेंगे" ॥ ६३ ॥ |
| ततोऽतिहृष्टा हरिराक्षसाद्याः<br>स्पृष्ट्वा जलं त्यक्तकलेवरास्ते ।<br>प्रपेदिरे प्राक्तनमेव रूपं<br>यदंशजा ऋक्षहरीश्वरास्ते ॥६४॥ | यह सुनकर समस्त वानर और राक्षसादि अति प्रसन्न हुए और जलस्पर्श करके शरीर छोड़ने लगे। ये रीछ और वानर आदि जिस-जिसके अंशसे उत्पन्न हुए थे उस-उस देवताके पूर्वरूपको ही प्राप्त हो गये ॥ ६४ ॥ |
| प्रभाकरं प्राप हरिप्रवीरः<br>सुग्रीव आदित्यजवीर्यवत्त्वात् ॥६५॥ | वानरराज सुग्रीव सूर्यके वीर्यसे उत्पन्न हुए थे अतः वे सूर्यमें लीन हो गये ॥ ६५ ॥ तदनन्तर |
| ३८४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ९ |
|---|
ततो विमग्नाः सरयूजलेषु
नराः परित्यज्य मनुष्यदेहम् ।
आरुह्य दिव्याभरणा विमानं
प्रापुश्च ते सान्तनिकाख्यलोकान् ॥६६॥
अयोध्या-निवासी लोग सरयूके जलमें डूब-डूबकर मनुष्य देहको त्याग दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो विमानोंपर चढ़कर सान्तनिक नामक लोकोंमें पहुँच गये ॥६६॥
तिर्यक्प्रजाता अपि रामदृष्टा
जलं प्रविष्टा दिवमेव याताः ।
दिदृक्षवो जानपदाश्च लोका
रामं समालोक्य विमुक्तसङ्गाः ।
स्मृत्वा हरिं लोकगुरुं परेशं
स्पृष्ट्वा जलं स्वर्गमवापुरञ्जः ॥६७॥
जो तिर्यक् योनियोंमें उत्पन्न हुए थे वे (कूकुर-शूकर आदि) भी भगवान् रामकी दृष्टि पड़नेसे जलमें डूबकर स्वर्गलोकको ही चले गये। जो देशवासी लोग यह सब कौतुक देखनेके लिये आये थे वे भी श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन कर संसारकी आसक्तिको छोड़ लोकगुरु परमेश्वर भगवान् विष्णुका स्मरण करते हुए जलस्पर्श कर अनायास स्वर्गको चले गये ॥ ६७ ॥
एतावदेवोत्तरमाह शम्भुः
श्रीरामचन्द्रस्य कथावशेषम् ।
यः पादमप्यत्र पठेत्स पापा-
द्विमुच्यते जन्मसहस्रजातात् ॥६८॥
श्रीमहादेवजीने भगवान् रामकी कथाका परिशिष्ट रूप यह इतना ही उत्तरकाण्ड कहा है। जो पुरुष इसका एक पाद (चौथाई श्लोक) भी पढ़ता है वह अपने हजारों जन्मोंके पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ६८॥
दिने दिने पापचयं प्रकुर्वन्
पठेन्नरः श्लोकमपीह भक्त्या ।
विमुक्तसर्वाघचयः प्रयाति
रामस्य सालोक्यमनन्यलभ्यम् ॥६९॥
नित्यप्रति अनेकों पाप करनेवाला पुरुष यदि भक्तिपूर्वक इसका एक श्लोक भी पढ़े तो सम्पूर्ण पापराशिसे छूटकर श्रीरामके सालोक्य-पदको प्राप्त हो जाता है, जो दूसरोंके लिये अलभ्य है॥ ६९॥
आख्यानमेतद्रघुनायकस्य
कृतं पुरा राघवचोदितेन ।
महेश्वरेणाप्तभविष्यदर्थं
श्रुत्वा तु रामः परितोषमेति ॥७०॥
श्रीरघुनाथजीकी प्रेरणासे उनकी इस कथाको, जिसमें भविष्य चरित्रोंका ही वर्णन किया गया है, पहले श्रीमहादेवजीने रचा था। इसको सुनकर श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न होते हैं ॥ ७०॥
रामायणं काव्यमनन्तपुण्यं
श्रीशङ्करेणाभिहितं भवान्यै ।
भक्त्या पठेद्यः शृणुयात्स पापै-
र्विमुच्यते जन्मशतोद्भवैश्च ॥७१॥
