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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-५ देवता—सोम आयमगन् पर्णमणिर्बली बलेन प्रमृणन्त्सपत्नान्. ओजो देवानां पय ओषधीनां वर्चसा मा जिन्वत्वप्रयावन्.. (१) अपनी शक्ति की अधिकता से शत्रुओं को नष्ट करने वाली तथा सभी ओषधियों की सार रूप तथा श्रेष्ठ फल देने वाली यह पर्णमणि मुझे प्राप्त हो. हे देवो! ओज रूप यह पर्णमणि मुझे अपने तेज से तेजस्वी बनाए. (१) मयि क्षत्रं पर्णमणे मयि धारयताद् रयिम्. अहं राष्ट्स्याभीवर्गे निजो भूयासमुत्तमः.. (२) हे पलाश से निर्मित पर्णमणि! मुझ मणि धारण कर्ता को बल एवं धन प्रदान करो. तुम्हें धारण करने के कारण मैं अपने राज्य को स्वाधीन करने में किसी की सहायता न लेने से सर्वोत्तम बनूं. (२) यं निदधुर्वंनस्पतौ गुह्यं देवाः प्रियं मणिम्. तमस्मभ्यं सहायुषा देवा ददतु भर्तवे.. (३) इंद्र आदि देवों ने मनचाहा फल देने के कारण प्रिय इस मणि को पलाश वृक्ष में गोपनीय रूप से छिपा कर रखा था. देवगण मेरी आयु वृद्धि करें और भरणपोषण के निमित्त मुझे वह पर्णमणि प्रदान करें. (३) सोमस्य पर्णः सह उग्रमागन्निन्द्रेण दत्तो वरुणेन शिष्टः. तं प्रियासं बहु रोचमानो दीर्घायुत्वाय शतशारदाय.. (४) दूसरों को पराजित करने की शक्ति देने वाली सोम मणि मुझे प्राप्त हो. इंद्र द्वारा दी हुई और वरुण द्वारा अनुमत उस प्रिय मणि को मैं सौ वर्ष की दीर्घ आयु पाने के लिए धारण करूं. (४) आ मारुक्षत् पर्णमणिर्मह्या अरिष्टतातये. यथाहमुत्तरो ऽ सान्यर्यम्ण उत संविदः.. (५) यह पर्णमणि मेरा कल्याण करने के लिए मुझे चिरकाल तक प्राप्त हो. यह मणि धारण कर के मैं अर्यमा की कृपा से शत्रु नाश में समर्थ, अधिक बली एवं उत्तम बन जाऊं. (५) ये धीवानो रथकाराः कर्म्मारा ये मनीषिणः. उपस्तीन् पर्ण मह्यं त्वं सर्वान् कृण्वभितो जनान्.. (६) हे पर्णमणि! तुम सभी मछली पकड़ने वाले, रथकार अर्थात् बढ़ई, लुहार और ebook converter DEMO Watermarks*

बुद्धिजीवी जनों को मेरी सेवा करने के लिए मेरे चारों ओर उपस्थित करो. (६) ये राजानो राजकृतः सूता ग्रामण्यश्च ये. उपस्तीन् पर्ण मह्यं त्वं सर्वान् कृण्वभितो जनान्.. (७) हे पर्णमणि! जो राजगण, राजा बनाने में समर्थ सचिवगण, रथ हांकने वाले सूत और गांव के मुखिया हैं, उन सब को तू मेरी सेवा करने के लिए मेरे चारों ओर उपस्थित कर. (७) पर्णो ऽ सि तनूपानः सयोनिर्वीरो वीरेण मया. संवत्सरस्य तेजसा तेन बध्नामि त्वा मणे.. (८) हे पर्णमणि! सोमलता के पत्तों से निर्मित होने के कारण तुम देह की रक्षा करने वाली हो. तुम शक्तिशालीनी और मुझ वीर के समान जन्म वाली हो. सूर्य के समान तेजस्विनी तुझ पर्णमणि को मैं तेज प्राप्ति के लिए बांधना चाहता हूं. (८) सूक्त-६ देवता—अश्वत्थ पुमान् पुंसः परिजातो ऽ श्वत्थः खदिरादधि. स हन्तु शत्रून् मामकान् यानहं द्वेष्मि ये च माम्.. (१) अत्यंत शक्ति संपन्न वृक्ष पीपल से तथा गायत्री के सार से उत्पन्न सहयोग से निर्मित अश्वत्थ मणि धारण करने पर मेरे उन शत्रुओं का विनाश करें, जिन से मैं द्वेष करता हूं और जो मुझ से द्वेष करते हैं. (१) तानश्वत्थ निः शृणीहि शत्रून् वैबाधदोधतः. इन्द्रेण वृत्रघ्ना मेंदी मित्रेण वरुणेन च.. (२) हे खदिर वृक्ष में उत्पन्न पीपल से निर्मित अश्वत्थमणि! तू मेरे शत्रुओं का पूर्ण रूप से नाश कर दे. वृत्र का नाश करने वाले इंद्र और वरुण के साथ तेरी मित्रता है. (२) यथाश्वत्थ निरभनो ऽ न्तर्महत्यर्णवे. एवा तान्तसर्वान्निर्भङ्ग्धि यानहं द्वेष्मि ये च माम्.. (३) हे मणि के उपादानकारण अश्वत्थ! तुम जिस प्रकार, खदिर वृक्ष के कोटर को भेद कर उत्पन्न हुए हो, उसी प्रकार मेरे सभी शत्रुओं का विनाश कर दो. (३) यः सहमानश्चरसि सासहान इव ऋषभः. तेनाश्वत्थ त्वया वयं सपत्नान्त्सहिक्षीमहि.. (४) पीपल उसी प्रकार दूसरे वृक्षों को पराजित करता हुआ बढ़ता है, जिस प्रकार बैल अपने ebook converter DEMO Watermarks*

दर्प से अन्य पशुओं को पराजित करता है. हे पीपल! तुम से निर्मित मणि को धारण करने वाले हम शत्रुओं का नाश करें. (४) सिनात्वेनान् निर्ऋतिर्मृत्योः पाशैरमोक्यैः. अश्वत्थ शत्रून् मामकान् यानहं द्वेष्मि ये च माम्.. (५) हे अश्वत्थ! पाप की देवी मृत्यु के न छूटने वाले फंदों से मेरे उन शत्रुओं को बांधो, जिन से मैं द्वेष करता हूं और जो मुझ से द्वेष करते हैं. (५) यथाश्वत्थ वानस्पत्यानारोहन् कृणुषे ऽ धरान्. एवा मे शत्रोर्मूर्धानं विष्वग् भिन्द्धि सहस्व च.. (६) हे अश्वत्थ! जिस प्रकार तुम सभी वनस्पतियों अर्थात् वृक्षों को नीचे छोड़ते हुए ऊपर उठते हो, उसी प्रकार मेरे शत्रुओं के शीशों को सभी और से कुचलो और उन का विनाश कर दो. (६) ते ऽ धराञ्चः प्र प्लवन्तां छिन्ना नौरिव बन्धनात्. न वैबाधप्रणुत्तानां पुनरस्ति निवर्तनम्.. (७) तट के वृक्षों से रस्सी के सहारे बंधी हुई नाव खुलने के बाद जिस प्रकार किनारे को प्राप्त न कर के नदी की धारा के साथ नीचे की ओर बहती जाती है, उसी प्रकार मेरे शत्रु नीचे को मुंह कर के नदी के प्रवाह में बहें, क्योंकि खदिर के वृक्ष में उत्पन्न पीपल के प्रभाव में आए हुए शत्रुओं का उद्धार नहीं होता. (७) प्रैणान् नुदे मनसा प्र चित्तेनोत ब्रह्मणा. प्रैणान् वृक्षस्य शाखयाश्वत्थस्य नुदामहे.. (८) मैं दृढ़ मानसिक शक्ति और गंध के प्रभाव द्वारा अपने शत्रुओं का उच्चाटन करता हूं. मैं मंत्रों से प्रभावित पीपल वृक्ष की शाखा के द्वारा शत्रुओं का विनाश करता हूं. (८) सूक्त-७ देवता—हरिण आदि हरिणस्य रघुष्यदो ऽ धि शीर्षणि भेषजम्. स क्षेत्रियं विषाणया विषूचीनमनीनशत्.. (१) तेज दौड़ने वाले काले हरिण के सिर में जो सींग रूपी रोग निवारक ओषधि है, वह मातापिता से आए हुए क्षय, कुष्ठ, मिरगी आदि का पूर्णतया नाश करे. (१) अनु त्वा हरिणो वृषा पद्भिश्चतुर्भिरक्रमीत्. विषाणे वि ष्य गुष्पितं यदस्य क्षेत्रियं हृदि.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

