भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

यजमान को इस निधि की कामना करनी चाहिए. हमारे द्वारा दिया हुआ भात धरोहर के रूप में है. यह ओदन स्वर्गगामी होता हुआ अपने तीनों कांडों सहित स्वर्ग में पहुंचे. (४२) अग्नी रक्षस्तपतु यद् विदेवं क्रव्यात् पिशाच इह मा प्र पास्त. नुदाम एनमप रुध्मो अस्मदादित्या एनमङ्गिरसः सचन्ताम्.. (४३) जो राक्षस मेरे कर्म फल में बाधा पहुंचाते हैं. ये अग्नि देव उन्हें बाधित करें अर्थात् रोकें. क्रव्याद और पिशाच हमारा शोषण न करें. इस राक्षस को यहां आने से रोकते हुए हम भागते हैं. आंगिरस और सूर्य इस राक्षस को वश में करें. (४३) आदित्येभ्यो अङ्गिरोभ्यो मध्विदं घृतेन मिश्रं प्रति वेदयामि. शुद्धहस्तौ ब्राह्मणस्यानिहत्यैतं स्वर्गं सुकृतावपीतम्.. (४४) मैं यह घृत युक्त मधु आंगिरसों तथा आदित्यों के हेतु निवेदित करता हूं. ब्राह्मण के पवित्र हाथ फल के रूप में इस ओदन को स्वर्ग में पहुंचाएं. (४४) इदं प्रापमुत्तमं काण्डमस्य यस्माल्लोकात् परमेष्ठी समाप. आ सिञ्च सर्पिर्घृतवत् समङ्ग्ध्येष भागो अङ्गिरसो नो अत्र.. (४५) प्रजापति ने जिस दिखाई देते हुए कांड के द्वारा फल प्राप्त किया था. उस उत्तम कांड को मैं ने भी प्राप्त कर लिया है. इसे घृत से सींचो. यह घृत युक्त भाग हम अंगिरा गोत्र वाले ऋषियों का है. (४५) सत्याय च तपसे देवताभ्यो निधिं शेवधिं परि दद्म एतम्. मा नो द्यूते ऽ व गान्मा समित्यां मा स्मान्यस्मा उत्सृजता पुरा मत्.. (४६) सत अर्थात् स्थायी फल के निमित्त हम यह ओदन रूप धरोहर देवताओं को सौंपते हैं. परस्पर कर्म के आदानप्रदान रूप द्यूत में तथा समिति में भी यह हम से अलग न हो. इसे अन्य पुरुषों का भोज्य मत बनाओ. (४६) अहं पचाम्यहं ददामि ममेदं कर्मन् करुणे ऽ धि जाया. कौमारो लोको अजनिष्ट पुत्रो ३ न्वारभेथां वय उत्तरावत्.. (४७) पाक क्रिया करने वाला मैं ही इस का दान कर रहा हूं. हे यज्ञात्मक कर्म! इस कार्य में मेरे साथ मेरी पत्नी भी सहयोग कर रही है. हमारे घर में कुमार अवस्था वाला एक पुत्र है. हम इस उत्तम कर्म रूप यज्ञान्न के पाक तथा दान आदि कर्मों को उसके कल्याण के हेतु करते हैं. (४७) न किल्बिषमत्र नाधारो अस्ति न यन्मित्रैः समममान एति. अनूनं पात्रं निहितं न एतत् पक्तारं पक्वः पुनरा विशाति.. (४८) ebook converter DEMO Watermarks*

इस कर्म में किसी प्रकार का हेरफेर नहीं है. इस का कोई अन्य आधार भी नहीं है. यह अपने मित्रों के साथ मिल कर भी नहीं आता है. यह जो पूर्ण पात्र रखा गया है, वही पकाने वाले को पुनः प्राप्त हो जाता है. (४८) प्रियं प्रियाणं कुणवाम तमस्ते यन्तु यतमे द्विषन्ति. धेनुरनड्‌वान् वयोवय आयदेव पौरुषेयमप मृत्युं नुदन्तु.. (४९) हे यजमान! प्रिय से भी प्रिय फल वाले कर्म को भी हम तेरे लिए करते हैं. तेरे द्वेषी पुरुष नरक के रूप अंधकार की करे. गौ, बैल, अन्न, आयु और पुरुषार्थ ये हमारे समीप आते हुए अपमृत्यु आदि को दूर भगाएं. (४९) समग्नयो विदुरन्यो अन्यं य ओषधीः सचते यश्च सिन्धून्. यावन्तो देवा दिव्या ३ तपन्ति हिरण्यं ज्योतिः पचतो बभूव.. (५०) ओषधियों का भक्षण करने वाले अग्नि तथा जलों के सेवन कर्ता अग्नि एकदूसरे को जानते हैं. उन के अतिरिक्त अन्य अग्नि भी इस कर्म को जानते हैं. देवताओं के तप, सुवर्ण तथा चमचमाते हुए अन्य पदार्थ पाक कर्म करने वाले को प्राप्त होते हैं. (५०) एषा त्वचां पुरुषे सं बभूवानग्नाः सर्वे पशवो ये अन्ये. क्षत्रेणात्मानं परि धापयाथो ऽ मोतं वासो मुखमोदनस्य.. (५१) ये पशु चर्म से आच्छादित दिखाई पड़ते हैं. इन की त्वचा पहले पुरुष में थी. हे पति और पत्नी! तुम अपने को क्षमा तेज से संपन्न करो तथा इस भात के मुख को ढक दो. (५१) यदक्षेषु वदा यत् समित्यां यद्वा वदा अनृतं वित्तकाम्या. समानं तन्तुमभि संवसानौ तस्मिन्सर्वं शमलं सादयाथः.. (५२) द्यूत कर्म में अथवा युद्ध में धन प्राप्ति की अभिलाषा से तुम ने जो मिथ्या भाषण किया है, समस्त तंतुओं से बने इस वस्त्र से ढकते हुए अग्नि में उस दोष को प्रविष्ट कर दो. (५२) वर्षं वनुष्वापि गच्छ देवांस्त्वचो धूमं पर्युत्पातयासि. विश्वव्यचा घृतपृष्ठो भविष्यन्सयोनिलोर्कमुप याह्येतम्.. (५३) हे ओदन! तू फल की वर्षा करने वाला हो. तू देवताओं के पास जा कर अपनी त्वचा को धुएं के समान उछालना. तू घृत पृष्ठ होता हुआ अनेक प्रकार से पूजित हो कर तथा समान उत्पत्ति वाला बन कर इस पुरुष को स्वर्ग में प्राप्त हो. (५३) तन्वं स्वर्गो बहुधा वि चक्रे यथा विद आत्मन्नन्यवर्णांम्. अपाजैत् कृष्णां रुशतीं पुनानो या लोहिनी तां ते अग्नौ जुहोमि.. (५४) ebook converter DEMO Watermarks*

