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अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ
  • अध्याय ३१७ * ६५१

तीन सौ सोलहवाँ अध्याय

त्वरिता आदि विविध मन्त्र एवं कुब्जिका-विद्याका कथन

अग्निदेव कहते हैं—मुने! पहले 'हुं' रखे, फिर 'खे च च्छे'—ये तीन पद जोड़कर मन्त्रकी शोभा बढ़ावे। तत्पश्चात् 'क्षः स्त्रीं हूं क्षे' लिखकर अन्तमें 'फट्' जोड़ दे। (कुल मिलाकर) 'हुं खे च च्छे क्षः स्त्रीं हूं क्षे ह्रीं फट्।' यह दशाक्षरा त्वरिता-विद्या हुई। यह विद्या समस्त कार्योंको सिद्ध करनेवाली तथा विष, सर्पादिकामर्दन करनेवाली है। 'खे च च्छे'—यह त्र्यक्षर-विद्या काल (अथवा काले साँप)-के डँसे हुएको भी जीवन देनेवाली है॥ १-२॥

'ॐ हूं खे क्षः'—इस चतुरक्षरी विद्याका प्रयोग विष एवं सर्पदंशकी पीड़ाको नष्ट करनेवाला है। (पाठान्तर 'विषशत्रुप्रमर्दनः' के अनुसार उक्त विद्याका प्रयोग विष एवं शत्रु की बाधाको दूर करनेवाला है।) 'स्त्रीं हूं फट्'—इस विद्याका प्रयोग पाप तथा रोग आदिपर विजय दिलाता है। 'खे च'—इस द्वयक्षर मन्त्रका प्रयोग शत्रु एवं दुष्ट आदिकी बाधाको दूर करता है। 'हूं स्त्रीं ॐ'—इस मन्त्रका प्रयोग स्त्री आदिको वशमें करनेवाला है। 'खे स्त्रीं खे'—इस मन्त्रका प्रयोग कालसर्पद्वारा डँसे गये मनुष्यके जीवनकी रक्षा करता है तथा शत्रुओंपर विजय दिलाता है। 'क्षः स्त्रीं क्षः'—इसका प्रयोग वशीकरण तथा विजयका साधक है॥ ३-५॥

कुब्जिका-विद्या

**'ऐं ह्रीं श्रीं हसख्फ्रें हसौः ॐ नमो भगवति हसख्फ्रें कुब्जिके हस्रूं हस्रूं अघोरे घोरे अघोरमुखि छां छीं किणि किणि विच्चे हसौः हसख्फ्रें श्रीं ह्रीं ऐं'**¹—यह श्रीमती कुब्जिकाविद्या सब कार्योंको सिद्ध करनेवाली मानी गयी है॥ ६॥

अब उन मन्त्रोंका वर्णन किया जायगा, जिनका उपदेश भगवान् शंकरने स्कन्दको दिया था॥ ७॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'त्वरिता आदि नाना मन्त्रोंका तथा कुब्जिका-विद्याका वर्णन' नामक तीन सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१६॥


तीन सौ सत्रहवाँ अध्याय

सकलादि मन्त्रोंके उद्धारका क्रम

भगवान् शिव कहते हैं—स्कन्द! सकल, निष्कल, शून्य, कलाढ्य, समलंकृत, क्षपण, क्षय, अन्तःस्थ, कण्ठोष्ठ तथा आठवाँ शिव—'ये प्रासादपरासंज्ञक² मन्त्रके आठ स्वरूप माने गये हैं। ('कलाढ्य' सकलके और 'शून्य' निष्कलके अन्तर्गत है।) यह शब्दमय मन्त्र साक्षात् सदाशिवरूप


१. यह मन्त्र अग्निपुराणकी विभिन्न पोथियोंमें विभिन्न रूपसे छपा है। कोई भी शुद्ध नहीं है, अतः 'श्रीविद्यार्णव-तन्त्र' (अष्टम श्वास)-में जो इसका शुद्ध पाठ मिलता है, वही यहाँ रखा गया है। वहीं इसका विनियोग-वाक्य यों दिया गया है—'अस्य श्रीकुब्जिकामन्त्रस्य रुद्र ऋषिर्गायत्री छन्दः कुब्जिका देवता हसौः बीजं हसख्फ्रें शक्तिः हस्रूं कीलकम्, श्रीविद्याङ्गत्वेन विनियोगः।' पूनावाले अग्निपुराणमें इस मन्त्रका पाठ यों है—'ऐं ह्रीं श्रीं स्र्य्यै भगवति अम्बिके कुब्जिके स्म्र्य्यै स्फं स्फम् ऊं उं उं रण नमो घोरमुखिच्छां छीं किणि किणि बिच्छू स्फों ह्रों श्रीं ह्रीम् ऐं।' यही मन्त्र बहुल पाठान्तरके साथ चौखम्बावाले संस्करणमें भी है। दोनों जगहका पाठ अशुद्ध ही है। पिछले १४३, १४४ अध्यायोंमें भी कुब्जिकाका प्रसङ्ग द्रष्टव्य है।

२. 'श्रीविद्यार्णव-तन्त्र' में 'प्रासादपरा-संज्ञक' मन्त्रका उद्धार प्राप्त होता है। उसके अनुसार इसका स्वरूप है—'हसौँ'। यही यदि सादि हो जाय, अर्थात् 'सहौं' के रूपमें लिखा जाय तो 'परा-प्रासाद-मन्त्र' कहलाता है। केवल 'हौं' हो अर्थात् सकारसे संयुक्त न हो तो वह शुद्ध 'प्रासाद-मन्त्र' है।

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है। इसके जपसे सम्पूर्ण सिद्धियोंकी प्राप्ति होती है॥ १-२॥

अमृत, अंशुमान्, इन्द्र, ईश्वर, उग्र, ऊहक्, एकपाद, ऐल, ओज, औषध, अंशुमान् और वशी—ये क्रमशः अकार आदि बारह स्वरोंके वाचक हैं (यथा—अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अः)। तथा आगे जो शब्द दिये जा रहे हैं, ये ककार आदि अक्षरोंके सूचक हैं। कामदेव, शिखण्डी, गणेश, काल, शंकर, एकनेत्र, द्विनेत्र, त्रिशिख, दीर्घबाहु, एकपाद, अर्धचन्द्र, वलय, योगिनीप्रिय, शक्तीश्वर, महाग्रन्थि, तर्पक, स्थाणु, दन्तुर, निधीश, नन्दि, पद्म, शाकिनीप्रिय, मुखबिम्ब, भीषण, कृतान्त (यम), प्राण, तेजस्वी, शक्र, उदधि, श्रीकण्ठ, सिंह, शशाङ्क, विश्वरूप तथा नारसिंह (क्ष)। विश्वरूप अर्थात् हकारको बारह मात्राओंसे युक्त करके लिखे। (इस प्रकार ये बारह बीज होते हैं, जो अङ्गन्यास एवं करन्यासके उपयोगमें आते हैं।)॥ ३-८॥

विश्वरूप (ह)-को अंशुमान् (अनुस्वार) तथा ओज (ओकार)-से युक्त करके रखा जाय; उसमें शशिबीज (स)-का योग न किया जाय तो 'हौं'—यह प्रथम बीज उद्धृत होता है, जो 'ईशान'से सम्बद्ध है। उपर्युक्त बारह बीजोंमें पाँच ह्रस्वयुक्त बीज माने जाते हैं और छः दीर्घ-बीज। पहली और ग्यारहवीं मात्रामें एक ही 'हं' बीज बनता है। 'हं हिं हुं हैं हौं'—ये पाँच ह्रस्वयुक्त बीज हैं तथा शेष दीर्घयुक्त। ह्रस्व बीजोंमें विलोम-गणनासे (हौं) प्रथम है। शेष क्रमशः तृतीय, पञ्चम, सप्तम और नवम कहे गये हैं। द्वितीय आदि दीर्घ हैं। तृतीय बीज है—'हैं'। यह तत्पुरुष-सम्बन्धी बीज है, ऐसा जानो। पाँचवाँ बीज 'हुं' है, जो दक्षिणदिशावर्ती मुख—'अघोर'का बीज है। सातवाँ बीज है—'हिं'। इसे 'वामदेवका बीज' जानना चाहिये। इसके बाद रस (अमृत) संज्ञक मात्रा (अकार)-से युक्त सानुस्वार हकार अर्थात् 'हं' बीज है; वह उपर्युक्त गणनाक्रमसे नवाँ है और 'सद्योजात'से सम्बद्ध है। इस प्रकार उक्त पाँच बीजोंसे युक्त 'ईशान' आदि मुखोंको 'ब्रह्मपञ्चक' कहा गया है। इनके आदिमें 'प्रणव' तथा अन्तमें 'नमः' जोड़ दे। 'ईशान' आदि नामोंका चतुर्थ्यन्त प्रयोग करे तो सभी उनके लिये पूजोपयुक्त मन्त्र हो जाते हैं। यथा—'ॐ हौं ईशानाय नमः।' इत्यादि। इसी प्रकार 'ॐ हं सद्योजाताय नमः।' यह सद्योजात-देवताका मन्त्र है। द्वितीय, चतुर्थ आदि मात्राएँ दीर्घ हैं, अतः उनका हृदयादि अङ्गोंमें न्यास किया जाता है। द्वितीय बीजको बोलकर हृदय और अङ्ग-मन्त्र (नमः) बोलकर हृदयमें न्यास करे। यथा—'हां हृदयाय नमः, हृदि।' चतुर्थ बीज 'शिरोमन्त्र' है, जो हकारमें ईश्वर तथा अंशुमान् (ं) जोड़नेसे सम्पन्न होता है। यथा—'हीं शिरसे स्वाहा, शिरसि।' विश्वरूप (ह)-में ऊहक (ऊ) तथा अनुस्वार जोड़नेपर छठा बीज 'हूँ' बनता है। उसे 'शिखामन्त्र' जानना चाहिये। यथा—'हूं शिखायै वषट्, शिखायां हुम्।' अर्थात् कवचका मन्त्र आठवाँ बीज 'हैं' है। यथा—'हैं कवचाय हुम्—बाहुमूलयोः।' दसवाँ बीज 'हौं' नेत्र-मन्त्र कहा गया है। यथा—'हौं नेत्रत्रयाय वौषट्, नेत्रयोः।' अस्त्र-मन्त्र वशी (विसर्गयुक्त) है। शिखिध्वज! इसे शिवसंज्ञक माना गया है। यथा—'हः अस्त्राय फट्।' (इससे चारों ओर तर्जनी और अङ्गुष्ठद्वारा ताली बजाये।) हृदयादि अङ्गोंकी छः जातियाँ क्रमशः इस प्रकार हैं—नमः, स्वाहा, वषट्, हुम्, वौषट् तथा फट्। अब मैं 'प्रासाद-मन्त्र' बताता हूँ। 'हीं हौं हूं'—ये प्रासादमन्त्रके तीन बीज हैं। इसे 'कुटिल' संज्ञा दी गयी है। इस प्रकार यह प्रासाद-मन्त्र समस्त कार्योंको सिद्ध करनेवाला है। हृदय-

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शिखा आदि बीजोंका पूर्वोक्त रीतिसे उद्धार करके फट्कारपर्यन्त सब अङ्गोंका न्यास करना चाहिये। अर्धचन्द्राकार आसन दे। 'भगवान् पशुपति कामपूरक देवता हैं तथा सर्पोंसे विभूषित हैं।' इस प्रकार ध्यान करके महापाशुपतास्त्र$^१$ मन्त्रका जप करे। यह समस्त शत्रुओंका मर्दन करनेवाला है। यह 'सकल (कलासहित) प्रासाद-मन्त्र'का वर्णन किया गया। अब 'निष्कल-मन्त्र' कहा जाता है॥ ९-१९॥

औषध (औ), विश्वरूप (ह), ग्यारहवीं मात्रा, सूर्यमण्डल (अनुस्वार) इनसे युक्त अर्धचन्द्र (अनुनासिक) एवं नादसे युक्त जो 'हौं' मन्त्र है। यह 'निष्कल प्रासाद-मन्त्र' है; इसे संज्ञाविहीन 'कुटिल' भी कहते हैं। 'निष्कल प्रासाद-मन्त्र' भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। सदाशिवस्वरूप 'प्रासाद-मन्त्र' ईशानादि पाँच ब्रह्ममूर्तियोंसे युक्त होता है; अतः वह 'पञ्चाङ्ग' या 'साङ्ग' कहा गया है$^२$। अंशुमान् (अनुस्वार), विश्वरूप (ह) तथा अमृत (अ)—इन तीनोंके योगसे व्यक्त हुआ 'हं' बीज 'शून्य' नामसे अभिहित होता है। (यह 'हिं हुं हें हों'—इन सबका उपलक्षण है।) ईशान आदि ब्रह्मात्मक अङ्गों (मुखों)—से रहित होनेपर ही उसकी शून्य संज्ञा होती है। ईशानादि मूर्तियाँ इन बीजोंके अमृततरु हैं। इनका पूजन समस्त विघ्नोंका नाश करनेवाला है॥ २०-२२॥

