भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
मेरा भी एक संदेह है, आप महात्माओंसे पूछकर निवृत्त करा लें। मैं तो अन्तःपुरमें ही रहती हूँ। अतः मेरी प्रार्थना है कि आप प्रथम मेरा ही संदेह निवृत्त करा दें, क्योंकि आपके संदेहकी निवृत्तिके अनेक साधन हैं।'
राजा सत्राजित्ने कहा—'प्रिये! क्या पूछना चाहती हो, पहले मैं तुम्हारा ही संदेह पहुँगा।'
विमलवतीने कहा—'महाराज! मैंने अनेक राजाओंके चरित्र और ऐश्वर्यको सुना है, किंतु आपके समान ऐश्वर्य अन्य लोगोंको सुलभ नहीं है, यह किस कर्मका फल है? मैंने कौन-सा उत्तम कर्म किया था, जिसके फलस्वरूप मुझे आपकी रानी होनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ? पूर्वजन्ममें हम दोनोंने कौन-सा पुण्यकर्म किया है? इस विषयमें आप मुनियोंसे पूछें।'
सत्राजित् बोले—'देवि! तुमने तो मेरे मनकी बात जान ली है। मुनियोंकी बातें सत्य हैं, पत्नी पुरुषकी अर्धाङ्गिनी होती है। ऐसी कोई बात नहीं है जो इन महामुनियोंसे छिपी हो। इन महात्माओंसे मैं भी यही पूछना चाहता था। अनन्तर महाराजने महात्माओंसे पूछा—भगवन्! मैं पूर्वजन्ममें कौन था, मैंने कौन-से पुण्य कर्म किये थे? इस सर्वाङ्गिसुन्दरी मेरी पत्नीने कौन-से उत्तम कर्म सम्पन्न किये थे, जिससे हमें ऐसी दुर्लभ लक्ष्मी प्राप्त हुई है। हमलोगोंमें परस्पर अतिशय प्रीति है। सभी राजा मेरे अधीन हैं, मेरे पास असीम द्रव्य है और मैं अत्यन्त बलशाली हूँ। मेरा शरीर भी नीरोग है। मेरी पत्नीके समान संसारमें कोई स्त्री नहीं है। सभी मेरे असीम तेजको सहन करनेमें असमर्थ हैं। महामुने! आपलोग त्रिकालज्ञ हैं। आप मेरी जिज्ञासाको शान्त करें।' राजाके इस प्रकार पूछनेपर उन ब्राह्मणोंने सूर्यदेवके परम भक्त परावसुसे प्रार्थना की कि आप ही इनके संदेहको निवृत्त करें। धर्मज्ञ ब्राह्मणोंकी सम्मतिसे
महामति परावसुने योग-समाधिके द्वारा राजा तथा रानीके पूर्वजन्मके सभी कर्मोंकी जानकारी प्राप्त कर राजासे कहना आरम्भ किया—
परावसु बोले—महाराज! आप पूर्वजन्ममें बड़े निर्दयी, हिंसक तथा कठोर हृदयके शूद्र थे, कुछ-रोगसे पीड़ित थे। सुन्दर नेत्रोंवाली ये महारानी उस समय भी आपकी ही भार्या थीं। ये ऐसी पतिव्रता थीं कि आपके द्वारा पीड़ित होनेपर भी आपकी सेवामें निरन्तर संलग्न रहती थीं, परंतु आपकी अतिशय क्रूरताके कारण आपके बन्धु-बान्धव आपसे अलग हो गये और आपने भी अपने पूर्वजोंद्वारा संचित धनको नष्ट कर डाला। अनन्तर आपने कृषि-कार्य प्रारम्भ किया, किंतु दैवेच्छासे वह भी व्यर्थ हो गया। आप अत्यन्त दीन-हीन होकर दूसरोंकी सेवाद्वारा जीवन-यापन करने लगे। आपने अपनी स्त्रीको छोड़नेका बहुत प्रयास किया, किंतु उसने आपका साथ नहीं छोड़ा। इसके बाद आप दोनों कान्यकुब्ज देशमें चले गये और भगवान् सूर्यके मन्दिरमें सेवा करने लगे। वहाँ प्रतिदिन मन्दिरका मार्जन, लेपन, प्रोक्षण (जल छिड़कना) आदि कार्य बड़े भक्तिभावसे करते रहे। मन्दिरमें पुराणकी कथा होती थी। आप दोनोंने उसका भक्तिपूर्वक श्रवण किया। कथा-श्रवण करनेके बाद आपकी पत्नीने पितासे प्राप्त अँगूठीको कथामें चढ़ा दिया। आपके मनमें रात-दिन यही चिन्ता रहती थी कि यह मन्दिर कैसे स्वच्छ रहे। आप दोनों बहुत दिनोंतक वहाँ रहे। भगवान्के सेवारूपी योगकर्ममें आपका मन अहर्निश लगा रहता था।
इस प्रकार आप दोनों निष्कामभावसे भगवान् सूर्यकी सेवा करते और जो कुछ मिलता, उसीसे निर्वाह करते थे। गोपति भगवान् सूर्यका आप नित्य चिन्तन करते थे, अतः आपके सभी पाप समाप्त हो गये।
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- ब्राह्मपर्व *
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किसी समय अपनी विशाल सेनाके साथ कुवलाश्व नामका एक राजा वहाँ आया। उसकी अपार सम्पत्ति और हजारों श्रेष्ठ रानियोंको देखकर आप दोनोंकी भी राजा-रानी बननेकी इच्छा हुई। कुछ ही समयमें आपका देहान्त हो गया। सूर्यदेवकी श्रद्धा-भक्तिपूर्वक की गयी सेवा तथा पुराण-श्रवणके प्रभावसे आप राजा हुए और आपकी स्त्री रानी हुई एवं आप दोनोंको जो असीम तेज प्राप्त हुआ है, उसका भी कारण सुनिये—
जब मन्दिरमें दीपक तेल तथा बत्तीके अभावमें बुझने लगता था, तब आप अपने भोजनके लिये रखे तेलसे उसे पूरित करते थे और आपकी रानी अपनी साड़ी फाड़कर उससे बत्ती बनाकर जलाती थी। राजन्! यदि अन्य जन्ममें भी आपको ऐश्वर्यकी इच्छा है तो भगवान् सूर्यकी श्रद्धापूर्वक आराधना करें। गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि जो आपको प्रिय हों, वही भगवान् सूर्यको अर्पण करें। उनके मन्दिरमें मार्जन, उपलेपन आदि कार्य करें, जिससे मन्दिर स्वच्छ और निर्मल रहे। उत्तम दिनोंमें उपवास कर रात्रि-जागरण और नृत्य-गीत-वाद्यादिद्वारा महोत्सव करायें। पुराण-इतिहास आदिकी कथा श्रद्धापूर्वक सुनें तथा भगवान् सूर्यकी प्रसन्नताके लिये वेद-पाठ करायें। सदा निष्काम-भावसे तन्मय होकर उनकी सेवामें लगे रहें। संतुष्ट होकर भगवान् सूर्य अभीष्ट फल देते हैं। वे पुष्प, नैवेद्य, रत्न, सुवर्ण आदिसे उतना प्रसन्न नहीं होते, जितना वे भक्तिभावसे प्रसन्न होते हैं। यदि भक्तिभावपूर्वक सूर्यकी आराधना और विविध उपचारोंसे पूजन करेंगे तो इन्द्रसे भी अधिक वैभवकी प्राप्ति कर लेंगे।
राजा सत्राजित्ने कहा—भगवन्! इन्द्रत्वकी प्राप्ति या अमरत्वकी प्राप्तिसे जो आनन्द होता है, वह आनन्द आपकी इस वाणीको सुनकर मुझे
प्राप्त हुआ। अज्ञानरूपी अन्धकारके लिये आपकी यह वाणी प्रदीप्त दीपकके समान है। सम्पत्तिके विनाशकी सम्भावनासे हम बहुत व्याकुल थे। आपने सम्पत्ति-प्राप्तिके लिये मूल तत्त्वका आज उपदेश दिया है। इससे यह सिद्ध हो गया कि मुझे यह सारी सम्पत्ति पूर्वजन्मके सुकृतकर्मके ही फलस्वरूप प्राप्त हुई है। भक्तिमान् दरिद्र भी भगवान् सूर्यको प्रसन्न कर सकता है, किंतु एक ऐश्वर्यशाली धनवान् भक्तिहीन होनेपर उनका अनुग्रह नहीं प्राप्त कर सकता। भगवन्! आप मुझे सूर्यभगवान्की आराधनाके उस मार्गको सूचित करें, जिससे शीघ्र ही उनका अनुग्रह प्राप्त हो सके।
परावसु बोले—राजन्! कार्तिक मासमें प्रतिदिन भगवान् सूर्यका पूजन कर ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये और स्वयं भी एक ही बार भोजन करना चाहिये। इस आराधनासे बाल्यावस्थामें किये गये ज्ञात-अज्ञात सभी पापोंसे छुटकारा मिल जाता है। मार्गशीर्षमें पूर्वोक्त रीतिसे व्रत करनेवाले स्त्री-पुरुषकी, ब्राह्मणको मरकत मणिका दान करनेसे प्रौढावस्थामें किये गये पापोंसे मुक्ति हो जाती है। पौष मासमें पूर्वोक्त विधिके अनुसार एकभुक्त हो श्रद्धापूर्वक सूर्यकी आराधना करनेसे वृद्धावस्थामें किये गये सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
इस त्रैमासिक व्रतको श्रद्धापूर्वक विधि-विधानसे करनेवाले स्त्री या पुरुष सूर्यभगवान्के कृपापात्र हो जाते हैं और लघु पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। दूसरे वर्ष इसी प्रकार त्रैमासिक व्रत करनेपर सभी उपपातक निवृत्त हो जाते हैं। तीसरे वर्ष भी इस व्रतको करनेपर महापातक नष्ट हो जाते हैं और मनोवाञ्छित फलकी प्राप्ति होती है। यह व्रत तीन मासमें सम्पन्न होता है और इसे तीन वर्षतक करना चाहिये। सभी अवस्थाओंमें आधिभौतिक, आधैदैविक तथा आध्यात्मिक—त्रिविध पातक
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
इसके द्वारा नष्ट हो जाते हैं। इस सर्वपापहर्ता व्रतको त्रिविक्रम-व्रत कहा जाता है।
राजा सत्राजित्ने कहा— भगवन्! व्रतका विधान तो मैंने सुना, परंतु भोजन कैसे ब्राह्मणको कराना चाहिये, यह भी आप कृपाकर बतायें।
परावसु बोले— पौराणिक ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। इस प्रसंगमें अरुणको सूर्यदेवने जो निर्देश दिया था, वह मैं आपको बताता हूँ—
किसी समय उदयाचलपर अरुणने भगवान् सूर्यसे पूछा—‘महाराज! कौन-कौन पुष्प, नैवेद्य, वस्त्र आदि आपको प्रिय हैं और कैसे ब्राह्मणको भोजन करानेसे आप संतुष्ट होते हैं?’ इसे आप
कृपाकर बतायें।
भगवान् सूर्यने कहा— अरुण! करवीरके पुष्प, रक्त चन्दन, गुग्गुलका धूप, घीका दीपक और मोदक आदि नैवेद्य मुझे प्रिय हैं। मेरे भक्त और पौराणिक ब्राह्मणको दान देकर उसके प्रति श्रद्धा समर्पित करनेसे मुझे जितनी प्रसन्नता होती है, उतनी प्रसन्नता गीत, वाद्य और पूजन आदिसे नहीं होती। मैं पुराण आदिके वाचन-श्रवणसे अतिशय प्रसन्न होता हूँ। इतिहास-पुराणके वाचक तथा मेरी पूजा करनेवाला भोजक—ये दोनों मुझे विशेष प्रिय हैं। इसलिये पौराणिकका पूजन करे और इतिहास आदिको सुने। (अध्याय ११६)
भोजकोंकी उत्पत्ति तथा उनके लक्षणोंका वर्णन
अरुणने पूछा—भगवन्! यह भोजक कौन है? किसका पुत्र है? इसने ऐसा कौन-सा उत्तम कर्म किया है, जिस कारण ब्राह्मण आदि वर्णोंको छोड़कर आपका इसपर इतना अनुग्रह हुआ? आप कृपाकर सब मुझे बतायें।
