अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
हे अग्नि! सोमलता के अंकुर के समान पुष्ट होने के कारण इस पुरुष के अंगप्रत्यंग पूर्णता को प्राप्त हों. इस गुणवान पुरुष को जीवित रहने के लिए नीरोग कीजिए. (१३) एतास्ते अग्ने समिधः पिशाचजम्भनीः. तास्त्वं जुषस्व प्रति चैना गृहाण जातवेदः.. (१४) हे अग्नि! तुम्हारी ये समिधाएं पिशाचों को नष्ट करने वाली हैं. हे जातवेद! इन समिधाओं को प्राप्त कर के तुम प्रसन्न बनो. (१४) तार्ष्टाधीरग्ने समिधः प्रति गृह्णाह्यार्चिषा. जहातु क्रव्याद्रूपं यो अस्य मांसं जिहीर्षति.. (१५) हे अग्नि! तृषा शांत करने वाली इन समिधाओं को घी के साथ ग्रहण करो. जो राक्षस इस पुरुष के मांस की इच्छा करता है, वह अपने कार्य से विमुख हो जाए. (१५) सूक्त-३० देवता—आयु आवतस्त आवतः परावतस्त आवतः. इहैव भव मा नु गा मा पुर्वाननु गाः पितॄनसुं बध्नामि ते दृढम्.. (१) मैं समीप के देश से और दूर के देश से तेरे प्राणों को दृढ़ता से बांधता हूं. तू यहीं रह और अपने पूर्ववर्ती पितरों का अनुकरण मत कर. (१) यत् त्वाभिचेरुः पुरुषः स्वो यदरणो जनः. उन्मोचनप्रमोचने उभे वाचा वदामि ते.. (२) पितृऋण को न चुकाने वाले जिस पुरुष ने तुझ पर अधिकार किया है, मैं उस से छूटने का उपाय अपने मंत्र बल से तुझे बताता हूं. (२) यद् दुद्रोहिथ शेपिषे स्त्रियै पुंसे अचित्या. उन्मोचनप्रमोचने उभे वाचा वदामि ते.. (३) तूने जिस स्त्री अथवा पुरुष के प्रति वैरभाव रखते हुए इस पापपूर्ण अभिचार का प्रयोग किया है, मैं तुझे उस से मुक्त करने से संबंधित बात बताता हूं. (३) यदेनसो मातृकृताच्छेषे पितृकृताच्च यत्. उन्मोचनप्रमोचने उभे वाचा वदामि ते.. (४) तू अपने पिता अथवा माता द्वारा किए गए पाप के कारण रोगी हो कर शय्या पर पड़ा है. मैं अपनी वाणी से उस रोग से उन्मोचन और प्रमोचन की बात तुझे बताता हूं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
यत् ते माता यत् ते पिता जामिर्भ्राता च सर्जतः. प्रत्यक् सेवस्व भेषजं जरदष्टिं कृणोमि त्वा.. (५) तेरी माता, तेरे पिता, तेरे भाई अथवा तेरी बहन ने जिस मंत्र अथवा ओषधि का प्रयोग तेरे लिए निश्चित किया है, उसे भली प्रकार से सेवन कर. मैं तुझे वृद्धावस्था तक जीवित रहने वाला बनाता हूं. (५) इहैधि पुरुष सर्वेण मनसा सह. दूतौ यमस्य मानु गा अधि जीवपुरा इहि.. (६) हे पुरुष! तू यमराज के दूतों का अनुकरण मत कर अर्थात् मर मत. तू अपने समस्त परिवार जनों के साथ यहां जीवित रह. (६) अनूहूतः पुनरेहि विद्वानुदयनं पथः. आरोहणमाक्रमणं जीवतोजीवतोऽयनम्.. (७) तू उदय होने के मार्ग को जानने वाला है और इस यज्ञ कर्म के द्वारा बुलाया गया है. उत्तरायण एवं दक्षिणायन तेरे जीवन में ही व्यतीत हों. (७) मा बिभेर्न मरिष्यसि जरदष्टिं कृणोमि त्वा. निर्वोचमहं यक्ष्ममङ्गेभ्यो अङ्ग़ज्वरं तव.. (८) हे रोगी! तू भय त्याग दे, क्योंकि तू मरेगा नहीं. मैं तुझे वृद्धावस्था तक इस लोक में रहने योग्य बनाता हूं. तेरे शरीर में से यक्ष्मा रोग और अस्थिगत ज्वर दूर हो चुका है. (८) अङ्गभेदो अङ्ग़ज्वरो यश्च ते हृदयामयः. यक्ष्मः श्येन इव प्रापप्तद् वाचा साढः परस्तराम्.. (९) तेरे शरीर में व्याप्त ज्वर, तेरा हृदय रोग एवं यक्ष्मा रोग—ये सभी मेरे मंत्र रूपी बाणों से तिरस्कृत हो कर उड़ने वाले बाज पक्षी के समान दूर जा कर गिरे हैं. (९) ऋषी बोधप्रतीबोधावस्वप्नो यश्च जागृविः. तौ ते प्राणस्य गोप्तारौ दिवा नक्तं च जागृताम्.. (१०) जो बोध, प्रतिबोध, स्वप्न और जागृति नामक तेरे प्राणरक्षक ऋषि हैं, वे रातदिन जागते रहें. (१०) अयमग्निरुपसद्य इह सूर्य उदेतु ते. उदेहि मृत्योर्गम्भीरात् कृष्णाच्चित् तमसस्परि.. (११) यह अग्नि समीप रहने योग्य है. तेरे लिए सूर्य इसी लोक में उदय हो. तू गहरी, काली ebook converter DEMO Watermarks*
और अंधकारपूर्ण मृत्यु से निकल कर जीवन को प्राप्त हो. (११) नमो यमाय नमो अस्तु मृत्यवे नमः पितृभ्य उत ये नयन्ति. उत्पारणस्य यो वेद तमग्निं पुरो दधे ऽ स्मा अरिष्टतातये.. (१२) यमराज के लिए नमस्कार है. मृत्यु के लिए नमस्कार है. पितरों के लिए नमस्कार है. ये तुझे ले जाने वाले हैं. जो अग्नि शरीर के पारण की विधि जानते हैं, वे तेरे कल्याण के लिए आए हैं. मैं तुझे स्थापित करता हूं. (१२) ऐतु प्राण ऐतु मन ऐतु चक्षुरथो बलम्. शरीरमस्य सं विदां तत् पद्भ्यां प्रति तिष्ठतु.. (१३) इस पुरुष को प्राण, नेत्र और बल प्राप्त हों. मैं ने इस के शरीर को मंत्र शक्ति के द्वारा प्राण युक्त किया है. वह अपने पैरों पर खड़ा हो जाए. (१३) प्राणेनाग्ने चक्षुषा सं सृजेमं समीरय तन्वा ३ सं बलेन. वेत्थामृतस्य