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अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

486 तत्रैव विस्तारमाह — उत्तमं चाऽष्टहस्तैश्च₈ सप्तहस्तैश्च₇ मध्यमम्। कनिष्ठं चैव षड्ढस्तैर्विस्तार₆स्त्रिविधो₃ मतः ॥ 4 ॥ इनमें उत्तम प्रतोली या पोल की चौड़ाई (विस्तार) आठ गज की, मध्यम प्रतोली की चौड़ाई सात गज की और कनिष्ठ प्रतोली की चौड़ाई छह गज की होती है। इस तरह इनकी चौड़ाई भी तीन प्रकार की बताई गई है। नवहस्तोच्छ्रिता₉ स्तम्भाः कुम्भकैः सुसमन्विताः। ऊर्ध्वमेक₁ द्वि₂ त्रिक्षणा₃ मालिकाश्च ह्यनुक्रमात् ॥ 5 ॥ नौ गज ऊँचाई के स्तम्भ कुम्भकों से युक्त हों और उनके ऊपर एक, दो अथवा तीन क्षणामालिका अनुक्रम से बनाई जाए अर्थात् एक, दो या तीन अवसर, खाली स्थान छोड़ते हुए मालिका अर्थात् माल अनुक्रम से बनाएँ। मदलाःशीर्षस्तम्भिका निर्व्यूहे मदलाः पुनः। स्वस्तिकाद्वयं शीर्षोर्ध्व निर्व्यूहे मदलाः पुनः ॥ 6 ॥ जैसे कि मदल स्तम्भ के शीर्ष पर बनाएँ और फिर निर्यूह (नेजू) बनाकर उन पर पुनः मदल की रचना करें और उनके शीर्ष पर दो स्वस्तिक बनाकर निर्यूह बनाए तथा उन पर पुनः मदल की रचना करनी चाहिए। शीर्षोर्ध्वे च भवेत्पट्टः शाखाद्यं चोत्तराङ्गकम्। तुला जयन्ती पीता सा ? निर्मलं कपिशीर्षकम् ॥ 7 ॥ इसके उपरान्त उसके शीर्ष के ऊपर छाबने का पाट धरें जो शाखा से लेकर उत्तराङ्ग अर्थात् छाबना बनें, यह जयन्ती नामक तोरण तुला कहलाती है जो निर्मल है और उसके ऊपर कँगूरे बने होते हैं। तदूर्ध्वे च पुनर्भूमिंश्चतुर्द्वारं तृतीयके। दृढार्गलाः कपाटाश्चाऽपवरकास्ततः परम् ॥ 8 ॥ इनके ऊपर पुनः तीसरी भूमि अर्थात् तीसरी मंजिल के चार द्वार बनाए जाए जिनके दृढ़ किंवाड़ हों और उनके बन्द करने अर्गला-आगल लगाने की व्यवस्था हो जिससे द्वार के किंवाड़ सुदृढ़ रूप से बन्द रहें तथा उसके परे भी दूसरे द्वार और कपाट अपवरक— इस प्रकार दृढ़तर बनाएँ। प्रतोलीचतुष्टये मुखद्वारमाह — वक्त्रद्वाराणि वक्ष्यामि प्रतोलीनां चतुष्टयम्। अनुक्रमेण कर्तव्यं कश्यापि यथावत ॥ 9 ॥

सूत्र-८३ 487 अब मैं प्रतोली चतुष्टय के मुख-द्वारों के बारे में क्रम से निर्माण-विधि संक्षेप से कहता हूँ। उत्सङ्गः पूर्णबाहुश्च हीनबाहुस्तथापरः। प्रतिकाय इति प्रोक्तं प्रतोलीनां चतुष्टयम् ॥ 10 ॥ प्रतोली-चतुष्टय में एक द्वार उत्सङ्ग, दूसरा पूर्णबाहु, तीसरा हीनबाहु एवं चौथा प्रतिकाय संज्ञक होता है। उत्तरामुख उत्सङ्गः पूर्णबाहुश्च पूर्वतः। अपरे हीनबाहुश्च प्रतिकायस्तु दक्षिणे ॥ 11 ॥ इसमें उत्तरामुखी द्वार उत्संग होता है, पूर्णबाहु पूर्व दिशा सम्मत, हीनबाहु पश्चिमाभिमुख एवं प्रतिकाय दक्षिणाभिमुख होता है। सृष्टिप्रवेश उत्सङ्गः प्रतिकायोऽपसव्यतः। पूर्णबाहुः पूर्ववक्त्रो वामास्यो हीनबाहुकः ॥ 12 ॥ सृष्टि-प्रवेश (सृष्टिक्रम से) द्वार उत्सङ्ग कहा जाएगा, अपसव्य क्रम से प्रतिकाय होगा अर्थात् दायीं ओर होगा। पूर्णबाहु पूर्वमुख होता है और हीनबाहुक दक्षिणमुखी।¹ वामभागे दिशि दिशि वामावर्तोद्भवस्तु ये। द्वारं च दक्षिणावर्तं कथितं त्वपराजित ॥ 13 ॥ इसके वाम भाग या बायें भाग में प्रत्येक दिशा में आवर्त (परिक्रमणक) होते हैं। इनके द्वार दक्षिणावर्त होते हैं। हे अपराजित ! ऐसा कहा गया है। पोलसमूहमाह - एकपोल्यं त्रिपोल्यं वा पञ्चपोल्यमथोच्यते । एवंविधः प्रकर्तव्यः पोल्यानां तु समुच्चयः ॥ 14 ॥ अब पोल समूह के बारे में कहता हूँ। ये तीन प्रकार की होती है— एक पोल वाली, त्रिपोल्य या तीन पोल वाली तथा पञ्चपोल्य या पाँच पोल वाली।

