अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
यह दिखाई देता हुआ सूर्य हजार वर्ष तक हमें दिखाई देता रहे. क्रांतदर्शी पुरुषों के द्वारा मनन करने योग्य, सब को अपनेअपने कर्मों में लगाने वाले ये सूर्य हमें प्रतिदिन सत्कर्म करने की प्रेरणा देते रहें. (१) ब्रध्नः समीचीरुषसः समैरयन्. अरेपसः सचेतसः स्वसरे मन्युमत्तमाश्रिते गोः.. (२) पाप रहित, समान ज्ञान वाले एवं दिन के समय अतिशय दीप्तिशाली सूर्य हमें पूजा आदि कर्मों में प्रेरित करें. (२) सूक्त-२४ देवता—दुःस्वप्न विनाश दौष्वप्न्यं दौर्जीवित्यं रक्षो अभवमराय्यः. दुर्नाम्नीः सर्वा दुर्वाचस्ता अस्मन्नाशयामसि.. (१) व्याधि दिखाने वाले बुरे सपने को, राक्षसों को, टोनेटोटके से उत्पन्न भीषण भय को, पिशाचियों को तथा दरिद्रता को हम इस होने वाले टोटके से ग्रस्त पुरुष से दूर करते हैं. (१) सूक्त-२५ देवता—सविता यन्न इन्द्रो अखनद् यदग्निर्विश्वे देवा मरुतो यत् स्वर्काः. तदस्मभ्यं सविता सत्यधर्मा प्रजापतिरनुमतिर्नि यच्छात्.. (१) परम ऐश्वर्य वाले इंद्र देव ने हमारे लिए जो फल दिया तथा अग्नि, विश्वे देव, मरुद्गण और स्वका नामक देवों ने हमारे लिए जो फल दिया. सब के प्रेरक सविता और यथार्थ नाम वाले प्रजापति ने जिस फल की अनुमति दी. वह फल हमें प्राप्त हो. (१) सूक्त-२६ देवता—विष्णु ययोरोजसा स्कभिता रजांसि यौ वीर्यैर्वीरतमा शविष्ठा. यौ पत्येते अप्रतीतौ सहोभिर्विष्णुमग्न् वरुणं पूर्वहूतिः.. (१) जिन विष्णु और वरुण के बल के द्वारा पृथ्वी आदि स्थान दृढ़ किए गए हैं, जो विष्णु और वरुण अपने वीरतापूर्ण कर्मों के द्वारा अतिशय शक्तिशाली ऐश्वर्य प्राप्त कर चुके हैं, उन विष्णु और वरुण को सभी देवों से पहले किया गया आह्वान प्राप्त हो. (१) यस्येदं प्रदिशि यद् विरोचते प्र चानति वि च चष्टे शचीभिः. पुरा देवस्य धर्मणा सहोभिर्विष्णुमग्न् वरुणं पूर्वहूतिः.. (२) विष्णु और वरुण की आज्ञा में यह जगत् विशेष रूप से दीप्त है, सांस लेता है और
सूक्त-२७ देवता—विष्णु
अपनेअपने कार्यों का फल देखता है. इस के अतिरिक्त जगत् को प्रकाशित करने वाले विष्णु और वरुण के धारक कर्म और बलों के साथ प्राचीन काल में चेष्टा करता था. इस प्रकार के विष्णु और वरुण को फल चाहने वाले लोग अपने प्रथम आह्वान से जोड़ें. (२) सूक्त-२७ देवता—विष्णु विष्णोर्नु कं प्र वोचं वीर्याणि यः पार्थिवानि विममे रजांसि. यो अस्कभायदुत्तरं सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः.. (१) मैं उन विष्णु के किन वीरतापूर्ण कर्मों का वर्णन करूं, जिन्होंने पृथ्वी के रूप में लोकों का निर्माण किया है. विष्णु ने इस से भी ऊंचे स्तर के स्थान स्वर्ग को धारण किया है. महापुरुषों द्वारा स्तुति किए गए विष्णु ने पृथ्वी, अंतरिक्ष और आकाश में चरण रखते हुए यह निर्माण किया है. (१) प्र तद् स्तवते वीर्याणि मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः. परावत आ जगम्यात् परस्याः.. (२) वीरतापूर्ण कर्मों के कारण विष्णु की स्तुति की जाती है. विष्णु सिंह के समान भयानक, भूमि पर विचरण करने वाले एवं पर्वत में स्थित हैं. वे विष्णु मेरी स्तुति सुन कर दूर देश से भी यहां आएं. (२) यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्वाधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा. उरु विष्णो वि क्रमस्वोरु क्षयाय नस्कृधि. घृतं घृतयोने पिब प्रप्र यज्ञपतिं तिर.. (३) उन विष्णु के तीन विस्तृत चरण विक्षेपों में सभी भुवन एवं प्राणी निवास करते हैं. हे व्यापक विष्णु! तीनों लोकों में अपने तीन चरण रखने का पराक्रम करो तथा हमारे निवास स्थान को धन संयुक्त बनाओ. हे घृत के कारण रूप विष्णु! यह हवन किया जाता हुआ घृत पियो तथा यज्ञ के स्वामी यजमान की वृद्धि करो. विष्णु ने इस विश्व में विक्रम का प्रदर्शन किया है. उन्होंने तीन बार अपने चरण स्थापित किए हैं. इन विष्णु के तीन चरण विक्षेपों में सारा विश्व स्थापित है. (३) इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदा. समूढमस्य पांसुरे.. (४) सब के रक्षक और दूसरों के द्वारा पराजित न होने वाले विष्णु ने इस पृथ्वीलोक से आरंभ कर के प्राणियों को धारण करने वाले तीनों लोक धारण किए. (४) त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः. इतो धर्माणि धारयन्.. (५)
हे स्तोताओ! सर्व व्यापक विष्णु देव के उन कर्मों को देखो, जिन कर्मों के द्वारा उन्होंने तुम्हारे कर्मों का स्पर्श किया. ये विष्णु इंद्र देव के योग्य सखा हैं. (५) विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे. इन्द्रस्य युज्यः सखा.. (६) व्यापक विष्णु देव के उत्तम स्थान को मेधावी लोग देखते हैं. उन का स्थान आकाश में सूर्य मंडल के समान विस्तृत है. (६) तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः. दिवीव चक्षुराततम्.. (७) हे विष्णु देव! पृथ्वी एवं द्युलोक से भी महान किसी अन्य लोक से अर्थात् विस्तीर्ण अंतरिक्ष से लाए हुए बहुत से धनों से अपने हाथों को पूर्ण करो. इस के पश्चात हमारे सामने आ कर अपने दाहिने और बाएं हाथों से हमें अधिक धनराशि प्रदान करो. (७) दिवो विष्ण उत वा पृथिव्या महो विष्ण उरोरन्तरिक्षात्. हस्तौ पृणस्व