मा नु गान्मा नु भूमिगृहो भुवत्.. (१४) हे अग्नि! तुम इस पुरुष को प्राण और चक्षु से युक्त करो तथा इस के शरीर में बल भर दो. तुम अमृत के जानने वाले हो. यह इस लोक से प्रस्थान न करे और श्मशान इस का घर न बने. (१४) मा ते प्राण उप दसन्मो अपानो ऽ पि धायि ते. सूर्यस्त्वाधिपतिर्मृत्योरुदायच्छतु रश्मिभिः.. (१५) हे रोगी! तेरे प्राणों का क्षय न हो तथा तेरी अपान वायु भी तेरा त्याग न करे. सूर्य अपनी किरणों द्वारा मृत्यु शय्या पर पड़े हुए तुझे उस से उठा दें. (१५) इयमन्तर्वदति जिह्वा बद्धा पनिष्पदा. त्वया यक्ष्मं निरवोचं शतं रोपीश्च तक्मनः.. (१६) भीतर से हिलती हुई और मुख में बांधी हुई मेरी जीभ कहती है कि तुझे यक्ष्मा रोग ने त्याग दिया है और तेरे ऊपर ज्वर का आक्रमण शांत हो गया है. (१६) अयं लोकः प्रियतमो देवानामपराजितः. यस्मै त्वमिह मृत्यवे दिष्टः पुरुष जज्ञिषे. स च त्वांनु ह्वयामसि मा पुरा जरसो मृथाः.. (१७) यह पराजित न होने वाला मृत्युलोक देवों को भी प्रिय है. इस लोक में तूने मृत्यु के लिए ही जन्म लिया है. वह मृत्यु तेरा आह्वान करती है. तू वृद्धावस्था से पहले मृत्यु को प्राप्त न ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-३१ देवता—कृत्या का प्रतिहरण
हो. (१७) सूक्त-३१ देवता—कृत्या का प्रतिहरण यां ते चक्रुरामै पात्रे यां चक्रुर्मिश्रधान्ये. आमे मांसे कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रति हरामि ताम्.. (१) हे कृत्या! अभिचार करने वाले ने मिट्टी के कच्चे पात्र में चावल, जौ, गेहूं, उपवाक, तिल एवं कांगनी के मिले हुए अन्नों में अथवा मुरगे आदि के मांसों में तुझे स्थित किया है. मैं तुझे उसी की ओर लौटाता हूं, जिस ने अभिचार कर के तुझे भेजा है. (१) यां ते चक्रुः कृकवाकावजे वा यां कुरीरिणि. अव्यां ते कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रति हरामि ताम्.. (२) हे कृत्या! अभिचारकर्ता ने तुझे मुरगे अथवा बकरे के मांस में अथवा पेड़ पर स्थित किया है. मैं तुझे उसी की ओर लौटाता हूं, जिस ने तुझे अभिचार कर के भेजा है. (२) यां ते चक्रुरेकशफे पशूनामुभयादति. गर्दभे कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रति हरामि ताम्.. (३) हे कृत्या! अभिचारकर्ता ने तुझे एक शाफ अर्थात् टाप वाले और दोनों ओर दांतों वाले (घोड़े या गधे) पशु पर स्थित किया है. हम तुझे उसी की ओर लौटाते हैं, जिस ने अभिचार कर के तुझे भेजा है. (३) यां ते चक्रूरमूलायां वलगं वा नराच्याम्. क्षेत्रे ते कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रति हरामि ताम्.. (४) हे कृत्या! अभिचारकर्ता ने तुझे मनुष्यों द्वारा पूजित खाने के पदार्थ में ढक कर खेत में स्थित किया है. हम तुझे उसी की ओर लौटाते हैं, जिस ने अभिचार कर के तुझे भेजा है. (४) यां ते चक्रुर्गार्हपत्ये पूर्वाग्नावुत दुश्चितः. शालायां कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रति हरामि ताम्.. (५) हे कृत्या! अभिचार करने वाले ने तुझे गार्हपत्य अग्नि में अथवा यज्ञशाला में स्थित किया है. हम तुझे उसी की ओर लौटाते हैं, जिस ने अभिचार कर के तुझे भेजा है. (५) यां ते चक्रुः सभायां यां चक्रुरधिदेवने. अक्षेषु कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रति हरामि ताम्.. (६) हे कृत्या! अभिचार करने वाले ने तुझे सभा में अथवा जुआ खेलने के पासों में स्थित
किया है. हम तुझे उसी की ओर लौटाते हैं, जिस ने अभिचार कर के तुझे भेजा है. (६) यां ते चक्रुः सेनायां यां चक्रुरिष्वायुधे. दुन्दुभौ कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रति हरामि ताम्.. (७) हे कृत्या! अभिचार करने वाले ने तुझे सेना में, बाण पर अथवा दुदुंभि पर स्थित किया है. हम तुझे उसी की ओर लौटाते हैं, जिस ने अभिचार कर के तुझे भेजा है. (७) यां ते कृत्यां कूपे ऽ वदधुः श्मशाने वा निचख्नुः. सद्मनि कृत्यां यां चक्रुः पुनः प्रति हरामि ताम्.. (८) हे कृत्या! अभिचार करने वाले ने तुझे कुएं में, श्मशान में अथवा घर में स्थित किया है. हम तुझे उसी की ओर लौटाते हैं, जिस ने अभिचार कर के तुझे भेजा है. (८) यां ते चक्रुः पुरुषास्थे अग्नौ संकसुके च याम्. म्रोकं निर्दार्हं क्रव्यादं पुनः प्रति हरामि ताम्.. (९) हे कृत्या! अभिचार करने वाले मांसभक्षी ने तुझे पुरुष की हड्डी पर अथवा प्रकाशित अग्नि पर स्थित किया है. हम तुझे उसी की ओर लौटाते हैं, जिस ने अभिचार कर के तुझे भेजा है. (९) अपथेना जभारैणां तां पथेतः प्र हिण्मसि. अधीरो मर्याधीरेभ्यः सं जभाराचित्त्या.. (१०) जिस अज्ञानी अभिचारकर्ता ने