अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
अनुरागसागर वाणी
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पुनि रानी राजहि समुझावा। हे प्रभु बहुरि न ऐसो दावा।। गहो शरण जो कारज चाहो। इतना वचन मोर निरवाहो।।
रानी ने फिर राजा को भी समझाया कि साहिब की शरण में आ जाओ, कल्याण हो जायेगा।
राजा ने कहा
तुम रानी अरधंगी सोई। हम तुम भक्त होय नहिं दोई।। तोरि भक्ति कर देखो भाऊ। किहि विधि मोहि लेहु मुक्ताऊ।। देखो तोरि भक्ति परतापा। पहुँचो लोक मिटे संतापा।।
राजा ने रानी से कहा कि तुम मेरी अंधांगिनी हो, तुम्हारी भक्ति के प्रताप से मेरा भी कल्याण हो जायेगा।
साहिब ने रानी से कहा
रानी बहुरि मोहि पहँ आई। हम तिहि काल चरित्र लखाई।। सुन रानी इक वचन हमारा। कालहु कला करे छल धारा।। तो कह शिष्य कीन हम जानी। डसे काल तच्छक है आनी।। अब हम तोकहँ मंत्र लखाओं। काल गरल सब दूर भगाओं।। दीन्हो शब्द विरहु ली ताही। काल गरल जेहि व्यापे नाहीं।। पुनि यम दूसर छल तोहि ठानी। सो चरित्र मैं कहों बखानी।। छल कर यम आये तुम पासा। सो तुहि भेद कहों परगासा।। हँ स वर्ण वह रूप बनायी। हम सम ज्ञान तोहि समझायी।। तुम सन कहे चीन्ह मुहिं रानी। मरदन काल नाम ममज्ञानी।। यहि विधि काल ठगे तोहि आयी। काल रेख सब देउँ बतायी।। मस्तक छोट काल कर जानू। चक्षु गुंजन को रंग बखानू।। काल लक्षण मैं तोहि बतायी। और अंग सब सेत रहायी।।
रानी पुनः साहिब के पास आयी। तब साहिब ने उसे काल चरित्र समझाया, कहा-तुमने मेरा नाम ले लिया है, यह जान काल तुम्हें सौंप
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का रूप धारण कर डसेगा, इसलिए मेरा मंत्र याद रखो, काल का जहर नहीं चढ़ेगा। दूसरी बार पुनः काल हंस रूप बनाकर तुम्हें ठगने आयेगा, इसलिए मैं तुम्हें काल का रूप समझा देता हूँ, ताकि तुम उसे पहचान सको। उसका छोटा माथा होगा, काली आखें होंगी, बाकी अंग सफेद होंगे।
रानी चरण गहे तब धायी। हे प्रभु मोहि लोक लै जायी ॥
यह तो देस काल कर थानी। हे प्रभु लै चल देस अमानी ॥
रानी ने कहा कि यह तो काल का देश है, मुझे अपने लोक ले चलो।
तब रानी सों कहेउ बुझाई। बचन हमार सुनो चित लाई ॥
जब लंगि ठे का पूरे आई। तब लग रहो नाम लौ लाई ॥
साहिब ने कहा कि आयु से पहले नहीं ले जाऊँगा तुम्हारा जीव, इसलिए जब तक आयु है, तब तक नाम में लौ लगाए रखो, जब पूरी होगी तो ले जाऊँगा।
गजरूपी है काल, केहरि पुरुष प्रताप है ।
रोक रहो तुम ढाल, काल खडग व्यापे नहीं ॥
साहिब ने कहा कि काल हाथी की तरह है, पर परम पुरुष की नाम सिंह की तरह है, उसकी ढाल होगी तो काल कुछ नहीं कर पायेगा।
इतना कह हम गुप्त छिपाया। तक्षक रूप काल हो आया ॥
जबहीं रात बीती आधी। रानी उठ चली सेवा साथी ॥
सेज आय रानी पौढायी। डसेउ व्याल मस्तक मँह जायी ॥
साहिब रानी को समझाकर गुप्त हो गये और इतने में काल साँप का रूप धारण कर आया। जब आधी रात बीत गयी तो रानी सेवा भक्ति करके अपने विस्तर पर आयी। तब काल ने उसे मस्तक में डस लिया।
इन्द्रमती ने कहा
इन्द्रमती अस वचन सुनायी। तक्षक डसेउ मोहि कहँ आयी ॥
सुन राजा व्याकुल है धावा। गुणी गारुडी वेगि बुलावा ॥
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राय कहे मम प्राण पियारी । लेहु चिताय जो अबकी बारी ॥ तक्षक गरल दूर हो आयी । देहु परगना तोहि दिवायी ॥
इन्द्रमती ने राजा को पुकारा कि मुझे साँप ने डस लिया है । यह सुनकर राजा व्याकुल होकर दौड़ा हुआ आया और अच्छे वैद्य को बुलवाया । राजा ने कहा कि तुम मेरे प्राणों से भी प्यारी हो, तुम्हें नहीं जाने दूँगा, देखो, अभी सारा ज़हर दूर हो जायेगा ।
इन्द्रमती ने कहा
मंत्र मोहि लखाय सतगुरु, गरल मोहि न लागई ॥ होत सूर्य प्रकाश जेहि क्षण, अंध अघोर नशावई ॥
रानी ने कहा कि मुझे सदगुरु ने मंत्र दिया है, इसलिए मुझे ज़हर नहीं लगेगा । यह कह रानी साहिब के नाम का सुमिरन करती रही और कुछ ही देर में उठ बैठी ।
