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भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

तो फल-प्राप्तिमें न्यूनता होती है। 'सप्त तेः' इस ब्राह्मण-मन्त्रके कौण्डिन्य ऋषि, जगती छन्द और अग्नि देवता हैं। 'देहि मेः' इस मन्त्रके प्रजापति ऋषि, अनुष्टुप् छन्द और प्रजापति देवता हैं। 'पूर्णा दक्षिः' इस मन्त्रके शतक्रतु ऋषि, अनुष्टुप् छन्द एवं अग्नि देवता हैं। 'पुनन्तुः' इस मन्त्रके पवन ऋषि, जगती छन्द तथा देवता अग्नि हैं।

इस रीतिसे तत्तद् मन्त्रोंके उच्चारणके समय ऋषि, छन्द एवं देवताका स्मरण करना चाहिये। जप-कालमें मन्त्रोंकी संख्या अवश्य पूरी करनी चाहिये। निर्दिष्ट संख्याके बिना किया गया जप फलदायी नहीं होता। अयुत-होम, लक्ष-होम और कोटि-होममें जिन ऋत्विक् ब्राह्मणोंका वर्ण किया जाय, वे शान्त एवं काम-क्रोधरहित हों। ऋत्विजोंकी संख्या अभीष्ट होमानुसार करनी चाहिये। प्रयत्नपूर्वक उनकी पूजाकर एवं दक्षिणा प्रदान कर उन्हें संतुष्ट करना चाहिये। इस प्रकार विधिपूर्वक याग-कर्म करनेवाला व्यक्ति वसु, आदित्य और मरुदग्गणोंके द्वारा शिवलोकमें पूजित होता है तथा अनेक कल्पोंतक वहाँ

निवास कर अन्तमें मोक्ष प्राप्त करता है। जो किसी कामनाके बिना अर्थात् निष्काम-भावपूर्वक ईश्वरार्पण-बुद्धिसे लक्ष-होम करता है, वह अपने अभीष्टको प्राप्त कर परमपद प्राप्त कर लेता है। पुत्रार्थी पुत्र, धनार्थी धन, भार्यार्थी भार्या और कुमारी शुभ पतिको प्राप्त करती है। राज्यभ्रष्ट राज्य तथा लक्ष्मीकी कामनावाला व्यक्ति अतुल ऐश्वर्य प्राप्त करता है। जो व्यक्ति निष्कामभावपूर्वक कोटि-होम करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। ब्रह्माने स्वयं बतलाया है कि कोटि-होम लक्ष-होमसे सौ गुना श्रेष्ठ है। ऋत्विज् ब्राह्मणोंके अभावमें आचार्य भी होता बन सकता है। आसनोंमें कुशासन प्रशस्त माना गया है।

देवता पद्मासनपर स्थित रहते हैं और वास भी करते हैं, अतः पद्मासनस्थ होकर ही अर्चना करनी चाहिये। 'देवो भूत्वा देवान् यजेत' इस न्यायके अनुसार पद्मासनस्थ देवताओंका अर्चन पद्मासनस्थ होकर ही करना चाहिये। यदि ऐसा न किया जाय तो सम्पूर्ण फल यक्षिणी हरण कर लेती है। (अध्याय १९-२१)

॥ प्रथम भाग सम्पूर्ण ॥

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

मध्यमपर्व

( द्वितीय भाग )

यज्ञादि कर्मोंके मण्डल-निर्माणका विधान तथा कौञ्ज्यादि पक्षियोंके दर्शनका फल

सूतजीने कहा—ब्राह्मणगण! अब मैं आपलोगोंसे पुराणोंमें वर्णित मण्डल-निर्माणके विषयमें कहूँगा। बुद्धिमान् व्यक्ति हाथसे नापकर मण्डलका माप निश्चित करे। फिर उसे तत्त् स्थानोंमें विधि-विहित लाल आदि रंग भरे। उनमें देवताओंके अस्त्र-विशेष बाहर, मध्य और कोणमें लिखकर प्रदर्शित करे। शम्भु, गौरी, ब्रह्मा, राम और कृष्ण आदिका अनुक्रमसे निर्देश करे। फिर सीमा-रेखाको एक अङ्गुल ऊँचा उन-उन अर्ध-भागोंसे युक्त करे। शिव और विष्णुके महायागमें शम्भुसे प्रारम्भ कर देवताओंकी परिकल्पना—ध्यान करे। प्रतिष्ठामें रामपर्यन्त, जलाशयमें कृष्णपर्यन्त और दुर्गायागमें ब्रह्मादिकी परिकल्पना करे। मण्डलका निर्माण अधम ब्राह्मण एवं शूद्र न करे। सूतजीने पुनः कहा—अब मैं कौञ्ज्याका स्वरूप बतलाता हूँ। सभी शास्त्रोंमें उसका उल्लेख मिलता है जो गोपनीय है। यह कौञ्ज्य (पक्षी-विशेष)-महाकौञ्ज्य, मध्य-कौञ्ज्य और कनिष्ठ-कौञ्ज्य-भेद तीन प्रकारका

वर्णित है। इसका दर्शन सैकड़ों जन्मोंमें किये गये पापोंको नष्ट करता है। मयूर, वृषभ, सिंह, कौञ्ज्य और कपिको घरमें, खेतमें और वृक्षपर भूलसे भी देख ले तो उसको नमस्कार करे, ऐसा करनेसे दर्शकके सैकड़ों ब्रह्महत्याजनित पाप नष्ट हो जाते हैं। उनके पोषणसे कीर्ति मिलती है और दर्शनसे धन तथा आयु बढ़ती है। मयूर ब्रह्माका, वृषभ सदाशिवका, सिंह दुर्गाका, कौञ्ज्य नारायणका, बाघ त्रिपुरसुन्दरी लक्ष्मीका रूप है। स्नानकर यदि प्रतिदिन इनका दर्शन किया जाय तो ग्रहदोष मिट जाता है। इसलिये प्रयत्नपूर्वक इनका पोषण करना चाहिये। सभी यज्ञोंमें सर्वतोभद्रमण्डल सभी प्रकारकी पुष्टि प्रदान करता है। सर्वशक्तिमान् ईश्वरने साधकोंके हितके लिये उसका प्रकाश किया है। सम्पूर्ण स्मार्त-यागोंमें सर्वतोभद्रमण्डलका विशेषरूपसे निर्माण किया जाता है और तत्-तत् स्थानोंमें तत्-तत् रंगोंसे पूरित किया जाता है।