आदित्य बोले— महामति वैन्तेय! तुमने बहुत सुन्दर बात पूछी है। इसके उत्तरमें मैं जो कहता हूँ, उसे तुम सावधान होकर सुनो। अपनी पूजाके निमित्त ही मैंने अपने तेजसे भोजकोंकी उत्पत्ति की है। ये वर्णतः ब्राह्मण हैं और मेरी पूजाके लिये अनुष्ठानमें तत्पर रहते हैं। ये भोजक मुझे अति प्रिय हैं।
प्राचीन कालमें शाकद्वीपके स्वामी राजा प्रियव्रतके पुत्रने विमानके समान एक भव्य सूर्य-मन्दिर बनवाया और उसमें स्थापित करनेके लिये सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न सोनेकी एक दिव्य सूर्यकी प्रतिमा भी बनवायी। अब राजाको यह चिन्ता होने लगी कि मन्दिर तथा प्रतिमाकी प्रतिष्ठा कौन कराये? उन्हें कोई योग्य व्यक्ति नहीं दिखायी
दिया। अतः वह राजा मेरी शरणमें आया। अपने भक्तको चिन्ताग्रस्त देखकर मैंने उसे प्रत्यक्ष दर्शन दिया और पूछा—‘वत्स!’ तुम क्या विचार कर रहे हो, तुम क्यों चिन्तित हो, शीघ्र ही अपनी चिन्ताका कारण बताओ। तुम दुःखी मत होओ, मैं तुम्हारे अत्यन्त दुष्कर कर्मोंको भी सम्पन्न कर दूँगा।’ इसपर राजाने प्रसन्न होकर कहा—‘प्रभो! मैंने बड़ी भक्ति एवं श्रद्धासे इस द्वीपमें आपका एक विशाल मन्दिर बनवाया है तथा एक दिव्य सूर्य-प्रतिमा भी बनवायी है, मुझे यह चिन्ता सता रही है कि प्रतिष्ठा-कार्य कैसे सम्पन्न हो?’ राजाके इन वचनोंको सुनकर मैंने कहा—‘राजन्! मैं अपने तेजसे अपनी पूजा करनेके लिये मगसंज्ञक ब्राह्मणोंकी सृष्टि करता हूँ। मेरे ऐसा कहते ही चन्द्रमाके समान श्वेतवर्णवाले आठ बलशाली पुरुष मेरे शरीरसे उत्पन्न हो गये। वे सभी काषाय वस्त्र पहिने हुए थे, हाथोंमें पिटारी और कमलके पुष्प लिये हुए थे तथा साङ्गोपाङ्ग चारों वेदों और उपनिषदोंका पाठ कर रहे थे। इनमेंसे दो पुरुष
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- ब्राह्मपर्व *
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ललाटसे, दो वक्षःस्थलसे, दो चरणोंसे तथा दो पादोंसे उत्पन्न हुए।' उन महात्माओंने मुझे पिता मानते हुए हाथ जोड़कर मुझसे कहा—'हे पिता! हे लोकनाथ! हम आपके पुत्र हैं। आपने किसलिये हमें उत्पन्न किया है? हमें आज्ञा दीजिये। हम सब आपके आदेशका पालन करेंगे।' पुत्रोंका ऐसा वचन सुनकर मैंने कहा—'तुम सब इस राजाकी बात सुनो और ये जैसा कहें वैसा ही करो।' पुत्रोंसे ऐसा कहनेके बाद मैंने राजासे कहा—'राजन्! ये मेरे पुत्र हैं, ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ हैं तथा सर्वदा पूज्य हैं। मेरी प्रतिष्ठा करानेके लिये ये सर्वथा योग्य हैं। इनसे प्रतिष्ठा करवा लो। मन्दिरकी प्रतिष्ठा कराकर मन्दिर इन्हें समर्पित कर दो। ये सदा मेरा पूजन किया करेंगे, परंतु देकर फिर इनसे हरण मत करना। मेरे निमित्त जो कुछ धन-धान्य, गृह, क्षेत्र, बाग, ग्राम नगर आदि मन्दिरमें अर्पण करो, उन सबके स्वामी ये भोजक ही होंगे। जैसे पिताके द्रव्यका अधिकारी उसका पुत्र होता है, वैसे ही मेरे धनके अधिकारी ये भोजक ही हैं।' मेरी आज्ञा पाकर उस राजाने प्रसन्न हो वैसा ही किया और भोजकोंद्वारा प्रतिष्ठा कराकर वह मन्दिर उन्हींको अर्पित कर दिया।
अरुण! इस प्रकार अपनी पूजाके लिये मैंने अपने शरीरके तेजसे भोजकोंको उत्पन्न किया। ये मेरे आत्मस्वरूप हैं। मेरी प्रीतिके लिये जो कुछ भी देना हो वह भोजकको देना चाहिये। परंतु भोजकको दिया हुआ धन कभी वापस नहीं लेना चाहिये। भोजक हमारे सम्पूर्ण धनका स्वामी है।
भोजकमें ये लक्षण होने चाहिये—वह पहले वेदाध्ययन कर फिर गृहस्थजीवनमें प्रवेश करे। नित्य त्रिकाल स्नान करे, दिन-रात्रिमें पञ्चकृत्यों*
द्वारा मेरा पूजन करे। वेद, ब्राह्मण और देवताओंकी कभी निन्दा न करे। नित्य हमारे सम्मुख शङ्ख-ध्वनि करे। छः महीने पुराण सुननेसे जैसी प्रसन्नता मुझे होती है, वैसी प्रीति केवल एक बार शङ्ख-ध्वनि श्रवण करनेसे हो जाती है। इसलिये भोजकको पूजनमें नित्य शङ्ख बजाना चाहिये। वे अभोज्य पदार्थ भक्षण नहीं करते हैं, इसलिये भोजक कहलाते हैं और नित्य हमको भोजन कराते हैं, इसलिये भी भोजक कहलाते हैं। वे सदा मगका ध्यान करते रहते हैं, इसलिये मगध कहे जाते हैं। भोजक परम शुद्धिकर अव्यङ्ग धारण किये बिना सदा अपवित्र रहता है। जो अव्यङ्ग धारण किये बिना मेरी पूजा करता है, उसको संतान नहीं होती और मेरी प्रसन्नता भी उसे प्राप्त नहीं होती। भोजकको सिर मुड़ाकर रहना चाहिये, किंतु शिखा अवश्य रखनी चाहिये। रविवारके दिन तथा षष्ठीको नक्तव्रत कर ससमीको उपवास करना चाहिये और संक्रान्तिका व्रत भी करना चाहिये। मेरे समीप त्रिकाल गायत्रीका जप करे। भक्ति-श्रद्धापूर्वक मौन होकर मेरा पूजन करे। क्रोध न करे। सदा हमारा नैवेद्य भक्षण करे। वह नैवेद्य भोजकको शुद्ध करनेके लिये पवित्र हविष्यान्नके समान है। मुझे चढ़ा हुआ गन्ध, पुष्प, वस्त्राभूषण आदि बेचे नहीं। स्नान कराये गये जल और निर्माल्य (विसर्जनके बाद देवार्पित वस्तु) तथा अग्निका उल्लङ्घन न करे। सदा पवित्र रहे, एक बार भोजन करे और क्रोध, अमङ्गल-वचन तथा अशुभ कर्मोंको त्याग दे।
अरुण! इस प्रकारके लक्षणोंवाला भोजक मुझे बहुत प्रिय है। भोजकका सदा सत्कार करना चाहिये। तुम्हारे ही समान भोजक भी मुझे बहुत प्रिय हैं।
महात्मा परावसु बोले—राजन्! इस प्रकार
- इज्या, अभिगमन, उपादान, स्वाध्याय और योग—ये पाँच उपासनाके भेद हैं, जिनमें प्रतिमा-पूजन, संध्या-तर्पण, हवन-पूजन, ध्यान, जप एवं सूर्यके चरित्रोंका पाठ सम्मिलित है।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
अरुणको उपदेश देकर सूर्यनारायण आकाशमें भ्रमण करने लगे और अरुण भी यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ।
ब्रह्माजी बोले— महामुनि परावसुके मुखसे यह कथा सुनकर राजा सत्राजित् और उसकी रानी विमलवती बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने पृथ्वीपर जहाँ-जहाँ भगवान् सूर्यके मन्दिर थे, उन सबमें
मार्जन और उपलेपन कराया। सब मन्दिरोंमें कथा कहनेके लिये पौराणिकोंको नियुक्त किया और बहुत-सी दक्षिणा देकर उन्हें संतुष्ट किया। वे विविध उपचारोंसे भक्तिपूर्वक नित्य सूर्यदेवकी पूजा-उपासना करने लगे और अन्तमें उन दोनोंने उनकी प्रीति प्राप्त कर उत्तम गति प्राप्त की।
(अध्याय ११७)
भद्र ब्राह्मणकी कथा एवं कार्तिक मासमें सूर्य-मन्दिरमें दीपदानका फल
ब्रह्माजी बोले— विष्णो! जो कार्तिक मासमें सूर्यदेवके मन्दिरमें दीप प्रज्वलित करता है, उसे सम्पूर्ण यज्ञोंका फल प्राप्त होता है एवं वह तेजमें सूर्यके समान तेजस्वी होता है। अब मैं आपको भद्र ब्राह्मणकी कथा सुनाता हूँ, जो समस्त पापोंका नाश करनेवाली है, उसे आप सुनें—
प्राचीन कालमें माहिष्मती नामकी एक सुन्दर नगरीमें नागशर्मा नामका एक ब्राह्मण रहता था। भगवान् सूर्यकी प्रसन्नतासे उसके सौ पुत्र हुए। सबसे छोटे पुत्रका नाम था भद्र। वह सभी भाइयोंमें अत्यन्त विचक्षण विद्वान् था। वह भगवान् सूर्यके मन्दिरमें नित्य दीपक जलाया करता था। एक दिन उसके भाइयोंने उससे बड़े आदरसे पूछा—‘भद्र! हमलोग देखते हैं कि तुम भगवान् सूर्यको न तो कभी पुष्प, धूप, नैवेद्य आदि अर्पण करते हो और न कभी ब्राह्मण-भोजन कराते हो, केवल दिन-रात मन्दिरमें जाकर दीप जलाते रहते हो, इसमें क्या कारण है? तुम हमें बताओ।’ अपने भाइयोंकी बात सुनकर भद्र बोला—‘भ्रातृगण! इस विषयमें आपलोग एक आख्यान सुनें—
प्राचीन कालमें राजा इक्ष्वाकुके पुरोहित महर्षि वसिष्ठ थे। उन्होंने राजा इक्ष्वाकुसे सरयू-तटपर सूर्यभगवान्का एक मन्दिर बनवाया। वे वहाँ नित्य गन्ध-पुष्पादि उपचारोंसे भक्तिपूर्वक भगवान्
सूर्यकी पूजा करते और दीपक प्रज्वलित करते थे। विशेषकर कार्तिक मासमें भक्तिपूर्वक दीपोत्सव किया करते थे। तब मैं भी अनेक कुछ आदि रोगोंसे पीड़ित हो उसी मन्दिरके समीप पड़ा रहता और जो कुछ मिल जाता, उसीसे अपना पेट भरता। वहाँके निवासी मुझे रोगी और दीन-हीन जानकर मुझे भोजन दे देते थे। एक दिन मुझमें यह कुत्सित विचार आया कि मैं रात्रिके अन्धकारमें इस मन्दिरमें स्थित सूर्यनारायणके बहुमूल्य आभूषणोंको चुरा लूँ। ऐसा निश्चयकर मैं उन भोजकोंकी निद्राकी प्रतीक्षा करने लगा। जब वे भोजक सो गये, तब मैं धीरे-धीरे मन्दिरमें गया और वहाँ देखा कि दीपक बुझ चुका है। तब मैंने अग्नि जलाकर दीपक प्रज्वलित किया और उसमें घृत डालकर प्रतिमासे आभूषण उतारने लगा, उसी समय वे देवपुत्र भोजक जग गये और मुझे हाथमें दीपक लिया देखकर पकड़ लिया। मैं भयभीत हो विलापकर उनके चरणोंपर गिर पड़ा। दयावश उन्होंने मुझे छोड़ दिया, किंतु वहाँ घूमते हुए राजपुरुषोंने मुझे फिर बाँध लिया और वे मुझसे पूछने लगे—‘अरे दुष्ट! तुम दीपक हाथमें लेकर मन्दिरमें क्या कर रहे थे? जल्दी बताओ’, मैं अत्यन्त भयभीत हो गया। उन राजपुरुषोंके भयसे तथा रोगसे आक्रान्त होनेके
