बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)
Bawan Kasni
सद्गुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: Sant Ashram Ranjari 2015 Edition · Sant Ashram Ranjari, Samba (J&K)
बावन कसनी ( कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई ) 101
44. साहिब जी को क्रूश पर खड़ा किया जाना
102 साहिब बन्दगी
(44) साहिब जी को क्रूश पर खड़ा किया जाना
बार-बार साहिब की इतनी कसनियाँ लेने के बाद भी मूर्ख पाखण्डियों को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि साहिब तो इंसान ही नहीं हैं। उनका शरीर तो मात्र देखने के लिए है असल में वो तो शब्द सरुपी हैं। वे अभी भी साहिब को जादूगर समझकर मिटाने का प्रयास कर रहे थे। सबने मिलकर विचार किया कि कबीर को क्रूश पर खड़ा करके कीलें ठुकवाकर मार देते हैं। जब यह षडयंत्र शेख तकी को मालम हुआ तो वो बड़ा खुश हुआ। उसने इस योजना को मान लिया। शेख तकी साहिब के पास गया और उन्हें अपने साथ क्रूश वाले स्थान पर ले आया। वहाँ पहुँचकर तकी ने साहिब से कहा कि आप इस क्रूश पर खड़े हो जाओ। बेखौफ साहिब भी मानो इसी इंतज़ार में थे, क्योंकि वे तो लोगों को यही बताना चाह रहे थे कि देख लो, ये धार्मिक पाखण्डी असल में कितने क्रूर हैं, कितने धोखेबाज हैं। हुक्म पा कर जब साहिब उस क्रूश पर खड़े हो गये तो तकी ने अपने सिपाहियों को हुक्म दिया कि काँटों की टोपी कबीर के सिर पर रख कर हाथों और पाँव में कीलें ठोक दो। शेख तकी के हुक्म का पालन हुआ। इस बार भी शेख तकी की योजना विफल हो गई। यह योजना भी साहिब का कुछ न बिगाड़ सकी। उसकी ईर्ष्या अग्नि ज्वाला की तरह बढ़ रही थी।
साहिब मारन को रल पाखण्डी, एक नया परपंच रचाया।
क्रूश पर खड़ा कर साहिब को, काटों का टोप पहिनाया॥
साहिब का तो कुछ न बिगड़ा, पाखिण्डयों का मुख मुरझाया॥
बावन कसनी ( कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई ) 103
45. चक्र से साहिब जी पर प्रहार किया जाना
104 साहिब बन्दगी
#(45) चक्र से साहिब जी पर प्रहार किया जाना
समय पाकर सहयोगी पाखण्डियों ने सलाह दी कि क्यों न कबीर पर ऐसे चक्र का प्रहार करें, जैसा श्री कृष्ण के पास था। उसने बताया कि कृष्ण जी के चक्र से कोई भी बचकर नहीं जा सकता था। वो चक्र किसी भी विरोधी को मारकर फिर वापिस उनके पास आ जाता था। तकी को यह बात बहुत अच्छी लगी। उसे फिर उम्मीद की एक किरण नज़र आने लगी। उसने ऐसा ही चक्र बनवाया और चक्र चलाने में कुशल चालक को भी बुलवाया। चालक को तकी ने कह दिया कि जब मैं इशारा करूँ, तब ही यह चक्र कबीर पर चलाना है। शेख तकी ने समझा दिया कि कबीर की गर्दन को इस चक्र से अलग करना है। चक्र चालक ने कहा कि आप चिंता न करें, जैसा आप कहे वैसा ही होगा। शेख तकी ने कहा यदि तुम ऐसा कर सके तो तुम्हें बहुत सारा ईनाम मिलेगा। समय आने पर तकी ने चालक को ईशारा किया। ईशारा पाते ही चालक ने चक्र को कबीर पर छोड़ा। सभा में सबने देखा कि चक्र साहिब का चक्कर काटकर वापिस मुड़ा और चलाने वाले का सिर अलग कर दिया। यह देख सब साहिब की जय-जयकार करने लगे। तब बाद में साहिब ने उस चालक को जीवित कर दिया। वो साहिब के चरणों पर गिरकर क्षमा माँगने लगा। दयालु साहिब तो शेख तकी को भी क्षमा किये जा रहे थे, फिर चक्र चालक का कसूर ही कितना था। साहिब जी ने पीर शेख तकी और चालक दोनों को क्षमा कर दिया।
