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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

इन पापनाशक और स्वर्गगामी सूर्य से दोनों अयन अर्थात् उत्तरायण और दक्षिणायन
सहस्रों दिवसों में नियमपूर्वक बंधे रहते हैं. ये सब देवताओं को अपने में लीन कर के सभी
जीवों को देखते हुए चलते हैं. ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी और विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक
को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और अपने पाशों के बंधन में डालो.
(१४)
अयं स देवो अप्स्व १ न्तः सहस्रमूलः पुरुशाको अत्रिः.
य इदं विश्वं भुवनं जजान.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१५)
सभी लोकों को जिन्होंने प्रकाशित किया वे देव जल में वास करते हैं. वे ही सहस्रों के
मूल रूप तथा तीनों तापों अर्थात् दैहिक, दैविक भौतिक से रहित अग्नि हैं. इस क्रोधवंत देव
के अपराधी और विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण
बनाओ और अपने पाशों में बांध लो. (१५)
शुक्रं वहन्ति हरयो रघुष्यदो देवं दिवि वर्चसा भ्राजमानम्.
यस्योर्ध्वा दिवं तन्व १ स्तपन्त्यर्वाङ् सुवर्णैः पटरैर्वि भाति.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१६)
स्वर्ग में अपने तेज से चमकते हुए सूर्य को उन की द्रुतगामी रश्मियां निर्मल रस प्राप्त
कराती हैं उन की देह के ऊर्ध्व भाग रूप रश्मियां स्वर्ग को संतप्त करती हैं. जो स्वर्णिम
रश्मियों द्वारा प्रकाश फैलाते हैं, उन क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक
को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और अपने पाशों से बांध दो. (१६)
येनादित्यान् हरितः संवहन्ति येन यज्ञेन बहवो यन्ति प्रजानन्तः.
यदेकं ज्योतिर्बहुधा विभाति.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१७)
जिन के प्रभाव से सूर्य के अश्व सूर्य को वहन करते हैं तथा जिन के प्रभाव से विज्ञ पुरुष
यज्ञ आदि कर्मों को प्राप्त होते हैं, जो एक ज्योति होते हुए भी अनेक रूप से प्रकाशमान हैं,
ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित
करते हुए क्षीण बनाओ तथा उसे अपने पाशों से बांधो. (१७)
सप्त युञ्जन्ति रथमेकचक्रमेको अश्वो वहति सप्तनामा.
त्रिनाभि चक्रमजरमनर्वं यत्रेमा विश्वा भुवनाधि तस्थुः.
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तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१८)
फैलने वाली किरणें अन्य जातियों को निस्तेज कर के चक्र वाले सूर्य के रथ में युक्त
होती हैं. ये सूर्य सप्तऋषियों द्वारा किए हुए नमस्कार को स्वीकार कर के घूमते हैं. ये ग्रीष्म,
वर्षा और हेमंत—इन तीन ऋतुओं वाले वर्ष को बनाते हैं. सब लोक इस काल के आश्रित हैं.
ऐसे क्रोधवंत देवता के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित
करते हुए क्षीण बनाओ और उसे अपने पाशों से बांध लो. (१८)
अष्टधा युक्तो वहति वह्निरुग्रः पिता देवानां जनिता मतीनाम्.
ऋतस्य तन्तुं मनसा मिमानः सर्वा दिशः पवते मातरिश्वा.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१९)
आठ प्रकार से बहने वाले अग्नि उग्र हैं. वे देवों के पालक तथा बुद्धियों को उत्पन्न करने
वाले हैं. ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम
कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा उसे अपने पाशों से बांध दो. (१९)
सम्यञ्चं तन्तुं प्रदिशो ऽ नु सर्वा अन्तर्गायत्र्याममृतस्य गर्भे.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२०)
गायत्री में, अमृत के गर्भ में तथा सभी दिशाओं में पूजनीय जलतंतु को वायु पवित्र
करते हैं. उन क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम
कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा उसे अपने पाशों से बांध दो. (२०)
निमुचस्तिस्रो व्युषो ह तिस्रस्त्रीणि रजांसि दिवो अङ्ग तिस्रः.
विद्मा ते अग्ने त्रेधा जनित्रं त्रेधा देवानां जनिमानि विद्म.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२१)
हे अग्नि! हम तुम्हारी तीनों उत्पत्तियों को जानते हैं. तुम्हारी तीनों गतियां भस्म करने
वाली हैं. हम तीन लोकों तथा स्वर्ग में तीन भेदों को भी जानते हैं. ऐसे उन क्रोधवंत देव के
अपराधी को तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहितदेव! तुम कंपित करते हुए क्षीण
बनाओ तथा उसे अपने पाशों से बांध लो. (२१)
वि य और्णोत् पृथिवीं जायमान आ समुद्रमदधादन्तरिक्षे.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२२)
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जो उत्पन्न हो कर भूमि को आच्छादित करता है तथा जल को अंतरिक्ष में स्थिर करता
है, ऐसे उस क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम
कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा अपने पाशों से बांध लो. (२२)
त्वमग्ने ऋतुभिः केतुभिर्हितो ३ र्कः समिद्ध उदरोचथा दिवि.
किमभ्यार्चन्मरुतः पृश्निमातरो यद् रोहितमजनयन्त देवाः.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२३)
हे अग्नि! तुम ऋतु संबंधी दशों में प्रदीप्त किए जाते हो तथा स्वर्ग में अर्चना के साधन
रूप बनते हो. क्या पश्चिमाताओं के पुत्र मरुद्गण ने तुम्हारी पूजा की थी जो देवता रोहित देव
से मिले थे. उन क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव!
तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और अपने पाशों से बांध लो. (२३)
य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः.
यो ३ स्येशे द्विपदो यश्चतुष्पदः.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२४)
शारीरिक बल के प्रदाता आत्मिक बल के प्रेरक, जिन के बल की देवता आराधना करते
हैं तथा जो प्राणिमात्र के स्वामी हैं, ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के
हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा अपने पाशों से बांध लो.
(२४)
एकपाद् द्विपदो भूयो वि चक्रमे द्विपात् त्रिपादमभ्येति पश्चात्.
