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बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)

Bawan Kasni

सद्गुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sant Ashram Ranjari 2015 Edition · Sant Ashram Ranjari, Samba (J&K)

Devanagarihipublished122 पृष्ठ

बावन कसनी ( कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई ) 17

2. साहिब जी को जंजीरों से बाँधकर गंगा में डुबोया गया

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#(2) साहिब जी को जंजीरों से बाँधकर गंगा में डुबोया गया

धर्म गुरु ने बादशाह सिकंदर व भक्तजनों की साहिब के प्रति श्रद्धा से दुखी होकर फैसला किया कि वो कबीर का अंत कर देगा। उसके मन में ईर्ष्या की आग पैदा हो रही थी। उसने मौलवियों और काज़ियों द्वारा साहिब पर समाज द्रोही होने का मुकद्दमा करवा दिया और स्वयं धर्मगुरु और राजा का प्रधानमंत्री होने के कारण खुद मुकद्दमा सुना। शेख तकी ने फैसला सुनाया कि कबीर समाजद्रोही है, धर्म के ख़िलाफ़ बात करता है, इसलिए उसे सजाए मौत दी जाए। राजा ने तकी को बहुत समझाया कि कबीर साहिब पर जुल्म मत कर; वो सच्चा फ़कीर है। राजा ने कहा कि तुमने मुझे खुद कहा था कि पीर और फ़कीर अल्लाह के रूप हैं। फिर आज तुम खुद कबीर को मारना चाहते हो।

कहे सिकंदर सुनो मेरे पीर, मृत्यु दण्ड मत देह।
कबीर अल्लाह का नूर है मेरी बात मान लेह॥
हाथ-पाँव, गले बाँध जंजीर, गंगा बीच डुबाया।
राजा परजा सब ही देखें कोई रोक न पाया॥

पीर शेख तकी ने राजा से कहा कि तुम मेरी बात मान लो, नहीं तो मैं तुम्हें शाप दे दूँगा। उसने अपना मुक्ट पृथ्वी पर पटक दिया। राजा डर गया। साहिब ने राजा से कह दिया कि शेख तकी जो करना चाहता है, उसे करने दो। आप मत रोको। बादशाह सिकंदर ने साहिब को मारने की आज्ञा नहीं दी, पर तकी से कह दिया कि आप जो करना चाहे, वो करो। शेख तकी ने सिपाहियों को आज्ञा दी कि कबीर को गंगा नदी के किनारे ले चलो। सिपाही साहिब को पकड़कर वहाँ ले गये। तब शेख तकी ने आज्ञा दी कि नाव पर कबीर को बिठाकर गंगा के बीच ले चलो और वहाँ डूबने के लिए छोड़ दो। चारों ओर पाखण्डियों का शोर मचा हुआ था कि देखो कबीर को जंजीरों से बाँधकर गंगा जी में छोड़ रहे हैं। पर साहिब तो शांत भाव से मुस्करा रहे थे। सैनिक साहिब को गंगा के बीच में डुबोकर चले गए। यह दृश्य पूरी जनता देख रही थी। राजा भी वहाँ पर मौजूद था। यह कौतक देख सब हैरान हो गए कि साहिब गंगा की लहरों में मृगशाला पर बैठे मुस्करा रहे थे। उनके सभी बंधन टूट चुके थे। जंजीरें पुष्पमालाएँ बनकर साहिब के गले में पड़ी दिख रही थीं। भक्त जन यह कौतक देख प्रसन्न होकर साहिब की जय-जयकार करने लगे और पाखण्डियों के चेहरे शर्म से झुक गये।

लहर गंगा की टूटे बंदन, बैठे मृगछाला पै कबीर।
मूर्ख दुनिया समझे जुलाहा, साहिब आया पीरों का पीर॥

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3. साहिब जी को देग़ में डालकर जलाने का प्रयास

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(3) साहिब जी को देग़ में डालकर जलाने का प्रयास