चक्र चलाने में माहिर, चालक एक ले आया।
भरी सभा में साहिब ऊपर, चालक चक्र चलाया॥
चारों ओर चक्र घूमा, रत्ती छू न पाया।
चालक का ही सिर कट गया, जब चक्र वापस आया॥
बावन कसनी ( कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई ) 105
46. साहिब जी पर बाना चालक पहलवान द्वारा प्रहार करवाना
106 साहिब बन्दगी
(46) साहिब जी पर बाना चालक पहलवान द्वारा प्रहार करवाना
रोज-रोज साहिब की बढ़ती हुई ख्याति से परेशान होकर एक दिन विरोधियों ने शेख तकी को सलाह दी कि कबीर के ऊपर बाना चालक पहलवान द्वारा प्रहार करवाकर मरवाया जाए। मुसलमानों में ऐसे पट्टा खेलने वाले पहलवान होते हैं। ये पट्टा खेलते हुए बड़े खेल दिखाते हैं। कहा जाता है कि यदि किसी को पट्टा या बाना लग जाए तो वो वहीं मर जाता है। इसी कारण इस खेल को देखने वाले थोड़ा दूर रहकर देखते हैं। शेख तकी ने बाना चलाने वाले पहलवान को बुलवाकर अच्छी तरह से समझाया कि यह खेल दिखाते हुए मेरे इशारे का इंतज़ार करना। जब मैं इशारा करूँ, तुम कबीर पर अपने बाने का प्रहार करना। धर्म गुरु ने उसे बहुत सारे ईनाम का लालच भी दिया। बाना चालक बड़ा खुश हुआ और भरी सभा में पहुँच गया। भरी सभा में जब साहिब सत्य भक्ति का संदेश दे रहे थे तो बाना चालक ने वहाँ अपना खेल दिखाना शुरू कर दिया। बाना चालक का बाना तो साहिब के शरीर को छू भी नहीं पा रहा था।
भारी लालच दे पाखण्डियां, चालक को सब समझाया। पा ईशारा पहलवां, बाना साहिब पर बरसाया॥ बाना साहिब को छू न पाए, बड़ा जोर लगाया॥
अंत में पहलवान लगातार साहिब पर प्रहार करने लगा। लोग देख रहे थे कि बाने ने चालक के सिर पर ही प्रहार कर दिया, जिससे पहलवान के सिर के टुकड़े-टुकड़े हो गये। यह दृश्य देख सब साहिब की जय-जयकार करने लगे। साहिब ने एक बार फिर अपनी दयालुता का परिचय देते हुए बाना चालक को पुनः जीवित कर दिया। यह देखकर शेख तकी और उसके पाखण्डी साथी बहुत लज्जित हुए।
बाने उलटा चालक का सिर, टुकड़-टुकड़ कर डाला। दयालू साहिब ने चालक को, पुनः जीवन दे डाला॥
बावन कसनी ( कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई ) 107
47. धनुष बाण से साहिब जी को मरवाया जाना
108 साहिब बन्दगी
(47) धनुष बाण से साहिब जी को मरवाया जाना
लगातार साहिब को मारने में विफल हो रहे शेख तकी को दुखी देख उसके साथी मौलवी ने उसे एक तरकीब बताई कि क्यों न कबीर को धनुष बाण से मरवाया जाए। उसने शेख तकी को समझाया कि पहले समय में बाण चलाने वाला छिपकर भी बाण चलाता था और जिस पर चलाया जाता था, उसे मालम ही नहीं होता था। छिपकर बाण चलाने से कबीर कोई जादू भी नहीं कर सकेगा और उसका अंत हो जायेगा। शेख तकी को तरकीब बड़ी प्यारी लगी। उसने धनुष बाण चलाने में कुशल व्यक्ति को लाने की आज्ञा दी। जब उसके सैनिक ऐसे व्यक्ति को ले आए तो शेख तकी ने उसे उसका काम