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बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)

Bawan Kasni

सद्गुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sant Ashram Ranjari 2015 Edition · Sant Ashram Ranjari, Samba (J&K)

Devanagarihipublished122 पृष्ठ

बावन कसनी ( कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई ) 11

गगनमण्डल से उतरे, साहिब पुरुष कबीर। चोला धरा खवास का, तोड़े यम जंजीर ।। दास गरीब कबीर को चेरा। सत्य लोक अमर पुर डेरा। अमृत पान अमिय रस चोखा। पीवे हंसा नाहीं धोखा।। अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड में, बंदी छोड़ कहाय। सो तो पुरुष कबीर है, जननी जना न माय।। साहिब पुरुष कबीर ने, देह धरी न कोय। शब्द स्वरूपी रूप है, घट घट बोलै सोय ।। –गरीब दास जी

स्वामी! जौ तुम गवौ सो हौं गाऊँ, तुम्हारा ज्ञान विचारूँ। कहें रैदास सुणों हो स्वामी, भर्म कर्म सब छाडूूँ।। –रविदास जी

पानी ते पैदा नहीं, श्वासा नहीं शरीर। अन्न अहार करता नहीं, ताको नाम कबीर ।। –नाभा दास जी

मेरे कन्त कबीर है, वर और नहिं वरिहों। दादू तीन तिलाक है, चित और न धरिहौं ।। –दादू दयाल जी

कक्का केवल नाम है, बब्बा वरण शरीर। रर्रा सब में रमि रहा, जिसका नाम कबीर ।। सोई ज्ञानी पुरुष है, सतगुरु सत्य कबीर। रज वीरज पैदा नहीं, सुआसा नहीं शरीर ।।

अलग-अलग नामों से हर युग में आये साहिब

12 साहिब बन्दगी

अलग अलग नामों से हर युग में आये साहिब

धर्म दास को साहिब जी समझा रहे हैं कि मैं हर युग में आकर हंसों को अपने धाम ले जाता हूँ। सतयुग का वर्णन करते हुए साहिब कह रहे हैं-

सुनु धर्मदास यह अकथ कहानी। सुर नर मुनि काहू नाहिं मानी॥
तन मन धनसो चित्त लगावे। गुरु का अंत कोई बिरला पावे॥
युगन युगन मोहि आवत भयऊ। सत्य शब्द मैं कहते रहेऊ॥
कहा कहौं कोई नाहिं मानै। जे समझै ते झगरा ठानै॥

सतयुग-सतयुग में सत्यसुकृत नाम से ज्ञानी पुरुष (कबीर साहिब) काल पुरुष के लोक में आए। इस युग में मनुष्य 21 हाथ ऊँचे शरीर के थे। साहिब ने चार हंसों को तारा-जिनके नाम थे, चित्ररेखा रानी, अष्टचौका (अष्टावक्र), राय हरचन्द (राजा हरीश चंद्र) और विकसी ग्वालिन। उन्होंने-आगे नौ लाख जीवों का कल्याण किया।

सतयुग चार हंस समझाये। प्रथम राय मित्र से नहिं आये॥
<ins>चित्ररेखा रानी</ins> कर नाऊ। तिन सुनि शब्द श्रवण चितलाऊ॥
राजा रानी पूछत मोही। सो हकीकत कहौं मैं तोही॥
<ins>अष्टचौका</ins> को शब्द सुनावा। राजा रानी लोक पठावा॥
दुसरे राय वटक्षेत्र के आवा। सतसुकृति तहँ नाम धरावा॥
तिन राजा पूछा चित लायी। तब तेहि भेद कह्यो समझायी॥
पान परवाना राजहिं दीन्हा। राजा वास लोक में कीन्हा॥
तिसरे <ins>राय हरचन्द</ins> कहँ आये। बन्ध काटि के लोक पठाये॥
चौथे पुरी मथुरा में आये। <ins>विकसी ग्वालिन</ins> को समझाये॥
चारि हंस सतयुग समझाये। ते चारों गुरुवंश कहाये॥
चारिहंस नौ लाख बचाये। शब्द भरोसे घरहिं पठाये॥

साहिब कह रहे हैं कि इस तरह सतयुग में आकर मैंने चार हंसों को तारा और आगे उन चारों ने नौ लाख जीवों का कल्याण किया। आगे कह रहे हैं-