विष्णु जी ने दूत को भेजा
कहे विष्णु सुनहो यमदूत । सतहि अंग करो तुम पूता ॥ छल करि जाइ लिवाइय रानी । वचन हमार लेहु तुम मानी ॥
विष्णु जी ने यमदूत को कहा कि तुम श्वेत अंग धारण कर रानी को छल कपट से ले आओ और हमारा बचन मानो ।
दूत रानी के पास आया
कीन्हों दूत सेत सब अंगा । चलेउ नारि पहुँ बहुत उमंगा ॥ रानी सो अस वचन प्रकाशा । तुम कस रानी भई उदासा ॥ जानि बूझि कस भई अचीन्हा । दीक्षा मंत्र तोहि हम दीन्हा ॥ ज्ञानी नाम हमारो रानी । मरदो काल करौँ पिसमानी ॥ तक्षक काल होय तोहि खायी । तब हम राख लीन्ह तोहि आयी ॥ छोड़हु पलँग गहो तुम पाई । तजहु आपनी मान बड़ाई ॥ अब हम लैन तोहि कहँ आवा । प्रभु के दर्शन तोहि करावा ॥
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यमदूत श्वेत अंग बनाकर आया और रानी से कहा—हे रानी! उदास क्यों बैठी हो, मैंने तो तुम्हें दीक्षा मंत्र दिया है, मेरा नाम ज्ञानी है। काल तुम्हें साँप रूप में डसने आया था, तब मैंने ही तुम्हारी रक्षा की थी। अब मैं तुम्हें लेने आया हूँ, चलो मेरे साथ।
रानी ने कहा
इन्द्रमती तब चीन्हे उ रेखा। जस कछु साहिब कहे उ विशेषा ॥ तीनों रेख देख चक माहीं। जर्द सेत अरु राता आहीं ॥ मस्तक ओछ देख पुनि ताको। भयो प्रतीत वचन को साको ॥ जाहु दूत तुम अपने देसा। अब हम चीन्हे उ तुम्हरो भेसा ॥ काग रूप जो बहुत बनाई। हंस रूप शोभा किमि पाई ॥ तस हम तोरा रूप निहारा। ऐ समर्थ बड़ गुरु हमारा ॥
तब रानी उसे पहचान गयी, क्योंकि साहिब ने उसे काल का रूप समझा दिया था कि उसका छोटा-सा मस्तक होगा, भँवरे की तरह काली आँखें होंगी। तो रानी ने कहा कि कौवे को हंस का रूप शोभा नहीं देता। हमारा गुरु बड़ा समर्थ है।
यह सुन काल निकट चल आवा। इन्द्रमती पर थाप चलावा ॥ थाप चलाय सुमुख पर मारा। रानी खसि परि भूमि मँझारा ॥ इन्द्रमती तब सुमिरन लाई। हे गुरु ज्ञानी होठ सहाई ॥
यह सुन काल ने इन्द्रमती को थप्पड़ मारा, जिससे रानी भूमि पर गिर पड़ी। इन्द्रमती ने साहिब को पुकारा कि रक्षा करो।
सुनत पुकार मुहि रहो न जाय। सुनहु धर्मनि यह मोर सुभाय ॥ रानी जबहीं कीन्ह पुकारा। ततछन मैं तहाँ पगु धारा ॥ देखत रानी भयी हु लासा। मन ने भाग्यो काल त्रासा ॥
साहिब धर्मदास से कहते हैं कि जब कोई मुझे सच्चे दिल से पुकारता है तो मुझसे रहा नहीं जाता, यह मेरा स्वभाव है। तो रानी ने जब पुकार की तो मैं तुरंत वहाँ पहुँचा। मुझे देख रानी प्रसन्न हो गयी और काल का डर जाता रहा।
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कह इन्द्रमती तब कर जोरी । हे प्रभु सुनो विनती मोरी । चीन्ह परी मोही यम की छाहीं । अब यहि देश रहब हम नाहीं ॥ हे साहिब लै चलु निज देश । इहवाँ बहु काल कलेशा ॥
रानी ने दोनों हाथ जोड़कर विनती की, कहा—मुझे काल की बाधा समझ आ गयी है, इसलिए अब इस देश में नहीं रहूँगी, मुझे अपने देश ले चलो, यहाँ बहुत कष्ट है ।
साहिब कहते हैं
प्रथमहि रानी कीन्हों संग। मेट्यो काल कठिन परसंगा ॥ तबहीं ठीक पूर भराया । ले रानी सत लोक सिधाया ॥ ले पहुँचायो मानसरोवर । जहवाँ कामिनि करहिं कतोहर ॥ अमी सरोवर अमी चखायी । सागर कबीर पाँव परायी ॥ तेहि आगे सुरति को सागर । पहुँची रानी भई उजागर ॥ लोक द्वार ठाढ तब कीनी । देखत रानी अति सुख भीनी ॥ हंस धाय अंकम भर लीन्हा । गावहिं मंगल आरति कीन्हा ॥ सकल हंस कीन्हा सनमाना । धन्य हंस सतगुरु पहिचाना ॥ भल तुम छोड़ेहु काल का फंदा । तुम्हरो कष्ट मिट्यो दुखदंदा ॥ चलो हंस तुम हमरे साथ। पुरुष दरश कर नावहु माथा ॥ इन्द्रमती आवहु संग मोरे । पुरुष दरश होवै अब तोरे ॥ इन्द्रमती अरु हंस मिलाहीं । करहिं कुतूहल मंगल गाहीं ॥ चलत हंस सब अस्तुति लावै । अब तो दरश पुरुष को पावै । तब हम पुरुष सन बिनती लावा । देहु दरश अब हंस ढिग आवा ॥ देहु दरश तिहिं दीनदयाला । बंदीछोर सु होहु कृपाला ॥ बिकस्यो पुहुह उठा अस बानी । सुनहु योग संतायन ज्ञानी ॥ हंसन कहै अब आव लिवाई । दरश कराइ लेउ तुम आई ॥