रामायण नामक यह अनन्त पुण्यप्रद काव्य श्रीशंकरभगवान्ने पार्वतीजीसे कहा है। जो पुरुष इसे भक्तिपूर्वक पढ़ता अथवा सुनता है वह अपने सैकड़ों जन्मोंके पापपुञ्जसे मुक्त हो जाता है ॥ ७१ ॥
अध्यात्मरामं पठतश्च नित्यं
श्रोतुश्च भक्त्या लिखितुश्च रामः ।
अतिप्रसन्नश्च सदा समीपे
सीतासमेतः श्रियमातनोति ॥७२॥
इस अध्यात्मरामायणको नित्यप्रति पढ़ने, सुनने अथवा भक्तिपूर्वक लिखनेवालेसे अत्यन्त प्रसन्न होकर भगवान् राम सीताजीके सहित उसके पास रहकर उसकी श्रीवृद्धि करते हैं॥ ७२ ॥
सर्ग ९ ] उत्तरकाण्ड ३८५
| रामायणं जनमनोहरमादिकाव्यं<br>ब्रह्मादिभिः सुरवरैरपि संस्तुतं च।<br>श्रद्धान्वितः पठति यः शृणुयात्तु नित्यं<br>विष्णोः प्रयाति सदनं स विशुद्धदेहः॥७३॥ | ब्रह्मा आदि सुरश्रेष्ठोंसे प्रशंसित और मनुष्योंके मनको हरनेवाले इस आदिकाव्य रामायणको जो पुरुष नित्यप्रति श्रद्धापूर्वक पढ़ता या सुनता है वह विशुद्ध शरीर धारण कर भगवान् विष्णुके धामको प्राप्त होता है ॥ ७३ ॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
उत्तरकाण्डे नवमः सर्गः ॥९॥
समाप्तमिदमुत्तरकाण्डम्।
पार्वत्यै परमेश्वरेण गदिते ह्याध्यात्मरामायणे
काण्डैः सप्तभिरन्वितेऽतिशुभदे सर्गाश्चतुःषष्टिकाः।
श्लोकानान्तु शतद्वयेन सहितान्युक्तानि चत्वारि वै
साहस्राणि समासतः श्रुतिशतान्युक्तानि तत्त्वार्थतः॥
साक्षात् परमेश्वर (श्रीमहादेवजी) द्वारा पार्वतीजीके प्रति कहे हुए, सात काण्डोंसे युक्त इस शुभप्रद अध्यात्मरामायणमें चौंसठ सर्ग हैं। इसकी समाप्तिपर्यन्त कुल चार हजार दो सौ श्लोक कहे गये हैं तथा तत्त्वार्थका विवेचन करते हुए सैकड़ों श्रुतियाँ कही गयी हैं।
(समाप्त)
श्रीरामाय नमः
श्रीजानकीजीवनाष्टकम्
आलोक्य यस्यातिललामलीलां सद्भाग्यभाजौ पितरौ कृतार्थौ ।
तमर्भकं दर्पकदर्पचौरं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥ १ ॥
श्रुतैव यो भूपतिमात्तवाचं वनं गतस्तेन न नोदितोऽपि ।
तं लीलयाऽऽह्लादविषादशून्यं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥ २ ॥
जटायुषो दीनदशां विलोक्य प्रियावियोगप्रभवं च शोकम् ।
यो वै विसस्मार तमार्द्रचित्तं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥ ३ ॥
यो वालिना ध्वस्तबलं सुकण्ठं न्ययोजयद्राजपदे कपीनाम् ।
तं स्वीयसन्तापसुतप्तचित्तं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥ ४ ॥
यच्च्याननिर्धूतवियोगवह्निर्विदेहबाला विबुधारिवन्द्याम् ।
प्राणान्दधे प्राणमयं प्रभुं तं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥ ५ ॥
यस्यातिवीर्याम्बुधिवीचिराजौ वंश्यैरहो वैश्रवणो विलीनः ।
तं वैरिविध्वंसनशीललीलं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥ ६ ॥
यद्रूपराकेशमयूखमालाऽनुरञ्जिता राजरमाऽपि रेजे ।
तं राघवेन्द्रं विबुधेन्द्रवन्द्यं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥ ७ ॥
