अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
श्रीराम
कोसलपाल कृपालु, आप ही हैं प्रेरकवर । प्रभु-इच्छा ही पूर्ण सतत करते सब सुर-नर । इससे भी जो बना आपकी ही लीला है। अहो ! आपकी केलि परमविस्मयशीला है !! अब इसको दीजे यही, दानी दशरथलाल ! तुम्हें छोड़ चाहे न कुछ—
पदपायक
मुनिलाल
भक्ति ही सार है।
भक्तवत्सल जगन्नाथ श्रीरामके प्रसन्न होनेपर संसारमें क्या दुर्लभ है। देखो, उनकी कृपासे नीच जातिमें उत्पन्न हुई शबरीने भी मोक्ष-पद प्राप्त कर लिया। फिर श्रीरामका ध्यान करनेवाले पुण्यजन्मा ब्राह्मणादि यदि मुक्त हो जायँ तो इसमें क्या आश्चर्य है ? निःसन्देह, भगवान् रामकी भक्ति ही मुक्ति है। अरे लोगो ! भगवान् श्रीरामचन्द्रकी भक्ति ही मोक्ष देनेवाली है। अतः उनके कामधेनुरूप चरणयुगलोंकी अति उत्साहपूर्वक सेवा करो। हे बुद्धिमान् लोगो ! इन विविध विज्ञान-वार्ताओं और मन्त्रविस्तारको अलग रखकर तुरन्त ही श्रीशंकरके हृदयधाममें शोभा पानेवाले श्यामशरीर भगवान् रामका भजन करो।
( अरण्य० १०। ४२-४४ )
श्रीहरिः
निवेदन
——◇——
मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम्।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्॥
भगवान्की लीलाका रहस्य कौन जान सकता है? बड़े-बड़े ऋषि, मुनि, महात्मा और सिद्धगण आजन्म उसीका मनन करते रहनेपर भी उसका पार नहीं पा सके। किन्तु वह इतनी दुर्विज्ञेय और गूढ़ होनेपर भी कितनी मधुर, मनमोहिनी और कल्याणमयी है। रसिकजन संसारके सभी भोगोंको छोड़कर अपनी आयुको एकमात्र उसीके अनुशीलनमें लगाकर अपनेको अत्यन्त बड़भागी समझते हैं। वे उसकी माधुरीका आस्वादन करते-करते कभी नहीं अघाते। अन्य लौकिक एवं पारलौकिक भोगोंका पर्यवसान उनसे विरक्त हो जाने—अघा जानेमें होता है, किन्तु इस लोकोत्तर रससे इसके रसिकका चित्त कभी नहीं ऊबता। जिसका चित्त इससे ऊबने लगे, समझना चाहिये उसने इसका आस्वादन ही नहीं किया। इसीलिये रसिकचक्रचूड़ामणि श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं—
रामचरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेस जाना तिन नाहीं॥
धन्य हैं, वे महाभाग जिन्हें उसके यथेष्ट आस्वादनका सौभाग्य प्राप्त हुआ है!
भगवान्के उसी दुर्लभ गूढ़ रहस्यको, जिसका यथावत् समझना बड़े-बड़े मेधावी आचार्य और योगनिष्ठ यतियोंके लिये भी अत्यन्त कठिन है और जिसे विभिन्न रूपसे ग्रहण करनेके कारण ही इस अनादि संसारमें अनादि कालसे अनन्त सम्प्रदायों और मतोंकी प्रवृत्ति होती आयी है, मुझ-जैसे मन्दमतिको ठीक-ठीक समझ लेना कैसे सम्भव है? उसे समझनेके योग्य मेरे पास विद्या, बुद्धि, विवेक अथवा श्रद्धा आदि कोई भी तो सामग्री नहीं है। इस ओर मेरा प्रवृत्त होना भी बड़ी हँसीकी बात है और प्रवृत्त होनेके अनन्तर जितनी भी सेवा मुझसे बनी है उसपर भी मुझे तो आश्चर्य है। मैं इस बातको स्वयं ही अनुभव करता हूँ कि इस अनधिकार चेष्टामें प्रवृत्त होकर मैं विद्या और विद्वानोंका अपराध कर रहा हूँ।
किन्तु, एक विचार है जो मुझे इन संकोच और आश्चर्य दोनोंहीसे मुक्त कर देता है। हम पद-पदपर देखते हैं कि अपनी इच्छा न होनेपर भी हमें बलात्कारसे बहुत-से ऐसे कार्योंमें लग जाना पड़ता है जिनमें प्रवृत्त होनेकी पहले कभी आशा भी नहीं थी। इसका कारण यही है कि हमारी सारी प्रवृत्तियोंका नियामक कोई और ही है, जो देहाभिमानके पर्देमें छिपा हुआ हमारे अन्तःकरणोंमें विराजमान है। हमारी सारी प्रवृत्तियाँ उस हृदयस्थित देवके ही इशारेपर नाचती रहती हैं। वस्तुतः तो 'हमारी प्रवृत्तियाँ, हमारी चित्तवृत्तियाँ' ऐसा कहना और मानना भी अज्ञानवश परिच्छिन्न अहंकारको स्वीकार करनेके ही कारण है। विज्ञान-विभासुका विमल प्रकाश होनेपर अज्ञानान्धकारके नष्ट होते ही जब देहाभिमानरूप उलूक न जाने कहाँ छिप जाता है, तब कर्ता कर्म और करणादिका कोई भेद नहीं रहता। फिर तो प्रवृत्ति, प्रवर्तक और प्रवर्त्य—सब कुछ एकमात्र वह अन्तर्यामी ही रहते हैं जिनके यत्किञ्चित् कृपा-कटाक्षसे ही यह सम्पूर्ण प्रपञ्च भासित हो रहा है तथा जिनकी सत्ता पाकर ही यह, सर्वथा असत् होनेपर भी, ध्रुव-सत्य बना हुआ है। अतः हमारा सारा
[ २ ]
संकोच और आश्चर्य तभीतक है जबतक हम सच्चे कर्ताको भूलकर तुच्छ देहाभिमानके शिरपर सारे कर्तृत्व-भोक्तृत्वका भार लाद देते हैं और उस देहाभिमानको देहाभिमान न समझकर अपना परमार्थस्वरूप मान बैठते हैं, नहीं तो जो लीलामय बिना किसी प्रयोजनके केवल लीलाके लिये ही इच्छामात्रसे इस अनन्त ब्रह्माण्डकी सृष्टि करते हैं, जिनकी मायासे मोहित होकर हमारी इस हाड़-मांसके पञ्जरमें आत्मबुद्धि होती है और फिर इसीकी आसक्तिमें फँसकर स्त्री-धन-धरती आदि महाघृणित और असार वस्तुओंमें रमणीय-बुद्धि होती है तथा जिनके लेशमात्र कृपाकणसे यह अनन्त ब्रह्माण्ड बालूकी भाँत हो जाता है, उन महामहिम सर्वशक्तिमान् सर्वेश्वरके लिये क्या दुष्कर है ? उनकी जैसी इच्छा होती है उसी ओर सबको प्रवृत्त होना पड़ता है और उनकी इच्छाके अनुसार ही उन्हें उसमें सफलता अथवा असफलता प्राप्त होती रहती है।