अंशुमान् (अनुस्वार) युक्त विश्वरूप (ह) यदि ऊहक (ऊ)-के ऊपर अधिष्ठित हो तो वह 'हूं' बीज 'कलाढ्य' कहा गया है। वह 'सकल'के ही अन्तर्गत है। सकलके ही पूजन और अङ्गन्यास आदि सदा होते हैं। (इसी तरह जो 'शून्य' कहा गया है, वह 'निष्कल'के ही अन्तर्गत है।) नरसिंह यमराजके ऊपर बैठे हों, अर्थात् षकार मकारके ऊपर चढ़ा हो, साथ ही तेजस्वी (र) तथा प्राण (य)—का भी योग हो, फिर ऊपर अंशुमान् (अनुस्वार) हो तथा नीचे ऊहक (दीर्घ ऊकार) हो तो 'क्ष्म्यूं'—यह बीज उद्धृत होता है। इसकी 'समलंकृत' संज्ञा है। यह ऊपर और नीचे भी मात्रासे अलंकृत होनेके कारण 'समलंकृत' कहा गया है। यह भी 'प्रासादपर' नामक मन्त्रका एक भेद है। चन्द्रार्धाकार बिन्दु और नादसे युक्त ब्रह्मा एवं विष्णुके नामोंसे विभूषित क्रमशः उदधि (व) और नरसिंह (क्ष)—को बारह मात्राओंसे भेदित करे। ऐसा करनेपर पूर्ववत् ह्रस्वस्वरोंसे युक्त बीज ईशानादि ब्रह्मात्मक अङ्ग होंगे तथा दीर्घस्वरोंसे युक्त बीजसहित मन्त्र हृदयादि अङ्गोंमें विन्यस्त किये जायँगे$^३$॥ २३-२५$\frac{१}{२}$॥

अब दस बीजरूप प्रणव बताये जाते हैं—ओजको अनुस्वारसे युक्त करके 'ओम्' इस प्रथम वर्णका उद्धार करे। अंशुमान् और अंशुका योग 'आं' यह नायकस्वरूप द्वितीय वर्ण है। अंशुमान् और ईश्वर—'ईं'—यह तृतीय वर्ण है, जो मुक्ति प्रदान करनेवाला है। अंशु (अनुस्वार)—से आक्रान्त ऊहक अर्थात् 'ऊँ' यह चतुर्थ वर्ण है। सानुस्वार वरुण (व्), प्राण (य्) और तेजस्


१. 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र'में महापाशुपतास्त्र-मन्त्र इस प्रकार उद्धृत किया गया है—'ॐ श्लौं हसकलहीं पशुहसकलहीं हूं सकल हीं फट्।'
२. साङ्ग-मन्त्रके बीज ह्रस्व स्वरोंसे भेदित होते हैं। न्यास तथा पूजनके लिये उनका स्वरूप यों समझना चाहिये—'हों ईशानायोर्ध्ववक्त्राय नमः। हें तत्पुरुषाय पूर्ववक्त्राय नमः। हुं अघोराय दक्षिणवक्त्राय नमः। हिं वामदेवाय उत्तरवक्त्राय नमः। हं सद्योजाताय पश्चिमवक्त्राय नमः।'
३. यथा—वों ब्रह्मणे क्षों विष्णवे ईशानाय नमः। वें ब्रह्मणे क्षें विष्णवे तत्पुरुषाय नमः। वुं ब्रह्मणे क्षुं विष्णवे अघोराय नमः। विं ब्रह्मणे क्षिं विष्णवे वामदेवाय नमः। वं ब्रह्मणे क्षं विष्णवे सद्योजाताय नमः। ये पूजनके मन्त्र हैं। अङ्गन्यास—वां ब्रह्मणे क्षां विष्णवे हृदयाय नमः। वीं ब्रह्मणे क्षीं विष्णवे शिरसे स्वाहा। वूं ब्रह्मणे क्षूं विष्णवे शिखायै वषट्। वैं ब्रह्मणे क्षैं विष्णवे कवचाय हुम्। वौं ब्रह्मणे क्षौं विष्णवे नेत्रत्रयाय वौषट्। वः ब्रह्मणे क्षः विष्णवे अस्त्राय फट्।

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(२)—अर्थात् 'व्यूं' इसे पञ्चम बीजाक्षर बताया गया है। तत्पश्चात् सानुस्वार कृतान्त (मकार) अर्थात् 'मं' यह षष्ठ बीज है। सानुस्वार उदक और प्राण (व्यं) सप्तम बीजके रूपमें उद्धृत हुआ है। इन्दुयुक्त पद्म—'पं' आठवाँ तथा एकपादयुक्त नन्दीश 'नें' नवाँ बीज है। अन्तमें प्रथम बीज 'ओम्' का ही उल्लेख किया जाता है। इस प्रकार जो दशबीजात्मक मन्त्र है, इसे 'क्षपण' कहा गया है। इसका पहला, तीसरा, पाँचवाँ, सातवाँ तथा नवाँ बीज क्रमशः ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव और सद्योजातस्वरूप है। द्वितीय आदि बीज हृदयादि अङ्गन्यासमें उपयुक्त होते हैं। दसों प्रणवात्मक बीजोंके एक साथ उच्चारणपूर्वक 'अस्त्राय फट्' बोलकर अस्त्रन्यास^१ करे। ईशानादि मूर्तियोंके अन्तमें 'नमः' जोड़कर ही बोलना चाहिये, अन्यथा नहीं। द्वितीय बीजसे लेकर नवम बीजतकके जो आठ बीज हैं, वे आठ विद्येश्वररूप हैं। उनके नाम ये हैं—अनन्तेश, सूक्ष्म, शिवोत्तम, एकमूर्ति, एकरूप, त्रिमूर्ति, श्रीकण्ठ तथा शिखण्डी—ये आठ विद्येश्वर कहे गये हैं। शिखण्डीसे लेकर अनन्तेशपर्यन्त विलोम-क्रमसे बीजमन्त्रोंका सम्बन्ध जोड़ना चाहिये^२ (यही प्रासाद-मन्त्रका 'क्षय' नामक भेद है।) इस तरह यहाँ मूर्ति-विद्या बतायी गयी॥ २६—३४॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सकलादि मन्त्रोंके उद्धारका वर्णन' नामक तीन सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१७॥


तीन सौ अठारहवाँ अध्याय

अन्तःस्थ, कण्ठोष्ठ तथा शिवस्वरूप मन्त्रका वर्णन; अघोरास्त्र-मन्त्रका उद्धार; 'विघ्नमर्द' नामक मण्डल तथा गणपति-पूजनकी विधि

**भगवान् शिव कहते हैं—**स्कन्द! जिसके ऊपर तेज (र्) हो, ऐसे विश्वरूप (ह्)-को उद्धृत करके फिर नरसिंह (क्ष्)-के नीचे कृतान्त (म्) रखे। उसके अन्तमें 'प्रणव' लगा दे। ऐसा कर 'र्हक्ष्मों' बना। इसके बाद ऊहक (), अंशुमान् () तथा विश्व (ह्)-को संयुक्त करे। इससे 'हूं' बनेगा। ये दोनों क्रमशः अन्तःस्थ और कण्ठोष्ठ कहे गये हैं। [(र्) अन्तःस्थ वर्ण आदिमें होनेसे उस पूरे मन्त्रकी 'अन्तःस्थ' संज्ञा हुई है। दूसरे मन्त्रमें ह् कण्ठ स्थानीय है और ऊकार ओष्ठस्थानीय; अतः उसे 'कण्ठोष्ठ' नाम दिया गया है।] इनके अन्तमें 'नमः' जोड़ देनेसे ये दोनों मन्त्र चार अक्षरवाले हो जाते हैं। यथा—'ॐ र्हक्ष्मों नमः। ॐ हूं नमः।' विश्वरूप (हकार) कारण माना गया है। उसे बारह मात्राओंसे गुणित करे। इन बारहमेंसे पाँच ह्रस्व-बीजोंद्वारा पूर्ववत् 'ईशान' आदि पाँच ब्रह्ममूर्तियोंकी पूजा करे और दीर्घात्मक छः बीजोंद्वारा पहलेकी ही भाँति यहाँ अङ्गन्यासका कार्य सम्पन्न करे॥ १—३॥

[अब अघोरास्त्र^३-मन्त्रका उद्धार करते हैं—] 'ह्रीं' लिखकर दो बार 'स्फुर-स्फुर' लिखे।


^१. **यथा—**ओम् ईशानाय नमः। ईं तत्पुरुषाय नमः। व्यं अघोराय नमः। व्यं वामदेवाय नमः। नें सद्योजाताय नमः॥ अङ्गन्यासका क्रम इस प्रकार है—आं हृदयाय नमः। ॐ शिरसे स्वाहा। मं शिखायै वषट्। पं कवचाय हुम्। ओम् नेत्रत्रयाय वौषट्। ओं आं ईं ॐ न्यं मं न्यं पं नें ओम् अस्त्राय फट्। इसी क्रमसे करन्यास भी कर सकते हैं।
^२. **यथा—**आं शिखण्डिने नमः। ईं श्रीकण्ठाय नमः। ॐ त्रिमूर्तये नमः। न्यं एकरूपाय नमः। मं एकमूर्तये नमः। इत्यादि।
^३. अग्निपुराणकी उपलब्ध पुस्तकें लिखावट या छपाईके दोषसे 'अघोरास्त्र-मन्त्र' पूरा व्यक्त नहीं कर पाती हैं। 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र'के अनुसार किंचिन्मात्र संशोधनसे मन्त्र स्पष्ट हो जाता है; अतः यहाँ शुद्ध पाठ दिया गया है।

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इसके बाद इन दोनोंके आदिमें 'प्र' जोड़कर पुनरुल्लेख करे—'प्रस्फुर प्रस्फुर'। तत्पश्चात् 'कह', 'वम' और 'बन्ध'—इन तीनों पदोंको दो-दो बार लिखे। फिर दो बार 'घातय' लिखकर अन्तमें 'हुं फट्'का उच्चारण करे। (सब जोड़नेपर ऐसा बनता है—'ह्रीं स्फुर स्फुर प्रस्फुर प्रस्फुर घोर घोरतरतनुरूप चट चट प्रचट प्रचट कह कह वम वम बन्ध बन्ध घातय घातय हुं फट्।'—इक्यावन अक्षरोंका मन्त्र है।) इस प्रकार 'अघोरास्त्र-मन्त्र' होता है। (इसके विनियोग और न्यास आदिकी विधि 'श्रीविद्यार्णव-तन्त्र'के ३०वें श्वासमें द्रष्टव्य है।) अब 'शिव-गायत्री' बतायी जाती है। 'महेशाय विद्महे। महादेवाय धीमहि। तन्नः शिवः प्रचोदयात्।'—यह 'शिव-गायत्री' (ही पूर्वाध्यायमें कथित प्रासाद-मन्त्रका आठवाँ भेद 'शिव-रूप' है।) सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको सिद्ध करनेवाली है॥ ४-७॥

यात्रामें तथा विजय आदिके कार्यमें पहले गणकी पूजा करनी चाहिये; इससे 'श्री'की प्राप्ति होती है। पहले चौकोर क्षेत्रको सब ओरसे बारह-बारह कोष्ठोंमें विभाजित करे। [ऐसा करनेसे एक सौ चौवालीस पदोंका चतुष्कोण क्षेत्र बनेगा।] मध्यवर्ती चार पदोंमें त्रिकोणकी रचना करके उसके बीचमें तीन दलोंसे युक्त कमल लिखे। उसके पृष्ठभागमें पदिका और वीथीके भागमें तीन दलवाला अश्वयुक्त कमल बनावे। तदनन्तर वसुदेव-पुत्रों (वासुदेव, संकर्षण और गद)-से, जो तीन दलवाले कमलोंसे सुशोभित हैं, पादपट्टिकाका निर्माण करे। उसके ऊपर भागमात्रके प्रमाणसे एक वेदीकी रचना करे। पूर्वादि दिशाओंमें द्वार तथा कोणभागोंमें उपद्वारकी रचना करे। इस प्रकार द्वारों तथा उपद्वारोंसे रचित मण्डल विघ्ननाशक है। मध्यमें जो कमल है, वह आरक्त वर्णका हो। उसके बाहरके कमल भी वैसे ही हों। वीथी श्वेतवर्णकी होनी चाहिये। द्वारोंका रंग अपने इच्छानुसार रख सकते हैं। कर्णिका पीले रंगसे रँगी जायगी तथा केसर भी पीले ही होंगे। यह 'विघ्नमर्द' नामक मण्डल है। इसके मध्यभागमें गणपतिका पूजन करे। नामका आदि अक्षर अनुस्वारसहित बोलकर आदिमें 'ओं' और अन्तमें 'नमः' जोड़ दे। (यथा—ॐ गं गणपतये नमः।') ह्रस्वान्त बीजोंसे युक्त ईशान-तत्पुरुषादि मन्त्रोंसे ब्रह्ममूर्तियोंका पूजन तथा दीर्घान्त बीजोंसे हृदय, सिर आदि अङ्गोंमें न्यास करे। उपर्युक्त मण्डलकी पूर्वदिशागत पङ्क्तिमें गज, गजशीर्ष (गजानन), गाङ्गेय, गणनायक, गगनग तथा गोपति—इन नामोंका उल्लेख करे। इनमेंसे अन्तिम दो नामोंकी तीन आवृत्तियाँ होंगी। (इस प्रकार ये दस नाम दस कोष्ठोंमें लिखे जायँगे और किनारेके एक-एक कोष्ठ खाली रहेंगे, जो दक्षिण-उत्तरकी नामावलीसे भरेंगे।) ॥ ८-१५॥