बहुभिर्वसव्यैराप्रयच्छ दक्षिणादोत सव्यात्.. (८) हे विष्णु देव! आप अपने दोनों हाथों के द्वारा द्युलोक, भूलोक और अंतरिक्ष लोक से हमें बहुत से साधन प्रदान करो. (८) सूक्त-२८ देवता—इडा इडैवास्मां अनु वस्तां व्रतेन यस्याः पदे पुनते देवयन्तः. घृतपदी शक्वरी सोमपृष्ठोप यज्ञमस्थित वैश्वदेवी.. (१) गहन रूपा इडा ही हमारे द्वारा किए जाते हुए यह कर्मों को फल देने वाला बनाएं. उस इडा के चरणों में देवों की कामना करने वाले यजमान अपनेआप को पवित्र करते हैं. हम जहांजहां चरण रखें वहांवहां घृत टपकाने वाली, फल देने में समर्थ एवं पीठ पर सोम लिए हुए इडा नाम की बहन हमारे यज्ञ को विस्तृत करें. (१) सूक्त-२९ देवता—झंडा वेदः स्वस्तिर्दुघणः स्वस्तिः परशुर्वेदिः परशुर्नः स्वस्ति. हविष्कृतो यज्ञिया यज्ञकामास्ते देवासो यज्ञमिमं जुषन्ताम्.. (१) वेद (दर्भ समूह) हमारे लिए अविनाश का कारण बने. पेड़ काटने के काम आने वाली कुल्हाड़ी हमारा कल्याण करे. घास काटने का साधन वेदि अर्थात् खुरपी तथा परशु हमारा कल्याण करे. हवि का निर्माण करने वाले, यज्ञ के योग्य एवं यज्ञ की कामना करते हुए मुझ यजमान का यज्ञ वे देव स्वीकार करें. (१) eBook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-३० देवता—अग्नि, विष्णु
सूक्त-३० देवता—अग्नि, विष्णु अग्नाविष्णू महि तद् वां महित्वं पाथो घृतस्य गुह्यस्य नाम. दमेदमे सप्त रत्ना दधानौ प्रति वां जिह्वा घृतमा चरण्यत्.. (१) हे अग्नि और विष्णु! तुम दोनों कहे जाते हुए माहात्म्यपूर्ण, महान गोपनीय, और टपकने वाले घृत को पियो. अग्नि और विष्णु प्रत्येक यज्ञशाला में रत्न धारण करते हैं. तुम दोनों की जिह्वा हवन में डाले गए घृत को सामने आ कर प्राप्त करे. (१) अग्नाविष्णू महि धाम प्रियं वां वीथो घृतस्य गुह्या जुषाणौ. दमेदमे सुष्टुत्या वावृधानौ प्रति वां जिह्वा घृतमुच्चरण्यात्.. (२) हे अग्नि और विष्णु! तुम दोनों का तेज महान एवं सब को प्रसन्न करने वाला है. तुम दोनों, घृत के चरु, पुरोडाश आदि रूपों का भक्षण करो. परस्पर प्रसन्न होते हुए तुम दोनों सभी यजमानों के घरों में शोभन स्तुति से बढ़ते हुए अपनी जिह्वाओं से घृत का भक्षण करो. (२) सूक्त-३१ देवता—द्यावा, पृथ्वी, मित्र, बृहस्पति स्वाक्तं मे द्यावापृथिवी स्वाक्तं मित्रो अकरयम्. स्वाक्तं मे ब्रह्मणस्पतिः स्वाक्तं सविता करत्.. (१) धरती और आकाश मेरे यज्ञ के बलिदान वाले खंबे अर्थात् यूप को भलीभांति रंगें. दिखाई देते हुए ये सूर्य यज्ञ के यूप को रंगें. मंत्र का पालन करने वाले देव मेरे यूप को रंगें. सब के प्रेरक सविता देव इस यूप को रंगा हुआ बनाएं. (१) सूक्त-३२ देवता—इंद्र इन्द्रोतिभिर्बहुलाभिर्नो अद्य यावच्छ्रेष्ठाभिर्मघवञ्छूर जिन्व. यो नो द्वेष्ट्यधरः सस्पदीष्ट यमु द्विष्मस्तमु प्राणो जहातु.. (१) हे इंद्र! आज बहुत सी रक्षाओं अर्थात् रक्षा साधनों के द्वारा हमारा पालन करो. हे धनवान एवं शौर्य संपन्न इंद्र! प्रशंसनीय रक्षा साधनों के द्वारा हमें पूर्णतया प्रसन्न करो. जो शत्रु हम से द्वेष करते हैं, वे अधोमुख हो कर गिरें. जिस शत्रु से हम द्वेष करते हैं, उसे तुम्हारा प्राण त्याग दे. (१) सूक्त-३३ देवता—आयु ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-३४ देवता—पूषा
उप प्रियं पनिप्रतं युवानमाहुतीवृधम्. अगन्म बिभ्रतो नमो दीर्घमायुः कृणोतु मे.. (१) सब को प्रसन्न करने वाले, स्तुति किए जाते हुए, नित्य तरुण एवं घृत की आहुतियों से बढ़ने वाले अग्नि देव को हम नमस्कार एवं हविरूप अन्न ले कर मिलें. वे मेरी और मेरे विद्यार्थी की आयु १०० वर्ष करें. (१) सूक्त-३४ देवता—पूषा सं मा सिञ्चन्तु मरुतः सं पूषा सं बृहस्पतिः. सं मायमग्निः सिञ्चतु प्रजया च धनेन च दीर्घमायुः कृणोतु मे.. (१) मरुत् आदि देवगण मुझ फल चाहने वाले यजमान को पुत्र आदि रूप प्रजा से और धन से युक्त करें. अग्नि मेरे विद्यार्थी की आयु लंबी करें. (१) सूक्त-३५ देवता—जातवेद अग्ने जातान् प्र णुदा मे सपत्नान् प्रत्यजाताञ्जातवेदो नुदस्व. अधस्पदं कृणुष्व ये पृतन्यवोऽनागसस्ते वयमदितये स्याम.. (१) हे अग्नि! मेरे उत्पन्न शत्रुओं को मुझ से बहुत दूर जाने की प्रेरणा दो. हे जातवेद अग्नि! मेरे जो शत्रु उत्पन्न नहीं हुए हैं, उन का विनाश करो. जो शत्रु सेना ले कर मुझ से युद्ध करने के इच्छुक हैं. उन्हें अपने पैरों के नीचे कुचल दो. हे खंड न करने योग्य पृथ्वी अथवा अदीना देवमाता! हम पापरहित हो कर तुम्हारे कृपा पात्र बनें. (१) सूक्त-३६ देवता—जातवेद प्रान्यान्त्सपत्नान्त्सहसा सहस्व प्रत्यजाताञ्जातवेदो नुदस्व. इदं राष्ट्रं पिपृहि सौभगाय विश्व एनमनु मदन्तु देवाः.. (१) हे अग्नि! मेरे उत्पन्न शत्रुओं को बहुत दूर भगा दो. हे उत्त्पन्नों को जानने वाले अग्नि देव! मेरे ऐसे शत्रुओं का विनाश करो, जिन्हें मैं नहीं जानता. हमारे इस राष्ट्र को तुम सौभाग्य से पूर्ण करो. सभी देव शत्रु विनाश का प्रयोग करने वाले इस यजमान को प्रसन्न करें. (१) इमा यास्ते शतं हिराः सहस्रं धमनीरुत. तासां ते सर्वासामहमश्मना बिलमप्यधाम्.. (२) हे मुझ से विद्वेष करने वाली स्त्री! तेरी जो गर्भधारण संबंधी सौ से अधिक नाड़ियां हैं तथा हजार धमनियां हैं, मैं उन सब का मुख पत्थर से ढक कर तुझे बांझ बनाता हूं. (२)