अस्तु। ‘तोमार इच्छा पूर्ण हउक करुणामय स्वामी’ इस वंग-कहावतके अनुसार प्रभुने जो कार्य सौंपा है उसे उन्हींका काम समझकर उन्हींके इङ्गितके अनुसार करते रहनेमें ही हमारा कल्याण है; और वास्तवमें हम करते भी ऐसा ही हैं, परन्तु ऐसा समझते नहीं। इसीलिये उसकी सफलता-असफलतामें हर्ष-शोकके शिकार होते हैं। प्रभु हमें ऐसा ही समझते रहनेकी शक्ति प्रदान करें।
श्रीमदध्यात्मरामायण कोई नवीन ग्रन्थ नहीं है, जिसके विषयमें कुछ विशेष कहनेकी आवश्यकता हो। यह परम पवित्र गाथा साक्षात् भगवान् शंकरने अपनी प्रेयसी आदिशक्ति श्रीपार्वतीजीको सुनायी है। यह आख्यान ब्रह्माण्डपुराणके उत्तरखण्डके अन्तर्गत माना जाता है। अतः इसके रचयिता महामुनि वेदव्यासजी ही हैं। इसमें परमरसायन रामचरितका वर्णन करते-करते पद-पदपर प्रसंग उठाकर भक्ति, ज्ञान, उपासना, नीति और सदाचार-सम्बन्धी दिव्य उपदेश दिये गये हैं। विविध विषयोंका विवरण रहनेपर भी इसमें प्रधानता अध्यात्मतत्त्वके विवेचनकी ही है। इसीलिये यह 'अध्यात्म-रामायण' कहलाता है। उपदेशभागके सिवा इसका कथाभाग भी कुछ कम महत्त्वका नहीं है। भगवान् श्रीराम मूर्त्तिमान् अध्यात्मतत्त्व हैं, उनके परमपावन चरित्रकी महिमाका कहाँतक वर्णन किया जाय ? आजकल जिस श्रीरामचरितमानसमें अवगाहन कर करोड़ों नर-नारी अपनेको कृतकृत्य मान रहे हैं उसके कथानकका आधार भी अधिकांशमें यही ग्रन्थ है। श्रीरामचरितमानसकी कथा जितनी अध्यात्मरामायणसे मिलती-जुलती है उतनी और किसीसे नहीं मिलती। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि श्रीगोस्वामी तुलसीदासजीने भी इसीका प्रामाण्य सबसे अधिक स्वीकार किया है।
अबतक इस ग्रन्थके कई अनुवाद हो चुके हैं। चार-पाँच तो मेरे देखनेमें भी आये हैं। प्रस्तुत अनुवादमें श्रीवेंकटेश्वर स्टीमप्रेसद्वारा प्रकाशित स्वर्गीय पं० बलदेवप्रसादजी मिश्र तथा स्वर्गीय पं० रामेश्वरजी भट्टके अनुवादोंसे सहायता ली गयी है। इसके लिये उक्त दोनों महानुभावोंका मैं हृदयसे कृतज्ञ हूँ। इस ग्रन्थरत्नका अनुवाद करनेका आदेश देकर गीताप्रेसने मुझे इसके अनुशीलनका अमूल्य अवसर दिया है और फिर उसीने इसका संशोधन कराकर इसे प्रकाशित करनेकी भी कृपा की है, इस उपकारके लिये मैं उसके सञ्चालकोंका हृदयसे आभारी हूँ।
अन्तमें, जिन लीलामयके लीलाकटाक्षसे प्रेरित होकर यह लीला हुई है, उनकी यह लीला आदरपूर्वक उन्हींको समर्पित है। इसमें यदि कुछ अच्छा है तो उन्हींके कृपाकटाक्षका प्रसाद है और जो भूल है वह मेरी अहंकारजनित धृष्टताका फल है। इत्यलम्।
\begin{aligned} & विनीत- \ & अनुवादक \end{aligned}
श्रीहरिः
विषय-सूची
| सर्ग | विषय | पृष्ठ | सर्ग | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| १-माहात्म्य | ... ... ... | २। | ९-भगवान् राम और भरतका मिलन, भरतजीका अयोध्यापुरीको लौटना और श्रीरामचन्द्रजीका अत्रिमुनिके आश्रमपर जाना | ... ... | ९२ |
| बालकाण्ड | अरण्यकाण्ड | ||||
| १-रामहृदय | ... ... ... | ३ | १-विराध-वध | ... ... ... | १०३ |
| २-भारपीडिता पृथिवीका ब्रह्मादि देवताओंके पास जाना और भगवान्का उनकी प्रार्थनासे प्रकट होकर उन्हें धैर्य बँधाना | ... ... | ६ | २-शरभंग तथा सुतीक्ष्ण आदि मुनीश्वरोंसे भेंट | ... ... ... | १०७ |
| ३-भगवान्का जन्म और बाल-लीला | ... ... | १२ | ३-मुनिवर अगस्त्यजीसे भेंट | ... ... | १११ |
| ४-विश्वामित्रजीका आगमन; राम और लक्ष्मणका उनके साथ जाना और ताटकाका वध करना | ... ... | १८ | ४-पञ्चवटीमें निवास और लक्ष्मणजीको उपदेश | ... ... | ११६ |
| ५-मारीच और सुबाहुका दमन तथा अहिल्योद्धार | ... ... ... | २१ | ५-शूर्पणखाको दण्ड, खर आदि राक्षसोंका वध और शूर्पणखाका रावणके पास जाना | ... ... | १२० |
| ६-धनुर्भङ्ग और विवाह | ... ... ... | २७ | ६-रावणका मारीचके पास जाना | ... | १२६ |
| ७-परशुरामजीसे भेंट | ... ... | ३३ | ७-मारीचवध और सीताहरण | ... | १२६ |
| अयोध्याकाण्ड | ८-सीताजीके वियोगमें भगवान् रामका विलाप और जटायुसे भेंट | ... ... | १३५ | ||
| १-भगवान् रामके पास नारदजीका आना | ... | ४१ | ९-कबन्धोद्धार | ... ... ... | १४० |
| २-राज्याभिषेककी तैयारी तथा वसिष्ठजी और रघुनाथजीका संवाद | ... ... | ४४ | १०-शबरीसे भेंट | ... ... ... | १४५ |
| ३-राजा दशरथका कैकेयीको वर देना | ... | ५१ | किष्किन्धाकाण्ड | ||