विचित्रांश, महाकाय, लम्बोष्ठ, लम्बकर्ण, लम्बोदर, महाभाग, विकृत (विकट), पार्वती-प्रिय, भयावह, भद्र, भगण और भयसूदन—ये बारह नाम दक्षिण दिशाकी पङ्क्तिमें लिखे। पश्चिममें देवत्रास, महानाद, भासुर, विघ्नराज, गणाधिप, उद्भटस्वन, उद्भटशुण्ड, महाशुण्ड, भीम, मन्मथ, मधुसूदन तथा सुन्दर और भावपुष्ट—ये नाम लिखे। फिर उत्तर दिशामें ब्रह्मोश्वर, ब्राह्म-मनोवृत्ति, संलय, लय, नृत्यप्रिय, लोल, विकर्ण, वत्सल, कृतान्त, कालदण्ड तथा कुम्भका पूर्ववत् उल्लेख करके इन सबका यजन करे ॥ १६-२०॥

पूर्वोक्त मन्त्रका दस हजार जप और उसके दशांशसे होम करे। शेष नाम-मन्त्रोंका दस-दस बार जप करके उनके लिये एक-एक बार

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आहुति दे। तत्पश्चात् पूर्णाहुति देकर अभिषेक करे। इससे सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध होता है। साधक भूमि, गौ, अश्व, हाथी तथा वस्त्र आदि देकर गुरुदेवकी पूजा करे॥ २१-२२ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'गणपति-पूजनके विधानका कथन' नामक तीन सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१८ ॥


तीन सौ उन्नीसवाँ अध्याय

वागीश्वरीकी पूजा एवं मन्त्र आदि

भगवान् शिव कहते हैं— स्कन्द! अब मैं मण्डलसहित 'वागीश्वरी-पूजन' की विधि बता रहा हूँ। ऊहक (ऊ)-को काल (घ)-से संयुक्त करके उसका चन्द्रमा (अनुस्वार)-से योग करें तो वह एकाक्षर मन्त्र बनेगा (घूं)। निषादपर ईश्वर (ई)-का योग करके उसे बिन्दु-विसर्गसे समन्वित करे। इस एकाक्षर मन्त्रका उपदेश सबको नहीं देना चाहिये। वागीश्वरीदेवीका ध्यान इस प्रकार करे—'देवीकी अङ्गकान्ति कुन्दकुसुम तथा चन्द्रमाके समान उज्ज्वल है। वे पचास वर्णोंका मालामय रूप धारण करती हैं। मुक्ताकी माला तथा श्वेतपुष्पके हारोंसे सुशोभित हैं। उनके चार हाथोंमें क्रमशः वरद, अभय, अक्षमाला तथा पुस्तक शोभा पाते हैं। वे तीन नेत्रोंसे युक्त हैं।' इस प्रकार ध्यान करके उक्त एकाक्षर-मन्त्रका एक लाख जप करे। 'देवी पैरोंसे लेकर मस्तकपर्यन्त अथवा कंधोंतक ककारसे लेकर क्षकारतककी वर्णमाला धारण करती हैं'—इस प्रकार उनके स्वरूपका स्मरण करे॥ १-४॥

गुरु दीक्षा देने या मन्त्रोपदेश करनेके लिये एक मण्डल बनाये। वह सूर्याग्र हो और इन्दुसे विभक्त हो। दो भागोंमें कमल बनाये। वह कमल साधकके लिये हितकर होता है। फिर वीथी और पाया बनाये। चार पदोंमें आठ कमल बनाये। उनके बाह्यभागमें वीथी और पदिकाका निर्माण करे। दो-दो पदोंद्वारा प्रत्येक दिशामें द्वार बनाये। इसी तरह उपद्वारोंका भी निर्माण करे। कोणोंमें दो-दो पट्टिकाएँ निर्मित करे। अब नौ कमल (वर्णाब्ज तथा दिशाओंसे सम्बद्ध कमल) श्वेतवर्णके रखे। कर्णिकापर सोनेके रंगका चूर्ण गिराकर उसे पीली कर दे। केसरोंको अनेक रंगोंसे रंगकर कोणोंको लाल रंगसे भरे। व्योमरेखान्तर काला रखे द्वारोंका मान इन्द्रके हाथीके मानके अनुसार रखे। मध्यकमलमें सरस्वतीको, पूर्वगत कमलमें वागीशीको, फिर अग्नि आदि कोणोंके क्रमसे ह्ललेखा, चित्रवागीशी, गायत्री, विश्वरूपा, शाङ्करी, मति और धृतिको स्थापित करके उन सबका पूजन करे। नामके आदिमें 'ह्रीं' तथा नामके आदि अक्षरको बीज-रूपोंमें बोलकर पूजा करनी चाहिये। यथा— पूर्वमें 'ह्रीं वां वागीश्यै नमः' इत्यादि। सरस्वती ही वागीश्वरीके रूपमें ध्येय हैं। जप पूरा करके कपिला गायके घीसे हवन करे। ऐसा करनेवाला साधक संस्कृत तथा प्राकृत भाषाओंमें काव्य-रचना करनेवाला कवि होता है और काव्यशास्त्र आदिका विद्वान् हो जाता है॥ ५-११॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'वागीश्वरी-पूजा' नामक तीन सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१९ ॥

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तीन सौ बीसवाँ अध्याय

सर्वतोभद्र आदि मण्डलोंका वर्णन

भगवान् शिव कहते हैं— स्कन्द! अब मैं 'सर्वतोभद्र' नामक आठ प्रकारके मण्डलोंका वर्णन करता हूँ। पहले शङ्कु या कीलसे प्राचीदिशाका साधन करे। इस प्राचीका निश्चय हो जानेपर विद्वान् पुरुष विषुवकालमें चित्रा और स्वाती नक्षत्रके अन्तरसे, अथवा प्रत्यक्ष सूतको लेकर पूर्वसे पश्चिमतक उसे फैलाकर मध्यमें दो कोटियोंको अङ्कित करे। उन दोनोंके मध्यभागसे उत्तर-दक्षिणकी लंबी रेखा खींचे। दो मत्स्योंका निर्माण करे तथा उन्हें दक्षिणसे उत्तरकी ओर आस्फालित करे। क्षतपद क्षेत्रके आधे मानसे कोण सम्पात करे। इस तरह चार बार सूत्रके क्षेत्रमें आस्फालनसे एक चौकोर रेखा बनती है। उसमें चार हाथका शुभ भद्रमण्डल बनाये। आठ पदोंमें सब ओरसे विभक्त चौंसठ पदवालेमेंसे बीस पदवाले क्षेत्रमें बाहरकी ओर एक वीथीका निर्माण करे। यह वीथी एक मन्त्रकी होगी। कमलके मानसे दो पदोंका द्वार बनाये। द्वार कपोलयुक्त होना चाहिये। कोणबन्धके कारण उसकी विचित्र शोभा हो, ऐसा द्विपदका द्वार-निर्माणमें उपयोग करे। कमल श्वेतवर्णका हो, कर्णिका पीतवर्णसे रँगी जाय, केसर चित्रवर्णका हो, अर्थात् उसके निर्माणमें अनेक रंगोंका उपयोग किया जाय। वीथीको लाल रंगसे भरा जाय। द्वार लोकपाल-स्वरूप होता है। नित्य तथा नैमित्तिक विधिमें कोणोंका रंग लाल होना चाहिये। अब कमलका वर्णन सुनो। कमलके दो भेद हैं—'असंसक्त' तथा 'संसक्त'। 'असंसक्त' मोक्षकी तथा संसक्त भोगकी प्राप्ति करानेवाला है। 'असंसक्त' कमल मुमुक्षुओंके लिये उपयुक्त है। संसक्त कमलके तीन भेद हैं—बाल, युवा तथा वृद्ध। वे अपने नामके अनुसार फलसिद्धि प्रदान करनेवाले हैं॥ १—९॥

कमलके क्षेत्रमें दिशा तथा कोणदिशाकी ओर सूत-चालन करे तथा कमलके समान पाँच वृत्त निर्माण करे। प्रथम वृत्तमें नौ पुष्करोंसे युक्त कर्णिका होगी, दूसरेमें चौबीस केसर रहेंगे, तीसरेमें दलोंकी संधि होगी, जिसकी आकृति हाथीके कुम्भस्थलके सदृश होगी, चौथे वृत्तमें दलोंके अग्रभाग होंगे तथा पाँचवें वृत्तमें आकाशमात्र 'शून्य' रहेगा। इसे 'संसक्त कमल' कहा गया है। 'असंसक्त कमल'में दलाग्रभागपर जो दिशाओंके भाग हैं, उनके विस्तारके अनुसार दो भाग छोड़कर आठ भागोंसे दल बनाये। संधि-विस्तारसूत्रसे उसके मानके अनुसार दलकी रचना करे। इसमें बायेंसे दक्षिणके क्रमसे प्रवृत्त होना चाहिये। इस तरह यह 'वृद्ध संसक्त कमल' बनता है॥ १०—१४॥

अथवा संधिके बीचसे सूतको अर्धचन्द्राकार घुमाये या दो संधियोंके अग्रवर्ती सूतको (अर्धचन्द्राकार) घुमाये। ऐसा करनेसे 'बालपद्म' बनता है। संधिसूत्रके अग्रभागसे पृष्ठभागकी ओर सूत घुमाये। वह तीक्ष्ण अग्रभागवाला 'युवा' संज्ञक है। ऐसे कमलसे भोग और मोक्षकी उपलब्धि होती है। सम (छः) मुखवाले स्कन्द! मुक्तिके उद्देश्यसे किये जानेवाले आराधनात्मक कर्ममें 'वृद्ध कमल'का उपयोग करना चाहिये तथा वशीकरण आदिमें 'बालपद्म'का। 'नवनाभ' कमलचक्र नौ हाथोंका होता है। उसमें मन्त्रात्मक नौ भाग होते हैं। उसके मध्यभागमें कमल होता है। उस कमलके ही मानके अनुसार उसमें पट्टिका, वीथी और द्वारके साथ कण्ठ एवं उपकण्ठके निर्माणकी बात भी कही गयी है। उसके बाह्यभागमें वीथीकी स्थिति मानी गयी है।

६५८ * अग्निपुराण *


पाँच भागमें तो वीथी होती है और अपने चारों ओर वह दस भागका स्थान लिये रहती है। उसके आठ दिशाओंमें आठ कमल होते हैं तथा वीथीसहित एक द्वारपद्म भी होता है। उसके बाह्यभागमें पाँच पदोंकी वीथी होती है, जो लता आदिसे विभूषित हुआ करती है। द्वारके कण्ठमें कमल होता है। द्वारका ओष्ठ और कण्ठभाग एक-एक पदका होता है। कपोल-भाग एक पदका बनाना चाहिये। तीन दिशाओंमें तीन द्वार स्पष्ट होते हैं। कोणबन्ध तीन पट्टियों, दो पद तथा वज्र-चिह्नसे युक्त होता है। मध्यकमल शुक्लवर्णका होता है तथा शेष दिशाओंके कमल पूर्वादिक्रमसे पीत, रक्त, नील, पीत, शुक्ल, धूम्र, रक्त तथा पीतवर्णके होते हैं। यह कमलचक्र मुक्तिदायक है॥ १५-२२॥