कृत्या को बुरे मार्ग से हम मर्यादा में रहने वालों पर भेजा है, हम कृत्या को उसी मार्ग से अभिचार करने वालों की ओर लौटाते हैं. (१०) यश्चकार न शशाक कर्तुं शश्रे पादमङ्गुरिम्. चकार भद्रमस्मभ्यमभागो भगवद्भ्यः.. (११) जिस ने हमारे ऊपर कृत्या का अभिचार किया है, वह हमारी उंगली अथवा पैर को नष्ट नहीं कर सका है. वह अपनी अभिसंधि में सफल न हो और हम भाग्यशालियों का अमंगल न कर सके. (११) कृत्याकृतं वलगिनं मूलिनं शपथैय्यम्. इन्द्रस्तं हन्तु महता वधेनाग्निर्विध्यत्वस्तया.. (१२) शत्रुता रखने वाले जिस अभिचारकर्ता ने छिप कर हम पर कृत्या भेजने का दुष्कर्म किया है, इंद्र उसे अपने विशाल शस्त्र से नष्ट कर दें और अग्नि देव उसे अपनी ज्वालाओं से जला दें. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*
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सूक्त-१ देवता—सविता
छठा कांड सूक्त-१ देवता—सविता दोषो गाय बृहद् गाय द्युमद्धेहि. आथर्वण स्तुहि देवं सवितारम्.. (१) हे अथर्वा ऋषि के पुत्र दध्यङ्ऋषि! स्तुति के योग्य एवं विशाल साम मंत्रों का रातदिन अर्थात् हर समय गुणगान करो तथा उन के द्वारा हमें धन युक्त बनाओ. हे स्तुति करने वाले दध्यङ् ऋषि! तुम अपने नाम मंत्रों द्वारा दानादि गुणों से संपन्न सविता देव की स्तुति करो. (१) तमु ष्टुहि यो अन्तः सिन्धौ सूनुः. सत्यस्य युवानमद्रोधवाचं सुशेवम्.. (२) हे स्तुति करने वाले! उन्हीं सविता देव की स्तुति करो जो ब्रह्म के प्रथम पुत्र हैं एवं जो प्रवाहशील सागर से उदित होते दिखाई देते हैं. वे नित्य तरुण, रात्रि के अंधकार का विनाश करने वाले एवं शोभन वचन उच्चारण करने वाले हैं. (२) स घा नो देवः सविता साविषदमृतानि भूरि. उभे सुष्टुती सुगातवे.. (३) वे ही सविता देव हमें अमर बनाने के साधन यज्ञों अधिक मात्रा में देवों को प्राप्त कराएं एवं हमें मृत्यु विरोधी बल प्रदान करें. वे सविता देव हमें शोभन स्तुति के साधन दोनों प्रकार के रथंतर साम गान हेतु प्रेरित करें. (३) सूक्त-२ देवता—सोम इन्द्राय सोममृत्विजः सुनोता च धावत. स्तोतुर्यो वचः शृणवद्ववं च मे.. (१) हे अध्वर्यु आदि ऋत्विजो! इंद्र के लिए सोम को निचोड़ो और निचोड़े गए सोम का दशापवित्र के द्वारा सभी प्रकार शोधन करो. वे इंद्र मुझ स्तोता के स्तुति लक्षण आह्वान को सुनें तथा आदरपूर्वक जानें. (१) आ यं विशन्तीन्दवो वयो न वृक्षमन्धसः. विरप्शिन् वि मृधो जहि रक्षस्विनीः.. (२) जिस प्रकार पक्षी अपने निवास वाले वृक्ष पर स्वेच्छा से शीघ्र पहुंच जाते हैं, उसी प्रकार ebook converter DEMO Watermarks*
सोम इंद्र के शरीर में शक्ति उत्पादक के रूप में स्वयं पहुंच जाते हैं. हे महान इंद्र! सोम पान से उत्तेजित हो कर हमें बाधा पहुंचाने वाले सैनिकों से युक्त एवं युद्ध करती हुई शत्रु सेनाओं का विनाश करो. (२) सुनोता सोमपाव्ने सोममिन्द्राय वज्रिणे. युवा जेतेशानः स पुरुष्टुतः.. (३) हे अध्वर्युगण! सोमपान के लिए उत्सुक एवं हाथ में वज्र धारण करने वाले इंद्र के लिए सोमरस निचोड़ो. वे इंद्र नित्य तरुण, विजयी, सारे संसार के समीप तथा बहुत से यजमानों द्वारा प्रशंसित हैं. (३) सूक्त-३ देवता—इंद्र, पूषा पातं न इन्द्रापूषणादितिः पान्तु मरुतः. अपां नपात् सिन्धवः सप्त पातन पातु नो विष्णुरुत द्यौः.. (१) हे इंद्र और पूषादेव! हमारी रक्षा करो. देवमाता अदिति हमारी रक्षा करें. उनचास मरुद्गण हमारी रक्षा करें. अपानपात अर्थात् जल को ईंधन बनाने वाले अग्नि देव एवं सात सागर हमारी रक्षा करें. विष्णु एवं आकाश हमारी रक्षा करें. आह्वनीय अग्नि और अग्नि की सुखकर तथा राक्षसों द्वारा दिए हुए दुःख से रक्षक किरणें हमारी रक्षा करें. (१) पातां नो द्यावापृथिवी अभिष्टये पातु ग्रावा पातु सोमो नो अंहसः. पातु नो देवी सुभगा सरस्वती पात्वग्निः शिवा ये अस्य पायवः.. (२) द्यावा और पृथिवी अभिमत फल पाने के लिए हमारी रक्षा करें. सोमरस कुचलने का पत्थर और सोमरस पाप से हमारी रक्षा करे. सौभाग्ययुक्त देवी सरस्वती हमारी रक्षा करे. अग्नि हमारी रक्षा करे, जिनकी किरणें हमें पवित्र करती हैं. (२) पातां नो देवाश्विना शुभस्पती उषासानक्तोत न उरुष्यताम्. अपां नपादभिहुती गयस्य चिद् देव त्वष्ट्र्वर्धय सर्वतातये.. (३) हे दानादि गुणयुक्त एवं दीप्त तेज वाले अश्विनीकुमारो! हे दिन और रात के अधिष्ठाता देवो! हमारी रक्षा करो. अपानपात अर्थात् मेघों के जल को बढ़ाने वाले अग्नि राक्षस आदि की हिंसा से हमें बचाएं. हे त्वष्टा देव! सभी फलों की प्राप्ति के लिए हमें बढ़ाओ. (३) सूक्त-४ देवता—त्वष्टा त्वष्टा मे दैव्यं वचः पर्जन्यो ब्रह्मणस्पतिः. पुत्रैर्भ्रातृभिरदितिर्नु पातु नो दुष्टरं त्रायमाणं सहः.. (१) त्वष्टा एवं ब्रह्मणस्पति अर्थात् इस मंत्र के अधिपतिदेव मेरे स्तुति लक्षण वचनों को सुनें. ebook converter DEMO Watermarks*