| ४-भगवान् रामका मातासे विदा होना तथा सीता और लक्ष्मणके सहित वन-गमनकी तैयारी करना | ... ... | ५५ | १-सुग्रीवसे भेंट | ... ... ... | १५१ |
| ५-भगवान्का वनगमन | ... ... | ६५ | २-वालीका वध और भगवान्के साथ उसका सम्भाषण | ... ... | १५६ |
| ६-गङ्गोत्तरण तथा भरद्वाज और वाल्मीकिजीसे भेंट | ... ... | ७० | ३-ताराका विलाप, श्रीरामचन्द्रजीका उसे समझाना तथा सुग्रीवका राजपद प्राप्त करना | ... ... ... | १६५ |
| ७-सुमन्त्रका प्रत्यागमन, राजा दशरथका स्वर्गवास तथा भरतजीका ननिहालसे आना और वसिष्ठजीके आदेशसे पिताका अन्त्येष्टि-संस्कार करना | ... | ७८ | ४-भगवान् रामका लक्ष्मणजीसे क्रिया-योगका वर्णन करना | ... ... | १७० |
| ८-भरतजीका वनको प्रस्थान, मार्गमें गुह और भरद्वाजजीसे भेंट तथा चित्रकूट-दर्शन | ... ... ... | ८७ | ५-भगवान् रामका शोक और लक्ष्मणजीका किष्किन्धापुरीमें जाना | ... ... | १७५ |
| ६-सीताजीकी खोज, वानरोंका गुहाप्रवेश और स्वयम्प्रभा-चरित्र | ... ... | १८१ |
( २ )
| सर्ग | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ७-वानरोंका प्रायोपवेशन और सम्पाति-से भेंट | ... ... ... | १८८ |
| ८-सम्पातीकी आत्मकथा | ... ... | १९३ |
| ९-समुद्रोलङ्घनकी मन्त्रणा | ... ... | १९७ |
सुन्दरकाण्ड
| सर्ग | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १-हनुमान्जीका समुद्रोलङ्घन और लंका-प्रवेश | ... ... ... | २०३ |
| २-हनुमान्जीका वाटिकामें जाना तथा रावणका सीताजीको भय दिखलाना | ... ... | २०८ |
| ३-जानकीजीसे भेंट, वाटिका-विध्वंस और ब्रह्मपाश-बन्धन | ... ... | २१३ |
| ४-हनुमान् और रावणका संवाद तथा लङ्कादहन | ... ... ... | २२० |
| ५-हनुमान्जीका सीताजीसे विदा होना और श्रीरामचन्द्रजीको उनका सन्देश सुनाना | ... ... ... | २२६ |
युद्धकाण्ड
| सर्ग | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १-वानर-सेनाका प्रस्थान | ... ... | २३३ |
| २-रावणद्वारा विभीषणका तिरस्कार | ... ... | २३७ |
| ३-विभीषणकी शरणागति, समुद्रका त्रास तथा सेतु-बन्धनका आरम्भ | ... ... | २४१ |
| ४-समुद्र-तरण, लङ्का-निरीक्षण तथा रावण-शुक-संवाद | ... ... | २४८ |
| ५-शुकका पूर्व-चरित्र, माल्यवान्का रावणको समझाना तथा वानर-राक्षस-संग्राम | ... ... | २५३ |
| ६-लक्ष्मण-मूर्च्छा, राम-रावण-संग्राम, हनुमान्जीका ओषधि लेने जाना और रावण-कालनेमि-संवाद | ... ... | २५६ |
| ७-कालनेमिका कपट, हनुमान्जीद्वारा उसका वध, लक्ष्मणजीका सचेत होना और रावणका कुम्भकर्णको जगाना | ... ... | २६५ |
| ८-कुम्भकर्ण-वध | ... ... ... | २७० |
| ९-मेघनाद-वध | ... ... ... | २७६ |
| १०-रावणका यज्ञ-विध्वंस तथा उसका मन्दोदरीको समझाना | ... ... | २८२ |
| ११-राम-रावण-संग्राम और रावणका वध | ... ... | २८७ |
| १२-विभीषणका राज्याभिषेक और सीताजीकी अग्नि-परीक्षा | ... ... | २९४ |
| १३-देवताओंका भगवान् रामकी स्तुति करना, सीताजीसहित अग्निदेवका प्रकट होना, अयोध्याके लिये प्रस्थान | ... ... | ३०१ |
| १४-अयोध्या-यात्रा, भरद्वाज मुनिका आतिथ्य तथा भरत-मिलाप | ... ... | ३०७ |
| १५-श्रीराम-राज्याभिषेक | ... ... | ३१५ |
| १६-वानरोंकी विदा तथा ग्रन्थप्रशंसा | ... ... | ३२२ |
उत्तरकाण्ड
| सर्ग | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १-भगवान् रामके यहाँ अगस्त्यादि मुनीश्वरोंका आना और रावणादि राक्षसोंका पूर्वचरित्र सुनाना | ... ... | ३२६ |
| २-राक्षसोंके राज्यस्थापनका विवरण | ... ... | ३३४ |
| ३-वाली और सुग्रीवका पूर्वचरित्र तथा रावण-सनत्कुमार-संवाद | ... ... | ३४१ |
| ४-रामराज्यका वर्णन तथा सीता-वनवास | ३४६ | |
| ५-रामगीता | ... ... ... | ३५१ |
| ६-लवण-वध, भगवान् रामके यज्ञमें कुश-लवके सहित महर्षि वाल्मीकिका पधारना और कुशको परमार्थोपदेश करना | ... ... ... | ३६० |
| ७-भगवान् रामके यज्ञमें कुश और लवका गान, सीताजीका पृथिवी-प्रवेश, रामचन्द्रजीका माताको उपदेश | ... ... | ३६५ |
| ८-कालका आगमन, लक्ष्मणजीका परित्याग और उनका स्वर्गगमन | ... ... | ३७२ |
| ९-महाप्रयाण | ... ... ... | ३७८ |
चित्र-सूची
| क्र. | चित्र | प्रकार | पृष्ठ | क्र. | चित्र | प्रकार | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १- | रामचतुष्टय | (रंगीन) | आदिमें | ५- | दासभक्त हनुमान्जी | (रंगीन) | १५१ |
| २- | सदाप्रसन्न राम | ( " ) | ३ | ६- | अशोकवाटिकामें सीताजी | ( " ) | २०३ |
| ३- | श्रीसीताराम | ( " ) | ४१ | ७- | श्रीराम-रावण-युद्ध | ( " ) | २३३ |
| ४- | रामजटायु | (सादा) | १०३ | ८- | क्रीडावनमें श्रीरामसीता | (सुनहरी) | ३२६ |
