अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूर्य चामू रिशादसस्तद् देवाः प्रागकल्पयन्.. (१)
अभिषव अर्थात् सोमरस निचोड़ने का काम करने वाला, यज्ञकर्ता एवं सभ्य पुरुष
सूर्यलोक को भेद कर उस से ऊपर वाले लोक में जाता है. इस की कल्पना देवताओं ने पहले
कर ली थी. (१)
यो जाम्या अप्रथयस्तद् यत् सखायं दुधूर्षति.
ज्येष्ठो यदप्रचेतास्तदाहुरधरागिति.. (२)
जाम्य ने जिसे विस्तृत किया, वह मित्र को सुशोभित करता है. जो ज्येष्ठ प्रचेता है, उसे
लोग अधराक् कहते हैं. (२)
यद् भद्रस्य पुरुषस्य पुत्रो भवति दाधृषिः.
तद् विप्रो अब्रवीदु तद् गन्धर्वः काम्यं वचः.. (३)
जिस ब्राह्मण का पुत्र धारण करने वाला होता है. वह ब्राह्मण अभीष्ट वचन करने में
समर्थ है. ऐसा गंधर्व कहते हैं. (३)
यश्च पणि रघुरिजिष्ठ्यो यश्च देवां अदाशुरिः.
धीराणां शश्वतामहं तदपागिति शुश्रुम.. (४)
जो वणिक् देवताओं को हवि दान नहीं करता, वह शाश्वत वीरों का सेवक बनता है.
ऐसा सुना जाता है. (४)
ये च देवा अयजन्ताथो ये च पराददिः.
सूर्यो दिवमिव गत्वाय मघवा नो वि रप्शते.. (५)
जो स्तोता एवं परा गौ का दान करने वाले हैं, वे सूर्य के समान स्वर्ग में जाते हैं. (५)
योनाक्ताक्षो अनभ्यक्तो अमणि वो अहिरण्यरः.
अब्रह्मा ब्रह्मणः पुत्रस्तोता कल्पेषु संमिता.. (६)
जो भक्त नहीं है, जो आक्त अदक्ष नहीं है, जो मणिवान नहीं, जो हिरपाप नहीं है तथा
जो ब्राह्मण नहीं है; वह ब्रह्म पुत्र स्तोता कल्पों में मान्य है. (६)
य आक्ताक्षः सुभ्यक्तः सुमणिः सुहिरण्यवः.
सुब्रह्म ब्रह्मणः पुत्रस्तोता कल्पेषु संमिता.. (७)
जो आक्त अक्ष हैं, जो सुभक्त हैं, जो सुंदर मणि वाले हैं; ऐसे ब्रह्म पुत्र स्तोता हैं, यह
कल्पों अर्थात् कला ग्रंथों में माना गया है. (७)
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अप्रपाणा च वेशन्ता रेवां अप्रतिदिश्यः.
अयभ्या कन्या कल्याणी तोता कल्पेषु संमिता.. (८)
जो सरोवर जलपूर्ण नहीं हैं; जो धनी हैं, पर दानी नहीं हैं; जो कन्याएं गृहस्थ धर्म के
योग्य नहीं हैं, ऐसा कल्प ग्रंथों के अनुसार है. (८)
सुप्रपाणा च वेशन्ता रेवान्त्सुप्रतिदिश्यः.
सुयभ्या कन्या कल्याणी तोता कल्पेषु संमिता.. (९)
सरोवरों का पीने योग्य जल से भरा होना, धनी होने पर दानी होना तथा सुंदर कन्या
होने पर गृहस्थ धर्म के योग्य होना—ऐसा कल्प ग्रंथों के अनुसार है. (९)
परिवृक्ता च महिषी स्वस्त्या च युधिंगमः.
अनाशुरश्वायामी तोता कल्पेषु संमिता.. (१०)
हे इंद्र! तुम ने दाशराज युद्ध में मनुष्यों की खोज की थी. तुम सब के लिए रूपहीन बन
गए थे. तुम उन के साथ यज्ञ के लिए कल्पित हुए. (१०)
वावाता च महिषी स्वस्त्या च युधिंगमः.
श्वाशुरश्वायामी तोता कल्पेषु संमिता.. (११)
हे कामनाओं को पूरा करने वाले इंद्र! तुम सूर्य के रूप में अक्षु को झुकाते हो तथा
रोहिणी को विस्तृत मुख वाला बना देते हो. तुम ने वृत्र असुर का सिर काटा था. (११)
यदिन्द्रादो दाशराज्ञे मानुषं वि गाहथाः.
विरूपः सर्वस्मा आसीत् सह यक्षाय कल्पते.. (१२)
जिन्होंने पंख काट कर पर्वतों को स्थिर किया, जल का अवगाहन किया और वृत्र असुर
का वध किया, उन इंद्र को नमस्कार है. (१२)
त्वं वृषाक्षुं मघवन्नम्रं मर्याकरो रविः.
त्वं रौहिणं व्या स्यो वि वृत्रस्याभिनच्छिः.. (१३)
हरे रंग के घोड़ों पर बैठ कर तेज चाल से आते हुए इंद्र ने घोड़ों के विषय में उच्चैःश्रवा
से कहा, “हे अश्व! तेरा कल्याण हो. तू माला से सुशोभित इंद्र को अपनी पीठ पर चढ़ाता है.”
(१३)
यः पर्वतान् व्यदधाद् यो अपो व्यगाहथाः.