अदिति अपने पुत्रों और भ्राताओं के साथ हमारे रक्षक एवं शत्रुओं द्वारा अतिक्रमण रहित बल की शीघ्र रक्षा करें. (१) अंशो भगो वरुणो मित्रो अर्यमादितिः पान्तु मरुतः. अप तस्य द्वेषो गमेदभिहुतो यावयच्छत्रुमन्तितम्.. (२) अदिति और उन के भग, वरुण, मित्र और अर्यमा नामक पुत्र और उनचास मरुतों का समूह मेरी रक्षा करें. इन का द्वेष कर्म हम से दूर चला जाए. तुम हम से द्वेष रखने वाले शत्रु को हम से पृथक् करो. (२) धिये समश्विना प्रावतं न उरुष्या ण उरुज्मन्नप्रयुच्छन्. द्यौ ३ ष्पिप्रीयय दुच्छुना या.. (३) हे अश्विनीकुमारो! अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्म करने की सद्बुद्धि के लिए हमारी रक्षा करो. हे विस्तीर्ण गमन वाले वायु देव! तुम प्रमाद न करते हुए हमारी रक्षा करो. हे पिता के समान द्युलोक! कुत्ते के समान आक्रमण करने वाली पाप की देवी को हमारे पास से भगाओ. (३) सूक्त-५ देवता—अग्नि, इंद्र उदेनमुत्तरं नयाग्ने घृतेनाहुत. समेनं वर्चसा सृज प्रजया च बहुं कृषि.. (१) हे घृत के द्वारा बुलाए गए अग्नि देव! तुम इस यजमान को उत्तम पद प्राप्त कराओ. उत्तम पद प्राप्त कराने के पश्चात तुम इस यजमान को शारीरिक तेज से युक्त करो तथा पुत्र, पौत्र आदि से समृद्ध बनाओ. (१) इन्द्रेमं प्रतरं कृषि सजातानामसद् वशी. रायस्पोषण सं सृज जीवातवे जरसे नय.. (२) हे इंद्र! इस यजमान की अतिशय वृद्धि करो. तुम्हारी कृपा से यह अपने बंधुओं के मध्य सब को वश में करने वाला तथा स्वयं स्वतंत्र बने. तुम इसे धन संपन्न बनाओ तथा इस के जीवन को वृद्धावस्था तक पहुंचाओ. (२) यस्य कृण्मो हविर्गृहे तमग्ने वर्धया त्वम्. तस्मै सोमो अधि ब्रवदयं च ब्रह्मणस्पतिः.. (३) हे अग्नि देव! हम जिस यजमान के घर में यज्ञ कर रहे हैं, उस यजमान को तुम समृद्ध बनाओ. सोम देव एवं ब्रह्मणस्पति देव इसे अपना कहें. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-६ देवता—ब्रह्मणस्पति
सूक्त-६ देवता—ब्रह्मणस्पति यो ३ स्मान् ब्रह्मणस्पते ऽ देवो अभिमन्यते. सर्वं तं रन्धयासि मे यजमानाय सुन्वते.. (१) हे ब्रह्मणस्पति देव! जो देव विरोधी शत्रु हमें वध करने योग्य मानता है, उस को सोम रस निचोड़ने वाले मुझ यजमान के वश में करो. (१) यो नः सोम सुशंसिनो दुःशंस आदिदेशति. वज्रेणास्य मुखे जहि स संपिष्टो अपायति.. (२) हे सोम! दुर्वचन बोलने वाला जो शत्रु हमें बाधा पहुंचाता है और अपने कठोर वचनों से हमारा पराभव करता है, उस के मुख पर वज्र का प्रहार करो. वह शत्रु वज्र के आघात से छिन्नभिन्न हो कर भाग जाए. (२) यो नः सोमाभिदासति सनाभिर्यश्च निष्ट्यः. अप तस्य बलं तिर महीव द्यौर्वधत्मना.. (३) हे सोम! हमारा जो संबंधी हमारा अभिभव करना चाहता है तथा जो निकृष्ट शत्रु हमें बाधा पहुंचाता है, तुम उस को उसी प्रकार नष्ट कर दो, जिस प्रकार द्युलोक वज्र के द्वारा विनाश करता है. (३) सूक्त-७ देवता—सोम येन सोमादितिः पथा मित्रा वा यन्त्यद्रुहः. तेना नो ऽ वसा गहि.. (१) हे सोम! जिस मार्ग से, अदिति मित्र एवं उस के बारह पुत्र अनुग्रह करते हुए सरंचना करते हैं, उसी मार्ग से हमारा कल्याण करते हुए आओ. (१) येन सोम साहन्त्यासुरान् रन्धयासि नः. तेना नो अधि वोचत.. (२) हे सोम! जिस बल के द्वारा तुम हमारे शक्तिशाली शत्रुओं का विनाश करते हो, उसी शक्ति के द्वारा हमें आशीर्वाद वचन सुनाओ. (२) येन देवा असुराणामोजांस्यवृणीध्वम्. तेना नः शर्म यच्छत.. (३) हे देवो! तुम अपने जिस बल से शत्रुओं की शक्ति अपने में मिला लेते हो, उसी बल के द्वारा हमारे लिए सुख प्रदान करो. (३) सूक्त-८ देवता—कामात्मा ebook converter DEMO Watermarks*
यथा वृक्षं लिबुजा समन्तं परिषस्वजे. एवा परि ष्वजस्व मां यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा असः.. (१) हे पत्नी! जिस प्रकार लता चारों ओर से वृक्ष को लपेटती है, उसी प्रकार तू मेरा आलिंगन कर. जिस प्रकार तू मेरी कामना करती हुई मेरे समीप से कहीं न जाए, उसी प्रकार मैं तुझे अपने वश में करता हूं. (१) यथा सुपर्णः प्रपतन् पक्षौ निहन्ति भूम्याम्. एवा नि हन्मि ते मनो यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा असः.. (२) हे कामिनी! जिस प्रकार गरुड़ अपने निवास स्थान से उड़ता हुआ धरती पर अपने दोनों पंखों को पटकता है, उसी प्रकार मैं तेरे हृदय को पीड़ित करता हूं. जिस प्रकार तू मेरी कामना करती हुई मेरे समीप