✤ श्रीसीतारामभ्यां नमः ✤
अध्यात्मरामायण
हिन्दी-अनुवादसहित
मायातीतं माधवमाद्यं जगदादिं, मानातीतं मोहविनाशं मुनिवन्द्यम् ।
योगिध्येयं योगविधानं परिपूर्णं, वन्दे रामं रञ्जितलोकं रमणीयम् ॥
[पृष्ठ पर केवल पुष्प-चित्र (Decorative Illustration) अंकित है, कोई पाठ नहीं है।]
अध्यात्मरामायण-माहात्म्य
ॐ
अध्यात्मरामायण
माहात्म्य
रामं विश्वमयं वन्दे रामं वन्दे रघूद्वहम् । रामं विप्रवरं वन्दे रामं श्यामाग्रजं भजे ॥
यस्य वागांशुतश्च्यूतं रम्यं रामायणामृतम् । शैलजासेवितं वन्दे तं शिवं सोमरूपिणम् ॥
सच्चिदानन्दसन्दोहं भक्तिभूतिविभूषणम् । पूर्णानन्दमहं वन्दे सद्गुरुं शङ्करं स्वयं ॥
अज्ञानध्वान्तसंहर्त्री ज्ञानालोकविलासिनी । चन्द्रचूडवचश्चन्द्रचन्द्रिकेयं विराजते ॥
अप्रमेयत्रयातीतनिर्मलज्ञानमूर्तये ।
मनोगिरां विदूराय दक्षिणामूर्तये नमः ॥ १ ॥
जो प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे परे, त्रिगुणातीत, मलहीन, ज्ञानस्वरूप और मन, वाणी आदिके अविषय हैं उन दक्षिणामूर्ति भगवान् (सदाशिव) को नमस्कार है ॥ १ ॥
सूत उवाच
कदाचिन्नारदो योगी परानुग्रहवाञ्छया ।
पर्यटन्सकलाँल्लोकान्सत्यलोकमुपागमत् ॥ २ ॥
तत्र दृष्ट्वा मूर्तिमद्भिश्छन्दोभिः परिवेष्टितम् ।
बालार्कप्रभया सम्यग्भासयन्तं सभागृहम् ॥ ३ ॥
मार्कण्डेयादिमुनिभिः स्तूयमानं मुहुर्मुहुः ।
सर्वार्थगोचरज्ञानं सरस्वत्या समन्वितम् ॥ ४ ॥
चतुर्मुखं जगन्नाथं भक्ताभीष्टफलप्रदम् ।
प्रणम्य दण्डवद्भक्त्या तुष्टाव मुनिपुङ्गवः ॥ ५ ॥
**श्रीसूतजी बोले—**एक समय योगिराज नारदजी दूसरोंपर कृपा करनेके लिये समस्त लोकोंमें विचरते हुए सत्यलोकमें पहुँचे ॥ २ ॥ वहाँ मूर्तिमान् वेदोंसे घिरे हुए, अपनी बालसूर्यके समान प्रभासे सभाभवनको पूर्णतया देदीप्यमान करते हुए, मार्कण्डेय आदि मुनिजनोंसे बारम्बार स्तुति किये जाते हुए, सम्पूर्ण पदार्थोंका ज्ञान रखनेवाले और भक्तोंको इच्छित फल देनेवाले सरस्वतीयुक्त जगत्पति ब्रह्माजीको देखकर मुनिश्रेष्ठ नारदजीने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और भक्तिभावसे स्तुति की ॥ ३–५ ॥
सन्तुष्टस्तं मुनिं प्राह स्वयम्भूर्वैष्णवोत्तम् ।
किं प्रष्टुकामस्त्वमसि तद्गदिष्यामि ते मुने ॥ ६ ॥
तब स्वयम्भू ब्रह्माजीने प्रसन्न होकर वैष्णवाग्रणी श्रीनारदजीसे कहा—"मुने ! तुम क्या पूछना चाहते हो ? मैं तुमसे वह सब कहूँगा" ॥ ६ ॥
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य मुनिर्ब्रह्माणमब्रवीत् ।
त्वत्तः श्रुतं मया सर्वं पूर्वमेव शुभाशुभम् ॥ ७ ॥
इदानीमेकमेवास्ति श्रोतव्यं सुरसत्तम ।
तद्रहस्यमपि ब्रूहि यदि तेऽनुग्रहो मयि ॥ ८ ॥
ब्रह्माजीके ये वचन सुनकर नारदजीने उनसे कहा, "हे देवश्रेष्ठ ! शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन तो मैं आपसे पहले ही सुन चुका हूँ। अब मुझे एक ही बात और सुननी है; यदि मुझपर आपकी कृपा है तो गोपनीय होनेपर भी वह सुनाइये ॥ ७-८ ॥ अब घोर कलियुगके आनेपर
मा अध्यात्मरामायण
प्राप्ते कलियुगे घोरे नराः पुण्यविवर्जिताः ।
दुराचाररताः सर्वे सत्यवार्तापराङ्मुखाः ॥ ९ ॥
मनुष्य पुण्यकर्म छोड़ देंगे और सत्यभाषणसे विमुख होकर दुराचारमें प्रवृत्त हो जायँगे ॥ ९ ॥
परापवादनिरताः परद्रव्याभिलाषिणः ।
परस्त्रीसक्तमनसः परहिंसापरायणाः ॥ १० ॥
वे दूसरोंकी निन्दामें तत्पर रहेंगे, दूसरोंके धनकी इच्छा करेंगे, परस्त्रीमें चित्त लगावेंगे और परायी हिंसा करेंगे ॥ १० ॥
देहात्मदृष्टयो मूढा नास्तिकाः पशुबुद्धयः ।
मातापितृकृतद्वेषाः स्त्रीदेवाः कामकिङ्कराः ॥ ११ ॥
ये मूढ़ देहमें ही आत्मबुद्धि करेंगे, शास्त्र और ईश्वरसे विमुख होंगे, उनकी बुद्धि पशुओंके समान होगी और वे कामके गुलाम होकर स्त्रीके भक्त और माता-पिताके द्रोही बनेंगे ॥ ११ ॥
विप्रा लोभग्रहग्रस्ता वेदविक्रयजीविनः ।
धनार्जनार्थमभ्यस्तविद्या मदविमोहिताः ॥ १२ ॥
ब्राह्मणगण लोभरूपी ग्रहसे ग्रस्त और वेद बेचकर अपनी आजीविका चलानेवाले होंगे, वे धनोपार्जनके लिये ही विद्याभ्यास करेंगे और (विद्या तथा ब्राह्मणत्वके) मदमे उन्मत्त हो जायँगे ॥ १२ ॥
त्यक्तस्वजातिकर्माणः प्रायशः परवञ्चकाः ।
क्षत्रियाश्च तथा वैश्याः स्वधर्मत्यागशीलिनः ॥ १३ ॥
क्षत्रिय और वैश्यगण भी स्वधर्मको त्यागनेवाले तथा अपने जाति-कर्मोंको छोड़कर प्रायः दूसरोंको ठगनेवाले ही होंगे ॥ १३ ॥
तद्वच्छूद्राश्च ये केचिद्ब्राह्मणाचारतत्पराः ।
स्त्रियश्च प्रायशो भ्रष्टा भर्तृवज्ञाननिर्भयाः ॥ १४ ॥
इसी प्रकार जो शूद्र होंगे वे भी ब्राह्मणोंके आचारमें तत्पर हो जायँगे तथा स्त्रियाँ प्रायः भ्रष्टाचारिणी और अपने पतिके अपमान करनेमें निडर होंगी ॥ १४ ॥
श्वशुरद्रोहकारिण्यो भविष्यन्ति न संशयः ।