हे मृगशृंग! तुम्हें क्षेत्रीय रोगों का विनाश करने के लिए मैं ने मणि के रूप में धारण किया है. इस रोगी के हृदय में जो रोग बसे हुए हैं, तुम उन का विनाश करो. (२) अदो यदवरोचते चतुष्पक्षमिवच्छदिः. तेना ते सर्वं क्षेत्रियमङ्गेभ्यो नाशयामसि.. (३) यह चार कोनों वाला मृगचर्म चौकौरी चटाई के समान सुशोभित हो रहा है. हे रोगी! इस के द्वारा मैं तेरे क्षय, कुष्ठ आदि रोगों का नाश करता हूं. (३) अमू ये दिवि सुभगे विचृतौ नाम तारके. वि क्षेत्रियस्य मुञ्चतामधमं पाशमुत्तमम्.. (४) आकाश में स्थित विचृत नामक दो तारे क्षय, कुष्ठ, मिरगी आदि क्षेत्रीय रोगों का विनाश करें. (४) आप इद् वा उ भेषजीरापो अमीवचातनीः. आपो विश्वस्य भेषजीस्तास्त्वा मुञ्चन्तु क्षेत्रियात्.. (५) जल ही ओषधि है. जल ही सब रोगों का नाश करने वाला है. जल किसी एक रोग की नहीं, समस्त रोगों की ओषधि है. हे रोगी! जल तुझे क्षय, कुष्ठ, मिरगी आदि क्षेत्रीय रोगों से छुड़ाएं. (५) यदासुतेः क्रियमाणायाः क्षेत्रियं त्वा व्यानशे. वेदाहं तस्थ भेषजं क्षेत्रियं नाशयामि त्वत्.. (६) हे रोगी! अन्न का यथाविधि उपयोग न करने के कारण तेरे शरीर में जो क्षय, कुष्ठ, मिरगी आदि क्षेत्रीय रोग उत्पन्न हो गए हैं, मैं चिकित्सक उन की जौ आदि के रूप में ओषधि जानता हूं. उस ओषधि के द्वारा मैं तेरे क्षेत्रीय रोगों का विनाश करता हूं. (६) अपवासे नक्षत्राणामपवास उषसामुत. अपास्मत् सर्वं दुर्भूतम्प क्षेत्रियमूच्छतु.. (७) तारों के छिपने के समय अर्थात् उषाकाल से पूर्व और उषाकाल के समय किए गए स्नान आदि नित्य कर्मों के प्रभाव से रोगों का कारण दूर हो जाए. इस के पश्चात हमारे क्षय, कुष्ठ, मिरगी आदि क्षेत्रीय रोग नष्ट हो जाएं. (७) सूक्त-८ देवता—मित्र आदि विश्वे देव आ यातु मित्र ऋतुभिः कल्पमानः संवेशयन् पृथिवीमुस्रियाभिः. अथास्मभ्यं वरुणो वायुरग्निर्बृहद् राष्ट्रं संवेश्यं दधातु.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

मृत्यु से रक्षा करने में समर्थ और मित्रवत् सब के उपकारी मित्र देवता अर्थात् सूर्य वसंत आदि ऋतुओं के द्वारा हमारी आयु को दीर्घ करने में समर्थ हों. वे अपनी किरणों से पृथ्वी को व्याप्त करें. सूर्य देव के आगमन के पश्चात वरुण, वायु और अग्नि हमें शासन करने योग्य विशाल राज्य प्रदान कराएं (१) धाता रातिः सवितेदं जुषन्तामिन्द्रस्त्वष्टा प्रति हर्यन्तु मे वचः. हुवे देवीमदितिं शूरपुत्रां सजातानां मध्यमेषा यथासानि.. (२) सब के विधाता धाता देव, दानशील अर्यमा और सब के प्रेरक सविता देव मेरी हवि ग्रहण करें. इन के साथसाथ इंद्र और त्वष्टा देव भी मेरी स्तुतियां सुनें. मैं वीर पुत्रों की माता अदिति का आह्वान करता हूं, जिस से मैं अपने समान व्यक्तियों में सम्मान पा सकूं. (२) हुवे सोमं सवितारं नमोभिर्विश्वानदित्याँ अहमुत्तरत्वे. अयमग्निदीदायद् दीर्घमेव सजातैरृद्धो ऽ प्रतिब्रुवद्भिः.. (३) मैं यजमान को श्रेष्ठ पद प्राप्त करने के लिए सोम का, सविता का तथा समस्त अदिति पुत्रों का नमस्कारात्मक मंत्रों के द्वारा आह्वान करता हूं. सब के आधारभूत अग्नि देव अपनी दीप्ति बढ़ाएं. मैं अपने अनुकूलवर्ती बंधु बांधवों के साथ चिरकाल तक श्रेष्ठता प्राप्त करूं. (३) इहेदसाथ न परो गमाथेर्यो गोपाः पुष्टपतिर्व आजत्. अस्मै कामायोप कामिनीर्विश्वे वो देवा उपसंयन्तु.. (४) हे कामिनियो! तुम सब कन्या के समीप ही रहो. इस के सामने से दूर मत जाओ. मार्ग की प्रेरणा देने वाले एवं पालन कर्ता पूषा देव तुम्हें प्रेरणा दें. इस वर की इच्छा पूर्ति के लिए विश्वे देव तुझ कामना करने वाली स्त्री को उस के समीप जाने की प्रेरणा दें. (४) सं वो मनांसि सं व्रता समाकूतीर्नमामसि. अमी ये विव्रता स्थन तान् वः सं नमयामसि.. (५) हे हमारे विरोधी जनो! हम तुम्हारे चित्तों, कर्मों और संकल्पों को अपने अनुकूल बनाते हैं. इन में जो नियमों के विरुद्ध काम करने वाले हों, उन्हें हम तुम्हारे सामने ही दंड दें. (५) अहं गृभ्णामि मनसा मनांसि मम चित्तमनु चित्तेभिरेत. मम वशेषु हृदयानि वः कृणोमि मम यातमनुवर्त्मान एत.. (६) हे मेरे विरोधी जनो! मैं अपने मन के द्वारा तुम सब के मनों को और अपने चित्त के द्वारा तुम सब के चित्तों को अपने वश में करता हूं. आओ और तुम सब भी अपने हृदयों को मेरे वश में करो. तुम सब भी मेरी इच्छा के अनुसार मेरा अनुगमन करो और मेरे अनुकूल बनो. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-९ देवता—द्यावा, पृथ्‍वी, विश्‍वे देव