(अध्याय १-२)

यज्ञादि कर्ममें दक्षिणाका माहात्म्य, विभिन्न कर्मोंमें पारिश्रमिक व्यवस्था और कलश-स्थापनका वर्णन

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! शास्त्रविहित यज्ञादि कार्य दक्षिणारहित एवं परिमाणविहीन कभी नहीं करना चाहिये। ऐसा यज्ञ कभी सफल नहीं होता। जिस यज्ञका जो माप बतलाया गया है, उसीके अनुसार विधान करना चाहिये। मानरहित यज्ञ करनेवाले व्यक्ति नरकमें जाते हैं। आचार्य, होता, ब्रह्मा तथा जितने भी सहयोगी हों, वे सभी

विधिवत् हों।

अस्सी वराटों (कौड़ियों)-का एक पण होता है। सोलह पणोंका एक पुराण कहा जाता है, सात पुराणोंकी एक रजतमुद्रा तथा आठ रजतमुद्राओंकी एक स्वर्णमुद्रा कही जाती है, जो यज्ञ आदिमें दक्षिणा दी जाती है। बड़े उद्यानोंकी प्रतिष्ठा-यज्ञमें दो स्वर्णमुद्राएँ, कूपोत्सर्गमें आधी स्वर्णमुद्रा (निष्क),

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

तुलसी एवं आमलकी-यागमें एक स्वर्णमुद्रा (निष्क) दक्षिणारूपमें विहित है। लक्ष-होममें चार स्वर्ण-मुद्रा, कोटि-होम, देव-प्रतिष्ठा तथा प्रासादके उत्सर्गमें अठारह स्वर्ण-मुद्राएँ दक्षिणारूपमें देनेका विधान है। तडाग तथा पुष्करिणी-यागमें आधी-आधी स्वर्णमुद्रा देनी चाहिये। महादान, दीक्षा, वृषोत्सर्ग तथा गया-श्राद्धमें अपने विभवके अनुसार दक्षिणा देनी चाहिये। महाभारतके श्रवणमें अस्सी रत्ती तथा ग्रहयाग, प्रतिष्ठाकर्म, लक्षहोम, अयुतहोम तथा कोटिहोममें सौ-सौ रत्ती सुवर्ण देना चाहिये। इसी प्रकार शास्त्रोंमें निर्दिष्ट सत्पात्र व्यक्तिको ही दान देना चाहिये, अपात्रको नहीं। यज्ञ, होममें द्रव्य, काष्ठ, घृत आदिके लिये शास्त्र-निर्दिष्ट विधिका ही अनुसरण करना चाहिये। यज्ञ, दान तथा व्रतादि कर्मोंमें दक्षिणा (तत्काल) देनी चाहिये। बिना दक्षिणाके ये कार्य नहीं करने चाहिये। ब्राह्मणोंका जब वरण किया जाय तब उन्हें रत्न, सुवर्ण, चाँदी आदि दक्षिणारूपमें देना चाहिये। वस्त्र एवं भूमि-दान भी विहित हैं। अन्यान्य दानों एवं यज्ञोंमें दक्षिणा एवं द्रव्योंका अलग-अलग विधान है। विधानके अनुसार नियत दक्षिणा देनेमें असमर्थ होनेपर यज्ञ-कार्यकी सिद्धिके लिये देव-प्रतिमा, पुस्तक, रत्न, गाय, धान्य, तिल, रुद्राक्ष, फल एवं पुष्प आदि भी दिये जा सकते हैं। सूतजी पुनः बोले—ब्राह्मणो! अब मैं पूर्णपात्रका स्वरूप बतलाता हूँ। उसे सुनै। काम्य-होममें एक मुष्टिके पूर्णपात्रका विधान है। आठ मुट्ठी अन्नको एक कुञ्चिका कहते हैं। इसी प्रमाणसे पूर्णपात्रोंका निर्माण करना चाहिये। उन पात्रोंको अलग कर द्वार-प्रदेशमें स्थापित करे।

कुण्ड और कुड्मलोंके निर्माणके पारिश्रमिक इस प्रकार हैं—चौकोर कुण्डके लिये रौप्यादि,

सर्वतोभद्रकुण्डके लिये दो रौप्य, महासिंहासनके लिये पाँच रौप्य, सहस्सार तथा मेरुपृष्ठकुण्डके लिये एक बैल तथा चार रौप्य, महाकुण्डके निर्माणमें द्विगुणित स्वर्णपाद, वृत्तकुण्डके लिये एक रौप्य, पञ्चकुण्डके लिये वृषभ, अर्धचन्द्रकुण्डके लिये एक रौप्य, योनिकुण्डके निर्माणमें एक धेनु तथा चार माशा स्वर्ण, शैवयागमें तथा उद्यापनमें एक माशा स्वर्ण, इष्टिकाकरणमें प्रतिदिन दो पण पारिश्रमिक देना चाहिये। खण्ड-कुण्ड-(अर्ध गोलाकार-) निर्माताको दस वराट (एक वराट बराबर अस्सी कौड़ी), इससे बड़े कुण्डके निर्माणमें एक काकिणी (माशेका चौथाई भाग), सात हाथके कुण्ड-निर्माणमें एक पण, बृहत्कूपके निर्माणमें प्रतिदिन दो पण, गृह-निर्माणमें प्रतिदिन एक रत्ती सोना, कोष्ठ बनवाना हो तो आधा पण, रंगसे रँगनेमें एक पण, वृक्षोंके रोपणमें प्रतिदिन डेढ़ पण पारिश्रमिक देना चाहिये। इसी तरह पृथक् कर्मोंमें अनेक रीतिसे पारिश्रमिकका विधान किया गया है। यदि नापित सिरसे मुण्डन करे तो उसे दस काकिणी देनी चाहिये। स्त्रियोंके नख आदिके रञ्जनके लिये काकिणीके साथ पण भी देना चाहिये। धानके रोपणमें एक दिनका एक पण पारिश्रमिक होता है। तैल और क्षारसे वर्जित वस्त्रकी धुलाईके लिये एक पण पारिश्रमिक देना चाहिये। इसमें वस्त्रकी लम्बाईके अनुसार कुछ वृद्धि भी की जा सकती है। मिट्टीके खोदनेमें, कुदाल चलानेमें, इक्षुदण्डके निष्पीडन तथा सहस्त्र पुष्प-चयनमें दस-दस काकिणी पारिश्रमिक देना चाहिये। छोटी माला बनानेमें एक काकिणी, बड़ी माला बनानेमें दो काकिणी देना चाहिये। दीपकका आधार काँसे या पीतलका होना चाहिये। इन दोनोंके अभावमें मिट्टीका भी आधार बनाया जा सकता है*।