एवं कृता येन विचित्रलीला मायामनुष्येण नृपच्छलेन ।
तं वै मरालं मुनिमानसानां श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥ ८ ॥
श्रीहरिः
गीताप्रेस, गोरखपुरकी पुस्तकें
गीता-[ श्रीशांकरभाष्यका सरल हिन्दी-अनुवाद ] इसमें मूल भाष्य तथा भाष्यके सामने ही अर्थ लिखकर पढ़ने और समझनेमें सुगमता कर दी गयी है, भाष्यके पदोंको अलग-अलग करके लिखा गया है और श्रुति, स्मृति, इतिहासके उद्धृत प्रमाणोंका सरल अर्थ दिया गया है तथा गीतामें आये हुए हरेक शब्दकी पूरी सूची है, २ तिरंगे, १ इकरंगे चित्र, पृष्ठ ५०४, मू० साधारण जिल्द २॥), बढ़िया जिल्द २॥।)
**गीता-**मूल, पदच्छेद, अन्वय, साधारण भाषाटीका, टिप्पणी, प्रधान और सूक्ष्मविषय एवं त्यागसे भगवद्-प्राप्तिसहित, मोटा टाइप, मजबूत कागज, सुन्दर कपड़ेकी जिल्द, ५७० पृष्ठ, ४ बहुरंगे चित्र, सातवाँ संस्करण (अब तक ५६००० छप चुकी है)। बिना अधिक परिश्रमके ही समझ सकते हैं, विद्यार्थियोंके भी बड़े कामकी है। अर्थमें खींचातानी नहीं है, ऐसी सस्ती गीता और न मिलेगी। मू० $\dots$ १।)
**गीता-**प्रायः सभी विषय १।) वालीके समान, श्लोकोंके सिरेपर भावार्थ छुपा हुआ है, चार बहुरंगे चित्र, साइज और टाइप कुछ छोटे, पृष्ठ ४६८, यह १५००० छप चुकी है। मू० ॥=) स० $\dots$ ॥=)
**गीता-**श्लोक और साधारण भाषाटीकासहित आकार २० $\times$ ३० सोलहपेजी, पृ० ३१६ टिप्पणी, प्रधान विषय और त्यागसे भगवत्-प्राप्ति नामक निबन्धसहित मोटा टाइप मू० ॥) स० $\dots$ ॥=)
**गीता-**भाषाटीका, सचित्र, त्यागसे भगवत्-प्राप्तिसहित, पाकेट-साइज (३५०००० छप चुकी है), सभी विषय आठ आनेवालीके समान, मूल्य =)॥ सजिल्द $\dots\dots\dots$ =)॥
**गीता-**मूल, मोटे अक्षरवाली, माहात्म्य, अंगन्यास, करन्याससहित, सचित्र, मूल्य ।-) सजिल्द $\dots$ ।=)
**गीता-**केवल भाषा, संस्कृत श्लोक न पढ़ सकनेवालोंके लिये बड़ी उपयोगी है मू० ।) सजिल्द $\dots$ ।=)
**गीता-**मूल, विष्णुसहस्रनामसहित, पृ० १३२ आठवाँ संस्करण (१७६०० छप चुकी है) सचित्र और सजिल्द =)
**गीता-**मूल, ताबीजी, साइज २ $\times$ २॥ इन्च, सजिल्द और सचित्र, इसमें माहात्म्य, करन्यास, ध्यानादि भी दिये गये हैं, मूल्य $\dots\dots\dots$ =)
**गीता-**दो पन्नोंमें सम्पूर्ण १८ अध्याय, इसे ताबीजमें भरकर गले या हाथमें बाँध सकते हैं, मू० $\dots$ -)
**गीता-**केवल दूसरी अध्याय, मूल और अर्थसहित, पाकेट-साइज, यह पुस्तक बाँटनेके लिये बड़ी उपयोगी है ।>
गीता-सूची, (Gita List) भिन्न-भिन्न भाषाओंकी गीताओँकी सूची, मू० $\dots\dots$ ॥)
**गीताका सूक्ष्म विषय-**गीताके प्रत्येक श्लोकोंका हिन्दीमें सारांश है, मू० $\dots\dots$ -)l
**श्रीकृष्ण-विज्ञान-**गीताका श्लोकोंसहित हिन्दी-पद्यानुवाद। सचित्र १) स० $\dots$ १।)
श्रीमद्भगवद्गीता गुजराती भाषामें
सभी विषय १।) वाली गीताके समान, मूल्य $\dots\dots$ ६।) .