सूक्त-९ देवता—द्यावा, पृथ्‍वी, विश्‍वे देव कर्शफस्य विशफस्य द्यौष्पिता पृथिवी माता. यथाभिचक्र देवास्तथाप कृणुता पुनः.. (१) जो नाखून और खुर वाले बाघ आदि पशु हैं, जो बिना खुर वाले सर्प आदि जंतु हैं तथा जो फटे हुए खुर वाले गाय, बैल, भैंस आदि पशु हैं उन का पिता द्युलोक है और माता पृथ्‍वी है. हे देवो! इन विघ्नकारी पशुओं और जीवजंतुओं को आप ने जिस प्रकार हमारे अभिमुख किया है, उसी प्रकार इन्हें हम से अलग करो. (१) अश्रेष्माणो अधारयन् तथा तन्मनुना कृतम्. कृणोमि वध्रि विष्कन्धं मुष्काबर्हो गवामिव.. (२) दूषित शरीर से रहित देवों ने अभिमत कार्य में आने वाले विघ्नों की शांति के लिए अरलू वृक्ष से बने दंड को धारण किया है. मनुष्यों की सृष्टि करने वाले मनु ने भी यही किया था. बैलों को जिस प्रकार प्रजनन में असमर्थ बनाया जाता है, उसी प्रकार मैं सूखे चमड़े की रस्सी से विघ्नों को निष्क्रिय कर रहा हूं. (२) पिशङ्गे सूत्रे खगलं तदा बध्नन्ति वेधसः. श्रवस्युं शुष्मं काबवं वध्रिं कृण्वन्तु बन्धुरः.. (३) पीले रंग के धागे जिस प्रकार कवच को धारण करते हैं, उसी प्रकार साधक अरलू मणि को अर्थात् अरलू वृक्ष से बने डंडे को धारण करते हैं. हमारे द्वारा धारण की हुई अरलू मणि श्रवस्यु, शोधक और कबरे रंग के क्रूर प्राणियों से संबंधित विघ्नों को समाप्त करे. (३) येना श्रवस्यवश्चरथ देवा इवासुरमायया. शुनां कपिरिव दष्णो बन्धुरा काबवस्य च.. (४) हे शत्रुओं को जीत कर यश की इच्छा करने वाले मनुष्यो! जिस प्रकार देवगण असुरों की माया से मोहित थे, उसी प्रकार तुम शत्रुओं द्वारा डाले गए विघ्नों से मोहित हो. जिस प्रकार बंदर कुत्तों को भगा देता है, उसी प्रकार तुम्हारे द्वारा धारण किया हुआ खड्ग विघ्नों को दूर भगा दे. (४) दृष्ट्यै हि त्वा भत्सयामि दूषयिष्यामि काबवम्. उदाशवो रथा इव शपथैभिः सरिष्यथ.. (५) हे मणि! मैं शत्रुओं द्वारा डाले गए विघ्नों को समाप्त करने के लिए तुझे धारण करता हूं. इसी प्रकार मैं काबव नाम के विघ्न को दूर करता हूं. हे मनुष्यो! तुम दौड़ने के लिए विस्तृत घोड़ों वाले रथों के समान शत्रुओं द्वारा उत्पन्न विघ्नों से रहित हो कर अपने कार्यों में लगो. ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-१० देवता—इष्टका

(५) एकशतं विष्कन्धानि विष्ठिता पृथिवीमनु. तेषां त्वामग्र उज्जह्रुर्माणं विष्कन्धदूषणम्.. (६) हे मणि! धरती पर एक सौ एक विघ्न हैं. देवों ने उन की शांति के लिए तुझे धारण किया था. हे विघ्नों को दूर करने वाली मणि! मैं भी तुझे उसी उद्देश्य से धारण करता हूं. (६) सूक्त-१० देवता—इष्टका प्रथमा ह व्यु वास सा धेनुरभवद् यमे. सा नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम्.. (१) सृष्टि के आदि में उत्पन्न एकाष्टका उषा ने अंधकार दूर कर दिया था. यह हमारे पूर्वजों के लिए दूध देने वाली हुई थी. यह हमारे लिए भी दूध देने वाली हो और अभिमत फल प्रदान करे. (१) यां देवाः प्रतिनन्दन्ति रात्रिं धेनुमुपायतीम्. संवत्सरस्य या पत्नी सा नो अस्तु सुमङ्गली.. (२) जिस एकाष्टका संबंधी रात्रि को धेनु के रूप में समीप आती हुई देख कर हवि का भोग देने वाले देवगण, उस की प्रशंसा करते हैं. वह एकाष्टका रात्रि संवत्सर की पत्नी है. वह हमारे लिए कल्याण करने वाली हो. (२) संवत्सरस्य प्रतिमां यां त्वा रात्र्युपास्महे. सा न आयुष्मतीं प्रजां रायस्पोषेण सं सृज.. (३) हे रात्रि! तुम संवत्सर की प्रतिमा हो. हम तुम्हारी उपासना करते हैं. तुम हमारे पुत्र, पौत्र आदि को लंबी आयु वाला बनाओ तथा हमें गाय आदि धन से संपन्न करो. (३) इयमेव सा या प्रथमा व्यौच्छदास्वितरासु चरति प्रविष्टा. महान्तो अस्यां महिमानो अन्तर्वधूर्जिगाय नवगज्जनेत्री.. (४) यह आज की एकाष्टक लक्षणा वह प्रथम उत्पन्न उषा है, जिस ने सृष्टि के आरंभ में उत्पन्न हो कर अंधकार का विनाश किया था. वही उषा इन दिखाई देने वाली अन्य उषाओं में अनुगत हो कर उदित होती है. इस उषा में असीमित महिमा है. इस में सूर्य, अग्नि और सोम का निवास है. सूर्य की पत्नी, यह उषा प्राणियों को प्रकाश देती हुई सब से उत्तम रहे. (४) वानस्पत्या ग्रावाणो घोषमक्रत हविष्कृण्वन्तः परिवत्सरीणम्. एकाष्टके सुप्रजसः सुवीरा वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

हे एकाष्टक वृक्षों से बने ऊखल! मूसल आदि ने तथा पत्थरों ने संवत्सर में तैयार होने वाले जौ, धान आदि कूटतेपीटते हुए शब्द किया है. तुम्हारी कृपा से हम उत्तम पुत्र, पौत्रों, शक्तिशाली सेवकों तथा धनों के स्वामी बनें. (५) इडायास्पदं घृतवत् सरीसृपं जातवेदः प्रति हव्या गृभाय. ये ग्राम्याः पशवो विश्वरूपास्तेषां सप्तानां मयि रन्तिर्स्तु.. (६) हे जातवेद अग्नि! तुम हव्य ग्रहण करो. तुम्हारी कृपा से दूध, घी देने वाली गाएं, तेज दौड़ने वाले घोड़े तथा गांव में होने वाले बकरी, भेड़, गधा, ऊंट आदि नाना आकार वाले सात प्रकार के पशु मुझ से प्रेम रखें. (६) आ मा पुष्टे च पोषे च रात्रि देवानां सुमतौ स्याम. पूर्णा दर्वे परा पत सुपूर्णा पुनरा पत. सर्वान् यज्ञान्त्संभुञ्जतीषमूर्जं न आ भर.. (७) हे रात्रि! मुझे समृद्ध धन और पुत्र, पौत्र आदि का स्वामी बनाओ. तुम्हारी कृपा से मैं देवों का भी कृपापात्र बनूं. हे दर्वी अर्थात् हवन के साधन पात्र! तू हवि से पूर्ण हो कर देवों के पास जा और वहां से हमारे मन चाहे फल ले कर हमारे समीप आ. तू हवि से सभी यज्ञों का पालन करता हुआ देवों के पास से अन्न और बल ला कर हमें प्रदान कर. (७) आयमगन्त्संवत्सरः पतिरेकाष्टके तव. सा न आयुष्मतीं प्रजां रायस्पोषेण सं सृज.. (८) हे एकाष्टका! यह संवत्सर आ गया है. यह तेरा पति है. तू अपने पति संवत्सर के सहित हमारी संतान को अधिक आयु वाली करती हुई हमें धन संपन्न बना. (८) ऋतून् यज ऋतुपतीनार्तवानुत हायनान्. समाः संवत्सरान् मासान् भूतस्य पतये यजे.. (९) हे एकाष्टका! मैं वसंत आदि ऋतुओं को और उन के अधिष्ठाता देवों को हृदय के द्वारा प्रसन्न करता हूं. मैं ऋतु संबंधी, दिनरात संबंधी और बारह मासों से संबंधित यज्ञ करता हूं. मैं चराचर प्राणियों के स्वामी काल के निमित्त भी तेरे द्वारा यज्ञ करता हूं. (९) ऋतुभ्यष्ट्वार्तवेभ्यो माद्भ्यः संवत्सरेभ्यः. धात्रे विधात्रे समृद्धे भूतस्य पतये यजे.. (१०) हे एकाष्टका! मैं वसंत आदि ऋतुओं, ऋतु संबंधी दिनरात, बारह मासों, संवत्सर के धाता विधाता देवों और सभी चराचर प्राणियों के स्वामी काल के निमित्त तेरा यज्ञ करता हूं. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