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तब साहिब उसे अपने साथ अमर लोक ले गये। जब मानसरोवर, अमृत सरोवर, सुरति का सागर देखकर रानी अमर लोक पहुँची तो लोक की शोभा देख बहुत प्रसन्न हुई। सभी हँसों ने रानी का सम्मान किया, कहा कि तुमने सतगुरु को पहचाना, तुम धन्य हो, तुम्हारा कष्ट अब समाप्त हुआ। तब साहिब ने इन्द्रमती से कहा कि अब परम पुरुष के दर्शन को चलो। सभी हँस भी खुशी-2 साथ हो लिये कि अब परम पुरुष के दर्शन होंगे। तब साहिब के कहने पर परम पुरुष ने दर्शन दिये।
पुरुष कांति जब देखउ रानी। अद्भुत अमी सुधा की खानी ॥ गदगद होय चरण लपटानी। हँस सुबुद्धि सुजन गुणज्ञानी ॥
परम पुरुष की शोभा देख रानी गद्गद हो गयी और चरणों में लिपट गयी। परम पुरुष ने रानी से कहा कि करुणामय को बुला लाओ। जब रानी साहिब के पास आई तो देखकर चकित हो गयी कि साहिब ही परम पुरुष हैं, उनमें और परम पुरुष में कोई अन्तर नहीं है। तब रानी ने कहा-
कह रानी यह अचरज आही। भिन्न भाव कछु देखों नाहीं ॥ जो कोइ कला पुरुष कहै देखा। करुणामय तन एक विसेखा ॥ धाय चरण गह हँस सुजाना। हे प्रभु तव चरित्र सब जाना ॥ तुम सतपुरुष दास कहलाये। यह शोभा कस उहाँ छिपाये ॥ मोरे चित्त यह निश्चय आई। तुमहि पुरुष दूजा नहिं भाई ॥
रानी ने कहा कि मुझे आपमें और परम पुरुष में कोई अन्तर नहीं दिखा, अब मैं आपका चरित्र समझ चुकी हूँ, आप सतपुरुष होकर दास कहलाते हैं और अपना असली रूप छिपाए रखते हैं, पर मुझे निश्चय हो गया है कि आप परम पुरुष ही हैं, अन्य नहीं हैं।
तब रानी ने राजा को भी वहाँ लाने की विनती की, कहा-वे काल के मुख में जा रहे हैं, उन्होंने मुझे कभी संतों की सेवा में रुकावट नहीं दी। तब विनती मान साहिब गढ़गिरनार में आए और राजा को लेकर अमर लोक पहुँचे।
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साहिब धर्मदास से कहते हैं कि मैंने फिर पुनः संसार में आकर सुपच सुदर्शन को चेताया, नाम दिया। तब द्वार का अंतिम समय था।
धर्मन पुनि आये जगमाहीं । रानी पति लै गये तहांहीं ॥
राख्यो ताहि लोक मँझारा । ततछिन पुनि आयउ संसारा ॥
काशी नगर कहाँ चलि आये । नाम सुदरशन सुपच जगाये ॥
रानी के पति को वहाँ पहुँचाकर साहिब फिर संसार में आए और काशी नगर के सुपच को जगाया। वो बड़ा भक्त हुआ। जब पाण्डव कौरव युद्ध समाप्त हुआ तो कृष्ण ने पाण्डवों को बन्धुओं को मारने के अपराध में यज्ञ करने को कहा। यज्ञ में आकाश में एक घण्टा स्थित किया गया, कृष्ण ने कहा-
पाण्डव प्रति बोले यदुपाला । पूरन यज्ञ जान तिहिं काला ॥
घण्ट अकाश बजत सुनि आवे । यज्ञ को फल पूरन पावे ॥
भोजन विविध प्रकार बनाई । परम प्रीति से सबहिं जेबाई ॥
इच्छा भोजन सब मिलि पावा । घंट नहिं बाजा राय लजावा ॥
भोजन कीन सकल ऋषि राया । बजी न घंट भूप भ्रम आया ॥
कृष्ण ने कहा कि यदि घण्टा बजा तो समझना कि यज्ञ सफल हुआ।
यज्ञ हुआ, सभी ब्राह्मणों, ऋषियों-मुनियों, संयासियों को भोजन करवाया गया, पर घण्टा नहीं बजा। तब राजा लज्जित हुआ और कृष्ण के पास सब पाण्डव गये और पूछा-
करिके कृपा कहो यदुराजा । कारण कौन घंट नहिं बाजा ॥
कृष्ण अस कारण तासु बताया । साधू कोई न भोजन पाया ॥
पाण्डवों ने कृष्ण से पूछा कि घण्टा क्यों नहीं बजा, तो कृष्ण जी ने कहा कि किसी साधू ने भोजन नहीं किया है।
चकित भै तब पाण्डव कहै ई । कोटिन साधु भोजन लहे ऊ ॥
अब कहँ साधु पाइय नाथा । तिनते तब बोले यदुनाथा ॥
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सुपच सुदर्शन को लै आवो । आदर मान सहित जिमावो ॥ सोई साधु और न कोई । पूरन यज्ञ जाहि ते होई ॥