इन्द्रो यो वृत्रहान्महं तस्मादिन्द्र नमो ऽ स्तु ते.. (१४)
हे इंद्र! श्वेत अश्व तुम्हारे रथ की दाईं ओर जुड़ते हैं. उन अश्वों पर सवारी करने वाले तुम
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सूक्त-१२९ देवता—
देवों के द्वारा नमस्कार के योग्य तथा महिमाशाली हो. (१४)
सूक्त-१२९ देवता—
एता अश्वा आ प्लवन्ते.. (१)
यह घोड़ी अच्छी तरह उछलती है. (१)
प्रतीपं प्राति सुत्वनम्.. (२)
सुवा प्रतीप को संपन्न करता है. (२)
तासामेका हरिक्निका.. (३)
उन में एक हरिक्निका है. (३)
हरिक्निके किमिच्छसि.. (४)
हे हरिक्निका! तेरी क्या इच्छा है? (४)
साधुं पुत्रं हिरण्ययम्.. (५)
हे पुत्र! साधु को स्वर्ण दो. (५)
क्वाहतं परास्यः.. (६)
अवाहत अर्थात् घायल हुआ परास्य कहां है? (६)
यत्रामूस्तिस्रः शिंशपाः.. (७)
इस स्थान पर तीन शिंशिपा वृक्ष हैं. (७)
परि त्रयः.. (८)
सभी ओर तीन हैं. (८)
पृदाकवः.. (९)
बहुत से पृदाकू हैं. (९)
शृङ्गं धमन्त आसते.. (१०)
वे सींगों को नष्ट कर के बैठे हैं. (१०)
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अयन्महा ते अर्वाहः.. (११)
यह दिवस तुम्हारा महान अश्व है. (११)
स इच्छकं सघाघते.. (१२)
वह कामना करने वालों का समाधान कर्ता है. (१२)
सघाघते गोमीद्या गोगतीरिति.. (१३)
गोमीठ गायों की गति को एकत्र करता है. (१३)
पुमां कुस्ते निमिच्छसि.. (१४)
पुरुष और पृथ्वी तुझे प्रसन्न करते हैं. (१४)
पल्प बद्ध वयो इति.. (१५)
हे वृद्ध पल्प! यह तेरा अन्न है. (१५)
बद्ध वो अघा इति.. (१६)
बंधा होना पाप है. (१६)
अजागार केविका.. (१७)
सेविकाएं जागी नहीं हैं. (१७)
अश्वस्य वारो गोशपद्यके.. (१८)
अश्व के सवार हो कर गाय के खुर के गड्ढे में पड़े हैं. (१८)
श्येनीपती सा.. (१९)
यह श्येनीपति अर्थात् मादा बाज का स्वामी है. (१९)
अनामयोपजिह्विका.. (२०)
उप जिह्विका रोग रहित है. (२०)
सूक्त-१३०
को अर्य बहुलिमा इषूनि.. (१)
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बहुत से बाणों पर अधिकार करने वाला कौन है? (१)
को असिद्याः पयः.. (२)
रजोगुणी प्रकृति का पोषक कौन है? (२)
को अर्जुन्याः पयः.. (३)
अर्जुनी अर्थात् प्रकृति का पय अर्थात् दूध कौन सा है? (३)
कः काष्ण्याः पयः.. (४)
तमोगुणी प्रकृति का दूध क्या है. (४)
एतं पृच्छ कुहं पृच्छ.. (५)
यदि जानते नहीं हो तो पूछो. (५)
कुहाकं पक्वंकं पृच्छ.. (६)
कुशल एवं परिपक्व मनुष्य से पूछो. (६)
यवानो यतिस्वभिः कुभिः.. (७)
यत्नकर्ता समान पृथ्वियों से युक्त हुआ. (७)
अकुप्यन्तः कुपायकुः.. (८)
पृथ्वी का मर्म न जानने वाला क्रोधित हो गया. (८)
आमणको मणत्सकः.. (९)
आमणक मणत्सक है. (९)
देव त्वप्रतिसूर्य.. (१०)
हे सूर्य देव. (१०)
एनश्विपङ्क्तिका हविः.. (११)
यह पापनाशक हवि है. (११)
प्रदुद्दुदो मघाप्रति.. (१२)
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यह ऐश्वर्य के प्रति गति दे. (१२)
शृङ्ग उत्पन्न.. (१३)
सींग उत्पन्न हुआ. (१३)
मा त्वाभि सखा नो विदन्.. (१४)
मेरा मित्र मुझे और तुझे मिले. (१४)
वशायाः पुत्रमा यन्ति.. (१५)
वशा गौ के पुत्र को लाते हैं. (१५)
इरावेदुमयं दत्त.. (१६)
ज्ञानपूर्ण इरा उसे दो. (१६)
अथो इयन्नियन्निति.. (१७)
इस के पश्चात यह इस प्रकार का है. (१७)
अथो इयन्निति.. (१८)
फिर यह इस प्रकार है. (१८)
अथो श्वा अस्थिरो भवन्.. (१९)
इस के बाद श्वा अर्थात् कुत्ता अस्थिर हुआ. (१९)
उयं यकांशलोकका.. (२०)
कष्टकारी लोक वाला हो. (२०)
सूक्त-१३१
आमिनोनिति भद्यते.. (१)
यह परम तत्त्व कहा जाता है. (१)
तस्य अनु निभञ्जनम्.. (२)
उस के बाद विभाजन है. (२)
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वरुणो याति वस्वभिः.. (३)
वरुण रात्रि के साथ जाते हैं. (३)
शतं वा भारती शवः.. (४)
वाणी के सौ बल हैं. (४)
शतमाश्वा हिरण्ययाः.