पूर्व आदि दिशाओंमें आठ कमलोंका तथा शिव-विष्णु आदि देवताओंका यजन करे। विष्णु आदिका पूजन प्रासादके मध्यवर्ती कमलमें करके पूर्वादि कमलोंमें इन्द्र आदि लोकपालोंकी पूजा करे। इनकी बाह्यवीथीकी पूर्वादि दिशामें उन-उन इन्द्र आदि देवताओंके वज्र आदि आयुधोंकी पूजा करे। वहाँ विष्णु आदिकी पूजा करके साधक अश्वमेधयज्ञके फलका भागी होता है। पवित्रारोपण आदिमें महान् मण्डलकी रचना करे। आठ हाथ लंबे क्षेत्रका छब्बीससे विवर्तन (विभाजन) करे। मध्यवर्ती दो पदोंमें कमल-निर्माण करे। तदनन्तर एक पदकी वीथी हो। तत्पश्चात् दिशाओं तथा विदिशाओंमें आठ नीलकमलोंका निर्माण करे। मध्यवर्ती कमलके ही मानसे उसमें कुल तीस पद्म निर्मित किये जायँ। वे सब दलसंधिसे रहित हों तथा नीलवर्णके 'इन्दीवर' संज्ञक कमल हों। उसके पृष्ठभागमें एक पदकी वीथी हो। उसके ऊपर स्वस्तिकचिह्न बने हों। तात्पर्य यह कि वीथीके ऊपरी भाग या बाह्यभागमें दो-दो पदोंके विभक्त स्थानोंमें कुल आठ स्वस्तिक लिखे जायें। तदनन्तर पूर्ववत् बाह्यभागमें वीथिका रहे। द्वार, कमल तथा उपकण्ठ सब कुछ रहने चाहिये। कोणका रंग लाल और वीथीका पीला होना चाहिये। मण्डलके बीचका कमल नीलवर्णका होगा। कार्तिकेय! विचित्र रंगोंसे युक्त स्वस्तिक आदि मण्डल सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है॥ २३-२९$\frac{१}{२}$॥

'पञ्चाब्ज-मण्डल' पाँच हाथके क्षेत्रको सब ओरसे दससे विभाजित करके बनाया जाता है। इसमें दो पदोंका कमल, उसके बाह्यभागमें वीथी, फिर पट्टिका, फिर चार दिशाओंमें चार कमल होते हैं। इन चारोंके बाद पृष्ठभागमें वीथी हो, जो एक पद अथवा दो पदोंके स्थानमें बनायी गयी हो। कण्ठ और उपकण्ठसे युक्त द्वार हों और द्वारके मध्यभागमें कमल हो। इस पञ्चाब्ज-मण्डलमें पूर्ववर्ती कमल श्वेत और पीतवर्णका होता है। दक्षिणदिग्वर्ती कमल वैदूर्यमणिके रंगका, पश्चिमवर्ती कमल कुन्दके समान श्वेतवर्णका तथा उत्तरदिशाका कमल शङ्खके सदृश उज्ज्वल होता है। शेष सब विचित्र वर्णके होते हैं॥ ३०-३३॥

अब मैं दस हाथके मण्डलका वर्णन करता हूँ, जो सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है। उसको विकार-संख्या (२४) द्वारा सब ओर विभक्त करके चौकोर क्षेत्र बना ले। इसमें दो-दो पदोंका द्वार होगा। पूर्वोक्त चक्रोंकी भाँति इसके भी मध्यभागमें कमल होगा। अब मैं 'विघ्नध्वंस-चक्र'का वर्णन करता हूँ। चार हाथका पुर (चौकोर क्षेत्र) बनाकर उसके मध्यभागमें दो हाथके घेरेमें वृत्त (गोलाकर चक्र) बनाये। एक हाथकी वीथी होगी, जो सब ओरसे स्वस्तिक-चिह्नोंद्वारा घिरी रहेगी। एक-एक हाथमें चारों ओर द्वार बनेंगे। चारों दिशाओंमें वृत्त होंगे,


  • अध्याय ३२१ * ६५९

जिनमें कमल अङ्कित रहेंगे। इस प्रकार इस चक्रमें पाँच कमल होंगे, जिनका वर्ण श्वेत होगा। मध्यवर्ती कमलमें निष्कल (निराकार परमात्मा)-का पूजन करना चाहिये। पूर्वाद दिशाओंमें हृदय आदि अङ्गोंकी तथा विदिशाओंमें अस्त्रोंकी पूजा होनी चाहिये। पूर्ववत् 'सद्योजात' आदि पाँच ब्रह्ममय मुखोंका भी पूजन आवश्यक है॥ ३४—३७॥

अब मैं 'बुद्ध्याधार-चक्र'का वर्णन करता हूँ। सौ पदोंके क्षेत्रमेंसे मध्यवर्ती पंद्रह पदोंमें एक कमल अङ्कित करे। फिर आठ दिशाओंमें एक-एक करके आठ शिवलिङ्गोंकी रचना करे। मेखलाभागसहित कण्ठकी रचना दो पदोंमें होगी। आचार्य अपनी बुद्धिका सहारा लेकर यथास्थान लता आदिकी कल्पना करे। चार, छः, पाँच और आठ आदि कमलोंसे युक्त मण्डल होता है। बीस-तीस आदि कमलोंवाला भी मण्डल होता है। १२१२० कमलोंसे युक्त भी सम्पूर्ण मण्डल हुआ करता है। १२० कमलोंके मण्डलका भी वर्णन दृष्टिगोचर होता है। श्रीहरि, शिव, देवी तथा सूर्यदेवके १४४० मण्डल हैं। १७ पदोंद्वारा सत्रह पदोंका विभाग करनेपर २८९ पद होते हैं। उक्त पदोंके मण्डलमें लतालिङ्गका उद्भव कैसे होता है, यह सुनो। प्रत्येक दिशामें पाँच, तीन, एक, तीन और पाँच पदोंको मिटा दे। ऊपरके दो पदोंसे लिङ्ग तथा पार्श्ववर्ती दो-दो कोष्ठकोंसे मन्दिर बनेगा। मध्यवर्ती दो पदोंका कमल हो। फिर एक कमल और होगा। लिङ्गके पार्श्वभागोंमें दो 'भद्र' बनेंगे। एक पदका द्वार होगा; उसका लोप नहीं किया जायगा। उस द्वारके पार्श्वभागोंमें छः-छः पदोंका लोप करनेसे द्वारशोभा बनेगी। शेष पदोंमें श्रीहरिके लिये लहलहाती लताएँ होंगी। ऊपरके दो पदोंका लोप करनेसे श्रीहरिके लिये 'भद्राष्टक' बनेंगे। फिर चार पदोंका लोप करनेसे रश्मिमालाओंसे युक्त शोभास्थान बनेगा। पचीस पदोंसे कमल, फिर पीठ, अपीठ तथा दो-दो पदोंको रखकर (एकत्र करके) आठ उपशोभाएँ बनेंगी। देवी आदिका सूचक 'भद्रमण्डल' बीचमें विस्तृत और प्रान्तभागमें लघु होता है। बीचमें नौ पदोंका कमल बनता है तथा चारों कोणोंमें चार 'भद्रमण्डल' बनते हैं। शेष त्रयोदश पदोंका 'बुद्ध्याधार-मण्डल' है। इसमें एक सौ साठ पद होते हैं। 'बुद्ध्याधार-मण्डल' भगवान् शिव आदिकी आराधनाके लिये प्रशस्त है॥ ३८—४८॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'मण्डलविधानका वर्णन' नामक तीन सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२०॥


तीन सौ इक्कीसवाँ अध्याय

अघोरास्त्र आदि शान्ति-विधानका कथन

महादेवजी कहते हैं—स्कन्द! पहले समस्त कर्मोंमें 'अस्त्रयाग' करना चाहिये। यह सिद्धि प्रदान करनेवाला है। मध्यभागमें शिव, विष्णु आदिके अस्त्रकी पूजा करनी चाहिये तथा पूर्वाद दिशाओंमें क्रमशः इन्द्रादि दिक्पालोंके वज्र आदि अस्त्रोंका पूजन करना चाहिये। भगवान् शंकरके पाँच मुख तथा दस हाथ हैं। उनके इस स्वरूपका ध्यान करते हुए युद्धसे पूर्व पूजा कर ली जाय तो विजयकी प्राप्ति होती है। ग्रहपूजा करते समय नवग्रहचक्रके मध्यमें सूर्यदेवकी तथा पूर्वाद दिशाओंमें सोम आदिकी अर्चना करनी चाहिये। ग्रहोंकी पूजा करनेसे सभी ग्रह एकादश (ग्यारहवें) स्थानमें स्थित होते हैं और उस स्थानमें स्थितकी भाँति उत्तम फल देते हैं॥ १—२$\frac{१}{२}$॥

६६० * अग्निपुराण *

अब मैं समस्त उत्पातोंका नाश करनेवाली 'अस्त्रशान्ति' का वर्णन करूँगा। यह शान्ति ग्रहरोग आदिको शान्त करनेवाली तथा महामारी एवं शत्रु का मर्दन करनेवाली है। विघ्नकारक गणोंके द्वारा उत्पादित उत्पातको भी शान्त करती है। मनुष्य 'अघोरास्त्र' का जप करे। एक लाख जप करनेसे ग्रहबाधा आदिका निवारण होता है और तिलसे दशांश होम कर दिया जाय तो उत्पातोंका नाश होता है। एक लाख जप-होमसे दिव्य उत्पातका तथा आधे लक्ष जप-होमसे आकाशज उत्पातका विनाश होता है। घीकी एक लाख आहुति देनेसे भूमिज उत्पातके निवारणमें सफलता प्राप्त होती है। घृतमिश्रित गुग्गुलके होमसे सम्पूर्ण उत्पात आदिका शमन हो जाता है। दूर्वा, अक्षत तथा घीकी आहुति देनेसे सारे रोग दूर होते हैं। केवल घीकी एक सहस्र आहुतिसे बुरे स्वप्न नष्ट हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है। वही आहुति यदि दस हजारकी संख्यामें दी जाय तो ग्रहदोषका शमन होता है। घृतमिश्रित जौकी दस हजार आहुतियोंसे विनायकजनित पीड़ाका निवारण होता है। दस हजार घीकी आहुतिसे तथा गुग्गुलकी भी दस सहस्र आहुतिसे भूत-वेताल आदिकी शान्ति होती है। यदि कोई बड़ा भारी वृक्ष आँधी आदिसे स्वतः उखड़कर गिर जाय, घरमें सर्पका कङ्गाल हो तथा वनमें प्रवेश करना पड़े तो दूर्वा, घी और अक्षतके होमसे विघ्नकी शान्ति होती है। उल्कापात या भूकम्प हो तो तिल और घीसे होम करनेसे कल्याण होता है। वृक्षोंसे रक्त बहे, असमयमें फल-फूल लगें, राष्ट्रभङ्ग हो, मारणकर्म हो, जब मनुष्य-पशु आदिके लिये महामारी आ जाय तो तिलमिश्रित घीसे अर्धलक्ष आहुति देनी चाहिये। इससे दोषोंका शमन होता है। यदि हाथीके लिये महामारी उपस्थित हो, हथनीके दाँत बढ़ जायँ अथवा हथनीके गण्डस्थलसे मद फूटकर बहने लगे तो इन सब दोषोंकी शान्तिके लिये दस हजार आहुतियाँ देनी चाहिये। इससे अवश्य शान्ति होती है॥ ३-१२$\frac{१}{२}$॥

जहाँ असमयमें गर्भपात हो या जहाँ बालक जन्म लेते ही मर जाता हो तथा जिस घरमें विकृत अङ्गवाले शिशु उत्पन्न होते हों तथा जहाँ समय पूर्ण होनेसे पूर्व ही बालकका जन्म होता हो, वहाँ इन सब दोषोंके शमनके लिये दस हजार आहुतियाँ देनी चाहिये। सिद्धि-साधनमें तिलमिश्रित घीसे एक लाख हवन किया जाय तो वह उत्तम है, मध्यम सिद्धिके साधनमें अर्धलक्ष और अधम सिद्धिके लिये पचीस हजार आहुति देनी चाहिये। जैसा जप हो, उसके अनुसार ही होम होना चाहिये। इससे संग्राममें विजय प्राप्त होती है। न्यासपूर्वक तेजस्वी पञ्चमुखका ध्यान करके 'अघोरास्त्र'* का जप करना चाहिये॥ १३-१६॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अघोरास्त्र आदि विविध शान्तिका कथन' नामक तीन सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२१॥


तीन सौ बाईसवाँ अध्याय

पाशुपतास्त्र-मन्त्रद्वारा शान्तिका कथन

महादेवजी कहते हैं— स्कन्द! अब मैं पाशुपतास्त्र-मन्त्रसे शान्ति तथा पूजा आदिकी बात बताऊँगा। शान्ति और जप आदि पूर्ववत् (पूर्व अध्यायमें कहे अनुसार) कर्तव्य हैं। इस