इडया जुह्वतो वयं देवान् घृतवता यजे. गृहान्लुभ्यतो वयं सं विशेमोप गोमतः.. (११) हम गाय के घी से युक्त हवि के द्वारा यज्ञ करते हुए देवों को प्रसन्न करते हैं. उन देवों की कृपा से हम सभी अभिलषित वस्तुओं एवं अनेक गायों से युक्त घरों को प्राप्त कर के उन में सुख से निवास करें. (११) एकाष्टका तपसा तप्यमाना जजान गर्भं महिमानमिन्द्रम्. तेन देवा व्यसहन्त शत्रून् हन्ता दस्यूनामभवच्छचीपतिः.. (१२) सब की स्वामिनी एकाष्टका ने तपस्या के द्वारा महिमा युक्त इंद्र को जन्म दिया. इंद्र की सहायता से देवों ने शत्रुओं को पराजित किया. शची देवी के पति वह इंद्र, दस्यु जनों के विनाशक हुए. (१२) इन्द्रपुत्रे सोमपुत्रे दुहितासि प्रजापतेः. कामानस्माकं पूरय प्रति गृह्णाहि नो हविः.. (१३) हे इंद्र और सोम की माता एकाष्टका! तू प्रजापति की पुत्री है. तू हमारे द्वारा दी हुई हवि को स्वीकार करती हुई हमें सतान तथा पशुओं से संपन्न बना. (१३) सूक्त-११ देवता—इंद्र, अग्नि आदि मुञ्चामि त्वा हविषा जीवनाय कमज्ञातयक्ष्मादुत राजयक्ष्मात्. ग्राहिर्जग्राह यद्येतदेनं तस्या इन्द्राग्नी प्र मुमुक्तमेनम्.. (१) हे व्याधिग्रस्त मनुष्य! मैं हवि के अन्न द्वारा तुझे उस यक्ष्मा रोग से मुक्त करता हूं जो मेरे जाने बिना ही तेरे शरीर में प्रवेश कर गया है. राजा सोम को जिस राजयक्ष्मा ने गृहीत किया था, दीर्घ जीवन के लिए उस से भी मैं तुझे मुक्त करता हूं. हे इंद्र और अग्नि! जिस पिशाचिनी ने इस बालक को पकड़ लिया है, आप दोनों उस से इस बालक को छुड़ाइए. (१) यदि क्षितायुर्यदि वा परेतो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एव. तमा हरामि निर्ऋतेरुपस्थादस्पार्शमेनं शतशारदाय.. (२) यह व्याधिग्रस्त मनुष्य चाहे क्षीण आयु वाला हो गया हो अथवा इस लोक को छोड़ कर मृत्यु के देव यमराज के समीप चला गया हो अर्थात् चाहे उस की चिकित्सा असंभव हो-इस प्रकार के पुरुष को भी मैं मृत्यु के पास से वापस ला कर सौ वर्ष जीवित रहने के लिए शक्तिशाली बनाता हूं. (२) सहस्राक्षेण शतवीर्येण शतायुषा हविषाहार्षमेनम्. इन्द्रो यथैनं शरदो नयात्यति विश्वस्य दुरितस्य पारम्.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

जो हवि देखने की शक्ति प्रदान करती है तथा जिस से सुनने आदि की सैकड़ों शक्तियां प्राप्त होती हैं, उस हवि की शक्ति से मैं इस रोगी को मृत्यु से लौटा लाया हूं. उस हवि में सौ वर्ष जीने का फल प्रदान करने की शक्ति है. मैं हवि के द्वारा इंद्र को इस कारण प्रसन्न करता हूं कि ये इस पुरुष को सैकड़ों वर्ष तक की आयु का विनाश करने वाले पापों से छुटकारा दिलाएं. इस प्रकार यह सौ वर्ष तक जीवित रह सके. (३) शतं जीव शरदो वर्धमानः शतं हेमन्ताञ्छतमु वसन्तान्. शतं त इन्द्रो अग्निः सविता बृहस्पतिः शतायुषा हविषाहार्षमेनम्.. (४) हे रोग से मुक्त पुरुष! तुम प्रतिदिन वृद्धि प्राप्त करते हुए सौ शरद ऋतुओं, सौ हेमंत ऋतुओं और सौ वसंत ऋतुओं तक जीवित रहो. इंद्र, अग्नि, सविता और बृहस्पति तुम्हें सौ वर्ष की आयु प्रदान करें. सैकड़ों वर्ष की आयु प्रदान करने वाले हवि के द्वारा मैं इसे मृत्यु के पास से लौटा लाया हूं. (४) प्र विशतं प्राणापानावन्डवाहाविव व्रजम्. व्य १न्ये यन्तु मृत्यवो यानाहुरितरान्छतम्.. (५) हे प्राण और अपान वायु! जिस प्रकार वृषभ अपनी पशुशाला में प्रवेश करता है, उसी प्रकार तुम इस क्षय रोग से ग्रस्त रोगी के शरीर में प्रवेश करो. इस राजयक्ष्मा के अतिरिक्त, जो मृत्यु के हेतु सैकड़ों रोग कहे गए हैं, वे भी इस रोगी से विमुख हो जाएं. (५) इहैव स्तं प्राणापानौ माप गातमितो युवम्. शरीरमस्याङ्गानि जरसे वहतं पुनः.. (६) हे प्राण और अपान वायु! तुम इस के शरीर में ही रहो, इस के शरीर से अकाल में ही मत निकलो. इस रोगी व्यक्ति के शरीर के हस्त, चरण आदि अंगों को तुम वृद्धावस्था तक मत त्यागो. (६) जरायै त्वा परि ददामि जरायै नि धुवामि त्वा. जरा त्वा भद्रा नेष्ट व्य १ न्ये यन्तु मृत्यवो यानाहुरितरान्छतम्.. (७) हे रोग मुक्त पुरुष! मैं तुझे वृद्धावस्था को देता हूं अर्थात् तुझे वृद्धावस्था तक जीवित रहने वाला बनाता हूं. मैं वृद्धावस्था तक रोगों से तेरी रक्षा करता हूं. वह वृद्धावस्था तुझे कल्याण प्राप्त कराए. (७) अभि त्वा जरिमाहित गामुक्षणमिव रज्ज्वा. यस्त्वा मृत्युरभ्यधत्त जायमानं सुपाशया. तं ते सत्यस्य हस्ताभ्यामुदमुञ्चद् बृहस्पतिः.. (८) हे रोग मुक्त पुरुष! जिस प्रकार गर्भाधान में समर्थ बैल को रस्सी से बांधा जाता है, उसी ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-१२ देवता—शाला, वास्तोष्पति