एतेषां नष्टबुद्धीनां परलोकः कथं भवेत् ॥ १५ ॥
निस्सन्देह वे अपने सास-ससुरोंसे द्रोह करेंगी। इन नष्ट-बुद्धियोंका परलोक किस प्रकार सुधरेगा ? ॥ १५ ॥
इति चिन्ताकुलं चित्तं जायते मम सन्ततम् ।
लघूपायेन येनैषां परलोकगतिर्भवेत् ।
तमुपायमुपारूढि सर्वं वेत्ति यतो भवान् ॥ १६ ॥
इस चिन्तासे मेरा चित्त निरन्तर व्याकुल रहता है। जिस सुगम उपायसे इनका परलोक सुधर सकता हो वह आप मुझे बतलाइये, क्योंकि आप सभी कुछ जानते हैं" ॥ १६ ॥
इत्युपर्षेर्वाक्यमाकर्ण्य प्रत्युवाचाम्बुजासनः ।
साधु पृष्टं त्वया साधो वक्ष्ये तच्छृणु सादरम् ॥ १७ ॥
देवर्षि नारदजीके ये वचन सुनकर कमलासन ब्रह्माजी बोले—"हे साधो ! तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है। मैं उसे बतलाता हूँ, तुम श्रद्धापूर्वक सुनो ॥ १७ ॥
पुरा त्रिपुरहन्तारं पार्वती भक्तवत्सला ।
श्रीरामतत्त्वं जिज्ञासुः पप्रच्छ विनयान्विता ॥ १८ ॥
"पूर्वकालमें भक्तवत्सला पार्वतीजीने श्रीराम-तत्त्वकी जिज्ञासासे त्रिपुर-विनाशक भगवान् शंकरसे विनयपूर्वक प्रश्न किया था ॥ १८ ॥
प्रियायै गिरिशस्तस्यै गूढं व्याख्यातवान्स्वयम् ।
पुराणोत्तममध्यात्मरामायणमिति स्मृतम् ॥ १९ ॥
तब अपनी प्रियासे श्रीमहादेवजीने जिस गूढ़ रहस्यका वर्णन किया था वह उत्तम पुराण अध्यात्मरामायणके नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ १९ ॥
तत्पार्वती जगद्धात्री पूजयित्वा दिवानिशम् ।
आलोचयन्ती स्वानन्दमग्ना तिष्ठति साम्प्रतम् ॥ २० ॥
अब जगज्जननी पार्वतीजी उसका पूजन कर रात-दिन उसीका मनन करती आत्मानन्दमें मग्न रहती हैं ॥ २० ॥
प्रचरिष्यति तल्लोके प्राण्यदृष्टवशाद्यदा ।
तस्याध्ययनमात्रेण जना यास्यन्ति सद्गतिम् ॥ २१ ॥
जिस समय प्राणियोंके सौभाग्यसे उसका लोकमें प्रचार होगा उस समय उसके अध्ययनमात्रसे लोग शुभगति प्राप्त करेंगे
| माहात्म्य | ५ |
|---|---|
| तावद्विजृम्भते पापं ब्रह्महत्यापुरःसरम् ।<br>यावज्जगति नाध्यात्मरामायणमुदेष्यति ॥२२॥ | ॥२१॥ संसारमें ब्रह्म-हत्यादि पाप तभीतक रहेंगे जबतक अध्यात्मरामायणका प्रादुर्भाव नहीं होगा ॥ २२ ॥ |
| तावत्कलिमहोत्साहो निःशङ्कं सम्प्रवर्तते ।<br>यावज्जगति नाध्यात्मरामायणमुदेष्यति ॥२३॥ | कलियुगका महान् उत्साह तभीतक निःशंक रहेगा जबतक संसारमें अध्यात्मरामायणका उदय न होगा ॥ २३ ॥ |
| तावद्यमभटाः शूराः सञ्चरिष्यन्ति निर्भयाः ।<br>यावज्जगति नाध्यात्मरामायणमुदेष्यति ॥२४॥ | यमराजके शूरवीर दूत तभीतक निर्भय विचरते रहेंगे जबतक जगत्में अध्यात्मरामायण प्रकट नहीं होगी ॥ २४ ॥ |
| तावत्सर्वाणि शास्त्राणि विवदन्ते परस्परम् ॥२५॥<br>तावत्स्वरूपं रामस्य दुर्बोधं महतामपि ।<br>यावज्जगति नाध्यात्मरामायणमुदेष्यति ॥२६॥ | और सम्पूर्ण शास्त्रोंमें परस्पर विवाद तभीतक रहेगा तथा महापुरुषोंको भी भगवान् रामका स्वरूप तभीतक दुर्बोध रहेगा जबतक संसारमें अध्यात्मरामायणका प्रकाश नहीं होगा ॥ २५-२६ ॥ |
| अध्यात्मरामायणसङ्कीर्तनश्रवणादिजम् ।<br>फलं वक्तुं न शक्नोमि कार्त्स्न्येन मुनिसत्तम ॥२७॥<br>तथाऽपि तस्य माहात्म्यं वक्ष्ये किञ्चित्तवानघ।<br>शृणु चित्तं समाधाय शिवेनोक्तं पुरा मम ॥२८॥ | "हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं अध्यात्मरामायणके कीर्तन और श्रवणसे होनेवाले फलका पूर्णतया वर्णन नहीं कर सकता, तथापि हे अनघ ! मैं तुम्हें उसका थोड़ा-सा माहात्म्य सुनाता हूँ। इसे पूर्वकालमें मुझसे शिवजीने कहा था; तुम सावधान होकर सुनो—॥२७-२८॥ |
| अध्यात्मरामायणतः श्लोकं श्लोकार्धमेव वा ।<br>यः पठेद्भक्तिसंयुक्तः स पापान्मुच्यते क्षणात्॥२९॥ | जो पुरुष अध्यात्मरामायणका एक अथवा आधा श्लोक भी भक्तिपूर्वक पढ़ता है वह तत्क्षण पापमुक्त हो जाता है ॥२९॥ |
| यस्तु प्रत्यहमध्यात्मरामायणमनन्यधीः ।<br>यथाशक्ति वदेद्भक्त्या स जीवन्मुक्त उच्यते ॥३०॥ | जो इस अध्यात्मरामायणको नित्यप्रति अनन्य बुद्धिसे भक्तिपूर्वक यथाशक्ति सुनाता है वह जीवन्मुक्त कहलाता है ॥३०॥ |
| यो भक्त्यार्चयतेऽध्यात्मरामायणमतन्द्रितः।<br>दिनेदिनेऽश्वमेधस्य फलं तस्य भवेन्मुने ॥३१॥ | हे मुने ! जो पुरुष आलस्य छोड़कर भक्तिभावसे प्रतिदिन अध्यात्मरामायणका पूजन करता है उसे अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है ॥ ३१ ॥ |
| यदृच्छयापि योऽध्यात्मरामायणमनादरात्।<br>अन्यतः शृणुयान्मर्त्यः सोऽपि मुच्येत पातकात् ३२ | जो मनुष्य दूसरोंसे अनियमपूर्वक अनादरसे भी अध्यात्मरामायण श्रवण करता है वह भी पातकसे छूट जाता है ॥ ३२ ॥ |
| नमस्करोति योऽध्यात्मरामायणमदूरतः ।<br>सर्वदेवार्चनफलं स प्राप्नोति न संशयः ॥३३॥ | जो कोई अध्यात्मरामायणके निकट जाकर उसे नमस्कार करता है वह समस्त देवताओंकी पूजाका फल पाता है—इसमें सन्देह नहीं ॥ ३३ ॥ |
