अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
अकबर बीरबल विनोद ४२
अकबर बीरबल विनोद ४२ परन्तु सभी देखनेवाले उसको नहीं देख पाते हाँ जो जन्मजा- कुलीन और कर्म से पवित्र होते हैं वे उसे तुरत देख लेते हैं।” बीरबल की इन बातोंसे बादशाह और घबड़ाया और मनमें कल्पना करने लगा“—सबको तो वह स्वर्ग की परी और उसकी दासी प्रत्यक्ष दिखलाई पड़ती है और मुझे नहीं; इसका क्या कारण है? हो न हो; मैं ही वर्णशंकर होऊँ। अब तक मैं अपने को वर्णशंकर नहीं समझता था, परन्तु आज इस स्वर्ग की परी के सामने परीक्षा होने पर मुझे अपना वर्णशंकर होना निश्चित हो गया। मेरे ऐसे पतित जीवन को कोटिशः धिक्कार है। अब मुझे इस भेद को छिपाना आवश्यक है नहीं तो प्रजावर्ग में मेरी बड़ी अपकीर्ति फैलेगी, मुँहपर तो सब वाह वाह करेंगे पीछे वर्णशंकर समझ कर मेरी हँसी उड़ावेंगे। इतने में बीरबल फिर अंगुली का संकेत करता हुआ बोला—“देखिये २ पृथ्वीनाथ ! वह चन्द्रा- नना बैठी है और उसकी दासी बगल में खड़ी है। बादशाह ने लाचार होकर उसकी बात मानली और बोला-“हाँ हाँ अबकी बार वह मुझे प्रत्यक्ष दीख पड़ी। वह खिड़की में खड़ी होकर इधर को ही देख रही है।” बादशाह को परी का देख पड़ना स्वीकार करने पर बीरबल सब सभासद और नये मंत्री के सहित महल के चौथे खण्ड पर गया। वहाँ पर पहले से मुलायम कोंच और मखमल की तकिया सुसज्जित रक्खी जा चुकी थी, बीरबल बादशाह को कोंच पर बैठाकर उनसे गपाष्टक मारने लगा, पर यह बात बादशाह को पसंद नहीं आती थी, उसका मन तो
४३ अकबर बीरबल बिनोद परी के देखने में लगा था। वह तत्क्षण बादशाह के मनकी बात ताड़ गया, जल्दी में फूल और इत्र तथा गुलाबजल से सबका स्वागतकर बोला-"गरीबपरवर ! आप और आपके साथी मृत्यु लोक के वस्त्राभूषणों को धारण किये हुए हैं, और ये सब नश्वर हैं, मैं सबको स्वर्गीय वस्त्र देता हूँ कृपया उसे धारण कर इहलोक और परलोक दोनों का सुख अनु- भव करें । ये कपड़े मैं पहले ही से अपने साथ लेता आया हूँ और ये कभी नष्ट होने वाले भी नहीं हैं। भला बीरबल के चकमें से कौन निकल सकता था, बादशाह के स्वीकार करते ही सब लोग अपने कपड़े उतार २ कर अलग धर दिये और बीरबल के दिये कपड़ों को धारण करने पर उद्यत हुए। बीरबल कुछ सोच विचार कर बादशाह को तो असली वस्त्र पहनाया परन्तु दीवान आदिकों को इतना ही कहकर रह गया कि इन स्वर्गीय कपड़ों को पहन लीजिये । नये दीवान ने अपनी आँखों के सामने कोई वस्त्र न देख कर मन में सोचा-"ऐसे कपड़े पहनने का अर्थ तो अपने को नग्न करना है; परन्तु बीरबल की बात नामंजूर कर वर्णशंकर कौन बने, इस बेइज्जती से तो नग्न होकर रहना ही अच्छा है। उसके बदन पर केवल पाजामाशेषथा उसे भी उतार कर अलग फेंक दिया और ऐसा ढोंग बनाया मानों लोगों के देखने में स्वर्गीय कपड़े ही पहन रहा हो। फिर कपड़े पहने हुओं के समान ऐँड़कर अपनी जगह पर नंग धड़ंग जा बैठा। उसके बदन पर यदि एक लगोट न रह गया होता तो गुप्तेन्द्रियाँ भी प्रगट दिखलाई पड़ने लगतीं। दीवान का ऐसा भेष
अकबर बीरबल विनोद ४४
अकबर बीरबल विनोद ४४ देखकर लोगों का हँसी आने लगी, परन्तु समय हँसने के विपरीत था इसलिये लागों ने उसे प्रगट नहीं होने दिया। हँसकर वर्णशंकर बनना किसी को मंजूर नहीं था—"भाई तू भी चुप, मैं भी चुप।" नये दीवान के नग्न हो जाने पर बीरबल ने बारी-बारी सबको नग्न कर दिया। क्या कहना था दरबार का दरबार नगोठिया हो गया; बादशाह मन ही मन आन की तान सोचता रहा अन्त में उसकी हृदय तंत्री बोली- "भाई स्वर्गीय चरित्र बड़े ही अद्भुत हैं।" तब बादशाह ने बीरबल से पूछा—"क्यों साहब अब तक लोग स्वर्गीय पोशाक पहन चुके वा नहीं?" "बीरबल ने