श्रीमद्भगवद्गीता मराठी भाषामें
सभी विषय १।) वाली गीताके समान, मूल्य $\dots\dots$ १।)
श्रीमद्भगवद्गीता बंगला भाषामें
सभी विषय ॥।=) वाली गीताके समान, मूल्य १) सजिल्द $\dots\dots$ १।)
( २ )
| श्रीजयदयालजी गोयन्दकाकी पुस्तकें— | श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दारद्वारा लिखित और सम्पादित पुस्तकें— |
|---|---|
| तत्त्व-चिन्तामणि [ भाग १ ]—(सचित्र) यह ग्रन्थ परमउपयोगी है। इसके मननसे धर्ममें श्रद्धा, भगवान्में प्रेम और विश्वास एवं नित्यके बर्तावमें सत्य व्यवहार और सबसे प्रेम, अत्यन्त आनन्द एवं शान्तिकी प्राप्ति होती है। पृष्ठ ३५२, मूल्य ॥=) स० ॥।-) | विनय-पत्रिका—सरल हिन्दी-टीका-सहित पृष्ठ ४२०, चित्र ३ सुनहरी, २ रंगीन, १ सादा मू० १) स० १।) स्वामीजीके पदोंका सरल हिन्दी भाषामें सबके समझने योग्य भावार्थ लिखा गया है, प्रचारके विचारसे मूल्य बहुत अनुकूल रक्खा गया है। |
| परमार्थ-पत्रावली—(सचित्र) कल्याणकारी २१ पत्रोंका छोटा-सा संग्रह, पृष्ठ १४४, मू० ।) | नैवेद्य—धर्म-सम्बन्धी चुने हुए २८ लेख और ६ कविताओंका सचित्र संग्रह। मू० ॥=) स० ... ॥।-) |
| **गीता-निबन्धावली—**यह गीताकी अनेक बातें समझनेके लिये उपयोगी है। पृ० ८८, मू० ≡)॥ | **तुलसी-दल—**इसमें इतने विषय हैं कि सबके लिये कुछ-न-कुछ अपने मनकी बात मिल सकती है। पृ० २६४, मूल्य ॥) सजिल्द ... ॥=) |
| **गीताके कुछ जानने योग्य विषय—**गीताके कुछ विषय समझानेकी चेष्टा की गयी है, पृ० ४३, मूल्य -)॥ | **भक्त-बालक—**इसमें गोविन्द, मोहन, धन्ना जाट, चन्द्रहास और सुधन्वाकी कथाएँ हैं। ५ चित्र, पृ० ८०, ।-) |
| **सच्चा सुख और उसकी प्राप्तिके उपाय—**साकार और निराकारके ध्यानादिका रहस्यपूर्ण वर्णन मू० -)॥ | **भक्त-नारी—**इसमें शबरी, मीरां, जना, करमैती और रवियाकी प्रेमपूर्ण कथाएँ हैं। ६ चित्र, पृ०८०, ।-) |
| **गीतोक्त सांख्ययोग और निष्कामकर्मयोग—**विषय नामसे ही प्रकट है। मू० ... -)॥ | **भक्त-पञ्चरत्न—**इसमें रघुनाथ, दामोदर और उसकी पत्नी, गोपाल, शान्तोबा और उसकी पत्नी और नीताम्बरदासके चरित्र हैं। मू० ... ।-) |
| श्रीप्रेमभक्तिप्रकाश—(सचित्र) इसमें भगवान्की प्रार्थना तथा मानसिक पूजा आदिका वर्णन है। मूल्य -) | पत्र-पुष्प—(सचित्र, कविता-संग्रह) पृष्ठ-संख्या १६, मू० ≡)॥ स० ... १)॥ |
| **त्यागसे भगवत्प्राप्ति—**त्यागोंके द्वारा मोक्षमन्दिरकी प्राप्तिके लिये पथप्रदर्शक है। मू० -) | **मानव-धर्म—**इसमें धर्मके दस लक्षणोंपर अच्छा विवेचन है। पृ० ११२ मू० ... ≡) |
| **भगवान् क्या हैं ?—**इसमें परमार्थतत्त्व भर देनेकी चेष्टा की गयी है। मू० ... -) | साधन-पथ—सचित्र पृष्ठ ७२, मू० ... =)॥ |
| **धर्म क्या है ?—**नामसे ही पुस्तकके विषयका पता लग जाता है। मू० ... )। | **स्त्री-धर्मप्रश्नोत्तरी—**नये संस्करणमें १ तिरंगा चित्र भी हैं। पृ० ५६ मू० ... =) |