  • भविष्यपुराणका यह अध्याय इतिहासकी दृष्टिसे बड़े महत्त्वका है। केवल कोटिल्य अर्थशास्त्र और शुक्रनीतिसे ही भारतकी प्राचीन

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  • मध्यमपर्व, द्वितीय भाग *

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सूतजी पुनः बोले—ब्राह्मणो! अब मैं कलशोंके विषयमें निश्चित मत प्रकट करता हूँ, जिसका उपयोग करनेसे मङ्गल होता है और यात्रामें सिद्धि प्राप्त होती है। कलशमें सात अङ्ग अथवा पाँच अङ्ग होते हैं। कलशमें केवल जल भरनेसे ही सिद्धि नहीं होती, इसमें अक्षत और पुष्पोंसे देवताओंका आवाहन कर उनका पूजन भी करना चाहिये—ऐसा न करनेसे पूजन निष्फल हो जाता है। वट, अश्वत्थ, धव-वृक्ष और बिल्व-वृक्षके पल्लवोंको कलशके ऊपर रखे*। कलश सोना, चाँदी, ताँबा या मृत्तिकाके बनाये जाते हैं। कलशका निर्माण

अपनी सामर्थ्यके अनुसार करे। कलश अभेद्य, निशिच्छद्र, नवीन, सुन्दर एवं जलसे पूरित होना चाहिये। कलशके निर्माणके विषयमें भी निश्चित प्रमाण बतलाया गया है। बिना मानके बना हुआ कलश उपयुक्त नहीं माना गया है। जहाँ देवताओंका आवाहन-पूजन किया जाय, उन्हींकी संनिधिमें कलशकी स्थापना करनी चाहिये। व्यतिक्रम करनेपर फलका अपहरण राक्षस कर लेते हैं। स्वस्तिक बनाकर उसके ऊपर निर्दिष्ट विधिसे कलश स्थापित कर वरूणादि देवताओंका आवाहन करके उनका पूजन करना चाहिये। (अध्याय ३-५)

चतुर्विध मास-व्यवस्था एवं मलमास-वर्णन

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! अब मैं (विभिन्न प्रकारके) मासोंका वर्णन करता हूँ। मास चार प्रकारके होते हैं—चान्द्र, सौर, सावन तथा नाक्षत्र। शुक्ल प्रतिपदासे लेकर अमावास्यातकका मास चान्द्र-मास कहा जाता है। सूर्यकी एक संक्रान्तिसे दूसरी संक्रान्तिमें प्रवेश करनेका समय सौर-मास कहलाता है। पूरे तीस दिनोंका सावन-मास होता है। अश्विनीसे लेकर रेवतीपर्यन्त नाक्षत्र-मास होता है। सूर्योदयसे दूसरे सूर्योदयतक जो दिन होता है, उसे सावन-दिन कहते हैं। एक तिथिमें चन्द्रमा जितना भोग करता है, वह चान्द्र-दिवस कहलाता है। राशिके तीसवें भागको सौर-दिन कहते हैं। दिन-रातको मिलाकर अहोरात्र होता है। किसी भी तिथिको लेकर तीस-दिन बाद आनेवाली तिथितकका समय सावन-मास होता है। प्रायश्चित्त, अन्नप्राशन तथा मन्त्रोपासनमें, राजाके कर-ग्रहणमें,

व्यवहारमें, यज्ञमें तथा दिनकी गणना आदिमें सावन-मास ग्राह्य है। सौर-मास विवाहदि-संस्कार, यज्ञ-व्रत आदि सत्कर्म तथा स्नानादिमें ग्राह्य है। चान्द्र-मास पार्वण, अष्टकाश्राद्ध, साधारण श्राद्ध, धार्मिक कार्यों आदिके लिये उपयुक्त है। चैत्र आदि मासोंमें तिथिको लेकर जो कर्म विहित हैं, वे चान्द्र-माससे करने चाहिये। सोम या पितृगणोंके कार्य आदिमें नाक्षत्र-मास प्रशस्त माना गया है। चित्रा नक्षत्रके योगसे चैत्री पूर्णिमा होती है, उससे उपलक्षित मास चैत्र कहा जाता है। चैत्र आदि जो बारह चान्द्र-मास हैं, वे तत्-तत्-नक्षत्रके योगसे तत्-तत्-नामवाले होते हैं।

जिस महीनेमें पूर्णिमाका योग न हो, वह प्रजा, पशु आदिके लिये अहितकर होता है। सूर्य और चन्द्रमा दोनों नित्य तिथिका भोग करते हैं। जिन तीस दिनोंमें संक्रमण न हो, वह मलिल्लुच,

मुद्राओं एवं पारिश्रमिकका पता चलता है। अन्य किसी पुराण या धार्मिक ग्रन्थोंमें इनका कोई संकेत नहीं किया गया है। गीताप्रेससे प्रकाशित 'माक्सवाद और रामराज्य' पुस्तकके पारिश्रमिकवाले प्रकरणमें इसपर पूरा विचार किया गया है तथा 'कल्याण' सन् १९६४ ई० के अङ्कमें भी इसपर विचार प्रकट किया गया है।

  • प्रचलित परम्परामें आम, पीपल, बरगद, प्लक्ष (पाकड़) तथा उदुम्बर (गूलर)—ये पञ्च-पल्लव कहे गये हैं।