चतुष्पाच्चक्रे द्विपदामभिश्वरे संपश्यन् पङ्क्तिमुपतिष्ठ मानः.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२५)
यह देव एक पैर वाला होने पर भी दो पैर वालों से तेज दौड़ता है, दो पैरों वाला तीन
पैरों वालों के पीछे चलता है. चार पैरों वाला दो पैरों वालों तथा एक स्वर में रहने वालों की
पंक्ति में देखता हुआ उन से सेवा लेता है. ऐसे उन क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान्
ब्राह्मण के हिंसक ब्रह्मघाती को हे रोहितदेव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और उसे
अपने दृढ़ पाशों से बांध लो. (२५)
कृष्णायाः पुत्रो अर्जुनो रात्र्या वत्सो ऽ जायत.
स ह द्यामध रोहति रुहो रुरोह रोहितः.. (२६)
काले रंग की रात्रि का पुत्र प्रकाशमान सूर्य हुआ है. लाल रंग वाला वह वृद्धि करने वाले
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सूक्त-४ देवता—अध्यात्म

सब से ऊपर चढ़ा है. वही निश्चित रूप से द्युलोक पर चढ़ता है. (२६)
सूक्त-४ देवता—अध्यात्म
स एति सविता स्वर्दिवस्पृष्ठे ऽ वचाकशतू.. (१)
वे सूर्य आकाश की पीठ पर चमकते हुए आते हैं. (१)
रश्मिभिर्नभ आभृतं महेन्द्र एत्यावृतः.. (२)
सूर्य ने अपनी रश्मियों से आकाश को ढक दिया है. सूर्य रश्मियों से युक्त हैं. (२)
स धाता स विधर्ता स वायुर्नभ उच्छ्रितम्.
रश्मिभिर्नभ आभृतं महेन्द्र एत्यावृतः.. (३)
वह धाता है, विधाता है तथा वही वायु है, जिस ने आकाश को ऊंचा बनाया है. (३)
सो ऽ र्यमा स वरुणः स रुद्रः स महादेवः.
रश्मिभिर्नभ आभृतं महेन्द्र एत्यावृतः.. (४)
वही अर्यमा, वही वरुण, वही रुद्र और वही महादेव है. (४)
सो अग्निः स उ सूर्यः स उ एव महायमः.
रश्मिभिर्नभ आभृतं महेन्द्र एत्यावृतः.. (५)
वही अग्नि, वे ही सूर्य तथा वे ही महान यम हैं. (५)
तं वत्सा उप तिष्ठन्त्येकशीर्षाणो युता दश.
रश्मिभिर्नभ आभृतं महेन्द्र एत्यावृतः.. (६)
एक शीश वाले दस वत्स उन्हीं की आराधना करते हैं. (६)
पश्चात् प्राञ्च आ तन्वन्ति यदुदेति वि भासति.
रश्मिभिर्नभ आभृतं महेन्द्र एत्यावृतः.. (७)
वे उदय होते ही चमकने लगते हैं तथा उन के पीछे उन की पूजनीय रश्मियां उन के चारों
ओर छा जाती हैं. (७)
तस्यैष मारुतो गणः स एति शिक्याकृतः.. (८)
छींके के आकार वाला उन का ही एक गण मारुत उनके पीछे आ रहा है. (८)
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रश्मिभिर्नभ आभृतं महेन्द्र एत्यावृतः.. (९)
उन्होंने अपनी रश्मियों से आकाश को ढक लिया है. ये महान इंद्र के द्वारा किरणों से
ढके हुए चले आ रहे हैं. (९)
तस्येमे नव कोशा विष्टम्भा नवधा हिताः.. (१०)
उस के नौ कोष विविध रूप धारण किए हुए हैं. (१०)
स प्रजाभ्यो वि पश्यति यच्च प्राणति यच्च न.. (११)
वे स्थावर और जंगम सभी प्रजाओं के द्रष्टा और सभी के साक्षी हैं. (११)
तमिदं निगतं सहः स एष एक एकवृदेक एव.. (१२)
यह सब उसी को प्राप्त होता है. वह अकेला ही एकवृत है. (१२)
एते अस्मिन् देवा एकवृतो भवन्ति.. (१३)
सब देवता इस एक का ही वरण करते हैं. (१३)
सूक्त-५ देवता—अध्यात्म
कीर्तिश्च यशश्चाम्भश्च नभश्च बाह्मणवर्चसं चान्नं चान्नाद्यं च
य एतं देवमेकवृतं वेद.. (१)
कीर्ति, यश, आकाश, जल, ब्रह्मवर्चस् अर्थात् ब्रह्म तेज अन्न और अन्न को पचाने की
क्रिया उसे ही प्राप्त होती है, जो इन एकवृत अर्थात् ब्रह्म का ज्ञाता है. (१)
न द्वितीयो न तृतीयश्चतुर्थो नाप्युच्यते. य एतं देवमेकवृतं वेद.. (२)
इन एकवृत अर्थात् ब्रह्म का ज्ञाता द्वितीय, तृतीय चतुर्थ नहीं कहलाता. (२)
न पञ्चमो न षष्ठः सप्तमो नाप्युच्यते. य एतं देवमेकवृतं वेद.. (३)
इन एकवृत अर्थात् ब्रह्म का ज्ञाता पंचम, षष्ठ अथवा सप्तम नहीं कहलाता है. (३)
नाष्टमो न नवमो दशमो नाप्युच्यते. य एतं देवमेकवृतं वेद.. (४)
जो इन एकवृत अर्थात् ब्रह्म का ज्ञाता है वह अष्टम, नवम नहीं कहलाता है. (४)
स सर्वस्मै वि पश्यति यच्च प्राणति यच्च न. य एतं देवमेकवृतं वेद.. (५)

इन एकवृत अर्थात् ब्रह्म का ज्ञाता स्थावर और जंगम सभी को देखने वाला होता है.
(५)
तमिदं निगतं सहः स एष एक एकवृदेक एव. य एतं देवमेकवृतं वेद.. (६)
वह असाधारण एकवृत अर्थात् ब्रह्म ही है, यह सब उसे ही प्राप्त होता है. (६)
सर्वे अस्मिन् देवा एकवृतो भवन्ति.