बता दिया। तकी ने साथ ही उसे कह दिया कि यदि तुम अपने काम में सफल हो गये तो मूँह मांगा ईनाम दिया जायेगा। बाण-चालक ने बात स्वीकार कर ली। शेख तकी ने कह दिया कि तुम मेरे इशारे का इंतज़ार करना। साहिब भरे दरबार में सत्य भक्ति का गुणगान करते हुये भक्तजनों को निहाल कर रहे थे तो तकी का इशारा पाकर धनुषधारी ने छिपकर साहिब पर तीर चलाने शुरू कर दिये। वो बाण तो चलाता था, पर उसके बाण साहिब के चरणों को स्पर्श करके फिर उसके तरकश में वापिस लौट आते थे। धनुषधारी ने बड़े बाण चलाए, पर जब साहिब का कुछ न बिगाड़ सका तो यह कौतक देखकर धनुषधारी उल्टे पाँव भाग खड़ा हुआ। शेख तकी की निराशा का कोई अंत न रहा। वह घबरा कर इधर-उधर देखने लगा और साहिब की जय-जयकार होने लगी।
छिपकर बाण चलाओ साहिब पर, वो जादू न कर पाये। लगे दरबार में धनुषधारी ने, कई बाण चलाये॥ तीर चरणों का पा स्पर्श, मुड़ तरकश में आये। घबराकर चालक हुआ व्याकुल, भागा जान बचाये॥
बावन कसनी ( कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई ) 109
48. साहिब जी को योद्धा द्वारा लट्ठों से मरवाया जाना
110 साहिब बन्दगी
(48) साहिब जी को योद्धा द्वारा लट्ठों से मरवाया जाना
बार–बार लज्जित हो रहे धर्म गुरु शेख तकी को मौलवियों, मुल्लाओं और पंडितों ने सलाह दी कि कबीर को किसी योद्धा द्वारा लट्ठों से मरवा देते हैं। हो सकता है कि वो कबीर का अंत कर दे। बौखलाया हुआ तकी यह भी आजमाने को तैयार हो गया। उसने सैनिकों को एक ताकतवर योद्धा को खोज लाने का हुक्म दिया। सैनिक योद्धा की खोज में चल पड़े और एक ताकतवर योद्धा को खोज लाए, जो लट्ठ चलाने में बड़ा ही माहिर था। तकी ने योद्धा से कहा कि तुम अपने लट्ठ से कबीर को मार दोगे तो तुम्हें मुँह माँगा ईनाम दिया जायेगा। योद्धा ने स्वीकार कर लिया। तकी ने कहा मेरे इशारे का इन्तजार करना।
आम तौर पर तकी तब आदेश देता जब साहिब श्रद्धालुओं के बीच बैठे होते थे, उन्हें प्रवचन दे रहे होते थे। ऐसा वो इसलिए करता ताकि साहिब को सबके सामने मार सके। जब साहिब सत्संग कर रहे थे तब शेख तकी का इशारा पाते ही योद्धा ने साहिब पर अंधाधुंध प्रहार करने शुरू कर दिये पर साहिब पर उन लट्ठों का कोई भी असर न हुआ। लट्ठ तो फूलों की तरह साहिब पर लग रहे थे। योद्धा भी साहिब पर अपने लट्ठों का कोई असर न देख बड़ा दुखी हुआ। आख़िर जब लट्ठ उल्टा उसके ऊपर बरसा और उसे खून निकलने लगा तो वह हार मानकर निराश होकर वहाँ से भाग गया। तकी को इस बात से अथाह लज्जित होकर जाना पढ़ा।
लट्ठधारी ताकतवर योद्धा, तकी पास ले आये।
सत्संग करते साहिब पर, पहिलवान लट्ठ चलाये॥
लट्ठ साहिब को छू न पाये, पलट योद्धा सिर लागा।
खून से लथ-पथ हुआ पहलवान, हार मान कर भागा॥
बावन कसनी ( कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई ) 111
49. साहिब जी को कोड़ों से मरवाया जाना
112 साहिब बन्दगी
#(49) साहिब जी को कोड़ों से मरवाया जाना