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

मलमास या अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) कहलाता है, उसमें सूर्यकी कोई संक्रान्ति नहीं होती। प्रायः अढ़ाई वर्ष (बत्तीस मास) के बाद यह मास आता है। इस महीनेमें सभी तरहकी प्रेत-क्रियाएँ तथा सपिण्डन-क्रियाएँ की जा सकती हैं। परंतु यज्ञ, विवाहादि कार्य नहीं होते। इसमें तीर्थस्नान, देव-दर्शन, व्रत-उपवास आदि, सीमन्तोन्नयन, ऋतुशान्ति, पुंसवन और पुत्र आदिका मुख-दर्शन किया जा सकता है। इसी तरह शुक्रास्तमें भी ये क्रियाएँ की जा सकती हैं। राज्याभिषेक भी मलमासमें हो सकता है। व्रतारम्भ, प्रतिष्ठा,

चूडाकर्म, उपनयन, मन्त्रोपासना, विवाह, नूतन-गृह-निर्माण, गृह-प्रवेश, गौ आदिका ग्रहण, आश्रमान्तरमें प्रवेश, तीर्थ-यात्रा, अभिषेक-कर्म, वृषोत्सर्ग, कन्याका द्विरागमन तथा यज्ञ-यागादि—इन सबका मलमासमें निषेध है। इसी तरह शुक्रास्त एवं उसके वार्धक्य और बाल्यत्वमें भी इनका निषेध है। गुरुके अस्त एवं सूर्यके सिंह राशिमें स्थित होनेपर अधिक मासमें जो निषिद्ध कर्म हैं, उन्हें नहीं करना चाहिये। कर्क राशिमें सूर्यके आनेपर भगवान् शयन करते हैं और उनके तुलाराशिमें आनेपर निद्राका त्याग करते हैं। (अध्याय ६)

काल-विभाग, तिथि-निर्णय एवं वर्षभरके विशेष पर्वों तथा तिथियोंके पुण्यप्रद कृत्य

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! देव-कर्म या पैतृक-कर्म कालके आधारपर ही सम्पन्न होते हैं और कर्म भी नियत समयपर किये जानेपर पूर्णरूपेण फलप्रद होते हैं। समयके बिना की गयी क्रियाओंका फल तीनों कालों तथा लोकोंमें भी प्राप्त नहीं होता। अतः मैं कालके विभागोंका वर्णन करता हूँ।

यद्यपि काल अमूर्तरूपमें एक तथा भगवान्का ही अन्यतम स्वरूप है तथापि उपाधियोंके भेदसे वह दीर्घ, लघु आदि अनेक रूपोंमें विभक्त है। तिथि, नक्षत्र, वार तथा रात्रिका सम्बन्ध आदि जो कुछ है, वे सभी कालके ही अङ्ग हैं और पक्ष, मास आदि रूपसे वर्षान्तरोंमें भी आते-जाते रहते हैं तथा वे ही सब कर्मोंके साधन हैं। समयके बिना कोई भी स्वतन्त्ररूपसे कर्म करनेमें समर्थ नहीं। धर्म या अधर्मका मुख्य द्वार काल ही है। तिथि आदि काल-विशेषोंमें निषिद्ध और विहित कर्म बताये गये हैं। विहित कर्मोंका पालन करनेवाला स्वर्ग प्राप्त करता है और विहितका

त्याग कर निषिद्ध कर्म करनेसे अधोगति प्राप्त करता है। पूर्वाह्नव्यापिनी तिथिमें वैदिक क्रियाएँ करनी चाहिये। एकोद्विष्ट श्राद्ध मध्याह्नव्यापिनी तिथिमें और पार्वण-श्राद्ध अपराह्न-व्यापिनी तिथिमें करना चाहिये। वृद्धिश्राद्ध आदि प्रातःकालमें करने चाहिये। ब्रह्माजीने देवताओंके लिये तिथियोंके साथ पूर्वाह्नकाल दिया है और पितरोंको अपराह्न। पूर्वाह्नमें देवताओंका अर्चन करना चाहिये।

तिथियाँ तीन प्रकारकी होती हैं—खर्वा, दर्पा और हिंसा। लङ्घित होनेवाली खर्वा, तिथिवृद्धि दर्पा तथा तिथिहानि हिंसा कही जाती है। इनमें खर्वा और दर्पा आगेकी लेनी चाहिये और हिंसा (क्षय-तिथि) पूर्वमें लेनी चाहिये। शुक्ल पक्षमें परा लेनी चाहिये और कृष्ण पक्षमें पूर्वा। भगवान् सूर्य जिस तिथिको प्राप्त कर उदित होते हैं, वह तिथि स्नान-दान आदि कृत्योंमें उचित है। यदि अस्त-समयमें भगवान् सूर्य दस घटीपर्यन्त रहते हैं तो वह तिथि रात-दिन समझनी चाहिये।

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  • मध्यमपर्व, द्वितीय भाग *

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शुक्ल पक्ष अथवा कृष्ण पक्षमें खर्चा या दर्पा तिथिके अस्तपर्यन्त सूर्य रहे तो पितृकार्यमें वही तिथि ग्राह्य है। दो दिनमें मध्याह्नकालव्यापिनी तिथि होनेपर अस्तपर्यन्त रहनेवाली प्रथम तिथि श्राद्ध आदिमें विहित है। द्वितीया तृतीयासे तथा चतुर्थी पञ्चमीसे युक्त हों तो ये तिथियाँ पुण्यप्रद मानी गयी हैं और उसके विपरीत होनेपर पुण्यका ह्रास करती हैं। षष्ठी पञ्चमीसे एवं अष्टमी सप्तमीसे विद्ध हो तथा दशमीसे एकादशी, त्रयोदशीसे चतुर्दशी और चतुर्दशीसे अमावास्या विद्ध हो तो उनमें उपवास नहीं करना चाहिये, अन्यथा पुत्र, कलत्र और धनका ह्रास होता है। पुत्र-भार्यादिसे रहित व्यक्ति का यज्ञमें अधिकार नहीं है। जिस तिथिको लेकर सूर्य उदित होते हैं, वह तिथि स्नान, अध्ययन और दानके लिये श्रेष्ठ समझनी चाहिये। कृष्ण पक्षमें जिस तिथिमें सूर्य अस्त होते हैं, वह स्नान, दान आदि कर्मोंमें पितरोंके लिये उत्तम मानी जाती है।