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त्रेतायुग–इस युग में ज्ञानी जी ( कबीर साहिब) मुनिन्द्र नाम से आए। इस युग में मनुष्य 14 हाथ ऊँचे शरीर के थे। त्रेतायुग के हंस ऋषि श्रृंगी ( नेम ऋषि) , अयोध्व मधुकर, टकसार।, लक्ष्मण कुमारा, रावण की पत्नि मन्दोदरी, गुरु वशिष्ठ मुनि और दुर्वासा ऋषि को गुरु स्वरूप परवाना दिया।

पुनि त्रेता युग कहौं विचारी। सात हंस त्रेतायुग तारी॥
प्रथम ऋषि श्रृंगी समझाये। दुसरे अयोध्या मधुकर आये॥
तीसरे शब्द कह्यो टकसार। चौथे बोधे लछन कुमारा॥
पचवें चलि रावण लगि गयऊ। तहाँ भेंट मंदोदरि से भयऊ॥
गवीं रावण शब्द न माना। मंदोदरी शब्द पहचाना॥
छठैं चलि वसिष्ठ लगि आये। ब्रह्म निरूपन उनहिं सुनाये॥
सतये जंगल में कियो वासा। जहाँ मिले ऋषि दुर्वासा॥
सात हंस सातौ गुरु कीन्हा। परम तत्व उनही भल चीन्हा॥
सातौ गुरु त्रेता में भयऊ। देइ उपदेश सो हंस पठयऊ॥

इस तरह साहिब कह रहे हैं कि त्रेतायुग में मैंने सात हंसों को तारा, जिनमें वशिष्ठ मुनि, श्रृंगी ऋषि आदि भी थे। अब द्वापर युग का वर्णन करते हुए साहिब कह रहे हैं-

द्वापरयुग–इस युग में ज्ञानी पुरुष करुणामय नाम से साहिब आए और रानी इन्दुमती, राजा युधिष्ठिर, द्रौपदी, पराशर ऋषि, राय धुधुल, पारसदास और उनकी पत्नी, गरुड़बोध, हरिदास सुपच भक्त, शुकदेव, विदुर, राजा भोज, राजा मुचकुन्दहि, चन्द्रहास, चार ग्वाल ( श्री कृष्ण) की गोपी को तारा।

त्रेता गत द्वापर युग आया। सत्रह जीव परवाना पाया॥
प्रथमं में राय चंद विजय कहँ गयऊ। ताकी रानी इन्दुमति रहेऊ॥
दुसरे राय युधिष्ठिर कहँ आये। द्रौपदी सहित परवाना पाये॥
तिसरे पाराशर पहँ आये। निर्णय ज्ञान ताहि समझाये॥
चौथे राय धुधुल लहि भेदा। बहुत ज्ञान को कीन्ह निखेदा॥
पचयें पारसदास समझावा। स्त्री सहित परवाना पावा॥
छठये गरुड़बोध हम कीन्हा। विहंग शब्द गरुड़ को दीन्हा॥
सातें हरिदास सुपच समझावा। नीमषार महँ उसको पावा॥

14 साहिब बन्दगी

अठयें शुकदेव पहँ ज्ञान पसारा। सकल सरब भेद निरवारा॥
नवमें राजा विदुर समझाया। भक्तिरूप उन दर्शन पाया॥
दशमें राजा भोज बुझाया। सत्य शब्द पुनि उसे चिह्नाया॥
ग्यारहें राजा मुचकुन्दहि तारे। बारहें राजा चन्द्रहास उबारे॥
तेरहे चलि वृन्दावन आये। चारि गवाल गोपी समझाये॥
गुरु रूप पुनि पन्थ चलाये। भौंसे हंसा आनि छुड़ाये॥
बावन लाख जो जीव उबारा। कलियुग चौथे यहाँ पर धारा॥

इस तरह साहिब कह रहे हैं कि 17 जीव मैंने द्वापर में तारे। अब कलयुग का वर्णन करते हुए कह रहे हैं-