से कहीं न जाए, उसी प्रकार मैं तुझे अपने वश में करता हूं. (२) यथेमे द्यावापृथिवी सद्यः पर्येति सूर्यः. एवा पर्येमि ते मनो यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा असः.. (३) हे नारी! सब का प्रेरक सूर्य जिस प्रकार इस आकाश और धरती को शीघ्र व्याप्त कर लेता है, उसी प्रकार मैं तेरे मन को व्याप्त करूंगा. जिस प्रकार तू मेरी कामना करती हुई मेरे समीप से कहीं न जाए, उसी प्रकार मैं तुझे अपने वश में करता हूं. (३) सूक्त-९ देवता—कामात्मा वाञ्छ मे तन्वं १ पादौ वाञ्छाक्ष्यौ ३ वाञ्छ सक्थ्यौ. अक्ष्यौ वृषण्यन्त्याः केशा मां ते कामेन शुष्यन्तु.. (१) हे कामिनी! तू मेरे शरीर, पैरों, नेत्रों और जंघाओं की कामना कर. तू ऐसे पुरुष की कामना करती है, जो तुझे संतुष्ट कर सके. तेरी सुंदर आंखें और केश मेरे मन को व्याकुल करते हैं. (१) मम त्वा दोषणिश्लिषं कृणोमि हृदयश्लिषम्. यथा मम क्रतावसो मम चित्तमुपायसि.. (२) हे पत्नी! मैं तुझे अपनी बांहों और हृदय में आश्रय लेने वाली बनाता हूं. इस प्रकार तू मेरे संकल्प के अधीन होगी और मेरे चित्त को प्राप्त करेगी. (२) यासां नाभिरारेहणं हृदि संवननं कृतम्. गावो घृतस्य मातरो ऽ मूं सं वानयन्तु मे.. (३) जिन के अंग आनंद प्राप्ति के साधन होते हैं और जिन के हृदय में विधाता ने वशीकरण ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-१० देवता—अग्नि, वायु
की शक्ति प्रदान की है; घी, दूध देने वाली गाएं मेरे ऐसे अधिकार में रहें. (३) सूक्त-१० देवता—अग्नि, वायु पृथिव्यै श्रोत्राय वनस्पतिभ्यो ऽग्नये ऽ धिपतये स्वाहा.. (१) पृथ्वी के लिए, शब्द सुनने के साधन कान के लिए, भूमि पर स्थित वृक्षों के अधिष्ठाता देवों के लिए तथा धरती के स्वामी अग्नि के लिए हव्य शोभन आहुति वाला हो. (१) प्राणायान्तरिक्षाय वयोभ्यो वायवे ऽ धिपतये स्वाहा.. (२) वायु रूप प्राण के लिए, वायु से संबंधित अंतरिक्ष के लिए, पक्षियों के लिए तथा वायु के अधिपति देवता के लिए यह हव्य शोभन आहुति वाला हो. (२) दिवे चक्षुषे नक्षत्रेभ्यः सूर्यायाधिपतये स्वाहा.. (३) आकाश के लिए, नेत्र के लिए, नक्षत्र के लिए तथा द्युलोक के अधिपति सूर्य के लिए यह हव्य शोभन आहुति वाला हो. (३) सूक्त-११ देवता—वीर्य शमीमश्वत्थ आरूढस्तत्र पुंसुवनं कृतम्. तद् वै पुत्रस्य वेदनं तत् स्त्रीष्वा भरामसि.. (१) शमी वृक्ष स्त्री है और अश्वत्थ अर्थात् पीपल का वृक्ष पुरुष है. अग्निरूप पुत्र उत्पन्न करने के लिए वह शमी वृक्ष पर आरूढ़ है. उसी पीपल वृक्ष से अरणियां बनाई जाती हैं, जो अग्नि उत्पादन के काम आती हैं. इस प्रकार के अश्वत्थ पर पुंसवन किया गया है. वह पुंसवन अर्थात् पुत्र प्राप्ति कर्म हम स्त्रियों में करते हैं. (१) पुंसि वै रेतो भवति तत् स्त्रियामनु षिच्यते. तद् वै पुत्रस्य वेदनं तत् प्रजापतिरब्रवीत्.. (२) पुरुषमय बीजरूप वीर्य होता है. वह गर्भाधान कर्म के द्वारा नारी के गर्भाशय में डाला जाता है. वही पुत्र प्राप्ति का साधन बनता है. यह पुंसवन कर्म प्रजापति ने बताया है. (२) प्रजापतिरनुमतिः सिनीवाल्य चीक्लृपत्. स्त्रैषूयमन्यत्र दधत् पुमांसमु दधदिह.. (३) प्रजापति ने, अमावस्या की देवी सिनीवाली ने और पूर्णमासी के देवता ने गर्भाशय में स्थित वीर्य के अंश से हाथ, पैर आदि की रचना की है. उन्होंने स्त्री के प्रसव संबंधी निमित्त ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-१२ देवता—विष निवारण
अर्थात् गर्भ को हम से पृथक् अर्थात् नारी में पुत्र रूपी संतान को एक वर्ष के पश्चात जन्म लेने योग्य बनाया. (३) सूक्त-१२ देवता—विष निवारण परि द्यामिव सूर्यो ऽ हीनां जनिमागमम्. रात्री जगदिवान्यूर्द्धसात् तेना ते वायरॆ विषम्.. (१) जिस प्रकार सूर्य अंतरिक्ष में व्याप्त होता है, उसी प्रकार मैं सर्पों के जन्म को जानता हूं. जिस प्रकार रात्रि अपने अंधकार से सारे संसार को व्याप्त कर लेती है, उसी प्रकार शरीर में व्याप्त विष को मैं ओषधि से दूर करता हूं. (१) यद् ब्रह्माभिर्यदृषिभिर्यद् देवैर्विदितं पुरा. यद् भूतं भव्यमासन्वत् तेना ते वायरॆ विषम्.. (२) जिस ओषधि को प्राचीन काल में मंत्रों ने, अगस्त्य, वसिष्ठ आदि ऋषियों तथा इंद्र आदि देवों ने जाना है, उन भूत, वर्तमान और भविष्यकाल की ओषधियों से मैं तेरे शरीर में स्थित विष का निवारण करता हूं. (२) मध्वा पृञ्चे नद्य १: पर्वता गिरयो मधु. मधु परुष्णी शीपाला शमास्ने अस्तु शं हृदे.. (३) गंगा आदि नदियां, हिमालय आदि विशाल पर्वत और छोटे पर्वत तेरे शरीर में विष नाशक अमृत सींचें. शैवाल से युक्त परुष्णी नाम की नदी तेरे शरीर पर अमृत चुपड़े. यह विषनाशक