सूतजी कहते हैं— ब्राह्मणो! अब मैं ब्रह्माजीद्वारा बतलायी गयी श्रेष्ठ तिथियोंका वर्णन करता हूँ। आश्विन, कार्तिक, माघ और चैत्र इन महीनोंमें स्नान, दान और भगवान् शिव तथा विष्णुका पूजन दस गुना फलप्रद होता है। प्रतिपदा तिथिमें अग्निदेवका यजन और हवन करनेसे सभी तरहके धान्य और ईप्सित धन प्राप्त होते हैं। यदि शुक्ल पक्षमें द्वितीया तिथि बृहस्पतिवारसे युक्त हो तो उस तिथिमें विधिपूर्वक भगवान् अग्निदेवका पूजन और नक्तव्रत करनेसे इच्छित ऐश्वर्य प्राप्त होता है। मिथुन (आषाढ़) और कर्क (श्रावण) राशिके सूर्यमें जो द्वितीया आये, उसमें उपवास करके भगवान् विष्णुका पूजन करनेवाली स्त्री कभी विधवा नहीं होती। अशून्य-शयन द्वितीया

(श्रावण मासके कृष्ण पक्षकी द्वितीया तिथि)–को गन्ध, पुष्प, वस्त्र तथा विविध नैवेद्योंसे भगवान् लक्ष्मीनारायणकी पूजा करनी चाहिये। (इस व्रतसे पति-पत्नीका परस्पर वियोग नहीं होता।) वैशाख शुक्ल पक्षकी तृतीयामें गङ्गाजीमें स्नान करनेवाला सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। वैशाख मासकी तृतीया स्वाती नक्षत्र और माघकी तृतीया रोहिणीयुक्त हो तथा आश्विन-तृतीया वृषराशिसे युक्त हो तो उसमें जो भी दान दिया जाता है, वह अक्षय होता है। विशेषरूपसे इनमें हविष्यान्न एवं मोदक देनेसे अधिक लाभ होता है तथा गुड़ और कर्पूरसे युक्त जलदान करनेवालेकी विद्वान् पुरुष अधिक प्रशंसा करते हैं, वह मनुष्य ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। यदि बुधवार और श्रवणसे युक्त तृतीया हो तो उसमें स्नान और उपवास करनेसे अनन्त फल प्राप्त होता है। भरणी नक्षत्रयुक्त चतुर्थीमें यमदेवताकी उपासना करनेसे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्ति मिलती है। भाद्रपदकी शुक्ला चतुर्थी शिवलोकमें पूजित है। कार्तिक और माघ मासके ग्रहणोंमें स्नान, जप, तप, दान, उपवास और श्राद्ध करनेसे अनन्त फल मिलता है। चतुर्थीमें सम्पूर्ण विघ्नोंके नाश तथा इच्छापूर्तिके लिये भगवान् गणेशकी पूजा मोदक आदिसे भक्तिपूर्वक करनी चाहिये।

श्रावण मासके शुक्ल पक्षकी पञ्चमीमें द्वार-देशके दोनों ओर गोमयसे नागोंकी रचना कर दूध, दही, सिन्दूर, चन्दन, गङ्गाजल एवं सुगन्धित द्रव्योंसे नागोंका पूजन करना चाहिये। नागोंका पूजन करनेवालोंके कुलमें निर्भयता रहती है एवं प्राणोंकी रक्षा भी होती है। श्रावण कृष्ण पञ्चमीको घरके आँगनमें नीमके पत्तोंसे मनसादेवीकी पूजा करनेसे कभी सर्पभय नहीं होता। भाद्रपदकी षष्ठीमें स्नान, दान आदि करनेसे अनन्त पुण्य

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

होता है। विप्रगणो! माघ और कार्तिककी षष्ठीमें व्रत करनेसे इहलोक और परलोकमें असीम कीर्ति प्राप्त होती है। शुक्ल पक्षकी सप्तमीमें यदि संक्रान्ति पड़े तो उसका नाम महाजया या सूर्यप्रिया होती है। भाद्रपदकी सप्तमी अपराजिता है। शुक्ल या कृष्ण पक्षकी षष्ठी या सप्तमी रविवारसे युक्त हो तो वह ललिता नामकी तिथि पुत्र-पौत्रोंकी वृद्धि करनेवाली और महान् पुण्यदायिनी है।

आश्विन एवं कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमीमें अष्टादशभुजाका पूजन करना चाहिये। आषाढ़ और श्रावण मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमीमें चण्डिकादेवीका प्रातःकाल स्नान करके अत्यन्त भक्तिपूर्वक पूजन कर रात्रिमें अभिषेक करना चाहिये। चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमीमें अशोक-पुष्पसे मृण्मयी भगवती देवीका अर्चन करनेसे सम्पूर्ण शोक निवृत्त हो जाते हैं। श्रावण मासमें अथवा सिंह-संक्रान्तिमें रोहिणीयुक्त अष्टमी हो तो उसकी अत्यन्त प्रशंसा की गयी है। प्रतिमासकी नवमीमें देवीकी पूजा करनी चाहिये। कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी दशमीको शुद्ध आहारपूर्वक रहनेवाले ब्रह्मलोकमें जाते हैं। ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी दशमी गङ्गादशहरा कहलाती है। आश्विनकी दशमी विजया और कार्तिककी दशमी महापुण्या कहलाती है।

एकादशीव्रत करनेसे सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। इस व्रतमें दशमीको जितेन्द्रिय होकर एक ही बार भोजन करना चाहिये। दूसरे दिन एकादशीमें उपवास कर द्वादशीमें पारणा करनी चाहिये। द्वादशी तिथि द्वादश पापोंका हरण करती है। चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीमें अनेक पुष्पादि सामग्रियोंसे कामदेवकी पूजा करे। इसे अनङ्ग-त्रयोदशी कहा जाता है। चैत्र मासके कृष्ण