* अघोरास्त्र-मन्त्रको ३१८ वें अध्यायमें स्पष्ट कर दिया गया है।

  • अध्याय ३२२ * ६६१

मन्त्रके आंशिक पाठ या जपसे पूर्वकृत पुण्यका नाश होता है; किंतु फडन्त-सम्पूर्ण मन्त्रका जप आपत्ति आदिका निवारण करनेवाला है॥ १॥

ॐ नमो भगवते महापाशुपतायातुलबलवीर्य-पराक्रमाय त्रिपञ्चनयनाय नानारूपाय नानाप्रहरणोद्यताय सर्वाङ्गरक्तायभिन्नाञ्जनचयप्रख्याय श्मशानवेतालप्रियाय सर्वविघ्ननिकृन्तनरताय सर्वसिद्धिप्रदाय भक्तानुकम्पिनेऽसंख्यवक्त्रभुजपादाय तस्मिन् सिद्धाय वेतालवित्रासिने शाकिनीक्षोभजनकाय व्याधि-निग्रहकारिणे पापभञ्जनाय सूर्यसोमाग्निनेत्राय विष्णुकवचाय खड्गवज्रहस्ताय यमदण्डवरुणपाशाय रुद्रशूलाय ज्वलज्जिह्वाय सर्वरोगविद्रावणाय ग्रहनिग्रहकारिणे दुष्टनागक्षयकारिणे। ॐ कृष्णपिङ्गलाय फट्। हूंकारास्त्राय फट्¹। वज्रहस्ताय फट्। शक्तये फट्। दण्डाय फट्। यमाय फट्। खड्गाय फट्। नैर्ऋताय फट्। वरुणाय फट्। वज्राय फट्। पाशाय फट्। ध्वजाय फट्। अङ्कुशाय फट्। गदायै फट्। कुबेराय फट्। त्रिशूलाय फट्। मुद्गराय फट्। चक्राय फट्। पद्माय फट्। नागास्त्राय फट्। ईशानाय फट्। खेटकास्त्राय फट्। मुण्डाय फट्। मुण्डास्त्राय फट्। कङ्कालास्त्राय फट्। पिच्छिकास्त्राय फट्। क्षुरिकास्त्राय फट्। ब्रह्मास्त्राय फट्। शक्त्यस्त्राय फट्। गणास्त्राय फट्। सिद्धास्त्राय फट्। पिलिपिच्छास्त्राय फट्। गन्धर्वास्त्राय फट्। पूर्वास्त्राय² फट्। दक्षिणास्त्राय फट्। वामास्त्राय फट्। पश्चिमास्त्राय फट्। मन्त्रास्त्राय फट्। शाकिन्यस्त्राय फट्। योगिन्यस्त्राय फट्। दण्डास्त्राय फट्। महादण्डास्त्राय फट्। नमोऽस्त्राय फट्³। शिवास्तव्याय फट्। ईशानास्त्राय फट्। पुरुषास्त्राय⁴ फट्। अघोरास्त्राय⁵ फट्। सद्योजातास्त्राय फट्। हृदयास्त्राय फट्। महास्त्राय फट्। गरुडास्त्राय फट्। राक्षसास्त्राय फट्। दानवास्त्राय फट्। क्षौं नरसिंहास्त्राय फट्। त्वष्ट्रस्त्राय फट्। सर्वास्त्राय फट्। नः⁶ फट्। वः⁷ फट्। पः फट्। फः फट्⁸। मः फट्। श्रीः⁹ फट्। पेः¹⁰ फट्। भूः फट्। भुवः फट्। स्वः फट्। महः फट्। जनः फट्। तपः फट्। सत्यं फट्। सर्वलोक फट्। सर्वपाताल फट्। सर्वतत्त्व¹¹ फट्। सर्वप्राण फट्। सर्वनाडी फट्। सर्वकारण फट्। सर्वदेव फट्। ह्रीं फट्। श्रीं फट्। हूं¹² फट्। स्रुं फट्¹³। स्वां¹⁴ फट्। लां फट्। वैराग्याय फट्। मायास्त्राय फट्। कामास्त्राय फट्। क्षेत्रपालास्त्राय फट्। हुंकारास्त्राय फट्। भास्करास्त्राय फट्। चन्द्रास्त्राय फट्। विघ्नेश्वरास्त्राय फट्। गौः गां फट्। ख्रों ख्रों फट्। हौं हों¹⁵ फट्। भ्रामय भ्रामय फट्। संतापय संतापय फट्। छादय छादय फट्। उन्मूलय उन्मूलय फट्। त्रासय त्रासय फट्। संजीवय संजीवय फट्। विद्रावय विद्रावय फट्। सर्वदुरितं नाशय नाशय फट्।

इस पाशुपत-मन्त्रकी एक बार आवृत्ति करनेसे ही यह मनुष्य सम्पूर्ण विघ्नोंका नाश कर सकता है, सौ आवृत्तियोंसे समस्त उत्पातोंको नष्ट कर सकता है तथा युद्ध आदिमें विजय पा सकता है॥ २॥

इस मन्त्रद्वारा घी और गुग्गुलके होमसे मनुष्य असाध्य कार्योंको भी सिद्ध कर सकता है। इस पाशुपतास्त्र¹⁶-मन्त्रके पाठमात्रसे समस्त क्लेशोंकी शान्ति हो जाती है॥ ३॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'पाशुपतास्त्र-मन्त्रद्वारा शान्तिका कथन' नामक तीन सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२२॥


१. पाठान्तर-कूर्राय फट्। २. पाठा० मूर्वास्त्राय। ३. पाठा० नानास्त्राय फट्। ४. इससे पहले पूनाकी प्रतिमें-महादण्डास्त्राय फट्। नामास्त्राय फट्-इतना अधिक पाठ है। ५. पाठा० वामदेवास्त्राय फट्। ६. पूनाकी प्रतिमें इससे पूर्व 'खः फट्'-इतना अधिक है। ७. पूनाकी प्रतिमें यह नहीं है। ८. पूनाकी प्रतिमें 'भः फट्। पः फट्।' ऐसा पाठ है। ९. पाठा० स्त्रा। १०. पाठा० है। ११. पाठा० सत्त्व। १२. पाठा० हुं। १३. स्तुं। १४. आं। १५. पाठा० हों। १६. 'श्रीविद्यार्णव-तन्त्र' (३०वें श्वास)-में तथा 'शारदातिलक' (२०वें पटल)-में एक षडक्षर पाशुपत-मन्त्र भी वर्णित है। यथा- 'ॐ श्लीं पशुं हुं फट्।' इसके जप और प्रयोगकी विधि वहीं द्रष्टव्य है।

६६२ * अग्निपुराण *


तीन सौ तेईसवाँ अध्याय

गङ्गा-मन्त्र, शिवमन्त्रराज, चण्डकपालिनी-मन्त्र, क्षेत्रपाल-बीजमन्त्र, सिद्धविद्या, महामृत्युंजय, मृतसंजीवनी, ईशानादि मन्त्र तथा इनके छः अङ्ग एवं अघोरास्त्रका कथन

महादेवजी कहते हैं—स्कन्द! 'ॐ हूं हं सः'—इस मन्त्रसे मृत्युरोग आदि शान्त हो जाते हैं। इस मन्त्रद्वारा दूर्वाकी एक लाख आहुतियाँ दी जायँ तो उससे साधक शान्ति तथा पुष्टिका भी साधन कर सकता है। षडानन! अथवा केवल प्रणव () अथवा माया (ह्रीं)—के जपसे ही दिव्य, अन्तरिक्षगत तथा भूमिगत उत्पातोंकी शान्ति होती है। उत्पातवृक्षके शमनका भी यही उपाय है॥ १-२॥

(गङ्गा-सम्बन्धी वशीकरणमन्त्र)

'ॐ नमो भगवति गङ्गे कालि कालि महाकालि महाकालि मांसशोणितभोजने रक्तकृष्णमुखि वशमानय मानुषान् स्वाहा।'—इस मन्त्रका एक लाख जप करके दशांश आहुति देकर मनुष्य सम्पूर्ण कर्मोंमें सिद्धि पा सकता है। इन्द्र आदि देवताओंको भी वशमें ला सकता है, फिर इन साधारण मनुष्योंको वशमें लाना कौन बड़ी बात है? यह विद्या अन्तर्धानकरी, मोहनी, जृम्भनी, शत्रुओंको वशमें लानेवाली तथा शत्रुंकी बुद्धिको मोहमें डाल देनेवाली है। यह कामधेनुविद्या सात प्रकारकी कही गयी है॥ ३-५$\frac{१}{२}$॥

अब मैं 'मन्त्रराज'का वर्णन करूँगा, जो शत्रुओं तथा चोर आदिको मोह लेनेवाला है। यह साक्षात् शिव (मेरे) द्वारा पूजित है। इसका सभी महान् भयके अवसरोंपर स्मरण करना चाहिये। एक लाख जप करके तिलोंद्वारा हवन करनेसे यह मन्त्र सिद्ध होता है। अब इसका उद्धार सुनो॥ ६-७॥

'ॐ हले शूलो एहि ब्रह्मसत्येन विष्णुसत्येन रुद्रसत्येन रक्ष मां वाचेश्वराय स्वाहा'॥ ८॥

भगवती शिवा दुर्गम संकटसे तारती—उद्धार करती है, इसलिये 'दुर्गा' मानी गयी है॥ ९॥

'ॐ ह्रीं चण्डकपालिनि दन्तान् किट किट क्षिट क्षिट गुह्ये फट् हीम्'॥ १०॥

—इस मन्त्रराजके जपपूर्वक चावल धोकर उसको इस मन्त्रके तीस बार जपद्वारा अभिमन्त्रित करे। फिर वह चावल चोरोंमें बँटवा दे। उस चावलको दाँतोंसे चबानेपर उनके श्वेत दन्त गिर जाते हैं तथा वे मनुष्य चोरीके पापसे मुक्त एवं शुद्ध हो जाते हैं॥ ११-१२॥

(क्षेत्रपालबलि-मन्त्र)

'ॐ ज्वलल्लोचन कपिलजटाभारभास्वर विद्रावण त्रैलोक्यडामर डामर दर दर भ्रम भ्रम आकट्ट आकट्ट तोटय तोटय मोटय मोटय दह दह पच पच एवं सिद्धिरुद्रो ज्ञापयति यदि ग्रहोऽपगतः स्वर्गलोकं देवलोकं वाऽऽरामविहाराचलं तथापि तमावर्तयिष्यामि बलिं गृह्ण गृह्ण ददामि ते स्वाहा। इति'॥ १३॥

—इस मन्त्रसे क्षेत्रपालको बलि देकर न्यास करनेसे अनिष्ट ग्रह रोता हुआ चला जाता है। साधकके शत्रु नष्ट हो जाते हैं तथा रणभूमिमें शत्रु-समुदायका विनाश हो जाता है॥ १४॥

'हंस' बीजका न्यास करके साधक तीन प्रकारके विष अथवा विघ्नका निवारण कर देता है। अगुरु, चन्दन, कुष्ठ (कूट), कुङ्कुम, नागकेसर, नख तथा देवदारु—इन सबको सममात्रामें कूट-पीसकर धूप बना ले। फिर इसमें मधुमक्खीके शहदका योग कर दे। उसकी सुगन्धसे शरीर

* अध्याय ३२३ * ६६३


तथा वस्त्र आदिको धूपित या वासित करनेसे मनुष्य विवाद, स्त्रीमोहन, शृंगार तथा कलह आदिके अवसरपर शुभ फलका भागी होता है। कन्यावरण तथा भाग्योदय-सम्बन्धी कार्यमें भी उसे सफलता प्राप्त होती है। मायामन्त्र (ह्रीं)-से मन्त्रित हो, रोचना, नागकेसर, कुङ्कुम तथा मैनसिलका तिलक ललाटमें लगाकर मनुष्य जिसकी ओर देखता है, वही उसके वशमें हो जाता है। शतावरीके चूर्णको दूधके साथ पीया जाय तो वह पुत्रकी उत्पत्ति करानेवाला होता है। नागकेसरके चूर्णको घीमें पकाकर खाया जाय तो वह भी पुत्रकारक होता है। पलाशके बीजको पीसकर पीनेसे भी पुत्रकी प्राप्ति होती है॥ १५-२०॥

( वशीकरणके लिये सिद्ध-विद्या )
'ॐ उत्तिष्ठ चामुण्डे जम्भय जम्भय मोहय मोहय (अमुकं) वशमानय स्वाहा'॥ २१॥
—यह छब्बीस अक्षरोंवाली 'सिद्ध-विद्या' है। (यदि किसी स्त्रीको वशमें करना हो तो) नदीके तीरकी मिट्टीसे लक्ष्मीजीकी मूर्ति बनाकर धतूरके रससे मदारके पत्तेपर उस अभीष्ट स्त्रीका नाम लिखे। इसके बाद मूत्रोत्सर्ग करनेके पश्चात् शुद्ध हो उक्त मन्त्रका जप करे। यह प्रयोग अभीष्ट स्त्रीको अवश्य वशमें ला सकता है॥ २२-२३॥

