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भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ
६१४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. २ पा. १ सू. ३५

कर्मणा भवति पापः पापेन' (बृ० ३।२।१३) इति च। स्मृतिरपि प्राणिकर्मविशेषापेक्षमेवेश्वरस्यानुग्रहीतृत्वं निग्रहीतृत्वं च दर्शयति—'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्' (भ० गी० ४।११) इत्येवंजातीयका ॥ ३४ ॥

न कर्माविभागादिति चेन्नानादित्वात् ॥ ३५ ॥

भामती सृजति इति श्रुतेरवगम्यते। तस्मान्न सृजतीति विरुद्धमभिधीयते। न च वैषम्यमात्रमत्र ब्रूमो न त्वीश्वरकारणत्वं व्यासेधाम इति वक्तव्यं किमतो यद्येवं, तस्मादीश्वरस्य सवासनक्लेशापरामर्शमभिवदन्तीनां भूयसीनां श्रुतीनामनुग्रहायोन्निनीषतेऽधो निनीषत इत्येतदपि तज्जातीयपूर्वककर्माभ्यासवशात् प्राणिन इत्येवं नेयम्, यथाहुः—

जन्मजन्मयदभ्यस्तं दानमध्ययनं तपः।
तेनैवाभ्यासयोगेन तच्चैवाभ्यसते नरः॥

इत्यभ्युपेत्य च सृष्टेस्तात्त्विकत्वमिदमुक्तमनिर्व्वाच्या तु सृष्टिरिति न प्रसक्तवैषम्यमत्रापि तथा च मायाकारस्येवाङ्गसाकल्यवैकल्यभेदेन विचित्रान् प्राणिनो दर्शयतो न वैषम्यदोषः, सहसा संहरतो वा न नैर्घृण्यमेवमस्यापि भगवतो विविधविचित्रप्रपञ्चमनिर्व्वाच्यं विश्वं दर्शयतः संहरतश्च स्वभावाद्वा लीलया वा न कश्चित् दोषः ॥ ३४ ॥

इति स्थिते शङ्कापरिहारपरं सूत्रम्—न कर्माविभागादिति चेन्नानादित्वात् शङ्कोत्तरे अतिरोहि-

भामती-व्याख्या लिए 'कर्म कारयित्वा सृजति'—ऐसा कहा है, अर्थात् प्राणियों के अदृष्टों का अनादि प्रवाह माना जाता है, ईश्वर जीवों से उनके पूर्व-पूर्व अदृष्ट के अनुसार ही शुभ या अशुभ कर्म कराता है, अपने-आप किसी से कुछ नहीं कराता। जीवों के शुभाशुभ कर्मों से जनित अदृष्टों के अनुरूप ही ईश्वर सृष्टि और प्रलय करता है, फिर वह दोषी क्यों होगा? यदि कहा जाय कि जगत् में ईश्वरकारणकत्व का निषेध नहीं किया जाता, केवल वैषम्य की सिद्धि की जाती है। तब प्रश्न उठता है कि इससे क्या होगा? ईश्वर सर्वथा अविद्यादि क्लेश और उनकी वासनाओं (संस्कारों) से रहित है, जैसा कि महर्षि पतञ्जलि कहते हैं—"क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः" (यो. सू. १।२४)। इस प्रकार के रागादि-रहित ईश्वर की प्रतिपादिका अनन्त श्रुतियों के अनुरोध पर यह मानना होगा कि ईश्वर में कतिपय प्राणियों की जो उन्निनीषा या अधोनिनीषा उत्पन्न होती है, वह उन प्राणियों के ही पूर्वकर्म की प्रेरणा से ही होती है, स्वतः नहीं जैसा कि कहा गया है—

जन्मजन्मयदभ्यस्तं दानमध्ययनं तपः।
तेनैवाभ्यासयोगेन तच्चैवाभ्यसते नरः॥

अर्थात् जीव ने जो अपने पूर्व जन्म में दान, अध्ययन और तप किया है, उसी के संस्कारों का पाथेय लेकर वह इस जन्म में आया है, अतः वैसा ही अभ्यास (पुनरावर्तन) करता रहता है। ईश्वर तो केवल प्राणियों के सामूहिक अदृष्टों के आधार जगत् का सर्जन कर देता है, उसकी विषमता में तो कर्मों के संस्कार ही प्रयोजक होते हैं। यह समाधान तो सृष्टि को तात्त्विक मान कर किया गया है। वस्तुतः सृष्टि मायामयी अनिर्वचनीया है, अतः मायाकार (जादूगर) के समान सकल (सर्वाङ्ग पूर्ण) और विकल (अपूर्ण) प्राणियों की रचना करने पर भी ईश्वर में न तो किसी प्रकार की विषमता सिद्ध होती है और न समग्र प्राणियों का संहार कर देने पर नैर्घृण्य (निष्ठुरत्व) ॥ ३४ ॥