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- ब्राह्मपर्व *
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कारण मन्दिरमें ही मेरे प्राण निकल गये। उसी समय सूर्यभगवान् के गण मुझे विमानमें बैठाकर सूर्यलोक ले गये और मैंने एक कल्पतक वहाँ सुख भोगा तथा फिर उत्तम कुलमें जन्म लेकर आप सबका भाई बना। बन्धुओ! यह कार्तिक मासमें भगवान् सूर्यके मन्दिरमें दीपक जलानेका फल है। यद्यपि मैंने दुष्टबुद्धिसे आभूषण चुरानेकी दृष्टिसे मन्दिरमें दीपक जलाया था तथापि उसीके फलस्वरूप इस उत्तम ब्राह्मणकुलमें मेरा जन्म हुआ तथा वेद-शास्त्रोंका मैंने अध्ययन किया और मुझे पूर्वजन्मोंकी स्मृति हुई। इस प्रकार उत्तम फल मुझे प्राप्त हुआ। दुष्टबुद्धिसे भी घीद्वारा दीपक जलानेका ऐसा श्रेष्ठ फल देखकर मैं अब नित्य भगवान् सूर्यके मन्दिरमें दीपक प्रज्वलित करता रहता हूँ। भाइयो! मैंने कार्तिक मासमें यह
दीपदानका संक्षेपमें माहात्म्य आपलोगोंको सुनाया।
इतनी कथा सुनाकर ब्रह्माजी बोले—विष्णो! दीपक जलानेका फल भद्रने अपने भाइयोंको बताया। जो पुरुष सूर्यके नामोंका जप करता हुआ मन्दिरमें कार्तिकके महीनेमें दीपदान करता है, वह आरोग्य, धन-सम्पत्ति, बुद्धि, उत्तम संतान और जातिस्मरत्वको प्राप्त करता है। षष्ठी और सप्तमी तिथिको जो प्रयत्नपूर्वक सूर्य-मन्दिरमें दीपदान करता है, वह उत्तम विमानमें बैठकर सूर्यलोकको जाता है। इसलिये भगवान् सूर्यके मन्दिरमें भक्तिपूर्वक दीप प्रज्वलित करना चाहिये। प्रज्वलित दीपको न तो बुझाये और न उसका हरण करे। दीपक हरण करनेवाला पुरुष अन्धमूषक होता है। इस कारण कल्याणकी इच्छावाला पुरुष दीप प्रज्वलित करे, हरे नहीं। (अध्याय ११८)
यमदूत और नारकीय जीवोंके संवादके प्रसंगमें सूर्य-मन्दिरमें दीपदान करने एवं दीप चुरानेके पुण्य-पापोंका परिणाम
ब्रह्माजी बोले—विष्णो! एक समय घोर नरकमें पड़े हुए भूखे, आर्त-दुःखी और विलाप करते हुए जीवोंसे यमदूतने कहा—मूढजनों! अब अधिक विलाप करनेसे क्या लाभ होगा, प्रमादवश तुम सबने अपनी आत्माकी उपेक्षा कर रखी है। पहले तुम सबने यह विचार नहीं किया कि इन कर्मोंका फल आगे भोगना पड़ेगा। यह शरीर थोड़े ही दिनोंतक रहनेवाला है, विषय भी नाशवान् हैं, यह कौन नहीं जानता। हजारों जन्मोंके बाद एक बार मनुष्य-जन्म मिलता है, उसमें क्यों मूढजन भोगोंकी ओर दौड़ते हैं। वे पुत्र, स्त्री, गृह, क्षेत्र आदिके लिये प्रयत्नशील रहते हैं और उनमें आसक्त होकर अनेक दुष्कर्म करते हैं, वे मूढजन अपना हित नहीं जानते, वे यह भी नहीं जानते कि सूर्य, चन्द्र,
काल तथा आत्मा—ये सभी मनुष्यके शुभ और अशुभ कर्मोंको देखते रहते हैं अर्थात् साक्षीभूत हैं। न केवल एक जन्म अपितु सैकड़ों जन्मोंमें पुत्र, स्त्री आदिके लिये जो-जो भी कर्म किया जाता है, उसे अच्छी तरहसे ये जानते रहते हैं। मोहकी यह महिमा तो देखो कि नरकमें भी ममता बनी रहती है। इस प्रकार परिणाममें भयंकर विषयोंके द्वारा आकृष्टचित्तवाले मनुष्योंकी बुद्धि परमार्थ-तत्त्वकी ओर नहीं होती। जिह्वाद्वारा भगवान् सूर्यका नाम लेनेमें कौन-सा श्रम है? मन्दिरमें दीप जलानेमें भी अधिक परिश्रम नहीं पड़ता, परंतु यदि मनुष्यसे इतना भी नहीं हो सकता तो अब रोदन और विलाप करनेसे क्या लाभ है? जैसा कर्म किया वैसा फल पाया। इसलिये पापकर्ममें
- अहो मोहस्य माहात्म्यं ममत्वं नरकेष्वपि। क्रन्दते मातरं तातं पीड्यमानोऽपि यत्स्वयम् ॥
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
कभी भी बुद्धि नहीं लगानी चाहिये। यदि कोई अज्ञानसे पापकर्म हो जाय तो सूर्यभगवान्की आराधना करे, जिससे सब पाप नष्ट हो जाते हैं।
ब्रह्माजी बोले —यमदूतके ऐसे वचनोंको सुनकर तथा भूखसे व्याकुल, प्याससे सूखे कण्ठवाले, दुःखसे पीड़ित वे नारकीय जीव उससे कहने लगे—‘साधो! हमने ऐसा कौन-सा कर्म किया, जिससे हमें इस दारुण नरकमें वास करना पड़ा।’
यमदूतने कहा —पूर्वजन्ममें यौवनके उन्मादसे उन्मादित तुम अविवेकियोंने घृतके लोभमें भगवान् सूर्यके मन्दिरसे दीप चुराया था। उसी कारण इस
घोर नरकमें तुम सब दुःख भोग रहे हो।
ब्रह्माजी बोले —अच्युत! मैंने सूर्यके मन्दिरमें दीपदान करनेके पुण्य तथा दीप-हरण करनेके दुष्परिणामोंका वर्णन किया। दीपदान करनेका तो सर्वत्र ही उत्तम फल है, परंतु सूर्यनारायणके मन्दिरमें विशेष फल है। जगत्में जो-जो अन्धा, मूक, बधिर, विवेकहीन, निन्द्य व्यक्ति दिखायी पड़ते हैं, उन सबने साधुजनोंद्वारा प्रज्वलित किये हुए दीपोंको सूर्यनारायणके मन्दिरसे हरण किया है।
(अध्याय ११९)
वैवस्वतके लक्षण और सूर्यनारायणकी महिमा
विष्णुभगवान्ने ब्रह्माजीसे पूछा—ब्रह्मन्! संसारमें मनुष्य विष, रोग, ग्रह और अनेक प्रकारके उपद्रवोंसे पीड़ित रहते हैं, यह किन कर्मोंका फल है, कृपाकर आप कोई ऐसा उपाय बतायें, जिससे जीवोंको रोग आदिकी बाधा न हो।
ब्रह्माजीने कहा —जिन्होंने पूर्वजन्ममें व्रत-उपवास आदिके द्वारा भगवान् सूर्यको प्रसन्न नहीं किया, वे मनुष्य विष, ज्वर, ग्रह, रोग आदिके भागी होते हैं और जो सूर्यनारायणकी आराधना करते हैं, उन्हें आधि-व्याधियाँ नहीं सतातीं। पूर्वजन्ममें भगवान् सूर्यकी आराधनासे इस जन्ममें आरोग्य, परम बुद्धि और जो-जो भी मनमें इच्छा
करता है, निःसंदेह उसे प्राप्त कर लेता है। आधि-व्याधियोंसे पीड़ित नहीं होता है और न विष एवं दुष्ट ग्रहोंके बन्धनमें ही फँसता है तथा कृत्या आदिका भी भय उसे नहीं रहता। सूर्यनारायणके भक्तके लिये दुष्ट भी अनुकूल हो जाते हैं और सब ग्रह सौम्य दृष्टि रखते हैं। जिसपर सूर्यदेव संतुष्ट हो जाते हैं, वह देवताओंका भी पूज्य हो जाता है। परंतु भगवान् सूर्यका अनुग्रह उसी पुरुषपर होता है, जो सब जीवोंको अपने समान ही समझता है और भक्तिपूर्वक उनकी आराधना करता है। प्रजाओंके स्वामी भगवान् सूर्यके प्रसन्न हो जानेपर मनुष्य पूर्णमनोरथ हो जाता है*।
एवमाकृष्टचित्तानां विषयैः स्वादुत्पणैः। नृणां न जायते बुद्धिः परमार्थविलोकिनी ॥
तथा च विषयासङ्गे करोत्यविरतं मनः। को हि भारो रवेनाग्निं जिह्वायाः परिकीर्तने ॥
वर्तितैलेऽल्पमूल्ये च यद्वर्तिलभ्यते सुधा। अतो वै कतरो लाभः कातश्चिन्ता भवेत् तदा ॥ (ब्राह्मपर्व ११९।१०—१३)
- व्रतोपवासैर्भीनुर्नान्यजन्मनि तोषितः। ते नरा देवशार्दूल ग्रहरोगादिभागिनः ॥
यैर्न तत्रवर्णं चित्तं सर्वदैव नरैः कृतम्। विषग्रहज्वरानां ते मनुष्याः कृष्ण भागिनः ॥
आरोग्यं परमां बुद्धिं मनसा यद्यदिच्छति। तत्तदाप्रीत्यसदिरग्धं परत्रादित्यतोषणात् ॥
नाधीन् प्राप्नोति न व्याधीन् न विषग्रहबन्धनम्। कृत्यास्पर्शभ्यं वापि तोषिते तिमिरापहे ॥
सर्वं दुष्टाः समास्तस्य सौम्यास्तस्य सदा ग्रहाः। देवानामपि पूज्योऽसी तुष्टो यस्य दिवाकरः ॥
यः समः सर्वभूतेषु यथात्मनि तथा हिते। उपवासदिना येन तोष्यते तिमिरापहः ॥
तोषितेऽस्मिन् प्रजानाथे नराः पूर्णमनोरथाः। अरोगाः सुखिनो नित्यं बहुधर्मसुखान्विताः ॥
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- ब्राह्मपर्व *
१४९
भगवान् विष्णुने पूछा—ब्रह्मन्! जिन्होंने पहले भगवान् सूर्यकी आराधना नहीं की और रोग-व्याधिसे दुःखी हो गये हैं, वे उन कष्ट एवं पापोंसे कैसे मुक्त हों, कृपाकर बतायें। हम भी भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्यकी आराधना करना चाहते हैं।
ब्रह्माजी बोले—भगवन्! यदि आप भगवान् सूर्यकी आराधना करना चाहते हैं तो आप पहले वैवस्वत (सूर्यभक्त) बनें, क्योंकि बिना विधिपूर्वक सौरी दीक्षाके उनकी उपासना पूरी नहीं हो सकती। जब मनुष्योंके पाप क्षीण होने लगते हैं तब भगवान् सूर्य और ब्राह्मणोंमें उनकी नैष्ठिकी श्रद्धा-भक्ति होती है। इस संसार-चक्रमें भ्रमण करते हुए प्राणियोंके लिये भगवान् सूर्यको प्रसन्न करना एकमात्र कल्याणका निष्कण्टक मार्ग है।
विष्णुभगवान्ने पूछा—ब्रह्मन्! वैवस्वतोंका क्या लक्षण है और उन्हें क्या करना चाहिये? यह आप बतायें।
ब्रह्माजी बोले—वैवस्वत वही है जो भगवान् सूर्यका परम भक्त हो तथा मन, वाणी एवं कर्मसे कभी जीवहिंसा न करे। ब्राह्मण, देवता और भोजकको नित्य प्रणाम करे, दूसरेके धनका हरण न करे, सभी देवताओं एवं संसारको भगवान् सूर्यका ही स्वरूप समझे और उनसे अपनेको अभिन्न समझे। देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी, पिपीलिका, वृक्ष, पाषाण, काष्ठ, भूमि, जल, आकाश तथा दिशा—सर्वत्र भगवान् सूर्यको व्याप्त समझे, साथ ही स्वयंको भी सूर्यसे भिन्न न समझे। जो किसी
भी प्राणीमें दुष्टभाव नहीं रखता, वही वैवस्वत सूर्योपासक है। जो पुरुष आसक्तिरहित होकर निष्कामभावसे भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्यके निमित्त क्रियाएँ करता है, वह वैवस्वत कहलाता है। जिसका न तो कोई शत्रु हो और न कोई मित्र हो तथा न उसमें भेद-बुद्धि हो, सबको बराबर देखता हो, ऐसा पुरुष वैवस्वत कहलाता है। जिस उत्तम गतिको वैवस्वत पुरुष प्राप्त करता है, वह योगी और बड़े-बड़े तपस्वियोंके लिये भी दुर्लभ है। जो सभी प्रकारसे भगवान् सूर्यका दृढ़ भक्त है, वह धन्य है। भक्तिपूर्वक आराधना करनेसे ही सूर्यभगवान्का अनुग्रह प्राप्त होता है।