शतं रथ्या हिरण्ययाः. शतं कुथा हिरण्ययाः. शतं निष्का हिरण्ययाः.. (५)
सुनहरे रंग के सौ घोड़े, सोने के बने सौ रथ, सोने के बने सौ गछे और सोने के सौ निष्क
अर्थात् सिक्के या आभूषण हैं. (५)
अहल कुश वर्त्तक.. (६)
उत्तम कुश वर्तमान है. (६)
शफेन इव ओहते.. (७)
वह शफ अर्थात् खुर से वहन करता है. (७)
आय वनेनती जनी.. (८)
आप झुकने वाली माता की तरह आएं. (८)
वनिष्ठा नाव गृह्यन्ति.. (९)
जल में स्थित नाव ग्रहण की जाती है. (९)
इदं मह्यं मद्दूरिति.. (१०)
यह मुझे प्रसन्न करता है. (१०)
ते वृक्षाः सह तिष्ठति.. (११)
वे वृक्षों के साथ बैठते हैं. (११)
पाक बलिः.. (१२)
बलि पक गई है. (१२)
शक बलिः.. (१३)
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बलि सशक्त है. (१३)
अश्वत्थ खदिरो धवः.. (१४)
पीपल, खैर, धव नाम के वृक्ष हैं. (१४)
अरदुपरम.. (१५)
विराम प्राप्त करो. (१५)
शयो हत इव.. (१६)
सोने वाला मृतक के समान होता है. (१६)
व्याप पूरुषः.. (१७)
पुरुष सर्वत्र व्याप्त है. (१७)
अदूहमित्यां पूषकम्.. (१८)
मैं पूषा का दोहन करता हूं. (१८)
अत्यर्धर्चं परस्वतः.. (१९)
अर्धर्च अर्थात् आधी ऋचा प्रवृत्त हो. (१९)
द्वौ हस्तिनो दृती.. (२०)
हाथियों के लिए दो मशकें बनाओ. (२०)
सूक्त-१३२ देवता—
आदलाबुकमेककम्.. (१)
एक अलाबुक अर्थात् रामतोरई है. (१)
अलाबुकं निखातकम्.. (२)
रामतोरई खोदी गई है. (२)
कर्करिको निखातकः.. (३)
ककड़ी को खोदा गया. (३)
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तद् वात उन्मथायति.. (४)
वह वायु को उखाड़ता है. (४)
कुलायं कृणवादिति.. (५)
घौंसला बनाता है. (५)
उग्रं वनिषदाततम्.. (६)
विस्तृत उग्र की सेवा करता है. (६)
न वनिषदनाततम्.. (७)
जिस का विस्तार नहीं है, उस की सेवा नहीं करता. (७)
क एषां कर्करी लिखत्.. (८)
इन में से कौन कर्करी को लिखता है. (८)
क एषां दुन्दुभिं हनत्.. (९)
इन में दुदुंभि राक्षस को किस ने मारा. (९)
यदीयं हनत् कथं हनत्.. (१०)
यदि यह वध करती है तो किस प्रकार करती है. (१०)
देवी हनत् कुहनत्.. (११)
देवी ने वध किया, बुरी तरह वध किया. (११)
पर्यागारं पुनः पुनः.. (१२)
निवास स्थान के चारों ओर बारबार शब्द करती है. (१२)
त्रीण्युष्ट्रस्य नामानि.. (१३)
ऊंट के तीन नाम हैं. (१३)
हिरण्यं इत्येके अब्रवीत्.. (१४)
कुछ लोगों ने हिरण्य, ऐसा कहा. (१४)
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सूक्त-१३३
द्वौ वा ये शिशवः.. (१५)
दो बालक हैं. (१५)
नीलशिखण्डवाहनः.. (१६)
नीलशिखंड उन का वाहन है. (१६)
सूक्त-१३३
विततौ किरणौ द्वौ तावा पिनष्टि पूरुषः.
न वै कुमारि तत् तथा यथा कुमारि मन्यसे.. (१)
हे कुमारी! तू उसे जैसा समझती है, वह वैसा नहीं है. दो किरणें फैली हुई हैं. पुरुष उन्हें
पीसने वाला है. (१)
मातुष्टे किरणौ द्वौ निवृत्तः पुरुषानृते.
न वै कुमारि तत् तथा यथा कुमारि मन्यसे.. (२)
हे पुरुष! तू जिस असत्य से मुक्त हुआ है, वह तेरी माता की दो किरणें हैं. हे कुमारी!
उसे तू जैसा समझती है, वह उस तरह का नहीं है. (२)
निगृह्य कर्णकौ द्वौ निरायच्छसि मध्यमे.
न वै कुमारि तत् तथा यथा कुमारि मन्यसे.. (३)
हे मध्यमा! तू दोनों कानों को पकड़ कर उसे नियुक्त करती है. तू उसे जैसा समझती है,
वह उस प्रकार का नहीं है. (३)
उत्तानायै शयानायै तिष्ठन्ती वाव गूहसि.
न वै कुमारि तत् तथा यथा कुमारि मन्यसे.. (४)
हे कुमारी! तू सोने जाती है. तू उसे जैसा समझती है, वह वैसा नहीं है. (४)
श्लक्ष्णायाँ श्लक्षिणकायां श्लक्ष्णमेवाव गूहसि.