  1. यह वर्णन समराङ्गण. में द्वार के प्रसंग में आया है-उत्सङ्गो हीनबाहुश्च पूर्णबाहुस्तथापरः। प्रत्यक्षायश्चतुर्थश्च निवेशः परिकीर्तितः ॥ उत्सङ्ग एवदीक्षाभ्यां (?) द्वाराणां वास्तुवेश्मनोः। स सौभाग्यप्रजावृद्धिधनधान्यजयप्रदः ॥ यत्र प्रवेशतो वास्तु गृहं भवति वामतः। तद्धीनबाहुकं वास्तु निन्दितं वास्तुचिन्तकैः ॥ तस्मिन् वसन्प्रव्यथितः स्वल्पमित्रोऽल्पबान्धवः । स्त्रीजितश्च भवेन्नित्यं विविधव्याधिपीडितः ॥ वास्तुप्रवेशतो यत् तु गृहं दक्षिणतो भवेत्। प्रदक्षिणप्रवेशत्वात् तद् विद्यात् पूर्णबाहुकम् ॥ तत्र पुत्रांश्च पौत्रांश्च धनधान्यसुखानि च। प्राप्नुवन्ति नरा नित्यं वसन्तो वास्तुनि ध्रुवम् ॥ गृहपृष्ठं समाश्रित्य वास्तुद्वारं यदा भवेत्। प्रत्यक्षायस्त्वसौ निन्द्यो वामावर्तप्रवेशवन् ॥ (समराङ्गण. 39, 11-17)

488 एकपोल्यं वक्त्रद्वारं त्रिपोल्यं भ्रमणीद्वयम्। पञ्चपोल्यं तु चित्राढ्यं कर्तव्यं सर्वकामदम्॥ 15 ॥ एक पोल का तो मुख्य द्वार एक ही होता है परन्तु त्रिपोलिया में दो भ्रमणी होती है तथा पञ्चपोल्य में तरह-तरह के चित्र अर्थात् मूर्ति अलङ्करणों की आढ्य- भरमार होनी चाहिए जो सर्व कामनाओं को पूर्ण करने वाली है। तस्य प्रकारलक्षणमाह — प्राकारादियुक्तभागैर्विस्तरो भागषट्कतः। निर्गमश्च चतुर्भागैः प्राकारो यत्र वाञ्छितः॥ 16 ॥ इन पोलों के प्राकार अर्थात् परकोटे भी समुचित भागों के विस्तार वाले होते हुए छह भाग तक होते हैं। जहाँ-जहाँ प्राकार-परकोटा वाञ्छित है, वहाँ-वहाँ उसका निकास-निर्गम चार भागों तक का होना चाहिए। याम्यपार्श्वे समस्तत्र विस्तरस्तु त्रिभागिकः₃। निर्गमश्च त्रिभागैश्च₃ सङ्क्षेपात्कथितं मया॥ 17 ॥ बायें भाग के समस्त अर्थात् बायीं बाजू के समस्त परकोटे तीन भाग के विस्तार-चौड़ाई वाले होने चाहिए। उनका निकास भी तीन भाग का होना चाहिए। ये सब मेरे द्वारा संक्षेप में कह दिया गया। अन्यदप्याह — त्रिभागं दक्षिणे त्यक्त्वा द्विभागं च तथोत्तरे। शेषा प्रतोली चैकांशा भागं दक्षिणभित्तिका॥ 18 ॥ तीन भाग दक्षिण की ओर छोड़कर तथा दो भाग उत्तर की ओर छोड़े; एक अंश-भाग प्रतोली की दक्षिणी भित्ति का होता है। भवेत् भागोत्तरा भित्तिः कर्णान्ते वलणं त्रिभिः₃। दक्षिणे भित्तिपार्श्वेऽग्रे कर्णान्ते वलणं त्रिभिः₃॥ 19 ॥ जो भाग उत्तर की ओर की भित्ति का होता है, उसके कोने तक तीन वलण (घूमाव) होते हैं तथा उसके दक्षिण की भित्ति के पार्श्व में भी आगे की ओर कोने तक तीन वलण होते हैं। द्विभागं विस्तरं कुर्याद् वक्त्रमार्गप्रवेशनम्। एकपोल्यमिति ख्यातं सङ्क्षेपात्कथितं मया॥ 20 ॥ द्वार के मुखमार्ग में प्रवेश करने के लिए दो भाग का विस्तार होना चाहिए। इस