शेख तकी साहिब को जल्दी से जल्दी मिटाना चाहता था। उसकी कोई भी तरकीब कामयाब नहीं हो रही थी। वो सोचता था कबीर कोई जादूगर है। उसने पंडित ओर मुल्ला की सलाह पर साहिब को कोड़ों से मरवाने का फैसला कर लिया। बौखलाया हुआ शेख तकी साहिब को रास्ते से हटाने के लिए हर किसी की बात मान लेता था। इसलिए उसने कोड़ों वाली बात भी मान ली और अपने सिपाहियों को हुक्म दिया कि किसी ऐसे आदमी को खोजकर लाओ जो कोड़े चलाने में कुशल हो। जब ऐसा व्यक्ति खोजकर लाया गया तो शेख तकी ने उसे समझा दिया कि उसे क्या करना है। जब साहिब भक्तजनों को प्रवचन सुना रहे थे, तब शेख तकी के इशारे पर उसने साहिब पर कोड़ों की वर्षा कर दी। पर कोड़ों से साहिब की शब्द स्वरूपी देही पर कोई असर नहीं हो रहा था और न ही कोई निशान पढ़ रहा था। साहिब तो भक्तजनों को सत्य भक्ति का उपदेश देने में मगन थे। कोड़ों का असर न होते हुये देख कोड़े चलाने वाला बड़ा परेशान हो गया और आखिरकार थक कर वहाँ से भाग खड़ा हुआ। यह देख भक्तजन साहिब की जय-जयकार करने लगे। शेख तकी और उनके सभी साथी लज्जित होकर वहाँ खड़े होकर साहिब की ओर देखते रह गए।
हुआ फैसला साहिब को, कोड़ों से मार मुकाने का। धर्म गुरु ने हुकम दिया, सत्संग में कोड़े लगाने का॥ वर्षा की तरह कोड़े बरसे, कोड़े वाला गया थक हार। सब का सिर नीवा हुआ, साहिब की सुन जय-जयकार॥
बावन कसनी ( कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई ) 113
50. साहिब जी को तेल के कोल्हू में डलवाना
114 साहिब बन्दगी
(50) साहिब जी को तेल के कोल्हू में डलवाना
शेख तकी द्वारा बार-बार साहिब की कसनी लेने से बादशाह बहुत दुःखी था क्योंकि बादशाह सिकंदर साहिब को स्वयं खुदा मानता था। बादशाह की साहिब के प्रति श्रद्धा को देख, धर्म गुरु शेख तकी ईर्ष्या में इतना जल रहा था कि उसे साहिब को मारने के सिवाय और कुछ सूझता ही नहीं था। इसलिए वो आए दिन अपने साथियों से मिलकर साहिब को मारने के नये-नये ढंग सोचता रहता। एक दिन वो अपने साथियों के साथ कहीं जा रहा था तो रास्ते में तेल का कोल्हू चलते देखा। सबका ध्यान उस ओर गया। बस ! फिर क्या था, सबने विचार रखा कि कबीर को मारने के लिए यह तरीका भी अपनाकर देख लेते हैं। हो सकता है कि इस युक्ति से कबीर का अंत हो जाए। शेख तकी को भी यह सलाह ठीक लगी। वो एक दिन साहिब को घूमने के बहाने ले गया। अर्न्तयामी साहिब तो सब जानते थे। शेख तकी ने उस तेल के कोल्हू के पास पहुँचकर साहिब से कहा कि आप इस ओखली में खड़े हो जाओ। साहिब भी आदेश के ही इंतज़ार में थे। वो तो मुस्कराते हुये उसमें खड़े हो गये। तभी शेख तकी ने कोल्हू चलाने वाले को कोल्हू चलाने का हुक्म दिया। हुक्म सुनते ही कोल्हू वाले ने कोल्हू चला दिया। कोल्हू चलता रहा, साहिब खड़े मुस्कराते रहे। कोहलू साहिब का कुछ न बिगाड़ पाया। यह देख तकी और उसके साथी बड़े हैरान हुये और अपनी हार से बेइज्जत होकर वहाँ से चल दिये।
कोल्हू में साहिब को पीड़ो, सबने मिल विचार बनाया। ओखली में खड़े होने का, साहिब को हुक्म सुनाया॥ झट से सब ने किया ईशारा, कोल्हू वाले कोल्हू चलाया। चलता कोल्हू साहिब ऊपर, कुछ बिगाड़ न पाया॥
बावन कसनी ( कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई ) 115
51. साहिब जी को इमली के पेड़ के साथ बाँध कर कीलें गड़वाना