ब्रह्माजी पुनः बोले—मैं भी उनके दक्षिण किरणसे उत्पन्न हुआ हूँ और उन्हींके वाम किरणसे भगवान् शिव तथा वक्षःस्थलसे शङ्ख-चक्र-गदाधारी आप उत्पन्न हैं। उन्हींकी इच्छासे आप सृष्टिका पालन तथा शङ्कर संहार करते हैं। इसी प्रकार रुद्र, इन्द्र, चन्द्र, वरुण, वायु, अग्नि आदि सब देवता सूर्यदेवसे ही प्रादुर्भूत हुए हैं और उनकी आज्ञाके अनुसार अपने-अपने कर्मोंमें प्रवृत्त हो रहे हैं। इसलिये भगवन्! आप भी सूर्यभगवान्की आराधना करें, इससे सभी मनोरथ पूर्ण होंगे।
पितामह ब्रह्माजी एवं विष्णुभगवान्के इस संवादको जो भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, वह मनोवाञ्छित फलोंको प्राप्त कर अन्तमें सुवर्णके विमानमें बैठकर सूर्यलोकको जाता है।
(अध्याय १२०)
न तेषां शत्रवो नैव शरीराद्यभिचारकम् । ग्रहरोगदिकं चापि पापकार्युपजायते ॥ अव्याहतानि देवस्य धनजालानि तं नरम् । रक्षन्ति सकलापत्सु येन श्वेताधिपोऽर्चितः ॥ (ब्राह्मपर्व १२०।४—१२)
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१५० * संक्षिप्त भविष्यपुराण * भगवान् सूर्यनारायणके सौम्य रूपकी कथा, उनकी स्तुति और परिवार तथा देवताओंका वर्णन राजा शतानीकने कहा—मुने! भगवान् सूर्यकी | वायुरिन्द्रश्च सोमश्च विवस्वान् वरुणस्तथा॥ कथा सुनते-सुनते मुझे तृप्ति नहीं होती, अतः आप | त्वं कालः सृष्टिकर्ता च हर्ता त्राता प्रभुस्तथा। पुनः उन्हींके गुणों और चरित्रोंका वर्णन करें। | सरितः सागराः शैला विद्युदिन्द्रधनूंषि च। सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने | प्रलयः प्रभवश्चैव व्यक्ताव्यक्तः सनातनः॥ भगवान् सूर्यकी जो पवित्र कथा ऋषियोंको सुनायी | ईश्वरात्परतो विद्या विद्यायाः परतः शिवः। थी, उसे मैं आपको सुनाता हूँ। वह कथा पापोंको | शिवात्परतरो देवस्त्वमेव परमेश्वर॥ नष्ट करनेवाली है— | सर्वतः पाणिपादस्त्वं सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः। एक समय भगवान् सूर्यके प्रचण्ड तेजसे संतप्त | सहस्त्रांशुस्त्वं तु देव सहस्रकिरणस्तथा॥ हो ऋषियोंने ब्रह्माजीसे पूछा—'ब्रह्मन्! आकाशमें | भूरादिर्भूर्भुवःस्वश्च महर्जनस्तपस्तथा। स्थित यह अग्निके तुल्य दाह करनेवाला तेजःपुञ्ज | प्रदीप्तं दीप्तिमन्नित्यं सर्वलोकप्रकाशकम्। कौन है?' | दुर्निरीक्ष्यं सुरेन्द्राणां यद्रूपं तस्य ते नमः॥ ब्रह्माजी बोले—मुनीश्वरो! प्रलयके समय जब | सुरसिद्धगणैर्जुष्टं भृग्वत्रिपुल्हादिभिः। सारा स्थावर-जङ्गम जगत् नष्ट हो गया, उस | शुभं परममव्यग्रं यद्रूपं तस्य ते नमः॥ समय सर्वत्र अन्धकार-ही-अन्धकार व्याप्त था। | पञ्चातीतस्थितं तद्वै दशैकादश एव च। उस समय सर्वप्रथम बुद्धि उत्पन्न हुई, बुद्धिसे | अर्धमासमतिक्रम्य स्थितं तत्सूर्यमण्डले। अहंकार तथा अहंकारसे आकाशादि पञ्चमहाभूतोंकी | तस्मै रूपाय ते देव प्रणताः सर्वदेवताः॥ उत्पत्ति हुई और उनसे एक अण्ड उत्पन्न हुआ, | विश्वकृद्विश्वभूतं च विश्वानरसुरार्चितम्। जिसमें सात लोक और सात समुद्रोंसहित पृथ्वी | विश्वस्थितमचिन्त्यं च यद्रूपं तस्य ते नमः॥ स्थित है। उसी अण्डमें स्वयं ब्रह्मा तथा विष्णु | परं यज्ञात्परं देवात्परं लोकात्परं दिवः। और शिव भी स्थित थे। अन्धकारसे सभी व्याकुल | दुरतिक्रमेति यः ख्यातस्तस्मादपि परम्परात्। थे। अनन्तर सब परमेश्वरका ध्यान करने लगे। | परमात्मेति विख्यातं यद्रूपं तस्य ते नमः॥ ध्यान करनेसे अन्धकारको हरण करनेवाला एक | अविज्ञेयमचिन्त्यं च अध्यात्मगतमव्ययम्। तेजःपुञ्ज प्रकट हुआ। उसे देखकर हम सभी | अनादिनिधनं देवं यद्रूपं तस्य ते नमः॥ उसकी इस प्रकार दिव्य स्तुति करने लगे— | नमो नमः कारणकारणाय नमो नमः पापविनाशनाय। आदिदेवोऽसि देवानामीश्वराणां त्वमीश्वरः। | नमो नमो वन्दितवन्दनाय नमो नमो रोगविनाशनाय॥ आदिकर्तासि भूतानां देवदेव सनातन॥ | नमो नमः सर्ववरप्रदाय नमो नमः सर्वबलप्रदाय। जीवनं सर्वसत्त्वानां देवगन्धर्वरक्षसाम्। | नमो नमो ज्ञाननिधे सदैव नमो नमः पञ्चदशात्मकाय * ॥ मुनिकिन्नरसिद्धानां तथैवोरगपक्षिणाम्॥ | (ब्राह्मपर्व १२३। ११-२४) त्वं ब्रह्मा त्वं महादेवस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापतिः। | इस प्रकार हमारी स्तुतिसे प्रसन्न हो वे तैजस-
- स्तुतिका भाव इस प्रकार है— हे सनातन देवदेव! आप ही समस्त चराचर प्राणियोंके आदि स्रष्टा एवं ईश्वरोंके ईश्वर तथा आदिदेव हैं। देवता, गन्धर्व, राक्षस, मुनि, In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth
- ब्राह्मपर्व *
९५९
रूप कल्याणकारी देव मधुर वाणीमें बोले—‘देवगण! आप क्या चाहते हैं?’ तब हमने कहा—‘प्रभो! आपके इस प्रचण्ड तस रूपको देखनेमें कोई भी समर्थ नहीं है। अतः संसारके कल्याणके लिये आप सौम्य रूप धारण करें।’ देवताओंकी ऐसी प्रार्थना सुनकर उन्होंने ‘एवमस्तु’ कहकर सभीको सुख देनेवाला उत्तम रूप धारण कर लिया।
सुमन्तु मुनिने कहा—राजन्! सांख्ययोगका आश्रय ग्रहण करनेवाले योगी आदि तथा मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुष इनका ही ध्यान करते हैं। इनके ध्यानसे बड़े-बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं। अग्निहोत्र, वेदपाठ और प्रचुर दक्षिणासे युक्त यज्ञ भी भगवान् सूर्यकी भक्तिके सोलहवीं कलाके तुल्य भी फलदायक नहीं हैं। ये तीर्थोंके भी तीर्थ, मङ्गलोंके भी मङ्गल और पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाले हैं। जो इनकी आराधना करते हैं, वे सभी पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकको प्राप्त करते हैं। वेदादि शास्त्रोंमें भगवान् दिवस्पति उपासना आदिके द्वारा जिस प्रकार सुलभ हो जाते हैं, उसी प्रकार सूर्यदेव समस्त लोकोंके उपास्य हैं।
राजा शतानीकने पूछा—मुने! देवता तथा ऋषियोंने किस प्रकार भगवान् सूर्यका सुन्दर रूप बनवाया? यह आप बतायें।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! एक समय सभी
किन्नर, सिद्ध, नाग तथा तिर्यक् योनियोंके आप ही जीवनाधार हैं। आप ही ब्रह्मा, शिव, विष्णु, प्रजापति, वायु, इन्द्र, सोम, विवरवान्, वरुण तथा काल हैं एवं जगत्के स्रष्टा, संहर्ता, पालनकर्ता और सबके शासक भी आप ही हैं। आप ही नदी, सागर, पर्वत, विद्युत, इन्द्रधनुष इत्यादि सब कुछ हैं। प्रलय, प्रभव, व्यक्त एवं अव्यक्त भी आप ही हैं। ईश्वरसे परे विद्या, विद्यासे परे शिव तथा शिवसे परतर आप परमदेव हैं। हे परमात्मन्! आपके पाणि, पाद, अक्षि, सिर, मुख सर्वत्र—चतुर्दिक् व्याप्त हैं। आपकी देदीप्यमान सहस्रों किरणें सब ओर व्याप्त हैं। भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः तथा सत्य इत्यादि समस्त लोकोंमें आपका ही प्रचण्ड एवं प्रदीप्त तेज प्रकाशित है। इन्द्रादि देवताओंसे भी दुर्निरीक्ष्य, भृगु, अत्रि, पुलह आदि ऋषियों एवं सिद्धोंद्वारा सेवित अत्यन्त कल्याणकारी एवं शान्त रूपवाले आपको नमस्कार है। हे देव! आपका वह रूप पाँच, दस अथवा एकादश इन्द्रियों आदिसे अगम्य है, उस रूपकी देवता सदा वन्दना करते रहते हैं। देव! विश्वस्रष्टा, विश्वमें स्थित तथा विश्वभूत आपके अचिन्त्य रूपकी इन्द्रादि देवता अर्चना करते रहते हैं। आपके उस रूपको नमस्कार है। नाथ! आपका रूप यज्ञ, देवता, लोक, आकाश—इन सबसे परे है, आप दुरतिक्क्रम नामसे विख्यात हैं, इससे भी परे आपका अनन्त रूप है, इसीलिये आपका रूप परमात्मा नामसे प्रसिद्ध है। ऐसे रूपवाले आपको नमस्कार है। हे अनादिनिधन ज्ञाननिधे! आपका रूप अविज्ञेय, अचिन्त्य, अव्यय एवं अध्यात्मगत है, आपको नमस्कार है। हे कारणोंके कारण, पाप एवं रोगके विनाशक, वन्दितोंके भी वन्ध, पञ्चदशात्मक, सभीके लिये श्रेष्ठ वरदाता तथा सभी प्रकारके बल देनेवाले! आपको सदा बार-बार नमस्कार है।
ऋषियोंने ब्रह्मलोकमें जाकर ब्रह्माजीसे प्रार्थना की कि ‘ब्रह्मन्! अदितिके पुत्र सूर्यनारायण आकाशमें अति प्रचण्ड तेजसे तप रहे हैं। जिस प्रकार नदीका किनारा सूख जाता है, वैसे ही अखिल जगत् विनाशको प्राप्त हो रहा है, हम सब भी अति पीड़ित हैं और आपका आसन कमल-पुष्प भी सूख रहा है, तीनों लोकोंमें कोई सुखी नहीं है, अतः आप ऐसा उपाय करें, जिससे यह तेज शान्त हो जाय।’
ब्रह्माजीने कहा—मुनीश्वरो! सभी देवताओंके साथ आप और हम सब सूर्यनारायणकी शरणमें जायँ, उसीमें सबका कल्याण है। ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकर सभी देवता और ऋषिगण उनकी शरणमें गये और उन्होंने भक्तिभावपूर्वक नम्र होकर अनेक प्रकारसे उनकी स्तुति की। देवताओंकी स्तुतिसे सूर्यनारायण प्रसन्न हो गये।