| **गजलगीता—**लड़कोंके गाने योग्य एवं नित्य पाठ करने योग्य सरल हिन्दीमें गजलके ढङ्गपर गीताके १२ वें अध्यायके कुछ उपदेशोंका अनुवाद है, चौथी बार ५०००० छपी है। मूल्य ... आधा पैसा | **आनन्दकी लहरें—**इसमें हम दूसरोंको सुख पहुँचाते हुए खुद कैसे सुखी हों, यह बताया गया है। मू० -)॥<br>**मनको वशमें करनेके उपाय—**इसमें एक चित्र है। -)।<br>**ब्रह्मचर्य—**ब्रह्मचर्यकी रक्षाके अनेक सरल उपाय बताये गये हैं। मू० ... -)<br>**समाज-सुधार—**समाजके जटिल प्रश्नोंपर प्रकाश डाला गया है। मू० ... -)<br>**दिव्य सन्देश—**वर्तमान दाम्भिक युगमें किस उपायसे शीघ्र भगवत्-प्राप्ति हो सकती है, इसमें उसके सरल उपाय बतलाये गये हैं। मू० ... )। |
( ३ )
स्वामीजी श्रीभोलेबाबाजीव्दारा लिखित पुस्तकें
श्रुति-रत्नावली— (सचित्र) वेद-उपनिषद् आदिके चुने हुए मन्त्रोंका अर्थसहित संग्रह मूल्य ॥)
श्रुतिकी टेर— (सचित्र) पृष्ठ-संख्या १५०, पुस्तक सीधी-सादी बोलचालकी कवितामें लिखी गयी है, वेदान्तके विषयकी है। मूल्य केवल ।)
वेदान्त-छन्दावली— (सचित्र) इसमें वेदान्तके विचारणीय प्रश्न और उपदेश हैं, पुस्तक सुन्दर कवितामें लिखी गयी है। पृष्ठ-संख्या ७५ मू० =)।।
श्रीवियोगी हरिजीकी पुस्तकें—
प्रेम-योग— आपकी भावुकतापूर्ण लेखनीसे लिखा हुआ यह ग्रन्थ अपने ढंगका एक ही है। सजीव भाषा और दिव्य भावोंसे सना हुआ यह प्रेम-योग प्रेम-साहित्यका एक पूर्ण ग्रन्थ कहा जा सकता है। दो खण्ड, पृ० ४२०, मूल्य १।) सजिल्द १॥)
गीतामें भक्ति-योग— आपके अन्य ग्रन्थोंकी तरह यह पुस्तक भी सुन्दर हुई है। पृष्ठ १०८, दो चित्र, मू० ।-)
भजन-संग्रह पहला भाग— इस भागमें तुलसीदासजी, सूरदासजी, कबीरजीके भजन हैं। मू० =)
भजन-संग्रह दूसरा भाग— इसमें हितहरिवंश, स्वामी हरिदास, गदाधर भट्ट, व्यासजी, श्रीभट्ट, सूरदास, नागरीदास, नारायणस्वामी, ललितकिशोरी, दादू-दयाल, रैदास, मलूकदास, चरनदास, गुरु नानक आदिके भजन हैं। मू० ... =)
भजन-संग्रह तीसरा भाग— इसमें मीराबाई, सहजो-बाई, बनीठनी, प्रतापकुंवरि, श्रीयुगलप्रिया, श्री-रामप्रिया, रानी रूपकुँवरि आदिके भजन हैं। मू०=)
चतुर्वेदी पं० श्रीद्वारकाप्रसादजीकी पुस्तकें—
भागवतरत्न प्रह्लाद— यह पवित्र चरित्र हम माँ, बहिन, बेटी, भाई, भौजाई आदि सबके हाथोंमें पढ़नेके लिये दे सकते हैं। पृष्ठ ३४०, ३ रंगीन और ३ सादे चित्र, मू० १) सजिल्द ... १।)
देवर्षि नारद— जैसे भगवान्के चरित्रोंसे हमारे धर्म-शास्त्र भरे पड़े हैं, वैसे ही नारदजीकी पुण्यमयी गाथाएँ भी हमारे शास्त्रोंमें ओतप्रोत हैं। पृष्ठ २४०, २ रंगीन, ३ सादे चित्र मू० ।।।) स० १)
कुछ अन्य लेखकोंकी पुस्तकें—
श्रीअरविन्द घोष
माता— इस पुस्तकका इतना ही परिचय देना बहुत होगा कि यह श्रीअरविन्दकी विचारधारा या एक प्रिय श्रेष्ठ रचना है।
मूल्य ... ।)
श्रीमालवीयजी
ईश्वर— महामना मालवीयजीने इस पुस्तकमें ईश्वरके स्वरूपका और धर्मका वेदशास्त्र-सम्मत बहुत ही सुन्दर निरूपण किया है। मूल्य केवल ... -)।
श्रीगान्धीजी
सप्त-महाव्रत— इसमें सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, अस्वाद और अभय इन सात महाव्रतोंपर महात्मा गान्धीजी द्वारा लिखित बड़ी ही सुन्दर अनुभवपूर्ण व्याख्या है। मूल्य केवल -)
श्रीशंकराचार्य श्रीभारती कृष्णतीर्थ