परं योनेरवरं ते कृणोमि मा त्वा प्रजाभि भून्मोत सूनुः. अस्वं १ त्वाप्रजसं कृणोम्यश्मानं ते अपिधानं कृणोमि.. (३) हे मेरे प्रतिकूल रहने वाली नारी! मैं तेरी योनि के भीतर वाले स्थान अर्थात् गर्भाशय को गर्भ धारण के अयोग्य बनाता हूं. इसीलिए तुझे कन्या रूपी संतान भी प्राप्त न हो. तुझे पुत्र संतान भी न मिले. मैं तुझे खच्चरी के समान संतान रहित बनाता हूं. मैं तेरे गर्भाशय को पत्थर से ढकता हूं. (३) सूक्त-३७ देवता—अक्षि, मन अक्ष्यौ नौ मधुसंकाशे अनीकं नौ समञ्जनम्. अन्तः कृणुष्व मां हृदि मन इन्नौ सहासति.. (१) हे पत्नी! मेरी और तेरी आंखें शहद के समान मधुर हों अर्थात् हम एकदूसरे के प्रति अनुरक्त हों. हमारी आंखों का अग्रभाग काजल से युक्त हो. तू मुझे हृदयंगम कर अर्थात् ऐसा प्रयत्न कर, जिस से मैं तेरा प्रिय बन सकूं. हम दोनों का मन समान कार्य करने वाला हो. (१) सूक्त-३८ देवता—वस्त्र अभि त्वा मनुजातेन दधामि मम वाससा. यथा ऽ सो मम केवलॊ नान्यासां कीर्तयाश्चन.. (१) स्त्री अपने पति से कहती है—हे पति! मैं तुम को अपने मंत्र से युक्त वस्त्र से बांधती हूं. इस प्रकार तुम केवल मेरे ही हो सकोगे तथा दूसरी नारियों का नाम भी नहीं लोगे. (१) सूक्त-३९ देवता—वनस्पति इदं खनामि भेषजं मां पश्यमभिरोरुदम्. परायतो निवर्तनमायतः प्रतिनन्दनम्.. (१) मैं वश में करने वाली इस सौवर्चा नामक जड़ी को खोदता हूं. यह मेरे पति को मेरे अनुकूल बनाए और मेरे पति का अन्य नारियों से संबंध रोके. यह जड़ी मुझे छोड़ कर जाते हुए पति को वापस लाए तथा मेरी ओर आते हुए पति को आनंदित करे. (१) येना निचक्र आसुरीन्द्रं देवेभ्यस्परि. तेना नि कुर्वे त्वामहं यथा ते ऽ सानि सुप्रिया.. (२) असुरों की माया ने जिस जड़ी के बल से इंद्र के अतिरिक्त सभी देवों को युद्ध में अपने अधीन किया था, हे पति! उसी जड़ी के द्वारा मैं तुझे अपने वश में करती हूं. मैं ऐसा इसीलिए
करती हूं, जिस से मैं तेरी असाधारण प्यारी हो सकूं. (२) प्रतीची सोममसि प्रतीच्युत सूर्यम्. प्रतीची विश्वान् देवान् तां त्वा ऽ च्छावदामसि.. (३) हे शंखपुष्पी नामक जड़ी! तू वशीकरण के निमित्त सोम के सम्मुख होती है. तू सब के प्रेरक सूर्य के भी सम्मुख होती है. अधिक कहने से क्या लाभ, तू सभी देवों के सम्मुख होती है. मैं अपने पति को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए तेरी स्तुति करती हूं. (३) अहं वदामि नेत् त्वं सभायामह त्वं वद. ममेदसस्त्वं केवलो नान्यासां कीर्तयाश्चन.. (४) पति के वशीकरण के लिए जड़ीबूटी पा कर नारी अपने पति से कहती है—हे पति! आओ. अब मैं ही बोलूंगी. तुम कभी मत बोलना. तुम केवल विद्वानों की सभा में बोलना. हे पति! तुम केवल मेरे ही रहोगे, अन्य नारियों के नहीं. (४) यदि वासि तिरोजनं यदि वा नद्यस्तिरः. इयं ह मह्यं त्वामोषधिर्बद्ध्वेव न्यानयत्.. (५) हे पति! यदि तुम मेरी दृष्टि से ओझल हो जाओगे अथवा मुझ से दूर नदी के पार चले जाओगे, तब भी यह शंखपुष्पी नामक जड़ी पति से प्रेम करने वाली मेरे समीप तुम्हें इस प्रकार लाएगी, जैसे किसी को बांध कर लाया जाता है. (५) सूक्त-४० देवता—मंत्रों में बताए गए छंद दिव्यं सुपर्णं पयसं बृहन्तमपां गर्भं वृषभमोषधीनाम्. अभीपतो वृष्ट्या तर्पयन्तमा नो गोष्ठे रयिष्ठां स्थापयति.. (१) हे इंद्र! हमारी गोशाला में दिव्य, शोभन गति वाले, जल से पूर्ण, महान जलों के मध्य रहने वाले, जड़ीबूटियों की वृद्धि के लिए वर्षा करने वाले, सभी ओर से जलों से संगत एवं सारे संसार को वर्षा से तृप्त करने वाले सारस्वत नामक देव को स्थापित करो. वे सदा धन वाले प्रदेश में ठहरते हैं. (१) सूक्त-४१ देवता—सरस्वान यस्य व्रतं पशवो यन्ति सर्वे यस्य व्रत उपतिष्ठन्त आपः. यस्य व्रते पुष्टपतिर्निविष्टस्तं सरस्वन्तमवसे हवामहे.. (१) समस्त पशु अपनी पुष्टि के निमित्त जिस के कर्म का अनुगमन करते हैं, जिस के कर्म में जल आपस में मिलते हैं तथा जिस के कर्म के अधीन पोषण के स्वामी हैं, उन सरस्वान देव ebook converter DEMO Watermarks*
की तृप्ति के लिए हम उन का आह्वान करते हैं. (१) आ प्रत्यञ्चं दाशुषे दाश्वंसं सरस्वन्तं पुष्टपतिं रयिष्ठाम्. रायस्पोषं श्रवस्युं वसाना इह हुवेम सदनं रयीणाम्.. (२) सामने हो कर प्रसन्न करने के लिए हम हवि देने वाले यजमान को मनचाहा फल देने वाले, पोषण के स्वामी, धन के स्थान पर ठहरने वाले एवं धन के पोषक सरस्वान देव को सेवा के निमित्त बुलाते हैं. (२) सूक्त-४२ देवता—श्येन अति धन्वान्यत्यपस्ततर्द श्येनो नृचक्षा अवसानदर्श:. तरन् विश्वान्यवरा रजांसीन्द्रेण सख्या शिव आ जगम्यात्.. (१) मनुष्यों के सभी कर्मों के साक्षी एवं अंत में आकाश में दिखाई देने वाले सूर्य मरुस्थल को पार कर के अत्यधिक जलपूर्ण करें. वे आकाश से नीचे स्थित समस्त लोकों को पार करते हुए अपने मित्र इंद्र के साथ कल्याणकारी बन कर नवीन गृह निर्माण के स्थान में आएं. (१) श्येनो नृचक्षा दिव्यः सुपर्णः सहस्रपाच्छतयोनिर्वायोधाः. स नो नि यच्छाद् वसु यत् पराभूतमस्माकमस्तु पितृषु स्वधावत्.. (२) मनुष्यों के सभी कर्मों को देखने वाले, दिव्य एवं शोभन गति वाले, हजार किरणों वाले, असंख्य कार्यों के कारण एवं अन्न के दाता सूर्य हमें चिरकाल तक स्थापित करें. हमारा