न वै कुमारि तत् तथा यथा कुमारि मन्यसे.. (५)
हे कुमारी! तु आलिंगन में अपना शरीर छिपाती है. तू उसे जैसा समझती है वह उस
तरह का नहीं है. (५)
अवश्लक्ष्णमिव भ्रंशदन्तर्लोममति हृदे.
न वै कुमारि तत् तथा यथा कुमारि मन्यसे.. (६)
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सूक्त-१३४
आलिंगन के समय टूटे हुए दांत और रोम सरोवर में है. (६)
सूक्त-१३४
इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् अरालागुदभर्त्सथ.. (१)
यहां चारों दिशाओं से घिरे हुए को भयभीत करो. (१)
इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् वत्साः पुरुषन्त आसते.. (२)
यहां चारों दिशाओं से घिरे स्थान में बालक युवक बनने की इच्छा से बैठे हैं. (२)
इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् स्थालीपाको वि लीयते.. (३)
यहां चारों दिशाओं से घिरे हुए स्थान में स्थालीपाक अर्थात् बटलोई में पकाया हुआ
पदार्थ समाप्त हो जाता है. (३)
इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् स वै पृथु लीयते.. (४)
यहां चारों दिशाओं से घिरे स्थान में वह समाप्त हो जाता है. (४)
इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् आष्टे लाहणि लीशाथी.. (५)
यहां चारों दिशाओं से घिरे स्थान में युवती जीवन धारण करती है. (५)
इहेत्थ प्रागपागुदगधराग् अक्षिलेली पुच्छिलीयते (६)
चारों दिशाओं से घिरे इस स्थान में व्यावहारिक बुद्धि पूछी जाती है. (६)
सूक्त-१३५
भुगित्यभिगतः शलित्यपक्रान्तः फलित्यभिष्ठितः.
दुन्दुभिमाहननाभ्यां जरितरो ऽ थामो दैव.. (१)
खाने वाला चला गया, गतिशील जीव भाग गया है तथा उसका शरीर रखा है. हे स्तुति
करने वालो! तुम इस के बाद दुंदुभि जिन दो डंडों से बजाई जाती है, उस से खेलो. (१)
कोशबिले रजनि ग्रन्थेर्धानमुपानहि पादम्.
उत्तमां जनिमां जन्यानुत्तमां जनीन् वर्त्मन्यात्.. (२)
पैर के जूते में, धान की कुटिया में तथा उत्तम धरती से उत्पन्न पदार्थों को मार्ग में रखो.
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(२)
अलाबूनि पृषातकान्यश्वत्थपलाशम्.
पिपीलिकावटश्वसो विद्युत्स्वापर्णशफो गोशफो जरितरो ऽ थामो दैव..
(३)
हे स्तोता! पृषातक अर्थात् तुंबी, लौकी, पीपल, ढाक, बरगद, सुंदर पत्तों वाले, कटहल,
विद्युत और गाय के खुर के बाद शक्ति से क्रीड़ा कर. (३)
वी मे देवा अक्रंसताध्वर्यो क्षिप्रं प्रचर. सुसत्यमिद् गवामस्यसि प्रखुदसि..
(४)
हे अध्वर्यु जनो! उन प्रकाश वाले अथवा तेजस्वी देवों के सामने शीघ्र ही मंत्रों का
उच्चारण करो. गायों के लिए तुम सत्य रूप हो. (४)
पत्नी यदृश्यते पत्नी यक्ष्यमाणा जरितरो ऽ थामो दैव.
होता विष्टीमेन जरितरो ऽ थामो दैव.. (५)
पत्नी यज्ञ करती हुई दिखाई दे रही है. इस के बाद तुम भयों पर विजय प्राप्त करने की
इच्छा करना. (५)
आदित्या ह जरितरङ्गिरोभ्यो दक्षिणामनयन्.
तां ह जरितः प्रत्यायंस्तामु ह जरितः प्रत्यायन्.. (६)
हे स्तोता! उस को उन्होंने ग्रहण किया. उसे तुम ने भी ग्रहण किया. हम चेतन प्राणियों
को हानि पहुंचाने वालों को तथा यज्ञ न करने वालों को विशेष चेतन प्राणियों को प्रदान करते
हैं. (६)
तां ह जरितर्नः प्रत्यगृभ्णंस्तामु ह जरितर्नः प्रत्यगृभ्णः.
अहानेतरसं न वि चेतनानि यज्ञानेतरसं न पुरोगवामः.. (७)
तुम श्वेत तथा आशुपत्य वाली ऋचाओं से युवा अवस्था प्राप्त करते हो. यह शीघ्र पूर्ण
करता है. (७)
उत श्वेत आशुपत्वा उतो पद्याभिर्यविष्ठः. उतेमाशु मानं पिपर्ति.. (८)
हे स्तोता! तुम अंगिरागोत्रीय ऋषियों से दक्षिणा लाते थे. उसे वे लाए थे, वे उसे लाए थे.
(८)
आदित्या रुद्रा वसवस्त्वेनु त इदं राधः प्रति गृभ्णीह्याङ्गिरः.
इदं राधो विभु प्रभु इदं राधो बृहत् पृथु.. (९)
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हे अंगिरागोत्रीय ऋषियो! आदित्य, वसु और रुद्र ये सभी तुम पर कृपा करते हैं. तुम
इस धन को ग्रहण करो. यह धन विशाल, बृहत, व्यापक तथा प्रभुता से संपन्न है. (९)
देवा ददत्वासुरं तद् वो अस्तु सुचेतनम्.