बादशाह सिकंदर ने देखा गंगा जी में साहिब को डुबो कर मारने में शेख तकी असफल रहा तो बादशाह ने शेख तकी को कहा कि कबीर तो फकीर है और फकीर अल्लाह का नूर है। यह सुनते ही शेख तकी को क्रोध आ गया और उसको लगा कि कबीर ने कोई जादू किया है और जल को बाँध दिया जिस कारण वो डूब नहीं सका। अब मैं इसे देग़ में डालकर आँच दिलाऊँगा और कबीर की राख बना दूँगा। ऐसा करने से कबीर बच नहीं सकता। यह सोच उसने एक बड़ी देग़ मंगवाई। उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि कबीर को पकड़कर इस देग़ में डाल दो। सैनिकों ने आदेश का पालन करते हुए कबीर को देग़ में डाल दिया। साहिब ने कोई विरोध नहीं जताया और शांत भाव से देग़ में बैठ गए। फिर शेख तकी ने देग़ का मुँह बंद कर दिया और उसके नीचे आग लगा दी। कुछ देर बाद शेख तकी सोचने लगा कि अब कबीर जलकर मर गया होगा। इतने में बादशाह ने शेख तकी को संदेश भेजा कि तुम किसे देग़ में आँच दिला रहे हो, कबीर साहिब तो मेरे पास राजदबार में बैठे हैं! शेख तकी के दुख का कोई ठिकाना न रहा।

देग़ में डाल कबीर को, नीचे आग लगाई।
पीर बड़ा खुश हुआ, देखे सभी लुकाई॥
ले संदेशा राजा का, सैनिक भागा आई।
कबीर तो मेरे पास है, किसे आँच दिलाई॥

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4. साहिब जी को तलवार से मारवाने का प्रयास

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(4) साहिब जी को तलवार से मरवाने का प्रयास

राज गुरु पीर शेख तकी द्वारा साहिब को दी जा रही यात्नाओं से बादशाह बहुत दुखी था पर राजा का शेख तकी को रोकना कठिन था। क्योंकि वो राजा का धर्मगुरु और वज़ीर भी था। साहिब ने भी बादशाह से यह कह दिया था कि इसे अपनी इच्छा से जो चाहे करने दो, मत रोको। क्रोध से भरा शेख तकी साहिब को देग़ में डालकर न जला सका तो उसकी क्रोधाग्नि चरम सीमा तक पहुँच गयी थी। क्रोध मनुष्य को सब कुछ भुला देता है। उचित-अनुचित का उसे कोई बोद्ध नहीं रहता है। वो अपना आपा भी भूल जाता है। यही हाल तकी का भी हो गया था, क्रोध में आकर उसने अपनी तलवार उठाई और साहिब को मारने चल पढ़ा। उसके साथियों ने उसे रोकने का बड़ा प्रयास किया; कहा कि आपको यह काम शोभा नहीं देता। आप यह काम किसी ओर से करवा लें। पर वो नहीं माना और खुद ही तलवार लेकर साहिब के पास आया और उन पर अँधाधुंध वार करने लगा। शेख तकी यह देख हैरान रह गया कि उसकी तलवार साहिब का कुछ नहीं बिगाड़ पा रही थी। वो साहिब के शरीर पर बिना कोई घाव किये इस तरह आर-पार होती जा रही थी मानो वो वायु में तलवार चला रहा हो। तलवार चलाते-चलाते आख़िर में जब वो थक गया तो लज्जित होकर वहाँ से मुँह नीचा करके चला गया। साहिब का शरीर तो केवल देखने मात्र के लिए था। वास्तव में तो उनका कोई शरीर था ही नहीं वो तो शब्द स्वरूपी थे।

हाथ में ले तलवार, पीर अंधाधुंध चलाये।
हर एक वार तलवार का, आर-पार हो जाये॥
पीर थक कर हार गया, अपना मुख छुपाये।
लज्जित होकर चल दिया, साहिब रहा, मुस्काये॥