(महामृत्युंजय)
'ॐ जूं सः वषट्'॥ २४॥
—यह 'महामृत्युंजय-मन्त्र' है, जो जप तथा होमसे पुष्टिकारक होता है॥ २५॥

(मृतसंजीवनी)
'ॐ हं सः हूं हूं सः, हः सौः'॥ २६॥
—यह आठ अक्षरवाली 'मृतसंजीवनी-विद्या' है, जो रणभूमिमें विजय दिलानेवाली है। 'ईशान' आदि मन्त्र भी धर्म-काम आदिको देनेवाले हैं॥ २७॥

(ईशान आदि मन्त्र)
(ॐ) ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम्¹ ॥ २८ ॥
(ॐ) तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥ २९ ॥
(ॐ) अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वतः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः³ ॥ ३० ॥
(ॐ) वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः४ ॥ ३१ ॥
(ॐ) सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमो भवे भवे नातिभवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः५ ॥ ३२ ॥
अब मैं 'पञ्चब्रह्म'के छः अङ्गोंका वर्णन करूँगा, जो भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला है॥ ३३॥


ईशान आदि मन्त्रोंके अर्थ—
१. जो सम्पूर्ण विद्याओंके ईश्वर, समस्त भूतोंके अधीश्वर, ब्रह्म वेदके अधिपति, ब्रह्म-बल-वीर्यके प्रतिपालक तथा साक्षात् ब्रह्मा एवं परमात्मा हैं, वे सच्चिदानन्दमय नित्य कल्याणस्वरूप शिव मेरे बने रहें॥ २८॥
२. तत्पदार्थ—परमेश्वररूप अन्तर्यामी पुरुषको हम जानें, उन महादेवका चिन्तन करें; वे भगवान् रुद्र हमें सद्धर्मके लिये प्रेरित करते रहें॥ २९॥
३. जो अघोर हैं, घोर हैं, घोरसे भी घोरतर हैं, उन सर्वव्यापी, सर्वसंहारी रुद्ररूपोंके लिये जो आपके ही स्वरूप हैं,—साक्षात् आपके लिये मेरा नमस्कार हो॥ ३०॥
४. प्रभो! आप ही वामदेव, ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, रुद्र, काल, कलविकरण, बलविकरण, बल, बलप्रमथन, सर्वभूतदमन तथा मनोन्मन आदि नामोंसे प्रतिपादित होते हैं; इन सभी नाम-रूपोंमें आपके लिये मेरा बारंबार नमस्कार है॥ ३१॥
५. मैं सद्योजात शिवकी शरण लेता हूँ। सद्योजातको मेरा नमस्कार है। किसी जन्म या जगत्में मेरा अतिभव—पराभव न करें। आप भवोद्भवको मेरा नमस्कार है॥ ३२॥

६६४ * अग्निपुराण *


( ॐ ) नमः परमात्मने पराय कामदाय परमेश्वराय योगाय योगसम्भवाय सर्वकराय कुरु कुरु सद्य सद्य भव भव भवोद्भव वामदेव सर्वकार्यकर पापप्रशमन सदाशिव प्रसन्न नमोऽस्तु ते ( स्वाहा ) ॥ ३४ ॥<br>— यह सतहत्तर अक्षरोंका हृदय-मन्त्र है, जो सम्पूर्ण मनोरथोंको देनेवाला है। [कोष्ठकमें दिये गये अक्षरोंको छोड़कर गिननेपर सतहत्तर अक्षर होते हैं।] ॥ ३५ ॥<br>(इस मन्त्रको पढ़कर 'हृदयाय नमः' बोलकर हृदयका स्पर्श करना चाहिये।)<br>'ॐ शिव शिवाय नमः।'—यह शिरोमन्त्र है, अर्थात् इसे पढ़कर 'शिरसे स्वाहा' बोलकर दाहिने हाथसे सिरका स्पर्श करना चाहिये। 'ॐ शिवहृदये ज्वालिनि स्वाहा, शिखायै वषट्' बोलकर शिखाका स्पर्श करे।'ॐ शिवात्मक महातेजः सर्वज्ञ प्रभो संवर्तय महाघोरकवच पिङ्गल आयाहि पिङ्गल नमो महाकवच शिवाज्ञया हृदयं बन्ध बन्ध घूर्णय घूर्णय चूर्णय चूर्णय सूक्ष्मासूक्ष्म वज्रधर वज्रपाशधनुर्वज्राशनिवज्रशरीर मच्छरीरमनुप्रविश्य सर्वदुष्टान् स्तम्भय स्तम्भय हुम्* ॥ ३६ ॥<br>—यह एक सौ पाँच अक्षरोंका कवच-मन्त्र है। अर्थात् इसे पढ़कर 'कवचाय हुम्' बोलते हुए दोनों हाथोंसे एक साथ दोनों भुजाओंका स्पर्श करे ॥ ३७ ॥<br>'ॐ ओजसे नेत्रत्रयाय वौषट्' ऐसा बोलकर दोनों नेत्रोंका स्पर्श करे। इसके बाद निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़कर अस्त्रन्यास करे—'ॐ ह्रीं स्फुर स्फुर प्रस्फुर प्रस्फुर घोरघोरतरतनुरूप चट चट प्रचट प्रचट कह कह वम वम बन्ध बन्ध घातय घातय हुं फट्।' यह (प्रणवसहित बावन अक्षरोंका) 'अघोरास्त्र-मन्त्र' है ॥ ३८ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अनेकविध मन्त्रोंके साथ ईशान आदि मन्त्र तथा छः अङ्गोंसहित अघोरास्त्रका कथन' नामक तीन सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२३ ॥


तीन सौ चौबीसवाँ अध्याय

कल्पाघोर रुद्रशान्ति

महादेवजी कहते हैं—स्कन्ध! अब मैं 'कल्पाघोर-शिवशान्ति' का वर्णन करता हूँ। भगवान् अघोर शिव सात करोड़ गणोंके अधिपति हैं तथा ब्रह्महत्या आदि पापोंको नष्ट करनेवाले हैं। उत्तम और अधम—सभी सिद्धियोंके आश्रय तथा सम्पूर्ण रोगोंके निवारक हैं। भौम, दिव्य तथा अन्तरिक्ष—सभी उत्पातोंका मर्दन करनेवाले हैं। विष, ग्रह और पिशाचोंको भी अपना ग्रास बना लेनेवाले तथा सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले हैं। पापसमूहको पीड़ा देकर दूर भगानेके लिये वे उस प्रबल प्रायश्चित्तके प्रतीक हैं, जो दुर्भाग्य तथा दुःखका विनाशक है ॥ १–३ ॥'एकवीर' का सर्वाङ्गमें न्यास करके सदा पञ्चमुख शिवका ध्यान करे। (विभिन्न कर्मोंमें उनके विभिन्न शुक्ल-कृष्ण आदि वर्णोंका ध्यान किया जाता है। यथा—) शान्ति तथा पुष्टि-कर्ममें भगवान् शिवका वर्ण शुक्ल है, ऐसा चिन्तन करे। वशीकरणमें उनके रक्तवर्णका, स्तम्भनकर्ममें पीतवर्णका, उच्चाटन तथा मारणकर्ममें धूम्रवर्णका, आकर्षणमें कृष्णवर्णका तथा मोहन-कर्ममें कपिलवर्णका चिन्तन करना चाहिये। (अघोरमन्त्र बत्तीस अक्षरोंका मन्त्र बताया गया है।) वे बत्तीस अक्षर वेदोक्त अघोरशिवके रूप हैं। अतः उतने अक्षरोंके मन्त्रस्वरूप अघोरशिवकी

*पाठान्तर 'हूमू'।

* अध्याय ३२४ * ६६५


अर्चना करनी चाहिये। इस मन्त्रका (बत्तीस) या तीस लाख जप करके उसका दशांश होम करे। यह होम गुग्गुलमिश्रित घीसे होना चाहिये। इससे मन्त्र ‘सिद्ध’ होता और साधक ‘सिद्धार्थ’ हो जाता है। वह सब कुछ कर सकता है। अघोरसे बढ़कर दूसरा कोई मन्त्र भोग तथा मोक्ष देनेवाला नहीं है। इसके जपसे अब्रह्मचारी ब्रह्मचारी होता तथा अस्नातक स्नातक हो जाता है। अघोरास्त्र तथा अघोर-मन्त्र—दोनों मन्त्रराज हैं। इनमेंसे कोई भी मन्त्र जप, होम तथा पूजनसे युद्धस्थलमें शत्रुसेनाको रौंद सकता है॥ ४-८॥

अब मैं कल्याणमयी 'रुद्रशान्ति'का वर्णन करता हूँ, जो सम्पूर्ण मनोरथोंको सिद्ध करनेवाली है। पुत्रकी प्राप्ति, ग्रहबाधाके निवारण, विष एवं व्याधिके विनाश, दुर्भिक्ष तथा महामारीकी शान्ति, दुःस्वप्ननिवारण, बल आदि तथा राज्य आदिकी प्राप्ति और शत्रुओंके संहारके लिये इस 'रुद्रशान्ति'का प्रयोग करना चाहिये। यदि अपने बगीचेके किसी वृक्षमें असमयमें फल लग जाय तो यह भी अनिष्टकारक है; अतः उसकी शान्तिके लिये तथा समस्त ग्रहबाधाओंका नाश करनेके लिये भी उक्त शान्तिका प्रयोग किया जा सकता है। पूजन-कर्ममें मन्त्रके अन्तमें 'नमः' बोलना चाहिये तथा हवन-कर्ममें 'स्वाहा'। आप्यायन (तृप्ति)-में मन्त्रान्तमें 'वषट्' पदका प्रयोग करे और पुष्टि-कर्ममें 'वौषट्' पदका। मन्त्रमें जो दो जगह 'च' का प्रयोग है, वहाँ आवश्यकताके अनुसार 'नमः', 'स्वाहा' आदि जातिका योग करना चाहिये॥ ९-१२॥

रुद्रशान्ति-मन्त्र
ॐ रुद्राय च ते ॐ वृषभाय नमोऽविमुक्ताया- सम्भवाय पुरुषाय च पूज्यायेशानाय पौरुषाय पञ्च पञ्चोत्तरे विश्वरूपाय करालाय विकृतरूपायाविकृतरूपाय॥ १३॥

उत्तरवर्ती कमलदलमें नियतितत्त्वकी स्थिति है, जल (वरुण)-की दिशा पश्चिमके कमलदलमें कालतत्त्व है और नैर्ऋत्यकोणवर्ती दलमें मायातत्त्व अवस्थित है; उन सबमें देवताओंकी पूजा होती है। 'एकपिङ्गलाय श्वेतपिङ्गलाय कृष्णपिङ्गलाय नमः। मधुपिङ्गलाय नमः—मधुपिङ्गलाय।'—इन सबकी पूजा नियतितत्त्वमें होती है। 'अनन्तायार्द्राय शुष्काय पयोगणाय (नमः)।'—इनकी पूजा कालतत्त्वमें करे। 'करालाय विकरालाय (नमः)।'—इन दोकी पूजा मायातत्त्वमें करे। 'सहस्रशीर्षाय सहस्रवक्त्राय सहस्रकरचरणाय सहस्रलिङ्गाय (नमः)।'—इनकी अर्चना विद्यातत्त्वमें करे। वह इन्द्रसे दक्षिण दिशाके दलमें स्थित है। वहीं छः पदोंसे युक्त षड्विध रुद्रका पूजन करे। यथा—'एकजटाय द्विजटाय त्रिजटाय स्वाहाकाराय स्वधाकाराय वषट्काराय षड्रुद्राय।' स्कन्द! अग्निकोणवर्ती दलमें ईशतत्त्वकी स्थिति है। उसमें क्रमशः 'भूतपतये पशुपतये उमापतये कालाधिपतये (नमः)।' बोलकर भूतपति आदिकी पूजा करे। पूर्ववर्ती दल सदाशिव-तत्त्वमें छः पूजनीयोंकी स्थिति है, जिनका निम्नाङ्कित मन्त्रमें नामोल्लेख है। यथा—'उमायै कुरूपधारिणि ॐ कुरु कुरु रुहिणि रुहिणि रुद्रोऽसि देवानां देवदेव विशाख हन हन दह दह पच पच मथ मथ तुरु तुरु अरु अरु मुरु मुरु रुद्रशान्तिमनुस्मर कृष्णपिङ्गल अकाल-पिशाचाधिपति विद्येश्वराय नमः।' कमलकी कर्णिकामें शिवतत्त्वकी स्थिति है। उसमें भगवान् उमा-महेश्वर पूजनीय हैं। मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ व्योमव्यापिने व्योमरूपाय सर्वव्यापिने शिवायाननन्ताय नाथायानाश्रिताय शिवाय' (प्रणवको अलग गिननेपर इस मन्त्रमें कुल नौ पद हैं)—शिवतत्त्वमें व्योमव्यापी नामवाले शिवके नौ पदोंका पूजन करना चाहिये॥ १४-२४॥
तदनन्तर योगपीठपर विराजमान शिवका नौ