जो धन चोरों ने चुरा लिया है, वह हमारे पितरों के निमित्त स्वधा के रूप में हो. (२) सूक्त-४३ देवता—सोम सोमारुद्रा वि वृहतं विषूचीममीवा या नो गयमाविवेश. बाधेथां दूरं निर्ऋतिं पराचैः कृतं चिदेनः प्र मुमुक्तमस्मत्.. (१) हे सोम एवं रुद्र देव! सभी ओर फैलने वाले उस अमीवा नामक रोग का विनाश करो जो हमारे शरीर में प्रवेश कर गया है. इस के अतिरिक्त अमीवा रोग का कारण बनी हुई पिशाची को विमुख कर के दूर ले जाओ, जिस से वह हमारे पास न आ सके. हमारे द्वारा किए हुए पाप को भी हम से दूर करो. (१) सोमारुद्रा युवमेतान्यस्मद् विश्वा तनूषु भेषजानि धत्तम्. अव स्यतं मुञ्चतं यन्नो असत् तनूषु बद्धं कृतमेनो अस्मत्.. (२) हे सोम एवं रुद्र देव! तुम दोनों हमारे शरीरों में रोगों को निकालने वाली जड़ीबूटियों को ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-४४ देवता—वाक्
स्थापित करो. हमारे शरीरों में स्थित हमारे द्वारा किया हुआ जो पाप है, उसे भी हम से अलग करो और नष्ट कर दो. (२) सूक्त-४४ देवता—वाक् शिवास्त एका अशिवास्त एकाः सर्वा बिभर्षि सुमनस्यमानः. तिस्रो वाचो निहिता अन्तरस्मिन् तासामेका वि पपातानु घोषम्.. (१) हे अकारण निंदित पुरुष! तेरे विषय में कुछ वाणियां स्तुति रूपा एवं कल्याणी हैं तथा कुछ वाणियां तेरे विषय में निंदापूर्ण हैं. सौमनस्य का आचरण करती हुई इन दो प्रकार की वाणियों के अतिरिक्त तीन वाणियां अर्थात् परा, पश्यंती और मध्यमा-इस शब्द प्रयोग में शरीर के भीतर छिपी रहती हैं. केवल एक अर्थात् वैखरी वाणी ध्वनि के रूप में निकलती है. (१) सूक्त-४५ देवता—इंद्र उभा जिग्यथुर्न परा जयेथे न परा जिग्ये कतरश्चनैनयोः. इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रं वि तदैरयेथाम्.. (१) हे इंद्र और विष्णु! तुम दोनों सर्वदा विजयी बनो और किसी से कभी पराजित न होओ. इन दोनों में से एक भी दूसरे से पराजित नहीं होता. हे इंद्र और विष्णु! तुम दो असुरों के साथ जिस वस्तु की स्पर्धा करते हो, वह वस्तु लोक, वेद और वाणी के रूप में स्थित हो कर हजारों से भी बढ़कर हो. (१) सूक्त-४६ देवता—ईर्ष्या जनाद् विश्वजनीनात् सिन्धुतस्पर्याभृतम्. दूरात् त्वा मन्य उद्भृतमीर्ष्याया नाम भेषजम्.. (१) ईर्ष्या समाप्त करने वाली जड़ीबूटी को संबोधित कर के कहा जा रहा है— सभी जनों के हितकारक जनपद से तथा सागर से लाई हुई को एवं दूर देश से उखाड़ कर लाई तुझ, सक्तुमंथ नामक जड़ीबूटी को मैं क्रोध का निवारण करने वाली मानता हूं. (१) सूक्त-४७ देवता—ईर्ष्या अग्नेरिवास्य दहतो दावस्य दहतः पृथक्. एतामेतस्येष्यार्मुदग्निमिव शमय.. (१) जिस प्रकार अग्नि वस्तुओं को जलाती है, उसी प्रकार क्रोध के कारण मेरे कार्य ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-४८ देवता—सिनीवाली
बिगाड़ने वाले तथा दावाग्नि के जलाने के समान क्रोध करते हुए सामने वाले पुरुष को मेरे विषय में प्रयोग की जाती हुई ईर्ष्या को इस प्रकार शांत करो, जिस प्रकार शीतल जल डालने से अग्नि शांत कर दी जाती है. (१) सूक्त-४८ देवता—सिनीवाली सिनीवालि पृथुष्टुके या देवानाम्सि स्वसा. जुषस्व हव्यमाहुतं प्रजां देवि दिदिड्ढि नः.. (१) हे सिनीवाली! अर्थात् ऐसी अमावस्या! जिस में चंद्रमा दिखाई नहीं देता है, तू बहुत से जनों द्वारा स्तुति की गई एवं देवों की बहन है. तू सामने डाले गए हव्य को स्वीकार कर तथा हमारे लिए पुत्र आदि के रूप में प्रजा प्रदान कर. (१) या सुबाहुः स्वङगुरिः सुषूमा बहुसूवरी. तस्यै विशपत्न्यै हविः सिनीवाल्यै जुहोतन.. (२) हे सिनीवाली! तू सुंदर हाथ वाली, शोभन उंगलियों वाली, सुंदर प्रसव वाली तथा बहुत सी प्रजाओं को जन्म देने वाली है. हे ऋत्विजो तथा यजमानो! प्रजाओं का पालन करने वाली उस सिनीवाली के लिए हवि दो. (२) या विशपत्नीन्द्रमसि प्रतीची सहस्त्रस्तुकाभियन्ती देवी. विष्णो पत्नि तुभ्यं राता हवींषिपतिं देवि राधसे चोदयस्व.. (३) जो सिनीवाली प्रजाओं का पालन करने वाली तथा परमैश्वर्य संपन्न इंद्र के सामने खड़ी होने वाली है तथा हजारों स्तोताओं द्वारा प्रशंसित एवं प्रकाशित होने वाली है. हे विष्णु अथवा इंद्र की पत्नी! तेरे लिए हवि दी गई है. हे देवी! तू प्रसन्न हो कर अपने पति इंद्र को हमें धन देने के लिए प्रेरित कर. (३) सूक्त-४९ देवता—कुहू कुहूं देवीं सुकृतं विद्मनापसमस्मिन् यज्ञे सुहवा जोहवीमि. सा नो रयिं विश्ववारं नि यच्छाद् ददातु वीरं शतदायमुक्थ्यम्.. (१) कुहू अथवा चंद्रमा दिखाई न देने वाली अमावस्या देवी को मैं इस यज्ञ में बुलाता हूं अथवा हवि से होम करता हूं. शोभन कर्म करने वाली, विदित कर्मों वाली एवं शोभन आह्वान वाली वह अमावस्या हमें सब के द्वारा वरणीय धन दे तथा अधिक धन देने वाला, प्रशंसनीय एवं वीर पुत्र प्रदान करे. (१) कुहूर्देवानाम्मृतस्य पत्नी हव्या नो अस्य हविषो जुषेत. ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-५० देवता—राका अर्थात् पूर्णमासी