पूर्व सूत्र में "कर्मजं लोकवैचित्र्यम्" (अभि. को. ४।१) की जो स्थापना की गई, उस

अनादिः संसारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ६१५

'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' (छा० ६।२।१) इति प्राक्सृष्टेर्- विभागावधारणान्नास्ति कर्म, यदपेक्ष्य विषमा सृष्टिः स्यात् । सृष्ट्युत्तरकालं हि शरीरादिविभागापेक्षं कर्म, कर्मापेक्षश्च शरीरादिविभाग इतीतरेतराश्रयत्वं प्रसज्येत । अतो विभागादूर्ध्वं कर्मापेक्ष ईश्वरः प्रवर्त्ततां नाम । प्राग्विभागाद्वैचित्र्यनिमित्तस्य कर्मणोऽभावात्तुल्यैवाद्या सृष्टिः प्राप्नोतीति चेत्, नैष दोषः, अनादित्वात्संसारस्य । भवेदेव दोषो यद्यादिमान् संसारः स्यात् । अनादौ तु संसारे बीजाङ्कुरवद्धेतुहेतुमद्भावेन कर्मणः सर्गवैषम्यस्य च प्रवृत्तिर्न विरुध्यते ॥ ३५ ॥ कथं पुनरवगम्यतेऽनादिरेष संसार इति ? अत उत्तरं पठति - उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च ॥ ३६ ॥ उपपद्यते च संसारस्यानादित्वम् । आदिमत्त्वे हि संसारस्याकस्मादुद्भूतेर्मुक्ता- नामपि पुनः संसारोद्भूतिप्रसङ्गः, अकृताभ्यागमप्रसङ्गश्च, सुखदुःखादिवैषम्यस्य निर्निमित्तत्वात् । न चेश्वरो वैषम्यहेतुरित्युक्तम् । न चाविद्या केवला वैषम्यस्य कार-

भामती

तार्थेन भाष्यग्रन्थेन व्याख्याते ॥ ३५ ॥ अनादित्वादिति सिद्धवदुक्तं तत्साधनार्थं सूत्रम् - "उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च" ॥ ३६ ॥ अकृते कर्माणि पुण्ये पापे वा तत्फलं भोक्तारमध्यागच्छेत् तथा च विधिनिषेधशास्त्रमनर्थकं भवेत् प्रवृत्तिनिवृत्त्यभावादिति मोक्षशास्त्रस्य चोक्तमानर्थक्यम् । न चाविद्या केवलेति लयाभिप्रायम् । विक्षेप- लक्षणाविद्यासंस्कारस्तु कार्यत्वात् स्वोत्पत्तौ पूर्वं विक्षेपमपेक्षते, विक्षेपश्च मिथ्याप्रत्ययो मोहापरनामा

भामती-व्याख्या

पर शङ्का उठाई गई कि द्वितीयादि सृष्टियों में पूर्व कर्म-जन्यत्व सम्भव होने पर भी प्रथम सृष्टि में कर्म-प्रयुक्तत्व क्योंकर सम्भावित होगा ? क्योंकि "सदेव सोम्येदमग्र आसीत्" (छा० ६।२।१) यह श्रुति प्रथम सृष्टि से पूर्व कर्त्ता, कर्म और करणादि-विभाग का निषेध करती है। इस शङ्का का समाधान है - "अनादित्वात्" । अर्थात् संसार अनादि है, इसकी कभी आदि (प्रथम) सृष्टि मानी ही नहीं जाती, अतः पूर्व-पूर्व कर्मों के आधार पर उत्तरोत्तर सृष्टि का उच्चावचभाव सम्पन्न हो जाता है ॥ ३५ ॥ 'अनादित्व' हेतु को सिद्ध समझ कर उद्धृत कर दिया गया, वस्तुतः वह सिद्ध नहीं किया गया, अतः उसकी सिद्धि करने के लिए कहा गया है - "उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च"। यदि संसार को अनादि न मानकर आदिमान् माना जाता है, तब प्रथम सृष्टि के पहले पुण्य- पापादि रूप कर्मों के न रहने पर इस जन्म में जीव को सुख-दुःखादि रूप फल का लाभ जो मिलता है, वह अकृताभ्यागम (कर्म किए बिना ही फल की प्राप्ति) है। कर्म किए बिना ही जब उनका फल मिल जाता है, तब विधि-निषेधात्मक शास्त्र निरर्थक और अप्रमाण हो जाते हैं, क्योंकि शास्त्रों के द्वारा न किसी की प्रवृत्ति होती है और न निवृत्ति । केवल विधि-निषेधा- त्मक कर्मकाण्ड का ही आनर्थक्य नहीं होता, अपि तु मोक्ष-शास्त्र (वेदान्त-शास्त्र) भी व्यर्थ हो जाता है, क्योंकि कर्मों के बिना ही यदि संसार होता है, तब मुक्त पुरुषों को भी संसरण (जन्म-मरणादिरूप बन्धन) प्राप्त हो जायगा, यही भाष्यकार ने कहा है - "मुक्तानामपि संसारोद्भूतिप्रसङ्गः" । भाष्यकार ने जो कहा है - "न चाविद्या केवला वैषम्यस्य कारणम्।" वह प्रलय-प्रयोजिका अविद्या को ध्यान में रखकर कहा है, क्योंकि विक्षेप (सृष्टि) की प्रयो- जिका अविद्या कार्य (जन्य) होने के कारण अपनी उत्पत्ति में नियमतः अपने पूर्व संसाररूप विक्षेप की अपेक्षा करती हैं। विक्षेप नाम है-मिथ्या ज्ञान का, जिसकी दूसरी संज्ञा है-