य एतं देवमेकवृतं वेद... (७)
ये सब देव उस ब्रह्म में एक रूप होते हैं, जो एक व्रत को जानता है. (७)
सूक्त-६ देवता—अध्यात्म
ब्रह्म च तपश्च कीर्तिश्च यशश्चाम्भश्च नभश्च ब्राह्मणवर्चसं चान्नं चान्नाद्यं च. य एतं
देवमेकवृतं वेद.. (१)
भूतं च भव्यं च श्रद्धा च रुचिश्च स्वर्गश्च स्वधा च.. (२)
य एतं देवमेकवृतं वेद.. (३)
ब्रह्म, तप, कीर्ति, यश, जल, आकाश, ब्रह्मचर्य, अन्न और अन्न को पचाने की शक्ति व
भूत, भविष्य, श्रद्धा, रुचि, स्वर्ग और स्वधा—ये सभी उस एक वृत अर्थात् ब्रह्म के ज्ञाता को
प्राप्त होते हैं. (१-३)
य एव मृत्युः सो ३ मृतं सो ३ भ्वं १ स रक्षः. (४)
वे ही मृत्यु, अमृत, अभ्व हैं तथा वही राक्षस हैं. (४)
स रुद्रो वसुवनिर्वसुदेये नमोवाके वषट्कारो ऽ नु संहितः.. (५)
वही रुद्र धनदान के समय धन प्राप्त करने वाले तथा वही नमस्कार यज्ञ में उत्तम रीति
से बोला गया वष्टकार है. (५)
तस्येमे सर्वे यातव उप प्रशिषमासते.. (६)
ये सब राक्षस आदि उस की आज्ञा में रहते हैं. (६)
तस्यामू सर्वा नक्षत्रा वशे चन्द्रमसा सह.. (७)
ये सब नक्षत्र चंद्रमा के साथ उस के वश में रहते हैं. (७)
सूक्त-७ देवता—अध्यात्म
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स वा अह्नो ऽ जायत तस्मादहरजायत.. (१)
उस से दिन प्रकट हुआ और वह दिन से प्रकट हुआ. (१)
स वै रात्र्या अजायत तस्माद् रात्रिरजायत.. (२)
रात्रि उन्हीं ब्रह्म से प्रकट हुई और वे रात्रि से उत्पन्न हुए. (२)
स वा अन्तरिक्षादजायत तस्मादन्तरिक्षमजायत.. (३)
अंतरिक्ष उन से प्रकट हुआ और वे अंतरिक्ष से प्रकट हुए. (३)
स वै वायोरजायत तस्माद् वायुरजायत.. (४)
वायु उन से प्रकट हुई और वे वायु से प्रकट हुए. (४)
स वै दिवो ऽ जायत तस्माद् द्यौरध्यजायत.. (५)
आकाश उन से प्रकट हुआ और वे आकाश से प्रकट हुए. (५)
स वै दिग्भ्यो ऽ जायत तस्माद् दिशो ऽ जायन्त.. (६)
दिशाएं उन से प्रकट हुईं और वे दिशाओं से प्रकट हुए. (६)
स वै भूमेरजायत तस्माद् भूमिरजायत.. (७)
पृथ्वी उन से प्रकट हुईं और वे पृथ्वी से प्रकट हुए. (७)
स वा अग्नेरजायत तस्मादग्निरजायत.. (८)
अग्नि उन से प्रकट हुई और वे अग्नि से प्रकट हुए. (८)
स वा अद्भयो ऽ जायत तस्मादापो ऽ जायन्त.. (९)
जल उन से प्रकट हुआ और वे जल से प्रकट हुए. (९)
स वा ऋग्भ्यो ऽ जायत तस्मादृचो ऽ जायन्त.. (१०)
ऋचाएं उन से प्रकट हुईं और वे ऋचाओं से प्रकट हुए. (१०)
स वै यज्ञादजायत तस्माद् यज्ञो ऽ जायत.. (११)
यज्ञ उन से प्रकट हुआ और वे यज्ञ से प्रकट हुए. (११)
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स यज्ञस्तस्य यज्ञः स यज्ञस्य शिरस्कृतम्.. (१२)
यज्ञ उन का है और वे यज्ञ के हैं एवं यज्ञ के शीर्ष रूप हैं. (१२)
स स्तनयति स वि द्योतते स उ अश्मानमस्यति.. (१३)
वे ही दमकते और कड़कते हैं वे ही उपल गिराते है. (१३)
पापाय वा भद्राय वा पुरुषायसुराय वा.. (१४)
तुम पापियों को, कल्याणकारी पुरुष को, असुर को और ओषधियों को उत्पन्न करते हो.
(१४)
यद्वा कृणोष्वोषधीर्यद्वा वर्षसि भद्रया यद्वा जन्यमवीवृधः.. (१५)
कल्याणमयी वृष्टि के रूप में तुम रसते हो तथा उत्पन्न हुओं को बढ़ाते हो. (१५)
तावांस्ते मघवन् महिमोपो ते तन्वः शतम्.. (१६)
तुम मघवन अर्थात् इंद्र हो. तुम सैकड़ों देवों से युक्त हो और महिमा के द्वारा महान हो.
(१६)
उपो ते बध्वे बद्धानि यदि वासि न्यर्बुदम्.. (१७)
तुम सैकड़ों बांधे हुओं के बांधने वाले और अंत रहित हो. (१७)
सूक्त-८ देवता—अध्यात्म रोहित
भूयानिन्द्रो नमुराद् भूयानिन्द्रासि मृत्युभ्यः.. (१)
वे इंद्र नमुर से श्रेष्ठ हैं. हे इंद्र! तुम मृत्यु के कारणों से भी उत्कृष्ट हो. (१)
भूयानरात्याः शच्याः पतिस्त्वमिन्द्रासि विभूः प्रभूरिति त्वोपास्महे वयम्..
(२)
हे इंद्र! तुम शत्रुओं की अपेक्षा महान हो. तुम शक्ति के पति हो, तुम व्यापक और स्वामी
हो. इस प्रकार के तुम्हारी हम उपासना करते हैं. (२)
नमस्ते अस्तु पश्यत पश्य मा पश्यत.. (३)
हे दर्शनीय! तुम्हारे लिए नमस्कार है. हे शोभन! तुम मुझे देखो. (३)
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अन्नाद्येन यशसा तेजसा ब्राह्मणवर्चसेन.. (४)
तुम मुझे खानपान, यश, तेज और ब्रह्मवर्चस से युक्त करो. (४)
अम्भो अमो महः सह इति त्वोपास्महे वयम्.
नमस्ते अस्तु पश्यत पश्य मा पश्यत.
अन्नाद्येन यशसा तेजसा ब्राह्मणवर्चसेन.. (५)
तुम जल, पौरुष, महत्ता और बल स्वरूप हो. हम तुम्हारी उपासना करते हैं. हे दर्शनीय!
आप को नमस्कार है. हे शोभन! आप मुझे देखें. आप हमें अन्न, यश, तेज एवं ब्रह्मवर्चस से
युक्त करें. (५)
अम्भो अरुणं रजतं रजः सह इति त्वोपास्महे वयम्.