शृणोतु यज्ञमुशती नो अद्य रायस्पोषं चिकितुषी दधातु.. (२) देवों के मध्य कुहू अर्थात् अमावस्या रूप देवी अमृत अथवा जल की पत्नी अर्थात् पालन करने वाली है. हव्य देने योग्य यह हमारे द्वारा दिए जाते हुए हवि को प्राप्त करे तथा हमारे यज्ञ की कामना करती हुई आज हमारा आह्वान सुने. इस के पश्चात हमारे यज्ञ को जानने वाली वह हमारे धन को पुष्ट करे. (२) सूक्त-५० देवता—राका अर्थात् पूर्णमासी राकामहं सुहवा सुष्टुती हुवे शृणोतु नः सुभगा बोधतु त्मना. सीव्यत्वपः सूच्या ऽ च्छिद्यमानया ददातु वीरं शतदायमुक्थ्यम्.. (१) मैं शोभन आह्वान वाली, पूर्ण चंद्र से सुशोभित एवं शोभन स्तुति वाली पूर्णिमा का आह्वान करता हूं. यह शोभन ज्ञान वाली पूर्णिमा मेरा आह्वान सुने तथा प्रजनन के लक्षण को सी दे. ऐसा वह न टूटने वाली नाड़ी रूपी सूई से सिए. ऐसा कर के पूर्णिमा हमें विक्रांत पुत्र एवं बहुत सा धन प्रदान करे. (१) यास्ते राके सुमतयः सुपेशसो याभिर्ददासि दाशुषे वसूनि. ताभिर्नो अद्य सुमना उपागहि सहस्रापोषं सुभगे रराणा.. (२) हे राका अर्थात् पूर्णिमा देवी! तेरी जो सुंदर रूप वाली कल्याण बुद्धियां हैं, जिन के द्वारा तू हवि देने वाले यजमान को धन प्रदान करती है, आज तू उन्हीं कल्याणकारी बुद्धियों एवं शोभन मन से युक्त हो कर हमारे समीप आ. तू हमें बहुत से धनों का पोषण देती हुई आ. (२) सूक्त-५१ देवता—देव पत्नियां देवानां पत्नीरुशतीरवन्तु नः प्रावन्तु नस्तुजये वाजसातये. याः पार्थिवासो या अपामपि व्रते ता नो देवीः सुहवाः शर्म यच्छन्तु.. (१) हमारी कामना करती हुई देव पत्नियां हमारी रक्षा करें तथा हमें संतान और अन्न प्रदान करने के लिए आएं. जो देव पत्नियां पृथ्वी पर रहने वाली तथा अंतरिक्ष में स्थित हैं, वे शोभन आह्वान सुन कर हमें सुख और गृह प्रदान करें. (१) उत ग्ना व्यन्तु देवपत्नीरिन्द्राण्य१ग्नाय्यश्विनी राट्. आ रोदसी वरुणानी शृणोतु व्यन्तु देवीर्य ऋतुर्जनीनाम्.. (२) देव पत्नियां अर्थात् देवियां मेरी कामना करें. वे देवियां इंद्र पत्नी, अग्नि पत्नी एवं अश्विनीकुमारों की पत्नियां हैं. रुद्र की पत्नी रुद्राणी और वरुण की पत्नी वरुणानी मेरे सामने ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-५२ देवता—इंद्र
आ कर मेरी स्तुति सुनें. नारियों का जो ऋतु काल है, उस समय देव पत्नियां हमारी हवि को स्वीकार करें. (२) सूक्त-५२ देवता—इंद्र यथा वृक्षमशनिर्विश्वाहा हन्त्यप्रति. एवाहमद्य कितवानक्षैर्बध्यासमप्रति.. (१) बिजली की आग अद्वितीय है तथा वह जिस प्रकार वृक्षों का विनाश करती है, उसी प्रकार मैं भी अद्वितीय हो कर आज जुआरी पुरुषों का वध करूं. मैं जुआरियों का वध पासों से करूंगा अर्थात् उन्हें पासों से हराऊंगा, पराजित करूंगा. (१) तुराणामतुराणां विशामवर्जुषीणाम्. समैतु विश्वतो भगो अन्तर्हस्तं कृतं मम.. (२) जुआ खेलने में चाहे जुआरी शीघ्रता करे अथवा देरी करे, मैं ही उस से जुए में जीतूंगा. जो जुआरी हार जाने पर भी इस आशा से जुआ खेलना बंद नहीं करता कि मैं ही जीतूंगा, ऐसे जुआरी लोगों का धन सभी ओर से मेरे ही पास आए. जुए के पासे मेरे ही हाथ में रहें. (२) ईडे अग्निं स्वावसुं नमोभिरिह प्रसक्तो वि चयत् कृतं नः. रथैरिव प्र भरे वाजयद्भिः प्रदक्षिणं मरुतां स्तोममृध्याम्.. (३) जो अग्नि देव अपना धन अपने स्तुतिकर्ताओं को देते हैं, मैं उन की स्तुति करता हूं. इस द्यूत कर्म के अधिपति अग्नि देव हम जुआरियों के लाभ के लिए कृपा करें. अग्नि देव रथों के समान स्थित पासों से प्रहार करें. इस के पश्चात मैं सभी देवों की क्रम से स्तुति प्रारंभ करूं. (३) वयं जयेम त्वया युजा वृतमस्माकमंशमुदवा भरेभरे. अस्मभ्यमिन्द्र वरीयः सुगं कृधि प्र शत्रूणां मघवन् वृष्ण्या रुज.. (४) हे इंद्र! तुम्हारी सहायता से हम अपने विरोधी जुआरी को जीत लें. तुम प्रत्येक द्यूत क्रीड़ा में हम जीत के इच्छुकों का अंश सुरक्षित करो. इस के अतिरिक्त तुम हमें अत्यधिक धन प्राप्त कराओ. हे धनवान इंद्र! तुम मेरे विरोधी जुआरियों को जीतने की शक्ति को समाप्त कर दो. (४) अजैषं त्वा संलिखितमजैषमुत संरुधम्. अविं वृको यथा मथदेवा मथ्नामि ते कृतम्.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
विरोधी जुआरी को संबोधन कर के कहा जा रहा है—हे जुआरी! तूने अपने पैरों में अंकों को ठीक से लिख लिया है. फिर भी मैं तुझे जीतूंगा. मैं तुझे ऐसे स्थान में जीत लूंगा, जहां अंक रोके जाते हैं. भेड़िया जिस प्रकार भेड़ को मसल डालता है, उसी प्रकार मैं तेरे दांव को नष्ट कर दूंगा. (५) उत प्रहामतिदीवा जयति कृतमिव श्वघ्नी वि चिनोति काले. यो देवकामो न धनं रुणद्धि समित् तं रायः सृजति स्वधाभिः.. (६) अधिक जुआ खेलता हुआ पुरुष अपने विरोधी जुआरी को जीत लेता है, क्योंकि दूसरे का धन हरण करने वाला जुआरी पासे फेंकने से पहले ही उस के अंकों का निश्चय कर लेता है. देवों की कामना करता हुआ जो जुआरी जीत में प्राप्त धन को देव संबंधी कार्यों में लगाता है, उसे इंद्र धनों और अन्नों से युक्त करते हैं. (६) गोभिष्टरेमाममतिं दुरेवां यवेन वा क्षुधं पुरुहूत विश्वे. वयं राजसु प्रथमा धनान्यरिष्टासो वृजनीभिर्जयेम.. (७) हे इंद्र! दरिद्रता के कारण आई हुई दुर्बुद्धि को मैं पशुओं के द्वारा पार करूं. हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! हम सभी जौ आदि अन्नों की सहायता से भूख का निवारण करें. विरोधी जुआरियों से पराजित न होते हुए हम मुख्य धनों को जुआघर से जीत कर ले जाएं. (७) कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः. गोजिद् भूयासमश्वजिद् धनंजयो