युष्मां अस्तु दिवेदिवे प्रत्येव गृभायत.. (१०)
देवता तुझे प्राण, शक्ति एवं चेतना प्रदान करते हुए प्रत्येक अवसर पर प्राप्त होते हैं.
(१०)
त्वमिन्द्र शर्मरिणा हव्यं पारावतेभ्यः.
विप्राय स्तुवते वसुवनिं दुरश्रवसे वह.. (११)
हे इंद्र! तुम इहलोक और परलोक दोनों को पार करने वालों के लिए हवि वहन करो.
जिस स्तोता ब्राह्मण को अन्न प्राप्त करना कठिन है, उसे तुम बल प्रदान करो. (११)
त्वमिन्द्र कपोताय छिन्नपक्षाय वज्चते.
श्यामाकं पक्वं पीलु च वारस्मा अकृणोर्बहुः.. (१२)
हे इंद्र! पंख कटे हुए कबूतर के लिए तुम पके हुए पीलु, अखरोट तथा अधिक मात्रा में
जल प्रदान करो. (१२)
अरंगरो वावदीति त्रेधा बद्धो वरत्रया. इरामह प्रशंसत्यनिरामप सेधति..
(१३)
चमड़े की रस्सी से बंधा हुआ रहट बारबार शब्द करता हुआ ऐसे स्थान को सींचता है,
जहां फसलें हैं. (१३)
सूक्त-१३६
यदस्या अंहुभेद्याः कृधु स्थूलमुपातसत्.
मुष्काविदस्या एजतो गोशफे शकुलाविव.. (१)
पाप का विनाश करने वाली ओषधि को क्रोध हो गया है. इस के सूखे हुए शकुल गाय
के खुर के गड्ढे में भरे पानी में कांपते हैं. (१)
यथा स्थूलेन पससाणौ मुष्का उपावधीत्.
विष्वञ्चा वस्या वर्धतः सिकतास्वेव गर्दभौ.. (२)
जब स्थूल पसस् के द्वारा मनुष्यों में अणु का प्रहार किया गया, तब धूल में लोटने वाले
गधों के समान आच्छादनी अर्थात् छप्पर में मुश्क बढ़ते हैं. (२)
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यदल्पिकास्वल्पिका कर्कन्धूकेवषद्यते.
वासन्तिकमिव तेजनं यन्त्यवाताय वित्पति.. (३)
जो कर्कन्धू अर्थात् बेरी के समान घर को नष्ट करने वाले तथा अल्प से भी अल्प कण
प्राप्त होते हैं, तब वासंतिक तेज आधान के निमित्त उस में गमन करते हैं. (३)
यद् देवासो ललामगुं प्रविष्टिमिनमाविषुः.
सकुला देदिश्यते नारी सत्यस्याक्षिभुवो यथा.. (४)
जब सुंदर गौ में प्रविष्ट देवता हर्षित होते हैं, तब नारी आंखों देखी के समान सत्य से
युक्त हो जाती है. (४)
महानग्न्य तृप्रद्धि मोक्रददस्थानासरन्.
शक्तिकानना स्वचमशकं सक्तु पद्यम.. (५)
महान अग्नि ऊपर खड़े हुए जनों पर आक्रमण न करते हुए तृप्ति प्राप्त करते हैं. हम
तेजस्वी जनों को शक्ति प्राप्त हो. (५)
महानग्न्यु लूखलमतिक्रामन्त्यब्रवीत्.
यथा तव वनस्पते निरघ्नन्ति तथैवति.. (६)
महान अग्नि उलूखल को लांघते हुए कहने लगे—हे बृहस्पति! लोग जिस प्रकार तुझे
कूटते हैं, वैसा होना चाहिए. (६)
महानग्न्युप ब्रूते भ्रष्टो ऽ थाप्यभूभुवः.
तथैव ते वनस्पते पिप्पति तथैवति.. (७)
महान अग्नि ने कहा—तू मिट कर भी बारबार उत्पन्न होती है. हे वनस्पति! जिस भांति
तू पूर्ण होती है, वैसा ही होना चाहिए. (७)
महानग्न्युप ब्रूते भ्रष्टोऽथाप्यभूभुवः.
यथा वयो विदाह्य स्वर्गे नमवदह्यते.. (८)
महान अग्नि ने कहा—तू नष्ट हो कर भी उत्पन्न हो जाती है. जीर्ण अवस्था में होने पर
भी स्वर्ग में तेरा दोहन हवि के समान किया जाता है. (८)
महानग्न्युप ब्रूते स्वसावेशितं पसः.
इत्थं फलस्य वृक्षस्य शूर्पे शूर्पं भजेमहि.. (९)
महान अग्नि का कथन है कि यह पापनाशक ओषधि भलीभांति उत्तेजित की गई है.
हम फल वाले वृक्ष के सूपों में सूप को प्रविष्ट करते हैं. (९)
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महानग्नी कृकवाकं शम्यया परि धावति.
अयं न विद्म यो मृगः शीर्ष्णा हरित धाणिकाम्.. (१०)
महान् अग्नि कृक शब्द करने वाले पर दौड़ते हैं. हमें यह ज्ञात है कि वे मृग के समान
शीश के द्वारा मौन अर्पण का हरण करते हैं. (१०)
महानग्नी महानग्नं धावन्तमनु धावति.