सूर्यभगवान् बोले—आपलोग वर माँगिये। उस समय देवताओंने यही वर माँगा कि ‘प्रभो! आपके तेजको विश्वकर्मा कम कर दें, ऐसी आप आज्ञा प्रदान करें।’ इन्होंने देवताओंकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। तब विश्वकर्माने उनके तेजको तराश कर कम किया। इसी तेजसे भगवान् विष्णुका चक्र और अन्य देवताओंके शूल, शक्ति, गदा,
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१५२ * संक्षिप्त भविष्यपुराण *
वज्र, बाण, धनुष, दुर्गा आदि देवियोंके आभूषण तथा शिविका (पालकी), परशु आदि आयुध बनाकर विश्वकर्माने उन्हें देवताओंको दिया।
भगवान् सूर्यका तेज सौम्य हो जानेसे तथा उत्तम-उत्तम आयुध प्राप्त कर देवता अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने पुनः उनकी भक्तिपूर्वक स्तुति की।
देवताओंकी स्तुतिसे प्रसन्न हो भगवान् सूर्यने और भी अनेक वर उन्हें प्रदान किये। अनन्तर देवताओंने परस्पर विचार किया कि दैत्यगण वर पाकर अत्यन्त अभिमानी हो गये हैं। वे अवश्य भगवान् सूर्यको हरण करनेका प्रयत्न करेंगे। इसलिये उन सबको नष्ट करनेके लिये तथा इनकी रक्षाके लिये हमें चाहिये कि हम इनके चारों ओर खड़े हो जायँ, जिससे ये दैत्य सूर्यको देख न सकें। ऐसा विचारकर स्कन्द दण्डनायकका रूप धारण कर भगवान् सूर्यके बायीं ओर स्थित हो गये। भगवान् सूर्यने दण्डनायकको जीवोंके शुभाशुभ कर्मोंको लिखनेका निर्देश दिया। दण्डका निर्णय करने तथा दण्डनीतिका निर्धारण करनेसे दण्डनायक नाम पड़ा। अग्निदेव पिंगलवर्णके होनेके कारण पिंगल नामसे प्रसिद्ध हुए और सूर्यभगवान्की दाहिनी ओर स्थित हुए। इसी प्रकार दोनों पार्श्वोंमें दो अश्विनीकुमार स्थित हुए। वे अश्वरूपसे उत्पन्न होनेके कारण अश्विनीकुमार कहलाये। महाबलशाली राज्ञ और श्रौष दो द्वारपाल हुए। राज्ञ कार्तिकेयके और श्रौष हरके अवतार कहे गये हैं। लोकपूज्य ये दोनों द्वारपाल धर्म और अर्थके रूपमें प्रथम द्वारपर रहते हैं। दूसरे द्वारपर कल्माष और पक्षी ये दो द्वारपाल रहते हैं। इनमेंसे कल्माष यमराजके रूप हैं और पक्षी गरुडरूप हैं। ये दोनों दक्षिण दिशामें स्थित हैं। कुबेर और विनायक उत्तरमें तथा दिण्डी और रेवन्त पूर्व दिशामें स्थित हैं। दिण्डी रुद्ररूप हैं और रेवन्त भगवान् सूर्यके पुत्र हैं। ये सब देवता दैत्योंको मारनेके लिये सूर्यनारायणके चारों ओर स्थित हैं और सुन्दर रूपवाले, विरूप, अन्यरूप और कामरूप हैं तथा अनेक प्रकारके आयुध धारण किये हैं। चारों वेद भी उत्तम रूप धारणकर भगवान् सूर्यके चारों ओर स्थित हैं। (अध्याय १२१—१२४)
श्रीसूर्यनारायणके आयुध—व्योमका लक्षण और माहात्म्य
**सुमन्तु मुनिने कहा—**राजन्! अब भगवान् सूर्यके मुख्य आयुध व्योमका लक्षण कहता हूँ, उसे आप सुनें।
भगवान् सूर्यका आयुध व्योम सर्वदेवमय है, वह चार शृङ्गोंसे युक्त है तथा सुवर्णका बना हुआ है। जिस प्रकार वरुणका पाश, ब्रह्माका हुंकार, विष्णुका चक्र, त्र्यम्बकका त्रिशूल तथा इन्द्रका आयुध वज्र है, उसी प्रकार भगवान् सूर्यका आयुध व्योम है। उस व्योममें ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, दस विश्वेदेव*, आठ वसुगण तथा दो अश्विनीकुमार—ये सभी अपनी-अपनी कलाओंके साथ स्थित हैं। हर, शर्व, त्र्यम्बक, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, रैवत, अपराजित, ईश्वर, अहिर्बुध्न्य और भुवन (भव)—ये ग्यारह रुद्र हैं। ध्रुव, धर, सोम, अनिल, अनल, अप्, प्रत्यूष और प्रभास—ये आठ वसु हैं। नासत्य और दस्र—ये दो अश्विनीकुमार हैं। क्रतु, दक्ष, वसु, सत्य, काल, काम, धृति, कुरु, शंकुमात्र तथा वामन—ये दस विश्वेदेव हैं।
* अन्य सभी पुराणोंमें विश्वेदेवोंकी संख्या कहीं दस, कहीं बारह, कहीं तेरह बतलायी गयी है। विशेष जानकारीके लिये 'कल्याण' विशेषाङ्क 'देवताङ्क' देखना चाहिये।
- ब्राह्मपर्व *
१५३
इसी प्रकार साध्य, तुषित, मरुत् आदि देवता हैं। इनमें आदित्य और मरुत कश्यपके पुत्र हैं। विश्वेदेव, वसु और साध्य—ये धर्मके पुत्र हैं। धर्मका तीसरा पुत्र वसु (सोम) है और ब्रह्माजीका पुत्र धर्म है।
स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत और चाक्षुष—ये छः मनु तो व्यतीत हो गये हैं, वर्तमानमें सप्तम वैवस्वत मनु हैं। अर्कसावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, धर्मसावर्णि, दक्षसावर्णि, रौच्य और भौत्य—ये सब मनु आगे होंगे। इन चौदहों मन्वन्तरोंमें इन्द्रोंके नाम इस प्रकार हैं—विष्णुभुक्, विद्युति, विभु, प्रभु, शिखी तथा मनोजव—ये छः इन्द्र व्यतीत हो गये हैं। ओजस्वी नामक इन्द्र वर्तमानमें हैं। बलि, अद्भुत, त्रिदिव, सुसात्त्विक, कीर्ति, शतधामा तथा दिवस्पति—ये सात इन्द्र आगे होंगे। कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, भरद्वाज, गौतम, विश्वामित्र और जमदग्नि—ये सप्तर्षि हैं। प्रवह, आवह, उद्ग्रह, संवह, विवह, निवह और परिवह—ये सात मरुत् हैं। (प्रत्येकमें सात-सात मरुदृगणोंका समूह है)। ये उनचास मरुत् आकाशमें पृथक्-पृथक् मार्गसे चलते हैं। सूर्याग्निका नाम शुचि, वैद्युत अग्निका नाम पावक और अरणि-मन्थनसे उत्पन्न अग्निका नाम पवमान है। ये तीन अग्नियाँ हैं। अग्नियोंके पुत्र-पौत्र उनचास हैं और मरुत् भी उनचास ही हैं। संवत्सर, परिवत्सर, इद्वत्सर (इडावत्सर) अनवत्सर और वत्सर—ये पाँच संवत्सर हैं—ये ब्रह्माजीके पुत्र हैं। सौम्य, बर्हिषद् और अग्निष्वात्—ये तीन पितर हैं। सूर्य, सोम, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु—ये नव ग्रह हैं। ये सदा जगत्का भाव-अभाव सूचित करते हैं। इनमें सूर्य और चन्द्र मण्डलग्रह, भौमादि पाँच ताराग्रह और राहु-केतु छायाग्रह कहलाते हैं। नक्षत्रोंके अधिपति चन्द्रमा हैं और ग्रहोंके राजा सूर्य हैं। सूर्य कश्यपके पुत्र हैं, सोम धर्मके, बुध चन्द्रके,
गुरु और शुक्र प्रजापति भृगुके, शनि सूर्यके, राहु सिंहिकाके और केतु ब्रह्माजीके पुत्र हैं।
पृथ्वीको भूलोक कहते हैं। भूलोकके स्वामी अग्नि, भुवलोकके वायु और स्वर्लोकके स्वामी सूर्य हैं। मरुदृगण भुवलोकमें रहते हैं और रुद्र, अश्विनीकुमार, आदित्य, वसुगण तथा देवगण स्वर्लोकमें निवास करते हैं। चौथा महर्लोक है, जिसमें प्रजापतियोंसहित कल्पवासी रहते हैं। पाँचवें जनलोकमें भूमिदान करनेवाले तथा छठे तपोलोकमें ऋभु, सनत्कुमार तथा वैराज आदि ऋषि रहते हैं। सातवें सत्यलोकमें वे पुरुष रहते हैं, जो जन्म-मरणसे मुक्ति पा जाते हैं। इतिहास-पुराणके वक्ता तथा श्रोता भी उस लोकको प्राप्त करते हैं। इसे ब्रह्मलोक भी कहा गया है, इसमें न किसी प्रकारका विघ्न है न किसी प्रकारकी बाधा।
देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, नाग, भूत, और विद्याधर—ये आठ देवयोनियाँ हैं। इस प्रकार इस व्योममें सातों लोक स्थित हैं। मरुत्, पितर, अग्नि, ग्रह और आठों देवयोनियाँ तथा मूर्त, अमूर्त सब देवता इसी व्योममें स्थित हैं। इसलिये जो भक्ति और श्रद्धासे व्योमका पूजन करता है, उसे सब देवताओंके पूजनका फल प्राप्त हो जाता है तथा वह सूर्यलोकको जाता है। अतः अपने कल्याणके लिये सदा व्योमका पूजन करना चाहिये।
महीपते! आकाश, ख, दिक्, व्योम, अन्तरिक्ष, नभ, अम्बर, पुष्कर, गगन, मेरु, विपुल, बिल, आपोछिद्र, शून्य, तमस, रोदसी—व्योमके इतने नाम कहे गये हैं। लवण, क्षीर, दधि, घृत, मधु, इक्षु तथा सुस्वादु (जलवाला)—ये सात समुद्र हैं। हिमवान्, हेमकूट, निषध, नील, श्वेत, शृङ्गवान्—ये छः वर्षपर्वत हैं। इनके मध्य महाराजत नामक पर्वत है। माहेन्द्री, आग्रेयी, याम्या, नैऋन्ती, वारुणी, वायवी, सौम्या तथा ईशानी—ये देवनगरियाँ ऊपर
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
समाश्रित है। पृथ्वीके ऊपर लोकालोक पर्वत है। अनन्तर अण्डकपाल, इससे परे अग्नि, वायु, आकाश आदि भूत कहे गये हैं। इससे परे महान् अहंकार, अहंकारसे परे प्रकृति, प्रकृतिसे परे पुरुष और इस पुरुषसे परे ईश्वर है, जिससे यह सम्पूर्ण जगत् आवृत है। भगवान् भास्कर ही ईश्वर हैं, उनसे यह जगत् परिव्याप्त है। ये सहस्रों किरणवाले, महान् तेजस्वी, चतुर्बाहु एवं महाबली हैं।
भूलोक, भूवलोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक—ये सात लोक कहे गये हैं। भूमिके नीचे जो सात लोक हैं, वे इस प्रकार हैं—तल, सुतल, पाताल, तलातल, अतल, वितल और रसातल। काञ्चन मेरु पर्वत भूमण्डलके मध्यमें फैला हुआ चार रमणीय शृङ्गोंसे युक्त तथा सिद्ध-गन्धर्वोंसे सुसेवित है। इसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है। यह सोलह हजार योजन भूमिमें नीचे प्रविष्ट है। इस प्रकार सब मिलाकर एक लाख योजन मेरुपर्वतका मान है। उसका सौमनस, नामका प्रथम शृङ्ग सुवर्णका है, ज्योतिष्क नामका द्वितीय शृङ्ग पद्मराग मणिका है। चित्र नामका तृतीय शृङ्ग सर्वधातुमय है और चन्द्रौजस्क नामक चतुर्थ शृङ्ग चाँदीका है। गाङ्ग्रेय नामक प्रथम सौमनस शृङ्गपर भगवान् सूर्यका उदय होता है, सूर्योदयसे ही सब लोग देखते हैं, अतः उसका नाम उदयाचल है। उत्तरायण होनेपर सौमनस