हिरण्यजित्.. (८) मेरे दाहिने हाथ में लाभ का कारण कृत अर्थात् जुए की महान विजय तथा बाएं हाथ में ऐसी विजय है, जो जुए का साध्य है. इस प्रकार मैं दूसरों की गायों को जीतने वाला, घोड़ों को जीतने वाला, धन को जीतने वाला और स्वर्ण जीतने वाला बनूं. (८) अक्षाः फलवतीं ध्रुवं दत्त गां क्षीरिणीमिव. सं मा कृतस्य धारया धनुः स्नाव्नेव नह्यत.. (९) विजय के लिए पासों से प्रार्थना की जा रही है—हे पासो! तुम इस जुए के खेल को मेरे लिए इस प्रकार फल देने वाला बनाओ, जिस प्रकार दूध देने वाली गाय होती है. धनुष जिस प्रकार तांत से बनी डोरी के द्वारा बाण को दूर फेंकता है, उसी प्रकार पासे चार संख्या वाले दावों के लिए मुझे विजय से जोड़ें. (९) सूक्त-५३ देवता—इंद्र, बृहस्पति बृहस्पतिर्नः परि पातु पश्चादुतोत्तरस्मादधरादघायोः. इन्द्रः पुरस्तादुत मध्यतो नः सखा सखिभ्यो वरीयः कृणोतु.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-५४ देवता—सौमनस्य
बृहस्पति पश्चिम दिशा से, उत्तर दिशा से तथा नीचे वाले स्थान से हिंसा करने वाले पुरुष से मेरी रक्षा करें. इंद्र पूर्व दिशा से तथा बीच के स्थान से हमारी रक्षा करें. मित्र बने हुए इंद्र हम स्तोताओं के लिए अधिक धन प्रदान करें. (१) सूक्त-५४ देवता—सौमनस्य संज्ञानं नः स्वेभिः संज्ञानमरणेभिः. संज्ञानमश्विना युवमिहास्मासु नि यच्छतम्.. (१) अपने लोगों के साथ हमारा एकमत हो तथा अनुकूल न बोलने वाले अर्थात् प्रतिकूल पुरुषों के साथ हम समान ज्ञान वाले हों. हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों इस समय इस विषय में अपने और परायों के साथ हमें एकमत बनाओ. (१) सं जानामहै मनसा सं चिकित्वा मा युष्महि मनसा दैव्येन. मा घोषा उत्स्थुर्बहुले विनिर्हते मेषुः पप्तदिन्द्रस्याहन्यागते.. (२) हम अपने मन के साथ दूसरों के मन को संयुक्त करें और जाग कर दूसरों के कार्यों से संगत बनें. हम देव संबंधी मन अर्थात् देवों के प्रति श्रद्धा रखने वाले मन के कारण दूसरों से अलग न हों. अधिक कुटिलता संबंधी शब्द न उठें. दिन निकलने पर इंद्र के वज्र के समान मर्मवेधी वाणी हमें सुनाई न दे. (२) सूक्त-५५ देवता—आयु अमुत्रभूयादधि यद् यमस्य बृहस्पतेअभिशस्तेरमुञ्चः. प्रत्यौहतामश्विना मृत्युमस्मद् देवानाम्ने भिषजा शचीभिः.. (१) हे बृहस्पति! परलोक में भवन वाले यमराज के शाप से तुम इस ब्रह्मचारी को छुड़ाते हो. यमराज का शाप मरण का कारण है. हे अग्नि! तुम्हारी कृपा से अश्विनीकुमार अपनी क्रियाओं के द्वारा हमारे ब्रह्मचारी को मृत्यु के कारण से छुड़ाएं. (१) सं क्रामतं मा जहीतं शरीरं प्राणापानौ ते सयुजाविह स्ताम्. शतं जीव शरदो वर्धमानो ऽ ग्निष्टे गोपा अधिपा वसिष्ठः.. (२) हे प्राण और अपान वायु! तुम दोनों आयु की कामना करने वाले मनुष्य के शरीर में संक्रमण करो तथा उस के शरीर का त्याग मत करो. हे आयु की कामना करने वाले पुरुष! तेरे इस शरीर में प्राण और अपान वायु संयुक्त रहें. इस के पश्चात तू सौ वर्ष तक जीवित रहे. जीवित रहते हुए तेरे हवि आदि से समृद्ध होते हुए अग्नि देव तेरी रक्षा करने वाले, तुझे अपना समझने वाले तथा निवास स्थान देने वाले हों. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
आयुर्यत् ते अतिहितं पराचैरपानः प्राणः पुनरा ताविताम्. अग्निष्टदाहार्निर्ऋतेरुपस्थात् तदात्मनि पुनरा वेशयामि ते.. (३) हे आयु की कामना करने वाले पुरुष! तुम्हारा जो जीवन तुम्हें छोड़ कर और तुम्हारा अतिक्रमण कर के गया है, वह प्राण और अपान वायु की कृपा से पुनः वापस आ जाए. उस आयु का अग्नि ने निकृष्ट गति वाली मृत्यु के पास से हरण कर लिया है. अग्नि के द्वारा हरण कर के लाई गई उस आयु को मैं तेरे शरीर में पुनः स्थापित करता हूं. (३) मेमं प्राणो हासीन्मो अपानो ऽ वहाय परा गात्. सप्तर्षिभ्य एनं परि ददामि त एनं स्वस्ति जरसे वहन्तु.. (४) प्राण वायु इस आयु चाहने वाले पुरुष का त्याग न करे तथा अपान वायु भी इसे छोड़ कर न जाए. मैं इस पुरुष को रक्षा के हेतु सप्त ऋषियों के लिए सौंप रहा हूं. वे सात ऋषि अर्थात् सात प्राण इसे वृद्धावस्था तक ले जाएं. (४) प्र विशतं प्राणापानावड्वान्वाविव व्रजम्. अयं जरिम्णः शेवधिररिष्ट इह वर्धताम्.. (५) हे प्राण और अपान वायु! जिस प्रकार गाड़ी को खींचने वाले बैल गोठ में प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार तुम आयु चाहने वाले पुरुष के शरीर में प्रवेश करो. वह आयु चाहने वाला पुरुष वृद्धावस्था की निधि बने. वह इस लोक में मृत्यु की बाधा से रहित हो कर जीवित रहे एवं वृद्धि को प्राप्त करे. (५) आ ते प्राणं सुवामसि परा यक्ष्मं सुवामि ते. आयुर्नो विश्वतो दधदयमग्निवरेण्यः.. (६) हे आयु चाहने वाले पुरुष! हम तेरे प्राण को वापस बुलाते हैं. हम तेरी आयु के प्रतिबंधक यक्ष्मा रोग को पीछे हटने के लिए प्रेरित करते हैं. वे वरेण्य एवं हवन किए जाते हुए अग्नि देव हमारे इस यजमान को सभी प्रकार से सौ वर्ष की आयु प्रदान करें. (६) उद् वयं तमस्परि रोहन्तो नाकमृत्तमम्. देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्.. (७) पाप से ऊपर उठे हुए हम उत्तम एवं दुःख रहित स्वर्ग में आरोहण करें. इस के पश्चात हम उत्तम एवं ज्योतिरूप में प्रकाशित सूर्य देव के समीप जाएं. (७) सूक्त-५६ देवता—इंद्र ऋचं साम यजामहे याभ्यां कर्माणि कुर्वते. एते सदसि राजतो यज्ञं देवेषु यच्छतः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-५७ देवता—इंद्र