अमृत तेरे और मेरे हृदय के लिए सुखकारी हो. (३) सूक्त-१३ देवता—मृत्यु नमो देववधेभ्यो नमो राजवधेभ्यः. अथो ये विश्यानां वधास्तेभ्यो मृत्यो नमो ऽ स्तु ते.. (१) इंद्र आदि के हनन साधन वज्र आदि को नमस्कार है, जिस से वे हमारा त्याग कर दें. राजा से संबंधित आयुधों को नमस्कार है. हे मृत्यु! वैश्य जातियों के वध के जो साधन हैं, उन से बचाने के लिए हम तुझे नमस्कार करते हैं. (१) नमस्ते अधिवाकाय परावाकाय ते नमः. सुमत्यै मृत्यो ते नमो दुर्मत्यै त इदं नमः.. (२) हे मृत्यु! तेरा पक्षपात कर के वचन बोलने वाले दूत को तथा पराभव का वर्णन करने वाले के लिए नमस्कार है. हे मृत्यु! तेरी अनुग्रहकारिणी बुद्धि के लिए एवं निग्रह करने वाली ebook converter DEMO Watermarks*
दुर्बुद्धि के लिए नमस्कार है. (२) नमस्ते यातुधानेभ्यो नमस्ते भेषजेभ्य:. नमस्ते मृत्यो मूलेभ्यो ब्राह्मणेभ्य इदं नम:.. (३) हे मृत्यु! तुझ से संबंधित राक्षसों को नमस्कार है, जो लोगों को पीड़ा पहुंचाते हैं. तुझ से रक्षा करने वाली ओषधियों को नमस्कार है. तुझ से संबंधित मूल पुरुषों तथा शापानुग्रह समर्थ ब्राह्मणों के लिए नमस्कार है. (३) सूक्त-१४ देवता—बलास अस्थिस्रंसं परुस्रंसमास्थितं हृदयामयम्. बलासं सर्वं नाशयाङ्गेष्ठा यश्च पर्वसु.. (१) मंत्र की शक्ति से हड्डियों को कंपित करने वाले, शरीर के जोड़ों को ढीला करने वाले तथा सारे शरीर में व्याप्त श्लेष्मा द्वारा किए हुए हृदय रोग की शक्ति का विनाश करे. वह रोग खांसी और सांस से संबंधित है. (१) निर्बलासं बलासिनः क्षिणोमि पुष्करं यथा. छिनद्म्यस्य बन्धनं मूलमुर्वार्व्वा इव.. (२) जिस प्रकार सरोवर से कमल उखाड़ा जाता है, उसी प्रकार मैं इस रोगी पुरुष के श्लेष्मा रोग को जड़ से नष्ट करता हूं. जिस प्रकार पकी हुई ककड़ी अपने नाल से अपनेआप अलग हो जाती है, उसी प्रकार मैं इस रोगी के श्लेष्मा रोग का बंधन तोड़ता हूं. (२) निर्बलासेतः प्र पताशुङ्गः शिशूको यथा. अथो इट इव हायनो ऽ प द्राह्यवीरहा.. (३) हे श्लेष्मा रोग! जिस प्रकार भागा हुआ शुंशुकि हरिण दूर चला जाता है तथा गया हुआ संवत्सर फिर वापस नहीं आया, उसी प्रकार हमारे वीरों के विनाशकारी तू इस रोगी को छोड़ कर बुरी दिशा में चला जा. (३) सूक्त-१५ देवता—वनस्पति उत्तमो अस्योषधीनां तव वृक्षा उपस्तयः. उपस्तिरस्तु सो ३ स्माकं यो अस्मां अभिदासति.. (१) हे सोमपर्ण से उत्पन्न पलाश वृक्ष! तू वनस्पतियों में उत्तम है. सभी वृक्ष तेरे उपासक अर्थात् तुझ से निम्न स्थिति वाले हैं. तेरी कृपा से हमारा वह शत्रु हमारा उपासक बने जो हमें नष्ट करना चाहता है. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
सबन्धुश्चासबन्धुश्च यो अस्माँ अभिदासति. तेषां सा वृक्षाणामिवाहं भूयासमुत्तमः.. (२) हमारे गोत्र वाला अथवा हमारे गोत्र से भिन्न जो शत्रु हमें क्षीण करना चाहता है, उन सब में मैं उसी प्रकार उत्तम बनूं, जिस प्रकार तू सभी वृक्षों में श्रेष्ठ है. (२) यथा सोम ओषधीनामुत्तमो हविषां कृतः. तलाशा वृक्षाणामिवाहं भूयासमुत्तमः.. (३) जिस प्रकार पुरोडाश के प्रयोग के लिए सोमलता सभी लताओं और वनस्पतियों में श्रेष्ठ मानी जाती है, उसी प्रकार मैं अपने गोत्र वालों में श्रेष्ठ बनूं. (३) सूक्त-१६ देवता—मंत्र में उक्त आबयो अनाबयो रसस्त उग्र आबयो. आ ते करम्भमद्मसि.. (१) हे रोग निवृत्ति के लिए खाई जाने वाली सरसों एवं न खाए जाने वाले सरसों के तने! तेरा रस अर्थात् तेल रोग निवारण में सक्षम है. हे सरसों! हम तेरा करम्भ (साग) मंत्रों से युक्त कर के खाते हैं. (१) विहह्लो नाम ते पिता मदावती नाम ते माता. स हि न त्वमसि यस्त्वमात्मानमावयः.. (२) हे सरसों के साग! तेरा पिता विहह्वल तथा माता मदावती नाम की है. तू अपना साग मनुष्यों को खाने के लिए दे देती है, इसलिए तू अपने मातापिता के समान नहीं रहती. (२) तौविलिके ऽ वेलयावायमैलब ऐलयीत्. बभ्रुश्च बभ्रुकर्णश्चापेहि निराल.. (३) हे तौविलिक नाम की पिशाची! तू रोगों का कारण है. तू हमारे रोग को पराजित कर के लौटा दे. तेरे द्वारा होने वाला ऐलय नाम का नेत्र रोग दूर चला जाए. हे बभ्रु, बभ्रुवर्ण तथा निराल नामक रोग! तुम इस पुरुष के शरीर से भाग जाओ. (३) अलसालासि पूर्वा सिलाञ्जालास्युत्तरा. नीलागलसाला.. (४) पौधों की मंजरी अलसाला प्रथम उत्पन्न होने के कारण पूर्व है और बाद में उत्पन्न होने के कारण सिलांजाला उत्तरा है. नीलागलसाला इन के मध्य वाली है. (४) सूक्त-१७ देवता—गर्भ बृंहण ebook converter DEMO Watermarks*