६१६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. २ पा. १ सू. ३६

णम्, एकरूपत्वात् । रागादिक्लेशवासनाक्षिप्तकर्मापेक्षा त्वविद्या वैषम्यकरी स्यात् । न च कर्मान्तरेण शरीरं सम्भवति, न च शरीरमन्तरेण कर्म सम्भवतीतीतरेतराश्रय-त्वप्रसङ्गः । अनादित्वे तु बीजाङ्कुरन्यायेनोपपत्तेर्न कश्चिद्दोषो भवति । उपलभ्यते च संसारस्यानादित्वं श्रुतिस्मृत्योः । श्रुतौ तावत् 'अनेन जीवेनाऽऽत्मना' ( छा० ६।३।२ ) इति सर्गप्रमुखे शारीरमात्मानं जीवशब्देन प्राणधारणनिमित्तेनाभिलपन्नादिः संसार इति दर्शयति । आदिमत्त्वे तु प्रागनवधारितप्राणः सन् कथं प्राणधारणनिमित्तेन जीवशब्देन सर्गप्रमुखेऽभिलप्येत ? न च धारयिष्यतीत्यतोऽभिलप्येत; अनागताद्धि सम्बन्धादतीतः सम्बन्धो बलवान् भवति, अभिनिष्पन्नत्वात् । 'सूर्याचन्द्रमसौ धाता


भामती

पुण्यापुण्यप्रवृत्तिहेतुभूतरागद्वेषनिदानं, स च रागादिभिः सहितः स्वकार्ये शरीरं सुखदुःखभोगायतन-मन्तरेण सम्भवति । न च रागद्वेषावन्तरेण कर्म, न च भोगसहितं मोहमन्तरेण रागद्वेषौ, न च पूर्वं-शरीरमन्तरेण मोहादिरिति पूर्वपूर्वशरीरापेक्षो मोहादिरेवं पूर्वपूर्वमोहाद्यपेक्षं पूर्वपूर्वशरीरमित्यनादितेवात्र भगवती चित्तमनाकुलयन्ति । तदेतदाह ॐ रागादिक्लेशवासनाक्षिप्तकर्मापेक्षा त्वविद्या वैषम्यकरी स्याद् इति ॐ । रागद्वेषमोहा रागादयस्त एव हि पुरुषं संसारदुःखमनुभाव्य क्लेशयन्तीति क्लेशास्तेषां वासनाः कर्मप्रवृत्त्यनुगुणास्ताभिराक्षिप्तानि प्रवर्त्तितानि कर्माणि तदपेक्षा लयलक्षणाऽविद्या । स्यादेतत्—भविष्यताऽपि व्यपदेशो दृष्टो यथा पुरोडाशकपालेन तुषानुपवपतीत्यत आह ॐ न च धारयिष्यतीत्यतः इति ॐ । तदेव-