हे धन देने वाले इंद्र! तुम्हारे जो मार्ग द्युलोक से नीचे वर्तमान हैं, उन विश्व प्रेरक मार्गों के द्वारा हमें सुख में स्थापित करो. अर्थात् हमें सुख प्रदान करो. (१) सूक्त-५७ देवता—इंद्र ऋचं साम यदप्राक्षं हविरोज़ो यजुर्बलम्. एष मा तस्मान्मा हिंसीद् वेदः पृष्टः शचीपते.. (१) हम ऋग्वेद और सामवेद को हवि के द्वारा पूजते हैं. यजमान ऋग्वेद और सामवेद के द्वारा यज्ञ कर्म करते हैं. ये दोनों वेद सदस नामक मंडप में शोभा देते हैं तथा यज्ञ को देवों तक पहुंचाते हैं. (१) ये ते पन्थानो ऽ व दिवो येभिर्विश्वम्मैरयः. तेभिः सुम्नया धेहि नो वसो.. (२) मैं ने ऋग्वेद से हवि, सामवेद से ओज और यजुर्वेद से बल के विषय में पूछा था. अर्थात् ऋग्वेद आदि में हवि आदि का अध्ययन किया था. हे शची के पति और व्याकरण के नियम बनाने वाले इंद्र! इस प्रकार सुविचारित ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद मुझ अध्यापक के अध्ययनअध्यापन में बाधा न डाल कर मनचाहा फल दें. (२) सूक्त-५८ देवता—बिच्छू तिरश्चिराजेरसितात् पृदाकोः परि संभृतम्. तत् कङ्कपर्वणो विषमियं वीरुदनीनशत्.. (१) तिरश्चिराजी अर्थात् तिरछी रेखाओं वाले काले और पृदाकू अर्थात् अपने द्वारा काटे हुए प्राणियों को रुलाने वाले सर्पों के विष को तथा कंकपर्व नामक काटने वाले विषैले जंतु के विष को यह मधु नाम की जड़ीबूटी नष्ट करे. (१) इयं वीरुन्मधुजाता मधुश्चुन्मधुला मधूः. सा विह्रुतस्य भेषज्यथो मशकजम्भनी.. (२) यह प्रयोग की जाती हुई ओषधि मधु अर्थात् शहद से निर्मित है, इसलिए इस से शहद टपकता है. मधु युक्त तथा मधूक नाम वाली यह जड़ीबूटी कुटिलता करने वाले विष का नाश करने वाली तथा मच्छरों को समाप्त करने वाली है. (२) यतो दष्टं यतो धीतं ततस्ते निर्ह्वयामसि. अर्भस्य तृप्रदंशिनो मशकस्यारसं विषम्.. (३) विषैले जंतु द्वारा काटे गए पुरुष से कहा जा रहा है—हे सर्प द्वारा काटे गए पुरुष! तुम्हारे जिस अंग में विषैले सर्प ने काटा है अथवा तुम्हारे जिस अंग को सर्प आदि ने पिया है, ebook converter DEMO Watermarks*
उस अंग से मैं सर्प का विष निकालता हूं तथा मुख, पूंछ और चरण-इन तीन अंगों से काटने वाले मच्छर के विष को भी मैं प्रभावहीन बनाता हूं. (३) अयं यो वक्रो विपरुर्व्यङ्गो मुखानि वक्रा वृजिना कृणोषि. तानि त्वं ब्रह्मणस्पत इषीकामिव सं नमः.. (४) हे ब्रह्मणस्पति! सर्प आदि के द्वारा काटा हुआ जो यह पुरुष अंगों को सिकोड़ता है, इस के अंगों के जोड़ ढीले पड़ गए हैं, इस के अवयव विवश हो गए हैं तथा इस के मुख आदि अंग टेढ़े पड़ गए हैं. तुम इस के सभी अंगों को उसी प्रकार सीधा बनाओ, जिस प्रकार टेढ़ी सींक को सरल बनाया जाता है. (४) अरसस्य शर्कोटस्य नीचीनस्योपसर्पतः. विषं ह्य१ स्यादिष्यथो एनमजीजभम्.. (५) विष रहित, नीचे की ओर मुंह किए हुए एवं तेरे समीप आते हुए शर्कोटक नाम के सांप के मैं ने टुकड़े कर दिए हैं अर्थात् मैं ने इस का विष समाप्त कर दिया है तथा इस सर्प को मैं ने नष्ट कर दिया है. (५) न ते बाह्वोर्बलमस्ति न शीर्षे नोत मध्यतः. अथ किं पापया ऽ मुया पुच्छे बिभर्ष्यर्भकम्.. (६) बिच्छू को संबोधन कर के कहा जा रहा है - हे बिच्छू! तेरे हाथों में दूसरों को पीड़ा पहुंचाने वाला बल नहीं है. तेरे सिर में भी बल नहीं है. तेरे मध्य भाग अर्थात् कमर में भी बल नहीं है. तू अपनी, परपीड़ाकारिणी बुद्धि के द्वारा थोड़ा विष अपनी पूंछ में क्यों धारण करता है? (६) अदन्ति त्वा पिपीलिका वि वृश्चन्ति मयूर्यः. सर्वे भल ब्रवाथ शर्कोटमरसं विषम्.. (७) हे सर्प! तुझे चीटियां खा लेती हैं और मोरनियां तेरे टुकड़े-टुकड़े कर देती हैं. हे सर्प का विष दूर करने में समर्थ जड़ीबूटियो! तुम शर्कोटक सर्प के विष को सामर्थ्यहीन कर देती हो, यह बात भलीभांति कही जाती है. (७) य उभाभ्यां प्रहरसि पुच्छेन चास्ये न च. आस्ये ३ न ते विषं किमु ते पुच्छधावसत्.. (८) हे बिच्छू! तू पूंछ और मुख दोनों के द्वारा प्राणियों को बाधा पहुंचाता है तेरे मध्य भाग और मुख में विष नहीं है. तेरे रोओं वाले भाग अर्थात् पूंछ में विष क्यों हो. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-५९ देवता—सरस्वती यदाशसा वदतो मे विचुक्षुभे यद् याचमानस्य चरतो जनाँ अनु. यदात्मनि तन्वो मे विरिष्टं सरस्वती तदा पृणद् घृतेन.. (१) मांगने के लिए दाताओं से स्पष्ट बात कहने वाला मेरा जो अंग क्षुब्ध था तथा मांगने के लिए जनजन के समीप मेरा जो अंग व्याकुल था, मेरे शरीर का वह बाधित अंग सरस्वती क्षोभ रहित करें तथा उसे घृत से पूर्ण करें. (१) सप्त क्षरन्ति शिशवे मरुत्वते पित्रे पुत्रासो अप्यवीवृत्न्र्तानि. उभे इदस्योभे अस्य राजत उभे यतेते उभे अस्य पुष्यतः.. (२) मरुतों से युक्त एवं जलों के पुत्र वरुण के लिए सात नदियां बहती हैं. द्युलोक में स्थित इंद्र के निमित्त मनुष्य यज्ञ आदि कर्म करते हैं. वे यज्ञकर्म देवों और मानवों के संघ के निवास स्थान होते हैं एवं आकाश और धरती इन देवों