आचार्यके सदुपदेश— पृष्ठ-संख्या २२ मूल्य -)
श्रीनारायणस्वामी
एक सन्तका अनुभव— साधकों और सच्चे सुखके अभिलाषियोंके लिये बहुत ही कामकी चीज है, पुस्तक नित्य मनन करने योग्य है
मूल्य ... -)
पं० श्रीभवानीशङ्करजी महाराज
ज्ञानयोग— पृष्ठ १२०, मूल्य ... ।)
रायबहादुर लाला श्रीसीतारामजी
चित्रकूटकी झाँकी— इसमें पावन तीर्थ चित्रकूटका और उसके आस-पासके तीर्थोंका विशद वर्णन है। चित्रकूट-सम्बन्धी १२ चित्र हैं। मूल्य ... =)
श्रीज्वालासिंहजी
मनन-माला— सचित्र, गद्यके साथ-साथ अनेक पद्य भी हैं मूल्य ... =)॥
श्रीअरण्डेल
सेवाके मन्त्र— सच्ची सेवा क्या है ? और सच्चा सेवक कौन है, इस बातका यह छोटी-सी पुस्तिका पढ़नेसे पूरा पता लग जायगा, पृष्ठ-संख्या ३२, मूल्य ... )॥
( ४ )
अन्य ग्रन्थ
श्रीश्रीचैतन्य-चरितावली (खण्ड १)—(सचित्र) श्रीचैतन्यकी इतनी बड़ी जीवनी अभीतक हिन्दीमें नहीं निकली। यह पाँच खण्डोंमें सम्पूर्ण होगी। बहुत ही सुन्दर ग्रन्थ है। मूल्य |||=) सजिल्द १=)
श्रीएकनाथ-चरित्र—(सचित्र) दक्षिणाके महान् भगवद्भक्तकी यह जीवनी अलौकिक है। भगवान् स्वयं आपके नौकर थे, पढ़ने योग्य है। मू० ||)
श्रीरामकृष्ण परमहंस—(सचित्र) आप कुछ ही दिन पहले अत्यन्त प्रसिद्ध भगवद्भक्त हो गये हैं। आपका नाम विलायत और अमेरिकातक प्रसिद्ध है। इस पुस्तकमें ३०० उपदेश भी संग्रहीत हैं मूल्य |=)
भक्त-भारती—(७ चित्र) सरल कवितामें सात भक्तोंकी सुन्दर रोचक कथाओंका वर्णन है, सबके लिये सुगम है। मूल्य ... |=)
श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध—सचित्र-सटीक, भागवतमें दशम और एकादश स्कन्ध सर्वोपरि हैं। लगभग ४२० पेजकी पुस्तकका दाम केवल |||) स० १)
विवेक-चूड़ामणि—(सचित्र) मूल श्लोक और हिन्दी-अनुवाद पृष्ठ २२४, मू० |=) स० ... ||=)
प्रबोध-सुधाकर—(सचित्र) विषय-भोगोंकी तुच्छता और आत्मसिद्धिके उपाय बताये गये हैं, =)||
अपरोक्षानुभूति—(सचित्र) मूल श्लोक और हिन्दी-अनुवाद-सहित, मू० ... =)||
**मनुस्मृति—**केवल दूसरा अध्याय और उसका हिन्दी-अनुवाद, मू० ... -)||
**विष्णुसहस्रनाम—**मूल्य ||| सजि० -)||
**हरेरामभजन—**मूल्य ... )III
**पातञ्जलयोगदर्शन—**मूल ... )।
**बलिवैश्वदेवविधि—**मूल्य ... )||
**प्रश्नोत्तरी—**इसमें भी मूल श्लोकोंसहित हिन्दी-अनुवाद है, मू० ... )||
**सन्ध्या—**हिन्दी-विधि-सहित, मू० ... )||
नयी पुस्तकें—
**अध्यात्मरामायण—**आपके हाथमें है। इसकी विशेषताएँ देखिये। संस्कृत श्लोकोंका अर्थ इस ढंगसे रक्खा गया है कि समझनेमें सुगमता हो। हो सके तो एक पुस्तक लेकर घर-परिवारके सब लोगोंको सुनाइये।
श्रीश्रीचैतन्य-चरितावली दूसरा खण्ड—(कई तिरंगे, दुरंगे, इकरंगे चित्रोंसहित ।) बहुत शीघ्र प्रकाशित होनेकी आशा है। श्रीचैतन्यदेवकी इतनी बड़ी ऐसी सुन्दर जीवनी हिन्दीमें अभीतक नहीं छपी। आपने पहला खण्ड देखा होगा, नहीं तो दोनोंके लिये साथ ही आर्डर देकर एक-एक प्रति मँगा लीजिये। दूसरे भागकी पृष्ठ-संख्या लगभग ४५० होगी। उपन्यास आदिके पढ़नेमे समय बचाकर महान् पुरुषोंकी जीवनियाँ पढ़नेमें बहुत लाभ प्रतीत होता है।