कलयुग-कलयुग में ज्ञानी पुरुष कबीर नाम से आए और गोरखदत्त (गोरखनाथ), गुरु रामानन्द, पीर शेख तकी, राजा सिकन्दर, राजा बीर सिंह, कनक सिंह, राव भुपाले, रतना बनिया, अलिदास धोबी, ...................., हजरत मुहम्मद, नानक देव जी, साहु दमोदर को तारा और गुरु स्वरुप परवाना दिया। ऐसे 5 लाख पहिले तारे 42 लाख और जीवों को उबारा।

प्रथमं गोरखदत्त समझाये। तारक भेद हम तुमहिं बताये॥
दुसरे शाह बलख को बोधा। पढ़े आरबी बहुविधि सोधा॥
तिसरे रामानन्द पहँ आये। गुप्त भेद हम उन्हें सुनाये॥
चौथे पीर को परचे दीन्हा। पचये शरण सिकन्दर लीन्हा॥
छठै बीरसिंह राजा भयऊ। ताको हम शब्द सुनयऊ॥
सतयें कनकसिंघ समझाये। सोलह रानी लोक पठाये॥
अठएँ राव भूपाले आये। ग्यारह रानी लोक पठाये॥
नौमें रतना बनिन समझाई। जाति अग्रवालिन करत मिठाई॥
दशाएँ अलिदास धोबी गयऊ। सात जीव परवाना पयऊ॥
ग्यारहें ________ समझायी। तिन बहु भक्ति करी चितलायी॥
बारहें मुहम्मद कह्यो कुराना। हद्द हुकुम जीव कर माना॥

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तेरहें नानक से कह्यो उपदेशा। गुप्त भेद का कहा संदेशा॥
चौदहें साहु दमोदर समझावा। करामात दै जीव मुक्तावा॥
चौदह हंस कलयुग में कीन्हा। गुरु स्वरूप परवाना दीन्हा॥
पाँच लाख हम पहिले तारे। पीछे धर्मनि तुम पगुधारे॥
वंशन थाप्यों कियो कडिहारा। लाख ब्यालिस जीव उबारा॥

साहिब ने धर्मदास को कहा कि हर युग में आता हूँ और जीवों को चिताकर अमर लोक ले जाता हूँ। इस तीन लोक में काल जीवों को सता रहा है। यह देख साहिब ने मुझे भेजा।

वो कह रहे हैं कि मेरा कोई माता-पिता नहीं है, मैं अविगत से चला आया हूँ। जो मेरे नाम को पकड़ लेता है, वो काल से मुक्त हो जाता है।

कबीर साहिब खुद साहिब थे। हम उनकी वाणी को लेकर चल रहे हैं। अन्य कोई भी उनकी वाणी को पूर्ण रूप से लेने से हिचकेगा। इसके कई कारण हैं। हालांकि हमारा पंथ कबीर-पंथ नहीं है, क्योंकि साहिब ने कभी नहीं कहा कि मुझे मानना, उन्होंने सतगुरु की भक्ति करने को कहा, सतगुरु को ऊँचा स्थान दिया। पर मैं उनकी वाणी को एक सहारे के रूप में ले रहा हूँ। वो भी लेने की ज़रूरत नहीं है, पर इससे मेरी बात को गवाही मिल जाती है। बाकी महात्मा वाणी को पूर्ण रूप में लेने से इसलिए हिचक रहे हैं, क्योंकि साहिब जी पाखण्ड के ख़िलाफ़ थे और पाखण्ड के हरेक रूप पर उन्होंने चोट की है। ऐसे में बाकिओं को अपनी पोल खुलने का भय है। वे तो बस उतना ही ले रहे हैं, जितने से उनका स्वार्थ सिद्ध हो सके। उनकी वाणी को लेकर कहीं वो तीन लोक को स्थापित कर रहे हैं, कहीं उनकी वाणी को लेकर सगुण-भक्ति को स्थापित कर रहे हैं। बस इनका हाल तो उस भिखारी की तरह है जो दान माँगने के लिए उनका नाम लेकर अक्सर गाता फिरता है-