यह ओदन स्वर्ग में अपनेआप को उसी प्रकार अनेक आकार वाला बना लेने में समर्थ है. जिस प्रकार आत्मा ज्ञानी को अनेक प्रकार का बना देता है तथा कालिमा को शुद्ध करता जाता है, उसी प्रकार मैं तेरे रूप को अग्नि में होम करता हूं. (५४) प्राच्यै त्वा दिशे ३ग्नये ऽ धिपतये ऽ सिताय रक्षित्र आदित्यायेषुमते. एतं परि दद्मस्तं नो गोपायतास्माकमैतो:. दिष्टं नो अत्र जरसे नि नेषज्जरा मृत्यवे परि णो ददात्वथ पक्वेन सहं सं भवेम.. (५५) हम तुझे पूर्व दिशा, अग्नि, काले सर्प और आदित्य को दान करते हैं. तू हमारे यहां से जाने तक इस पुरुष की रक्षा कर. इसे वृद्धावस्था तक हम को माननीय रूप में प्राप्त कराओ. हमारी वृद्धावस्था ही इसे मृत्यु प्रदान करें. हम इस पके हुए ओदन सहित स्वर्ग वासी होते हुए आनंद को प्राप्त करें. (५५) दक्षिणायै त्वा दिश इन्द्राय ऽ धिपतये तिरश्चिराजये रक्षित्रे यमायेषुमते. एतं परि दद्मस्तं नो गोपायतास्माकमैतो:. दिष्टं नो अत्र जरसे नि नेषज्जरा मृत्यवे परि णो ददात्वथ पक्वेन सह सं भवेम.. (५६) हम तुझे दक्षिण दिशा, इंद्र, तिरश्री सर्प और यम को प्रदान करते हैं. तू हमारे यहां से जाने तक इस की रक्षा कर. इसे वृद्धावस्था तक हम भाग्य रूप में प्राप्त करें. हमारी वृद्धावस्था इसे मृत्यु प्रदान करे. (५६) प्रतीच्यै त्वा दिशे वरुणाय ऽ धिपतये पृदाकवे रक्षित्रे ऽ न्नायेषुमते. एतं परि दद्मस्तं नो गोपायतास्माकमैतो:. दिष्टं नो अत्र जरसे नि नेषज्जरा मृत्यवे परि णो ददात्वथ पक्वेन सह सं भवेम.. (५७) हम तुझे पश्चिम दिशा, वरुण, पृदाकू सर्प तथा वरुणधारी अन्न को प्रदान करते हैं. तू हमारे यहां से प्रस्थान करने तक इस की रक्षा कर. इसे वृद्धावस्था तक भाग्य रूप में हमें प्राप्त करा. हमारी वृद्धावस्था ही इसे मृत्यु प्रदान करे और मरने पर हम इस पके हुए ओदन सहित स्वर्ग में जा कर आनंद प्राप्त करें. (५७) उदीच्यै त्वा दिशे सोमायाधिपतये स्वजाय रक्षित्रे ऽ शन्या इषमत्यै. एतं परि दद्मस्तं नो गोपायतास्माकमैतो:. दिष्टं नो अत्र जरसे नि नेषज्जरा मृत्यवे परि णो ददात्वथ पक्वेन सह सं भवेम.. (५८) हम तुझे उत्तर दिशा, सोम, स्वज नामक सर्प एवं अशनि को प्रदान करते हैं. तू हमारे ebook converter DEMO Watermarks*

यहां से प्रस्थान करने तक इस की रक्षा कर. इसे वृद्धावस्था तक भाग्य के रूप में हमें प्राप्त करा. हमारी वृद्धावस्था इसे मृत्यु प्रदान करे. मरने पर हम इस पके हुए ओदन के साथ स्वर्ग में आनंद प्राप्त करें. (५८) ध्रुवायै त्वा दिशे विष्णवे ऽ धिपतये कल्माषग्रीवाय रक्षित्र ओषधीभ्य इषुमतीभ्यः. एतं परि दद्मस्तं नो गोपायतास्माकमैतोः. दिष्टं नो अत्र जरसे नि नेषज्जरा मृत्यवे परि णो ददात्वथ पक्वेन सह सं भवेम.. (५९) हे ओदन! हम तुझे ध्रुव अर्थात् नीचे की ओर वाली दिशा, उस के अधिपति विष्णु, संरक्षण कर्ता कल्माष ग्रीव नामक सर्प और इषुमन्ती ओषधियों को देते हैं. तुम हमारे जाने के समय तक इस की रक्षा करो. उसे हमारे कर्मों के फल स्वरूप जीर्ण अवस्था प्राप्त कराओ. जीर्णावस्था इसे मृत्यु को सौंपे. इस पके हुए अन्न के साथ हम पुनः उत्पन्न होंगे. (५९) ऊर्ध्वायै त्वा दिशे बृहस्पतये ऽ धिपतये श्वित्राय रक्षित्रे वर्षायिषुमते. एतं परि दद्मस्तं नो गोपायतास्माकमैतोः. दिष्टं नो अत्र जरसे नि नेषज्जरा मृत्यवे परि णो ददात्वथ पक्वेन सह सं भवेम.. (६०) हम तुझे ऊर्ध्व दिशा, बृहस्पति, सर्प और इषुमान वर्ष को देते है. हमारे यहां से प्रस्थान करने तक तू इस की रक्षा कर. इसे वृद्धावस्था तक हमारे भाग्य के रूप में प्राप्त करा. वृद्धावस्था मृत्यु प्रदान करे. मरने पर हम इस सुपक्व ओदन सहित स्वर्गगामी हों तथा वहां आनंद प्राप्त करें. (६०) सूक्त-४ देवता—वशा ददामीत्येव ब्रूयादनु चैनामभुत्सत्. वशां ब्रह्मभ्यो याचद्भ्यस्तत् प्रजावदपत्यवत्.. (१) मैं मांगने वाले ब्राह्मणों को देता हूं, ऐसा कह कर उत्तर दे, फिर वे ब्राह्मण कहें कि यह कर्म यजमान को संतान आदि से संपन्न कराने वाला हो. (१) प्रजया स वि क्रीणीते पशुभिश्चोप दस्यति. य आर्षेयेभ्यो याचद्भयो देवानां गां न दित्सति.. (२) जो पुरुष ऋषियों सहित मांगने वाले ब्राह्मणों को देवताओं के निमित्त गोदान नहीं करता, वह अपनी संतान विक्रय करने वाला होता हुआ पशुओं से हीन हो जाता है. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