पाण्डवों ने कहा कि कई साधुओं को भोजन करवाया गया, आपने भी किया और कह रहे हो कि कोई साधु भोजन नहीं किया, अब साधु कहाँ से पाएँ! तब कृष्ण जी ने कहा कि सुपच सुदर्शन के अलावा कोई सच्चा साधु नहीं है, यदि उसे आदर सहित बुलाकर भोजन करवाओ तो तुम्हारा यज्ञ सफल होगा। तब उसे लाया गया और उसे भोजन खिलाया गया।
सुपच भक्त ग्रास उठावा । बाजो घण्ट नाम परभावा ॥ भूप भवन भोजन कर जबहीं । बजा अकाश में घण्टा तबहीं ॥
तब सुपच ने भोजन खाया तो आकाश में घण्टा बजा और यज्ञ सफल हुआ।
....निरंजन को दिये वचनानुसार साहिब ने तीन युग तक थोड़े-2 जीव अमर लोक पहुँचाए, पर कलयुग में उनके लाखों शिष्य हुए।
तीन लोक से बाहर देश। तेहि साहिब का सुनो संदेश॥ तेहि साहब की मोहि साहिदानी। तिनकी आदि कृष्ण नहि जानी॥
साहिब और धर्मदास
साहिब और धर्मदास
पुरुष अवाज उठी तिहि बारा । ज्ञानी बेग जाहु संसारा ॥ जीवन काज अंश पठवायी । सुकृत अंश जग प्रगटे जायी ॥ दीन्ह आज्ञा तेहि को भाई । शब्द भेद वाही समझायी ॥ लावहु जीवन नाम अधारा । जीवन खेड़ उतारो पारा ॥ सुनत आज्ञा वहि कीन पयाना । बहु रि न आये देश अमाना ॥ सुकृत भवसागर चलि गयऊ । काल जाल ते सुधि बिसरयऊ ॥ तिन कहँ जाय चितावहु ज्ञानी । जेहिते पंथ चले निरवानी ॥ बंस ब्यालिस अंस हमारा । सुकृत गृह लैहँ औतारा ॥ ज्ञानी बेगि जाहु तुम अंसा । अब सुकृत अंश कर मेटहु फंसा ॥
तो कहा कि तब हम परम पुरुष की आज्ञा से तुम्हारे पास आए । धर्मदास तुम सुकृत अंशा । जा कारण हम कीन्ह बहु संसा ॥ पुरुषहिं आज्ञा तुम्हरे ढिग आये । पिछली हेत पुनि याद कराये ॥ दश औतार ईश्वरी माया । यह सब देख काल की छाया ॥ तुम जग जीव चितावन आये । काल फन्द तुम आई फँसाये ॥ अबहुँ चेत करो धर्मदासा । पुरुषहिं शब्द करो परकासा ॥ ले परवाना जीव चिताओ । काल जाल ते हँस मुक्ताओ ॥
साहिब ने कहा-हे धर्मदास ! तुम मेरे अंश हो, परम पुरुष ने तुम्हें जीवों को चिताने संसार में भेजा था, पर तुम काल के फँदे में फँस गये और भूल गये । अब नाम लो और जीवों को चिताओ ।
धर्मदास ने पूछा
कलियुग केर कहो परभाऊ । और हँस परमोधेउ काठ ॥ सो मोहि वरण कहो गुरु देवा । कौन जीव कीन्ही तुम सेवा ॥
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साहिब बन्दगी
धर्मदास जी ने कलयुग के अन्य जीवों के बारे में पूछा, जिनपर साहिब ने उनके द्वारा कृपा की।
धर्मदास ने विनती की
धन सतगुरु तुम मोहि चैतावा । काल फंद ते मोहि मुकतावा ॥ मैं किंकंर तुम दास के दासा । लीन्हों मोरि काटि जम फाँसा ॥
मैं अघकर्मी कुटिल कठोरा । रहेउ अचेत भ्रम जिव मोरा ॥
कहा जानि तुम मोहि जगाये । कौने तप हम दर्शन पाये ॥
धर्मदास जी ने कहा कि मैं तो कठोर हृदय का था, बुरा इंसान था, अचेत था, फिर क्या सोचकर आपने मुझे जगाया !
साहिब ने कहा
इच्छा कर जो पूछो मोही । अब मैं गोइ न राखों तोही ।
धर्मन सुनहु पाछली बाता । तोहि समझाय कहो विख्याता ॥
संत सुदर्शन द्वारपर भयऊ । तासु कथा तोहि प्रथम सुनयऊ ॥
तेहि ले गयो निज जबहीं । विनती बहुत कीन तिन तबहीं ॥
कहे सुपच सतगुरु सुन लीजे । हमरे मात पिता गति दीजे ॥
बंदीछोर करो प्रभु जाई । यम के देश बहुत दुख पाई ॥
साहिब ने कहा कि द्वार के सुपच सुदर्शन की कथा तुम्हें मैंने सुनाई थी। जब मैं उसे अमर लोक ले गया तो उसने मुझसे प्रार्थना की कि मेरे माता-पिता को भी नाम दो, अमर-लोक ले चलो। मैंने उन्हें बहुत समझाया पर वे माने नहीं, नाम नहीं लिया। तब सुपच की विनती सुन मैंने कहा कि मैं इन्हें पार जरूर उतारूँगा। अगले जन्म में वे सुपच के प्रभाव से ब्राह्मण-ब्राह्मणी हुए, फिरसे मानव देही मिली। उनको पुत्र नहीं था, वो सूर्य से पुत्र माँग रही थी, इतने में मैं झोली में आकर गिर पड़ा। उसने सोचा कि सूर्य ने पुत्र दे दिया....घर ले आई।
संत सुदर्शन नाम प्रतापा । मानुष देह विप्र के छापा ॥
दोनों जन्म दाय तब लीन्हा । पुनि विधि मिलै ताहि कहँ दीना ॥