| लिखित्वा पुस्तकेऽध्यात्मरामायणमशेषतः ।<br>यो दद्याद्रामभक्तेभ्यस्तस्य पुण्यफलं शृणु ॥३४॥ | "जो पुरुष अध्यात्मरामायणकी सम्पूर्ण पुस्तक लिखकर राम-भक्तोंको देता है उसे जो पुण्य होता है उसका फल सुनो ॥३४॥ |
| अधीतेषु च वेदेषु शास्त्रेषु व्याकृतेषु च ।<br>यत्फलं दुर्लभं लोके तत्फलं तस्य सम्भवेत् ॥३५॥ | उसे वह फल मिलता है जो वेदोंके पढ़नेसे और शास्त्रोंकी व्याख्या करनेसे भी संसारमें दुर्लभ है ॥ ३५ ॥ |
| एकादशीदिनेऽध्यात्मरामायणमुपोषितः ।<br>यो रामभक्तः सदसि व्याकरोति नरोत्तमः ॥३६॥ | जो नरश्रेष्ठ रामभक्त एकादशीको उपवास करके सभामें अध्यात्मरामायणकी व्याख्या करता है, हे वैष्णवश्रेष्ठ ! उसके |
न अध्यात्मरामायण
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्य पुण्यफलं वक्ष्ये शृणु वैष्णवसत्तम ।<br>प्रत्यक्षरं तु गायत्रीपुरश्चर्याफलं भवेत् ॥३७॥ | पुण्यका फल बतलाता हूँ, सुनो। उसे एक-एक अक्षर के पढ़नेमें गायत्रीके पुरश्चरणका फल मिलता है ॥३६-३७॥ |
| उपवासव्रतं कृत्वा श्रीरामनवमीदिने ।<br>रात्रौ जागरितोऽध्यात्मरामायणमनन्यधीः।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि तस्य पुण्यं वदाम्यहम् ॥३८॥ | जो पुरुष रामनवमीके दिन निराहार रहकर और फिर रात्रिको जागरण कर अनन्य बुद्धि-से अध्यात्मरामायणको पढ़ता या सुनता है, अब मैं उसका पुण्य बतलाता हूँ ॥३८॥ |
| कुरुक्षेत्रादिनिखिलपुण्यतीर्थेष्वनेकंशः ।<br>आत्मतुल्यं धनं सूर्यग्रहणे सर्वतोमुखे ॥३९॥<br>विप्रेभ्यो व्यासुल्येभ्यो दत्त्वा यत्फलमश्नुते ।<br>तत्फलं सम्भवेत्तस्य सत्यं सत्यं न संशयः ॥४०॥ | कुरुक्षेत्रादि सम्पूर्ण पवित्र तीर्थोंमें सर्वग्रस्त सूर्यग्रहणके समय अनेकों बार व्यासजीके समान ब्राह्मणोंको अपने बराबर धन देनेसे जो फल होता है उसे वही फल मिलता है; इसमें कोई सन्देह नहीं, यह सर्वथा सत्य है, सर्वथा सत्य है ॥३९-४०॥ |
| यो गायते मुदाऽध्यात्मरामायणमहर्निशम् ।<br>आज्ञां तस्य प्रतीक्षन्ते देवा इन्द्रपुरोगमाः ॥४१॥ | जो मनुष्य अहर्निश प्रसन्नचित्तसे अध्यात्मरामायणका गान करता है उसकी आज्ञाकी इन्द्रादि देवगण प्रतीक्षा किया करते हैं ॥४१॥ |
| पठन्प्रत्यहमध्यात्मरामायणमनुव्रतः ।<br>यद्यत्करोति तत्कर्म ततः कोटिगुणं भवेत् ॥४२॥ | अध्यात्मरामायणका नित्यप्रति नियमपूर्वक पाठ करने-से मनुष्य जो कुछ पुण्य-कर्म करता है वह करोड़-गुना हो जाता है ॥४२॥ |
| तत्र श्रीरामहृदयं यः पठेत्सुसमाहितः ।<br>स ब्रह्मघ्नोऽपि पूतात्मा त्रिभिरेव दिनैर्भवेत् ॥४३॥ | “इस (अध्यात्मरामायण) मेंसे जो पुरुष खूब समाहित होकर श्रीरामहृदयका पाठ करता है वह ब्रह्महत्यारा भी हो तो भी तीन दिनमें ही पवित्र हो जाता है ॥४३॥ |
| श्रीरामहृदयं यस्तु हनूमत्प्रतिमान्तिके ।<br>त्रिः पठेत्प्रत्यहं मौनी स सर्वेप्सितभाग्भवेत् ॥४४॥ | जो पुरुष हनुमान्जीकी प्रतिमाके समीप प्रतिदिन तीन बार मौन होकर श्रीरामहृदयका पाठ करता है वह समस्त इच्छित फल प्राप्त करता है ॥४४॥ |
| पठन् श्रीरामहृदयं तुलस्यश्वत्थयोर्यदि ।<br>प्रत्यक्षरं प्रकुर्वीत ब्रह्महत्यानिवर्तनम् ॥४५॥ | और यदि कोई पुरुष तुलसी या पीपलके निकट श्रीराम-हृदयका पाठ करे तो वह एक-एक अक्षरपर (अपनी) ब्रह्महत्या (जैसे पापों) को दूर कर देता है ॥४५॥ |
| श्रीरामगीतामाहात्म्यं कृत्स्नं जानाति शङ्करः ।<br>तदर्धं गिरिजा वेत्ति तदर्धं वेद्म्यहं मुने ॥४६॥ | “हे मुने ! श्रीरामगीताका माहात्म्य पूरा-पूरा तो श्रीमहादेवजी ही जानते हैं; उनसे आधा पार्वतीजी जानती हैं और उनसे भी आधा मैं जानता हूँ ॥४६॥ |
| तत्ते किञ्चित्प्रवक्ष्यामि कृत्स्नं वक्तुं न शक्यते ।<br>यज्ज्ञात्वा तत्क्षणालोकश्चित्तशुद्धिमवाप्नुयात्।४७। | सो उसे पूरा कह भी नहीं सकता, उसमेंसे थोड़ा-सा तुम्हें सुनाता हूँ जिसके जाननेमात्रसे चित्त तत्काल शुद्ध हो जाता है ॥४७॥ |
| श्रीरामगीता यत्पापं न नाशयति नारद ।<br>तन्न नश्यति तीर्थादौ लोके क्वापि कदाचन ।<br>तन्न पश्याम्यहं लोके मार्गमाणोऽपि सर्वदा ॥४८॥ | हे नारद ! जिस पापको श्रीरामगीताने नष्ट नहीं किया वह संसारमें कभी किसी तीर्थादिसे भी नष्ट नहीं हो सकता, मैं सदा ढूँढ़नेपर भी उस पापको नहीं देख पाता ॥४८॥ |
| रामेणोपनिषत्सिन्धुमुन्मथ्योत्पादितां मुदा । | जिस गीतामृतको भगवान् रामने उपनिषत्सागरका |
माहात्म्य \qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad मः
लक्ष्मणायार्पितां गीतासुधां पीत्वाऽमरो भवेत् ४९
जमदग्निसुतः पूर्वं कार्तवीर्यवधेच्छया ।
धनुर्विद्यामभ्यसितुं महेशस्यान्तिके वसन् ॥५०॥
अधीयमानां पार्वत्या रामगीतां प्रयत्नतः ।