उत्तर दिया"-जी हाँ, अब सब लोग एक दम कपड़े लत्ते से लैस हैं, परन्तु एकाएक वहाँ (परी के पास) सबको न लिवा चलकर पहले मैं उसकी अनुमति ले लेना उत्तम समझता हूँ; आप लोग यहीं ठहरे मैं उसकी स्वीकृति लेकर तत्काल लौट आता हूँ। बीरबल बगल के एक कमरे में भीतर से सिटकना बन्द कर छिप रहा, कुछ समय बिताकर बाहर निकला और बादशाह से प्रार्थना कर बोला—"गरीबपरवर ! परी की ऐसी अनुमति है कि यह दिन का समय है, इस वक्त सब लोग वापस जावें रात्रि में मुझसे मिल सकते हैं। उसने एक बात और भी कहा है-"अपने मालिक से बोलना कि मुझे इस पहाड़ो की आबहवा बड़ी सुहावनी और निरोग जान पड़ती है इसलिये कुछ दिनों तक मेरा यहीं रहने का विचार है। मैं पहले से बादशाह की हो चुकी हूँ तदर्थ किसी न किसी दिन उनसे
४५ अकबर बीरबल बिनोद
अवश्य मिलूँगो । इस समय बादशाह के साथ और बहुत से लोग आये हुए हैं, मैंउनके सामने नहीं मिल सकती” स्वर्गीय परी का ऐसा सन्देशा सुनाकर बीरबल फिर बोला-“पृथ्वि- वीनाथ ! मुझे भी मुनासिब यही जान पड़ता है। हम लोग उसकी मरजी के अनुसार चलें, नहीं तो यदि हमारे ब्योहारों से ऊबकर कहीं वह रुष्ट हो गई तो फिर बना बनाया काम बिगड़ जायगा। इस समय लौट ही चलना बुद्धि- मानी है। कोई उपाय कार्यान्वित होते न देख बादशाह लाचार होकर मनगढंत परी की आज्ञा पालन करता हुआ नगर की तरफ चला। आगे २ बीरबल उसके पीछे बादशाह और सबके पीछे कतार से अन्य लोग चल रहे थे। बीरबल और बादशाह तो कपड़े पहने हुये थे लेकिन पीछे वाले सब नग्न शरीर केवल एक लगोटी पहने हुये थे। बादशाह विमुख लौटने के कारण बड़ा दुखी था; लेकिन चूँकि परी ने रात को उससे मिलने का वादा किया था इससे भीतर भीतर कुछ धैर्य भी बँधा हुआ था। इस प्रकार सबको लिये हुए बीरबल नगर में पहुँचा। शहर के रईसों को यों नंगधड़ंग घूमते देख नागरिकों को हँसी आने लगी। यह दल लिये हुये बीरबल जिस गली से होकर जाता वहाँ के लोग इन को देखकर हँस पड़ते। जब इनसे रहा न गया तो नागरिकों को डाटकर बोले-“तुम लोग बड़े मूर्ख हो जो हमको देखकर हँस रहे हो, तुम्हें मालूम नहीं कि बीरबल हम को स्वर्गीय आनन्द लुटा रहा है। हमारे इन पवित्र वस्त्रों को मृत्युलोक
निवासी देख नहीं सकते इसीसे तुम मुझे नग्न देख रहे हो।” नगर निवासी निरे भाँदू नहीं थे; उनमें भी एक से एक धुरंधर विद्वान थे । आपस में बोले-“हो न हो! यह सब बीर- बल के ही बहकावे में आ गये हों । तुम लोग जानते हो कि बीरबलको मरे आज कई वर्षों का समय बीत गया, फिर बीर- बल कहाँ से आ पहुँचा । यह बात सबको स्मरण होगा कि एक समय बादशाह ने बीरबल से एक अजीब तमाशा दिखलाने को कहा था । जिस कारण इतने दिनों तक गुप्त रह कर आज बादशाह को अजीब तमाशा दिखलाता हुआ आ रहा है।” सब नागरिकों ने इस बात को स्वीकार किया और सब बीरबल की बुद्धिमानी पर और जोर जोर से हँसने लगे । नागरिकों के ऐसे हास्य और भाषण को सुनकर नग्न अमीरों के कान खड़े हो गये; परन्तु फिर भी वे बीरबलकी सारी बातें सच्ची मानकर नगर वासियों की उपेक्षा करते हुये महल की तरफ चले । बीरबल अपने दल के सहित सारे नगर में घूमता फिरता शाही दर्बार में जा पहुँचा । सब लोग जगह बा जगह खड़े हो गये, परन्तु बीर- बल बादशाह को सबसे अलग ले गया और तब एकान्त में अपना दोनों हाथ जोड़कर बोला-“पृथ्वीनाथ ! यदि मेरे अपराधों की माफी मिले तो मैं कुछ निवेदन करूँ ।” बादशाह ने कहा-“अच्छा कहो, तुम्हें माफी दी जायगी ।” तब बीरबल बोला-“हुजूर को स्मर्ण होगा कि एक समय वर्ष के भीतर मुझे एक अजीब तमाशा दिखलाने को श्रीमान् ने हुक्म दिया था और यह भी बचन दिया था कि उस अजीब
४७ अकबर बीरबल बिनोद तमाशा के दिखलाने में मुझसे की गई गुस्ताखियाँ भी माफ कर दी जायँगी । उसी के मुवाफिक हुजूर को यह नया तमा- शा दिखलाया गया है, कभी आपको इस प्रकार की नग्न सभा देखने में न आई होगी और न फिर भविष्य में देखने ही सकेंगे यही इसका अन्त है । पृथ्वीनाथ ! कहीं मरा हुआ आदमी भी लौट कर आ सकता है ? भला स्वर्ग की परी यहाँ क्योंकर आवेगी ?” बादशाह लाचार था वह बीरबल के कथनानुसार उसको पहले से माफी दे रक्खी थी, अतएव सभासदों से बोला— “दीवानजी ! आजसे लगभग एक वर्ष पहले मैंने अपने दीवान बीरबल को एक अजीब तमाशा दिखलाने की आज्ञा दी थी और उसमें होने वाले सभी अपराधों के लिये उसको माफी भी दी गई थी । सो आज बीरबल ने वही अजीब तमाशा हमको दिखलाया है। आशा करता हूँ आप लोग उसपर रुष्ट न होंगे। यह जो कुछ भी हुआ सब मेरी आज्ञा के कारण हुआ है। इस बात का मुझे भी दुःख है कि उसने आपलोगों की बड़ी हँसी कराई है। मैं ऐसा नहीं चाहता था। मैं तो केवल अजीब तमाशा ही देखने की लालसा रखता था। आपलोग इस बात को एकदम भूल जायें और बीरबल से पहले सा ही प्रेम रक्खें।” बादशाह की आज्ञा सुनकर समस्त हिन्दू दरबारी धन्य धन्य कहने लगे, परन्तु मुसलमान दरबारियों का मुँह लटक गया और मनही मन बीरबल की धृष्टता पर गालियों का बौछार उड़ाने लगे। बीरबल उनके वस्त्रों का गट्ठर पहले
अकबर बीरबल विनोद ४८
अकबर बीरबल विनोद ४८ ही से दर्बार में भेज चुका था इसलिये उसको खुलवा कर सबके हवाले किया। सब लोग असलो वस्त्र धारण कर अपनी २ जगहों पर जा बिराजे और सभाका दूसरा कार्यारम्भ हुआ।
पहले जन्म की वार्ता।
बैजर नामी ग्राम में दो आदमी बड़े मित्र भाव से बसते थे। उनमें एक का नाम पंडित सुशर्मा था जो अति विद्वान, सदाचारी तथा गम्भीर प्रकृति का था। दूसरे मित्र का नाम सुदामा था। यह जाति का नाई था परन्तु विचार में बड़ा ही न्याई था। इनका आपस में ऐसा संगठन था कि बिना एक से पूछे दूसरा कोई नया कार्यारंभ नहीं करता था। एक दिन अकस्मात सुशर्मा के जी में यह बात आई- "हमें कोई ऐसा कर्म करना चाहिये जिससे भविष्य में राज्य ऐश्वर्य्य का सुख मिले।" इस विचार से प्रेरित होकर उसने सुदामा नामी अपने मित्र से इस की चर्चा की। सुदामा नाई ने कहा-" मित्रवर ! मेरा धर्म भी यही कहता है कि आपको तपश्चर्या करने की अनुमति दूँ और तपश्चर्या के समय आपका सह- योग कर मैं भी अपना अगला जन्म सँवारू"। सुशर्मा अपने मित्र को अपनी सम्मति से सहमत देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ और मित्र सुदामा नाई के सहित प्रयाग को चला गया। वहाँ पहुँचाकर त्रिवेणी के समीप ही एक छोटी सी पर्णकुटीर बनवाकर तपश्चर्य्या में निमग्न हुआ।
[Header] ४६ अकवर बीरबल विनोद
[Header] ४६ अकवर बीरबल विनोद सुशर्मा ने तन्मय होकर कई वर्षों तक उस पर्णकुटीर में तप किया परन्तु फिर भी देवताओं की प्रसन्नता न हुई तब ऐसी तपश्चर्य्या से उसका मन ऊब गया और उस प्रणाली को बदल कर संन्यास धारण किया। काशाय वस्त्र पहन कर पुनः तप करने में दत्तचित्त हुआ। सुदामा नाई भी छत्रछाया की तरह उसकी सेवा करता हुआ अपना धर्म पालन करने लगा; उसका अनुमान था कि सन्यासी की सेवा से मनोभीष्ट फल की प्राप्ति कर लूँगा। दोनों की प्रगाढ़ मैत्री थी। इन्हें आपस के सहयोग से कठिन से कठिन कार्य साधन में किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता था। जब इस ढंग से तप करते हुए भी बारह वर्ष बीत गये कुछ भी हासिल न हुआ, यानी देवता प्रसन्न नहीं हुए, तब इन दोनों को बड़ा दुख हुआ और एक दूसरे का मुख देखते हुए इस बात के अनुसन्धान में लगे कि अब कौन सा यत्न किया जाय कि, जिससे अभीष्ट फल की प्राप्ति हो। अपने मित्र सुदामा नाई को चुप देखकर संन्यासी बाला-"मित्र सुदामा ! तुम भलीभाँति देख रहे हो कि हमें तप साधन करते चौबीस वर्ष का समय बीत गया लेकिन कार्य की सिद्धि न हुई, तब आखिर ऐसा कौन सा उपाय किया जाय कि जगत में हमारी अपकीर्ति न हो। मेरे मनमें तो यह आता है कि आत्महत्या के अतिरिक्त निवृत्ति का दूसरा मार्ग नहीं है, लेकिन इससे भी मुक्ति नहीं मिलती इसमें भी एक बात बड़े अड़चन की है। शास्त्रकारों ने आत्म- हत्या को बड़ा पाप बतलाया है। तब भाई तुम्हीं कोई ऐसी ४