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5. साहिब जी को उबलते तेल में स्नान करने को कहा गया

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(5) साहिब जी को उबलते तेल में स्नान करने को कहा गया

सबकी जुबान पर साहिब का नाम था शेख तकी साहिब को जल्दी-से-जल्दी मिटाना चाहता था। राजदरबार लगा था। उसने एक बड़ा कड़ाहा मँगवाया और तेल से भरवा दिया। फिर कड़ाहे को भट्टी पर रखकर नीचे आग लगवा दी। जब तेल उबलने लगा तो तकी ने साहिब को कहा कि यदि आप स्वयं खुदा का नूर हैं तो इस तेल से स्नान करके दिखाएँ। तब मैं मानूँगा कि आप सच में खुदा का ही नूर हैं। साहिब बिना अटके उस उबलते तेल के कड़ाहे में उतर गये और स्नान करने लगे। ऐसा लग रहा था कि मानो वे शीतल जल से स्नान कर रहे हैं। तकी साहिब को जादूगर जानकर कहने लगा कि कबीर ने मंत्र द्वारा आग को बाँध दिया है, जिसके कारण उबलता हुआ तेल भी शीतल जल के समान हो गया है। बादशाह सिकंदर ने यह बात सुनी तो उसने सोचा कि मैं परीक्षण करके देखता हूँ। जब उसने अपनी अंगुली कड़ाहे में डाली तो ऊँगली जल गई। वह ज़ोर से चिल्लाता हुआ ज़मीन पर गिर पड़ा। उसकी अँगुली पर, माँस नहीं रह गया था। राजा को मूर्छित देख साहिब उस कड़ाहे से बाहर निकल आए और राजा की जली हुई अँगुली को अपना स्पर्श दिया। साहिब का स्पर्श पाते ही राजा की ऊँगली पुनः पहले की तरह हो गयी और वे उठ खड़े हुए। दूसरी ओर साहिब के शरीर पर कोई निशान तक नहीं था। यह देख शेख तकी और उसके साथी पाखण्डियों को बड़ा ही दुख हुआ और वे लज्जित होकर चले गये। देखने वाले सब साहिब की जय-जयकार करने लगे। आगे के लिए बादशाह ने साहिब से दिल्ली चलने की प्रार्थना की। साहिब जी ने राजा की प्रार्थना को मान लिया। राजा और उसकी सेना साहिब जी को साथ ले दिल्ली की ओर चल पड़े।

तेल भरे कड़ाहे में, साहिब करे स्नान।
तेल ऊबाले मारदा, सब देखत हुये हैरान॥
राजे समझा तेल है ठण्डा, ऊँगुल डुबोई आन।
माँस ऊपर का जल गया, दुःख से लगा चिल्लान॥

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6. कमाल को जीवित करने के लिए साहिब जी को कहा गया

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(6) कमाल को जीवित करने के लिए साहिब जी को कहा गया

साहिब को लेकर बादशाह दिल्ली की ओर चलने लगे तो बादशाह ने शेख तकी को समझाया कि साहिब की और कसौटी मत लो। पर शेख तकी कहाँ मानने वाला था। जाते-जाते रास्ते में एक जगह इलाहाबाद में त्रिवेणी के तट पर सब रुक गए। सबने वहाँ स्नान किया और भोजन किया। अब साहिब अपने प्रवचनों से सबको आनन्दित करने लगे। उसी समय संयोग से वहाँ गंगा में बहती हुई एक लाश दिखाई दी।