भामती-व्याख्या

मोह । मोह सदैव पुण्य-पापरूप प्रवृत्ति के हेतुभूत राग और द्वेष का कारण होता है । रागादि कार्यों से युक्त मोह सुख-दुःखरूप भोग के आयतनभूत शरीर के बिना नहीं हो सकता । राग-द्वेष के बिना पुण्य-पापात्मक कर्म, कर्मों ( अदृष्टों ) के बिना शरीर, राग-द्वेष और पूर्व शरीर के बिना मोहादि उत्पन्न नहीं हो सकते, अतः पूर्व-पूर्व शरीर की अपेक्षा उत्तरोत्तर मोहादि एवं पूर्व-पूर्व मोह की अपेक्षा उत्तरोत्तर शरीर का लाभ—इस प्रकार बौद्ध सम्मत अविद्यादि बारह पदार्थों के समान अनादि भाव-परम्परा का अनुसरण करना आवश्यक है [ जैसा कि वसुबन्धु ने भी कहा है—"क्लेशकर्म हेतुकं जन्म, तद्धेतुकानि पुनः क्लेशकर्माणि, तेभ्यः पुनर्जन्मेत्यनादि भवचक्रकं वेदितव्यम्" ( अभि. को. भा. पृ. १३० ] । भाष्यकार यही कह रहे हैं—"रागादिक्लेशवासनाक्षिप्तकर्मापेक्षा त्वविद्या वैषम्यकरी स्यात्" । भाष्यस्थ रागादि पद से राग, द्वेष और मोह का ग्रहण किया गया है, क्योंकि वे ही जीव को संसार-रूपी दुःख का अनुभव कराकर क्लेशित ( दुःखी ) करने के कारण क्लेश कहे जाते हैं । उन क्लेशों की जो वासनाएँ ( संस्कार ) हैं, उनके द्वारा आक्षिप्त ( प्रवर्तित ) कर्मों से युक्त होकर ही लयात्मिका अविद्या विश्व की विषमताओं को जन्म देती है । "अनेन जीवेनात्मना" ( छा. ६।३।२ ) इस श्रुति में 'जीव प्राणधारणे' धातु से निष्पन्न 'जीव' पद के द्वारा जो आत्मा का व्यवहार किया गया है, वह अतीत सृष्टि-कालीन प्राण-धारण के निमित्त से ? अथवा भावी सर्ग के प्राण-धारण को दृष्टि में रखकर ? ऐसा सन्देह होने पर पूर्वपक्षी कहता है कि अतीत सृष्टि मानने की आवश्यकता नहीं, भावी प्राण-धारण को वैसे ही निमित्त बनाया जा सकता है, जैसे "पुरोडाशकपालेन तुषानुपवपत्ति"—यहाँ पर भावी पुरोडाश-पाकादिरूप सम्बन्ध को लेकर 'पुरोडाशकपाल' शब्द का व्यवहार है, जैसा कि महर्षि जैमिनि कहते हैं—"अर्थाभिधान-कर्म च भविष्यता संयोगस्य तन्निमित्तत्वात् तदर्थो हि विधीयते" ( जै. सू. ४।१।२६ ) । उक्त पूर्वपक्ष का खण्डन करते हुए भाष्यकार ने कहा है—"अनागताद्धि सम्बन्धादतीतः सम्बन्धो बलवान्" ।

निर्गुणस्य स्रष्टृत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ६१७

यथापूर्वमकल्पयत्' (ऋ० सं० १०।१९०।३) इति च मन्त्रवर्णः पूर्वकल्पसद्भावं दर्श- यति । स्मृतावप्यनादित्वं संसारस्योपलभ्यते—'न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा' (गी० १५।३) इति पुराणे चातीतानागतानां च कल्पानां न परिमाणमस्तीति स्थापितम् ॥ ३६ ॥

——o——

( १३ सर्वधर्मोपपत्त्यधिकरणम् । सू० ३७ )

सर्वधर्मोपपत्तेश्च ॥ ३७ ॥

चेतनं ब्रह्म जगतः कारणं प्रकृतिश्चेत्यस्मिन्नवधारिते वेदार्थे परैरुपक्षिप्तान्वि- लक्षणत्वादीन्दोषान्पर्यहार्षीदाचार्यः। इदानीं परपक्षप्रतिषेधप्रधानं प्रकरणं प्रारिप्स- माणः स्वपक्षपरिग्रहप्रधानं प्रकरणमुपसंहरति । यस्मादस्मिन् ब्रह्मणि कारणे परिगृह्य- माणे प्रदर्शितेन प्रकारेण सर्वे कारणधर्मा उपपद्यन्ते 'सर्वज्ञं सर्वशक्ति महामायं च ब्रह्म'

भामती मनादित्वे सिद्धे सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयमिति प्राक् सृष्टेरविभागावधारणं समुदाचरद्रूप- रागादिनिषेधपरं न पुनरेतान् प्रसुप्तानप्याकरोतीति सर्वमवदातम् ॥ ३६॥