दान दिये धन न घटे, नदी न घटे नीर।
अपनी आँखों देख ले, यों कथि कहहिं कबीर॥

पर वह कभी भी यह दोहा क्यों बोलेगा-

माँग़ण मरण समान है, मत माँगो कोई भीख।
माँग़ण ते मरना भला, यह सतगुरु की सीख॥

वो तो बस साहिब के नाम की मोहर लगाकर अपना मतलब निकाल रहा है, लोगों को बुद्धू बना रहा है। वो तो साहिब ने दूसरे अर्थ से कहा है। यानी दान देने वाले की इच्छा पर है, माँगने के लिए तो कहा ही नहीं। ऐसे ही सगुण भक्ति के बारे में समझाया, पर यह तो कहा ही नहीं कि सगुण-भक्ति से कल्याण होगा। उन्होंने तो आत्मा के कल्याण के लिए सगुण और निर्गुण दोनों से परे परा-भक्ति का रहस्य दिया।

1. साहिब जी को गाय जीवित करने को कहा गया

16 साहिब बन्दगी

(1) साहिब को गाय जीवित करने को कहा गया

बनारस में कबीर साहिब समाज को पाखण्ड से छुड़ाकर सत्य भक्ति में लगा रहे थे। दिल्ली में सिकंदर लोधी का राज्य था। राजा जलन रोग से बहुत पीड़ित था। उसने बहुत उपचार किये, पर रोग शांत न हो सका। उधर पंडित, काजी, मुल्ला, मौलवी साहिब की बढ़ती हुई सत्य भक्ति को देख परेशान थे। उनका कारोबार समाप्त हो रहा था। घबराकर उन्होंने एक षड़यंत्र रचा और राजा से कहा कि बनारस में कोई कबीर नाम का साधु रहता है; वही आपकी जलन को समाप्त कर सकता है। यह सुनते ही राजा ने मुल्ला, मौलवियों, पीरों आदि को साथ ले बनारस चले आए। बादशाह ने कबीर साहिब को अपने पास आने का निमंत्रण दिया। पंडित, मुल्ला आदि यह सोचकर प्रसन्न हो रहे थे कि अब कबीर की ख़ैर नहीं है। कबीर तो उलटवसीया है; वो कोई उल्टी बात कर देगा और राजा उसका सिर काट देगा। पर हुआ इसके उलट। साहिब के दर्शन पाते ही बादशाह का जलन रोग शांत हो गया। उसने गहरे सुख की अनुभूति की। उसके दिल में साहिब के प्रति प्रेम उत्पन्न हो गया। वो साहिब का बहुत ही आदर-सत्कार करते हुए राजदरबार में ले गया और अपने सिंहासन पर बिठाकर स्वयं उनके चरणों के पास बैठ गया। यह देख काज़ी, पंडित, मौलवियों को बहुत ईर्ष्या हुई। राजा का पीर गुरु शेख तकी का हृदय तो मारे ईर्ष्या के जल गया। सबने तकी के पास जाकर कहा कि कबीर काफ़िर है; यह धर्म के ख़िलाफ़ बोलता है, किसी को नहीं मानता है। तकी राजा सिकंदर के पास उनकी फ़रियाद लेकर गया और कहा कि आप खुदाय रसूल का उल्लंघन कर पाप कमा रहे हैं। राजा सोच में पड़ गया। राजा ने साहिब के पास आकर सारा हाल बताया। राजा ने कहा कि मैं आपको खुदा का ही रूप मानता हूँ, पर इन लोगों की शंका का समाधान करो। साहिब ने उनकी शंका का समाधान करना स्वीकार कर लिया। राजदरबार लगा हुआ था। साहिब भी वहाँ पहुँचे। शेख तकी धर्म गुरु होने के साथ-साथ राजा का वज़ीर भी था। इसलिए उसकी बात कोई टाल नहीं सकता था। उसने एक गाय मंगवाकर क़त्ल करवा दी। शेख तकी ने राजा से कहा कि यदि कबीर खुदा का रूप है तो इस गाय को जीवित कर दे। राजा ने साहिब की ओर देखा और उनसे ऐसा करने की प्रार्थना की। राजा की प्रार्थना को मानते हुए साहिब ने गाय को अपनी मधुर आवाज़ में पुकारा। साहिब के मीठे शब्द सुनते ही गाय जीवित हो गयी और उठकर साहिब के चरणों को चाटने लगी। पूरा दरबार यह कौतक देख बहुत हैरान हुआ। सब साहिब की जय-जयकार करने लगे और राजा यह कौतक देख इतना प्रभावित हुआ कि वो सबके सामने साहिब के चरणों में लेट गया। यह देख सब के चेहरे मुरझा गये।