प्रकार मैं तुझे वृद्धावस्था से बांधता हूं. अर्थात् तुझे वृद्धावस्था तक जीवित रहने वाला बनाता हूं. तुझे जन्म लेते ही अकाल में मृत्यु ने अपने फंदे में कस लिया है. उस फंदे को बृहस्पति ब्रह्मा के हाथों के द्वारा कटवा दें. (८) सूक्त-१२ देवता—शाला, वास्तोष्पति इहैव ध्रुवां नि मिनोमि शालां क्षेमे तिष्ठाति घृतमुक्षमाणा. तां त्वा शाले सर्ववीराः सुवीरा अरिष्टवीरा उप सं चरेम.. (१) मैं इसी प्रदेश में खंभों आदि के कारण स्थिर रहने वाली शाला बनाता हूं. वह शाला मुझे अभिमत फल देती हुई कुशलतापूर्वक स्थिर रहे. हे शाला! मैं अनेक पुत्रपौत्रों, शोभन गुणों वाली संतान एवं रोग आदि बाधाओं से हीन परिवार वाला हो कर तुझ में निवास करूं. (१) इहैव ध्रुवा प्रति तिष्ठ शालेऽश्वावती गोमती सूनूतावती. ऊर्जस्वती घृतवती पयस्वत्युच्छ्रयस्व महते सौभगाय.. (२) हे शाला! तू बहुत से घोड़ों, गायों, प्रिय बालकों की मधुर वाणी, पर्याप्त अन्न, घृत एवं दूध से पूर्ण हो कर इसी प्रदेश में स्थिर हो और हमारे महान कल्याण के लिए प्रयत्नशील बन. (२) धरुण्यसि शाले बृहच्छन्दाः पूतिधान्या. आ त्वा वत्सो गमेदा कुमार आ धेनवः सायमास्पन्दमानाः.. (३) हे शाला! तू बहुत से भोगों को धारण करने वाली है. अनेक वेद मंत्रों से और पके होने के कारण सुगंधित बने विविध प्रकार के अन्नों से युक्त तुझ में बछड़े और बालक आएं तथा गाएं संध्या काल में थनों से दूध टपकाती हुई आएं. (३) इमां शालां सविता वायुरिन्द्रो बृहस्पतिर्नि मिनोतु प्रजानन्. उक्षन्तूद्ना मरुतो घृतेन भगो नो राजा नि कृषिं तनोतु.. (४) इंद्र और बृहस्पति खंभों को स्थापित कर के इस शाला का निर्माण करें. मरुत् इस शाला को जल से सींचें तथा भग देव इस के आसपास की भूमि को कृषि के योग्य बनाएं. (४) मानस्य पत्नि शरणा स्योना देवी देवेभिर्निमितास्यग्रे. तृणं वसाना सुमना असस्त्वमथास्मभ्यं सहवीरं रयिं दाः.. (५) हे शाला! तू धान्य आदि का पोषण करने वाली, सुखकरी, रक्षिका एवं तेजस्विनी है. देवों ने सृष्टि के आरंभ में तेरा निर्माण किया था. तिनकों से ढकी हुई तू उत्तम आशाओं वाली हो कर हमें पुत्र, पौत्र आदि से युक्त धन प्रदान कर. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

ऋतेन स्थूणामधि रोह वंशोग्रो विराजन्नप वृङ्क्ष्व शत्रून्. मा ते रिषन्नुपसत्तारो गृहाणां शाले शतं जीवेम शरदः सर्ववीराः.. (६) हे बांस! तू बाधाहीन रूप से इस शाला के खंभे के रूप में खड़ा रह तथा शक्तिशाली बन कर विराजता हुआ हमारे शत्रुओं को यहां से दूर भगा. हे शाला! तेरे आवासों में निवास करने वालों की हिंसा न हो. हम अभिलषित पुत्रों और पौत्रों से युक्त हो कर सौ वर्ष तक जीवित रहें. (६) एमां कुमारस्तरुण आ वत्सो जगता सह. एमां परिस्रुतः कुम्भ आ दध्नः कलशैरगुः.. (७) युवक पुत्र और गायों के सहित बछड़े इस शाला में आएं. टपकने वाले शहद तथा दही के कलश भी इस शाला में आएं. (७) पूर्ण नारि प्र भर कुम्भमेतं घृतस्य धाराममृतेन संभृताम्. इमां पातॄनमृतेना समङ्ग्धीष्टापूर्तमभि रक्षात्येनाम्.. (८) हे स्त्री! तू अमृत के समान जल से युक्त शहद, घी आदि की धारा बहाती हुई जल से भरे घड़े को ले कर इस शाला में आ तथा इस घट को अमृत के समान जल से पूर्ण कर. इस शाला में किए जाने वाले श्रौत और स्मार्त कर्म चोरों, अग्नि आदि से हमारी रक्षा करें. (८) इमा आपः प्र भराम्ययक्ष्मा यक्ष्मनाशनीः. गृहानुप प्र सीदाम्यमृतेन सहाग्निना.. (९) मैं यक्ष्मा रोग से रहित और अपने सेवकों के यक्ष्मा रोग का विनाश करने वाले जलों से पूर्ण कलश को शाला में लाता हूं. इस के साथ ही मैं कभी न बुझने वाली अग्नि को भी लाता हूं. (९) सूक्त-१३ देवता—सिंधु, जल, वरुण यददः संप्रयतीरहावनदता हते. तस्मादा नद्यो ३ नाम स्थ ता वो नामानि सिन्धवः.. (१) हे जल! मेघों के द्वारा ताड़ित हो कर इधरउधर गमन करने और नाद करने के कारण तुम्हारा नाम नदी हुआ है. हे बहने वाले जल! तुम्हारे उदक आदि अन्य नाम भी इसी प्रकार सार्थक हैं. (१) यत् प्रेषिता वरुणेनाच्छीभं समवल्गत. तदाप्रोदिन्द्रो वो यतीस्तस्मादापो अनु ष्ठन.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