कुलपति नाम विप्र कर कहिया । नारी नाम महे सरि रहिया ॥
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बहुत अधीन पुत्र हित हारी। करी अस्नान सूर्य व्रतधारी।। अंचल लै विनवै कर जोरी। रुदन करे चित सुत कह दौरी।। तत्क्षण हम अंचल पर आवा। हम कहँ देखि नारि हरषावा।।
बाल रूप धरि भेंट्यो वोही। विप्र नारि गृह लै गइ मोही।। कहँ नारि कृपा प्रभु कीना। सूर्य व्रत कर फल यह दीना।।
अब मैं उन्हें समझाने लगा, पर वे माने नहीं, तो मैं गुप्त हो गया। पुनि हम सत्य शब्द गोहराई। बहु प्रकार ते उनहिँ समझाई।। ता हृदय नहिँ शब्द समायी। बालक जान प्रतीत न आयी।। ताहि देह चीन्हसि नहिँ मोही। भयो गुप्त तहँ तन तज वोही।।
तो फिर दूसरे जन्म में वे शाह-शाहनी हुए, चन्दन और ऊदा उनके नाम हुए।
नारी द्विज दोई तन त्यागा। दरश प्रभाव मनुज तन जागा।। ऊदा नाम नारी कहँ भयऊ। पुरुष नाम चंदन धरिगयऊ।। परसोतमते हम चलि आये। तह चंदवारा जाइ प्रगटाये।। बालक रूप कीन्ह तेहि ठामा। किन्हउ ताल माहिँ विश्रामा।। कमल पत्र पर आसन लाई। आठ पहर हम तहाँ रहाई।। पीछे ऊदा अस्नानहि आयी। सुन्दर बालक देखि लुभायी।। दरश दियो तेहि शिशुतन धारी। ले गई बालक निज घर नारी।।
तब मैं उनके गाँव आया और समीप के सरोवर में प्रगट हुआ। एक दिन वहीं रहा। सुबह जब नारी स्नान करने आई तो सुंदर बालक देख मोहित हुई और घर ले आई।
कह चन्दन के मूरख नारी। वेगि जाहु दै बालक डारी।। जाति कुटुंब हँसिहँ सब लोगा। हँसत लोग उपजै तन सोगा।।
चंदन ने कहा कि यह किसे उठा लाई हो, जाओ वापिस छोड़ आओ, नहीं तो लोग हँसी करेंगे। तब चंदन के डर से ऊदा मुझे वापिस छोड़ने जा रही थी।
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साहिब बन्दगी
चलि भइ मोहि पवारन जबहीं । अन्तरधान भयो मैं तबहीं ॥ भयउ गुप्त तेहि करसे भाई । रुदन करें दोनों बिलखाई ॥ बिकल होय बन डोलैं । मुग्ध ज्ञान कछू मुख नहीं बोलैं ॥
तब मैं उसके हाथ से लुप्त हो गया। यह देख दोनों रोने लगे, बन-बन मुझे ढूँढने लगे, पर मैं न मिला। फिर अगले जन्म में वे ही नीरू-नीमा हुए। तब मैं काशी के लहरतारा तालाब में नीमा को मिला। नीरू के डर से वहाँ भी नीमा मुझे छोड़ने जा रही थी तो मैंने कहा-
प्रीत पिछली कारणे, तोहि मिला हूँ आप।
मुक्ति संदेश सुनाऊँगा, ले चल अपने साथ ॥
वे नीरू नीमा सुपच के माता-पिता थे, जो तीसरे जन्म में नीरू-नीमा हुए। पर बालक जान तब भी उन्हें विश्वास न हुआ। फिर चौथे जन्म में मथुरा में जाकर साहिब ने उन्हें समझाया और उन्होंने नाम ले लिया और पार हुए।
ताहि देह पुनि मोहि न चीन्हा । जानि पुत्र मोहि संग न कीन्हा । तजि सो देह बहु रि जो भाई । देह धरी सो देहूँ चिन्हाई ॥
जुलहा की तब अवधि सिरानी । मथुरा देह धरी तिन आनि ॥
हम तहाँ जाय दरश तिन दीन्हा । शब्द हमार मान सों लीन्हा ॥
रतना भक्ति करे चितलाई । नारि पुरुष परवाना पाई ॥
ता कहँ दीन्हे उ लोक निवासा । अंकूरी पठये निज दासा ॥
पुरुष चरण भेटे उर लाई । शोभा देह हँस कर पाई ॥
देखत हँस पुरुष हरषाने । सुकृत अंश कही मन माने ॥
बहुत दिवस लगि लोक रहाये । तब लगि काल जीव संताये ॥
तो मैं उन्हें अमर लोक ले गया। कुछ समय वे वहाँ रहे, फिर परम पुरुष ने नीरू को जीवों को चिताने संसार में भेजा। पर काल ने उसे अपने जाल में फँसा लिया।
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जीवन दुख अतिशय भयो भाई। तबहीं पुरुष सुकृत हंकराई॥ आज्ञा कान्ह जाहु संसारा। काल अपर बल जीव दुखारा॥ लोक संदेशा ताहि सुनाओ। देइ नाम जीवन मुकताओ॥ आज्ञा सुनत सुकृत हरषाये। तुरतहिं लोक पयाना लाये॥ सुकृत देख काल हरषाई। इन कहँ तो हम लेब फँसाई॥ करि उपाय बहुत तब काला। सुकृत फँसाय जाल महँ डाला॥ बहुत दिवस गयो जब बीता। एकहु जीव न कालहिं जीता॥ जीव पुकार सतलोक सुनाये। तबहीं पुरुष मोकहँ हंकराये॥