नमस्ते अस्तु पश्यत पश्य मा पश्यत.
अन्नाद्येन यशसा तेजसा ब्राह्मणवर्चसेन.. (६)
हे जल! आप अरुण एवं श्वेत वर्ण के हैं. हम आप को क्रियात्मक तथा शक्तिरूप समझ
कर आपकी उपासना करते हैं. आप हमें अन्न, यश, तेज तथा ब्रह्मवर्चस प्रदान करें. (६)
सूक्त-९ देवता—अध्यात्म रोहित
उरुः पृथुः सुभूर्भुव इति त्वोपास्महे वयम्.
नमस्ते अस्तु पश्यत पश्य मा पश्यत.
अन्नाद्येन यशसा तेजसा ब्राह्मणवर्चसेन.. (१)
तुम हमें अन्न, यश, तेज और ब्रह्मवर्चस प्रदान करो. तुम्हारी हम उपासना करते है. (१)
प्रथो वरो व्यचो लोक इति त्वोपास्महे वयम्.
नमस्ते अस्तु पश्यत पश्य मा पश्यत.
अन्नाद्येन यशसा तेजसा ब्राह्मणवर्चसेन.. (२)
आप महान, विस्तृत, उत्तम होने वाले एवं सामर्थ्य रूप हैं. हे शोभन! आप को नमस्ते,
हे दर्शनीय! आप मुझे देखें, आप हमें अन्न, यश तेज तथा ब्रह्मवर्चस प्रदान करें. हम आप की
उपासना करते हैं. (२)
भवद्वसुरिद्वद्धसुः संयद्वसुरायद्वसुरिति त्वोपास्महे वयम्.. (३)
हम तुम्हें भागमुक्त, संबंधों को एकत्र करने वाले, संबंधों को प्राप्त करने वाले मान कर
तुम्हारी उपासना करते हैं. (३)
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नमस्ते अस्तु पश्यत पश्य मा पश्यत.. (४)
हे दर्शनीय! तुम्हारे लिए नमस्कार है. तुम मुझे देखो. (४)
अन्नाद्येन यशसा तेजसा ब्राह्मणवर्चसेन.. (५)
तुम मुझे खानपान, यश, तेज और ब्रह्मवर्चस से युक्त करो. (५)

चौदहवां कांड
सूक्त-१ देवता—सोम
सत्येनोत्तभिता भूमिः सूर्येणोत्तभिता द्यौः.
ऋतेनादित्यास्तिष्ठन्ति दिवि सोमो अधि श्रितः.. (१)
सत्य से भूमि और सूर्य से आकाश स्थित है. सूर्य के बिना आकाश में चंद्रमा स्थित नहीं
होता. (१)
सोमेनादित्या बलिनः सोमेन पृथिवी मही.
अथो नक्षत्राणामेषामुपस्थे सोम आहितः.. (२)
सोम के कारण आदित्य बलशाली है तथा सोम के कारण पृथ्वी विशाल है. इसी कारण
यह सोम नक्षत्रों के समीप रहता है. (२)
सोमं मन्यते पपिवान् यत् संपिषन्त्योषधिम्.
सोमं यं ब्रह्माणो विदुर्न तस्याश्नाति पार्थिवः.. (३)
जो सोम रूप ओषधि को पीस कर पीते हैं, वे अग्नि को सोमपान करने वाला समझते
हैं. ज्ञानी जन जिस सोम को जानते हैं, उस का भक्षण साधारण प्राणी नहीं कर सकते. (३)
यत् त्वा सोम प्रपिबन्ति तत आ प्यायसे पुनः.
वायुः सोमस्य रक्षिता समानां मास आकृतिः.. (४)
हे सोम! पुरुष तुम्हें पीते हैं, फिर भी तुम वृद्धि को प्राप्त होते रहते हो. अनेक संवत्सरों
रूप से वायु इस सोम की रक्षा करता है. (४)
आच्छद्विधानैर्गुपितो बार्हतैः सोम रक्षितः.
ग्राव्णामिच्छृण्वन् तिष्ठसि न ते अश्नाति पार्थिवः.. (५)
हे सोम! बृहती छंदों वाले कर्मों से तथा आच्छद विधानों से तुम्हारी रक्षा होती है. सोम
कूटने के पाषाण से जो शब्द होता है, उस से तुम्हारी स्थिति है. पार्थिव जीव तुम्हारा सेवन
नहीं कर सके. (५)
चित्तिरा उपबर्हणं चक्षुरा अभ्यञ्जनम्.

द्यौर्भूमिः कोश आसीद् यदयात् सूर्या पतिम्.. (६)
जब सूर्या अपने पति के पास गई, तब ज्ञान उस का तकिया तथा चक्षु ही अंजन बने.
आकाश और पृथ्वी उस के कोष थे. (६)
रैभ्यासीदनुदेयी नाराशंसी न्योचनी.
सूर्याया भद्रमिद् वासो गाथैर्यात परिष्कृता.. (७)
वेदमंत्रों के साथ उस की पिता के घर से विदाई हुई. मंत्रों से ही पति गृह में उस का
स्वागत हुआ. मंत्रों के द्वारा पवित्र बना पति के घर का वस्त्र उस वधू का कल्याण करता है.
(७)
स्तोमा आसन् प्रतिधयः कुरीरं छन्द ओपशः.
सूर्याया अश्विना वराग्निरासीत् पुरोगवः.. (८)
पति के घर के यज्ञ वधू के लिए भोग तथा वेदमंत्र ही उस के आभूषण हुए थे. कुरीर
नाम का छंद उस के शरीर का आभूषण बना. दोनों अश्विनीकुमार सूर्य के घर में और अग्नि
देव उस के आगे चल रहे थे. (८)
सोमो वध्यूरभवदश्विनास्तामुभा वरा.
सूर्या यत् पतये शंसन्तीं मनसा सविताददात्.. (९)
सोम वधू की इच्छा करने वाले हुए. दोनों अश्विनीकुमार उन के साक्षी थे. तब सविता ने
मन से स्तुति करने वाली सूर्या को पति के हाथ में दान के रूप में दिया. (९)
मनो अस्या अन आसीद् द्यौरासीदुत च्छदिः.
शुक्रावनड्वाहावास्तां यदयात् सूर्या पतिम्.. (१०)
जब सूर्या अपने पति को प्राप्त हुई तब मन रथ बना तथा द्युलोक उस की छत हुआ.
उस रथ में दो बलवान बैल जुड़े हुए थे. (१०)
ऋक्सामाभ्यामभिहितौ गावौ ते सामनावैताम्.