श्रुत्वा गृहीत्वाऽऽशु पठन्नारायणकलामागात्॥५१॥
ब्रह्महत्यादिपापानां निष्कृतिं यदि वाञ्छति।
रामगीतां मासमात्रं पठित्वा मुच्यते नरः ॥५२॥
दुष्प्रतिग्रहदुर्भोज्यदुरालापादिसम्भवम् ।
पापं यत्तत्कीर्तनेन रामगीता विनाशयेत् ॥५३॥
शालग्रामशिलाग्रे च तुलस्यश्वत्थसन्निधौ ।
यतीनां पुरतस्तद्वद्रामगीतां पठेत्तु यः ॥५४॥
स तत्फलमवाप्नोति यद्वाचोऽपि न गोचरम्॥५५॥
रामगीतां पठन्भक्त्या यः श्राद्धे भोजयेद्द्विजान् ।
तस्य ते पितरः सर्वे यान्ति विष्णोः परं पदम् ॥५६॥
एकादश्यां निराहारो नियतो द्वादशीदिने ।
स्थित्वाऽगस्त्यतरोर्मूले रामगीतां पठेत्तु यः ।
स एव राघवः साक्षात्सर्वदेवैश्च पूज्यते ॥५७॥
विना दानं विना ध्यानं विना तीर्थावगाहनम् ।
रामगीतां नरोऽधीत्य तदनन्तफलं लभेत् ॥५८॥
बहुना किमिहोक्तेन शृणु नारद तत्त्वतः ।
श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासागमशतानि च ।
अर्हन्ति नाल्पमध्यात्मरामायणकलामपि ॥५९॥
अध्यात्मरामचरितस्य मुनीश्वराय
माहात्म्यमेतदुदितं कमलासनेन ।
यः श्रद्धया पठति वा शृणुयात्स मर्त्यः
प्राप्नोति विष्णुपदवीं सुरपूज्यमानः॥६०॥
मन्थन कर निकाला और फिर बड़ी प्रसन्नतासे लक्ष्मण-जीको दिया (मनुष्यको चाहिये कि) उसका पान करके अमर हो जाय ॥ ४९ ॥ पूर्वकालमें सहस्रार्जुनके वधकी इच्छासे जमदग्निनन्दन परशुरामजी धनुर्विद्याका अभ्यास करनेके लिये श्रीमहादेवजीके पास रहते थे ॥५०॥ उस समय रामगीताका अध्ययन करती हुई पार्वतीजीसे इसे यत्नपूर्वक सुनकर और तुरन्त ही हृदयंगम कर इसका पाठ करते-करते वे श्रीनारायणकी कलारूप हो गये ॥ ५१ ॥ यदि कोई पुरुष ब्रह्महत्या आदि घोर पापोंसे मुक्त होना चाहे तो केवल एकमास रामगीताका पाठ करनेसे छूट सकता है ॥५२॥ बुरे दान, निषिद्ध भोजन और खोटी बोलचाल आदिसे जो पाप होता है उसे रामगीता पाठमात्रसे नष्ट कर देती है ॥५३॥ जो पुरुष शालग्राम शिलाके आगे, तुलसी या पीपलके पास अथवा यतिजनोंके सामने रामगीताका पाठ करता है उसे वह फल मिलता है जो वाणीका भी विषय नहीं है ॥५४-५५॥ जो मनुष्य श्राद्धमें रामगीताका भक्तिपूर्वक पाठ करके ब्राह्मणोंको भोजन कराता है उसके वे समस्त पितृगण भगवान् विष्णुके परम धामको जाते हैं ॥५६॥ जो पुरुष एकादशीके दिन निराहार और जितेन्द्रिय रहकर द्वादशीको अगस्त्य वृक्षके नीचे बैठकर रामगीताका पाठ करता है वह साक्षात् रामरूप ही है, उसकी समस्त देवगण पूजा करते हैं ॥५७॥ रामगीताका पाठ करनेसे मनुष्य बिना किसी दान, ध्यान अथवा तीर्थस्नानके ही अक्षय फल पाता है ॥५८॥ हे नारद ! और अधिक क्या कहा जाय जो वास्तविक बात है वह सुन—श्रुति, स्मृति, पुराण और इतिहास आदि सैकड़ों शास्त्र श्रीअध्यात्मरामायणकी एक तुच्छ कलाके समान भी नहीं हैं” ॥५९॥
यह अध्यात्मरामायणका माहात्म्य श्रीब्रह्माजीने मुनिराज नारदसे कहा है । इसे जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक पढ़ता या सुनता है वह देवताओंसे पूजित होकर श्रीविष्णुभगवान्का पद प्राप्त करता है ॥६०॥
इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे उत्तरखण्डेऽध्यात्मरामायण-
माहात्म्यं सम्पूर्णम्
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बालकाण्ड
श्रीसीतारामाभ्यां नमः
अध्यात्मरामायण
बालकाण्ड
आलोक्य यस्यातिललामलीलां सद्भाग्यभाजौ पितरौ कृतार्थौ । तमर्भकं दर्पकदर्पचौरं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥
[चित्र: ध्यानस्थ भगवान् शिव]
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सदाप्रसन्न राम
सोऽयं परात्मा पुरुषः पुराणः एकः स्वयंज्योतिरनन्त आद्यः।
मायातनुं लोकविमोहनीयां धत्ते परानुग्रह एष रामः॥
(अ० रा० बाल० ५ । ४६)
बालकाण्ड - सर्ग १: रामहृदय
ॐ
अध्यात्मरामायण
बालकाण्ड
प्रथम सर्ग
रामहृदय
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यः पृथ्वीभरवारणाय दिविजैः<br> संप्रार्थितश्चिन्मयः<br>संजातः पृथिवीतले रविकुले<br> मायामनुष्योऽव्ययः ।<br>निश्चक्रं हतराक्षसः पुनरगाद्<br> ब्रह्मत्वमाद्यं स्थिरां<br>कीर्तिं पापहरां विधाय जगतां<br> तं जानकीशं भजे ॥ १ ॥ | जिन चिन्मय अविनाशी प्रभुने पृथिवीका भार उतारनेके लिये देवताओंकी प्रार्थनासे पृथिवीतलपर सूर्यवंशमें माया-मानवरूपसे अवतार लिया और जो राक्षसोंके समूहको मारकर तथा संसारमें अपनी पापविनाशिनी अविचल कीर्ति स्थापितकर पुनः अपने आद्य ब्रह्मस्वरूपमें लीन हो गये उन श्रीजानकीवल्लभका मैं भजन करता हूँ ॥ १ ॥ |