शृङ्गसे और दक्षिणायन होनेपर ज्योतिष्क शृङ्गसे भगवान् सूर्य उदित होते हैं। मेघ और तुला-संक्रान्तियोंमें मध्यके दो शृङ्गोंमें सूर्यका उदय होता है। इस पर्वतके ईशानकोणमें ईश और अग्निकोणमें इन्द्र, नैऋत्यकोणमें अग्नि और वायव्यकोणमें मरुत् तथा मध्यमें साक्षात् ब्रह्मा, ग्रह एवं नक्षत्र स्थित हैं। इसे व्योम कहते हैं। व्योममें सूर्यभगवान् स्वयं निवास करते हैं, अतः यह व्योम सर्वदेवमय और सर्वलोकमय है। राजन्! पूर्वकोणमें स्थित शृङ्गपर शुक्र हैं, दूसरे शृङ्गपर हेलिज (शनि), तीसरेपर कुबेर, चौथे शृङ्गपर सोम हैं। मध्यमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव स्थित हैं। पूर्वोत्तर शृङ्गपर पितृगण और लोकपूजित गोपति महादेव निवास करते हैं। पूर्वाग्रिय शृङ्गपर शाण्डिल्य निवास करते हैं। अनन्तर महातेजस्वी हेलिपुत्र यम निवास करते हैं। नैऋत्यकोणके शृङ्गमें महाबलशाली विरूपाक्ष निवास करते हैं। उसके बाद वरुण स्थित हैं, अनन्तर महातेजस्वी महाबली वीरमित्र निवास करते हैं। सभी देवोंके नमस्कार्य वायव्य शृङ्गका आश्रयण कर नरवाहन कुबेर निवास करते हैं। मध्यमें ब्रह्मा, नीचे अनन्त, उपेन्द्र और शंकर अवस्थित हैं। इसीको मेरु, व्योम और धर्म भी कहा जाता है। यह व्योमस्वरूप मेरु वेदमय नामसे प्रसिद्ध है। चारों शृङ्ग चारों वेदस्वरूप हैं। (अध्याय १२५-१२६)
साम्बद्वारा भगवान् सूर्यकी आराधना, कुष्ठुरोगसे
मुक्ति तथा सूर्यस्तवराजका कथन
राजा शतानीकने पूछा—मुने! साम्बने किस प्रकार भगवान् सूर्यकी आराधना की और उस भयंकर रोगसे कैसे मुक्ति पायी? इसे आप कृपाकर बतायें।
सुमन्तु मुनिने कहा—राजन्! आपने बहुत
उत्तम कथा पूछी है। इसका मैं विस्तारसे वर्णन करता हूँ, इसके सुननेसे सभी पाप दूर हो जाते हैं। नारदजीके द्वारा सूर्यभगवान्का माहात्म्य सुनकर साम्बने अपने पिता श्रीकृष्णचन्द्रके पास जाकर विनयपूर्वक प्रार्थना की—'भगवन्! मैं अत्यन्त
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- ब्राह्मपर्व *
१५५
दारुण रोगसे ग्रस्त हूँ। वैद्योंद्वारा बहुत ओषधियोंका सेवन करनेपर भी मुझे शान्ति नहीं मिल रही है। अब आप आज्ञा दें कि मैं वनमें जाकर तपस्याद्वारा अपने इस भयंकर रोगसे छुटकारा प्राप्त करूँ।' पुत्रका वचन सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने आज्ञा दे दी और साम्ब अपने पिताकी आज्ञाके अनुसार सिन्धुके उत्तरमें चन्द्रभागा नदीके तटपर लोकप्रसिद्ध मित्रवन नामके सूर्यक्षेत्रमें जाकर तपस्या करने लगे। वे उपवास करते हुए सूर्यकी आराधनामें तत्पर हो गये। उन्होंने इतना कठोर तप किया कि उनका अस्थिमात्र ही शेष रह गया। वे प्रतिदिन इस गुहा स्तोत्रसे दिव्य, अव्यय एवं प्रकाशमान आदित्यमण्डलमें स्थित भगवान् भास्करकी स्तुति करने लगे—
प्रजापति परमात्मन्! आप तीनों लोकोंकेनेत्र-स्वरूप हैं, सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि हैं, अतः आदित्य नामसे विख्यात हैं। आप इस मण्डलमें महान् पुरुषरूपमें देदीप्यमान हो रहे हैं। आप ही अचिन्त्यस्वरूप विष्णु और पितामह ब्रह्मा हैं। रुद्र, महेन्द्र, वरुण, आकाश, पृथ्वी, जल, वायु, चन्द्र, मेघ, कुबेर, विभावसु, यमके रूपमें इस मण्डलमें देदीप्यमान पुरुषके रूपसे आप ही प्रकाशित हैं। यह आपका साक्षात् महादेवमय वृत्त अण्डके समान है। आप काल एवं उत्पत्तिस्वरूप हैं। आपके मण्डलके तेजसे सम्पूर्ण पृथ्वी व्याप्त हो रही है। आप सुधाकी वृष्टिसे सभी प्राणियोंको
परिपुष्ट करते हैं। विभावसो! आप ही अन्तःस्थ म्लेच्छजातीय एवं पशु-पक्षीकी योनिमें स्थित प्राणियोंकी रक्षा करते हैं। गलित कुछ आदि रोगोंसे ग्रस्त तथा अन्ध और बधिरोंको भी आप ही रोगमुक्त करते हैं। देव! आप शरणागतके रक्षक हैं। संसार-चक्र-मण्डलमें निमग्र निर्धन, अत्यायु व्यक्तियोंकी भी सर्वदा आप रक्षा करते हैं। आप प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं। आप अपनी लीलामात्रसे ही सबका उद्धार कर देते हैं। आर्त और रोगसे पीड़ित मैं स्तुतियोंके द्वारा आपकी स्तुति करनेमें असमर्थ हूँ। आप तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदिसे सदा स्तुत होते रहते हैं। महेन्द्र, सिद्ध, गन्धर्व, अप्सरा, गुह्यक आदि स्तुतियोंके द्वारा आपकी सदा आराधना करते रहते हैं। जब ऋक्, यजु और सामवेद तीनों आपके मण्डलमें ही स्थित हैं तो दूसरी कौन-सी पवित्र अन्य स्तुति आपके गुणोंका पार पा सकती है? आप ध्यानियोंके परम ध्यान और मोक्षार्थियोंके मोक्षद्वार हैं। अनन्त तेजोराशिसे सम्पन्न आप नित्य अचिन्त्य, अक्षोभ्य, अव्यक्त और निष्कल हैं। जगत्पते! इस स्तोत्रमें जो कुछ भी मैंने कहा है, इसके द्वारा आप मेरी भक्ति तथा दुःखमय परिस्थिति (कुष्ठरोगकी बात)-को जान लें और मेरी विपत्तिको दूर करें*।
सूर्यभगवान्ने कहा—जाम्बवतीपुत्र! मैं तुम्हारी स्तुतिसे प्रसन्न हूँ, वत्स! मुझसे जो तुम चाहते हो वह कहो।
- आदिरेष हि भूतानामादित्य इति संज्ञितः। त्रैलोक्यचक्षुरेवात्र परमात्मा प्रजापतिः ॥ एष वै मण्डले ह्यस्मिन् पुरुषो दीप्यते महान्। एष विष्णुरचिन्त्यात्मा ब्रह्मा चैष पितामहः ॥ रुद्रो महेन्द्रो वरुण आकाशं पृथिवीं जलम्। वायुः शशाङ्कः पर्जन्यो धनाध्यक्षो विभावसुः ॥ य एष मण्डले ह्यस्मिन् पुरुषो दीप्यते महान्। एकः साक्षान्महादेवो वृत्रमण्डनिभः सदा ॥ कालो ह्येष महाबाहुर्निबोधोत्पलितक्षणः। य एष मण्डले ह्यस्मिन्तेजोभिः पूर्यन् महोम् ॥ भ्राम्यते ह्यव्यवच्छिन्नो वातैर्योऽमृतलक्षणः। नातः परतरं किंचित् तेजसा विद्यते क्वचित् ॥ पुण्याति सर्वभूतानि एष एव सुधामृतैः। अन्तःस्थान् म्लेच्छजातीयास्तिर्यग्योनिगतानपि ॥ कारुण्यात् सर्वभूतानि पासि त्वं च विभावसो। क्षिप्रकुष्ठग्रन्थबधिरान् पंगुरुचापि तथा विभो ॥ प्रपन्नवत्सलो देव कुरुते नीरुजो भवान्। चक्रमण्डलमग्नांश्च निर्धनात्यायुपस्तथा ॥
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१५६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
साम्बने कहा—भगवन्! आपके चरणोंमें मेरी दृढ़ भक्ति हो, यही वर चाहता हूँ।
सूर्यभगवान्ने कहा—ऐसा ही होगा! मैं तुमसे बहुत संतुष्ट हूँ, सुब्रत! द्वितीय वर माँगो।
साम्बने कहा—भगवन्! मेरे शरीरमें रहनेवाला यह मल—कुछ आपकी कृपासे दूर हो जाय, गोपते! मेरा शरीर सर्वथा शुद्ध निर्मल हो जाय।
भगवान् सूर्यने कहा—ऐसा ही होगा।
भगवान् सूर्यके ऐसा कहते ही साम्बके शरीरसे कुछरोग वैसे ही दूर हो गया जैसे सर्पके शरीरसे केंचुल। वह दिव्य रूपसम्पन्न हो गया। साम्ब भगवान् सूर्यको प्रणामकर उनके सम्मुख खड़े हो गये।
सूर्यदेवने कहा—साम्ब! प्रसन्न होकर मैं और भी वर देता हूँ। आजसे मेरा यह स्थान तुम्हारे नामसे प्रसिद्ध होगा। लोकमें तुम्हारी अक्षय कीर्ति होगी। जो व्यक्ति तुम्हारे नामसे मेरा स्थान बनायेगा, उसे सनातन लोक प्राप्त होगा। इस चन्द्रभागा नदीके तटपर मेरी स्थापना करो। मैं तुझे स्वप्रमें दर्शन देता रहूँगा। इतना कहकर सूर्यभगवान् प्रत्यक्ष दर्शन देकर अन्तर्धान हो गये।
इस साम्बकृत स्तोत्रको जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक तीनों कालमें पढ़ता है अथवा सात दिनोंमें एक सौ इक्कीस बार पाठ और हवन करता है तो राज्यकी कामना करनेवाला राज्य, धनकी कामना करनेवाला धन प्राप्त कर लेता है और रोगसे
पीड़ित व्यक्ति वैसे ही रोगमुक्त हो जाता है, जैसे साम्ब कुछरोगसे मुक्त हो गये।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! तपस्याके समय रोगसे दुर्बल साम्बने सूर्यकी स्तुति उनके सहस्रनामसे की थी। उसे दुःखी देखकर स्वप्नमें भगवान् सूर्यने साम्बसे कहा—‘साम्ब! सहस्रनामसे मेरी स्तुति करनेकी आवश्यकता नहीं है। मैं अपने अतिशय गोपनीय, पवित्र और इक्कीस शुभ नामोंको बताता हूँ। प्रयत्नपूर्वक उन्हें ग्रहण करो, उनके पाठ करनेसे सहस्रनामके पाठका फल प्राप्त होगा। मेरे इक्कीस नाम इस प्रकार हैं—
(१) विकर्तन (विपत्तियोंको काटने तथा नष्ट करनेवाले), (२) विवस्वान् (प्रकाश-रूप), (३) मार्तण्ड (जिन्होंने अण्डमें बहुत दिन निवास किया), (४) भास्कर, (५) रवि, (६) लोकप्रकाशक, (७) श्रीमान्, (८) लोकचक्षु, (९) ग्रहेश्वर, (१०) लोकसाक्षी, (११) त्रिलोकेश, (१२) कर्ता, (१३) हर्ता, (१४) तमिस्त्रहा (अन्धकारको नष्ट करनेवाले), (१५) तपन, (१६) तापन, (१७) शुचि (पवित्रतम), (१८) सप्ताश्ववाहन, (१९) गभस्तिहस्त (किरणें ही जिनके हाथस्वरूप हैं), (२०) ब्रह्मा और (२१) सर्वदेवनमस्कृत।*
साम्ब! ये इक्कीस नाम मुझे अतिशय प्रिय हैं। यह स्तवराजके नामसे प्रसिद्ध है। यह स्तवराज