जीवित गाय देख कर सब कोई हुआ हैरान।
शर्मसार हुये पाखण्डी, बड़ी साहिब की शान॥

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2. साहिब जी को जंजीरों से बाँधकर गंगा में डुबोया गया

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#(2) साहिब जी को जंजीरों से बाँधकर गंगा में डुबोया गया

धर्म गुरु ने बादशाह सिकंदर व भक्तजनों की साहिब के प्रति श्रद्धा से दुखी होकर फैसला किया कि वो कबीर का अंत कर देगा। उसके मन में ईर्ष्या की आग पैदा हो रही थी। उसने मौलवियों और काज़ियों द्वारा साहिब पर समाज द्रोही होने का मुकद्दमा करवा दिया और स्वयं धर्मगुरु और राजा का प्रधानमंत्री होने के कारण खुद मुकद्दमा सुना। शेख तकी ने फैसला सुनाया कि कबीर समाजद्रोही है, धर्म के ख़िलाफ़ बात करता है, इसलिए उसे सजाए मौत दी जाए। राजा ने तकी को बहुत समझाया कि कबीर साहिब पर जुल्म मत कर; वो सच्चा फ़कीर है। राजा ने कहा कि तुमने मुझे खुद कहा था कि पीर और फ़कीर अल्लाह के रूप हैं। फिर आज तुम खुद कबीर को मारना चाहते हो।

कहे सिकंदर सुनो मेरे पीर, मृत्यु दण्ड मत देह।
कबीर अल्लाह का नूर है मेरी बात मान लेह॥
हाथ-पाँव, गले बाँध जंजीर, गंगा बीच डुबाया।
राजा परजा सब ही देखें कोई रोक न पाया॥

पीर शेख तकी ने राजा से कहा कि तुम मेरी बात मान लो, नहीं तो मैं तुम्हें शाप दे दूँगा। उसने अपना मुक्ट पृथ्वी पर पटक दिया। राजा डर गया। साहिब ने राजा से कह दिया कि शेख तकी जो करना चाहता है, उसे करने दो। आप मत रोको। बादशाह सिकंदर ने साहिब को मारने की आज्ञा नहीं दी, पर तकी से कह दिया कि आप जो करना चाहे, वो करो। शेख तकी ने सिपाहियों को आज्ञा दी कि कबीर को गंगा नदी के किनारे ले चलो। सिपाही साहिब को पकड़कर वहाँ ले गये। तब शेख तकी ने आज्ञा दी कि नाव पर कबीर को बिठाकर गंगा के बीच ले चलो और वहाँ डूबने के लिए छोड़ दो। चारों ओर पाखण्डियों का शोर मचा हुआ था कि देखो कबीर को जंजीरों से बाँधकर गंगा जी में छोड़ रहे हैं। पर साहिब तो शांत भाव से मुस्करा रहे थे। सैनिक साहिब को गंगा के बीच में डुबोकर चले गए। यह दृश्य पूरी जनता देख रही थी। राजा भी वहाँ पर मौजूद था। यह कौतक देख सब हैरान हो गए कि साहिब गंगा की लहरों में मृगशाला पर बैठे मुस्करा रहे थे। उनके सभी बंधन टूट चुके थे। जंजीरें पुष्पमालाएँ बनकर साहिब के गले में पड़ी दिख रही थीं। भक्त जन यह कौतक देख प्रसन्न होकर साहिब की जय-जयकार करने लगे और पाखण्डियों के चेहरे शर्म से झुक गये।

लहर गंगा की टूटे बंदन, बैठे मृगछाला पै कबीर।
मूर्ख दुनिया समझे जुलाहा, साहिब आया पीरों का पीर॥

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3. साहिब जी को देग़ में डालकर जलाने का प्रयास