और मनुष्यों के ऐश्वर्य बनते हैं. आकाश और धरती इन देवों तथा मनुष्यों के लिए प्रयत्न करते हैं तथा अन्न, जल आदि से पोषण करते हैं. (२) सूक्त-६० देवता—इंद्र, वरुण इन्द्रावरुणा सुतपाविमं सुतं सोमं पिबतं मद्यं धृतव्रतौ. युवो रथो अध्वरो देववीतये प्रति स्वसरमुप यातु पीतये.. (१) हे निचोड़े गए सोमरस को पीने वाले एवं व्रत धारण करने वाले इंद्र और वरुण! मद करने वाले एवं हमारे द्वारा निचोड़े गए सोमरस को पियो. शत्रुओं के द्वारा पराजित न होने वाला तुम्हारा रथ तुम दोनों को सोमरस पीने और यज्ञ कर्म करने के लिए यजमान के घर के समीप ले जाए. (१) इन्द्रावरुणा मधुमत्तमस्य वृष्णः सोमस्य वृषणा वृषेथाम्. इदं वामन्धः परिषिक्तमासद्यास्मिन् बर्हिषि मादयेथाम्.. (२) हे मनचाहा फल देने वाले इंद्र और वरुण! तुम दोनों अत्यधिक मधुर और मनचाहा फल देने वाले सोमरस को पियो. यह सोमलक्षण अन्न हम ने चमस आदि पात्रों में रख दिया है, इसीलिए इस कुशासन पर बैठ कर सोमरस पियो और तृप्त हो जाओ. (२) सूक्त-६१ देवता—शत्रु नाशन यो नः शपादशपतः शपतो यश्च नः शपात्. वृक्ष इव विद्युता हत आ मूलादनु शुष्यतु.. (१)
सूक्त-६२ देवता—गुहा
जो शत्रु हम निंदा न करने वालों की निंदा करता है और जो शत्रु हम निंदा करने वालों की निंदा करता है, वह इस प्रकार नष्ट हो जाए जिस प्रकार बिजली से मारा हुआ वृक्ष जड़ से सूख जाता है. (१) सूक्त-६२ देवता—गुहा ऊर्जं बिभ्रद् वसुवनिः सुमेधा अघोरेण चक्षुषा मित्रियेण. गृहानैमि सुमना वन्दमानो रमध्वं मा बिभीत मत्.. (१) हे घरो! अन्न धारण करता हुआ और धन का स्वामी मैं शोभन बुद्धि वाला हो कर तुम्हें अनुकूल और मैत्री पूर्ण दृष्टि से देखूं. मैं तुम्हारी स्तुति करता हुआ तुम्हारे पास आऊं. मेरे अधिकार में तुम सुखी रहो, इसलिए जब मैं दूसरे स्थान से तुम्हारे पास आऊं तो तुम मुझे पराया समझ कर भय मत करो. (१) इमे गृहा मयोभुव ऊर्जस्वन्तः पयस्वन्तः. पूर्णा वामेन तिष्ठन्तस्ते नो जानन्त्वायतः.. (२) यह घर सुख देने वाले, अन्न एवं रस से युक्त, दूध आदि एवं धन से समृद्ध रहे हैं. सामने दिखाई देते हुए ये घर प्रवास से आते हुए हमें स्वामी के रूप में जानें. (२) येषामध्येति प्रवसन् येषु सौमनसो बहुः. गृहानुप ह्वयामहे ते नो जानन्त्वायतः.. (३) प्रवास करता हुआ पुरुष जिन घरों का स्मरण करता है तथा जिन घरों में सौमनस्य वाला पदार्थ अधिक मात्रा में है, मैं ऐसे घर पाने के लिए प्रार्थना करता हूं. हमारे ये घर प्रवास से आते हुए हमें स्वामी के रूप में जानें. (३) उपहूता भूरिधनाः सखायः स्वादुसंमुदः. अक्षुध्या अतृष्या स्त गृहा मास्मद् बिभीतन.. (४) हे घरो! अनुमति हेतु प्रार्थना करने पर तुम अधिक धन युक्त, मैत्रीपूर्ण तथा स्वादिष्ट और मधुर पदार्थों से युक्त बनो. तुम सदा भूख और प्यास से रहित अर्थात सभी प्रकार तृप्त जनों वाले बनो. हे घरो! जब हम बाहर से आएं, तब तुम हमें पराया समझ कर भयभीत मत बनो. (४) उपहूता इह गाव उपहूता अजावयः. अथो अन्नस्य कीलाल उपहूतो गृहेषु नः.. (५) हमारे घरों में गाएं, बकरियां और भेड़ें बुलाई जाएं. इस के अतिरिक्त हमारे घरों में अन्न का सारभूत अंश भी चाहा जाए. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
सूनृतावन्तः सुभगा इरावन्तो हसामुदाः. अतृष्या अक्षुध्या स्त गृहा मास्मद् बिभीतन.. (६) हे घरो! तुम में प्यारी और सच्ची बातें कही जाएं, तुम शोभन भाग्य वाले बनो. सदा तुम में अन्न भरा रहे. तुम लोगों की हंसी से मुखरित रहो. हम जब बाहर से आएं तो तुम हमें पराया समझ कर भयभीत मत होना. (६) इहैव स्त मानु गात विश्वा रूपाणि पुष्यत. ऐष्यामि भद्रेणा सह भूयांसो भवता मया.. (७) हे घरो! तुम इसी स्थान पर सुखी रहो. प्रवास करते हुए मुझ गृहस्वामी के पीछे मत आओ. तुम पशु आदि सभी रूपों वाले का पोषण करो. मैं धन ले कर पुनः तुम्हारे समीप आऊंगा. देशांतर से वापस आते मुझे पराया समझ कर तुम भयभीत मत होना. (७) सूक्त-६३ देवता—अग्नि यदग्ने तपसा तप उपतप्यामहे तपः. प्रियाः श्रुतस्य भूयास्मायुष्मन्तः सुमेधसः.. (१) हे अग्नि देव! तुम्हारे समीप समिदाधान आदि रूप कर्म के द्वारा जो तप किया जा सकता है, वह तप हम करते हैं. उस तप के द्वारा हम अध्ययन किए हुए वेदमंत्रों के प्रिय, अधिक आयु वाले और उत्तम धारण शक्ति से संपन्न बनें. (१) अग्ने तपस्तप्यामह उप तप्यामहे तपः. श्रुतानि शृण्वन्तो वयमायुष्मन्तः सुमेधसः.. (२) हे अग्नि देव! तुम्हारे समीप ही हम शरीर को सुखाने वाला तप करें. हम इस का तप किसी दूसरे स्थान पर न करें. हम अध्ययन किए गए वेदमंत्रों को सुनते हुए अधिक आयु वाले और उत्तम बुद्धि वाले बनें. (२) सूक्त-६४ देवता—जातवेद अयमाग्नः सत्पतिर्वृद्धवृष्णो रथीव पत्तीनजयत् पुरोहितः. नाभा पृथिव्यां निहितो दविद्युतदधस्पदं कृणुतां ये पृतन्यवः.. (१) यह अग्नि देव देवों का पालन करने वाले तथा अधिक शक्ति संपन्न हैं. रथ में बैठा हुआ व्यक्ति जिस प्रकार दूसरे की पत्नी अथवा प्रजा को अपने अधिकार में कर लेता है, उसी प्रकार प्रजा को हम अपने वश में करें. यज्ञस्थल की नाभि अर्थात् उत्तरवेदी में स्थापित तथा अत्यधिक दीप्त होते हुए अग्नि संग्राम में हमें जीतने वाले शत्रुओं को हमारे पैरों के नीचे ebook converter DEMO Watermarks*