| विश्वोद्भवस्थितिलयादिषु हेतुमेकं<br> मायाश्रयं विगतमायमचिन्त्यमूर्तिम् ।<br>आनन्दसान्द्रममलं निजबोधरूपं<br> सीतापतिं विदिततत्त्वमहं नमामि ॥ २ ॥ | जो विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और लय आदिके एकमात्र कारण हैं, मायाके आश्रय होकर भी मायातीत हैं, अचिन्त्यस्वरूप हैं, आनन्दघन हैं, उपाधिकृत दोषोंसे रहित हैं, तथा स्वयंप्रकाशस्वरूप हैं उन तत्त्ववेत्ता श्रीसीतापतिको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥ |
| पठन्ति ये नित्यमनन्यचेतसः<br> शृण्वन्ति चाध्यात्मिकसंज्ञितं शुभम् ।<br>रामायणं सर्वपुराणसंमतं<br> निर्धूतपापा हरिमेव यान्ति ते ॥ ३ ॥ | जो लोग इस सर्व-पुराण-सम्मत पवित्र अध्यात्मरामायणका एकाग्र-चित्तसे नित्य पाठ करते हैं और जो इसे सुनते हैं वे पापरहित होकर श्रीहरिको ही प्राप्त करते हैं ॥ ३ ॥ |
| अध्यात्मरामायणमेव नित्यं<br> पठेद्यदीच्छेद्भवबन्धमुक्तिम् ।<br>गवां सहस्रायुतकोटिदानात्<br> फलं लभेद्यः शृणुयात्स नित्यम् ॥ ४ ॥ | यदि कोई संसार-बन्धनसे मुक्त होना चाहता हो तो वह अध्यात्मरामायणका ही नित्य पाठ करे। जो कोई मनुष्य इसका नित्य श्रवण करता है वह लाखों करोड़ गो-दानका फल प्राप्त करता है ॥ ४ ॥ |
| पुरारिगिरिसंभूता श्रीरामार्णवसंगता ।<br>अध्यात्मरामगङ्गेयं पुनाति भुवनत्रयम् ॥ ५ ॥ | श्रीशंकररूप पर्वतसे निकली हुई रामरूप समुद्रमें मिलनेवाली यह अध्यात्मरामायणरूपिणी गंगा त्रिलोकीको पवित्र कर रही है ॥ ५ ॥ |
| ४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग १ |
|---|
कैलासाग्रे कदाचिद्रविशतविमले मन्दिरे रत्नपीठे
संविष्टं ध्याननिष्ठं त्रिनयनमभयं सेवितं सिद्धसंघैः ।
देवी वामाङ्कसंस्था गिरिवरतनया पार्वती भक्तिनम्रा
प्राहैदं देवमीशं सकलमलहरं वाक्यमानन्दकन्दम् ॥ ६ ॥
पार्वत्युवाच
नमोऽस्तु ते देव जगन्निवास सर्वात्मदृक् त्वं परमेश्वरोऽसि ।
पृच्छामि तत्त्वं पुरुषोत्तमस्य सनातनं त्वं च सनातनोऽसि ॥ ७ ॥
गोप्यं यदत्यन्तमनन्यवाच्यं वदन्ति भक्तेषु महानुभावाः ।
तदप्यहोऽहं तव देव भक्ता प्रियोऽसि मे त्वं वद यत्तु पृष्टम् ॥ ८ ॥
ज्ञानं सविज्ञानमथाशुभक्ति-वैराग्ययुक्तं च मितं विभास्वत् ।
जानाम्यहं योषिदपि त्वदुक्तं यथा तथा ब्रूहि तरन्ति येन ॥ ९ ॥
पृच्छामि चान्यच्च परं रहस्यं तदेव चाग्रे वद वारिजाक्ष ।
श्रीरामचन्द्रेऽखिललोकसारे भक्तिर्दृढा नौर्भवति प्रसिद्धा ॥ १० ॥
भक्तिः प्रसिद्धा भवमोक्षणाय नान्यत्ततः साधनमस्ति किञ्चित् ।
तथापि हृत्संशयबन्धनं मे विभेत्तुमर्हस्यमलोक्तिभिस्त्वम् ॥ ११ ॥
वदन्ति रामं परमेकमाद्यं निरस्तमायागुणसंप्रवाहम् ।
भजन्ति चाहर्निशमप्रमत्ताः परं पदं यान्ति तथैव सिद्धाः ॥ १२ ॥
वदन्ति केचित्परमोऽपि रामः स्वाविद्यया संवृतमात्मसंज्ञम् ।
जानाति नात्मानमतः परेण सम्बोधितो वेद परात्मतत्त्वम् ॥ १३ ॥
हिन्दी-अनुवाद
एक समय कैलाशपर्वतके शिखरपर सैकड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान शुभ्र भवनमें रत्नसिंहासनपर ध्यानावस्थित बैठे हुए, सिद्ध-समूह-सेवित, नित्यनिर्भय, सर्वपापपहारी आनन्दकन्द देवदेव भगवान् त्रिनयनसे उनके वामाङ्कमें विराजमान श्रीगिरिराजकुमारी पार्वती ने भक्तिभावसे नम्रतापूर्वक ये वाक्य कहे ॥ ६ ॥
श्रीपार्वतीजी बोलीं—हे देव! हे जगन्निवास! आपको नमस्कार है; आप सबके अन्तःकरणोंके साक्षी और परमेश्वर हैं। मैं आपसे श्रीपुरुषोत्तम भगवान्का सनातन-तत्त्व पूछना चाहती हूँ, क्योंकि आप भी सनातन हैं ॥ ७ ॥ महानुभावलोग जो अत्यन्त गोपनीय विषय होता है तथा अन्य किसीसे कहने योग्य नहीं होता उसे भी अपने भक्तजनोंसे कह देते हैं। हे देव! मैं भी आपकी भक्त हूँ, मुझे आप अत्यन्त प्रिय हैं। इसलिये मैंने जो कुछ पूछा है वह वर्णन कीजिये ॥ ८ ॥ जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य संसार-समुद्रसे पार हो जाते हैं उस भक्ति और वैराग्यसे परिपूर्ण प्रकाशमय आत्मज्ञानका वर्णन आप विज्ञानसहित इस प्रकार स्वल्प शब्दोंमें कीजिये जिससे मैं स्त्री होनेपर भी आपके वचनोंको (सहज ही) समझ सकूँ ॥ ९ ॥ हे कमलनयन! मैं एक परम गुह्य रहस्य आपसे और पूछती हूँ, कृपया आप पहले उसे ही वर्णन करें। यह तो प्रसिद्ध ही है कि अखिल-लोक-सार श्रीरामचन्द्रजीकी विशुद्ध भक्ति संसार-सागरको तरनेके लिये सुदृढ़ नौका है ॥ १० ॥ संसारसे मुक्त होनेके लिये भक्ति ही प्रसिद्ध उपाय है उससे श्रेष्ठ और कोई भी साधन नहीं है; तथापि आप अपने विशुद्ध वचनोंसे मेरे हृदयकी संशय-ग्रन्थिका छेदन कीजिये ॥ ११ ॥ प्रमादरहित सिद्धगण श्रीरामचन्द्रजीको परम अद्वितीय, सबके आदिकारण और प्रकृतिके गुण-प्रवाहसे परे बतलाते हैं तथा वे अहर्निश उनका भजन करके परमपद भी प्राप्त करते हैं ॥ १२ ॥ परन्तु कोई-कोई कहते हैं कि राम परब्रह्म होनेपर भी अपनी मायासे आवृत्त हो जानेके कारण अपने आत्मस्वरूपको नहीं जानते थे। इसलिये अन्य (वशिष्ठादि) के उपदेशसे उन्होंने आत्मतत्त्वको जाना ॥ १३ ॥ (अतः मैं पूछती