राजा वरुण के द्वारा प्रेरित होने के तुरंत बाद तुम एकत्र हो कर नृत्य करने लगे थे. उस समय तुम्हें इंद्र प्राप्त हुए थे. इस कारण तुम्हारा नाम आप हुआ. (२) अपकामं स्यन्दमाना अवीवरत वो हि कम्. इन्द्रो वः शक्तिभिर्देवीस्तस्माद् वार्नाम वो हितम्.. (३) बिना किसी कामना के बहने वाले तुम्हारा वरण इंद्र ने अपनी शक्ति से किया था. हे क्रीड़ा करने वाले जल! इस कारण तुम्हारा नाम वारि पड़ा. (३) एको वो देवो ऽ प्यतिष्ठत् स्यन्दमाना यथावशम्. उदानिषुर्महीरिति तस्मादुदकमुच्यते.. (४) अकेले इंद्र ने इच्छानुसार इधरउधर बहने वाले तुम्हें प्रतिष्ठित किया था. इंद्र से सम्मानित हो कर तुम ने अपने को महान समझ लिया. इस कारण तुम्हें उदक कहा जाता है. (४) आपो भद्रा घृतमिदाप आसन्नग्नीषोमौ बिभ्रत्याप इत् ताः. तीव्रॊ रसो मधुपृचामरंगम आ मा प्राणेन सह वर्चसा गमेत्.. (५) कल्याण करने वाला जल ही घृत हुआ. अग्नि में हवन किया हुआ घृत ही जल बन जाता है. जल ही अग्नि और सोम को धारण करता है. इस प्रकार के जल का मधुर रस कभी क्षीण न होने वाले बल के साथ मुझे प्राप्त हो. (५) आदित् पश्याम्युत वा शृणोम्य मा घोषो गच्छति वाङ् मासाम्. मन्ये भेजानो अमृतस्य तर्हि हिरण्यवर्णा अतृपं यदा वः.. (६) इस के पश्चात मैं देखता हूं और सुनता हूं कि बोले जाते हुए शब्द मेरी वाणी को प्राप्त हो रहे हैं. मैं कल्पना करता हूं कि उन जलों के आने से ही मुझे अमृत प्राप्त हुआ है. हे सुनहरे रंग वाले जलो! तुम्हारे सेवन से मैं तृप्त हो गया हूं. (६) इदं व आपो हृदयमयं वत्स ऋतावरीः. इहेत्थमेत शक्वरीर्यत्रेदं वेशयामि वः.. (७) हे जलो! यह सोना तुम्हारा हृदय है और यह मेढक तुम्हारा बछड़ा है. हे अभिमत फल देने में समर्थ जलो! इस खोदे गए स्थान में मेढक के ऊपर फेंकी हुई अबका घास उग आती है, उसी प्रकार तुम इस में स्थिर प्रवाह वाले बनो. मैं इस खोदे गए स्थान में तुम्हें प्रविष्ट कराता हूं. (७) सूक्त-१४ देवता—गोष्ठ, अर्यमा आदि सं वो गोष्ठेन सुषदा सं रय्या सं सुभूत्या. ebook converter DEMO Watermarks*

अहर्जातस्य यन्नाम तेना वः सं सृजामसि.. (१) हे गायो! मैं तुम्हें सुखपूर्ण गोशाला से युक्त करता हूं तथा तुम्हें आहार रूपी धन प्रदान करता हूं. मैं तुम्हें पुत्र, पौत्र आदि संतान से युक्त करता हूं. (१) सं वः सृजत्वर्यमा सं पूषा सं बृहस्पतिः. समिन्द्रो यो धनञ्जयो मयि पुष्यत यद् वसु.. (२) हे गायो! अर्यमा, उषा एवं धन जीतने वाले इंद्र तुम्हें उत्पन्न करें. इस के पश्चात तुम अपने दूध, घी आदि धन से मुझे पुष्ट करो. (२) संजग्माना अभिभ्युषीरस्मिन् गोष्ठे करीषिणीः. बिभ्रतीः सोम्यं मध्वनमीवा उपेतन.. (३) हे गायो! मेरी इस गोशाला में तुम पुत्र, पौत्र आदि संतान से युक्त तथा चोर, बाघ आदि के भय से रहित हो कर निवास करो. गोबर देने वाली तथा रोग रहित और अमृत के समान दूध धारण करने वाली तुम मुझे प्राप्त होओ. (३) इहैव गाव एतनेहो शकेव पुष्यत. इहैवोत प्र जायध्वं मयि संज्ञानमस्तु वः.. (४) हे गायो! तुम मेरी गोशाला में आओ. मक्खी जिस प्रकार संतान वृद्धि करती हुई, क्षण भर में अगणित हो जाती है, उसी प्रकार तुम भी अधिक संतान वाली बनो. तुम इसी गोशाला में पुत्रपौत्रों को जन्म दो और मुझ साधक के प्रति प्रेम रखो. (४) शिवो वो गोष्ठो भवतु शारिशाकेव पुष्यत. इहैवोत प्र जायध्वं मया वः सं सृजामसि.. (५) हे गायो! तुम्हारे रहने का स्थान सुखमय हो. तुम क्षण में हजारों के रूप में बढ़ने वाले शारिशाक जीव के समान मेरी पशुशाला में ही समृद्ध बनो. तुम यहीं संतान उत्पन्न करो. मैं तुम्हें अपने से युक्त करता हूं. (५) मया गावो गोपतिना सचध्वमयं वो गोष्ठ इहं पोषयिष्णुः. रायस्पोषेण बहुला भवन्तीर्जीवा जीवन्तीरुप वः सदेम.. (६) हे गायो! तुम मुझ गोस्वामी की गोशाला में आओ. यह गोशाला तुम्हारा पोषण करने वाली है. चारे रूपी धन के कारण अनगिनत होती हुई तुम चिरकाल तक मुझ चिरजीवी के साथ रहो. (६) सूक्त-१५ देवता—इंद्र, अग्नि ebook converter DEMO Watermarks*

इन्द्रमहं वणिजं चोदयामि स न एतु पुरएता नो अस्तु. नूदन्ररातिं परिपन्थिनं मृगं स ईशानो धनदा अस्तु मह्यम्.. (१) यज्ञ करने वाला मैं इंद्र को वाणिज्य करने वाला समझ कर स्तुति करता हूं. वे इंद्र यहां आएं और मेरे सम्मुख हों. इंद्र मेरे वाणिज्य में बाधा पहुंचाने वाले शत्रुओं तथा मार्ग रोकने वाले चोरों और बाघों की हिंसा करते हुए अग्रसर हों तथा मुझ व्यापारी को धन देने वाले बनें. (१) ये पन्थानो बहवो देवयाना अन्तरा द्यावापृथिवी संचरन्ति. ते मा जुषन्तां पयसा घृतेन यथा क्रीत्वा धनमाहराणि.. (२) व्यापार के जो बहुत से मार्ग हैं और धरती तथा आकाश के मध्य में लोग जिन मार्गों पर गमन करते हैं, वे मार्ग घी, दूध से हमारी सेवा करें, जिस से हम व्यापार कर के लाभ सहित मूल धन ले कर अपने घर आ सकें. (२) इध्मेनाग्न इच्छमानो घृतेन जुहोमि हव्यं तरसे बलाय. यावदीशे ब्रह्मणा वन्दमान इमां धियं शतसेयाय देवीम्.. (३) हे अग्नि! व्यापार से लाभ की कामना करता हुआ मैं शीघ्र गमन की शक्ति पाने के निमित्त घी के साथ हव्य की आहुति देता हूं. मैं मंत्रों से तुम्हारी स्तुति करता हुआ अपनी व्यवहार कुशल बुद्धि को असंख्य धनों वाला होने के लिए होम में लगाता हूं. (३) इमामग्ने शरणिं मीमृषो नो यमध्वानमगाम दूरम्. शुनं नो अस्तु प्रपणो विक्रयश्च प्रतिपणः फलिनं मा कृणोतु. इदं हव्यं संविदानौ जुषेथां शनुं नो अस्तु चरितमुत्थितं च.. (४) हे अग्नि! हम से दूर तक चलने से जो हिंसा हुई है और हमारे व्रत का लोप हुआ है, उसे क्षमा करो. व्यापार की वस्तुओं का क्रय और विक्रय दोनों ही मुझे लाभकारी हों. हे इंद्र और अग्नि! तुम एकमत हो कर इस हव्य को स्वीकार करो. तुम दोनों की कृपा से मेरा क्रयविक्रय और उस से लाभ के रूप में प्राप्त धन मेरे लिए सुखकारी हो. (४) येन धनेन प्रपणं चरामि धनेन देवा धनमिच्छमानः. तन्मे भूयो भवतु मा कनीयो ऽ ग्ने सातघ्नो देवान् हविषा नि षेध.. (५) हे देवो! जिस मूल धन से लाभ रूपी धन की इच्छा करता हुआ मैं व्यापार करता हूं, वह मेरे लिए सुखकारी हो. हे अग्नि! इस हवन किए जाते हुए हव्य से लाभ में बाधा डालने वाले देवों को संतुष्ट कर के रोको. हे देवो, तुम्हारे प्रभाव से मेरा धन बढ़े, कम न हो. (५) येन धनेन प्रपणं चरामि धनेन देवा धनमिच्छमानः. तस्मिन् म इन्द्रो रुचिमा दधातु प्रजापतिः सविता सोमो अग्निः.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