राजा कहे सुन तकी पीरा, छोड़ गुस्सा अभिमान।
कबीर आप रसूल है, मत करो अपमान॥

ईर्ष्या से भरे शेख तकी ने सोचा कि क्यों न अब साहिब को सबके सामने नीचा दिखाऊँ। तकी ने फौरन राजा से कहा कि यदि कबीर सचमुच खुदा है तो वो इस बहते हुए मुर्दे को जीवित कर दे। तब मैं समझूँगा कि कबीर साक्षात खुदा है। साहिब ने बादशाह से कहा कि आपके यहाँ अनेक पीर, मुल्ला, आदि इस सभा में विराजमान हैं। उन्हें आज्ञा दीजिए कि वे कलमा पढ़कर इस मृतक को जीवित कर दें। राजा के कहने पर सब मिलकर कलमा पढ़ने लगे। सभी मृतक को अपनी ओर बुलाने लगे। पर जब उन्हें इसमें सफलता नहीं मिली तो सबका मुँह लज्जा से नीचा हो गया। अंत में राजा ने साहिब से बिनती की कि आप ही इस मृतक को अपनी ओर बुलाकर पुनः जीवित करने की कृपा करें। राजा की बिनती स्वीकार कर साहिब ने हाथ ऊपर उठाकर शव को मानो इशारा किया। शव साहिब का इशारा पाते ही किनारे पर आ गया। सबने शव को देखा। वो अत्यंत ही गला-सड़ा हुआ किसी बच्चे का शव था। साहिब ने शव की ओर देख कहा-‘‘उठ, कुदरत के कमाल से’’। वो शव उसी समय उठकर खड़ा हो गया। उसमें प्राणों का संचार हो गया और वो जीवित हो गया। गंगा नदी से बाहर आकर साहिब के चरणों से लिपट गया। यह देख सब हैरान थे। शेख तकी और उसके साथियों के मन ईर्ष्या से जल उठे। राजा के मुँह से निकला-वाह ! आपने तो कमाल ही कर दिया। साहिब ने कहा कि जाओ, आज से इसका नाम ‘कमाल’ ही होगा।

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7. साहिब जी को मदमस्त हाथी द्वारा मरवाने का प्रयास

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(7) साहिब जी को मदमस्त हाथी द्वारा मरवाने का प्रयास

शेख तकी क्रोध से भरा हुआ साहिब को मारने की योजना पर योजना बना रहा था। शेख तकी ने योजना बनाई कि कबीर को हाथी के पैरों तले कुचलवा देता हूँ। शेख तकी ने महावत से एक विशाल हाथी मंगवाया और महावत को समझा दिया कि हाथी को शराब पिलाकर मदमस्त कर कबीर को कुचलना है। उसने महावत को इस काम के लिए ईनाम का लालच भी दिया। महावत इस काम के लिए तैयार हो गया। उधर साहिब जी को शेख तकी ने सैनिकों द्वारा बँधवा दिया ताकि वे कहीं भाग भी न सकें। फिर महावत को आदेश दिया कि हाथी को कबीर के ऊपर चढ़ाओ और कुचल डालो। जैसे ही महावत हाथी को लेकर कबीर साहिब के पास पहुँचा, हाथी उल्टे पाँव भागने लगा। महावत ने बहुत प्रयास किया, पर हाथी मानता ही नहीं था। वो डरकर भाग खड़ा हुआ। रहस्य यह था कि हाथी को कबीर साहिब के दोनों ओर शेर दिखाई पड़े, जिससे वो डरकर भाग गया। महावत इस रहस्य को समझ नहीं पा रहा था कि हाथी पीछे क्यों भाग रहा है। शेख तकी का साहिब को मारने का यह प्रयास भी विफल हो गया और उसे हार से लज्जित होना पड़ा।

साहिब को मरवाने हेतू, मदमस्त हाथी ले आये।
महावत आगे को करे, वो पीछे हट जाए॥
डर से पीछे हट रहा, महावत रहा घबरायो।
भागा जंगल की तरफ, किसे मिला न आये॥

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8. साहिब जी को बन्दूक से मरवाया जाना

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(8) साहिब जी को बन्दूक से मरवाया जाना