६६६ * अग्निपुराण *


पदोंसे युक्त नाम बोलकर पूजन करे। मन्त्र इस प्रकार है—‘शाश्वताय योगपीठसंस्थिताय नित्ययोगिने ध्यानाहाराय नमः। ॐ नमः शिवाय सर्वप्रभवे शिवाय ईशानमूर्धाय तत्पुरुषाय पञ्चवक्त्राय।’ स्कन्द! तत्पश्चात् ‘सद्’ नामक पूर्वदलमें नौ पदोंसे युक्त शिवका पूजन करे॥ २५-२६॥

‘अघोरहृदाय वामदेवगुह्याय सद्योजातमूर्तये ॐ नमो नमः। गुह्यातिगुह्याय गोप्त्रेऽनिधनाय सर्वयोगाधिकृताय ज्योतीरूपाय’॥ २७। १॥

अग्निकोणवर्ती ईशतत्त्वमें तथा दक्षिणदिशावर्ती विद्यातत्त्वमें ‘परमेश्वराय अचेतनाचेतन व्योमन् व्यापिन्नरूपिन् प्रमथतेजस्तेजः।’—इस मन्त्रसे परमेश्वर शिवकी अर्चना करे॥ २७। २॥

नैर्ऋत्यकोणवर्ती मायातत्त्व तथा पश्चिमदिग्वर्ती कालतत्त्वमें निम्नाङ्कित मन्त्रद्वारा पूजन करे—

‘ॐ धृ धृ वां वां अनिधान निधनोद्भव शिव सर्व परमात्मन् महादेव सद्भावेश्वर महातेज योगाधिपते मुञ्च मुञ्च प्रमथ प्रमथ ॐ सर्व सर्व ॐ भव भव ॐ भवोद्भव सर्वभूतसुखप्रद॥’ २८-३०॥

वायुकोण तथा उत्तरवर्ती दलोंमें स्थित नियति एवं पुरुष—इन दोनों तत्त्वोंमें निम्नाङ्कित नौकी पूजा करे—

‘सर्वासान्निध्यकर ब्रह्मविष्णुरुद्रपरानर्चितास्तुत स्तुत साक्षिन् साक्षिन् तुरु तुरु पतङ्ग पतङ्ग पिङ्ग पिङ्ग ज्ञान ज्ञान। शब्द शब्द सूक्ष्म सूक्ष्म शिव शिव सर्वप्रद सर्वप्रद ॐ नमः शिवाय ॐ नमो नमः शिवाय ॐ नमो नमः’॥ ३१॥

ईशानवर्ती प्राकृततत्त्वमें ‘शब्द’ से लेकर ‘नमः’ तकका मन्त्र पढ़कर पूजन, जप और होम करे। यह ‘रुद्रशान्ति’ ग्रहबाधा, रोग आदि तथा त्रिविध पीडाका शमन करनेवाली तथा सम्पूर्ण मनोरथोंकी साधिका है॥ ३२॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘रुद्रशान्ति-विधान-कथन’ नामक तीन सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२४॥


तीन सौ पचीसवाँ अध्याय

रुद्राक्ष-धारण, मन्त्रोंकी सिद्धादि संज्ञा तथा अंश आदिका विचार

महादेवजी कहते हैं— स्कन्द! शैव-साधकको रुद्राक्षका कड़ा धारण करना चाहिये। रुद्राक्षोंकी संख्या विषम हो। उसका प्रत्येक मनका सब ओरसे सम और दृढ़ हो। रुद्राक्ष एकमुख, त्रिमुख या पञ्चमुख—जैसा भी मिल जाय, धारण करे। द्विमुख, चतुर्मुख तथा षण्मुख रुद्राक्ष भी प्रशस्त माना गया है। उसमें कोई क्षति या आघात न हो—वह फूटा या घुना न होना चाहिये। उसमें तीखे कण्टक होने चाहिये। दाहिनी बाँह तथा शिखा आदिमें चतुर्मुख रुद्राक्ष धारण करे। इससे अब्रह्मचारी भी ब्रह्मचारी तथा अस्नातक पुरुष भी स्नातक हो जाता है। अथवा शिव-मन्त्रकी पूजा करके सोनेकी अँगूठीको दाहिने हाथमें धारण करे॥ १-३॥

शिव, शिखा, ज्योति तथा सावित्र—ये चार ‘गोचर’ हैं। ‘गोचर’ का अर्थ ‘कुल’ समझना चाहिये। उसीसे दीक्षित पुरुषको लक्ष्य करना चाहिये। शिवकुलमें प्राजापत्य, महीपाल, कापोत तथा ग्रन्थिक—ये चार गिने जाते हैं। कुटिल, वेताल, पद्म और हंस—ये चार ‘शिखाकुल’में परिगणित होते हैं। धृतराष्ट्र, वक, काक और गोपाल—ये चार ‘ज्योति’ नामक कुलमें समझे जाते हैं। कुटिका, साठर, गुटिका तथा दण्डी—ये चार ‘सावित्री-कुल’में गिने जाते हैं। इस प्रकार एक-एक कुलके चार-चार भेद हैं॥ ४-६½॥

अब मैं ‘सिद्ध’ आदि अंशोंकी व्याख्या

  • अध्याय ३२५ * ६६७

करता हूँ, जिससे मन्त्र उत्तम सिद्धिको देनेवाला होता है। पृथ्वीपर कूटयन्त्ररहित मातृका (अक्षर) लिखे। मन्त्राक्षरोंको विलग-विलग करके अनुस्वारको पृथक् ले जाय। साधकका भी जो नाम हो, उसके अक्षरोंको अलग-अलग करे। मन्त्रके आदि और अन्तमें साधकके नामाक्षर जोड़े। फिर सिद्ध, साध्य, सुसिद्ध तथा अरि—इस संज्ञाके अनुसार अक्षरोंको क्रमशः गिने। मन्त्रके आदि तथा अन्तमें 'सिद्ध' हो तो वह शत-प्रतिशत सिद्धिदायक होता है। यदि आदि और अन्त दोनोंमें 'सिद्ध' (अक्षर) हों तो उस मन्त्रकी तत्काल सिद्धि होती है। यदि आदि और अन्तमें भी 'सुसिद्ध' हो तो उस मन्त्रको सिद्धवत् मान ले—वह मन्त्र अनायास ही सिद्ध हो गया—ऐसा समझ ले। यदि आदि और अन्त—दोनोंमें 'अरि' हो तो उस मन्त्रको दूरसे ही त्याग दे। 'सिद्ध' और 'सुसिद्ध'—एकार्थक हैं। 'अरि' और 'साध्य' भी एकसे ही हैं। यदि मन्त्रके आदि और अन्त अक्षरमें भी मन्त्र 'सिद्ध' हो और बीचमें सहस्रों 'रिपु'-अक्षर हों तो भी वे दोषकारक नहीं होते हैं। मायाबीज, प्रसादबीज और प्रणवके योगसे विख्यात मन्त्रमें अंशक होते हैं। वे क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्रके अंश हैं। ब्रह्माका अंश 'ब्रह्मविद्या' कहलाता है। विष्णुका अंश 'वैष्णव' कहा गया है। रुद्रांशक मन्त्र 'वीर' कहलाता है। इन्द्रांशक मन्त्र 'ईश्वरप्रिय' होता है। नागांश-मन्त्र नागोंकी भाँति स्तब्ध नेत्रवाला माना गया है। यक्षके अंशका मन्त्र 'भूषणप्रिय' होता है। गन्धर्वोंके अंशका मन्त्र अत्यन्त गीत आदि चाहता है। भीमांश, राक्षसांश तथा दैत्यांश-मन्त्र युद्ध करानेवाला होता है। विद्याधरोंके अंशका मन्त्र अभिमानी होता है। पिशाचांश मन्त्र मलाक्रान्त होता है। मन्त्रका पूर्णतः निरीक्षण करके उपदेश देना चाहिये। एकाक्षरसे लेकर अनेक अक्षरोंतकके मन्त्रके अन्तमें यदि 'फट्'—यह पल्लव जुड़ा हो तो उसे 'मन्त्र' कहना चाहिये। पचास अक्षरोंतकके (फट्काररहित) मन्त्रकी 'विद्या' संज्ञा है। बीस अक्षरोंतककी विद्याको 'बाला विद्या' कहते हैं। बीस अक्षरोंतकके 'अस्त्रान्त' मन्त्रको 'रुद्रा' कहा गया है। इससे ऊपर तीन सौ अक्षरोंतकके मन्त्र 'वृद्ध' कहे जाते हैं। अकारसे लेकर हकारतकके अक्षर मन्त्रमें होते हैं। मन्त्रमें क्रमशः शुक्ल और कृष्ण—दो पक्ष होते हैं। अनुस्वार और विसर्गको छोड़कर दस स्वर होते हैं। ह्रस्वस्वर शुक्लपक्ष तथा दीर्घस्वर कृष्णपक्ष हैं। ये ही प्रतिपदा आदि तिथियाँ हैं। उदयकालमें शान्तिक आदि कर्म करावे तथा भ्रमितकालमें वशीकरण आदि। भ्रमितकाल एवं दोनों संध्याओंमें द्वेषण तथा उच्चाटन-सम्बन्धी कर्म करे। स्तम्भनकर्मके लिये सूर्यास्तकाल प्रशस्त है। इडा नाड़ी चलती हो तो शान्तिक आदि कर्म करे। पिङ्गला नाड़ी चलती हो तो आकर्षण-सम्बन्धी कार्य करे। विषुवकालमें जब दोनों नाड़ियाँ समान भावसे स्थित हों, तब मारण, उच्चाटन आदि पाँच कर्म पृथक्-पृथक् सिद्ध करे। तीन तल्ले गृहमें नीचेके तल्लेको 'पृथ्वी', बीचवालेको 'जल' तथा ऊपरवालेको 'तेज' कहते हैं। जहाँ-जहाँ रन्ध्र (छिद्र या गवाक्ष) है, वहाँ बाह्यपार्श्वमें वायु और भीतरी पार्श्वमें आकाश है। पार्थिव अंशमें स्तम्भन, जलीय अंशमें शान्तिकर्म तथा तैजस अंशमें वशीकरण आदि कर्म करे। वायुमें भ्रमण तथा शून्य (आकाश)-में पुण्यकर्म या पुण्यकालका अभ्यास करे॥७–२३॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अंशक आदिका कथन' नामक तीन सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२५॥

६६८ * अग्निपुराण *

तीन सौ छब्बीसवाँ अध्याय

गौरी आदि देवियों तथा मृत्युंजयकी पूजाका विधान

महादेवजी कहते हैं—स्कन्द ! अब मैं सौभाग्य आदिके निमित्त उमाकी पूजाका विधान बताऊँगा। उनके मन्त्र, ध्यान, आवरणमण्डल, मुद्रा तथा होमविधिका भी प्रतिपादन करूँगा॥ १॥