जिस मूल धन से मैं लाभ रूपी धन की इच्छा करता हुआ व्यापार करता हूं, इंद्र, सविता, सोम, प्रजापति और अग्नि देव मेरा मन उस धन की ओर प्रेरित करें. (६) उप त्वा नमसा वयं होतर्वैश्वानर स्तुमः. स नः प्रजास्वात्मसु गोषु प्राणेषु जागृहि.. (७) हे देवों का आह्वान करने वाले अग्नि देव! हम हव्य ले कर तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम हमारे पुत्रों, पौत्रों, गायों और प्राणों की रक्षा के लिए सावधान रहो. (७) विश्वाहा ते सदमिद्धरेमाश्र्वायेव तिष्ठते जातवेदः. रायस्पोषेण समिषा मदन्तो मा ते अग्ने प्रतिवेशा रिषाम.. (८) हे जातवेद अग्नि! हमारे घर में नित्य निवास करने वाले तुम्हें हम प्रतिदिन उसी प्रकार हवि देते हैं, जिस प्रकार हम अपने घर में रहने वाले घोड़े को समयसमय पर घास आदि खिलाते हैं. हे अग्नि! तुम्हारे सेवक हम धन और अन्न की समृद्धि से प्रसन्न होते हुए कभी नष्ट न हों. (८) सूक्त-१६ देवता—इंद्र, अग्नि प्रातरग्निं प्रातरिन्द्रं हवामहे प्रातर्मित्रावरुणा प्रातरश्विना. प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिं प्रातः सोममुत रुद्रं हवामहे.. (१) हम शक्ति और बुद्धि प्राप्त करने के निमित्त प्रातःकाल अग्नि, इंद्र, मित्र, वरुण, भग, उषा, बृहस्पति, सोम और रुद्र का आह्वान करते हैं. (१) प्रातर्जितं भगमुग्रं हवामहे वयं पुत्रमदितेर्यो विधर्ता. आध्रश्चिद् यं मन्यमानस्तुरश्चिद् राजा चिद् यं भगं भक्षीत्याह.. (२) जो आदित्य वर्षा आदि के द्वारा सब के धारण कर्ता और पोषण करने वाले हैं. दरिद्र भी जिन्हें अपने अभिमत फल का साधन जानता हुआ पूजा करता है तथा राजा भी जिन्हें पूजने का इच्छुक रहता है, हम प्रातःकाल उन अदिति पुत्र एवं अपराजित शक्ति वाले सूर्य का आह्वान करते हैं. (२) भग प्रणेतर्भग सत्यराधो भगेमां धियमुदवा ददन्नः. भग प्र णो जनय गोभिरश्वैर्भग प्र नृभिर्नृवन्तः स्याम.. (३) हे सूर्य! तुम सारे जगत् के नेता हो. तुम्हारा धन कभी नष्ट नहीं होता. हमारी स्तुति को तुम सफल करो. हे भग! हमें गायों और घोड़ों से संपन्न करो. हम पुत्र, पौत्र, सेवक आदि मनुष्यों वाले बनें. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

उतेदानीं भगवन्तः स्यामोत प्रपित्व उत मध्ये अह्नाम्. उतोदितौ मघवन्सूर्यस्य वयं देवानां सुमतौ स्याम.. (४) इस कर्म का अनुष्ठान करने के समय हम भग देव की कृपा दृष्टि पा कर धन और सौभाग्य वाले रहें. हे इंद्र! हम प्रातःकाल, मध्याह्न, संध्या के समय सूर्य, अग्नि आदि देवों की कृपा दृष्टि प्राप्त करते रहें. (४) भग एव भगवाँ अस्तु देवस्तेना वयं भगवन्तः स्याम. तं त्वा भग सर्व इज्जोहवीमि स नो भग पुरएता भवेह.. (५) भग देव ही धनवान हैं. उन की कृपा से हम धन के स्वामी हैं. हे भग! इस प्रकार के तुम्हें सभी लोग बुलाते हैं. इस व्यापार में तुम हमारे आगे चलने वाले बनो. (५) समध्वरायोपसो नमन्त दधिक्रावेव शुचये पदाय. अर्वाचीनं वसुविदं भगं मे रथमिवाश्वा वाजिन आ वहन्तु.. (६) जिस प्रकार सवार के पीठ पर बैठ जाने के बाद घोड़ा चलने के लिए तैयार हो जाता है, उसी प्रकार उषा देवी धन देने वाले भग देव को मेरे यज्ञ में लाने के लिए प्रस्तुत हों. तेजी से दौड़ने वाले घोड़े जिस प्रकार रथ को ले जाते हैं, उसी प्रकार उषा देवी भग देव को मेरे पास ले आएं. (६) अश्वावतीर्गोमतीर्न उपासो वीरवतीः सदमुच्छन्तु भद्राः. घृतं दुहाना विश्वतः प्रपीता यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७) हे उषा देवी! बहुत से अश्वों, गायों, पुत्रपौत्र आदि से युक्त एवं कल्याण कारिणी बन कर सदा हमारे लिए उदित हों. हे उषा देवी! तुम जल प्रदान करती हुई तथा समस्त गुणों से युक्त हो कर अपने अविनाशी धनों से हमारी सदा रक्षा करो. (७) सूक्त-१७ देवता—सीता सीरा युञ्जन्ति कवयो युगा वि तन्वते पृथक्. धीरा देवेषु सुम्नयौ.. (१) बुद्धिमान लोग बैलों को हल में जोतते हैं. देवों को सुखकर अन्न प्राप्ति की इच्छा से वे बैलों के कंधों पर जुआ रखते हैं. (१) युनक्त सीरा वि युगा तनोत कृते योनौ वपतेह बीजम्. विराजः श्रुष्टिः सभरा असन्नो नेदीय इत् सृण्यः पक्वमा यवन्.. (२) हे किसानो! हलों को जुओं से युक्त करो और जुओं को बैलों के कंधों पर स्थापित करो.