पीर शेख तकी को उसके साथियों ने सलाह दी कि कबीर को किसी बंदूकधारी से मरवा देना ही ठीक रहेगा। शेख तकी ने उनकी सलाह को मान लिया और अपने सिपाहियों को भेजकर किसी कुशल निशानेबाज को लाने के लिए कहा जिसका निशाना चूके नहीं। सिपाही तकी की आज्ञा का पालन करते हुए एक बंदूकधारी को ले आए, जो बंदूक चलाने में बड़ा ही माहर था, जिसका निशाना बड़ा ही अचूक था। बंदूकधारी को शेख तकी ने समझा दिया कि उसे कबीर पर बंदूक से गोलियों की बौछार करनी है ताकि कबीर का नामोनिशान मिट जाए। उसने बंदूकधारी से कहा कि यदि तुम इस काम में सफल हुए तो तुम्हें मुँह माँगा ईनाम दिया जायेगा। बंदूकधारी मान गया। मौका आने पर शेख तकी का इशारा पाते ही बंदूकधारी ने साहिब पर उसी समय अंधा-धुंध गोलियों की बौछार शुरू कर दी, जब साहिब प्रवचन कर रहे थे। पर बंदूकधारी की गोलियाँ साहिब के चरणों का स्पर्श पाकर बंदूकधारी के पास वापिस आ रही थीं। यह देख बंदूकधारी बहुत लज्जित हुआ और वहाँ से भाग खड़ा हुआ। पूरी संगत साहिब की जय-जयकार करने लगी।

सत्संग करते साहिब पर हुई गोलियों की बौछार।
गोली चरण स्पर्श कर, वापस हुई बारम्बार॥

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9. सोते हुए साहिब जी को तलवारों से मरवाया जाना

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(9) सोते हुए साहिब जी को तलवारों से मरवाया जाना

शेख तकी और उनके साथियों में क्रोध की आग दिनों-दिन बढ़ती जा रही थी। उसकी कोई भी तरकीब कामयाब नहीं हो रही थी। उसने सोचा कि शायद कबीर कोई जादू जानता है, इसलिए मेरी कोई भी तरकीब कामयाब नहीं हो रही है। तो उसने अब की बार एक नयी तरकीब साहिब को रास्ते से हटाने की बनाई और सोचा कि मैं कबीर को सोते हुए ही मरवा दूँ ताकि उसे कोई जादू करने का मौका भी न मिल सके। यह सोच उसने उसी रात अपने जल्लादों को बुलवाकर हुक्म दिया कि कबीर को सुप्त अवस्था में क़त्ल करना है। उसके शरीर के इतने टुकड़े करो कि कोई भी जादू उसे बचा न सके। जल्लाद उस स्थान पर पहुँचे जहाँ साहिब सो रहे थे। जल्लादों ने मिलकर साहिब के गले पर अपनी तलवारों से बहुत प्रहार किये, पर साहिब का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाए। वो नहीं जानते थे कि साहिब का तो शरीर ही नहीं है; शरीर तो केवल संसार के लोगों के देखने मात्र के लिए ही धारण किया है। तलवार चलाते-चलाते जल्लादों ने सोचा कि साहिब को तलवार से काटना तो हवा को काटना ही है, इसलिये जल्लाद लज्जित होकर वापस चले गए।

सोय पड़े कबीर पर, जल्लादों चलाई तलवार।
शब्द स्वरूपी देही पर, पड़ा न कोई घाव॥
साहिब पुरुष कबीर ने, देह धरी न कोय।
घट घट में जो रम रहा, शब्द स्वरूपी सोय॥

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10. साहिब जी को कुँए में डालकर मरवाया जाना

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#(10) साहिब जी को कुँए में डालकर मरवाया जाना