पक्षकी अष्टमी शनिवार या शतभिषा नक्षत्रसे युक्त हो तो गङ्गामें स्नान करनेसे सैकड़ों सूर्यग्रहणका फल प्राप्त होता है। इसी मासके कृष्ण पक्षकी त्रयोदशी यदि शनिवार या शतभिषासे युक्त हो तो वह महावाराणी-पर्व कहलाता है। इसमें किया गया स्नान, दान एवं श्राद्ध अक्षय होता है। चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशी दम्भभंजिनी कही जाती है। इस दिन धतूरेकी जड़में कामदेवका अर्चन करना चाहिये, इससे उत्तम स्थान प्राप्त होता है। अनन्त-चतुर्दशीका व्रत सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला है। इसे भक्तिपूर्वक करनेसे मनुष्य अनन्त सुख प्राप्त करता है। प्रेत-चतुर्दशी (यम-चतुर्दशी)-को तपस्वी ब्राह्मणोंको भोजन और दान देनेसे मनुष्य यमलोकमें नहीं जाता। फाल्गुन मासके कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी शिवरात्रिके नामसे प्रसिद्ध है और वह सम्पूर्ण अभिलाषाओंकी पूर्ति करनेवाली है। इस दिन चारों पहरोमें स्नान करके भक्तिपूर्वक शिवजीकी आराधना करनी चाहिये। चैत्रमासकी पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र तथा गुरुवारसे युक्त हो तो वह महाचैत्री कही जाती है। वह अनन्त पुण्य प्रदान करनेवाली है। इसी प्रकार विशाखादि नक्षत्रसे युक्त वैशाखी, महाज्येष्ठी आदि बारह पूर्णिमाएँ होती हैं। इनमें किये गये स्नान, दान, जप, नियम आदि सत्कर्म अक्षय होते हैं और व्रतीके पितर संतुष्ट होकर अक्षय विष्णुलोकको प्राप्त करते हैं। हरिद्वारमें महावैशाखीका पर्व विशेष पुण्य प्रदान करता है। इसी प्रकार शालग्राम-क्षेत्रमें महाचैत्री, पुरुषोत्तम-क्षेत्रमें महाज्येष्ठी, शुद्धल-क्षेत्रमें महाषाढ़ी, केदारमें महाश्रावणी, बदरिकाक्षेत्रमें महाभाद्री, पुष्कर तथा कान्यकुब्जमें महाकार्तिकी, अयोध्यामें महामार्गशीर्षी तथा महापौषी, प्रयागमें महामाघी तथा नैमिषारण्यमें महाफाल्गुनी

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  • मध्यमपर्व, द्वितीय भाग *

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पूर्णिमा विशेष फल देनेवाली है। इन पर्वोंमें जो भी शुभाशुभ कर्म किये जाते हैं, वे अक्षय हो जाते हैं। आश्विनकी पूर्णिमा कौमुदी कही गयी है, इसमें चन्द्रोदय-कालमें विधिपूर्वक लक्ष्मीकी पूजा करनी चाहिये। प्रत्येक अमावास्याको तर्पण और श्राद्धकर्म अवश्य करना चाहिये। कार्तिक

मासके कृष्ण पक्षकी अमावास्यामें प्रदोषके समय लक्ष्मीका सविधि पूजन कर उनकी प्रीतिके लिये दीपोंको प्रज्वलित करना चाहिये एवं नदीतीर, पर्वत, गोष्ठ, श्मशान, वृक्षमूल, चौराहा, अपने घरमें और चत्वरमें दीपोंको सजाना चाहिये।

(अध्याय ७-८)

गोत्र-प्रवर आदिके ज्ञानकी आवश्यकता

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! गोत्र-प्रवरकी परम्पराको जानना अत्यन्त आवश्यक होता है, इसलिये अपने-अपने गोत्र या प्रवरको पिता, आचार्य तथा शास्त्रद्वारा जानना चाहिये। गोत्र-प्रवरको जाने बिना किया गया कर्म विपरीत फलदायी होता है। कश्यप, वसिष्ठ, विश्वामित्र, आङ्गिरस, च्यवन, मौकुन्य, वत्स, कात्यायन, अगस्त्य आदि अनेक गोत्रप्रवर्तक ऋषि हैं। गोत्रोंमें एक, दो, तीन, पाँच आदि प्रवर होते हैं। समान

गोत्रमें विवाहादि सम्बन्धोंका निषेध है। अपने गोत्र-प्रवरादिका ज्ञान शास्त्रान्तरोंसे कर लेना चाहिये।

वास्तवमें देखा जाय तो सारा जगत् महामुनि कश्यपसे उत्पन्न हुआ है। अतः जिन्हें अपने गोत्र और प्रवरका ज्ञान नहीं है, उन्हें अपने पिताजीसे ज्ञात कर लेना चाहिये। यदि उन्हें मालूम न हो तो स्वयंको काश्यप१ गोत्रीय मानकर उनका प्रवर लगाकर शास्त्रानुसार कर्म करना चाहिये।

(अध्याय ९)

वास्तु-मण्डलके निर्माण एवं वास्तु-पूजनकी संक्षिप्त विधि

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! अब मैं वास्तु-मण्डलका संक्षिप्त वर्णन कर रहा हूँ। पहले भूमिपर अङ्गुरोंका रोपण करके भूमिकी परीक्षा कर ले।

तदनन्तर उत्तम भूमिके मध्यमें वास्तु-मण्डलका निर्माण करे। वास्तु-मण्डलके देवता पैतालीस हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं—(१) शिखी, (२) पर्जन्य,

१-गोत्र-प्रवर-निर्णयपर 'गोत्र-प्रवर-निबन्ध-कदम्ब' आदि कई स्वतन्त्र निबन्ध ग्रन्थ हैं। मत्स्यपुराणके अध्याय १९५-२०५ तकमें विस्तारसे यह विषय आया है तथा स्कन्दपुराणके माहेश्वरखण्ड एवं ब्रह्मखण्डमें भी इसपर विचार किया गया है।

२-सबके लिये एकमात्र परमात्मा ही परमकल्याणार्थ ध्येय-ज्ञेय हैं और कश्यपनन्दन सूर्यके रूपमें वे प्रत्यक्षरूपसे संसारका पालन, संचालन—उष्मा तथा प्रकाशके रूपमें, फिर वायु—प्राणके रूपमें समस्त प्राणियोंके जीवन बने हैं। इसलिये सभी वैष्णव और संन्यासी अपनेको अच्युत-गोत्रीय ही मानते हैं। प्राचीन परम्पराके अनुसार वेदाध्ययनमें वैदिक शाखा, सूत्र, ऋषि, गोत्र और प्रवरका ज्ञान आवश्यक था। यह विषय आश्वलायन गृह्यसूत्रमें भी निर्दिष्ट है।