प्रत्यक्षदर्शी त्वं देव समुद्धरसि लीलया । का मे शक्तिः स्तवैः स्तोतुमार्तोऽहं रोगपीडितः ॥ स्युसे त्वं सदा देवैर्बहाविष्णुशिवादिभिः । महैन्द्रसिद्धगन्धर्वैरप्सरोभिः सगृह्यैः ॥ स्तुतिभिः किं पवित्रैर्वा तव देव समीरितैः । यस्य ते ऋगयजुःसाम्रां त्रितयं मण्डलस्थितम् ॥ ध्यानिनां त्वं परं ध्यानं मोक्षद्वारं च मोक्षिणाम् । अनन्ततेजसाक्षोभ्यो ह्यचिन्त्याव्यक्तनिष्कलः ॥ यदयं व्याहतः किंचित् स्तोत्रेऽस्मिञ्जगतः पतिः । आर्तिं भक्तिं च विज्ञाय तत्सर्वं ज्ञातुमर्हसि ॥
(ब्राह्मपर्व १२७।१०—१३)
- वैकर्तनो विवस्वांश्च मार्तण्डो भास्करो रविः । लोकप्रकाशकः श्रीमौल्लोकचक्षुग्रहेश्वरः ॥ लोकसाक्षी त्रिलोकेशः कर्ता हर्ता तमिस्त्रहा । तपनस्तापनश्वैव शुचिः सप्ताश्ववाहनः ॥ गभस्तिहस्तो ब्रह्मा च सर्वदेवनमस्कृतः ।
(ब्राह्मपर्व १२८।५—७)
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- ब्राह्मपर्व *
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शरीरको नीरोग बनानेवाला, धनकी वृद्धि करनेवाला और यशस्कर है एवं तीनों लोकोंमें विख्यात है। महाबाहो! इन नामोंसे उदय और अस्त दोनों संध्याओंके समय प्रणत होकर जो मेरी स्तुति करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। मानसिक, वाचिक और शारीरिक जो भी दुष्कृत हैं, वे सभी एक बार मेरे सम्मुख इसका जप करनेसे विनष्ट हो जाते हैं। यही मेरे लिये जपने योग्य तथा हवन एवं संध्योपासना है। बलिमन्त्र,
अर्घ्यमन्त्र, धूपमन्त्र इत्यादि भी यही है। अन्नप्रदान, स्नान, नमस्कार, प्रदक्षिणामें यह महामन्त्र प्रतिष्ठित होकर सभी पापोंका हरण करनेवाला और शुभ करनेवाला है। यह कहकर जगत्पति भगवान् शास्कर कृष्णपुत्र साम्बको उपदेश देकर वहीं अन्तर्धान हो गये। साम्ब भी इस स्तवराजसे ससाश्ववाहन शास्करकी स्तुति कर नीरोग, श्रीमान् और उस भयंकर शारीरिक रोगसे सर्वथा मुक्त हो गये। (अध्याय १२७-१२८)
साम्बको सूर्य-प्रतिमाकी प्राप्ति
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! इस प्रकार साम्ब सूर्यनारायणसे वर प्राप्तकर अतिशय प्रसन्न हुए और वर-प्राप्तिको आश्चर्य मानते हुए अन्य तपस्वियोंके साथ समीपमें स्थित चन्द्रभागा नदीमें स्नान करनेके लिये गये। वहाँ वे स्नानकर श्रद्धाके साथ अपने हृदयमें मण्डलाकार भगवान् सूर्यकी भावना कर मनमें यह सोचने लगे कि 'सूर्यनारायणकी कैसी प्रतिमा हो और उसे किस प्रकार कहाँ स्थापित करूँ।' इस प्रकार विचार कर ही रहे थे कि उन्होंने देखा—चन्द्रभागा नदीके ऊपरसे एक अत्यन्त देदीप्यमान प्रतिमा बहती हुई चली आ रही है। प्रतिमा देखकर साम्बको यह निश्चय हो गया कि यह भगवान् सूर्यकी ही मूर्ति है। जैसी उन्होंने आज्ञा दी थी, वही यह सूर्य-प्रतिमा है, इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं। यह सोचकर नदीसे उस तेजसे चमकती हुई मूर्तिको निकालकर उन्होंने मित्रवन (मुल्लान)-में एक स्थानपर तपस्वियोंके साथ विधिपूर्वक उसकी स्थापना की। एक दिन साम्बने सूर्य-प्रतिमाको प्रणामकर पूछा—'नाथ! आपकी यह प्रतिमा किसने बनायी? इसकी आकृति बड़ी सुन्दर है।' आप कृपाकर बतायें।
प्रतिमा बोली—साम्ब! पूर्वकालमें मेरा रूप प्रचण्ड तेजोमय था। उससे व्याकुल होकर सभी देवताओंने प्रार्थना की कि 'आप अपना रूप सभी प्राणियोंके सहन करनेके योग्य बनायें, नहीं तो सभी लोग जल जायेंगे।' मैंने महातपस्वी विश्वकर्माको आदेश दिया कि मेरे तेजको कम कर मेरा निर्माण करो। मेरा आदेश प्राप्त कर उन्होंने शाकद्वीपमें चक्रको घुमाकर मेरे तेजको खराद दिया। उसी विश्वकर्माने कल्पवृक्षके काष्ठसे यह मेरी सुलक्षण प्रतिमा बनायी है। तुम्हारा उद्धार करनेके लिये मेरी आज्ञाके अनुसार विश्वकर्माने ही सिद्धसेवित हिमालयपर इसे निर्मितकर चन्द्रभागा नदीमें प्रवाहित कर दिया है। साम्ब! यह स्थान बड़ा शुभ है, सुन्दर है। यहाँ सदा मेरा सांनिध्य रहेगा। प्रातः मनुष्यगण इत चन्द्रभागाके तटपर मेरा सांनिध्य प्राप्त करेंगे। मध्याह्नमें कालप्रियमें (कालपीमें) और अनन्तर यहाँ प्रतिदिन मेरा दर्शन प्राप्त करेंगे। पूर्वह्र्ममें ब्रह्मा, मध्याह्नमें विष्णु और अपराह्नमें शंकर सदा पूजा करेंगे। महाबाहो! इस प्रकार भगवान् सूर्यके ऐसा कहनेपर साम्ब अत्यन्त प्रसन्न हुए और भगवान् सूर्य भी अन्तर्धान हो गये। (अध्याय १२९)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
मन्दिर-निर्माण-योग्य भूमि एवं मन्दिरमें
प्रतिमाओंके स्थानका निरूपण
राजा शतानीकने पूछा—मुने! साम्बने भगवान् सूर्यकी प्रतिमाकी प्रतिष्ठा किस प्रकार की ? किसके कथनानुसार उन्होंने भगवान् आदित्यके प्रासादका निर्माण कराया।
सुमनु मुनि बोले—चन्द्रभागा नदीसे प्रतिमा प्राप्त करनेके बाद साम्बने देवर्षि नारदका स्मरण किया। स्मरण करते ही वे वहाँ उपस्थित हो गये। साम्बने विधिवत् उनका पूजन-सत्कार आदि करके उनसे पूछा—‘महाराज! भगवान्के मन्दिरको जो बनवाता है तथा प्रतिमाकी जो प्रतिष्ठा करता है, उन दोनोंका क्या फल है ?’
नारदजीने कहा—नरशार्दूल! जो रमणीय स्थानमें सूर्य-मन्दिरका निर्माण कराता है, वह व्यक्ति सूर्यलोकमें जाता है, इसमें संदेह नहीं।
साम्बने पूछा—सूर्य-मन्दिरका निर्माण किस प्रकार तथा किस स्थानपर कराना चाहिये ? आप इसे बतायें।
नारद बोले—जहाँ जलराशि निरन्तर विद्यमान रहे, वहाँ मन्दिर बनवाना चाहिये अर्थात् सर्वप्रथम एक विशाल जलाशयका निर्माण कराना चाहिये। यश और धर्मकी अभिवृद्धिके लिये वहाँ देवमन्दिरका निर्माण कराना चाहिये। उसके समीप उद्यान एवं पुष्पवाटिका भी लगवाने चाहिये। ब्राह्मण आदि वर्णोंके लिये जैसी भूमि वास्तुशास्त्रकी दृष्टिसे प्रासाद-निर्माणके लिये वर्णित है, वैसी ही भूमि देवप्रासादके लिये भी प्रशस्त मानी गयी है।
सूर्यनारायणका मन्दिर पूर्वाभिमुख बनवाना चाहिये, पूर्वकी ओर द्वार रखनेका स्थान न हो तो पश्चिमाभिमुख बनवाये। परंतु मुख्य पूर्वाभिमुख ही है। स्थानकी इस प्रकारसे कल्पना करे कि
मुख्य मन्दिरसे दक्षिणकी ओर भगवान् सूर्यका स्नान-गृह और उत्तरकी ओर यज्ञशाला रहे। भगवान् शिव और मातृकाका मन्दिर उत्तराभिमुख, ब्रह्माका पश्चिम और विष्णुका उत्तर-मुख बनवाना चाहिये। भगवान् सूर्यके दाहिने पार्श्वमें निखुभा तथा बायें पार्श्वमें राज्ञीको स्थापित करना चाहिये। सूर्यनारायणके दक्षिणभागमें पिङ्गल, वामभागमें दण्डनायक, सम्मुख श्री और महाश्वेताकी स्थापना करनी चाहिये। देवगृहके बाहर अश्विनीकुमारोंका स्थान बनाना चाहिये। मन्दिरके दूसरे कक्षमें राज्ञ और श्रोष, तीसरे कक्षमें कल्माष और पक्षी, दक्षिणमें दण्ड और माठर, उत्तरमें लोकपूजित कुबेरको स्थापित करना चाहिये। कुबेरसे उत्तर रेवन्त एवं विनायककी स्थापना करनी चाहिये या जिस दिशामें उत्तम स्थान हो वहीपर उनकी स्थापना करे। दाहिनी एवं बायीं ओर अर्घ्य प्रदान करनेके लिये दो मण्डल बनवाये। उदयके समय दक्षिण मण्डलमें और अस्तके समय वाम मण्डलमें भगवान्को अर्घ्य दे। चक्राकार पीठके ऊपर स्नानगृहमें चार कलशोंसे भगवान् सूर्यकी प्रतिमाको सविधि स्नान कराये। स्नानके समय शङ्खु आदि मङ्गल वाद्य बजाने चाहिये। तीसरे मण्डलमें सूर्यनारायणकी पूजा करे। सूर्यनारायणके सामने दिण्डीकी स्थानक (खड़ी हुई) प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये। सूर्यनारायणके सम्मुख समीपमें ही सर्वदेवमय व्योमकी रचना करनी चाहिये। मध्याह्नके समय वहाँ सूर्यको अर्घ्य देना चाहिये अथवा मध्याह्नमें अर्घ्य देनेके लिये चन्द्र नामक तृतीय मण्डल बनाये। प्रथम स्नान कराकर बादमें अर्घ्य दे। भगवान् सूर्यके समीप ही उचित स्थानपर पुराणका पाठ करनेके
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- ब्राह्मपर्व *
१५९
लिये स्थान बनाना चाहिये। यह देवताओंके स्थापनका विधान है। गृहराज और सर्वतोभद्र—ये दो प्रासाद
सूर्यनारायणको अतिशय प्रिय हैं।
(अध्याय १३०)
सात प्रकारकी प्रतिमा एवं काष्ठ-प्रतिमाके
निर्माणोपयोगी वृक्षोंके लक्षण
नारदजी बोले—साम्ब! अब मैं विस्तारके साथ प्रतिमा-निर्माणका विधान बतलाता हूँ। भक्तोंके कल्याणकी अभिवृद्धिके लिये भगवान् सूर्यकी प्रतिमा सात प्रकारकी बनायी जा सकती है। सोना, चाँदी, ताम्र, पाषाण, मृत्तिका, काष्ठ तथा चित्रलिखित। इनमें काष्ठकी प्रतिमाके निर्माणका विधान इस प्रकार है—
नक्षत्र तथा ग्रहोंकी अनुकूलता एवं शुभ शकुन देखकर मङ्गलस्मरणपूर्वक काष्ठ-ग्रहण करनेके लिये वनमें जाकर प्रतिमोपयोगी वृक्षका चयन करना चाहिये। दूधवाले वृक्ष, कमजोर वृक्ष, चौराहे, देवस्थान, वल्मीक, शमशान, चैत्य, आश्रम आदिमें लगे हुए वृक्ष तथा पुत्रक वृक्ष—जिसको किसी बिना पुत्रवाले व्यक्तिने पुत्रके रूपमें लगाया हो अथवा बाल वृक्ष, जिसमें बहुत कोटर हों, अनेक पक्षी रहते हों, शस्त्र, वायु, अग्नि, बिजली तथा हाथी आदिसे दूषित वृक्ष, एक-दो शाखावाले वृक्ष, जिनका अग्रभाग सूख गया हो ऐसे वृक्ष प्रतिमाके योग्य नहीं होते। महुआ, देवदारु, वृक्षराज चन्दन, बिल्व, आम्र, खदिर, अंजन, निम्ब, श्रीपर्ण (अग्निमन्थ), पनस (कटहल), सरल, अर्जुन और रक्तचन्दन—ये वृक्ष प्रतिमाके लिये उत्तम हैं। चारों वर्णोंके लिये भिन्न-भिन्न ग्राह्य काष्ठोंका विधान है।