कूट्यास्य सं शीर्यन्ते श्लोणया काटमर्दति. बण्डया दह्यन्ते गृहाः काणया दीयते स्वम्.. (३) वशा गौ के कूटा अर्थात् बिना सींगों वाले अंग के कारण दान न करने वाले के पदार्थ समाप्त हो जाते हैं. दान न करने वाला लकड़ी से गाय के सींगों के स्थान को पीड़ित करता है. बंडी अर्थात् बिना सींगों वाली गाय देने से उस के घर का नाश हो जाता है तथा कानी गाय देने से धन चला जाता है. (३) विलोहितो अधिष्ठानाच्छक्नो विन्दति गोपतिम्. तथा वशायाः संविद्धं दुरदभ्ना ह्युच्यसे.. (४) बिना ब्यायी हुई गौ दुर्दमना कहती है. गौ के स्वामी को वशा के अधिष्ठान अर्थात् रहने के स्थान से विलोहित शक्ति और संविद्य अर्थात् रक्त ज्वर प्राप्त होता है. (४) पदोरस्या अधिष्ठानाद् विक्लिन्दुर्नार्म विन्दति. अनामनात् सं शीर्यन्ते या मुखेनोपजिघ्रति.. (५) गौ के स्वामी को वशा अर्थात् बिना ब्यायी गाय के पांवों के स्थान से विक्किंदु नाम की विपत्ति मिलती है. उस के सूंघने से बिना जाने ही उस के पदार्थ नष्ट हो जाते हैं. (५) यो अस्याः कर्णावास्कुनोत्या स देवेषु वृश्चते. लक्ष्म कुर्व इति मन्यते कनीयः कृणुते स्वम्.. (६) वशा गौ के कानों को दुःख देने वाला देवताओं पर प्रहार करता है. जो अपनेआप को इस गाय के कंधों पर चिह्न न करने वाला मानता है, वह अपनेआप को छोटा बना लेता है. (६) यदस्याः कस्मै चिद् भोगाय बालान् कश्चित् प्रकृन्तति. ततः किशोरा म्रियन्ते वत्सांश्च घातुको वृकः.. (७) किसी भोग के निमित्त इस वशा गाय के बालों को काटने से काटने वाले का युवा पुत्र मृत्यु को प्राप्त होता है तथा उस के पुत्रों का संहार शृगाल अर्थात् सियार करते हैं. (७) यदस्या गोपतौ सत्या लोम ध्वाङ्क्षो अजीहिडत्. ततः कुमारा म्रियन्ते यक्ष्मो विन्दत्यनामनात्.. (८) गौ के स्वामी की उपस्थिति में यदि गाय के बालों को कौआ नौचता है तो उस के पुत्र मर जाते हैं तथा वह स्वयं क्षय रोग को प्राप्त होता है. (८) यदस्याः पल्पूलनं शकृद् दासी समस्यति. ebook converter DEMO Watermarks*

ततो ऽ परूपं जायते तस्माद्व्येष्यदेनसः.. (९) यदि गाय के गोबर आदि को दासी फेंकती है तो गाय का स्वामी उस पाप से नहीं छूट पाता तथा कुरूप हो जाता है. (९) जायमानाभि जायते देवान्त्सब्राह्मणान् वशा. तस्माद् ब्रह्मभ्यो देयैषा तदाहुः स्वस्य गोपनम्.. (१०) वशा अर्थात् तुरंत ब्यायी हुई गाय देवताओं और ब्राह्मणों के लिए ही प्रकट होती है. इसलिए ब्राह्मणों को उस का दान देना ही अपनी रक्षा करना है, ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं. (१०) य एनां वनिमायन्ति तेषां देवकृता वशा. ब्रह्मज्येयं तदब्रुवन् य एनां निप्रियायते.. (११) जो लोग गाय को परम प्रिय समझते हुए उस की सेवा करते हैं उन के लिए यह ब्रह्मज्या होती है, ऐसा विद्वानों का कथन है. (११) य आर्षेयेभ्यो याचद्भ्यो देवानां गां न दित्सति. आ स देवेषु वृश्चते ब्राह्मणानां च मन्यवे.. (१२) जो देवताओं की गाय को ऋषि पुत्रों वाले ब्राह्मणों को नहीं देना चाहता है, वह ब्रह्म कोप के कारण देवताओं के द्वारा नाश को प्राप्त होता है. (१२) यो अस्य स्याद् वशा ऽ भोगो अन्यामिच्छेत तर्हि सः. हिंस्ते अदत्ता पुरुषं याचितां च न दित्सति.. (१३) यदि वशा अर्थात् तुरंत ब्यायी हुई गाय उस के स्वामी के लिए उपभोग योग्य हो तो वह अन्य गाय की कामना करे. जो पुरुष याचक को वशा गाय का दान नहीं देता है तो यह दान न की हुई वशा गौ उसे नष्ट कर देती है. (१३) यथा शेवधिर्निहितो ब्राह्मणानां तथा वशा. तामेतदच्छायन्ति यस्मिन् कस्मिंश्च जायते.. (१४) वशा गाय ब्राह्मणों की धरोहर के समान होती है. यह गाय वास्तव में ब्राह्मणों की ही है. वह चाहे जिस के घर में प्रकट हो जाए, ये ब्राह्मण गोस्वामी के सामने आ कर इस गाय को मांगते हैं. (१४) स्वमेतदच्छायन्ति यद् वशां ब्राह्मणा अभि. यथैनानन्यस्मिन् जिनीयादेवास्या निरोधनम्.. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*

वशा गाय के सामने आने वाले ब्राह्मण अपने ही धन के समान उस के पास जाते हैं. इन्हें वर्जित करना अर्थात् इन्हें रोकना गाय के स्वामी को हानि पहुंचाता है. (१५) चरेदेवा त्रैहायणादविज्ञातगदा सती. वशां च विद्यान्नारद ब्राह्मणास्तर्ह्येष्याः.. (१६) हे नारद! यह धेनु अविजात गद अर्थात् रोग को न जानती हुई तीन वर्ष तक विचरण करे अथवा घास आदि खाए. यजमान इस के बाद इस धेनु को वशा मानता हुआ ब्राह्मणों की खोज करे. (१६) य एनामवशामाह देवानां निहितं निधिम्. उभौ तस्मै भवाशर्वौ परिक्रम्येषुमस्यतः.. (१७) यह वशा इन देवताओं की धरोहर के रूप में है. इस वशा को जो मनुष्य अवशा कहता है वह भव और शर्व के बाणों का लक्ष्य बनता है. (१७) यो अस्या ऊधो न वेदाथो अस्या स्तनानुत. उभयेनैवास्मै दुहे दातुं चेदशकद् वशाम्.. (१८) जो मनुष्य इस वशा के थनों और ऊधस अर्थात् ऐन को जानता हुआ इस का दान करता है, यह वशा उसे अपने थनों और उन दोनों के द्वारा फल देने वाली होती है. (१८) दुरदभ्नैनामा शये याचितां च न दित्सति. नास्मै कामाः समृध्यन्ते सामदत्त्वा चिकीर्षति.. (१९) जो मांगने पर उस वशा का दान नहीं करता है, उस को दुर्द्म्न अर्थात् वश में न आने वाली दशा जकड़ लेती है. जो उसे अपने पास ही रखना चाहता है, उस की इच्छाएं पूर्ण नहीं होतीं. (१९) देवा वशामयाचन् मुखं कृत्वा ब्राह्मणम्. तेषां सर्वेषामददद्धेडं न्येति मानुषः.. (२०) ब्राह्मण को अपना मुख बना कर देवता वशा को मांगते हैं. इसे न देने वाला मनुष्य उन के क्रोध का लक्ष्य बनता है. (२०) हेडं पशूनां न्येति ब्राह्मणेभ्यो ऽ ददद् वशाम्. देवानां निहितं भागं मर्त्यश्चेन्निप्रियायते.. (२१) जो पुरुष देवताओं की धरोहर रूप भाग को अपना अत्यंत प्रिय समझता है, वह ब्राह्मणों को वशा का दमन करने के कारण पशुओं का क्रोध प्राप्त करता है. (२१) ebook converter DEMO Watermarks*

यदन्ये शतं याचेयुर्ब्राह्मणा गोपतिं वशाम्. अथैनां देवा अब्रुवन्नेवं ह विदुषो वशा.. (२२) गौ के स्वामी से चाहे अन्य सैकड़ों ब्राह्मण वशा की याचना करें, पर वशा विद्वान् की होती है, ऐसी देवों की उक्ति है. (२२) य एवं विदुषे ऽ दत्त्वाथान्येभ्यो ददद् वशाम्. दुर्गा तस्मा अधिष्ठाने पृथिवी सहदेवता... (२३) जो पुरुष विद्वान् को गौ न देता हुआ, अन्य ब्राह्मण को देता है, उस के लिए पृथिवी देवताओं सहित दुर्गम हो जाती है. (२३) देवा वशामयाचन् यस्मिन्नग्रे अजायत. तामेतां विद्यान्नारदः सह देवैरुदाजत... (२४) जिस के सामने वशा प्रकट होती है, देवता उस से वशा मांगते हैं. यह जान कर नारद भी देवताओं सहित वहां पहुंच गए. (२४) अनपत्यमल्पपशुं वशा कृणोति पूरुषम्. ब्राह्मणैश्च याचितामथैनां निप्रियायते... (२५) ब्राह्मणों के द्वारा मांगी गई वशा को जो पुरुष अत्यंत प्रिय मानता हुआ नहीं देता है, वही वशा उसे संतानहीन तथा अन्य पशुओं वाला बना देती है. (२५) अग्नीषोमाभ्यां कामाय मित्राय वरुणाय च. तेभ्यो याचन्ति ब्राह्मणास्तेष्वा वृश्चते ऽ ददत्... (२६) ब्राह्मण सोम के लिए, अग्नि के लिए, काम के लिए और मित्रावरुण के लिए वशा को मांगते हैं. वशा न देने पर ये वशा के स्वामी को काटते हैं. (२६) यावदस्या गोपतिर्नोपशृणुयादृचः स्वयम्. चरेदस्य तावद् गोषु नास्य श्रुत्वा गृहे वसेत्... (२७) गौ का स्वामी जब तक गौ के संबंध में कोई संकल्प न करे, तब तक वह उस की गायों में विचरे, फिर उस के घर में वास न करे. (२७) यो अस्या ऋच उपश्रुत्याथ गोष्वचीचरत्. आयुश्च तस्य भूतिं च देवा वृश्चन्ति हीडिताः... (२८) जो संकल्प रूप वाणी के पश्चात भी अपनी गायों में विचरण करता है, वह देवताओं का अपमान करता है और देवताओं द्वारा ही अपनी आयु और ऐश्वर्य को नष्ट करने वाला होता है. ebook converter DEMO Watermarks*

(२८) वशा चरन्ती बहुधा देवानां निहितो निधिः. आविष्कृणुष्व रूपाणि यदा स्थाम जिघांसति... (२९) देवताओं की निधि रूप वशा अनेक प्रकार से विचरण करती हुई जब स्थान को नष्ट करना चाहती है, तब विभिन्न रूपों को प्रकट करती है. (२९) आविरात्मानं कृणुते यदा स्थाम जिघांसति. अथो ह ब्रह्मभ्यो वशा याच्याय कृणुते मनः... (३०) जब वशा अपने स्थान का नाश करने की इच्छा करती है, तब वह ब्राह्मणों के द्वारा मांगे जाने की इच्छा करती हुई अनेक रूपों को प्रकट करती है. (३०) मनसा सं कल्पयति तद् देवाँ अपि गच्छति. ततो ह ब्रह्माणो वशामुपप्रयन्ति याचितुम्... (३१) वशा जब इच्छा करती है, तब उस की इच्छा देवताओं के पास जाती है. तब ब्राह्मण वशा को मांगने के लिए उस के पास आते हैं. (३१) स्वधाकारेण पितृभ्यो यज्ञेन देवताभ्यः. दानेन राजन्यो वशाया मातुर्हेडं न गच्छति... (३२) पितरों के लिए स्वधा करने से, देवताओं के विभिन्न यज्ञ करने से तथा वशा का दान करने से क्षत्रिय अपनी माता का क्रोध प्राप्त नहीं करता है. (३२) वशा माता राजन्यस्य तथा संभूतमग्रशः. तस्या आहुरनर्पणं यद् ब्रह्मभ्यः प्रदीयते.. (३३) वशा क्षत्रिय की माता है. वशाओं का समूह पहले प्रकट हुआ था. ब्राह्मणों को वशा का दान करने से पहले उस वशा को अनर्पण अर्थात् अर्पण न की हुई कहा जाता है. (३३) यथाज्यं प्रगृहीतमालुम्पेत् स्रुचो अग्नये. एवा ह ब्रह्मभ्यो वशामग्नय आ वृश्चते ऽ ददत्.. (३४) ग्रहण किया हुआ घृत जिस प्रकार स्रुवा से अग्नि के लिए पृथक् होता है, उसी प्रकार अग्नि का ध्यान करते हुए ब्राह्मण के लिए वशा का दान करना चाहिए. (३४) पुरोडाशवत्सा सुदुघा लोके ऽ स्मा उप तिष्ठति. सास्मै सर्वान् कामान् वशा प्रददुषे दुहे... (३५) ebook converter DEMO Watermarks*

सुंदरता और सुख से दुहाने वाली वशा इस लोक में यजमान के पास रहती है. यजमान जब वशा का दान करता है तो वह उसे सभी अभीष्ट प्रदान करती है. (३५) सर्वान् कामान् यमराज्ये वशा प्रददुषे दुहे. अथाहुरनारिकं लोकं निरुन्धानस्य याचिताम्... (३६) यह वशा यम के राज्य में दाता की सभी कामनाओं को पूरा करने वाली है. मांगी हुई वशा के न देने पर नरक प्राप्त होता है, ऐसा विद्वानों का कथन है. (३६) प्रवीयमाना चरति क्रुद्धा गोपतये वशा. वेहतं मा मन्यमानो मृत्योः पाशेषु बध्यताम्.. (३७) क्रोध में भरी हुई वशा गाय अपने स्वामी को खाती हुई सी घूमती है. वह कहती है कि मुझ गर्भघातिनी को अपनी जानने वाला मूर्ख मृत्यु के बंधनों में पड़े. (३७) यो वेहतं मन्यमानो ऽ मा च पचते वशाम्. अप्यस्य पुत्रान् पौत्रांश्च याचयते बृहस्पतिः. (३८) यह वशा अन्य गायों में ताप बढ़ाती हुई घूमती है. यदि इस का स्वामी इसे दान नहीं करता तो वह उस के लिए विष का दोहन करती है. (३८) महदेषाव तपति चरन्ती गोषु गौरपि. अथो ह गोपतये वशाददुषे विषं दुहे.. (३९) जो गर्भघातिनी वशा को अपनी मानता है या उस का पाचन करता है, बृहस्पति उस के पुत्र, पौत्र आदि को लेने की इच्छा करते हैं. (३९) प्रियं पशूनां भवति यद् ब्रह्मभ्यः प्रदीयते. अथो वशायास्तत् प्रियं यद् देवत्रा हविः स्यात्.. (४०) ब्राह्मणों को वशा का दान कर देने पर वशा का स्वामी पशुओं का प्रिय होता है. वशा देवताओं को हवि के रूप में प्रदान की जाती है. (४०) या वशा उदकल्पयन् देवा यज्ञादुदेत्य. तासां विलिप्त्यं भीमामुदाकुरुत नारदः.. (४१) यज्ञों से लौट कर देवताओं ने वशा का निर्माण किया, तब नारद ने अधिक घी वाली और विशालकाय वशा को स्वीकार किया. (४१) तां देवा अमीमांसन्त वशेया ३ मवशेति. तामब्रवीन्नारद एषा वशानां वशतमेति.. (४२) ebook converter DEMO Watermarks*

उस समय देवताओं ने यह कहा कि यह वशा अवशा है अर्थात् इस पर किसी का अधिकार नहीं है. नारद ने उसे वशाओं में परम वशा अर्थात् सब से वही वशा बनाया. (४२) कति नु वशा नारद यास्त्वं वेत्थ मनुष्यजाः. तास्त्वा पृच्छामि विद्वांसं कस्या नाश्नीयादब्राह्मणः.. (४३) हे नारद! तुम ऐसी कितनी गायों को जानने वाले हो जो मनुष्यों में प्रकट होती हैं. तुम विद्वान् हो, इसी कारण मैं तुम से पूछता हूं. अब्राह्मण वशा के प्राशन अर्थात् खाने से बचे. (४३) विलिप्त्या बृहस्पते या च सूतवशा वशा. तस्या नाश्नीयादब्राह्मणो य आशंसेत भूत्याम्.. (४४) हे बृहस्पत! जो अब्राह्मण ऐश्वर्य चाहे वह विलिप्ती अर्थात् विशेष प्रयोजनों में लिप्त सूतवशा और वशा का भोजन न करे. (४४) नमस्ते अस्तु नारदानुष्ठु विदुषे वशा. कतमासां भीमतमा यामदत्त्वा पराभवेत्.. (४५) हे नारद! तुम्हें नमस्कार है. वशा विद्वान् की स्तुति के अनुकूल ही है. इन में भयंकर वशा कौन सी है, जिस का दान न करने पर पराजय प्राप्त होती है. (४५) विलिप्ती या बृहस्पते ऽ थो सूतवशा वशा. तस्या नाश्नीयादब्राह्मणो य आशंसेत भूत्याम्.. (४६) हे बृहस्पति! ऐश्वर्य की प्रार्थना करने वाला अब्राह्मण विलिप्ती और सूत वशा और वशा का भोजन न करे. (४६) त्रीणि वै वशाजातानि विलिप्ती सूतवशा वशा. ताः प्र यच्छेद ब्रह्मभ्यः सो ऽ नाव्रस्कः प्रजापतौ.. (४७) वशाओं के तीन भेद होते हैं—विलिप्ती, सूत वशा और वशा. इन्हें ब्राह्मणों को दान कर दे तो वह प्रजापति को क्रोध उत्पन्न करने वाला नहीं होता है. (४७) एतद् वो ब्राह्मणा हविरिति मन्वीत याचितः. वशां चेदेनं याचेयुर्या भीमाददुषो गृहे.. (४८) दान करने वाले के घर में यदि भीमा वशा है तो उस वशा की याचना करने पर यह कहे कि हे ब्राह्मणो! यह तुम्हारे लिए हवि है. (४८) देवा वशां पर्यवदन् न नो ऽ दादिति हीडिताः. ebook converter DEMO Watermarks*

एताभिर्ऋग्भिर्भेदं तस्माद् वै स पराभवत्.. (४९) क्रोधित देवताओं ने वशा से कहा कि इस यजमान ने हम को दान नहीं किया, यह दान न करने वाला इसी कारण पराजित होता है. (४९) उतैनां भेदो नाददाद् वशामिन्द्रेण याचित:. तस्मात् तं देवा आगसो ऽ वृश्चन्नहमुत्तरे.. (५०) इंद्र के प्रार्थना करने पर भी यदि वशा का दान न करे तो उस से इस पाप के कारण देवता अहंकार व्याप्त कर के उसे मिटा देते हैं. (५०) ये वशाया अदानाय वदन्ति परिरापिण:. इन्द्रस्य मन्यवे जाल्मा आ वृश्चन्ते आचित्या.. (५१) जो लोग वशा का दान न करने का परामर्श देते हैं, वे मूर्ख लोग इंद्र के कोप के कारण स्वयं नष्ट हो जाते हैं. (५१) ये गोपतिं पराणीयाथाहुर्र्मा ददा इति. रुद्रस्यास्तां ते हेतिं परि यन्त्यचित्त्य.. (५२) जो लोग वशा गौ के स्वामी से उस का दान न करने के लिए कहते हैं, वे मूर्ख इंद्र के आयुध वज्र के लक्ष्य बनते हैं. (५२) यदि हुतां यद्यहुताममा च पचते वशाम्. देवान्त्सब्राह्मणानृत्व्वा जिह्मो लोकान्निर्र्ऋच्छति.. (५३) हुत अर्थात् दान में दी गई या अहुत अर्थात् दान में न दी गई वशा का पालन करने वाला देवता और ब्राह्मणों का अपमान करने वाला होता है. वह इस लोक में बुरी गति प्राप्त करता है. (५३) सूक्त-५ देवता—ब्रह्मगवी श्रमेण तपसा सृष्टा ब्रह्मणा वित्तर्ते श्रिता.. (१) तप के द्वारा विरचित तथा परब्रह्म में आश्रित इस धेनु को ब्राह्मण ने यम से प्राप्त किया है. (१) सत्येनावृता श्रिया प्रावृता यशसा परीवृता.. (२) यह धेनु सत्य, संपत्ति और यश से परिपूर्ण है. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

स्वधया परिहिता श्रद्धया पर्यूढा दीक्षया गुप्ता यज्ञे प्रतिष्ठिता लोको निधनम्.. (३) यह धेनु श्रद्धा से व्याप्त, स्वधा से युक्त और दीक्षा के द्वारा रक्षित है. यह मन से प्रतिष्ठित है. क्षत्रिय का इस की ओर दृष्टि डालना मृत्यु के समान है. (३) ब्रह्म पदवायं ब्राह्मणो ऽ धिपतिः.. (४) इस धेनु के द्वारा ब्रह्म पद प्राप्त होता है. इस गौ का स्वामी ब्राह्मण ही है. (४) तामाददानस्य ब्रह्मगवीं जिनतो ब्राह्मणं क्षत्रियस्य. अप क्रामति सूनृता वीर्यं १ पुण्या लक्ष्मीः.. (५-६) जो क्षत्रिय ब्राह्मण की इस प्रकार की गौ का अपहरण करता है और ब्राह्मण को दुखी करता है, उस की लक्ष्मी, शक्ति और प्रिय वाणी पलायन कर जाती है. (५-६) सूक्त-६ देवता—ब्रह्मगवी ओजश्च तेजश्च सहश्च बलं च वाक् चेन्द्रियं च श्रीश्च धर्मश्च. (१) ब्रह्म च क्षत्रं च राष्ट्रं च विशश्च त्विषिश्च यशश्च वर्चश्च द्रविणं च. (२) आयुश्च रूपं च नाम च कीर्तिश्च प्राणश्चापानश्च चक्षुश्च श्रोत्रं च. (३) पयश्च रसश्चान्नं चान्नाद्यं चर्त्तं च सत्यं चेष्टं च पूर्तं च प्रजा च पशवश्च. (४) तानि सर्वाण्यप क्रामन्ति ब्रह्मगवीमाददानस्य जिनतो ब्राह्मणं क्षत्रियस्य. (५) उस क्षत्रिय के ओज, तेज, ब्रह्म, वाणी, इंद्रियों, लक्ष्मी, धर्म, वेद, क्षात्र शक्ति, राष्ट्र, हवि, यश, पराक्रम, धन, आयु, रूप, नाम, कीर्ति, नेत्र, कान, दूध, रस, अन्न, अग्नि, सत्य, इष्ट, पूर्त, प्रजा आदि सभी छिन जाते हैं. जो ब्राह्मण गौ का अपहरण करता है. वह अपनी आयु को क्षीण करता है. (१-५) सूक्त-७ देवता—ब्रह्मगवी सैषा भीमा ब्रह्मगव्य १ घविषा साक्षात् कृत्या कूर्ल्बजमावृता.. (१) ब्राह्मण की यह धेनु विराजमान होती है. कूर्ल्बज पाप से ढके हुए हिंसा करने वाले विष से युक्त हुई यह धेनु कृत्या के समान हो जाती है. (१)

सर्वाण्यस्यां घोराणि सर्वे च मृत्यवः.. (२) ब्राह्मण की इस गाय में सभी विकराल कर्म और मृत्यु देने वाले कारण व्याप्त रहते है. (२) सर्वाण्यस्यां क्रूराणि सर्वे पुरुषवधाः.. (३) ब्राह्मण की इस गाय में सभी प्रकार के कूट कर्म तथा पुरुषों के सब प्रकार के वध व्याप्त रहते हैं. (३) सा ब्रह्मज्यं देवपीयुं ब्रह्मगव्या दीयमाना मृत्योः पड्‌वीश आ द्यति.. (४) ब्राह्मण से छीनी हुई इस प्रकार की यह गाय ब्राह्मणत्व को अपमानित करने वाले मनुष्य को मृत्यु के बंधन में बांध देती है. (४) मेनिः शतवधा हि सा ब्रह्मज्यस्य क्षितिर्हि सा.. (५) जो मनुष्य ब्राह्मण की आयु क्षीण करता है. उस को क्षीण करने वाली यह गौ सैकड़ों प्रकार के संहारक अस्त्रों के समान बन जाती है. (५) तस्माद् वै ब्राह्मणानां गौर्दुराधर्षा विजानता.. (६) इसलिए ब्राह्मण की धेनु को विद्वान् पुरुष सैकड़ों का वध करने वाली के रूप में जाने. (६) वज्रो धावन्ती वैश्वानर उद्दीता.. (७) ब्राह्मण की गाय वज्र के समान दौड़ती है तथा अग्नि के समान ऊपर उठती है. (७) हेतिः शफानुत्खिदन्ती महादेवो ३ पेक्षमाणा.. (८) खुरों का शब्द करती हुई ब्राह्मण की गाय महादेव के आयुध के रूप में बन जाती है. (८) क्षुरपविरीक्षमाणा वाश्यमानाभि स्फूर्जति.. (९) रंभाती हुई ब्राह्मण की गाय के खुर वज्र के समान होते हैं. (९) मृत्युर्हिङ्‌कृण्वत्यु १ ग्रो देवः पुच्छं पर्यस्यन्ती.. (१०) हुंकार का शब्द करती हुई ब्राह्मण की गाय मृत्यु के समान होती हैं. सभी ओर पूंछ को घुमाती हुई यह गाय उग्र रूप वाली हो जाती है. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

सर्वज्यानिः कर्णौ वरीवर्जयन्ती राजयक्ष्मो मेहन्ती.. (११) सभी प्रकार से आयु को क्षीण करने वाली यह गौ कानों को हिलाती है. यह गौ अपने मूत्र को त्यागती हुई क्षय अर्थात् विनाश को उत्पन्न करने वाली हो जाती है. (११) मेनिर्दुह्यमाना शीर्षक्तिर्दुग्धा.. (१२) यह गौ जब दुही जाती है तब यह अस्त्र के समान होती है. तब दुही जाने के बाद सिर दर्द स्वरूपा बन जाती है. (१२) सेदिरुपतिष्ठन्ती मिथोधः परामृष्टा.. (१३) यह गाय स्पर्श करने पर आपस में युद्ध कराती है तथा समीप खड़ी होने पर विदीर्ण अर्थात् टुकड़े-टुकड़े कर देती है. (१३) शरव्या ३ मुखे ऽ पिनह्यमान ऋतिर्हन्यमाना.. (१४) यह गाय पीटने पर दुर्गति प्रदान करती है तथा ढकने पर विनाश करने वाली होती है. (१४) अघविषा निपतन्ती तमो निपतिता.. (१५) यह गाय बैठती हुई भयानक विष के समान तथा बैठ जाने पर साक्षात मृत्युरूपी अंधकार के समान हो जाती है. (१५) अनुगच्छन्ती प्राणानुप दासयति ब्रह्मगवी ब्रह्मज्यस्य.. (१६) ब्राह्मण की यह गाय ब्राह्मण को हानि पहुंचाने वाले के पीछे चलती हुई उस के प्राणों का विनाश करती है. (१६) सूक्त-८ देवता—ब्रह्मगवी वैरं विकृत्यमाना पौत्राद्यं विभाज्यमाना.. (१) यह ब्राह्मण की अपहृत अर्थात् चुराई हुई गाय है. यह पुत्र, पौत्र आदि का बंटवारा कर उन का विनाश करने वाली है. (१) देवहेतिह्रियमाणा वृद्धिर्हृता.. (२) ब्राह्मणों की यह गाय हरण करते समय अर्थात् चुराते समय अस्त्र रूप है और चुराने के बाद चुराने वाले को क्षीण करने वाली होती है. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

पाप्माधिधीयमाना पारुष्यमवधीयमाना.. (३) पाप रूप होने वाली ब्राह्मण की यह गाय कठोरता उत्पन्न करती है. (३) विषं प्रयस्यन्ती तक्मा प्रयस्ता.. (४) ब्राह्मण की चुराई हुई गाय यदि दूध देती है तो इस का दूध और मांस विष के समान होता है तथा यह चुराने वाले का जीवन संकट में डालने का कारण बनती है. (४) अघं पच्यमाना दुष्षप्न्यं पक्वा.. (५) ब्राह्मण की यह गाय पकाते समय व्यसनों अर्थात् बुरी लतों को बढ़ाने वाली है तथा पक जाने पर बुरे स्वप्नों का कारण बनती है. (५) मूलबर्हणी पर्याक्रियमाणा क्षितिः पर्याकृता.. (६) ब्राह्मण की चुराई हुई गाय को अगर बेचा जाए तो चुराने वाले को जड़ से उखाड़ देती है. बेचने के बाद यह चुराने वाले को क्षीण करती है. (६) असंज्ञा गन्धेन शुगुद्ध्रियमाणाशीविष उद्धृता.. (७) यदि ब्राह्मण की गाय को उठाया तो उठाते समय यह शोक प्रदान करती है और उठाने के बाद उठाने वाले के लिए सर्प के विष के समान बन जाती है. यह अपनी गंध से चुराने वाले की चेतना नष्ट कर देती है. (७) अभूतिरुपह्रियमाणा पराभूतिरुपहृता.. (८) यदि ब्राह्मण की गाय चुरा कर किसी को उपहार में दी जाए तो यह पराभव अर्थात् हार का कारण बनती है. उपहार में देने के बाद यह उपहार देने वाले की समृद्धि नष्ट करती है. (८) शर्वः क्रुद्धः पिश्यमाना शिमिदा पिशिता.. (९) यदि ब्राह्मण की गाय को क्लेश दिया जाए तो यह क्रोध में भरे शिव शंकर के समान बन जाती है. यदि इस का रक्त निकाला जाए तो यह रक्त निकालने वाले को मृत्यु देने वाली होती है. (९) अवर्तिरश्यमाना निर्ऋतिरशिता.. (१०) यदि ब्राह्मण की गाय का मांस खाया जाए तो यह खाने वाले को दरिद्र बना देती है. मांस खाने के बाद यह खाने वाले को बुरी गति प्रदान करती है. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-९ देवता—ब्रह्मगवी

अशिता लोकाञ्छिनत्ति ब्रह्मगवी ब्रह्मज्यमस्माच्चामुष्माच्च.. (११) यदि ब्राह्मण को हानि पहुंचाई जाए तो ब्राह्मण की गाय इहलोक और परलोक दोनों को बिगाड़ देती है. (११) सूक्त-९ देवता—ब्रह्मगवी तस्या आहननं कृत्या मेनिराशसनं वलग ऊबध्यम्. (१) ब्राह्मण की गाय को मारना मरणासन्न बन जाता है. इस को हनन करना कृत्या राक्षसी है. इस का गोबर युक्त आधा पका हुआ चारा शपथ के समान है. (१) अस्वगता परिहृणुता.. (२) ब्राह्मण की अपहरण की गई गाय अपने वश में नहीं रहती है. (२) अग्निः क्रव्याद् भूत्वा ब्रह्मगवी ब्रह्मज्यं प्रविश्यात्ति. (३) मारी हुई ब्राह्मण की गाय मांसाहारी पशु बन कर मारने वाले को खाती है. (३) सर्वास्याङ्ग पर्वा मूलानि वृश्चति. (४) यदि ब्राह्मण की गाय को कोई मारता है तो यह मारने वाले के शरीर के सभी जोड़ों को छिन्नभिन्न कर देती है. (४) छिनत्त्यस्य पितृबन्धु परा भावयति मातृबन्धु. (५) यह ब्राह्मण की गाय चुराने वाले के पिता के बांधवों का छेदन करती है और माता के बांधवों को अपमानित करती है. (५) विवाहां ज्ञातीन्त्सर्वानपि क्षापयति ब्रह्मगवी ब्रह्मज्यस्य क्षत्रियेणापुनर्दीयमाना. (६) क्षत्रिय द्वारा ब्राह्मण की गाय न लौटाई जाने पर उस के सभी बंधुओं को नष्ट कर देती है. (६) अवास्तुमेनमस्वगमप्रजसं करोत्यपरावरणो भवति क्षीयते. (७) ब्राह्मण की गाय को अगर क्षत्रिय न लौटाए तो वह क्षत्रिय को गृहहीन तथा संतानहीन कर देती है. ब्राह्मण की गाय चुराने वाला क्षत्रिय अपरा रोग से ग्रसित हो कर नष्ट हो जाता है. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

य एवं विदुषो ब्राह्मणस्य क्षत्रियो गामादत्ते.. (८) ऊपर बताई गई दशा उस क्षत्रिय की होती है, जो विद्वान् की गौ का अपहरण करता है. (८) सूक्त-१० देवता—ब्रह्मगवी क्षिप्रं वै तस्याहनने गृध्राः कुर्वत ऐलबम्.. (१) जो क्षत्रिय ब्राह्मण की गाय को ले जाता है, गिद्ध उस के नेत्र निकालते हैं. (१) क्षिप्रं वै तस्यादहनं परि नृत्यन्ति केशिनीराघ्नानाः. पाणिनोरसि कुर्वाणाः पापमैलबम्.. (२) जो क्षत्रिय ब्राह्मण की गाय ले जाता है, उस की चिता भस्म के समीप केशों वाली स्त्रियां अपनी छाती कूटती हैं और आंसू बहाती हैं. (२) क्षिप्रं वै तस्य वास्तुषु वृकाः कुर्वत ऐलबम्.. (३) जो क्षत्रिय ब्राह्मण की गाय ले जाता है उस के घरों में शृगाल शीघ्र ही अपने नेत्र घुमाते हैं. (३) क्षिप्रं वै तस्य पृच्छन्ति यत् तदासी ३ दिदं नु ता ३ दिति.. (४) जो क्षत्रिय ब्राह्मण की गाय ले जाता है, उस के विषय में यह कहा जाने लगता है कि क्या यह उस का घर है. (४) छिन्ध्या च्छिन्धि प्र च्छिन्ध्यपि क्षापय क्षापय.. (५) हे ब्राह्मण की गाय! तू इस चुराने वाले का छेदन कर और उसे नष्ट कर डाल. (५) आददानमाङ्गिरसि ब्रह्मज्यमुप दासय.. (६) हे आंगिरस! तू अपहरणकर्ता क्षत्रिय का नाश कर दे. (६) वैश्वदेवी ह्यु १ च्यसे कृत्या कूल्बजमावृता.. (७) हे ब्राह्मण की गौ! तू मांस रूपी वज्र से अपने अपहरणकर्ता को नष्ट करने वाली है. (७) ओषन्ती समोषन्ती ब्रह्मणो वज्रः.. (८) हे ब्राह्मण की गाय! तू वज्र से ढकी हुई विश्व देवी कृत्या कही जाती है. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

क्षुरपविर्मृत्युर्भूत्वा वि धाव त्वम्.. (९) हे ब्राह्मण की गौ! तू मृत्यु रूप होती हुई दौड़. (९) आ दस्ते जिनतां वर्च इष्टं पूर्तं चाशिषः.. (१०) हे ब्राह्मण की गाय! तू अपहरण करने वाले के तेज, कामना, पूर्त और आशीर्वादात्मक शब्दों का हरण करती है. (१०) आदाय जीतं जीताय लोके ३ ऽ मुष्मिन् प्र यच्छसि.. (११) हे ब्राह्मण की गाय! तू ब्राह्मण को हानि पहुंचाने वाले को न्यून आयु वाला करने के लिए पकड़ कर परलोकगामी बनाती है. (११) अघ्न्ये पदवीर्भव ब्राह्मणस्याभिशस्त्या.. (१२) हे अघ्न्या! ब्राह्मण के शाप के कारण तू अपहरण कर्ता के पैरों की बेड़ी बन जाती है. (१२) मेनिः शरव्या भवाघादघविषा भव.. (१३) हे ब्राह्मण की गाय! तू अस्त्ररूप बाणों के समूह को प्राप्त होती हुई उस के पाप के कारण अधिष्ठाता बन जा. (१३) अघ्न्ये प्र शिरो जहि ब्रह्मज्यस्य कृतागसो देवपीयोरराधसः.. (१४) हे अघ्न्या! तू उस देव हिंसक अपराधी के कार्य को विफल करने के लिए उस के शीश को काट डाल. (१४) त्वया प्रमूर्णं मृदितमग्निर्दहतु दुश्चितम्.. (१५) हे ब्राह्मण की गौ! तेरे द्वारा कुचले और मसले हुए उस पाप पूर्ण चित्त वाले को अग्नि भस्म कर डालें. (१५) सूक्त-११ देवता—ब्रह्मगवी वृश्च प्र वृश्च सं वृश्च दह प्रदह सं दह.. (१) हे ब्राह्मण की गाय! तू अपने अपहरण करने वाले को बारबार काट और जला दे. (१) ब्रह्मज्यं देव्यघ्न्य आ मूलादनुसंदह.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अघ्न्या! तू अपहरण करने वाले को समूल नष्ट कर दे. (२) यथायाद् यमसादनात् पापलोकान् परावतः.. (३) हे अघ्न्या! तेरा अपहरण करने वाला यम के लोकों और पाप के घरों को प्राप्त हो. (३) एवा त्वं देव्यघ्न्ये ब्रह्मज्यस्य कृतागसो देवपीयोरराधसः.. (४) हे अघ्न्या देवी! तू अपराध करने वाले अपहरणकर्ता, देव हिंसक के कंधों और सिर को काट दे. (४) वज्रेण शतपर्वणा तीक्ष्णेन क्षुरभृष्टिना.. (५) हे अघ्न्या! तू सौ पैरों वाले एवं तेज धार वाले वज्र से अपने अपहरणकर्ता का वध कर. (५) प्र स्कन्धान् प्र शिरो जहि.. (६) हे अघ्न्या! तू अपने अपहरणकर्ता को नष्ट कर दे. (६) लोमान्यस्य सं छिन्धि त्वचमस्य वि वेष्टय.. (७) हे अघ्न्या! तू अपने अपहरणकर्ता के लोमों को नष्ट कर उस का चमड़ा उधेड़ दे. (७) मांसान्यस्य शातय स्नावान्यस्य सं वृह.. (८) हे अघ्न्या! तू अपने अपहरणकर्ता के मांस को काट कर उस की नसों को सुखा दे. (८) अस्थीन्यस्य पीडय मज्जानमस्य निर्जहि.. (९) हे अघ्न्या! तू इस अपहरणकर्ता की हड्डियों में दाह और मज्जा में क्षय भर दे. (९) सर्वास्याङ्गा पर्वाणि वि श्रथय.. (१०) हे अघ्न्या! इस अपहरणकर्ता के अवयवों और जोड़ों को ढीला कर दे. (१०) अग्निरेनं क्रव्यात् पृथिव्या नुदतामुदोषतु वायुरन्तरिक्षान्महतो वरिम्र्णः.. (११) इस अपहरण करने वाले को वायु अंतरिक्ष और पृथ्वी से खदेड़ दे तथा क्रव्याद अग्नि इसे भस्म कर दे. (११) सूर्य एनं दिवः प्र णुदतां न्योषतु.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*