इमास्तदस्य गा रक्ष यभ मामद्ध्रौदनम्.. (११)
महान अग्नि महाअग्नि के पीछे दौड़ते हैं. वे इस की इंद्रियों के रक्षक हो कर ओदन
अर्थात् भात को खाते हैं. (११)
सुदेवस्त्वा महानग्नीर्बबाधते महतः साधु खोदनम्.
कुसं पीवरो नवत्.. (१२)
महान अग्नि उत्पीड़न करने वाले हैं तथा बड़ेबड़ों को कुरेदते हैं. ये स्थूल और कृश
सभी को नष्ट कर देते हैं. (१२)
वशा दग्धामिमाङ्गुलिं प्रसृजतो s ग्रतं परे.
महान् वै भद्रो यभ मामद्ध्रौदनम्.. (१३)
वशा नाम की गाय ने इस जली हुई उंगली की रचना की. अन्य जन उग्र की रचना करते
हैं. यह ओदन अर्थात् भात अत्यधिक कल्याणमय है. इस ओदन अर्थात् भात का भक्षण
करो. (१३)
विदेवस्त्वा महानग्नीर्विबाधते महतः साधु खोदनम्.
कुमारिका पिङ्ग्लिका कार्द भस्मा कु धावति.. (१४)
ये महान अग्नि विशेष पीड़ा देने वाले हैं. ये बड़ों को खोद डालते हैं. पिंगल अर्थात् पीले
रंग की यह कुमारी कार्य करने के बाद भाग जाती हैं. (१४)
महान् वै भद्रो बिल्वो महान् भद्र उदुम्बरः.
महाँ अभिक्त बाधते महतः साधु खोदनम्.. (१५)
बिल्व अर्थात् बेल और उदुंबुर अर्थात् गूलर—ये दोनों ही वृक्ष बड़े भले हैं. जो महान
इन्हें सभी ओर से पीड़ित करता है, वह बड़ों को कुरेदता है. (१५)
यः कुमारी पिङ्ग्लिका वसन्तं पीवरी लभेत्.
तैलकुण्डमिमाङ्गुष्ठं रोदन्तं शुदमुद्धरेत्.. (१६)
पिंगलिका अर्थात् पीले रंग की कुमारी यदि वसंत को प्राप्त करे तो तैलकुंड में से अंगूठे
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सूक्त-१३७ देवता—अलक्ष्मी नाशन
के द्वारा कुरेदती हुई इस का उद्धार करे. (१६)
सूक्त-१३७ देवता—अलक्ष्मी नाशन
यद्ध प्राचीरजगन्तोरो मण्डूरधाणिकी:.
हता इन्द्रस्य शत्रवः सर्वे बुद्बुदयाशवः.. (१)
जब मंडूधाणकी प्राची दिशा हृदय प्रदेश को प्राप्त हुई, तब इंद्र के सभी शत्रु नष्ट हो गए.
(१)
कपुन्नरः कपृथमुद दधातन चोदयत खुदत वाजसातये.
निष्टिग्र्यः पुत्रमा च्यावयोतय इन्द्रं सबाध इह सोमपीतये.. (२)
हे कर्मशील मनुष्यो! तुम सुखद इंद्र को हृदय में ग्रहण करो, तुम अन्न प्राप्ति के लिए
प्रेरणा करो. तुम अपनी रक्षा के लिए पुत्र को उत्पन्न करो तथा सोमरस पीने के लिए इंद्र का
आह्वान करो. (२)
दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः.
सुरभि नो मुखा करत् प्र ण आयूंषि तारिषत्.. (३)
इंद्र की सवारी के लिए मैं वेगवान अर्थात् तेज दौड़ने वाले घोड़े का पूजन कर चुका हूं.
वे इंद्र हमें सुरभि अर्थात् गाय का स्वामी बनाएं तथा हमें श्रेष्ठ बनाते हुए हमारा जीवन उत्तम
बनाएं. (३)
सुतासो मधुमत्तमाः सोमा इन्द्राय मन्दिनः.
पवित्रवन्तो अक्षरन् देवान् गच्छन्तु वो मदाः.. (४)
हर्ष प्रदान करने वाला सोमरस इंद्र के लिए तैयार किया जा चुका है. सोमरस छन्ने
अर्थात् छानने के लिए प्रयोग किए गए कपड़े से टपक रहा है. हे सोम! तुम्हारी शक्ति
देवताओं को हर्षित करे. (४)
इन्दुरिन्द्राय पवत इति देवासो अब्रुवन्.
वाचस्पतिर्मखस्यते विश्वस्येशान ओजसा.. (५)
इंद्र के लिए सोमरस का शोधन किया जा चुका है. संसार के स्वामी वाचस्पति अपने
ओज से प्रशंसित होते हैं. (५)
सहस्रधारः पवते समुद्रो वाचमीङ्खयः.
सोमः पती रयीणां सखेन्द्रस्य दिवेदिवे.. (६)
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हजारों धाराओं वाला गमनशील सोमरस तैयार किया जा रहा है. धन का स्वामी यह
सोमरस प्रत्येक स्तोत्र में इंद्र का सखा होता है. (६)
अव द्रप्सो अंशुमतीमतिष्ठदियानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः.