३-जिस भूमिपर मनुष्यादि प्राणी निवास करते हैं, उसे वास्तु कहा जाता है। इसके गृह, देवप्रासाद, ग्राम, नगर, पुर, दुर्ग आदि अनेक भेद हैं। इसपर वास्तुराजवल्लभ, समराङ्गणसूत्रधार, वृहत्संहिता, शिल्पस्तु, गृहरत्नभूषण, हयशीर्षपाञ्चरात्र तथा कपिलपाञ्चरात्र आदि ग्रन्थोंमें पूर्ण विचार किया गया है। पुराणोंमें मत्स्य, अग्नि तथा विष्णुधर्मोत्तरपुराणमें भी यह महत्त्वपूर्ण विषय आया है। 'कल्याण' के देवताङ्गमें भी वास्तु-चक्रादिके विषयमें सामग्री संकलित की गयी है। वास्तुके आविर्भावके विषयमें मत्स्यपुराणमें आया है कि अन्धकासुरके वधके समय भगवान् शंकरके ललाटेसे जो स्वेदबिन्दु गिरे उनसे एक भयंकर आकृतिवाला पुरुष प्रकट हुआ। जब वह त्रिलोकीका भक्षण करनेके लिये उद्यत हुआ, तब शंकर आदि देवताओंने उसे पृथ्वीपर सुलाकर वास्तुदेवता (वास्तुपुरुष)-के रूपमें प्रतिष्ठित किया और उसके शरीरमें सभी

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२६०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

(३) जयन्त, (४) कुलिशायुध, (५) सूर्य, (६) सत्य, (७) वृष, (८) आकाश, (९) वायु, (१०) पूषा, (११) वितथ, (१२) गुहा, (१३) यम, (१४) गन्धर्व, (१५) मृगराज, (१६) मृग, (१७) पितृगण, (१८) दौवारिक, (१९) सुग्रीव, (२०) पुष्पदन्त, (२१) वरुण, (२२) असुर, (२३) पशु, (२४) पाश, (२५) रोग, (२६) अहि, (२७) मोक्ष, (२८) भल्लाट, (२९) सोम, (३०) सर्प, (३१) अदिति, (३२) दिति, (३३) अपू, (३४) सावित्र, (३५) जय, (३६) रूद्र, (३७) अर्यमा, (३८) सविता, (३९) विवस्वान्, (४०) विबुधाधिप, (४१) मित्र, (४२) राजयक्ष्मा, (४३) पृथ्वीधर, (४४) आपवत्स तथा (४५) ब्रह्मा।

इन पैतालीस देवताओंके साथ ही वास्तु-मण्डलके बाहर ईशानकोणमें चरकी, अग्निकोणमें विदारी, नैऋत्यकोणमें पूतना तथा वायव्यकोणमें पापराक्षसीकी स्थापना करनी चाहिये। मण्डलके पूर्व दिशामें स्कन्द, दक्षिणमें अर्यमा, पश्चिममें जृम्भक तथा उत्तरमें पिलिपिच्छकी स्थापना करनी चाहिये। इस प्रकार वास्तु-मण्डलमें तिरपन देवी-देवताओंकी स्थापना होती है। इन सभीका अलग-अलग मन्त्रोंसे पूजन करना चाहिये। मण्डलके बाहर ही पूर्वादि दस दिशाओंमें दस दिक्पाल देवताओं—इन्द्र, अग्नि, यम, निऋति, वरुण, वायु, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा तथा अनन्तकी भी यथास्थान पूजा कर उन्हें बलि (नैवेद्य) निवेदित करनी चाहिये। वास्तु-मण्डलकी रेखाएँ श्वेत वर्णसे तथा मध्यमें कमल लाल वर्णसे अनुरञ्जित करना चाहिये। शिखी आदि पैतालीस

देवताओंके कोष्ठकोंको रक्तादि रंगोंसे अनुरञ्जित करना चाहिये। गृह, देवमन्दिर, महाकूप आदिक निर्माणमें तथा देव-प्रतिष्ठा आदिमें वास्तु-मण्डलका निर्माण कर वास्तुमण्डलस्थ देवताओंका आवाहन कर उनका पूजन आदि करना चाहिये। पवित्र स्थानपर लिपी-पुती डेढ़ हाथके प्रमाणकी भूमिपर पूर्वसे पश्चिम तथा उत्तरसे दक्षिण दस-दस रेखाएँ खींचे। इससे इक्यासी कोष्ठकके वास्तुपद-चक्रका निर्माण होगा। इसी प्रकार ९-९ रेखाएँ खींचनेसे चौंसठ पदका वास्तुचक्र बनता है।

वास्तु-मण्डलमें जिन देवताओंका उल्लेख किया गया है, उनका ध्यान और पूजन अलग-अलग मन्त्रसे किया जाता है। उल्लिखित देवताओंकी तुष्टिके लिये विधिके अनुसार स्थापना तथा पूजा करके हवन-कार्य सम्पन्न करना चाहिये। तदनन्तर ब्राह्मणोंको सुवर्ण आदि दक्षिणा देकर संतुष्ट करना चाहिये।

वास्तु-यागादिमें एक विस्तृत मण्डलके अन्तर्गत योनि तथा मेखलाओंसे समन्वित एक कुण्ड और वास्तु-वेदीका विधिके अनुसार निर्माण करना चाहिये। मण्डलके ईशानकोणमें कलश स्थापित कर गणेशजीका एवं कुण्डके मध्यमें विष्णु, दिक्पाल और ब्रह्मा आदिका तत्तद् मन्त्रोंसे पूजन करना चाहिये। प्राणायाम करके भूतशुद्धि करे। तदनन्तर वास्तुपुरुषका ध्यान इस प्रकार करे—वास्तुदेवता श्वेतवर्णके चार भुजावाले शान्तस्वरूप और कुण्डलोंसे अलंकृत हैं। हाथमें पुस्तक, अक्षमाला, वरद एवं अभय-मुद्रा धारण किये हुए