तब परम पुरुष ने मुझसे कहा कि उसे चेताओ, इसलिए परम पुरुष की आज्ञा से मैं आया हूँ।
पुरुष अवाज् उठी तिहि बारा। ज्ञानी बेग जाहु संसारा॥ जीवन काज अंश पठवायी। सुकृत अंश जग प्रगटे जायी॥ दीन्ह आज्ञा तेहि को भाई। शब्द भेद वाही समझायी॥ लावहु जीवन नाम अधारा। जीवन खेइ उतारो पारा॥ सुनत आज्ञा वहि कीन पयाना। बहुरि न आये देश अमाना॥ सुकृत भवसागर चलि गयऊ। काल जाल ते सुधि बिसरयऊ॥ तिन कहँ जाय चितावहु ज्ञानी। जेहिते पंथ चले निरवानी॥ बंस ब्यालिस अंस हमारा। सुकृत गूह लैहँ औतारा॥ ज्ञानी बेगि जाहु तुम अंसा। अब सुकृत अंश कर मेटहु फंसा॥
तो कहा कि तब हम परम पुरुष की आज्ञा से तुम्हारे पास आए। तुम नीरू के अवतार हो।
चलेउ हम तब सीस नवाई। धर्मदास हम तुम लग आई॥ धर्मदास तुम नीरू औतारा। आमिन नीमा प्रगट विचारा॥ तुम तो आहु प्रिय मम अंशा। जा कारण हम कीन्ह बहु संसा॥ पुरुषहिं आज्ञा तुम्हरे ढिग आये। पिछली हेत पुनि याद कराये॥
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यहि संयोग हम दर्शन दीन्हा । धर्मनि अबकी तुम मोहि चीन्हा ॥ पुरुष अवाज कहूँ तुम पासा । चीन्हहु शब्द गहो विश्वासा ॥
साहिब ने कहा—हे धर्मदास ! तुम मेरे अंश हो, परम पुरुष ने तुम्हें जीवों को चिताने संसार में भेजा था, पर तुम काल के फँदे में फँस गये और भूल गये। इस कारण हमने तुम्हें दर्शन दिया है, अब विश्वास करो और शब्द की डोर पकड़ो।
धाय परे चरनन धर्मदासा । नैन बारि भर प्रगट प्रगासा ॥ धरहिं न धीर बहुर संतोखा । तुम साहिब मेटहु जिव धोखा ॥ धरै न धीरज बहुत प्रबोधे । बिछरि जननि जिमि मिल्यो अबोधे ॥ युग पग गहे सीस भुई लाये । निपट अधीर न उठत उठाये ॥ बिलखत बदन वचन नहिं बोले । सुरति चरण ते नेक न डोले ॥
धर्मदास जी की आँखों में प्रेम के आँसू बह चले, वे तो ऐसे हो गये मानो किसी अबोध बालक को बिछुड़ी हुई माँ मिल गयी हो, कुछ बोल न पाए और साहिब के चरणों में लेट गये, उठाये न उठते थे।
बहुरि चरन गहि रोवहिं भारी । धन्य प्रभु मोहि तारन तन धारी ॥ धरि धीरज तब बोल सम्हारी । मोकहँ प्रभु तारन पगधारी ॥ अब प्रभु दया करहु यहि मोहि । एकौ पल न बिसरें तोही ॥ निशिदिन रहौं चरन तुम साथ । यह बर दीजे करहु सनाथा ॥
फिर धैर्य धारण कर कहने लगे कि हे साहिब ! मुझपर कृपा करना, मुझे एक पल भी बिसरना नहीं। फिर कहा—
धन सतगुरु धन तुम्हरी बानी । मुहिं अपनाय दीन्ह गति आनी ॥ मोहि आय तुम लीन्ह जगायी । धन्य भाग्य हम दर्शन पायी ॥ काल जाल जौनी विधि छूटे । यम बन्धन जौनी विधि टूटे ॥ सोई उपाय प्रभु अब कीजे । सार शब्द बताय मोहि दीजे ॥
कहा कि मेरा बड़ा भाग्य है कि आपने दर्शन दिये, अब मुझे सार शब्द बताकर काल से छुड़ा लो। तब साहिब ने उसे नाम देकर समझाया—
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धर्मदास तुम सुकृत अंशा। लेइ पान अब मेटहु संशा॥
धर्मदास आपन करि लेऊँ। चौका करि परवाना देऊँ॥
तिनका तुड़ाय लेहु परवाना। काल दशा छूटे अभिमाना॥
शालिग्राम को छाड़हु आसा। गहि सत शब्द होहु तुम दासा॥
दश औतार ईश्वरी माया। यह सब देख काल की छाया॥
तुम जग जीव चितावन आये। काल फन्द तुम आई फँसाये॥
अबहूँ चेत करो धर्मदासा। पुरुषहिँ शब्द करो परकासा॥
ले परवाना जीव चिताओ। काल जाल ते हँस मुक्ताओ॥
कहा-दस अवतार भी माया का खेल था, इसलिए शालिग्राम की आशा छोड़ दो और नाम को पकड़ो, दूसरे जीवों को भी चिताओ।
साहिब ने नाम का परवाना देकर धर्मदास को समझाया-
कहँ कबीर सुनो धर्मदासा। सत्य भेद मैं कियो परकासा॥
अब सुनु रहन की बाता। बिन जाने नर भटका खाता॥
पहिले कुल मरजादा खोवे। भय ते रहित भक्ति तब होवे॥
सेवा करो छाड़ि मत दूजा। गुरु की सेवा गुरु की पूजा॥
गुरु से करे कपट चतुराई। सो हँसा भव भरमें आई॥
ताते गुरु से परदा नाहीं। परदा करे रहे भवमाहीं॥
गुरु के वचन सदा चित दीजे। माया मोह सु कोर न भीजे॥
यहि रहनी भव बहुरि न आवे। गुरु के चरण कमल चित लावे॥