अभिमत वृक्षके पास जाकर वृक्षकी पूजा करनी चाहिये। पवित्र स्थान, एकान्त, केश-अङ्गारशून्य, पूर्व और उत्तरकी ओर स्थित, लोगोंको कष्ट न देनेवाला, विस्तृत सुन्दर शाखाओं तथा पत्तोंसे समृद्ध, सीधा, व्रणशून्य तथा त्वचावाला
वृक्ष शुभ होता है। स्वयं गिरे हुए या हाथीसे गिराये गये, शुष्क होकर या अग्निसे जले हुए और पक्षियोंसे रहित वृक्षोंका प्रतिमा-निर्माणमें उपयोग नहीं करना चाहिये। मधुमकखीके छतेवाला वृक्ष भी ग्राह्य नहीं है। स्निग्ध पत्रसमन्वित, पुष्पित तथा फलित वृक्षोंका कार्तिक आदि आठ मासोंमें उत्तम मुहूर्त देखकर उपवास रहकर अधिवासन-कर्म करना चाहिये। वृक्षके नीचे चारों ओर लीपकर गन्ध, पुष्पमाला, धूप आदिसे यथाविधि वृक्षकी पूजा करे। अनन्तर गायत्रीमन्त्रसे अभिमन्त्रित जलसे प्रोक्षण करे। दो उज्ज्वल वस्त्र धारण कर वृक्षकी गन्ध-माल्यसे पूजा करे तथा उसके सामने कुशासनपर बैठकर देवदारुकी समिधासे अग्निमें आहुतियाँ दे, नमस्कार करे।
ॐ प्रजापतये सत्यसदाय नित्यं
श्रेष्ठान्तरात्मन् सचराचरात्मन्।
सांनिध्यमस्मिन् कुरु देव वृक्षे
सूर्यावृत्तं मण्डलमाविशेश्च नमः॥
(ब्राह्मपर्व १३१।२६)
‘प्रजापतिसत्यस्वरूप इस वृक्षको नित्य नमस्कार है। श्रेष्ठान्तरात्मन्! सचराचरात्मन्! देव! इस वृक्षमें आप सांनिध्य करें। सूर्यावृत्त-मण्डल इसमें प्रविष्ट हो। आपको नमस्कार है।’
इस प्रकार वृक्षकी पूजा कर उसको सान्त्वना देते हुए कहे—‘वृक्षराज! संसारके कल्याणके लिये आप देवालयमें चले। देव! आप वहाँ छेदन और तापसे रहित होकर स्थित रहेंगे, समयपर धूप आदि प्रदानकर पुष्पोंके द्वारा संसार आपकी पूजा करेगा।’
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
वृक्षके मूलमें धूप-माल्य आदिसे कुठारका पूजन कर उसका सिर पूर्वकी ओर करके सावधानीसे स्थापित करे। अनन्तर मोदक, खीर आदि भक्ष्य द्रव्य तथा सुगन्धित पुष्प, धूप, गन्ध आदिसे वृक्षकी और देवता, पितर, राक्षस, पिशाच, नाग, सुरगण, विनायक आदिकी पूजा करके रात्रिमें वृक्षका स्पर्श कर यह कहें— 'देवदेव! आप पूजामें देवोंके द्वारा परिकल्पित हैं। वृक्षराज! आपको नमस्कार है। यह विधिवत् की गयी पूजा आप ग्रहण करें। जो-जो प्राणी यहाँ निवास करते हैं, उनको भी मेरा नमस्कार है*।'
प्रभातकालमें पुनः उस वृक्षका पूजन करे तथा ब्राह्मण और भोजकको दक्षिणा देकर विशेषज्ञोंके द्वारा स्वस्तिवाचनपूर्वक वृक्षका छेदन
करे। पूर्व-ईशान और उत्तरकी ओर वृक्ष कट करके गिरे तो अच्छा है। शाखाओंके इन दिशाओंमें गिरनेपर ही वृक्षका छेदन करे अन्यथा नहीं। वृक्षका नैऋत्य, आग्नेय और दक्षिण दिशाओंमें गिरना शुभ नहीं है एवं वायव्य और पश्चिममें गिरना मध्यम है। पहले वृक्षके चारों ओरकी शाखाओंको काटनेके बाद वृक्षको कटवाये। वृक्षसे शाखाएँ सर्वथा अलग हो जायँ तथा गिरकर टूटें नहीं एवं शब्द भी नहीं हो तो उत्तम है। जिसके कटनेसे दो भाग हो जाय, जिस वृक्षसे मधुर द्रव, घी, तेल आदि निकले उसका परित्याग कर दे। इन दोषोंसे रहित अच्छा काल देखकर काष्ठका संग्रह करना चाहिये।
(अध्याय १३१)
सूर्य-प्रतिमाकी निर्माण-विधि
नारदजीने कहा—यदुशादूल! मैं सभी देवोंकी प्रतिमाका लक्षण विशेषरूपसे आदित्यकी प्रतिमाका लक्षण कहता हूँ। एक हाथ, दो हाथ, तीन हाथ अथवा साढ़े तीन हाथ लम्बी या देवालयके द्वारके प्रमाणके अनुसार भगवान् सूर्यकी प्रतिमाका निर्माण कराना चाहिये। एक हाथकी प्रतिमा सौम्य होती है, दो हाथकी धन-धान्य देती है, तीन हाथकी प्रतिमासे सभी कार्य सिद्ध होते हैं, साढ़े तीन हाथकी लम्बी प्रतिमाकी स्थापनासे राष्ट्रमें सुभिक्ष, कल्याण और आरोग्यकी प्राप्ति होती है। प्रतिमाके अग्रभाग, मध्यभाग और मूलभागमें सौम्य होनेपर उसको गान्धर्वी प्रतिमा कहते हैं। वह धन-धान्य प्रदान करती है। देवालयके द्वारका जितना विस्तार हो, उसके आठवें अंशके समान प्रतिमा बनवानी चाहिये।
भगवान् सूर्यकी प्रतिमा विशाल नेत्र, कमलके
समान मुख, रक्तवर्णके बिम्बके समान सुन्दर ओठ, रत्नजटित मुकुटसे अलंकृत मस्तक, मणि-कुण्डल, कटक, अंगद, हार आदि अलंकारोंसे सुशोभित अभ्यङ्ग धारण किये हुए, हाथोंमें प्रफुल्लित कमल और सुवर्णकी माला लिये हुए अतिशय सुन्दर सभी शुभ लक्षणोंसे समन्वित बनवानी चाहिये।
इस प्रकारकी प्रतिमा प्रजाका कल्याण करनेवाली आरोग्य-प्रदायक तथा अभय प्रदान करनेवाली होती है। हीन या कम अङ्गवाली प्रतिमा अनिष्टकारक होती है। अतः प्रतिमा सीधी और सुडौल बनवानी चाहिये।
ब्रह्माजीकी मूर्ति हाथमें कमण्डलु धारण किये कमलासनपर विराजमान तथा चार मुखोंसे संयुक्त बनवानी चाहिये। कार्तिकेयकी प्रतिमा कुमार-स्वरूप, हाथमें शक्ति लिये, अतिशय सुन्दर बनवानी चाहिये। इनकी ध्वजा मयूर-मण्डित होनी चाहिये।
- अर्चासु देवदेव त्वं देवैश्च परिकल्पितः। नमस्ते वृक्ष पूज्यं विधिवत् परिगृह्यताम् ॥ (ब्राह्मपर्व १३१।३३)
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- ब्राह्मपर्व *
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इन्द्रकी प्रतिमा चार दाँतोंसे युक्त सफेद दाँतोंवाले ऐरावत गजपर आरूढ़ तथा हाथमें वज्र धारण किये हुए बनवानी चाहिये। इस प्रकार देवोंकी प्रतिमा शुभ लक्षणोंसे युक्त और सुन्दर बनवानी चाहिये।
नारदजी बोले—साम्ब! भगवान् सूर्यकी इस प्रकारकी प्रतिमा बनवाकर ईशानकोणमें चार तोरण, पल्लव, पुष्पमाला, पताका आदिसे विभूषित कर फिर अधिवासनके लिये मण्डपका निर्माण करवाना चाहिये। काष्ठकी मूर्ति श्री, विजय, बल, यश, आयु और धन प्रदान करती है, मिट्टीकी प्रतिमा प्रजाका कल्याण करती है। मणिमयी प्रतिमा कल्याण और सुभिक्ष प्रदान करती है, सुवर्णकी प्रतिमा पुष्टि, चाँदीकी मूर्ति कीर्ति, ताम्रकी मूर्ति प्रजावृद्धि तथा पाषाणकी प्रतिमा विपुल भूमि लाभ कराती है। लोहे, शीशे एवं रंगेकी मूर्तियाँ अनिष्ट करनेवाली होती हैं, इसलिये इन धातुओंकी प्रतिमा नहीं बनवानी चाहिये।
साम्बने पूछा—नारदजी! भगवान् सूर्य सर्वदेवमय कहे गये हैं, यह उनका सर्वदेवमयत्व कैसा है? उसे कृपाकर बतलाइये।
नारदजीने कहा—साम्ब! तुमने बड़ी अच्छी बात पूछी है। अब मैं यह सब बता रहा हूँ। इसे ध्यानसे सुनो—
भगवान् सूर्य सर्वदेवमय हैं, उनके नेत्रोंमें बुध और सोम, ललाटपर भगवान् शंकर, सिरमें ब्रह्मा, कपालमें बृहस्पति, कण्ठमें एकादश रुद्र, दाँतोंमें नक्षत्र और ग्रहोंका निवास है। ओष्ठोंमें धर्म और अधर्म, जिह्वामें सर्वशास्त्रमयी महादेवी सरस्वती स्थित हैं। कर्णोंमें दिशाएँ और विदिशाएँ, तालुदेशमें ब्रह्मा और इन्द्र स्थित हैं। इसी प्रकार भूमध्यमें बारहों आदित्य, रोमकूपोंमें सभी ऋषिगण, पेटमें समुद्र, हृदयमें यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, पिशाच, दानव और राक्षसगण विराजमान हैं। भुजाओंमें नदियाँ, कक्षोंमें वृक्ष, पीठके मध्यमें मेरु, दोनों स्तनोंके बीचमें मङ्गल और नाभिमण्डलमें धर्मराजका निवास है। कटिप्रदेशमें पृथ्वी आदि, लिङ्गमें सृष्टि, जानुओंमें अश्विनीकुमार, ऊरुओंमें पर्वत, नखोंके मध्य सातों पाताल, चरणोंके बीच वन और समुद्रसहित भूमण्डल तथा दन्तान्तरोंमें कालाग्नि रुद्र स्थित हैं। इस प्रकार भगवान् सूर्य सर्वदेवमय तथा सभी देवताओंके आत्मा हैं। जैसे वायुसे विश्व व्याप्त है, वैसे ही चराचर जगत् इनसे परिव्याप्त है, क्योंकि वायु भी भगवान् सूर्यके प्रत्येक अङ्गोंमें ही स्थित रहता है। ऐसे ये भगवान् सूर्य सम्पूर्ण प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके लिये निरन्तर तत्पर रहते हैं।
(अध्याय १३२-१३३)
सूर्य-प्रतिष्ठाका मुहूर्त और मण्डप बनानेका विधान
नारदजी बोले—साम्ब! भगवान् सूर्यकी स्थापनाके लिये प्रतिपदा, द्वितीया, चतुर्थी, पञ्चमी, दशमी, त्रयोदशी तथा पूर्णिमा—ये तिथियाँ प्रशस्त मानी गयी हैं। चन्द्रमा, बुध, गुरु और शुक्र—इन ग्रहोंके उदित एवं अनुकूल होनेपर भगवान् सूर्यकी प्रतिमाकी प्रतिष्ठा करनी चाहिये। सूर्यकी स्थापनामें तीनों उत्तरा, रेवती, अश्विनी, रोहिणी, हस्त, पुनर्वसु,
पुष्य, श्रवण और भरणी—ये नक्षत्र प्रशस्त हैं। प्रतिष्ठाके लिये यज्ञभूमि भूसी, राख, केश आदिसे रहित एवं शुद्ध होनी चाहिये। उसमें बालू, कंकड़ एवं कोयले न हों। दस हाथ लम्बा-चौड़ा मण्डप बनवाना चाहिये। उसके चारों ओर वृक्ष, उद्यान, उपवन आदि होने चाहिये। उस मण्डपमें चार हाथ लम्बी-चौड़ी वेदीका निर्माण करे। नदीके
584 Sankshipta Bhavishya Puran, Section 7.1, Front Page in Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth