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बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)

Bawan Kasni

सद्गुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sant Ashram Ranjari 2015 Edition · Sant Ashram Ranjari, Samba (J&K)

Devanagarihipublished122 पृष्ठ

23. बाँस की फूँकनी के प्रहार से साहिब जी को मारवाया जाना

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(23) बाँस की फूँकनी के प्रहार से साहिब जी को मरवाया जाना

साहिब की सत्य भक्ति पूरे देश में बहुत तेज़ी से फैल रही थी। पाखण्डियों के चुंगल से निकल कर लोग साहिब की सत्य भक्ति को अपना रहे थे। साहिब की बढ़ती हुई शान देख शेख तकी की चिन्ता बढ़ रही थी। इसलिए वो तलाश में रहता कि कैसे साहिब को रास्ते से हटाया जाये। अपने साथी पंडित, मुल्ला और मौलवियों से मिलकर नये-नये षड्यंत्र साहिब को मारने के लिए रचता रहता। एक दिन उसने नगर में बाँस की भारी फूँकनी देखी तो उसके मन में विचार आया कि क्यों न साहिब के सिर पर इस फूँकनी से प्रहार कर साहिब की जीवन लीला को समाप्त किया जाए। यह सोच कर उसने अपने सिपाहियों को भेजकर वो बाँस की फूँकनी मँगवाई और उसने स्वयं ही बाँस की फूँकनी से प्रहार करने का फैसला कर लिया। समय आने पर उसने उस भारी बाँस की फूँकनी से साहिब के सिर पर प्रहार किया। पर साहिब के सिर पर उसका कोई भी असर न हुआ। साहिब के सिर पर बार-बार प्रहार करने से बाँस की फूँकनी का असर न होते देख शेख तकी अत्यंत लज्जित हुआ और शीघ्र ही वहाँ से चल दिया।

देख बाँस की फूँकनी, तकी ने किया विचार।
जिसके सिर पै लगेगी, वोह सह सके न मार॥
अपने हाथों साहिब पर, बहुत किये प्रहार।
बाल बाँका न कर सका, थक कर गया हार॥

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24. विलक्षण नाग को साहिब जी पर छोड़ा गया

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(24) विलक्षण नाग को साहिब जी पर छोड़ा गया

साहिब को रास्ते से हटाने के सारे प्रयास फेल हो रहे थे। हर बार शेख तकी को लज्जित ही होना पड़ता। पर वो साहिब को जादूगर समझकर नये-नये षड्यंत्र रचने लगता था। कहीं से भी साहिब को मारने की कोई भी सलाह उसे देता तो वो फौरन मान लेता था। क्योंकि उसका एक ही लक्ष्य था कि किसी भी तरह से साहिब को हमेशा-हमेशा के लिए मिटा देना। शेख तकी के एक सूझवान साथी ने एक ऐसे विलक्षण नाग के बारे में बताया जिसके डंसते ही मनुष्य मर जाता है। शेख तकी ने फौरन उस नाग को मँगवाने का आदेश दे दिया। विलक्षण नाग आ गया। एक दिन जब बादशाह सिकंदर का राजदरबार लगा था और साहिब मध्य में आसन पर विराजमान होकर सत्य भक्ति का उपदेश दे रहे थे, शेख तकी ने ऐसे समय विलक्षण नाग की पटारी अपने हाथ में लेकर साहिब पर उस नाग को छोड़ा। शेख तकी साहिब की छवि को सबके सामने बिगाड़ने के चक्कर में था, पर उसे क्या पता था कि वो अपनी इन करतूतों से साहिब को अधिक-से-अधिक प्रसिद्ध किये जा रहा है। विलक्षण नाग साहिब को प्रणाम कर आकाश में उड़कर लुप्त हो गया। यह देख सब भक्तजन साहिब की जय-जयकार के जैकारे लगाने लगे।

नीचा दिखावन हेतु साहिब को, ऐसा नाग ले आये।
विलक्षण नाग अत डरावना, डसते ही मर जाये॥
नाग फूंकारे मारता, दिया साहिब पर छोड़।
कर प्रणाम साहिब को, उड़ा आकाश की ओर॥

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25. साहिब जी को सागवान के पेड़ से बाँध कर मरवाया जाना

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(25) साहिब जी को सागवान के पेड़ से बाँध कर मरवाया जाना

आशाओं पर पानी फिर रहा था। शेख तकी बहुत परेशान हो रहा था। साहिब को अपने रास्ते से हटाने के सारे प्रयास असफल हो रहे थे। वो जहाँ भी जाता, उसके कानों में साहिब की प्रशंसा ही सुनाई पड़ती। इससे उसके हृदय की क्रोधाग्नि और बढ़ती जा रही थी। ऐसे में किसी ने उसे बताया कि यदि किसी को सागवान के पेड़ के साथ चाँदी की तारों से बाँध दिया जाए तो उसकी जीवन लीला समाप्त हो जाती है। बौखलाए हुये शेख तकी ने साहिब को मारने का यह षड्यंत्र बिना विचार किये स्वीकार कर लिया। क्योंकि उसका लक्ष्य था कि किसी भी तरह से साहिब को अपने रास्ते से हटाया जाए।

भक्ति साहिब कबीर की, चारों ओर बढ़ती जाये। रोज बड़ाई सुनते सुनते, तकी को नींद न आये॥

उसने सोचा कि ऐसा करके भी देख लेते हैं। शेख तकी साहिब को घुमाने के बहाने साथ ले गया। रास्ते में जहाँ सागवान के पेड़ थे, वहाँ पहुँचकर रुक गया और साहिब को पेड़ के साथ खड़ा होने को कहा। साहिब उसके कहे अनुसार बिना किसी डर के वहाँ खड़े हो गये। शेख तकी ने सिपाहियों को आदेश दिया कि कबीर को चाँदी की तारों के साथ इस पेड़ से बाँध दो। सिपाहियों ने साहिब को पेड़ के साथ बाँध दिया पर सब बेकार ही गया। साहिब का तो कुछ बिगड़ा ही नहीं। तकी मारे लज्जा के मुँह छिपाकर वहाँ से चला गया।

तार चाँदी से बाँध दिया, साहिब पुरुष कबीर। कुछ न बिगड़ा साहिब का, हार गया तकी पीर॥

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26. नीरु, नीमा और भक्तजनों को कत्ल करवाया

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(26) नीरू, नीमा और भक्तजनों को कत्ल करवाया

साहिब की बढ़ती हुई प्रसिद्धी को देख शेख तकी और भी तिलमला उठा। सिपाहियों को हुक्म दिया कि नीरू–नीमा और अन्य भक्तजन, जो कबीर के शिष्य हैं, उन्हें पकड़ कर हमारे पास लाओ। उसकी आज्ञानुसार सबको पकड़कर लाया गया तो शेख तकी ने अपनी तलवार उठाई और सबके गले काट दिये। जब साहिब को इस बात का पता चला तो वे शेख तकी के पास आये और आकर शेख तकी से कहने लगे कि वाह ! पीर जी, बड़ा बहादुरी वाला काम किया है, क्या पीरों के यही काम होते हैं ! इन्होंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था, जो तुमने इनको कत्ल किया ! तुम्हारी दुश्मनी तो मेरे साथ है।

साहिब ने उसी समय एक ऐसी तान सुनाई कि सब जीवित हो उठ खड़े हुए। सब साहिब की जय–जयकार करने लगे। अब शेख तकी को बहुत शर्मिंदगी महसूस हो रही थी। उसे अपने किये पर बहुत पछतावा भी हुआ। वो साहिब के चरणों पर गिरकर क्षमा माँगने लगा। दया के सागर साहिब ने उसे इस भूल पर भी क्षमा कर दिया पर शेख तकी अन्दर से बहुत घबराया हुआ था।

क्रोध अग्नि से जलते हुए, धर्म गुरु पकड़ी तलवार।
नीरु नीमा और शिष्य अनेका, सबको दीया मार॥
आ नजदीक बोले साहिब, यही पीरों के काम।
क्या बिगाड़ा इन्होंने तेरा, गले पै चली तलवार॥

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27. साहिब जी को सात खण्डों वाले मकान में तालों से बंद कर मरवाया जाना

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(27) साहिब जी को सात खण्डों वाले मकान में तालों से बंद कर मरवाया जाना

एक सहयोगी ने शेख तकी को साहिब के ख़िलाफ़ एक तरकीब बताई कि क्यों न कबीर को अनेक तालों के अंदर बंद कर दिया जाए जिससे कबीर बाहर नहीं आ सकेगा और मारे भूख-प्यास से तड़प-तड़पकर मर जाएगा। शेख तकी इस षडयंत्र से बड़ा खुश हुआ। उसने फौरन सिपाहियों को आदेश दिया कि नगर में कोई ऐसा मकान देखो, जिसमें बहुत सारे खण्ड हों जिनको अलग-अलग ताला लग सके। सिपाहियों को सात खण्डों वाला एक मकान मिल गया और आकर तकी को इस बात की सूचना दी। तकी ने उनके साथ जाकर वो मकान देखा। शेख तकी ने उस मकान के सातवें खण्ड में साहिब के बैठने के लिए एक आसन लगवा दिया और साहिब को उस आसन पर बैठने को कहा। साहिब तो अर्न्तयामी थे पर वे उसके काम में बाधा नहीं पहुँचाते थे। वो जो करता, उसे करने देते। सब कुछ जानते हुए भी साहिब उस आसन पर विराजमान हो गये। साहिब के आसन पर बैठते ही शेख तकी ने सिपाहियों को इशारा कर दिया। सिपाहियों ने बाहर से ताला लगा दिया और फिर एक-एक करके सब खण्डों के द्वार बंद होने लगे और उनमें ताले लगते गए। जब सिपाहियों ने सातवें खण्ड पर भी ताला लगाकर शेख तकी की ओर मुँह किया तो साहिब को वहाँ पर खड़े पाया। यह देख सभी अत्यंत हैरान हुए और शेख तकी को मारे लज्जा के मुँह छुपाए वहाँ से जाना पड़ा।

सात खण्डों में ताले लगाकर, बंद किया साहिब कबीर। तड़प तड़प कर मर जायेगा, खुश हुआ तकी पीर॥ सातवां ताला लगा मुख फेरा, आगे खड़े पुरुष कबीर॥

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नं : 7

नं : 6

28. साहिब जी को नीम के पेड़ के साथ बाँध कर मरवाया जाना

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(28) साहिब जी को नीम के पेड़ के साथ बाँध कर मरवाया जाना

शेख तकी ने मौलवियों और पंडितों की सलाह से साहिब को नीम के पेड़ से बाँध कर मारने का षडयंत्र रच लिया। जब साहिब को नीम के पेड़ के पास ले जाकर पेड़ के साथ खड़े होने को कहा तो साहिब उनकी बात मान पेड़ के साथ खड़े हो गये। शेख तकी साहिब की जहाँ-जहाँ कसनी लेता था, वहाँ-वहाँ बहुत सारे लोग भी साथ ले जाता था, ताकि साहिब की छवि को सबके सामने बिगाड़ सके पर होता उल्टा ही था। साहिब भी लोगों को यह दिखाने के लिए कि ये धार्मिक पाखण्डी लोग हैं, उसकी हर बात को मंजूर कर लेते थे ताकि लोग उनके चुंगल में न फँसें और हो भी यही रहा था। भोली-भाली जनता जो पाखण्डियों के जाल में फँसी थी उनको छोड़ कर धीरे-धीरे साहिब की शरण में आने लगी थी।

जब साहिब नीम के पेड़ के पास खड़े हो गये तो तकी ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि कबीर को लोहे की तारों के साथ इस पेड़ के साथ बाँध दो। सैनिकों ने हुक्म का पालन किया और साहिब को लोहे की मजबूत तारों से उस पेड़ के साथ बाँध दिया। उसने सोचा कि अब तो कबीर भूख-प्यास के मारे प्राण त्याग देगा पर वो इस सत्य से बेखबर था। साहिब की देही तो केवल देखने के लिए थी। उसका यह प्रयास भी बेकार ही गया। साहिब का वो कुछ नहीं बिगाड़ पाया।

हो इकट्ठे धर्म के अगुवा, तार से बाँधो साहिब कबीर।
भूख प्यास से मर जायेगा, सोची मारन की तरकीब॥
कुछ न बिगड़ा साहिब का, शब्द स्वरुपी साहिब शरीर।
अन्न आहार कुछ न कर्ता, समझ न पाये मूर्ख पीर॥

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29. साहिब जी को दीवार में चिनवाया गया

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(29) साहिब जी को दीवार में चिनवाया गया

साहिब की ख्याति दिनों-दिन बढ़ती देख ईर्ष्या की आग में जलते हुए एक समय मौलवियों और पंडितों ने शेख तकी को सलाह दी कि कबीर को दीवार में चिनवा कर मार देते हैं। तकी पहले से ही किसी योजना की तलाश में था। उसने यह सलाह भी स्वीकार कर ली। धर्म गुरु शेख तकी ने कुशल मिस्त्री और मजदूरों को बुलवाया और उन्हें समझा दिया कि तुम्हें कबीर को दीवार में चिनना है, इसलिए दीवार बड़ी मज़बूत बननी चाहिए। जब दीवार बनाने का सारा मसाला तैयार हो गया तो शेख तकी कबीर साहिब को बुलाकर ले आया और कहा कि आप यहाँ पर खड़े हो जाएँ। मिस्त्री यहां पर दीवार बनायेंगे। कबीर साहिब बिना किसी झिझक के वहाँ खड़े हो गये। मिस्त्रियों ने शीघ्र ही मज़बूत दीवार तैयार कर दी और साहिब को उसमें चिन कर बंद कर दिया। यह देख शेख तकी के साथी बड़े खुश हुए कि अब साहिब से छुटकारा मिल गया। पर कमाल ऐसा हुआ कि अगले ही पल सबने साहिब को दीवार के बाहर खड़े पाया, जिससे सब हैरान हो गए और लज्जित होकर चले गये। यह देख चारों ओर साहिब की जय-जयकार होने लगी।

सभी पाखण्डी हो इकट्ठे, शेख तकी से सलाह बनाई। करो बन्द दीवार के बीच, मुल्ला मौलवी युक्ति बताई॥ साहिब बन्द हुए दीवार में, सबने मिलकर खुशी मनाई। दीवार के बाहर साहिब खड़े, संगत जय-जयकार बुलाई॥

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30. साहिब जी को विष का प्याला पिलाया जाना

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#(30) साहिब जी को विष का प्याला पिलाया जाना

दयालू साहिब शेख तकी की सब गलतियों को क्षमा किये जा रहे थे पर शेख तकी मारे ईर्ष्या के दिन-रात आग की तरह जल रहा था। वो किसी के भी मुख से साहिब की जय-जयकार सुननी नहीं चाहता था। ऐसे में उसने साहिब को विष का प्याला पिलाने की योजना बनाई। उसने सिपाहियों को आदेश दिया कि अत्यंत प्रभावशाली विष को लाया जाए। सिपाहियों ने आदेश का पालन कर बहुत प्रभावशाली विष पेश किया। शेख तकी ने उस विष को दूध में मिलाया और विष से मिला दूध का प्याला लेकर साहिब के पास आया। शेख तकी ने वो दूध का प्याला साहिब को पीने के लिए कहा। साहिब तो अंतर्यामी थे, सब जानते थे; उन्होंने बिना किसी झिझक के वो प्याला हाथ में लिया। हाथों में लेते ही विष से मिला दूध गायब हो गया। साहिब ने यह कहकर कि यह प्याला तो खाली है इसमें कुछ नहीं, शेख तकी को वो प्याला वापिस कर दिया। शेख तकी अपनी एक और नाकामयाबी पर लज्जित हुआ और वहाँ से निराश होकर चला गया।

अति प्रभावी ज़हर प्याला, साहिब हाथ थमाया।
दूध जहर सब गायब हो गया, जब साहिब हाथ लगाया॥
खाली कह कर ज़हर प्याला, वापस तकी लौटाया।
मारे लज्जा के राज गुरु ने, अपना मुख छुपाया॥

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31. साहिब जी को सखुआ के पेड़ से बाँध कर मरवाया जाना

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(31) साहिब जी को सखुआ के पेड़ से बाँध कर मरवाया जाना

बादशाह सिकंदर के वजीर अथवा धर्म गुरु पीर शेख तकी को दुखी देख सभी मुल्ला, मौलवियों और पंडितों ने मिलकर एक नया षडयंत्र रचा। उन्हें एक मुल्ला द्वारा मालम पड़ा कि किसी को सखुआ के पेड़ के साथ सोने की तारों से बाँध दिया जाए तो उसकी जीवन लीला समाप्त हो जाती है। उन्होंने इस नये षडयंत्र की ख़बर धर्म गुरु शेख तकी को दी। तकी ने उनकी बात झट से स्वीकार कर ली और साहिब की एक और कसनी लेने को तैयार हो गया। उसने सिपाहियों द्वारा सखुआ के पेड़ का पता लगाया। सिपाही शेख तकी को साथ लेकर वहाँ गये और वो पेड़ दिखाया। फिर शेख तकी अपने सिपाहियों, मुल्ला, मौलवियों, पंडितों और साहिब को अपने साथ लेकर वहाँ पहुँचा। शेख तकी ने साहिब से कहा कि आप इस पेड़ के साथ खड़े हो जाएं। बिना देर किये साहिब तुरंत उस पेड़ के साथ खड़े हो गये। शेख तकी ने सिपाहियों को आदेश दिया कि कबीर को सोने की तारों से इस पेड़ के साथ बाँध दिया जाये। सिपाहियों ने ऐसा ही किया। पर साहिब का कुछ न बिगड़ा क्योंकि उनका शरीर तो पंच भौतिक तत्व का था ही नहीं, जो नष्ट होता। वो तो शब्द स्वरूपी थे, शेख तकी को इस बार भी मुँह की खानी पड़ी। बेइज्जत होकर वह वहाँ से चला गया।

सखुआ पेड़ में स्वर्ण तार से, जो व्यक्ति बंध जाये।
मुल्ला मिलकर सलाह बनाई, सूखे वाँग सुख जाये॥
बाँधने हेतु साहिब कबीर, धर्म गुरु फरमान सुनाया।
शब्द स्वरुपी सत्य साहिब को, अब तक कोई बाँध न पाया॥

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32. साहिब जी को जिंदा जलाया जाना

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(32) साहिब जी को जिंदा जलाया जाना

साहिब की बार-बार कसनी लेता हुआ शेख तकी अपनी नाकामयाबी पर घबरा गया था। घबराहट से परेशान होकर वह नित्य नये-नये षड्यंत्र रच रहा था। उसने अपने सभी पाखण्डियों से मिलकर साहिब को जिंदा जलाने की योजना बनाई। किसी ने उसे बताया कि यदि अलसी के तेल में कपड़ा भिगोकर किसी के ऊपर डाल दो और फिर उसमें आग लगा दो तो वो व्यक्ति शीघ्र ही जलकर मर जाता है। तकी को योजना पसंद आई। उसने अलसी का तेल और कुछ कपड़े मँगवाए। फिर शेख तकी ने सिपाहियों से कहा कि इन कपड़ों को तेल में अच्छी तरह से भिगोकर साहिब के शरीर पर बाँध दो। सिपाहियों ने हुक्म का पालन किया। साहिब बड़े शांत भाव से उसकी हरकतें देख मुस्करा रहे थे, उसे कुछ कह नहीं रहे थे, क्योंकि साहिब तो अर्न्तयामी थे।

साहिब के शरीर पर तेल से भीगे कपड़ों को आग लगा दी गयी और सारे कपड़े जलकर राख हो गये। पर साहिब का तो कुछ बिगड़ा ही नहीं। उन्हें तो तनिक भी आँच नहीं आई। शेख तकी और उसके सब साथियों को फिर लज्जित होकर जाना पड़ा।

धर्म के ठेकेदारों मिलके, एक नयी तरकीब बनाई।
तेल से भीगा कपड़ा लिपटा, साहिब को आग लगाई॥
कपड़े जलकर राख हो गए, आग साहिब को छू न पाई।
जीव चेतावन आये साहिब, दुनिया उलटा मारन जाई॥

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