कहा-गुरु की भक्ति करो, उनसे छल-कपट मत करो, स्पष्ट बात करो, कुछ छिपाओ नहीं, उनके वचनों को हृदय में धारण करो, उनके चरणों में चित्त लगाए रहो। जब तक जीवन है, तब तक गुरु की आज्ञा को देखते चलो।
जब लग तन में हँस रहाई। निरखे शब्द चले पथ भाई॥
गुरु मुख जीव कतहु न बाचै। अगिण कुण्ड महँ जबरि नाचै॥
138
साहिब बन्दगी
गुरु दयाल तो पुरुष दयाला। जेहि गुरु व्रत छूए नहिं काला॥ कोटिक योग अराधे प्राणी। सतगुरु बिन जीव की हानी॥ सतगुरु अगम गम्य बतलावे। जाकी गम्य वेद न पावे॥ कोटि माहिं कोइ संत विवेकी। जो मम बानी गहे परे खी॥
साहिब ने धर्मदास को गुरु पूजा का महात्म बताया, कहा—जब तक शरीर में आत्मा रहे, गुरु के वचन को देखते चलो। गुरु के प्रसन्न होने से ही सतपुरुष प्रसन्न होते हैं। चाहे कोई करोड़ों उपाय क्यों न कर ले, बिना गुरु के हानि ही होगी। करोड़ों में कोई एक विवेकी संत ही मेरी बानी को समझता है। पर गुरु वो, जिसके पास गुप्त नाम(शब्द) हो। फिर साहिब ने उसे नाम का महात्म बताते हुए कहा—
कल यहि नाम प्रताप धर्मन, हँस छूटे काल सो। सत्त नाम मन बिच दूढ़ गहे, सो निस्तेरे यम जाल सो॥ यम तासु निकट न आवई, जेहि वंश की परतीत हो। कलिका के सिर पाँव दै, चले भवजल जीति हो॥
साहिब ने उसे यह भी समझाया कि गुरु गद्दी शब्द पुत्र को ही देनी है, बीज पुत्र को नहीं देनी है। यानी शरीर से उत्पन्न बेटे को नहीं देनी है, शब्द द्वारा बनाए गये बेटे को देनी है।
कहँ निर्गुण कहँ सगुण भाई। नाद बिना नहिं पंथ चलाई॥ धर्मनि नाद पुत्र तुम मोरी। ताते दीन्ह मुक्ति का डोरा॥
कहा—सगुण-निर्गुण सब भक्तियों में भी शब्द पुत्र से ही पंथ चलता है। तुम मेरे शब्द पुत्र हो, इसलिए तुम्हें जीवों की मुक्ति के लिए नाम की डोरी सौंपी है।
धर्मदास ने पूछा
अब प्रभु दया करो तुम ज्ञानी। वचन वंश प्रगटे जग आनी॥ आगे जेहिते पन्थ चलाई। तेहिते करैं विनती प्रभुराई॥
धर्मदास ने पूछा कि अब मेरा वंश कैसे चलेगा!
अनुरागसागर वाणी
139
साहिब ने कहा
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । दशै मास प्रगटै जिव कासा ॥ तुम गृह आय लेहि अवतारा । हंसन काज देह जग धारा ॥ धर्मदास सुनु शब्द सिखापन । कहौं सैदेश जानि हित आपन ॥ वस्तु भंडार दीन तुम पांही । सौंपहु वस्तु बतावहु ताही ॥ अब जो होइ हैं पुत्र हमारा । सो तो होइ हैं अंश हमारा ॥
साहिब ने कहा कि 10 महीने बाद तुम्हारे घर में एक अवतार होगा, जो वस्तु मैंने तुम्हें दी है, वही तुम उसे देना, वो जो तुम्हारा पुत्र होकर आयेगा, वो मेरा ही अंश होगा।
धर्मदास अस विनती लायी । हे प्रभु मोकहैं कहु समझाई ॥ हे पुरुष हम इन्द्री वश कीन्हा । कैसे अंश जनम जग लीन्हा ॥
धर्मदास ने कहा कि अब तो मैंने इन्द्री वश में की है, अब कैसे होगा। तब साहिब ने उसे समझाया कि वो नाद पुत्र होगा।
तब आयसु साहब अस भाखे । सुरति निरति करि आज्ञा राखे ॥ पारस नाम धर्मनि लिखि देहु जाते अंश जन्म सो लेहु ॥ लखहु सैन मैं दऊँ लखाई । धर्मदास सुनियो चितलाई ॥ लिखो पान पुरुष सहिदाना । आमिन देहु पान परवाना ॥
साहिब ने कहा कि अपनी स्त्री को नाम दो। तब धर्मदास जी की शंका समाप्त हुई और उन्होंने आमिन को बुलवाकर साहिब के चरण पकड़ने को कहा, पारस नाम दिया। इस तरह सुरति से गर्भवास हुआ और चूरामणि साहिब प्रगट हुए।
तब गयठ धर्मदास कह शंका । दृष्टि समीप कीन्हा परसंगा ॥ धर्मदास आमिन हँकरावा । लाय खसम के चरन परावा ॥ पारस नाम पान लिख दीन्हा । गरभवास आसा सा लीन्हा ॥
140
साहिब बन्दगी
रति सुरति सो गरभ जो भयऊ। चूरामनि दास बास तहँ लयऊ॥ धरमदास परवाना दीन्हा। आमिन आय दंडवत कीन्हा॥ दसों मास जब पूजी आसा। प्रगटे अंश चूरामणि दासा॥
तब साहिब उसके घर गये और कहा कि अब तुम्हारे 42 वंश होंगे। फिर उनकी शाखाएँ, परशाखाएँ होंगी, सकल जीवों को वे तारेंगे।