**रामगीता सटीक—**इसमें श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीको ज्ञानका विषय उत्तम रीतिसे समझाया है। छपाई सुन्दर है, मूल्य ... -)
**दिनचर्या—**इस पुस्तकका विषय नामसे ही प्रकट है। हिन्दू-संस्कृतिके अनुसार सबेरे आँख खुलनेसे रात्रिको सो जानेतक किस भाव और क्रियासे जीवन व्यतीत करना चाहिये, यह बताया है, साथ ही ब्रह्मचर्य, गृहस्थ आदि आश्रमोंके कुछ धर्म-नियम, स्वास्थ्यके नियम-साधन, ध्यान-प्राणायाम विषयकी बातें भी बतायी हैं। नित्य-पाठके उपयुक्त कई स्तोत्र मूल और सटीक और तुलसीदासजी, सूरदासजी आदि कई भक्तोंके भजन भी दिये गये हैं। पुस्तक शीघ्र प्रकाशित होनेकी आशा है।
तत्त्व-चिन्तामणि द्वितीय भाग—(सचित्र) ले० श्रीजयदयालजी गोयन्दका। इसका पहला भाग आपने देखा होगा। इसमें मनुष्य-कर्तव्य, भगवान्की प्राप्तिके विविध उपाय, सन्ध्या, बलिवैश्वदेव और यज्ञोंको प्रणाम करनेकी आवश्यकता इत्यादि परमार्थ-सम्बन्धी बहुत-से लेखोंका संग्रह है।
**श्रीविष्णुपुराण भाषाटीकासहित—**यह अठारह पुराणोंमेंसे एक है। यह प्रसिद्ध और अत्यन्त उपयोगी धर्मग्रन्थ है। इसके विषयमें अधिक क्या लिखें। इसकी छपाई अध्यात्मरामायणके ढंगसे ही हो रही है।
**विष्णुसहस्रनाम—**भगवान् विष्णुके सहस्र नामोंका श्रीशंकराचार्यजीने विस्तृत व्याख्या की है। उसीका यह भाष्यसहित सरल हिन्दी-अनुवाद प्रकाशित किया जायगा। भक्तोंके लिये यह बहुत ही उत्तम और सुन्दर, सचित्र ग्रन्थ होगा।
**ब्रजपरिचय (सचित्र)—**लेखक गोस्वामी लक्ष्मणायचार्यजी। इसमें ब्रजके मुख्य-मुख्य स्थानोंके विवरण सुन्दर ढंगसे रहेंगे, ब्रज-प्रेमियोंके लिये बड़े कामकी चीज़ होगी।
( ५ )
चित्र
छोटे, बड़े, रंगीन और सादे धार्मिक चित्र
श्रीकृष्ण, श्रीराम, श्रीविष्णु और श्रीशिवके दिव्यदर्शन ।
जिसको देखकर हमें भगवान् याद आवें, वह वस्तु हमारे लिये संग्रहणीय है । किसी भी उपायसे हमें भगवान् सदा स्मरण होते रहें तो हमारा धन्य भाग हो । भक्तों और भगवान्के स्वरूप एवं उनकी मधुर मोहिनी लीलाओंके सुन्दर दृश्य-चित्र हमारे सामने रहें तो उन्हें देखकर थोड़ी देरके लिये हमारा मन भगवत्-स्मरणमें लग जाता है और हम सांसारिक पाप-तापोंको भूल जाते हैं ।
ये सुन्दर चित्र किसी अंशमें इस उद्देश्यको पूर्ण कर सकते हैं । इनका संग्रहकर प्रेमसे जहाँ आपकी दृष्टि नित्य पड़ती हो, वहाँ घरमें, बैठकमें और मन्दिरोंमें लगाइये एवं चित्रोंके बहाने भगवान्को यादकर अपने मन-प्राणको प्रफुल्लित कीजिये । भगवान्की मोहिनी मूर्तिको ध्यान कीजिये ।
कागजका साइज १० इञ्च चौड़ा १५ इञ्च लम्बा, सुनहरी चित्रका -)॥, रंगीन चित्रका मूल्य -), दो रंगके और सादे चित्रका मूल्य )॥, यह छोटे ब्लाकोंसे ही वेल (बार्डर) लगाकर बड़े कागजोंपर छापे गये हैं
कागजोंका साइज ७॥ $\times$ १० इञ्च, सुनहरीका मूल्य -) ।, रंगीनका मूल्य )॥, सादेका )॥ मात्र ।
इनके सिवा १८$\times$२३, १५$\times$२० और २४$\times$॥ के बड़े और छोटे चित्र भी मिलते हैं ।
दुकानदार और थोक खरीदारोंको कमीशन भी दी जाती है ।
चित्रोंकी बड़ी सूची अलग मुफ्त मँगवाइये !