अंकुर उगने योग्य इस जुते हुए खेत में गेहूं, जौ आदि बीजों को बोओ. हमारे अन्न के पौधे दानों के भार वाले हों. शीघ्र ही वे पौधे पक कर दरांती का स्पर्श पाने योग्य हो जाएं. (२) लाङ्गलं पवीरवत् सुशीमं सोमसत्सरु. उदिद् वपतु गामविं प्रस्थावद् रथवाहनं पीबरीं च प्रफर्व्यम्.. (३) लोहे के फाल वाला हल कृषि योग्य खेत को सुख देता है. गेहूं, जौ आदि धान्य की उत्पत्ति का कारण होने से यह हल सोमयाग का कर्ता है. हल का भाग फाल भूमि के भीतर रह कर गति करता है. यह हल गाय आदि पशुओं की समृद्धि का कारण बने. (३) इन्द्रः सीतां नि गृह्णातु तां पूषाभि रक्षतु. सा नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम्.. (४) इंद्र हल द्वारा खेत में बनाई गई रेखा अर्थात् कूंड़ को ग्रहण करें तथा पूषा देव उस की रक्षा करें. हल से जुती हुई भूमि हमें अभिमत फल देने वाली बन कर सभी वर्षों में जौ, गेहूं आदि अन्न दे. (४) शुनं सुफाला वि तुदन्तु भूमिं शुनं कीनाशा अनु यन्तु वाहान्. शुनासीरा हविषा तोशमाना सुपिप्पला ओषधीः कर्तमस्मै.. (५) सुंदर फाल अर्थात् हल के लोहे वाले भाग हमें सुख देते हुए भूमि को जोतें. किसान हमें सुख देते हुए बैलों के पीछे चलें. हे सूर्य और वायु! तुम हमारे द्वारा दिए गए हवि से संतुष्ट होते हुए इस यजमान के लिए जौ, गेहूं आदि के पौधों को शोभन बालियों से युक्त करो. (५) शुनं वाहाः शुनं नरः कृषतु लाङ्गलम्. शुनं वरत्रा बध्यन्तां शुनमष्ट्रामुदिङ्गय.. (६) बैल और किसान सुखपूर्वक हल जोतें. हल सुखपूर्वक धरती को फाड़े. रस्सियां सुखपूर्वक बांधी जाएं. हे शुनः अर्थात् वायु देव! तुम बैलों के हांकने के लिए प्रयुक्त होने वाले चाबुक को सुखपूर्वक प्रेरणा दो. (६) शुनासीरेह स्म मे जुषेथाम्. यद् दिवि चक्रथुः पयस्तेनेमामुप सिञ्चतम्.. (७) हे सूर्य और वायु देव! तुम इस खेत में मेरा हवि ग्रहण करो. सूर्य और वायु दोनों ने आकाश में बादलों के रूप में जो जल पहुंचाया है, उस से वर्षा के रूप में इस जुती हुई भूमि को सींचों. (७) सीते वन्दामहे त्वार्वाची सुभगे भव. यथा नः सुमना असो यथा नः सुफला भुवः.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

हे जुती हुई भूमि! हम तुझे नमस्कार करते हैं. हे सुंदर भाग्य वाली भूमि! तू हमारे अनुकूल बन. तू जिस प्रकार से हमारे अनुकूल मन वाली हो, उसी प्रकार हमें शोभन फल देने वाली हो जा. (८) घृतेन सीता मधुना समक्ता विश्वैर्देवैरनुमता मरुद्भिः. सा नः सीते पयसाभ्याववृत्स्वोर्जस्वती घृतवत् पिन्वमाना.. (९) हे जुती हुई भूमि! तू मधुर स्वाद वाले जल से भली प्रकार सिंची हुई हो कर तथा विश्वे देव और मरुतों द्वारा अनुमति पा कर जल सहित हमारे सामने आ. तू शक्ति संपन्न हो कर घी से मिले हुए अन्न को सींचने वाली है. (९) सूक्त-१८ देवता—वनस्पति इमां खनाम्योषधिं वीरुधां बलवत्तमाम्. यया सपत्नीं बाधते यया संविन्दते पतिम्.. (१) पाठा नाम की इस लता रूपी जड़ीबूटी को मैं खोदता हूं जो सभी जड़ीबूटियों से अधिक बलवान है. इस जड़ीबूटी के द्वारा सौत को बाधा पहुंचती है तथा इसे धारण करने वाली स्त्री पति को प्राप्त करती है. (१) उत्तानपर्णे सुभगे देवजूते सहस्वति. सपत्नीं मे परा णुद पतिं मे केवलं कृधि.. (२) हे ऊपर की ओर मुख वाले पत्तों से युक्त जड़ीबूटी पाठा! तू इंद्र आदि देवों की कृपा से मुझे प्राप्त हुई है. तू मेरी सौत को पराजित करने वाली है. तू मेरी सौत को मेरे पति से दूर ले जा और मेरे पति को केवल मेरा बना. (२) नहि ते नाम जग्राह नो अस्मिन् रमसे पतौ. परामेव परावतं सपत्नीं गमयामसि.. (३) हे सौत! मैं तेरा नाम कभी नहीं लेना चाहती. मेरे पति के साथ तू रमण मत कर. मैं तुझे बहुत दूर भेज रही हूं. (३) उत्तराहमुत्तर उत्तरेदुत्तराभ्यः. अधः सपत्नी या ममाधरा साधराभ्यः.. (४) हे सभी जड़ीबूटियों में श्रेष्ठ पाठा! मैं अधिक श्रेष्ठ बनूं. लोक में जो अधिक श्रेष्ठ स्त्रियां हैं, मैं उन से भी अधिक श्रेष्ठ बनूं. मेरी जो सौत है, वह अति नीच नारियों से भी नीच बने. (४) अहमस्मि सहमानाथो त्वमसि सासहिः. उभे सहस्वती भूत्वा सपत्नीं मे सहावहै.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

हे पाठा नामक जड़ीबूटी! मैं तेरी कृपा से अपनी सौतों को पराजित करने वाली बनूं और तू भी शत्रुओं का तिरस्कार करने में समर्थ हो. इस प्रकार हम दोनों शत्रुओं को पराजित करने वाली बनें. मैं अपनी सौत को पराजित करूं. (५) अभि ते ऽ धां सहमानामुप ते ऽ धां सहीयसीम्. मामुन प्र ते मनो वत्सं गौरिव धावतु पथा वारिव धावतु.. (६) हे सौत! मैं तेरे पलंग के चारों ओर तथा पलंग के ऊपर इस पराजित करने वाली पाठा नाम की जड़ीबूटी को रखती हूं. थनों से दूध टपकाती हुई गाय जिस प्रकार बछड़े की ओर दौड़ती है तथा जल जिस प्रकार नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार तू मेरे पीछेपीछे चल. (६) सूक्त-१९ देवता—इंद्र संशितं म इदं ब्रह्म संशितं वीर्यं १ बलम्. संशितं क्षत्रमजरमस्तु जिष्णुर्येषामस्मि पुरोहितः.. (१) मेरा ब्राह्मणत्व जाति से पतित करने वाले दोष का विनाश करने में प्रबल हो. मंत्र के प्रभाव से उत्पन्न मेरी शक्ति और मेरा शारीरिक बल अमोघ अर्थात् कभी असफल न होने वाला बने. मैं जिस का पुरोहित हूं, वह क्षत्रिय जाति जय प्राप्त करने वाली तथा वृद्धावस्था से रहित बने. (१) समहमेषां राष्ट्रं स्यामि समोजो वीर्यं १ बलम्. वृश्चामि शत्रूणां बाहुननेन हविषाऽहम्.. (२) मैं जिस राजा के राज्य में निवास करता हूं, उस राज्य को मैं समृद्ध बनाता हूं. मैं अपने मंत्रों के प्रभाव से अपने राजा को शारीरिक शक्ति तथा हाथी, घोड़ा आदि से युक्त बनाता हूं. अग्नि में हवन किए जाते हुए इस हवि के द्वारा मैं अपने राजा के शत्रुओं की भुजाओं को छिन्नभिन्न करता हूं. (२) नीचैः पद्यन्तामधरे भवन्तु ये नः सूरिं मघवानं पृतन्यान्. क्षिणामि ब्रह्मणामित्रान्नुन्नयामि स्वानहम्.. (३) हमारे राजा कार्य और अकार्य को जानने वाले तथा अधिक धन वाले हैं. जो शत्रु हमारे ऐसे राजा को पराजित करने की इच्छा से सेना एकत्र करते हैं, हमारे राजा के वे शत्रु नीचे की ओर मुंह कर के गिरें और पैरों से कुचले जाएं. इस प्रयोजन की सिद्धि के निमित्त मैं असफल न होने वाले मंत्रों के द्वारा अपने राजा के शत्रुओं को क्षीण करता हूं और अपने राजा को विजय दिलाता हूं. (३) ebook converter DEMO Watermarks*