20 साहिब बन्दगी

(3) साहिब जी को देग़ में डालकर जलाने का प्रयास

बादशाह सिकंदर ने देखा गंगा जी में साहिब को डुबो कर मारने में शेख तकी असफल रहा तो बादशाह ने शेख तकी को कहा कि कबीर तो फकीर है और फकीर अल्लाह का नूर है। यह सुनते ही शेख तकी को क्रोध आ गया और उसको लगा कि कबीर ने कोई जादू किया है और जल को बाँध दिया जिस कारण वो डूब नहीं सका। अब मैं इसे देग़ में डालकर आँच दिलाऊँगा और कबीर की राख बना दूँगा। ऐसा करने से कबीर बच नहीं सकता। यह सोच उसने एक बड़ी देग़ मंगवाई। उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि कबीर को पकड़कर इस देग़ में डाल दो। सैनिकों ने आदेश का पालन करते हुए कबीर को देग़ में डाल दिया। साहिब ने कोई विरोध नहीं जताया और शांत भाव से देग़ में बैठ गए। फिर शेख तकी ने देग़ का मुँह बंद कर दिया और उसके नीचे आग लगा दी। कुछ देर बाद शेख तकी सोचने लगा कि अब कबीर जलकर मर गया होगा। इतने में बादशाह ने शेख तकी को संदेश भेजा कि तुम किसे देग़ में आँच दिला रहे हो, कबीर साहिब तो मेरे पास राजदबार में बैठे हैं! शेख तकी के दुख का कोई ठिकाना न रहा।

देग़ में डाल कबीर को, नीचे आग लगाई।
पीर बड़ा खुश हुआ, देखे सभी लुकाई॥
ले संदेशा राजा का, सैनिक भागा आई।
कबीर तो मेरे पास है, किसे आँच दिलाई॥

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4. साहिब जी को तलवार से मारवाने का प्रयास

22 साहिब बन्दगी

(4) साहिब जी को तलवार से मरवाने का प्रयास

राज गुरु पीर शेख तकी द्वारा साहिब को दी जा रही यात्नाओं से बादशाह बहुत दुखी था पर राजा का शेख तकी को रोकना कठिन था। क्योंकि वो राजा का धर्मगुरु और वज़ीर भी था। साहिब ने भी बादशाह से यह कह दिया था कि इसे अपनी इच्छा से जो चाहे करने दो, मत रोको। क्रोध से भरा शेख तकी साहिब को देग़ में डालकर न जला सका तो उसकी क्रोधाग्नि चरम सीमा तक पहुँच गयी थी। क्रोध मनुष्य को सब कुछ भुला देता है। उचित-अनुचित का उसे कोई बोद्ध नहीं रहता है। वो अपना आपा भी भूल जाता है। यही हाल तकी का भी हो गया था, क्रोध में आकर उसने अपनी तलवार उठाई और साहिब को मारने चल पढ़ा। उसके साथियों ने उसे रोकने का बड़ा प्रयास किया; कहा कि आपको यह काम शोभा नहीं देता। आप यह काम किसी ओर से करवा लें। पर वो नहीं माना और खुद ही तलवार लेकर साहिब के पास आया और उन पर अँधाधुंध वार करने लगा। शेख तकी यह देख हैरान रह गया कि उसकी तलवार साहिब का कुछ नहीं बिगाड़ पा रही थी। वो साहिब के शरीर पर बिना कोई घाव किये इस तरह आर-पार होती जा रही थी मानो वो वायु में तलवार चला रहा हो। तलवार चलाते-चलाते आख़िर में जब वो थक गया तो लज्जित होकर वहाँ से मुँह नीचा करके चला गया। साहिब का शरीर तो केवल देखने मात्र के लिए था। वास्तव में तो उनका कोई शरीर था ही नहीं वो तो शब्द स्वरूपी थे।

हाथ में ले तलवार, पीर अंधाधुंध चलाये।
हर एक वार तलवार का, आर-पार हो जाये॥
पीर थक कर हार गया, अपना मुख छुपाये।
लज्जित होकर चल दिया, साहिब रहा, मुस्काये॥

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5. साहिब जी को उबलते तेल में स्नान करने को कहा गया

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(5) साहिब जी को उबलते तेल में स्नान करने को कहा गया