तुमते वंश बयालिस होई। सकल जीवकहँ तारै सोई॥ तिनसों साठ होइ हैं शाखा। तिन शाखन ते होइ हैं परशाखा॥ दश सहस्र परशाख तुम है हैं। वंशन साथ सबै निरनहिहैं॥ नाता जान करे अधिकई। ताकहँ लोक बदों नहिं भाई॥ जस तुम्हार हुइ है कडिहारा। तैसे जानो साख तुम्हारा॥
कहा कि 42 वंश से आगे 360 शाखाएँ होंगी, फिर उसकी 10 हजार परशाखाएँ होंगी। जैसे मैंने तुम्हें नाम परवाना सोंपा है, वैसे ही तुम्हारे वंशों को भी सोंपा जायेगा। वो सब नाद पुत्र होंगे, शब्द पुत्र होंगे। ताते तोहि कहौं समझाई। अपने वंसन देहु चिताई॥ नाद पुत्र जो परगट होई। ताको मिलै प्रेम से सोई॥ तुमहु नाद पुत्र मम आहु। यह मन परखहु धर्मनि साहु॥ कमाल पुत्र जो मूत्र जियावा। ताके घट में दूत समावा॥ पिता जानि तिन आहंग कीन्हा। तब हम थाति तोहि कहँ दीन्हा॥ हम हैं प्रेम भगति के साथी। चाहों नहीं तुरी औ हाथी॥ प्रेम भक्ति से जो मोहिं गहिहैं। सो हंस मम हृदय समैहैं॥ अहं कारते होतेऊ राजी। तौ मैं थापत पंडित काजी॥ अधीन देखि थाति तेहि दीना। देखेउ जब तोहिउँ प्रेम अधीना॥ ताते धरमनि मानु सिखाई। नाप थाती सौँपिहु भाई॥ नाद पुत्र कहँ सौँपिहु सोई। पंथ उजागर जासों होई॥ बंस करिहैं अहं कार बहुता। हम हैं धर्मदास कुल पूता॥
अनुरागसागर वाणी
141
जहाँ हंग तहवाँ हम नाहीं । धरमदास देखु परखि मन माहींं ॥ जहाँ हंग तहँ काल सरूपा । नहिं पावे सत लोक अनूपा ॥
साहिब ने समझाया कि शब्द पुत्र को ही गद्दी सौंपनी है । कमाल को मैंने जीवित किया था, पर उसने अंहकार किया, मुझे पिता माना, इसलिए मैंने नाम का परवाना तुम्हें सोंपा, उसे नहीं । हे धर्मदास ! मैं प्रेम का भूखा हूँ, मुझे हाथी-घोड़े नहीं चाहिँ। यदि अंहकार से मैं अधीन होता तो पंडित-काजियों को यह काम सौंप देता । जहाँ अंहकार है, वहाँ हम नहीं, काल है, इसलिए वो जीव अमर लोक नहीं जा सकता ।
धर्मदास का बेटा नारायणदास साहिब का निंदक था, उसने नाम नहीं लिया, साहिब ने कहा कि यह काल का बंदा है, इसे त्याग दो, पर धर्मदास बार-बार साहिब से प्रार्थना करते कि उसे भी नाम दो, तब साहिब ने उससे कहा कि तुम पुत्र मोह में नहीं पड़ो, गुरुमुख बनो । साहिब ने उसे समझाया-
गुरु आज्ञा जो निरखत रहई । ताकर खूट काल नहिं गहई ॥ गुरु पद रहे सदा लौ लीना । जैसे जलहि न बिसरत मीना ॥ गुरु के शब्द सदा लौ लावे । सत्य नाम निसदिन गुण गावे ॥ पुरुष नाम को अस परभाऊ । हँसा बहुरि न जगमहँ आऊ ॥ निश्चय जाय पुरुष के पास । कूर्म कला परखहु धर्मदासा ॥
इसलिए-
जब लग तन में हँस रहाई । निरखे शब्द पंथ चले भाई ॥ जैसे शूर खेत रह मांड़ी । जो भागे तो होवे भांड़ी ॥ संत खेत गुरु शब्द अमोला । यम तेहि गहे जीव जो डोला ॥ गुरु विमुख जिव कतहुँ न बाचै । अग्नि कुंड महँ जरि बरि नाचै ॥ सासति होय अनेकन भाई । जनम जनम सो नर्कहि जाई ॥
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साहिब बन्दगी
गुरु दयाल तो पुरुष दयाला। जेहि गुरुमुख छुए न काला॥ जीव कहो परमारथ जानी। जो गुरु भक्त ताहि नहिं हानी॥ कोटिक योग अराधे प्रानी। सतगुरु बिन जीव की हानी॥ सतगुरु अगम गम्य बतलावे। जाकी गम्य वेद नहिं पावे॥ वेद जाहि ते ताहि बखाने। सत्य पुरुष का मरम न जाने॥ कोई इक हंस विवेकी होवे। सत्य शब्द जो गही बिलोवे॥ कोटि माहिं कोइ संत विवेकी। जो मम बानी गहे परे खी॥ फंदे सबै निरंजन फंदा। उलटि न निज घर चीन्हे मंदा॥
गुरु गुरुन में भेद विचारा। गुरु-2 कहे सकल संसारा॥ गुरु सोइ जिन शब्द लखाया। आवागमन रहित दिखलाया॥ गुरु सजीवन शब्द लखावे। जाके बल हंस घर जावे॥ सो गुरु सों कछु अन्तर नीहीं। गुरु औ शिष्य मता एक आहीं॥
कहा-यदि ऐसा गुरु मिल जाए तो उसमें और परम पुरुष में कोई अन्तर नहीं मानना।
अनुरागसागर ग्रंथ कथि तोहि अगम गम्य लखाइया॥ पुरुष लीला काल को छल सबै वरनि सुनाइया॥ रहनि गहनि संत की, जौहरी जन बूझिहैं॥ परखि बानी जो गहे, तेहि अगम मारग सूझिहैं॥