सूत्र-८३ 489 त्रिपोल्यलक्षणमाह — वामे द्विभागविस्तीर्णे अपरे दशभागिके₁₀ । दक्षिणे समभागश्च चतुर्भागं परे हितम् ॥ २१ ॥ इसी प्रकार बायीं ओर का विस्तार दो भाग का और दूसरी ओर दस भाग दक्षिण में भी उतने ही समान भाग का और परे-दूसरी ओर चार भाग रखना उचित है। त्रिभागे विस्तरं याम्ये अपरेऽस्य ¹समपदम् । याम्ये कुर्याच्च वेदांशं₄ मूलद्वारं तु कारयेत् ॥ २२ ॥ दक्षिण में तीन भाग के विस्तार का और अपरे-दूसरी ओर भी उतने ही समान पद अर्थात् तीन भाग का विस्तार हो तथा दक्षिण ओर का विस्तार चार भाग का हो, ऐसा मूलद्वार बनाना चाहिए। चतुर्भागाग्रभ्रमणं² भागा भित्तिर्याम्योत्तरे । भागा भित्तिस्तदग्रे च समद्वारं सतोरणम् ॥ २३ ॥ आगे की ओर चार भाग का भ्रमण अर्थात् घूमाव हो जिसके उत्तर दिशा और दक्षिण दिशा में भित्ति हो। उसके आगे की ओर भी एक भाग की भित्ति हो और तोरणयुक्त समान द्वार हो। पुनर्भ्रमश्चतुर्भागः षड्भागश्चैव विस्तरे । विधेयं पूर्ववच्छेषं त्रिपोल्यं नाम शोभनम् ॥ २४ ॥ उसके भी पुनः चार भाग का भ्रमण-घूमाव हो जिसका विस्तार छह भाग का हो, शेष सभी अङ्गों का न्यास पूर्व में बताए विधेय के अनुसार ही होगा। इस प्रकार के द्वार का नाम त्रिपोल्य अर्थात् त्रिपोलिया कहा है। पञ्चपोल्यलक्षणं — यथा वामे तथा दक्षे भित्तिर्भागा भुजान्ततः । मध्यभित्तिर्यथा पूर्वं चतुष्काकृति तोरणे ? ॥ २५ ॥ जैसा बायें वैसा ही दायें भित्तियों के भाग एक गज तक के हों। मध्य की भित्ति पूर्व की तरह की हो और चौकोर आकृति का तोरण हो (?)। द्वारं द्वारस्य सूत्रेण भागिको भित्तिविस्तरः । पुनरन्ते चान्तरे च द्वारं द्वारतृतीयकम् ॥ २६ ॥

  1. 'तमपदम् ?।' इति प्रकाशित पाठः ।
  2. 'चतुर्भागाग्ररमण' इति प्रकाशित पाठः ।

अ सभी द्वार एक सीध में या सूत्र में बने हों जिनकी भित्ति का विस् हो और उनके पुनः अन्तर-अन्तर पर द्वार तीन-तीन की संख्या में तद्वत्तल्यानि क्षेत्राणि कार्याणि शोभनानि वै। पूर्वद्वारानुक्रमेण उभे द्वारे याम्योत्तरे ॥ 27 ॥ उनके अनुरूप ही शोभायुक्त तल क्षेत्रों की रचना करनी चाहिए। प के अनुक्रम में दोनों द्वार उत्तर दक्षिण में बनाने चाहिए। वक्त्रद्वारं पुनस्त्वेवं कर्तव्यं दक्षिणोत्तरे। पञ्चपोल्यमिदं ख्यातं प्राकारः कपिशीर्षतः ॥ 28 ॥ इसी प्रकार पुनः मुखद्वारों को भी दक्षिण-उत्तर की ओर बनाना र यह पञ्चपोल नामक द्वार उत्तम परकोटे और कपिशीर्ष-कँगूरों इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छ (एकत्रि) पञ्चप्रतोल्यधिकारो नाम त्र्यशीतितमं सूत्रम् ॥ 83 ॥ प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा पञ्चप्रतोली अधिकार नामक तियासीवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 83 ॥