पता—
गीताप्रेस, गोरखपुर
"कल्याण" धार्मिक मासि[क]
( हर महीनेमें २०५०० छपता)
भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और धर्मसम्बन्धी मासिक पत्र, पृष्ठ-संख्या ८०, मूल्य ४=), [जिस]में एक विशेषांक भी निकलता है जो आठ [आनेके] मूल्यमें मिल जाता है । अबतक ६ विशेषांक [निकल] चुके हैं ।
( डाकमहसूलसहित )
भगवन्नामांक
पृष्ठ-संख्या ११०, चित्र-संख्या ४१, मू[ल्य ...]
रामायणांक
पृष्ठ-संख्या ५००, चित्र-संख्या १६०, मू० [५]
श्रीकृष्णांक
पृष्ठ-संख्या ५२२, चित्र-संख्या १०८, मू० २ [?]
ईश्वरांक सपरिशिष्टांक
पृष्ठ-संख्या ६२४, चित्र-संख्या ३३, मू० [?]
तीसरे वर्षकी फाइल—( प्रसिद्ध श्रीभक्तांक सहित ) अनेक सुन्दर चित्र और उपादेय लेख एवं कविताओंका यह संग्रह आपकी पुस्तकोंमें स्थान पाने योग्य है । सत्संग और पठन-पाठनकी अच्छी सामग्री है । धार्मिक विचारोंका सुन्दर संग्रह और स्थायी साहित्य है । भक्तोंकी कथाएँ विशेष मनोहर हैं । पूरी १२ अंकोंकी फाइलका मूल्य केवल ४=) मात्र, डाकखर्च माफ । (भक्तांक अलग नहीं मिलता)
चौथे वर्षकी फाइल—( सुविख्यात श्रीगीतांकसहित ) लगभग २०० चित्र और १४०० पृष्ठ । मूल्य केवल ४=), डाकव्यय माफ । ( गीतांक अलग नहीं मिलता )
जब श्रीगीतांक निकला तब कल्याणकी ग्राहकसंख्या ७५०० से लगभग १३००० हो गयी थी । यह गीताके सम्बन्धमें अपने ढंगका अनोखा ग्रन्थ है । बहुत थोड़ा बचा है । पहले-दूसरे या पाँचवें-छठे वर्षकी तरह ये फाइलें भी समाप्त हो जानेपर मिलनी कठिन हैं । भेंट आदिमें देनेके लिये भी यह उत्तम सामग्री है ।
( ६ )
श्रीरामायणांक
बहुत । दूसरा संस्करण ! पुनः छप गया ! नवीन संस्करण !
की प्राप्तिके लिये अनेक प्रेमी लालायित थे वही 'रामायणांक' पुनः छप गया। केवल ५००० छपा महान् (=) ही रक्खा गया है। जिन सज्जनोंकी माँग लौटा दी गयी थी, वे अब मँगवा सकते हैं। पृष्ट भगवान् ऊपर और सैकड़ों चित्र हैं।
, मायणांकका गेटप, छपाई, सफाई, कागज और बाइंडिंग सब सुन्दर हैं।
ही दि रामायणांकमें श्रीरामजीकी लीलाओंके अनेक सुनहरी, बहुरंगे, सादे चित्र एवं अनेक पवित्र तीर्थ आपव प्रयाग, काशी, चित्रकूट, पञ्चवटी, रामेश्वर, जनकपुर, शृङ्गवेरपुर आदिके दर्शनीय चित्र हैं; रामायण-इस भारतके कई भौगोलिक मानचित्र भी हैं।
रामायणांकमें अनेक महात्माओं, देशी-विदेशी विद्वानों और रामायणप्रेमियोंके लेख हैं।
सात रामायणांक सुखमय जीवनका अमोघ साधन है।
के हि आजतक कल्याणके सिवा इतने बड़े किसी भी सामयिक पत्रको दुबारा छपकर आपकी सेवा करनेका र नहीं मिला। यदि आप इस बार इस अङ्कको न अपना सकेंगे तो समझ लीजिये कि एक उत्कृष्ट वस्तुमे वञ्चित रह जायँगे, क्योंकि इसके शीघ्र तीसरी बार छपनेकी आशा हम अभी आपको नहीं दिला सकते। खरीदनेमें शीघ्रता कर सकते हैं।
व्यवस्थापक—
"कल्याण-कार्यालय," गोरखपुर