116 साहिब बन्दगी
(51) साहिब जी को इमली के पेड़ के साथ बाँध कर कीलें गड़वाना
चारों ओर पूरे देश में साहिब की सत्य भक्ति की प्रसिद्धी फैल गई थी और भक्तजन बड़ी गिनती में साहिब की शरण में आने लगे थे। दूसरी ओर धर्म गुरु और उनके साथी बार-बार अपनी हार के कारण परेशान हो रहे थे। इतने में किसी ने सलाह दी कि कबीर को इमली के पेड़ के साथ बाँध देते हैं। तकी ने उदास मन से यह युक्ति भी स्वीकार कर ली और साहिब को उस पेड़ के पास लाकर कहा कि आप इस पेड़ के पास खड़े हो जाओ। अर्न्तयामी साहिब तो उनके मन की बात को जानते थे और मुस्ककाते हुये वहाँ खड़े हो गये। तकी ने सिपाहियों को आदेश दिया कि कबीर को इमली के पेड़ के साथ बाँध दिया जाये और उसके माथे और छाती पर कीलें गाड़ दो। धर्म गुरु शेख तकी ने सोचा कि कबीर तड़पकर मर जायेगा। तकी के आदेश का पालन करते हुए सिपाहियों ने ऐसा ही किया। वे हथौड़ों से साहिब के माथे और छाती पर कीलें गाड़ने लगे। पर कोई यह नहीं जान पा रहा था कि साहिब का शरीर तो मात्र देखने के लिए था वो तो शब्द स्वरूपी हैं। सिपाही साहिब की छाती और माथे तक अपनी कीलें ले जा ही नहीं पा रहे थे। कीलें उनके हाथों से छूट-छूटकर नीचे पृथ्वी पर गिर रही थीं। सिपाहियों ने शेख तकी से कहा कि हमारे हाथ काम नहीं कर पा रहे हैं। कीले हाथ से नीचे गिर जाती हैं। यह सुनकर शेख तकी और उनके सलाहकार बड़ा ही लज्जित हुए। ऐसे में वो कर ही क्या सकते थे।
पाखण्डी देख शान साहिब की, हो गए लाल-पीले।
इमली पेड़ से बाँध साहिब को, लगे गाड़ने कीलें॥
कीलें पकड़ हाथ साहिब और, बड़े तो पड़ जाएँ ढीले॥
सिपाही कहें वश नहीं हमरे, गिर रही हाथ से कीलें॥
बावन कसनी ( कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई ) 117
52. मृतक कमाली को कब्र से जिन्दा करने को कहा गया
118 साहिब बन्दगी
#(52) मृतक कमाली को कब्र से जिन्दा करने को कहा गया
सत्य के पुंज सर्वव्यापी सतगुरु कबीर साहिब को धर्म गुरु शेख तकी बार-बार कसनियां लेकर भी साहिब का कुछ नहीं बिगाड़ सका था। उसको कुछ-कुछ समझ में आ गया था कि साहिब कोई साधारण नहीं हैं, ईलाही व्यक्तित्व हैं। पर फिर भी वह हार नहीं मान रहा था। राजदरबार लगा था, साहिब प्रवचन कर रहे थे। तकी वहाँ पर आया। राजा और सभी लोग धर्मगुरु के सम्मान में उठ खड़े हुये पर साहिब अपने आसन पर ही विराजमान रहे। यह देख तकी अधिक क्रोधित हुआ और राजा से कहा कि आप तो इस कबीर को खुदा का रूप मानते हैं। यदि यह सच में खुदा का रूप है तो मेरी बेटी, जो 8 दिन पहले मर गई थी, कब्र से जिंदा करके दिखाए। तब मैं समझूँगा कि यह सच में खुदा का रूप है। बादशाह ने साहिब की ओर देखा और साहिब से मन-ही-मन प्रार्थना की। साहिब ने राजा की बात मान ली और सबके साथ बेटी की कब्र पर पहुँचे। अब साहिब ने कहा-उठ शेख तकी की बेटी! पर वो नहीं उठी। साहिब ने फिर कहा-उठ तकी की बेटी! पर वो फिर भी नहीं उठी। तब साहिब ने कहा-उठ कबीर की बेटी! साहिब जी ने इतना ही कहा कि कब्र फट गई और लड़की उसी समय कब्र में से उठकर खड़ी हो गयी और साहिब के चरणों में लिपट गयी। सब साहिब की जय-जयकार करने लगे। अचनचेत राजा के मुँह से निकला-हे साहिब! आपने तो पुनः कमाल कर दिया। राजा के मुख से ये शब्द सुन साहिब ने उस कन्या का नाम भी कमाल की तरह ‘कमाली’ ही रखा।