सबकी जुबान पर साहिब का नाम था शेख तकी साहिब को जल्दी-से-जल्दी मिटाना चाहता था। राजदरबार लगा था। उसने एक बड़ा कड़ाहा मँगवाया और तेल से भरवा दिया। फिर कड़ाहे को भट्टी पर रखकर नीचे आग लगवा दी। जब तेल उबलने लगा तो तकी ने साहिब को कहा कि यदि आप स्वयं खुदा का नूर हैं तो इस तेल से स्नान करके दिखाएँ। तब मैं मानूँगा कि आप सच में खुदा का ही नूर हैं। साहिब बिना अटके उस उबलते तेल के कड़ाहे में उतर गये और स्नान करने लगे। ऐसा लग रहा था कि मानो वे शीतल जल से स्नान कर रहे हैं। तकी साहिब को जादूगर जानकर कहने लगा कि कबीर ने मंत्र द्वारा आग को बाँध दिया है, जिसके कारण उबलता हुआ तेल भी शीतल जल के समान हो गया है। बादशाह सिकंदर ने यह बात सुनी तो उसने सोचा कि मैं परीक्षण करके देखता हूँ। जब उसने अपनी अंगुली कड़ाहे में डाली तो ऊँगली जल गई। वह ज़ोर से चिल्लाता हुआ ज़मीन पर गिर पड़ा। उसकी अँगुली पर, माँस नहीं रह गया था। राजा को मूर्छित देख साहिब उस कड़ाहे से बाहर निकल आए और राजा की जली हुई अँगुली को अपना स्पर्श दिया। साहिब का स्पर्श पाते ही राजा की ऊँगली पुनः पहले की तरह हो गयी और वे उठ खड़े हुए। दूसरी ओर साहिब के शरीर पर कोई निशान तक नहीं था। यह देख शेख तकी और उसके साथी पाखण्डियों को बड़ा ही दुख हुआ और वे लज्जित होकर चले गये। देखने वाले सब साहिब की जय-जयकार करने लगे। आगे के लिए बादशाह ने साहिब से दिल्ली चलने की प्रार्थना की। साहिब जी ने राजा की प्रार्थना को मान लिया। राजा और उसकी सेना साहिब जी को साथ ले दिल्ली की ओर चल पड़े।

तेल भरे कड़ाहे में, साहिब करे स्नान।
तेल ऊबाले मारदा, सब देखत हुये हैरान॥
राजे समझा तेल है ठण्डा, ऊँगुल डुबोई आन।
माँस ऊपर का जल गया, दुःख से लगा चिल्लान॥

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6. कमाल को जीवित करने के लिए साहिब जी को कहा गया

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(6) कमाल को जीवित करने के लिए साहिब जी को कहा गया

साहिब को लेकर बादशाह दिल्ली की ओर चलने लगे तो बादशाह ने शेख तकी को समझाया कि साहिब की और कसौटी मत लो। पर शेख तकी कहाँ मानने वाला था। जाते-जाते रास्ते में एक जगह इलाहाबाद में त्रिवेणी के तट पर सब रुक गए। सबने वहाँ स्नान किया और भोजन किया। अब साहिब अपने प्रवचनों से सबको आनन्दित करने लगे। उसी समय संयोग से वहाँ गंगा में बहती हुई एक लाश दिखाई दी।

राजा कहे सुन तकी पीरा, छोड़ गुस्सा अभिमान।
कबीर आप रसूल है, मत करो अपमान॥

ईर्ष्या से भरे शेख तकी ने सोचा कि क्यों न अब साहिब को सबके सामने नीचा दिखाऊँ। तकी ने फौरन राजा से कहा कि यदि कबीर सचमुच खुदा है तो वो इस बहते हुए मुर्दे को जीवित कर दे। तब मैं समझूँगा कि कबीर साक्षात खुदा है। साहिब ने बादशाह से कहा कि आपके यहाँ अनेक पीर, मुल्ला, आदि इस सभा में विराजमान हैं। उन्हें आज्ञा दीजिए कि वे कलमा पढ़कर इस मृतक को जीवित कर दें। राजा के कहने पर सब मिलकर कलमा पढ़ने लगे। सभी मृतक को अपनी ओर बुलाने लगे। पर जब उन्हें इसमें सफलता नहीं मिली तो सबका मुँह लज्जा से नीचा हो गया। अंत में राजा ने साहिब से बिनती की कि आप ही इस मृतक को अपनी ओर बुलाकर पुनः जीवित करने की कृपा करें। राजा की बिनती स्वीकार कर साहिब ने हाथ ऊपर उठाकर शव को मानो इशारा किया। शव साहिब का इशारा पाते ही किनारे पर आ गया। सबने शव को देखा। वो अत्यंत ही गला-सड़ा हुआ किसी बच्चे का शव था। साहिब ने शव की ओर देख कहा-‘‘उठ, कुदरत के कमाल से’’। वो शव उसी समय उठकर खड़ा हो गया। उसमें प्राणों का संचार हो गया और वो जीवित हो गया। गंगा नदी से बाहर आकर साहिब के चरणों से लिपट गया। यह देख सब हैरान थे। शेख तकी और उसके साथियों के मन ईर्ष्या से जल उठे। राजा के मुँह से निकला-वाह ! आपने तो कमाल ही कर दिया। साहिब ने कहा कि जाओ, आज से इसका नाम ‘कमाल’ ही होगा।