यथेयं पृथिवी मही भूतानां गर्भमादधे. एवा ते ध्रियतां गर्भो अनु सूतं सवितवे.. (१) हे नारी! जिस प्रकार विशाल पृथ्वी प्राणियों के शरीर को धारण करती है, उसी प्रकार तेरा गर्भ भी प्रसव के समय जन्म लेने के लिए स्थित रहे. (१) यथेयं पृथिवी मही दाधारेमान् वनस्पतीन्. एवा ते ध्रियतां गर्भो अनु सूतं सवितवे.. (२) यह विशाल पृथ्वी जिस प्रकार वृक्षों को धारण करती है, उसी प्रकार तेरा गर्भ भी प्रसव के समय जन्म लेने के हेतु स्थित रहे. (२) यथेयं पृथिवी मही दाधार पर्वतान् गिरीन्. एवा ते ध्रियतां गर्भो अनु सूतं सवितवे.. (३) हे नारी! जिस प्रकार यह विशाल पृथ्वी पर्वतों को धारण करती है, उसी प्रकार तेरा गर्भ भी प्रसव के समय जन्म लेने के लिए स्थित रहे. (३) यथेयं पृथिवी मही दाधार विष्ठितं जगत्. एवा ते ध्रियतां गर्भो अनु सूतं सवितवे.. (४) हे नारी! यह विशाल पृथ्वी जिस प्रकार चराचर जगत् को धारण करती है. उसी प्रकार तेरा गर्भ भी प्रसव के समय जन्म लेने के लिए स्थित रहे. (४) सूक्त-१८ देवता—ईर्ष्या विनाशन ईर्ष्याया ध्राजिं प्रथमां प्रथमस्या उतापराम्. अग्निं हृदयं १ शोकं तं ते निर्वापयामसि.. (१) हे ईर्ष्या करने वाले पुरुष! तेरी ईर्ष्यापूर्ण मति यह है कि इस स्त्री को कोई देख न ले. इस मति को शांत करते हुए हम तेरे हृदय विदारक शोक एवं क्रोध को शांत करते हैं. (१) यथा भूमिर्मृतमना मृतान्मृतमनस्तरा. यथोत मम्रुषो मन एवेष्योर्मृतं मनः.. (२) सब प्राणियों से अधिष्ठित पृथ्वी शांत मन वाली और सब के शरीर से भी उदात्त मन वाली होती है. जिस प्रकार मृत पुरुष का मन ईर्ष्या रहित होता है, उसी प्रकार स्त्री विषयक ईर्ष्यायुक्त पुरुष का मन भी शांत हो जाए. (२) अदो यत् ते हृदि श्रितं मनस्कं पतयिष्णुकम्. ebook converter DEMO Watermarks*
ततस्त ईर्ष्यां मुञ्चामि निरूष्माणं दृतेरिव.. (३) हे ईर्ष्याग्रस्त पुरुष! लोहार जिस प्रकार भस्त्रा अर्थात् धौंकनी से सांस बाहर निकालता है, वैसे ही मैं तेरे हृदय से ईर्ष्या दूर करता हूं. (३) सूक्त-१९ देवता—मंत्र में उक्त पुनन्तु मा देवजनाः पुनन्तु मनवो धिया. पुनन्तु विश्वा भूतानि पवमानः पुनातु मा.. (१) देवगण मुझे पवित्र करें. मनुष्य मुझे बुद्धि अथवा कर्म के द्वारा पवित्र करें. सभी प्राणी मुझे पवित्र करें और अंतरिक्ष में विचरण करने वाली वायु मुझे पवित्र करे. (१) पवमानः पुनातु मा क्रत्वे दक्षाय जीवसे. अथो अरिष्टतातये.. (२) निचोड़ा जाता हुआ सोम मुझे यज्ञ कर्म के लिए, बल प्राप्ति के लिए, जीवन के लिए तथा अहिंसा करने के लिए पवित्र करे. (२) उभाभ्यां देव सवितः पवित्रेण सवेन च. अस्मान् पुनीहि चक्षसे.. (३) हे सब के प्रेरक सविता देव! तुम्हारा तेज पवित्र करने का साधन है. अपने तेज और प्रेरणा से हमें इहलोक और परलोक के सुख के साधन यज्ञ के लिए शुद्ध करो. (३) सूक्त-२० देवता—यक्ष्मा नाशक अग्नेरिवास्य दहत एति शुष्मिण उतेव मत्तो विलपन्नपायति. अन्यमस्मदिच्छतु कं चिद्व्रतस्तपुर्वधाय नमो अस्तु तक्मने.. (१) गीले और सूखे सब को जलाने वाली दावाग्नि के समान अंगों को जलाने वाले इस ज्वर का दाह सारे शरीर में व्याप्त है. उस समय व्यक्ति उन्मत्त के समान विलाप करता हुआ इस लोक से चला जाता है. इस प्रकार का प्रबल पित्त ज्वर हमें त्याग कर किसी चरित्रहीन पुरुष के पास चला जाए. (१) नमो रुद्राय नमो अस्तु तक्मने नमो राज्ञे वरुणाय त्विषीमते. नमो दिवे नमः पृथिव्यै नम ओषधीभ्यः.. (२) ज्वर के अभिमानी देव रुद्र के लिए नमस्कार है. ज्वर के लिए नमस्कार है. दीप्तिशाली एवं स्वामी वरुण के लिए नमस्कार है. द्युलोक तथा पृथ्वी के लिए नमस्कार है. पृथ्वी पर उत्पन्न ओषधियों को नमस्कार है. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
अयम् यो अभिशोचयिष्णुर्विश्वा रूपाणि हरिता कृणोषि. तस्मै ते ऽरुणाय बभ्रवे नमः कृणोमि वन्द्याय तक्मने.. (३) सभी ओर से पूरे शरीर को शोकयुक्त करता हुआ, जो यह पित्त ज्वर है, वह सभी प्राणियों का रक्त दूषित कर के उन्हें हल्दी के समान पीला बना देता है. उस रक्त वर्ण एवं पीत वर्ण तथा सेवा करने योग्य ज्वर को नमस्कार है. (३) सूक्त-२१ देवता—चंद्रमा इमा यास्तिस्रः पृथिवीस्तासां ह भूमिरुत्तमा. तासामधि त्वचो अहं भेषजं समु जग्रभम्.. (१) ये जो पृथ्वी आदि तीन लोक हैं, उन में यह पृथ्वी उत्तम है, जिस पर हम स्थित हैं. पृथ्वी की त्वचा के समान ऊपर वर्तमान जो भूमि है, मैं उस पर उत्पन्न ओषधियों का संग्रह करता हूं. (१) श्रेष्ठमसि भेषजानां वसिष्ठं वीरुधानाम्. सोमो भग इव यामेषु देवेषु वरुणो यथा.. (२) हे हरिद्रा! तू अमोघ शक्ति के कारण अन्य भेषजों में उसी प्रकार प्रशंसनीय है तथा वीरुधों में मुख्य है, जैसे रात्रि और दिन के काल विभाग के कारण चंद्रमा एवं