मुर्दा लाश जीवित हुई, जब साहिब शब्द उचारा।
देख कमाल दंग रहे सब, साहिबा नाम कमाली पुकारा॥
धर्म गुरु अपनी बेटी से कहने लगा कि अब घर चलो। कन्या ने शेख तकी के साथ जाने से मना कर दिया और कहा जब साहिब जी ने कहा उठ शेख तकी की बेटी मैं नहीं उठी। जब साहिब ने माता का नाम लेकर कहा, उठ तकी की बेटी मैं तब भी नहीं उठी। जब साहिब जी ने कहा उठ कबीर की बेटी तो मैं कबर से बाहर आ गई। अब मैं कबीर साहिब की बेटी हूँ। आपने तो मुझे गाड़ दिया था, पर साहिब ने ही मुझे जीवन दान दिया। फिर लड़की ने सबको उपदेश दिया कि कबीर साहिब स्वयं ही खुदा हैं। ये तो जीवों को संसार-सागर से पार लगाने के लिए आए हैं। पिता की ओर देखकर वो बोली कि आप अपनी ईर्ष्या को छोड़ दो और साहिब की शरण ग्रहण करो। इसी में आपकी भलाई है। अपनी बेटी के मुख से ये शब्द सुन तकी का सारा अज्ञान जाता रहा और वो साहिब के चरणों में लिपट गया।
बावन कसनी ( कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई ) 119
वेद हमारा भेद है, हम वेदन के माहिं (उपसंहार)
120 साहिब बन्दगी
वेद हमारा भेद है, हम वेदन के माहिं। जौन भेद में मैं बसौ, वेदै जानत नाहिं॥
कुरान शरीफ कह रहा है ‘बेचूना खुदा’। बेचूना अर्थात् निराकार। ईसा मसीह भी कह रहे हैं मेरा आकाशी पिता (स्वर्गीय पिता) मैं उसका एकलौता पुत्र हूँ। अकाशी पिता अर्थात् निराकार। वेद भी निराकार की बात कह रहा है। जेजे दृश्यम तेते अनित्यम्। जेजे अदृश्यम तेते नित्यम्। यानि निराकार। हमारे सभी धार्मिक ग्रन्थ भी निराकार तक की बात कहते हैं। भाईयों यह निराकार सत्ता वाला जिसको लोग रब्ब कहते हैं, वह 84 लाख योनियों का रचनहार है जो तत्वों में आकाश तत्व है परन्तु योनियों को चेतन करने वाली जो ऊर्जा है सुरति है वो कोई और चीज़ है तभी तो इस सिरजनहार निराकार को कबीर साहिब जी बोल रहे हैं।
मन ही निराकार, निरंजन जानिए॥ गुप्त भयो है संग सबके। मन निरंजन जानिये॥ निराकार जो वेद बखाने। सोई काल कोई भेद न जाने॥
मुक्ति से सबका तात्पर्य निराकार की प्राप्ति। साहिब बन्दगी पंथ किसी की निन्दा नहीं करता। निराकार सत्ता को भी स्वीकार करता है, लेकिन आगे की बात का संकेत भी देता है। संत सम्राट् कबीर साहिब जी ने न्यारा कहा और निराकार सत्ता से आगे कहा। सगुण भक्ति, निर्गुण भक्ति अथवा पाँच मुद्राओं से आगे कहा।
इसके आगे भेद हमारा। जानेगा कोई जाननहारा॥ कहे कबीर जानेगा सोई। जा पर दया सतगुरु की होई॥
संतों ने आ कर तीन लोक से आगे परम निर्माण, अमर धाम, सत्य लोक अथवा दसवें द्वार से आगे 11वें द्वार का भेद संसार को दिया।
भाईयों साहिब बन्दगी पंथ भी काल पुरुष के काया नाम और अमर लोक के विदेह नाम का अंतर समझा कर संसार को सत्य भक्ति की ओर ले जा रहा है।
काग पलट हंसा कर दीना। ऐसा पुरुष नाम मैं दीना॥ अकह नाम, लिखा न जाई, पढ़ा न जाई। बिन सतगुरु कोई नाहि पाई॥