साहिब को साथ ले, बादशाह सिकंदर अपने सैनिकों के साथ दिल्ली वापिस आ गये। ऐसे में धर्म गुरु पीर शेख तकी की ईर्ष्या भी बहुत बढ़ गयी थी। उसने फिर साहिब को मारने के लिए खाली कुँए में साहिब को दबा देने का षड्यंत्र रचा। शेख तकी ने साहिब को एक कुँए के पास ले जाकर कहा कि आप इस कुँए में प्रवेश करें, हम आपकी प्रभुताई देखना चाहते हैं। साहिब ने उसकी बात को स्वीकार करते हुए कुँए में बिना किसी झिझक के प्रवेश कर लिया। शेख तकी ने अपने षड्यंत्र अनुसार मजदूरों को तुरंत पत्थर, मिट्टी आदि के द्वारा कुँआ भर देने का हुकम दिया। देखते-ही-देखते कुँआ पूरा मिट्टी से भर गया। अब शेख तकी की खुशी का कोई ठिकाना न रहा। वो सोचने लगा कि अब साहिब से सदा के लिए छुटकारा मिल गया। इतने में बादशाह का एक सिपाही राजदरबार से वहाँ आया और शेख तकी को सूचना दी कि साहिब तो बादशाह के पास बैठे हैं और जनता को सत्य भक्ति का उपदेश दे रहे हैं। यह सुनकर शेख तकी को विश्वास नहीं हुआ और वो वहाँ पर देखने आ गया। साहिब को राजा के साथ देख शेख तकी शर्मिंदा होकर वहाँ से चला गया और साहिब को मारने का नया षड्यंत्र रचने लगा।

धर्म गुरु की इच्छा पर, कुँए में उतरे कबीर।
मिट्टी से कुँआ भर दिया, खुश हुआ तकी वजीर॥
राजे संदेशा भेजिया, मेरे पास फकीर कबीर॥

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11. साहिब जी को मुगदर द्वारा मरवाया जाना

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#(11) साहिब जी को मुगदर द्वारा मरवाया जाना

दिनों-दिन साहिब की बढ़ती हुई उपमा से परेशान क्रोध की आग में जलते हुए शेख तकी अपने साथी पंडित, मुल्लाओं सहित कहीं जा रहा था तो रास्ते में पहलवानों का अखाड़ा दिखाई दिया। वहाँ पर उसने बड़े-बड़े पहलवानों को भारी-भारी मुगदर घुमाते देखा। उसने विचार किया कि क्यों न कबीर को इन पहलवानों के मुगदरों से मरवाया जाए। यह सोचते-सोचते शेख तकी ने अपने बाकी साथियों से भी परामर्श किया। सबने इस युक्ति की सराहना की। अपने सिपाहियों को भेज तकी ने उस अखाड़े से दो बड़े पहलवानों को बुलवाया। जब वे शेख तकी के पास पहुँचे तो शेख तकी ने उन्हें उनका काम समझाया कि कैसे साहिब को जान से मारना है। पहलवानों को मुँह माँगा ईमान देने की बात भी कही। पहलवानों ने भी उसकी बात को मंजूर कर लिया। उचित समय पाकर तकी उन पहलवानों के साथ उस स्थान पर पहुँचा, जहाँ साहिब विराजमान होकर संगत को सत्य भक्ति का संदेश दे रहे थे। शेख तकी का हुक्म पाकर पहलवानों ने मुगदरों से साहिब पर प्रहार करने शुरू कर दिये। पर साहिब पर तो मानों फूलों की बारिश हो रही थी। आख़िर पहलवान प्रहार करते-करते थक गये और हार मानकर वहाँ से भाग गये। यह देख शेख तकी मन-ही-मन बहुत लज्जित हुआ। चारों ओर साहिब की जय-जयकार के जैकारे गूँजने लगे।

सत्संग देते साहिब पर, मुगदर से किये वार।
मुगदर चलाते पहलवां, थक कर गए हार॥
कुछ न बिगड़ा साहिब का, सब करते जय-जयकार॥