सूर्य मुख्य हैं. (२) रेवतीरनाधृषः सिषासवः सिषासथ. उत स्थ केशदृंहणीरथो ह केशवर्धनीः.. (३) हे धनवती ओषधियो! तुम किसी के द्वारा हिंसित नहीं हो. तुम आरोग्य देने के लिए इच्छुक हो, इसलिए मुझे आरोग्य प्रदान करो. तुम केशों को दृढ़ बनाने वाली हो, इसलिए मेरे केशों को दृढ़ करो. (३) सूक्त-२२ देवता—आदित्य रश्मि, मरुत् कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत् पतन्ति. त आववृत्रन्त्सदनादृतस्यादिद् घृतेन पृथिवीं व्यू दुः.. (१) कृष्ण वर्ण अंतरिक्ष को पा कर सूर्य की किरणें पृथ्वी के पदार्थों का रस ग्रहण करती हुई द्युलोक में पहुंच जाती हैं. वे सूर्य किरणें जल को सूर्य मंडल से वृष्टि के रूप में लाती हैं और बाद में धरती को जल से गीला कर देती हैं. (१) पयस्वतीः कृणुथाप ओषधीः शिवा यदेजथा मरुतो रुक्मवक्षसः. ebook converter DEMO Watermarks*
ऊर्जां च तत्र सुमतिं च पिन्वत यत्रा नरो मरुतः सिञ्चथा मधु.. (२) हे मरुद्गण! स्वर्ण से बने आभूषण वक्ष स्थल पर धारण कर के तुम जब चलते हो तो जलों को रसमय और ओषधियों को सुखकारी बनाते हो. हे नेता मरुद्गण! तुम जहां पर वर्षा का जल गिराते हो, उस देश में बल कारक अन्न और बुद्धियुक्त प्रजा का पोषण करो. (२) उदप्रुतो मरुतस्ताँ इयर्त वृष्ट्या विश्वा निवतस्पृणाति. एजाति ग्लहा कन्येव तुन्नैरुं तुन्दाना पत्येव जाया.. (३) हे मरुद्गण! तुम जल बरसाने वाले उन मेघों को प्रेरित करो, जिन से संबंधित वर्षा सभी फसलों को और सरिताओं को पुष्ट करती है. जिस प्रकार दरिद्र मातापिता अपनी कन्या को देख कर दुःखी होते हैं, मेघ उसी प्रकार अपनी गर्जना से लोगों को भयभीत और कंपित करते हैं. पत्नी जिस प्रकार पति से बातचीत करती हुई उसे अन्न आदि प्रदान करती है, मेघ गर्जन रूपी वाणी उसी प्रकार गमनशील मेघ से बात करती है. (३) सूक्त-२३ देवता—जल सस्रुषीस्तदपसो दिवा नक्तं च सस्रुषीः. वरेण्यक्रतुरहमपो देवीरुप ह्वये.. (१) उत्तम कर्म करने वाला मैं सभी प्राणियों के जीवन का रूप प्राप्त करने वाले, जगत् के रक्षक एवं सदैव बहने वाले जलों को अपने समीप बुलाता हूं. (१) ओता आपः कर्मण्या मुञ्चन्वित्त्वितः प्रणीतये. सद्य कृण्वन्त्वेतवे.. (२) सदैव बहने वाले, लौकिक और वैदिक कर्मों के साधन जल हमें उत्तम फल शीघ्र पाने के लिए सभी पापों से बचाएं. (२) देवस्य सवितुः सवे कर्म कृण्वन्तु मानुषाः. शं नो भवन्त्वप ओषधीः शिवाः.. (३) प्रकाशित होने वाले एवं सब के प्रेरक सूर्य की प्रेरणा होने पर मनुष्य लौकिक और वैदिक कर्म करे. जल हमारे लिए कल्याणकारी हों और ओषधियां हमारे पापों को शांत करें. (३) सूक्त-२४ देवता—जल हिमवतः प्रस्रवन्ति सिन्धौ समह संगमः. आपो ह मह्यं तद् देवीर्ददन् हृद्द्योतभेषजम्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
पाप नाशक गंगा आदि नदियों का जल हिमालय से निकलता है और सागर में मिलता है. इस प्रकार का दिव्य जल हृदय की जलन मिटाने वाली ओषधियां प्रदान करे. (१) यन्मे अक्ष्योराद्योत पाष्ण्योः प्रपदोश्च यत्. आपस्तत् सर्व निष्करन् भिषजां सुभिषक्तमाः.. (२) जो रोग मेरी आंखों को व्यथित करते हैं, जो मेरे घुटनों और जांघों में आश्रय लेते हैं, व्याधि विनाशकों में कुशल दिव्य जल उन सब को नष्ट करें. (२) सिन्धुपत्नीः सिन्धुराज्ञीः सर्वा या नद्य १ स्थन. दत्त नस्तस्य भेषजं तेना वो भुनजामहै.. (३) हे जलो! सागर तुम्हारा पति है और तुम सागर रूपी राजा की पत्नियां हो. तुम सब नदी रूप हो जाओ. तुम सब मुझे उस रोग को दूर करने की ओषधि दो, जिस से मैं निरोग हो सकूं. (३) सूक्त-२५ देवता—गंडमालाविनाशन पञ्च च याः पञ्चाशच्च संयन्ति मन्या अभि. इतस्ताः सर्वा नश्यन्तु वाका अपचितामिव.. (१) गले के ऊपरी भाग में स्थित पचपन प्रकार की गंड मालाएं गले के ऊपरी भाग की धमनियों को व्याप्त करती हैं. वे सब इस प्रकार नष्ट हो जाएं, जिस प्रकार पतिव्रता को पा कर सभी दोष नष्ट हो जाते हैं. (१) सप्त च याः सप्ततिश्च संयन्ति ग्रैव्या अभि. इतस्ताः सर्वा नश्यन्तु वाका अपचितामिव.. (२) गरदन की नसों में स्थित सतहत्तर प्रकार की गंडमालाएं गरदन की धमनियों को व्याप्त करती हैं. वे सब इस प्रकार नष्ट हो जाएं, जिस प्रकार पतिव्रता को पा कर सभी दोष नष्ट हो जाते हैं. (२) नव च या नवतिश्च संयन्ति स्कन्ध्या अभि. इतस्ताः सर्वा नश्यन्तु वाका अपचितामिव.. (३) कंधों की नसों में स्थित निन्यानवे प्रकार की गंडमालाएं कंधों की धमनियों को व्याप्त करती हैं. वे सब इस प्रकार नष्ट हो जाएं, जिस प्रकार पतिव्रता को पा कर सभी दोष नष्ट हो जाते हैं. (३) सूक्त-२६ देवता—पाप्मा ebook converter DEMO Watermarks*