‘गौं गौरीमूर्तये नमः*।’—यह गौरीदेवीका वाचक मूल मन्त्र है। ‘ॐ ह्रीं सः शौं गौर्यै नमः।’ तीन अक्षरसे ही ‘नमः’ आदिके योगपूर्वक षडङ्गन्यास करना चाहिये। प्रणवसे आसन और हृदय-मन्त्रसे मूर्तिकी उपकल्पना करे। ‘ऊ’ कालबीज तथा शिवबीजका उद्धार करे। दीर्घस्वरसे आक्रान्त प्राण—‘यां यीं’ इत्यादिसे जातियुक्त षडङ्गन्यास करे। प्रणवसे आसन तथा हृदय-मन्त्रसे मूर्तिन्यास करे। यह मैंने ‘यामल-मन्त्र’ कहा है। अब ‘एकवीर’का वर्णन करता हूँ। सृष्टिन्याससे युक्त व्यापकन्यास अग्नि, माया तथा कृशानुद्वारा करे। शिव-शक्तिमय बीज हृदयादिसे वर्जित है। गौरीकी सोने, चाँदी, लकड़ी अथवा पत्थर आदिकी प्रतिमा बनाकर उसकी पूजा करे। अथवा पाँच पिण्डीवाली मृण्मयी प्रतिमा बनाये। चारों कोणोंमें अव्यक्त प्रतिमा रहे और मध्यभागमें पाँचवीं व्यक्त प्रतिमा स्थापित करे। आवरण-देवताओंके रूपमें क्रमशः ललिता आदि शक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। पहले वृत्ताकार अष्टदल कमल बनाकर आग्नेय आदि कोणवर्ती दलोंमें क्रमशः ललिता, सुभगा, गौरी और क्षोभणीकी पूजा करे। फिर पूर्वादि दलोंमें वामा, ज्येष्ठा, क्रिया और ज्ञानाका यजन करे। पीठयुक्त वामभागमें शिवके अव्यक्त रूपकी पूजा करनी चाहिये। देवीका व्यक्त रूप दो या तीन नेत्रोंवाला है। वह शुद्ध रूप भगवान् शंकरके साथ पूजित होता है। वे देवी दो पीठ या दो कमलोंपर स्थित होती हैं। वहाँ देवी दो, चार, आठ अथवा अठारह भुजाओंसे युक्त हैं, ऐसा चिन्तन करे। वे सिंह अथवा भेड़ियेको भी अपना वाहन बनाती हैं। अष्टादशभुजाके दायें नौ हाथोंमें नौ आयुध हैं, जिनके नाम यों हैं—स्रक् (हन्), अक्ष, सूत्र (पाश), कलिका, मुण्ड, उत्पल, पिण्डिका, बाण और धनुष। इनमेंसे एक-एक महान् वस्तु उनके एक-एक हाथकी शोभा बढ़ाते हैं। वामभागके नौ हाथोंमें भी प्रत्येकमें एक-एक करके क्रमशः नौ वस्तुएँ हैं। यथा—पुस्तक, ताम्बूल, दण्ड, अभय, कमण्डलु, गणेशजी, दर्पण, बाण और धनुष॥ २—१४॥

उनको ‘व्यक्त’ अथवा ‘अव्यक्त’ मुद्रा दिखानी चाहिये। आसन-समर्पणके लिये ‘पद्म-मुद्रा’ कही गयी है। भगवान् शिवकी पूजामें ‘लिङ्ग-मुद्रा’ का विधान है। यही ‘शिवमुद्रा’ है। ‘आवाहनीमुद्रा’ दोनोंके लिये है। शक्ति-मुद्रा ‘योनि’ नामसे कही गयी है। इनका मण्डल या मन्त्र चौकोर है। यह चार हाथ लंबा-चौड़ा हुआ करता है। मध्यवर्ती चार कोष्ठोंमें त्रिदल कमल अङ्कित करना चाहिये। तीनों कोणोंके ऊर्ध्वभागमें अर्धचन्द्र रहे। उसे दो पदों (कोष्ठों)-को लेकर बनाया जाय। एकसे दूसरा दुगुना होना चाहिये। द्वारोंका कण्ठभाग दो-दो पदोंका हो; किंतु उपकण्ठ उससे दुगुना रहना चाहिये। एक-एक दिशामें तीन-तीन द्वार रखने चाहिये अथवा ‘सर्वतोभद्र’ मण्डल बनाकर उसमें पूजन करना चाहिये। अथवा किसी चबूतरे या वेदीपर देवताकी स्थापना करके पञ्चगव्य तथा पञ्चामृत आदिसे पूजन करे॥ १५–१८॥

पूजन करके उत्तराभिमुख हो उन्हें लाल रंगके फूल अर्पण करने चाहिये। घृत आदिकी


* ‘श्रीविद्यार्णव-तन्त्र’में इसी मन्त्रको ‘गौरीमन्त्र’ कहा है। यहाँ मूलमें जो बीज दिये गये हैं, उनका उल्लेख वहाँ नहीं मिलता।

  • अध्याय ३२७ * ६६९

सौ आहुतियाँ देकर पूर्णाहुति प्रदान करनेवाला साधक सम्पूर्ण सिद्धियोंका भागी होता है। फिर बलि अर्पित करके तीन या आठ कुमारियोंको भोजन करावे। पूजाका नैवेद्य शिवभक्तोंको दे, स्वयं अपने उपयोगमें न ले। इस प्रकार अनुष्ठान करके कन्या चाहनेवालेको कन्या और पुत्रहीनको पुत्रकी प्राप्ति होती है। दुर्भाग्यवाली स्त्री सौभाग्यशालिनी होती है। राजाको युद्धमें विजय तथा राज्यकी प्राप्ति होती है। आठ लाख जप करनेसे वाक्सिद्धि प्राप्त होती है तथा देवगण वशमें हो जाते हैं। इष्टदेवको निवेदन किये बिना भोजन न करे। बायें हाथसे भी अर्चना कर सकते हैं। विशेषतः अष्टमी, चतुर्दशी तथा तृतीयाको ऐसा करनेकी विधि है॥ १९—२२$\frac{१}{२}$॥

अब मैं मृत्युंजयकी पूजाका वर्णन करूँगा। कलशमें उनकी पूजा करे। हवनमें प्रणव मृत्युंजयकी मूर्ति है और 'ओं जूं सः।'—इस प्रकार मूलमन्त्र है। 'ओं जूं सः वौषट्।'—ऐसा कहकर अर्चनीय देवता मृत्युंजयको कुम्भमुद्रा दिखावे। इस मन्त्रका दस हजार बार जप करे तथा खीर, दूर्वा, घृत, अमृता (गुडुची), पुनर्नवा (गदहपूर्ना), पायस (पयःपक्व वस्तु) और पुरोडाशका हवन करे। भगवान् मृत्युंजयके चार मुख और चार भुजाएँ हैं। वे अपने दो हाथोंमें कलश और दो हाथोंमें वरद एवं अभयमुद्रा धारण करते हैं। कुम्भमुद्रासे उन्हें स्नान कराना चाहिये। इससे आरोग्य, ऐश्वर्य तथा दीर्घायुकी प्राप्ति होती है। इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित औषध शुभकारक होता है। भगवान् मृत्युंजय ध्यान किये जानेपर दुर्मृत्युको दूर करनेवाले हैं, इसलिये उनकी सदा पूजा होती है॥ २३—२७॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'गौरी आदिकी पूजाका वर्णन' नामक तीन सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२६॥


तीन सौ सत्ताईसवाँ अध्याय

विभिन्न कर्मोंमें उपयुक्त माला, अनेकानेक मन्त्र, लिङ्ग-पूजा तथा देवालयकी महत्ताका विचार

भगवान् महेश्वर कहते हैं—कार्तिकेय! व्रतेश्वर और सत्य आदि देवताओंका पूजन करके उनको व्रतका समर्पण करना चाहिये। अरिष्ट-शान्तिके लिये अरिष्टमूलकी माला उत्तम है। कल्याणप्राप्तिके लिये सुवर्ण एवं रत्नमयी, मारणकर्ममें महाशङ्खमयी, शान्तिकर्ममें शङ्खमयी और पुत्रप्राप्तिके लिये मौक्तिकमयी मालासे जप करे। स्फटिकमणिकी माला कोष-सम्पत्ति देनेवाली और रुद्राक्षकी माला मुक्तिदायिनी है। उसमें आँवलेके बराबर रुद्राक्ष उत्तम माना गया है। मेरुसहित या मेरुहीन माला भी जपमें ग्राह्य हैं। मानसिक जप करते समय मालाके मणियोंको अनामिका और अङ्गुष्ठसे सरकाना चाहिये। उपांशु जपमें तर्जनी और अङ्गुष्ठके संयोगसे मणियोंकी गणना करे; किंतु जपमें मेरुका कभी उल्लङ्घन न करे। यदि प्रमादवश माला गिर जाय, तो दो सौ बार मन्त्रजप करे। घण्टा सर्ववाद्यमय है। उसका वादन अर्थ-सिद्धि करनेवाला है। गृह और मन्दिरमें शिवलिङ्गकी, गोमय, गोमूत्र, वल्मीक-मृत्तिका, भस्म और जलसे शुद्धि करनी चाहिये॥ १—६॥

कार्तिकेय! 'ॐ नमः शिवाय'—यह मन्त्र सम्पूर्ण अभीष्ट अर्थोंको सिद्ध करनेवाला है। वेदमें 'पञ्चाक्षर' और लोकमें 'षडक्षर' माना गया है। परम अक्षर ओंकारमें शिव सूक्ष्म वटबीजमें वटवृक्षके समान स्थित हैं। शिवके क्रमशः 'ॐ नमः शिवाय'—'ईशानः सर्वविद्यानाम्' आदि

६७० * अग्निपुराण *

मन्त्र समस्त विद्याओंके समुदाय इस षडक्षर मन्त्रके भाष्य हैं। 'ॐ नमः शिवाय'—यह मन्त्र ही परमपद है। इसी मन्त्रसे शिवलिङ्गका पूजन करना चाहिये; क्योंकि धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष प्रदान करनेवाले भगवान् शिव सम्पूर्ण लोकोंपर अनुग्रह करनेके लिये लिङ्गमें प्रतिष्ठित हैं। जो मनुष्य शिवलिङ्गका पूजन नहीं करता है, वह धर्मकी प्राप्तिसे वञ्चित रह जाता है। लिङ्गपूजनसे भोग और मोक्ष दोनोंकी प्राप्ति होती है, इसलिये जीवनपर्यन्त शिवलिङ्गका पूजन करे। भले ही प्राण चले जायें, किंतु उसका पूजन किये बिना भोजन न करे। मनुष्य रुद्रके पूजनसे रुद्र, श्रीविष्णुके यजनसे विष्णु, सूर्यकी पूजा करनेसे सूर्य और शक्तिकी अर्चनासे शक्तिका सारूप्य प्राप्त करता है। उसे सम्पूर्ण यज्ञ, तप, दानकी प्राप्ति होती है। मनुष्य लिङ्गकी स्थापना करके उससे करोड़गुना फल प्राप्त करता है। जो मनुष्य प्रतिदिन तीनों समय पार्थिव-लिङ्गका निर्माण करके बिल्वपत्रोंसे उसका पूजन करता है, वह अपनी एक सौ ग्यारह पीढ़ियोंका उद्धार करके स्वर्गलोकको प्राप्त होता है। अपने धनसंचयके अनुसार भक्तिपूर्वक देवमन्दिर निर्माण कराना चाहिये। दरिद्र और धनिकको मन्दिर-निर्माणमें यथाशक्ति अल्प या अधिक व्यय करनेके समान फल मिलता है। संचित धनके दो भाग धर्मकार्यमें व्यय करके जीवन-निर्वाहके लिये समभाग रखें; क्योंकि जीवन अनित्य है। देवमन्दिर बनवानेवाला अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करके अभीष्ट अर्थकी प्राप्ति करता है। मिट्टी, लकड़ी, ईंट और पत्थरसे मन्दिर-निर्माणका क्रमशः करोड़गुना फल है। आठ ईंटोंसे भी मन्दिरका निर्माण करनेवाला स्वर्गलोकको प्राप्त हो जाता है। क्रीडामें धूलिका मन्दिर बनानेवाला भी अभीष्ट मनोरथको प्राप्त करता है॥ ७—११॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'देवालय-माहात्म्य-वर्णन' नामक तीन सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२७॥


तीन सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय

छन्दोंके गण और गुरु-लघुकी व्यवस्था

अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! अब मैं वेदके मूलमन्त्रोंके अनुसार पिङ्गलोक्त छन्दोंका क्रमशः वर्णन करूँगा। मगण, नगण, भगण, यगण, जगण, रगण, सगण और तगण—ये आठ गण होते हैं। सभी गण तीन-तीन अक्षरोंके हैं। इनमें मगणके सभी अक्षर गुरु (ऽऽऽ) और नगणके सब अक्षर लघु (।।।) होते हैं। आदि गुरु (ऽ।।) होनेसे 'भगण' तथा आदि लघु (।ऽऽ) होनेसे 'यगण' होता है। इसी प्रकार अन्त्य गुरु (।।ऽ) होनेसे 'सगण' तथा अन्त्य लघु होनेसे 'तगण' (ऽऽ।) होता है। पादके अन्तमें वर्तमान ह्रस्व अक्षर विकल्पसे गुरु माना जाता है। विसर्ग, अनुस्वार, संयुक्त अक्षर (व्यञ्जन), जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीयसे अव्यवहित पूर्वमें स्थित होनेपर 'ह्रस्व' भी 'गुरु' माना जाता है, दीर्घ तो गुरु है ही। गुरुका संकेत 'ग' और लघुका संकेत 'ल' है। ये 'ग' और 'ल' गण नहीं हैं। 'वसु' शब्द आठकी और 'वेद' चारकी संज्ञा हैं, इत्यादि बातें लोकके अनुसार जाननी चाहिये॥ १—३॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'छन्दस्सारका कथन' नामक तीन सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२८॥