श्रोत्रे ते चक्रे आस्तां दिवि पन्थाश्चराचरः.. (११)
ऋग्वेद और सामवेद से अभिमंत्रित तेरे दोनों बल शक्तिपूर्वक चलते हैं. दोनों कान तेरे
रथ के दो पहिए हैं. द्युलोक में तेरा चर और अचर मार्ग है. (११)
शुची ते चक्रे यात्या व्यानो अक्ष आहतः.
अनो मनस्मयं सूर्यारोहत् प्रयती पतिम्.. (१२)
तुझे ले जाने वाले रथ के दोनों पहिए शुद्ध हैं. उस रथ के अक्ष के स्थान पर व्यान
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नामक वायु रखी है. अपने पति के पास जाने वाली सूर्या इस मनोमय रथ पर चढ़ती है. (१२)
सूर्याया वहतुः प्रागात् सविता यमवासृजत्.
मघासु हन्यन्ते गावः फल्गुनीषु व्यु ह्यते.. (१३)
सविता देव ने जिस को भेजा था, सूर्या का वह दहेज आगे गया है. मघा नक्षत्र में गाएं
भेजी जाती हैं और फाल्गुनी नक्षत्रों में विवाह होता है. (१३)
यदश्विना पृच्छमानावयातं त्रिचक्रेण वहतुं सूर्यायाः.
क्वैकं चक्रं वामासीत् क्व देष्ट्राय तस्थथुः.. (१४)
हे अश्विनीकुमारो! जब तुम सूर्या का दहेज ले कर चले, उस समय तुम देवों को पूछते
हुए तीन पहियों वाले रथ के सहारे चले. तुम्हारा वह कर्म सब देवों को रुचिकर प्रतीत हुआ.
पूषा ने तुम्हें इस प्रकार स्वीकार किया जैसे पुत्र पिता को स्वीकार करता है. (१४)
यदयातं शुभस्पती वरेयं सूर्यामुप.
विश्वे देवा अनु तद् वामजानन् पुत्रः पितरमवृणीत पूषा.. (१५)
हे सूर्या! तेरे रथ के दोनों चक्रों को ज्ञानीजन ऋतु के अनुसार जानते हैं. तेरे रथ का जो
एक चक्र गुप्त है, उसे विशेष ज्ञानी ही जानते हैं. (१५)
द्वे ते चक्रे सूर्ये ब्रह्माण ऋतुथा विदुः.
अथैकं चक्रं यद् गुहा तदद्धातय इद् विदुः.. (१६)
हे शुभ करने वाले अश्विनीकुमारो! तुम दोनों जब वर के द्वारा पूछने योग्य सूर्य के समीप
गए, तुम्हारे उसे कर्म को सभी देवों ने सराहा. पूषा ने तुम्हें उसी प्रकार स्वीकार किया जिस
प्रकार पुत्र पिता को स्वीकार करता है. (१६)
अर्यमणं यजामहे सुबन्धुं पतिवेदनम्.
उर्वारुकमिव बन्धनात् प्रेतो मुञ्चामि नामुतः.. (१७)
अच्छे बंधुबांधवों से युक्त पति का ज्ञान देने वाले तथा श्रेष्ठ मनवाले हम तेरा सत्कार
करते हैं. खरबूजा जिस प्रकार अपनी बेल से छूट जाता है, उसी प्रकार मैं तुझे तेरे पितृकुल से
छुड़ाता हूं, मैं तुझे पतिकुल से अलग नहीं करता. (१७)
प्रेतो मुञ्चामि नामुतः सुबद्धाममुतस्करम्.
यथेयमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रा सुभगासति.. (१८)
मैं तुझे तेरे पितृकुल से मुक्त करता हूं, पतिकुल से नहीं. पतिकुल से तो मैं तुझे
भलीभांति बांधता हूं. हे दाता इंद्र! ऐसी कृपा करो कि यह वधू उत्तम पुत्रों वाली तथा

सौभाग्यशालिनी बने. (१८)
प्र त्वा मुञ्चामि वरुणस्य पाशाद् येन त्वाबध्नात् सविता सुशेवाः.
ऋतस्य योनौ सुकृतस्य लोके स्योनं ते अस्तु सहसंभलायै.. (१९)
मैं तुझे वरुण के उस शाप से मुक्त करता हूं, जिस से तुझे सेवा करने योग्य सविता ने
बांधा था. सदाचारी और उत्तम कर्म करने वाले पति के घर में तुझे सुख प्राप्त हो. (१९)
भगस्त्वेतो नयतु हस्तगृह्याश्विना त्वा प्र वहतां रथेन.
गृहान् गच्छ गृहपत्नी यथासो वशिनी त्वं विदथमा वदासि.. (२०)
भग नाम के देव तेरा हाथ पकड़ कर तुझे यहां से चलाएं. अश्विनीकुमार तुझे रथ में बैठा
कर तेरे पति के घर पहुंचाएं. तू अपने पति के घर को जा. वहां तू घर की स्वामिनी बन और
सब को वश में रख. पति के घर में तू उत्तम विवेक की बात कह. (२०)
इह प्रियं प्रजायै ते समृध्यतामस्मिन् गृहे गार्हपत्याय जागृहि.
एना पत्या तन्वं १ सं स्पृशस्वाथ जिर्विर्विदथमा वदासि.. (२१)
अपने पति के घर में तू गार्हपत्य अग्नि के प्रति सचेत रह. तेरी संतान के लिए वस्तुएं
बढ़ें. तू अपनी आयु पूर्ण होने तक बोलती रहे. (२१)
इहैव स्तं मा वि यौष्टं विश्वमायुर्व्य श्रुतम्.
क्रीडन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिर्मोदमानौ स्वस्तकौ.. (२२)
तुम दोनों पतिपत्नी सदा साथ रहो. तुम कभी एकदूसरे से अलग मत होओ. तुम दोनों
जीवन पर्यंत अनेक प्रकार के भोजन करो, अपने पुत्र आदि के साथ क्रीड़ा कर के तथा
कल्याण से मुक्त होते हुए सदा प्रसन्न रहो. (२२)
पूर्वापरं चरतो माययैतौ शिशू क्रीडन्तौ परि यातो ऽ र्णवम्.
विश्वान्यो भुवना विचष्ट ऋतूंरन्यो विदधज्जायसे नवः.. (२३)
ये सूर्य और चंद्रमा शिशु के समान क्रीड़ा करते हुए पूर्व से पश्चिम की ओर गमन करते
हैं. इन में से एक अर्थात् सूर्य लोकों को देखता हुआ ऋतुओं का निर्माण करता है तथा नवीन
रूप में प्रकट होता है. (२३)
नवोनवो भवसि जायमानो ऽ ह्नां केतुरुषसामेष्यग्रम्.
भागं देवेभ्यो वि दधास्यायन् प्र चन्द्रमस्तिरसे दीर्घमायुः.. (२४)
हे चंद्र! तुम मास में स्थित हो कर सदा नवीन रहते हो. तुम अपनी कलाओं को घटाते
और बढ़ाते हुए प्रतिपदा आदि तिथियों का निर्माण करते हो. तुम उषा काल में आगे आ कर
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देवों को उत्तम भाग देते हो तथा सभी को दीर्घ जीवन प्रदान करते हो. (२४)
परा देहि शामुल्यं ब्रह्मभ्यो वि भजा वसु.
कृत्यैषा पद्द्वती भूत्वा जाया विशते पतिम्.. (२५)
हे वर! तुम उत्तम वस्त्रदान करो तथा ब्राह्मणों को धन दो, जब यह कृत्या अर्थात्
विनाशक स्वभाव वाली स्त्री बन कर पति के समीप जाती है. (२५)
नीललोहितं भवति कृत्यासक्तिर्व्य ज्यते.
एधन्ते अस्या ज्ञातयः पतिर्बन्धेषु बध्यते.. (२६)
जब नीला और लाल वस्त्र होता है अथवा पुरुष क्रोधित होता है, तभी यह कृत्या अर्थात्
विनाशक स्वभाव वाली स्त्री बढ़ती है तथा इस की जाति के मनुष्यों की वृद्धि होती है. इसी के
कारण इस का पति बंधन में बंध जाता है. (२६)
अश्लीला तनूर्भवति रुशती पापयामुया.
पतिर्यद् वध्वो ३ वासः स्वमङ्गमभ्यूर्णुते.. (२७)
जब पत्नी के वस्त्र से पति अपना शरीर ढकता है, तब सुंदर शरीर वाला पति भी इस
पाप पूर्ण रीति के कारण शोभाहीन हो जाता है. (२७)
आशसनं विशसनमथो अधिविकर्तनम्.
सूर्यायाः पश्य रूपाणि तानि ब्रह्मोत शुम्भति.. (२८)
धारी वाले वस्त्रों में सिर के वस्त्र तथा सभी अंगों पर रहने वाले वस्त्रों में कृत्या अर्थात्
दुष्ट स्वभाव वाली स्त्री के रूपों को देखो. इन रूपों को ब्रह्मा ही तेजस्वी करता है. (२८)
तृष्टमेतत् कटुकमपाष्ठवद् विषवन्नैतदत्तवे.
सूर्या यो ब्रह्मा वेद स इद् वाधूयमर्हति.. (२९)
यह अन्न प्यास उत्पन्न करने वाला तथा कड़वा है. यह अन्न घृणित तथा विषैला है. यह
खाने योग्य नहीं है. जो ब्राह्मण सूर्या को इस प्रकार की शिक्षा देता है, वह निश्चित रूप से वधू
संबंधी वस्त्र लेने योग्य है. (२९)
स इत् तत् स्योनं हरति ब्रह्मा वासः सुमङ्गलम्.
प्रायश्चित्तिं यो अध्येति येन जाया न रिष्यति.. (३०)
जिस वस्त्र से प्रायश्चित्त होता है अर्थात् चित् की शुद्धि होती है तथा जिस के कारण
पत्नी मरण को प्राप्त नहीं होती है, उस कल्याणकारी वस्त्र को ब्रह्मा धारण करता है. (३०)
युवं भगं भरतं समृद्धमृतं वदन्तावृत्तोद्येषु.
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ब्रह्मणस्पते पतिमस्यै रोचय चारु संभलो वदतु वाचमेताम्.. (३१)
हे पति और पत्नी! तुम दोनों सत्य व्यवहारों के रहते हुए तथा सत्य भाषण करते हुए
समृद्धि वाला भाग्य प्राप्त करो. हे बृहस्पति! इस पत्नी के हृदय में पति के प्रति रुचि उत्पन्न
करो. पति इस के प्रति सुंदर वाणी बोले. (३१)
इहेदसाथ न परो गमाथेमं गावः प्रजया वर्धयाथ.
शुभं यतीरुसियाः सोमवर्चसो विश्वे देवाः क्रन्निह वो मनांसि.. (३२)
हे गायो! तुम यहां ही रहो. तुम यहां से दूर मत जाओ. तुम इसे उत्तम संतान के साथ
बढ़ाओ. हे गायो! तुम शुभ को प्राप्त कराने वाली तथा चंद्रमा की किरणों के समान प्रभा
वाली बनो. सभी देव तुम्हारे हृदयों को स्थिर बनाएं. (३२)
इमं गावः प्रजया सं विशाथायं देवानां न मिनाति भागम्.
अस्मै वः पूषा मरुतश्च सर्वे अस्मै वो धाता सविता सुवाति.. (३३)
हे गायो! तुम इस के घर में अपनी संतान के साथ प्रवेश करो. यह मनुष्य देवों के भाग
का लोप नहीं करता. विधाता और सविता तुम्हें दूसरे मनुष्य के लिए उत्पन्न करते हैं. (३३)
अनृक्षरा ऋजवः सन्तु पन्थानो येभिः सखायो यन्ति नो वरेयम्.
सं भगेन समर्येम्णा सं धाता सृजतु वर्चसा.. (३४)
हमारे वे सभी मार्ग कंटक रहित और सरल हैं, जिन से हमारे मित्र कन्या के घर तक
पहुंचते हैं. धाता, भग और अर्यमा देव इसे तेज से युक्त करें. (३४)
यच्च वर्चो अक्षेषु सुरायां च यदाहितम्.
यद् गोष्वश्विना वर्चस्तेनेमां वर्चसावतम्.. (३५)
हे अश्विनीकुमारो! जो तेज आंखों में होता है, जो संपत्ति में स्थान प्राप्त करता है तथा
जो तेज गायों में है, उसी तेज से इस की रक्षा करो. (३५)
येन महानघ्न्या जघनमश्विना येन वा सुरा.
येनाक्षा अभ्यषिच्यन्त तेनेमां वर्चसावतम्.. (३६)
हे अश्विनीकुमारो! जिस से बड़ी गौ का निचला दुग्धाशय का भाग, जिस से संपत्ति तथा
जिस से आंखें भरी रहती हैं, उस तेज से उस वधू की रक्षा करो. (३६)
यो अनिध्मो दीदयदप्स्व १ न्तर्यं विप्रास ईडते अध्वरेषु.
अपां नपान्मधुमतीरपो दा याभिरिन्द्रो वावृधे वीर्या वान्.. (३७)
जो जलों में बिना ईंधनों के चमकने वाला तेज है, जो यज्ञों के द्विजों का ज्ञान रूप तेज
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है, जो जलों में मधुरता और पुरुषों में वीर्य है; इस तेज, ज्ञान, माधुर्य और वीर्य से गृहस्थ युक्त
हों. इंद्र इन्हीं की अधिकता से सब से महान बने हैं. (३७)
इदमहं रुशन्तं ग्राहं तनूदूषिमपोहामि. यो भद्रो रोचनस्तमुदचामि.. (३८)
मैं शरीर में दोष उत्पन्न करने वाले विनाशक रोग को दूर करता हूं. जो कल्याणमय
तेजस्वी है, उसे अपने पास बुलाता हूं. (३८)
आस्यै ब्राह्मणा: स्नपनीर्हरन्त्वीरघ्नीरुदजन्त्वापः
अर्यम्णो अग्निं पर्येतु पूषन् प्रतीक्षन्ते श्वशुरो देवरश्च.. (३९)
ब्राह्मण इस के लिए स्नान का जल ले आएं. वे ऐसा जल लाएं जो वीर का नाश न करे.
वह अर्यमा देव की अग्नि की प्रदक्षिणा करे. हे पूषा देव! ससुर और देवर इस वधू की प्रतीक्षा
करें. (३९)
शं ते हिरण्यं शमु सन्त्वापः शं मेथिर्भवतु शं युगस्य तद्मँ.
शं त आपः शतपवित्रा भवन्तु शमु पत्या तन्वं १ सं स्पृशस्व.. (४०)
तेरे लिए सुवर्ण कल्याणकारी तथा जल सुख देने वाला हो. गाय बांधने का खंभा तुझे
सुख देने वाला हो. जुए का छेद तुझे सुखकर हो. सौ प्रकार से पवित्रता प्रदान करने वाला
जल तेरे लिए सुखकारी हो. तू सुखकारक एक रीति से अपने पति के साथ अपने शरीर का
स्पर्श कर. (४०)
खे रथस्य खे ऽ नसः खे युगस्य शतक्रतो.
अपालामिन्द्र त्रिष्पूत्वाकृणोः सूर्यत्वचम्.. (४१)
हे सौ यज्ञ करने वाले इंद्र देव! रथ के छिद्र में, गाड़ी के छिद्र तथा जुए के छिद्र में
अयोग्य रीति से पाली हुई युवती को तुम ने तीन बार पवित्र कर के सूर्य के समान तेजस्वी
त्वचा वाला बनाया है. (४१)
आशासाना सौमनसं प्रजां सौभाग्यं रयिम्.
पत्युरनुव्रता भूत्वा सं नह्यस्वामृताय कम्.. (४२)
उत्तम मन, संतान, सौभाग्य और धन की आशा करने वाली तू पति के अनुकूल
आचरण करने वाली हो कर सुखपूर्वक अमरत्व के हेतु सिद्ध हो. (४२)
यथा सिन्धुर्नदीनां साम्राज्यं सुषुवे वृषा.
एवा त्वं सम्राज्ञ्येधि पत्युरस्तं परेत्य.. (४३)
जिस प्रकार शक्तिशाली सागर नदियों पर शासन करता है, उसी प्रकार तू भी अपने
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पति के घर पहुंच कर सम्राज्ञी बनती हुई निवास कर. (४३)
सम्राज्ञ्येधि श्वशुरेषु सम्राज्ञ्युत देवृषु.
ननान्दुः सम्राज्ञ्येधि सम्राज्ञ्युत श्वश्र्वाः.. (४४)
तू ससुरों में स्वामिनी के समान, वरों में महारानी के समान आदर पा कर रह. तू ननद के
साथ रानी के समान तथा सास के साथ सम्राज्ञी के समान निवास कर. (४४)
या अकृन्तन्नवयन् याश्च तन्निरे या देवीरन्ताँ अभितो ऽ ददन्त.
तास्त्वा जरसे सं व्ययन्त्वायुष्मतीदं परि धत्स्व वासः.. (४५)
जिन देवियों ने स्वयं सूत काता है, जिन्होंने बुना है, जो ताना तानती हैं तथा चारों ओर
अंतिम भागों को ठीक रखती है, वे तुझे वृद्धावस्था तक रहने के लिए चुनें. तू दीर्घ आयु वाली
हो कर इन सब को धन्य बना. (४५)
जीवं रुदन्ति वि नयन्त्यध्वरं दीर्घामनु प्रसितिं दीध्युर्नरः.
वामं पितृभ्यो य इदं समीरिरे मयः पतिभ्यो जनये परिष्वजे.. (४६)
जीवित मनुष्य की विदाई पर लोग रोते हैं, यज्ञ को साथ ले जाते हैं तथा दीर्घ मार्ग का
विचार करते हैं. वे लोग अपने मातापिता के लिए यह सुंदर कार्य करते हैं. वे पत्नी को सुख
देने वाले हैं, जो स्त्री का आलिंगन करते हैं. (४६)
स्योनं ध्रुवं प्रजायै धारयामि ते ऽ श्मानं देव्याः पृथिव्या उपस्थे.
तमा तिष्ठानुमाद्या युवर्चा दीर्घं त आयुः सविता कृणोतु.. (४७)
मैं पृथ्वी माता के पास संतान के लिए सुख देने वाला तथा स्थिर पत्थर के समान
आधार बनाता हूं. तू उस पर खड़ा तथा आनंद का अनुभव कर. तुम उत्तम तेज वाला बनो.
सविता तुझे लंबी आयु प्रदान करे. (४७)
येनाग्निरस्या भूम्या हस्तं जग्राह दक्षिणम्.
तेन गृह्णामि ते हस्तं मा व्यथिष्ठा मया सह प्रजया च धनेन च.. (४८)
जिस कारण अग्नि ने इस भूमि का दायां हाथ ग्रहण किया है, उसी उद्देश्य से मैं तेरा
हाथ पकड़ता हूं. तू दुःख मत कर. तू मेरे साथ प्रजा अर्थात् संतान और धन के साथ निवास
कर. (४८)
देवस्ते सविता हस्तं गृह्णातु सोमो राजा सुप्रजसं कृणोतु.