आवत् तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नेहितीर्नृमणा अधत्त.. (७)
दस हजार किरणों से आकर्षित करने वाले सूर्य पृथ्वी पर आ कर अपने ओज से खड़े
हुए तथा अपनी शक्ति से पृथ्वी की हिंसा करने लगे. तब इंद्र ने अपने बल से सूर्य को हटा कर
पृथ्वी की रक्षा की तथा अपनी शक्ति से ही इंद्र ने पृथ्वी पर जल वाली शक्तियों की स्थापना
की. (७)
द्रप्समपश्यं विषुणे चरन्तमुपह्वरे नद्यो अंशुमत्याः.
नभो न कृष्णमवतस्थिवांसमिष्यामि वो वृषणो युध्यताजौ.. (८)
विषम और विचरण करने वाले शुकु अर्थात् काले असुर को अंशुमती के पास घूमते हुए
देखा है. वे भी सूर्य के समान ही आकाश में निवास करते हैं. मैं उन का आश्रित हूं. कामनाओं
की वर्षा करने वाले इंद्र युद्ध में तुम्हारा साथ दें. (८)
अध द्रप्सो अंशुमत्या उपस्थे ऽ धारयत् तन्वं तित्त्विषाणः.
विशो अदेवीरभ्या ३ चरन्तीर्बृहस्पतिना युजेन्द्रः ससाहे.. (९)
इस के बाद शुकु ने अपने शरीर को सूक्ष्म बना कर अंशुमती की गोद में रखा. बृहस्पति
की सहायता से इंद्र ने देवों की सत्ता स्वीकार न करने वाली प्रजाओं का वध कर दिया. (९)
त्वं ह त्यत् सप्तभ्यो जायमानो ऽ शत्रुभ्यो अभवः शत्रुरिन्द्र.
गूह्ळे द्यावापृथिवी अन्वविन्दो विभुमद्भ्यो भुवनेभ्यो रणं धाः.. (१०)
हे इंद्र! तुम ने आकाश और पृथ्वी का स्पर्श किया तथा उन्हें प्राप्त कर लिया. सात मित्रों
से उत्पन्न हुए तुम बाद में उन के शत्रु बन जाते हो. तुम ने विस्तृत भुवनों से युद्ध किया. (१०)
त्वं ह त्यदप्रतिमानमोजो वज्रेण वज्रिन् धृषितो जघन्थ.
त्वं शुष्णस्यावातिरो वधैस्त्रैस्त्वं गा इन्द्र शच्येदाविन्दः.. (११)
हे वज्रधारी इंद्र! तुम ने अपने वज्र से बल नाम के असुर का वध किया. तुम ने अपने
हिंसात्मक साधनों से उसे दूर कर दिया और गाएं प्राप्त कर लीं. (११)
तमिन्द्रं वाजयामसि महे वृत्राय हन्तवे. स वृषा वृषभो भुवत्.. (१२)
विशाल शरीर वाले वृत्र असुर को नष्ट करने के कारण हम इंद्र की प्रशंसा करते हैं.
कामनाओं की वर्षा करने वाले इंद्र सर्वश्रेष्ठ बनें. (१२)
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इन्द्रः स दामने कृत ओजिष्ठः स मदे हितः.
द्युम्नी श्लोकी स सोम्यः.. (१३)
पापियों को वश में करने के लिए तुम ने शक्तिशाली का रस्सी के समान प्रयोग किया. वे
प्रसन्नता देने वाले यज्ञ में प्रतिष्ठित होते हैं. वे इंद्र सभ्य, प्रसिद्ध और तेजस्वी हैं. (१३)
गिरा वज्रो न संभृतः सबलो अनपच्युतः. ववक्ष ऋष्वो अस्तुतः.. (१४)
इंद्र पर्वत से प्राप्य वज्र के समान शक्तिशाली हैं. वे कभी पतित नहीं होते हैं. वे श्रेष्ठ
यजमानों के लिए शत्रु का धन प्राप्त करते हैं. (१४)
सूक्त-१३८ देवता—इंद्र
महाँ इन्द्रो य ओजसा पर्जन्यो वृष्टिमाँ इव. स्तोमैर्वत्सस्य वावृधे.. (१)
इंद्र महान हैं. वे वर्षा के जल से पूर्ण मेघ के समान वत्स के स्तोम अर्थात् मंत्र समूह
द्वारा वृद्धि प्राप्त करते हैं. (१)
प्रजामृतस्य पिप्रतः प्र यद् भरन्त वह्नयः. विप्रा ऋतस्य वाहसा.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम उस प्रजा का पालन करो जो सत्य को धारण करती है. अग्नियां
उस प्रजा को पुष्ट करती हैं तथा ब्राह्मण यज्ञ का वहन करने वाले अग्नि देव के द्वारा उस प्रजा
की रक्षा करते हैं. (२)
कण्वा इन्द्रं यदक्रत स्तोमैर्यज्ञस्य साधनम्. जामि ब्रुवत आयुधम्.. (३)
कण्व ने अपने स्तोमों अर्थात् मंत्रों के समूहों के द्वारा इंद्र के यज्ञ को पूर्ण किया. जामि
उसी को आयुध कहती है. (३)
सूक्त-१३९ देवता—अश्विनीकुमार
आ नूनमश्विना युवं वत्सस्य गन्तमवसे.