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7. साहिब जी को मदमस्त हाथी द्वारा मरवाने का प्रयास

28 साहिब बन्दगी

(7) साहिब जी को मदमस्त हाथी द्वारा मरवाने का प्रयास

शेख तकी क्रोध से भरा हुआ साहिब को मारने की योजना पर योजना बना रहा था। शेख तकी ने योजना बनाई कि कबीर को हाथी के पैरों तले कुचलवा देता हूँ। शेख तकी ने महावत से एक विशाल हाथी मंगवाया और महावत को समझा दिया कि हाथी को शराब पिलाकर मदमस्त कर कबीर को कुचलना है। उसने महावत को इस काम के लिए ईनाम का लालच भी दिया। महावत इस काम के लिए तैयार हो गया। उधर साहिब जी को शेख तकी ने सैनिकों द्वारा बँधवा दिया ताकि वे कहीं भाग भी न सकें। फिर महावत को आदेश दिया कि हाथी को कबीर के ऊपर चढ़ाओ और कुचल डालो। जैसे ही महावत हाथी को लेकर कबीर साहिब के पास पहुँचा, हाथी उल्टे पाँव भागने लगा। महावत ने बहुत प्रयास किया, पर हाथी मानता ही नहीं था। वो डरकर भाग खड़ा हुआ। रहस्य यह था कि हाथी को कबीर साहिब के दोनों ओर शेर दिखाई पड़े, जिससे वो डरकर भाग गया। महावत इस रहस्य को समझ नहीं पा रहा था कि हाथी पीछे क्यों भाग रहा है। शेख तकी का साहिब को मारने का यह प्रयास भी विफल हो गया और उसे हार से लज्जित होना पड़ा।

साहिब को मरवाने हेतू, मदमस्त हाथी ले आये।
महावत आगे को करे, वो पीछे हट जाए॥
डर से पीछे हट रहा, महावत रहा घबरायो।
भागा जंगल की तरफ, किसे मिला न आये॥

बावन कसनी ( कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई ) 29

8. साहिब जी को बन्दूक से मरवाया जाना

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(8) साहिब जी को बन्दूक से मरवाया जाना

पीर शेख तकी को उसके साथियों ने सलाह दी कि कबीर को किसी बंदूकधारी से मरवा देना ही ठीक रहेगा। शेख तकी ने उनकी सलाह को मान लिया और अपने सिपाहियों को भेजकर किसी कुशल निशानेबाज को लाने के लिए कहा जिसका निशाना चूके नहीं। सिपाही तकी की आज्ञा का पालन करते हुए एक बंदूकधारी को ले आए, जो बंदूक चलाने में बड़ा ही माहर था, जिसका निशाना बड़ा ही अचूक था। बंदूकधारी को शेख तकी ने समझा दिया कि उसे कबीर पर बंदूक से गोलियों की बौछार करनी है ताकि कबीर का नामोनिशान मिट जाए। उसने बंदूकधारी से कहा कि यदि तुम इस काम में सफल हुए तो तुम्हें मुँह माँगा ईनाम दिया जायेगा। बंदूकधारी मान गया। मौका आने पर शेख तकी का इशारा पाते ही बंदूकधारी ने साहिब पर उसी समय अंधा-धुंध गोलियों की बौछार शुरू कर दी, जब साहिब प्रवचन कर रहे थे। पर बंदूकधारी की गोलियाँ साहिब के चरणों का स्पर्श पाकर बंदूकधारी के पास वापिस आ रही थीं। यह देख बंदूकधारी बहुत लज्जित हुआ और वहाँ से भाग खड़ा हुआ। पूरी संगत साहिब की जय-जयकार करने लगी।

सत्संग करते साहिब पर हुई गोलियों की बौछार।
गोली चरण स्पर्श कर, वापस हुई बारम्बार॥