[Header] अकबर बीरबल विनोद ५०
[Header] अकबर बीरबल विनोद ५०
युक्ति निकालो जिससे शास्त्रानुकूल सुख प्राप्त हो। "गतानि शोचानि कृतन्न भवन्ते।" अब बीती बातों की चिन्तना छोड़ आगे के लिये प्रयत्नशील होना चाहिये। सुदामा मित्र बोला-"आप पंडित और ज्ञानी हैं, मैं केवल आपका अनुयायी सेवक हूँ; शास्त्रों के आदेश क्या हैं इसका मुझे कोई गम नहीं, तब इसमें आपही को कोई सोच विचार कर दूसरा उपाय निकालना चाहिये। सुशर्मा बोला-"हाँ एक मार्ग है, परन्तु जबतक तुम उससे सहमत न हो मैं कैसे कर सकता हूँ। शास्त्रों में ऐसा प्रमाण मिलता है कि जो प्राणी त्रिवेणी के तटपर बैठकर आत्म विसर्जन करता है उसको आत्महत्या का पाप नहीं लगता बल्कि अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है।" सुदामा नाई पंडित सुशर्मा की इस सम्मति से सहमत हो गया और वे अपने सामानों का अलग २ दो गट्ठर बनाकर एक जगह गाड़कर चलता हुये। वहाँ से चलकर जगत जननी भागीरथी के तटपर आये। सुशर्मा के मन में राज सुख प्राप्ति की काँक्षा थी इसलिये वह पृथिवी मंडल का एकछत्र राज्य प्राप्ति के निमित्त और सुदामा को राज कर्मचारी होने की कांक्षा थी अतएव उसने मंत्री पद की अभिरुचि से त्रिवेणी जी के पवित्र जल में प्राण विसर्जन किया। वे मरती समय ध्यानमग्न हो ईश्वर से प्रार्थना कर बोले-"भगवन् ! इसी जन्म के समान पुनर्जन्म में भी हमारा साथ इसी प्रकार बना रहे और इस समय की सब बातें हमें स्मरण रहें। तीर्थ राज प्रयाग की भूमि जिसमें त्रिवेणी जल का प्रभाव क्या कहना, उस
५१ अकबर बीरबल विनोद
५१ अकबर बीरबल विनोद जल के पुण्य प्रभाव से उनको अभीष्ट सिद्धि मिली । अगले जन्म में सुशर्मा हिमायूँ बादशाह के घर जन्म लेकर अकबर के नाम से विख्यात हुआ और सुदामा नाई का जन्म उसी नगर के एक कुलीन ब्राह्मण के घर हुआ । इसके पिता के पुकारने का नाम स्वप्ननाथ था । ब्राह्मणपुत्र स्वप्ननाथ बड़ा ही बुद्धिमान और प्रतिभाशाली हुआ, जिस कारण थोड़े समय में इसने अच्छी विद्या हासिल करली । विद्या और बुद्धि के प्रभाव से बादशाह ने इसको दीवान पदपर नियुक्त किया और उसका नाम बदल कर बीरबल रक्खा ।
घी का व्यवसाय ।
दिल्ली नगर व्योपारों का केन्द्र था, इस लिये वहाँ बहुतेरे व्योपारी बसते थे। घी के दो व्योपारियों में कुछ अनबन हो गई। इसलिये उनमें का एक व्योपारी बादशाह के पास पहुँचकर बोला-“पृथिवीनाथ ! अमुक व्योपारी मुझसे एक हजार रुपया कर्ज लेकर अब देने से हीला हवाली करता है । उसकी नीयत रुपये देने की नहीं है।” बाद- शाह न्याय के लिये उसका अर्जीदावा बीरबल के पास भेज दिया। बीरबल उसे पढ़कर दूसरे व्योपारी को तलब किया। जब वह आया तो पहले व्योपारी का अभिशाप पढ़कर सुनाया। तब वह व्योपारी बोला-“हुजूर को मालूम हो कि हम दोनों एकी चीज के व्योपारी हैं इससे व्योपारिक प्रतिद्वन्दिता के कारण वह मुझसे बुरा मानता है
अकबर बीरबल बिनोद ५२
और मेरे व्योपार में धक्का पहुँचाने की नीयत से आपके पास झूठा अर्जीदावा लेकर आया है, इसकी जाँच कराने पर आपको स्वयं झूठ सचका पता चल जायगा, इस संबन्ध में, मैं और कुछ कहना नहीं चाहता। बीरबल ने उसकी बात मानकर उसको घर जाने की मुहलत दी। फिर पहले व्यापारी को बुलाकर बोला— “इस मामले में आपको अभी खामोश रहना पड़ेगा, समय पाकर मैं इसका उचित न्याय करूँगा। अभी आप इस ढङ्गसे रहें मानों कुछ हुआ ही नहीं है। वह बीरबल की बात मानने को लाचार था, चुप चाप अपने घर चला गया। व्योपारियों के झगड़े का न्याय करना बीरबल को याद रहता, सोचते २ एक दिन उसे एक नई युक्ति सूझी। बजार से चार घी से भरे कुप्पे मँगवाये गये जिनमें कुछ अपना अलग २ निशान बनाकर दो खास कुप्पों में एक-एक मोहरें डाल दीं। फिर दोनों व्योपारियों को बुलवाकर बोला-“देखो यह चार घी के कुप्पे मेरे पास बहुत दिनों से पड़े हुए हैं अब इनके नष्ट होने का भय है, तुम दोनों इसमें से एक एक कुप्पा अपने साथ लेजाओ; बाकी दो कुप्पे मैं दूसरे व्यापा- रियों के हाथ बेंच दूँगा। कुप्पों को बाज़ार में उचित दाम पर बेंचकर जो मिले उसमें से अपना नफा निकाल शेष मूल्य मेरे हवाले करना।” बादी तो कुछ इतराज न किया, परन्तु दूसरा व्योपारी (यानी प्रतिवादी) बोला-“दीवानजी ! इतने थोड़े घी के लिये चार व्योपारियों का क्या काम है, आप एक ही को चारो सुपुर्द कर दें। वह बेंचकर सबका
५३ अकबर बीरबल विनोद
५३ अकबर बीरबल विनोद मूल्य एकमुस्त अदा कर देगा।” बीरबल ने जवाब दिया-“नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, हमारे लिये सभी समान हैं और हमें सबका ध्यान है। तुम एक एक कुप्पे अपने साथ ले जावो बाकी मैं दूसरों के हवाले करूँगा। बीरबल उन दोनों को दोनों गुप्त निशान वाले कुप्पे देकर बिदा किया। घी कुछ बिगड़ा हुआ था व्योपारियों ने सोचा कि बिना तपाये इसका ऐब दूर न होगा। इसलिये पहले व्यापारी ने कुप्पे कोतपाना शुरू किया। जब घी पिघल गया तो उसे एक बड़े कराह में छोड़कर खराया। जब उसके मर्जी के मुवाफिक घी एकदम तय्यार हो गया और उससे सुगन्धि आने लगी तो उसने फिर घी को उसी कुप्पे में भरना प्रारम्भ किया। जब घी पेनी में पहुँचा तो किसी चीजके खड़कने की आवाज सुनाई पड़ी। उसे बाहर निकाल कर देखा तो वह अकबरी मुहर थी। व्योपारी मन में सोचने लगा-“यह मुहर बीरबल की है भूल से इस में आ पड़ी है। उसकी वस्तु उसीको देना मुनासिब है।” व्योपारी मुहर को लेकर बीरबल के पास पहुँचा और उसकी मुहर उसे देकर अपने घर लौट आया। बीरबल मुहर पाकर सोचने लगा-“यह व्योपारी सच्चा है।” दूसरे व्योपारी के कुप्पे से भी उसी प्रकार मुहर निकली, परन्तु उस लालची को सोना देखकर लोभ समा गया उसे अपने जेठे पुत्र को देकर बोला-“इसको यत्न से अपने पास रक्खो, जरूरत पड़ने पर मुझे लौटा देना। इधर जो दो कुप्पे बिना असरफी के थे दूसरे दो व्योपारियों
अकबर बीरबल विनोद ५४
अकबर बीरबल विनोद ५४ को देकर बीरबल बोला-"इसे बेचकर चौथे दिन सबके साथ मूल्य लेकर हाजिर होना।" इस प्रकार यत्रतत्र कुप्पों को बेचने और धन संग्रह करने में चारो व्योपारी जा लगे। जब रुपया जमा करने की निश्चित तिथि आई तो वे सब बिक्री के रुपये लेकर बीरबल के पास आये। बीरबल ने तीन व्यापारियों का द्रव्य सहेज लिया जब चौथे को (प्रतिवादी की) बारी आई तो उसका द्रव्य सहेजते हुये बोला-"तुम्हारे कुप्पे में अन्य व्योपारियों से अधिक घी था यानी तीन में तो एक एक मन था, परन्तु तुम्हारे कुप्पे में सवा मन था।" बीरबल की यह बात सुनकर प्रतिवादी घबड़ा गया और बोला-"हुजूर क्या कह रहे हैं, मेरे कुप्पेमें भी एकही मन था। गरमाते और तौलते समय उस जगह मेरे घर के और प्राणी भी मौजूद थे, आपको विश्वास न हो तो उनको बुलवाकर जाँच कर लें, घी की वजन सबके सामने की गई थी।" बीरबल अपने एक सेवक के कान में कुछ समझाकर बोला-"तू उसके लड़के से जाकर कहो कि तुम्हारा बाप कुप्पे से निकली अशर्फी को तुरत माग रहा है, तू उसे अभी लेकर मेरे साथ चल।" वह कर्मचारी जाकर व्योपारी के लड़के से बोला-"तेरा पिता बादशाह की सभा में बैठा है घी के कुप्पे से निकली अशर्फी लेकर तुझे बुलाया है, लड़का साथ हो लिया। अपने पुत्र को एकाएक दर्बार में उपस्थित देख व्योपारी चिन्ताग्रस्त हुआ, परन्तु विवश था, बीरबल के सामने उससे कुछ कह भी नहीं सकता था ! बीरबलने लड़के
५५ अकबर बीरबल विनोद
५५ अकबर बीरबल विनोद से पूछा-"क्या तुम मुँहर लेकर आये हो ?" "जी हाँ !" कहता हुआ लड़का पिता के सामने ही मुहर को बीरबल के हवाले किया । बीरबल ने कहा- "वाह, क्या खूब, यह तो एकही मुँहर है और तुम्हारा पिता बतलाता था कि उस घी के कुप्पे से इसी तरह की चार मुँहरें निकली हैं।" लड़का बाप की तरफ देखकर बोला- "पिताजी ! चार मोहरें कब निकली थीं, आपने तो मुझको यही एक मुहर दिया था न ।" पिता इशारे से पुत्रको दबाते हुए बोला- "भला यह तू क्या कहता है; कुप्पे से कब मुहर निकली थी?" लड़का बिचारा भला अपने बाप की मंशा क्या जानता था, वह विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया-"क्यों पिताजी ! जब घी का कुप्पा तपाया जा रहा था तो उसमें से एकही अशर्फी निकाली थी न।" बाप बोला- "लोग अपने ही से हारते हैं।" फिर गुस्सा मन में मार कर कहा- "तू इतना बड़ा हुआ परन्तु अभी तक तुझ में किसी बात की समझ न आई, भला तू मेरे व्योपार को कैसे कायम रक्खेगा ?" इसी तरह बाप बेटों में कुछ देर तक गपड़चौथ होती रही । तब बीरबल बोला- "यह तुम्हारा घरू चरखा फिर चलता रहेगा अब साफ २ बयान करो कि तुम्हें मुद्दई का रुपया देना मंजूर है वा नहीं ? बीरबल की बात का मुद्दालेह ने कुछ उत्तर नहीं दिया। तब भीतर से चिढ़कर वह बोला-"तू अब पट्टी पढ़ाकर मुझे धोखा नहीं दे सकता । जब एक मुहर के लिये ईमान छोड़ रहा है तो भला पाँच सौ की गठरी कब न दबाना चाहेगा।" बीरबल तो इतना कह गया, परन्तु व्योपारी
[Header] अकबर बीरबल विनोद ५६
[Header] अकबर बीरबल विनोद ५६ को जूँ तक न रेंगी, इसकी धृष्टता देखकर बीरबल एक दम खिसला गया और एक सिपाही को तुरत आज्ञा दी—"इस झूठे को अभी सौ कोड़े लगावो।" सिपाही कोड़ा लेकर मारने को उद्यत हुआ, इस बीच ब्योपारी का लड़का फिर बोल उठा-"वाह पिताजी ! अभी उस दिन तो आप स्वयं कह रहे थे कि इस महाजन का मुझे पाँच सौ का ऋण चुकाना है, परन्तु चिन्ता की कोई बात नहीं है इस समय रुपये मेरे पास मौजूद हैं, किसी दिन चुका दूँगा। तब आप उन रुपयों को इसे क्यों नहीं दे देते ?" लड़के की सभ्यता देखकर बाप ने हार मानली और बीरबल के सामने उन रुपयों को चुका देना स्वीकार किया। किसी ने सत्य कहा है-"मार के आगे भूत भागता है।" न सौ कोड़े की नौबत आती न रुपया बरामद होता । बीरबल ने तत्क्षण मुद्दई के रुपयों को दिलवा दिया और प्रतिवादी (मुद्दालेह) को सजा देकर रुपया मारने के अपराध में जेल भेज दिया। मुद्दई अपना धन पाकर बड़ा हर्षित हुआ और बीरबल के न्याय की भूरि भूरि प्रशंसा करने लगा। फिर बीरबल अन्य ब्योपारियों को चिताकर बोला-"यहाँ पर आप लोग अधिकतर ब्योपारी ही उपस्थित हैं, सबको उचित है की ईमानदारी का सौदा करें, बेइ- मानी करने के पहले तो भला मालूम होता है, परन्तु उसका परिणाम बुरा निकलता है। यह लड़का अभी तक बड़ा ईमानदार है, यदि इसको बुरों की सुहबत न होगी और बापका असर न आयेगा, तो आगे चलकर इसका ब्योपार
५७ अकबर बीरबल विनोद
५७ अकबर बीरबल विनोद तरक्की पर रहेगा ।'' फिर लड़के को चिताकर उसे सदैव सच बोलने की शिक्षा देकर बिदा किया। अन्य तीनों व्योपारी भी बीरबल की आज्ञा पाकर घर लौट गये।
आधी दूर धूप आधी दूर छाया।
एक दिन का हाल है कि बादशाह बीरबल पर खफा होकर उसको अपने नगर से बाहर निकाल दिया। बीरबल हरहालत में खुश रहनेवाला था, वह नगर से बाहर किसी ग्राम में जा बसा। इस प्रकार बास करते २ कई महीने व्यतीत होगये न बादशाह ने उसे बुलवाया और न वह स्वयं आया। समय समय पर बादशाह बीरबल को याद कर बड़ी चिन्ता करता, परन्तु उसका कहीं पता ठिकाना न मिलने के कारण लाचार था। जब किसी प्रकार बीरबल का पता न चला तो ढूँढ़ने के लिये बहुतेरे कर्मचारियों को गाँवों में भेजा, फिर भी बीरबल का अनुसन्धान न हो सका। तब बादशाह उसको ढूँढ़ने की एक नई तरकीब निकाली। नगर २ में ढिंढोरा फिरवा दिया कि जो सख्स-“आधी दूर धूप और आधी दूर छाया” में होकर मेरे पास आवेगा उसे एक हजार रुपये पारितोषिक दिये जायेंगे ।” बहुतों ने पारितोषिक पाने की चेष्टा की, परन्तु किसी के दिमाग में “आधी दूर धूप आधी दूर छाया” में होकर आने की युक्ति न सूझी। यह बात क्रमशः फैलते फैलते
अकबर बीरबल विनोद ९८
अकबर बीरबल विनोद ९८ बीरबल के कान में पहुँची। वह अपने पड़ोस के एक बढ़ई को बुलाकर बोला- "तुम एक चारपाई अपने मस्तक पर रखकर बादशाह के पास जाओ और कहो कि मैं-"आधी दूर धूप आधी दूर छाया" में होकर आपके पास आया हूँ अतएव मुझे पारितोषिक मिलनी चाहिये।" बढ़ई बीरबल को पहचानता था इसलिये उसकी बात मान- कर चारपाई सिरपर लेकर बादशाह के पास जा पहुँचा और एक हजार का पुरस्कार पाने का उजुरदार हुआ। बादशाह इस बात को बढ़ई के समझ से बाहर की समझ कर बोला- "सचसच बतलाना होगा, कि तुम्हें यह सलाह किसने दी है" बढ़ई बोला-"पृथिवीनाथ ! एक ब्राह्मण कुछ दिनों से हमारे ग्राम में आ बसा है, उसे लोग बीरबल के नाम से पुकारते हैं, उसीकी सम्मति से मैंने यह कार्य किया है। बादशाह किसान से बीरबल का नाम सुनकर बड़ा प्रसन्न हुआ और उसको एक हजार रुपये देकर बिदा किया। उसके साथ अपना दो कर्मचारी बीरबल को लाने के लिये परवाने के साथ भेजा। इतने यत्न के पश्चात् बीरबल फिर बादशाह के हाथ लगा।
अधर महल एक दिन दरबार के काम काजों से निश्चिन्त होकर बादशाह बीरबल के साथ गप्पें मार रहा था। गप्प शप के मानी मनोरंजन के हैं। उसी दिन उसको एक अधर महल
५९ अकबर बीरबल विनोद
५९ अकबर बीरबल विनोद बनवाने की इच्छा जागृत हुई। इस अभिप्राय से प्रेरित होकर बोला-“बीरबल ! क्या तुम मेरे लिये एक अधर महल बनवा सकते हो ?” बनवा देना तुम्हारा काम है और रुपया खर्चाना मेरा।” बीरबल ने सोच विचार कर उत्तर दिया-“पृथिवी- नाथ थोड़ा ठहर कर महल बनवाने का कार्यारम्भ करूँगा। इस कार्य के लिये कुछ मुख्य सामानों के संग्रह में समय की आवश्यकता है। बादशाह इस पर राजी हो गया। फिर बीरबल ने एक दूसरी बात छेड़कर बादशाह का मन दूसरे कामों में उलझा दिया, सायंकाल अवकाश पाकर घर लौट गया। दूसरे दिन बहेलियों को रुपये देकर जंगल से तोतों को पकड़ लाने की आज्ञा दी। हुक्म की देर थी बहेलिये उसी दिन सैकड़ों तोते पकड़ लाये। बीरबल ने कुछ तोतों को चुन कर खरीद लिया। और उनके पढ़ाने का भार अपनी बुद्धिमती कन्या को सौंप आप दरबार का आवश्यक कार्य्य करने लगा। लड़की ने बुद्धिमानी से पिता के आदेशानुसार तोतों को पढ़ाकर पक्का कर दिया। जब बीरबल ने उनकी परीक्षा ली तो वे उसके मरजी के माफिक निकले। फिर क्या था बीरबल तोतों को लिये हुए दरबार में हाजिर हुआ। उन को दीवान खाने में बन्द कर आप बादशाह के पास गया। तोते पिंजड़ों से बाहर निकाल कर छोड़ दिये गये थे। सब तरफ से किवाड़ बन्द था। तोते भीतर ही भीतर अपनी शिक्षा के अनुसार अलग अलग राग अलाप रहे थे। बादशाह को सलामकर बीरबल बोला-“पृथ्वीनाथ !