प्रास्मै यच्छतमवृकं पृथु च्छर्दिर्युयुतं या अरातयः.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! इस के बालक के घूमने के हेतु एवं रक्षा के लिए इसे ऐसा घर दो,
जहां सियार न पहुंच सके. इस के शत्रुओं को उस से दूर करो. (१)
यदन्तरिक्षे यद् दिवि यत् पञ्च मानुषाँ अनु. नृम्णं तद् धत्तमश्विना.. (२)
हे अश्विनीकुमारो अंतरिक्ष तथा स्वर्ग में जो धन है तथा निषाद नाम की पांचवीं जाति
दासों के पास जो धन है, उसे हमें दे दो. (२)
ये वां दंसांस्यश्विना विप्रासः परिमामृशुः. एवेत् काण्वस्य बोधतम्.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! ब्राह्मण तुम्हारे कर्मों का वर्णन करते हैं. वे सब कर्म तुम महर्षि कण्व
के द्वारा किए हुए समझो. (३)
अयं वां घर्मो अश्विना स्तोमेन परि षिच्यते.
अयं सोमो मधुमान् वाजिनीवसू येन वृत्रं चिकेतथः.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! यह हवि धन सहित है. यह स्तोम अर्थात् मंत्र समूह धर्म के द्वारा
संचित है. यह सोम मधुरता से पूर्ण है. तुम इसी सोमरस के द्वारा आवश्यक शत्रु को जानो.
(४)
यदप्सु यद् वनस्पतौ यदोषधीषु पुरुदंससा कृतम्. तेन माविष्टमश्विना..
(५)
हे अश्विनीकुमारो! जल में, ओषधियों तथा वनस्पतियों में जो कर्म छिपे हुए हैं, उन से
मुझे संपन्न बनाओ. (५)
सूक्त-१४० देवता—अश्विनीकुमार
यन्नासत्या भुरण्यथो यद् वा देव भिषज्यथः.
अयं वां वत्सो मतिभिर्न विन्धते हविष्मन्तं हि गच्छथः.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! तुम शीघ्र गमन करने वाले तथा चिकित्सा करने में कुशल हो. तुम्हारा
यह वत्स मोतियों के द्वारा नहीं बांधा जाता है. तुम उस के समीप जाते हो, जिस के पास हवि
है. (१)
आ नूनमश्विनोर्ऋषि स्तोमं चिकेत वामया.
आ सोमं मधुमत्तमं घर्मं सिञ्चादथर्वणि.. (२)
उपासना के योग्य अपनी बुद्धियों के द्वारा ऋषियों ने अश्विनी कुमारों के स्तोत्र को जान
लिया. इस लिए तुम मधुरता वाले सोमरस को अथर्व से सिंचित करो. (२)
आ नूनं रघुवर्तनिं रथं तिष्ठाथो अश्विना.
आ वां स्तोमा इमे मम नभो न चुच्यवीरत.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम तेज चलने वाले रथ पर बैठने वाले हो. तुम्हारे लिए जो स्तुति की
जाती है, वह आकाश के समान स्थिर रहे. (३)
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यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में लिप्यंतरण दिया गया है:
यदद्य वां नासत्योक्थैराचुच्युवीमहि.
यद् वा वाणीभिरविनेवेत् काण्वस्य बोधतम्.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! हम उक्थों अर्थात् मंत्र समूहों के द्वारा तुम्हारा आश्रय लेते हैं. यह
कण्व ऋषि की कृपा है कि हम वाणी के द्वारा तुम्हारी सेवा कर रहे हैं. (४)
यद् वां कक्षीवाँ उत यद् व्यश्व ऋषीर्यद् वां दीर्घतमा जुहाव.
पृथी यद् वां वैन्यः सादनेष्वेवेदतो अश्विना चेतयेथाम्.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! कक्षीवान, दीर्घतमा और व्यश्व ऋषियों ने तुम्हें आहुति दी है. वेन का
पुत्र पृथु तुम्हारे सब सदनों में है. इसलिए तुम चैतन्य हो जाओ. (५)
सूक्त-१४१ देवता—इंद्र
यातं छर्दिष्पा उत नः परस्पा भूतं जगत्या उत नस्तनूपा.
वर्तिस्तोकाय तनयाय यातं.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! तुम हमारे रक्षक के रूप में आओ. तुम हमारे घर की रक्षा करते हुए
हमें मिलो. तुम हमारे पुत्र, पौत्र आदि के रूप में हमें प्राप्त होओ तथा संसार की रक्षा करने
वाले हो कर हम से मिलो. (१)
यदिन्द्रेण सरथं याथो अश्विना यद् वा वायुना भवथः समोकसा.
यदादित्येभिर्ऋभुभिः सजोषसा यद् वा विष्णोर्विक्रमणेषु तिष्ठथः.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम इंद्र के रथ में उन के साथ बैठ कर चलते हो. तुम वायु के साथ
चलने वाले, आदित्य और ऋभुओं, स्नेही तथा विष्णु के विक्रमणों अर्थात् डगों से भी युक्त
हो. (२)
यदद्याश्विनावहं हुवेय वाजसातये.
यत् पृत्सु तुर्वणे सहस्तच्छ्रेष्ठमश्विनोरवः.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम यजमानों को शीघ्रता से प्राप्त होते ही युद्ध में अपनी उत्तम रक्षण
शक्ति से शत्रु का वध करते हो. मैं तुम्हें अन्न प्राप्त करने के लिए बुलाता हूं. (३)
आ नूनं यात्माश्विनेमा हव्यानि वां हिता.
इमे सोमासो अधि तुर्वशे यदाविमे कण्वेषु वामथ.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! यह हव्य तुम्हारे लिए हितकारी है. यह सोमरस तुवर्श, यदु तथा कण्व
ऋषि का है. तुम यहां अवश्य आगमन करो. (४)