अत्र ☸सर्वज्ञमिति☸ दृश्यते सर्वस्य चेतनाधिष्ठितस्यैव लोके प्रवृत्तिरिति लोकानुसारो दर्शितः। ☸ सर्वशक्ति इति ☸ सर्वस्य जगत उपादानकारणं निमित्तकारणं चेत्युपपादितम्। ☸महामायम् इति☸

भामती-व्याख्या कर्म और सृष्टि का बीज-वृक्ष के समान अनादि हेतु-हेतुमद्भाव सिद्ध हो जाने पर जो “सदेव सोम्येदमग्र आसीत्”—इस श्रुति के बल पर कर्मादि के विभाग का निराकरण किया गया है, वह केवल प्रवर्तमान (स्थूल या सक्रिय) कर्मादि का ही निषेध है, प्रसुप्त (सूक्ष्म या संस्काररूपेण अवस्थित) कर्मादि का नहीं ॥ ३६ ॥

——oo——

संशय—निर्गुण ब्रह्म में जगदुपादानत्व युक्तिविरुद्ध है? अथवा नहीं ?
पूर्वपक्ष—लोक में मृत्तिकादि सगुण पदार्थ ही घटादि पदार्थों के उपादान कारण देखे जाते हैं, रसादि निर्गुण पदार्थ किसी के भी उपादान नहीं होते, अतः 'ब्रह्म न जगत् उपादानम्, निर्गुणत्वाद्, रसादिवत्'—इस अनुमान के द्वारा निर्गुण ब्रह्म में उपादानत्व का समन्वय बाधित हो जाता है।
सिद्धान्त—[ ब्रह्म में परिणामित्वरूप उपादानत्व अवश्य युक्ति-विरुद्ध है, विवर्तोपादानत्व नहीं, क्योंकि ज्वरित व्यक्ति को मधुर रसरूप निर्गुण पदार्थ में भी कटुत्वादि का भ्रम हो जाता है, अतः कटुत्वादि की विवर्तोपादानता रसादि में सम्भव हो जाती है। ब्रह्म में अभिन्ननिमित्तोपादानत्व सिद्ध किया जा चुका है, उसकी पूर्ण योग्यता श्रुति-प्रतिपादित है, क्योंकि वह सर्वज्ञ सर्वशक्तिक और महामाया का आश्रय है ] यहाँ 'सर्वज्ञ' शब्द के द्वारा निमित्त कारणता प्रदर्शित की है, क्योंकि लोक में कुलालादिरूप विज्ञ (चेतन) व्यक्तियों से अधिष्ठित मृदादि पदार्थ ही घटादि निर्माणार्थ प्रवृत्त होते हैं, अतः कुलालादि के समान ही ब्रह्म जगत् का निमित्त कारण माना जाता है। 'सर्वशक्ति' पद के द्वारा 'शक्तस्य शक्यकारणात्'—इस न्याय के अनुसार ब्रह्म में जगत् की उपादानता प्रदर्शित है। 'महामायम्'—इस पद के द्वारा समस्त अनुपपत्तियाँ परास्त की गई है, क्योंकि माया के द्वारा ब्रह्म में सभी धर्म
७८

६१८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [अ. २ पा. १ सू. ३७

इति, तस्मादनतिशङ्कनीयमिदमौपनिषदं दर्शनमिति ॥ ३७ ॥
इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यशङ्करभगवत्पूज्यपादकृतो शारीरक-
मीमांसाभाष्ये द्वितीयाध्यायस्य सांख्यादिप्रयुक्ततर्कैश्च वेदान्त-
समन्वयविरोधपरिहाराख्यः प्रथमः पादः समाप्तः ॥ १ ॥
——०——


भामती

सर्वानुपपत्तिशङ्का परास्ता । तस्माज्जगत्कारणं ब्रह्मेति सिद्धम् ॥ ३७ ॥
इति श्रीवाचस्पतिमिश्रविरचिते भगवत्पादशारीरकभाष्यविभागे भामत्यां
द्वितीयाध्यायस्य प्रथमः पादः समाप्तः ॥


भामती-व्याख्या

उपपन्न हो जाता है—"न हि मायायां काचिदनुपपत्तिः" (ब्र. सि. पृ. २०)। आचार्य गौडपाद भी कहते हैं—

"स्वप्नमाये यथा दृष्टे गन्धर्वनगरं यथा ।
तथा विश्वमिदं दृष्टं वेदान्तेषु विचक्षणैः ॥" (आगम. २।३२)

स्वामियोगीन्द्रानन्दोदासीनविरचितायां भामतीव्याख्यायां
अविरोधाख्यस्य द्वितीयाध्यायस्य
प्रथमः पादः समाप्तः ।

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