अकबर बीरबल विनोद ६०
अकबर बीरबल विनोद ६० आपकी मरजी के मुवाफिक अधर महल में काम लगवा दिया है, इस समय उसमें बहुतेरे पेशराज और मिस्त्री काम कर रहे हैं, आप चलकर मुवाइना कर लें।" बादशाह महल देखने की इच्छा से बीरबल के साथ हो लिया। जब बीरबल दीवान खाने के पास पहुँचा तो उसका किवाड़ खोलवा दिया। तोते बाहर निकल कर आकाश में उड़ते हुये बोलने लगे—"ईंटा लाओ, चूना लावो, किवाड़ लाभो, चौखट तय्यार करो, दीवार चुनो।" इस प्रकार आकाश में तोतों ने खूब शोर गुल मचाया। तब बादशाह ने बीरबल से पूछा—"क्यों बीरबल! ये तोते क्या कह रहे हैं?" बीरबल अदब के साथ उत्तर दिया—"हुजूर आपका अधर महल तय्यार हो रहा है, उसमें पेशराज और बढ़ई लोग लगे हुये हैं। सब सामान एकत्रित हो जाने पर महल बनना शुरू होगा।" बीरबल की इस बुद्धिमानी पर बादशाह हर्षित हुआ और उसको बहुत सा धन देकर बिदाकिया। सेर भर मांस दिल्ली शहर में दीनदयाल नामी एक पुराना व्योपारी रहता था। उसका कारोबार बहुत बड़ा था जिस कारण उसकी ख्याति दूर देशों तक पहुँचती थी। एक समय उसको कई हुण्डियाँ एक साथ सकरनी पड़ीं और उसके पास रुपया आने में तीन चार दिनों की देर थी। जो कुछ पास था उससे रोकड़ मिलाने पर पाँच लाख रुपये की
६१ अकबर बीरबल बिनोद कमी पड़ती थी। जब दीनदयाल को मौके पर रुपयों का प्रबन्ध होना असम्भव दीख पड़ा तो अपने मुनीम को हुण्डी वालों का हिसाब किताब मिलान करने की आज्ञा देकर आप रुपये की तलाश में बाहर निकला। उस समय नगर में एक महाजन के अतिरिक्त ऐसा दूसरा कोई भी बड़ा महाजन नहीं था जो एकमुस्त पाँच लाख की थैली उधार देता। दीनदयाल ने उसी से कर्ज लेकर हुण्डी सकर देने का निश्चय किया। वह साहूकार बड़ा धूर्त, दुष्ट और निर्दय था, परन्तु लाचार, कोई दूसरी सूरत न सूझ पड़ने पर दीनदयाल को उसके द्वार पर कर्ज के निमित्त जाना पड़ा। दीनदयाल ने उस महाजन से बारह दिनों की अवधि पर पाँच लाख रुपये कर्ज माँगा। उसका विश्वास था की उपरोक्त समय के अन्तरगत उसके पास बहुत सा रुपया आ जावेगा। उसने मारवाड़ी को उसकी इच्छानुसार सूद देने का पक्का विचार कर लिया था। केशवदास बराबर दीनदयाल को समूल नष्ट करने की चेष्टा में लगा रहता कारण की उसका और दीन- दयाल का व्योपारिक द्वेष था। दीनदयाल का कारोबार इतना बड़ा और समुन्नत था कि उसके आगे दूसरे व्योपारियों का व्योपार चलना कठिन था। दीनदयाल निःसन्तान था अतएव अगले डाह के कारण मारवाड़ी इस घात में लगा हुआ था कि यदि किसी प्रकार दीन- दयाल मारा जाय तो फिर उसका कारोबार भलीभाँति रु निकले।