अग्निः सुभगां जातवेदाः पत्ये पत्नीं जरदष्टि कृणोतु.. (४९)
सविता देव तेरा पाणिग्रहण करें. राजा लोग तुझे उत्तम संतान वाली बनाएं. जातवेद
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अग्नि पति के लिए सौभाग्य वाली स्त्री को वृद्धावस्था तक जीवित रहने वाली बनाएं. (४९)
गृह्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः.
भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः.. (५०)
मैं सौभाग्य के लिए तेरा हाथ पकड़ता हूं. तू मुझ पति के साथ वृद्धावस्था तक जीवित
रह. भग, अर्यमा, सविता तथा सभी देवों ने तुझ को मेरे हाथ में गृहस्थाश्रम चलने के लिए
दिया है. (५०)
भगस्ते हस्तमग्रहीत् सविता हस्तमग्रहीत्.
पत्नी त्वमसि धर्मणाहं गृहपतिस्तव.. (५१)
भग तथा सूर्य देव ने तेरा हाथ पकड़ा है, इसलिए तू धर्मपूर्वक मेरी पत्नी है और मैं तेरा
पति हूं. (५१)
ममेयमस्तु पोष्या मह्यं त्वादद् बृहस्पतिः.
मया पत्या प्रजावति सं जीव शरदः शतम्.. (५२)
बृहस्पति ने तुझे मेरे लिए दिया है. तू मुझ पति के साथ रहती हुई संतान वाली बन तथा
सौ वर्ष की आयु भोगती हुई मेरी पोष्या अर्थात् पुष्ट होने वाली और पोषण प्राप्त करने वाली
बन. (५२)
त्वष्टा वासो व्यदधाच्छुभे कं बृहस्पतेः प्रशिषा कवीनाम्.
तेनेमां नारीं सविता भगश्च सूर्यामिव परि धत्तां प्रजया.. (५३)
हे शुभे! इस कल्याणकारी वस्त्र को बृहस्पति की आज्ञा से त्वष्टा ने बनाया है. सविता
तथा भग देवता सूर्या के समान ही इस स्त्री को इस वस्त्र के द्वारा संतान आदि से संपन्न
बनाएं. (५३)
इन्द्राग्नी द्यावापृथिवी मातरिश्वा मित्रावरुणा भगो अश्विनोभा.
बृहस्पतिर्मरुतो ब्रह्म सोम इमां नारीं प्रजया वर्धयन्तु.. (५४)
दोनों अश्विनीकुमार, इंद्र और अग्नि, मित्र और वरुण, आकाश और पृथ्वी, बृहस्पति,
वायु, मरुद्गण, ब्रह्म तथा सोम देवता इस स्त्री को संतान से बढ़ाएं. (५४)
बृहस्पतिः प्रथमः सूर्यायाः शीर्षे केशाँ अकल्पयत्.
तेनेमामश्विना नारीं पत्ये सं शोभयामसि.. (५५)
हे अश्विनीकुमारो! बृहस्पति ने सूर्या के केशों का विन्यास किया था. उसी के अनुसार
हम वरभाव आदि के द्वारा इस स्त्री को पति के निमित्त सजाते हैं. (५५)

इदं तद्रूपं यदवस्त योषा जायां जिज्ञासे मनसा चरन्तीम्.
तामन्वर्तिष्ये सखिभिर्नवग्वैः क इमान् विद्वान् वि चचर्त पाशान्.. (५६)
इस रूप को योषा धारण करती है. मैं योषा को जानता हूं. मैं इस की नवीन चाल वाली
सखियों के अनुसार चलूंगा. यह केश विन्यास किस विद्वान् ने किया है. (५६)
अहं वि ष्यामि मयि रूपमस्या वेददित् पश्यन् मनसः कुलायम्.
न स्तेयमद्मि मनसोदमुच्ये स्वयं श्रथ्नानो वरुणस्य पाशान्.. (५७)
मैं इस के हृदय को जानता हुआ तथा उस के रूप को देखता हुआ अपने से आबद्ध
करता हूं. मैं चोरी का काम नहीं करता. मैं स्वयं मन लगा कर तेरे केशों को गूंथता हुआ तुझे
वरुण के पाशों से मुक्त करता हूं. (५७)
प्र त्वा मुञ्चामि वरुणस्य पाशाद् येन त्वाबध्नात् सविता सुशेवाः.
उरुं लोकं सुगमत्र पन्थां कृणोमि तुभ्यं सहपत्न्यै वधु.. (५८)
सविता ने तुझे वरुण के जिस पाश में बांधा है उस पाश से मैं तुझे छुड़ाता हूं. हे पत्नी!
मैं तेरे साथ लोक के इस विस्तृत मार्ग को सरल बनाता हूं. (५८)
उद्याच्छध्वमप रक्षो हनोथेमां नारीं सुकृते दधात.
धाता विपश्चित् पतिमस्यै विवेद भगो राजा पुर एतु प्रजानन्.. (५९)
जल प्रदान करो. राक्षसों को मारो. इस स्त्री को पुण्य में प्रतिष्ठित करो. धाता ने इसे पति
प्रदान किया है. विद्वान् भग इस के सामने हैं. (५९)
भगस्ततक्ष चतुरः पादान् भगस्ततक्ष चत्वार्युष्पलानि.
त्वष्टा पिपेष मध्यतो ऽ नु वर्ध्रानत्सा नो अस्तु सुमङ्गली.. (६०)
भग देवता ने इस के पैरों के लिए चार आभूषणों को तथा शरीर पर धारण करने योग्य
चार फूलों को बनाया है. उन्होंने कमर में पहनने योग्य करधनी बनाई है. इन आभूषणों को
धारण कर के यह स्त्री उत्तम मंगलमयी बने. (६०)
सुकिंशुकं वहतुं विश्वरूपं हिरण्यवर्णं सुवृतं सुचक्रम्.
आ रोह सूर्ये अमृतस्य लोकं स्योनं पतिभ्यो वहतुं कृणु त्वम्.. (६१)
हे सूर्या! तू उत्तम पुष्पों वाले, अनेक रूप वाले तथा चमकने वाले अनेक रंगों से
सुशोभित इस रथ पर आसीन हो. जो उत्तम वेष्टनों वाला तथा सुंदर पहियों वाला है. तू अमृत
के लोक पर पहुंच तथा विवाह के दहेज के रूप में प्राप्त इसे अपने पति के लिए सुखदायक
बना. (६१)
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