देवताओंने वास किया। इसीलिये वह वास्तुदेवता कहलाया। देवताओंने उसे पूजित होनेका वर भी प्रदान किया। वास्तुदेवताकी पूजाके लिये वास्तुप्रतिमा तथा वास्तुचक्र बनाया जाता है। वास्तुचक्र प्रायः ४९ से लेकर एक सहस्र पदात्मक होता है। भिन्न-भिन्न अवसरोंपर भिन्न-भिन्न वास्तुचक्रोंका निर्माण कर उनमें देवताओंका आवाहन, स्थापन एवं पूजन किया जाता है। चौंसठ पदात्मक तथा इक्यासी पदात्मक वास्तुचक्रके पूजनकी परम्परा विशेषरूपसे प्रचलित है। इस सभी वास्तुचक्रके भेदोंमें प्रायः इन्द्रादि दस दिक्पालोंके साथ शिखी आदि पैतालीस देवताओंका पूजन किया जाता है तथा उन्हें पायसन्न बलि प्रदान की जाती है। वास्तुकलशमें वास्तुदेवता (वास्तोष्पति)-की पूजा कर उनसे सर्वविधि शान्ति एवं कल्याणकी प्रार्थना की जाती है।

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  • मध्यमपर्व, द्वितीय भाग *

२६१

हैं। पितरों और वैश्वानरसे युक्त हैं तथा कुटिल भूसे सुशोभित हैं। उनका मुख भयंकर है। हाथ जानुपर्यन्त लम्बे हैं१। ऐसे वास्तुपुरुषका विधिके अनुसार पूजन कर उन्हें स्नान कराये। 'वास्तोष्पते' यह वास्तुदेवताके पूजनका मुख्य मन्त्र है२। पूजाकी जितनी सामग्री है, उसे प्रोक्षणद्वारा शुद्ध कर ले। आसनकी शुद्धि कर गणेश, सूर्य, इन्द्र और आधारशक्तिरूप पृथ्वी तथा ब्रह्माका पूजन करे। तदनन्तर हाथमें श्वेत चन्दनयुक्त श्वेत पुष्प लेकर विष्णुरूप वास्तुपुरुषका ध्यान कर उन्हें आसन, पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क आदि प्रदान करे और विविध उपचारोंसे उनकी पूजा करे।

विद्वान् ब्राह्मणको चाहिये कि कुण्ड और वास्तुदेवीके मध्यमें कलशकी स्थापना करे। कलशमें पर्वतके शिखर, गजशाला, वल्मीक, नदीसंगम, राजद्वार, चौराहे तथा कुशके मूलकी—यह सात प्रकारकी मिट्टी छोड़े। साथ ही उसमें इन्द्रवल्ली (पारिजात), विष्णुकान्ता (कृष्ण शङ्खुपुष्पी), अमृती (आमलकी), त्रपुष (खीरा), मालती, चम्पक

तथा ऊर्वारुक (ककड़ी)—इन वनस्पतियोंको छोड़े। पारिभद्र (नीम)-के पत्रोंसे कलशके कण्ठका परिवेष्टन करे और कलशके मुखमें फणाकाररूपमें पञ्चपल्लवोंकी स्थापना करे। उसके ऊपर श्रीफल, बीजपूर, नारिकेल, दाड़िम, धात्री तथा जम्बूफल रखे। कलशमें सुवर्णादि पञ्चरत्न छोड़े। गन्ध-पुष्पादि पञ्चोपचारोंसे कलशका पूजन करे। कलशमें वरुणका आवाहन करे। कलशका स्पर्श करते हुए उसमें समस्त समुद्रों, तीर्थों, गङ्गादि नदियों तथा पवित्र जलाशयों आदिके पवित्र जलकी भावना कर, उनका आवाहन करे। कलश-स्थापनके अनन्तर तिल, चावल, मध्वाज्य तथा दही, दूध आदिसे यथाविधि वास्तु-होम करे। वास्तु-हवनके समय वास्तु-देवताके मन्त्रका जप करे। अनन्तर वास्तु-मण्डलके समस्त देवताओंको पायसात्र, कृशरात्र आदि पृथक्-पृथक् क्रमशः बलि निवेदित करे। सभी देवताओंको उन्हींके अनुरूप पताका भी प्रदान करे। अपनी सामर्थ्यके अनुसार मन्त्र-जप और वास्तुपुरुषस्तवका पाठ करे३। भगवान्

१-श्वेतं चतुर्भुजं शान्तं कुण्डलाधैरलंकृतम्। पुस्तकं चाक्षमालां च वराभयकरं परम्॥

पितृवैश्वानरोपेतं कुटिलभूपशोभितम्। करालवदनं चैव आजानुकरलम्बितम्॥ (मध्यमपर्व २।११।११-१२)

२-पूरा मन्त्र इस प्रकार है—

वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान्तस्वावेशो अनभीवो भवानः। यत् त्वेमेहे प्रति तन्नो जुपस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे॥

(ऋ७।५४।१)

हे वास्तुदेव! हम आपके सच्चे उपासक हैं, इसपर आप पूर्ण विश्वास करें और हमारी स्तुति-प्रार्थनाओंको सुनकर हम सभी उपासकोंको आधि-व्याधिमुक्त कर दें तथा जो हम अपने धन-श्रेयर्थकी कामना करते हैं, आप उसे भी परिपूर्ण कर दें, साथ ही इस वास्तुक्षेत्र या गृहमें निवास करनेवाले हमारे स्त्री-पुत्रादि-परिवार-परिजनोंके लिये कल्याणकारक हों एवं हमारे अधीनस्थ गौ, अश्वदि सभी चतुष्पद प्राणियोंका भी कल्याण करें।

३-भगवान् शंकरके द्वारा की गयी 'ब्रह्मस्तव' नामकी विष्णु-स्तुति इस प्रकार है—

विष्णुर्जिष्णुर्विभुर्ज्यो यज्ञियो यज्ञपालकः। नारायणो नरो हंसो विष्वक्सेनो हुताशनः॥

यज्ञेशः पुण्डरीकाक्षः कृष्णः सूर्यः सुरार्चितः। आदिदेवो जगत्कर्ता मण्डलेशो महीधरः॥

पद्मनाभो हृषीकेशो दाता दामोदरो हरिः। त्रिविक्रमस्त्रिलोकेशो ब्रह्मणः प्रीतिवर्धनः॥

भक्तप्रियोऽच्युतः सत्यः सत्यवाक्यो ध्रुवः शुचिः। संन्यासी शास्त्रतत्त्वज्ञस्त्रिपञ्चाशदगुणात्मकः॥

विदारी विनयः शान्तस्तपस्वी वैद्युतप्रभः। यज्ञस्त्वं हि वषट्कारस्त्वमंकारस्त्वमन्यः॥

त्वं स्वधा त्वं हि स्वाहा त्वं सुधा च पुरुषोत्तमः।

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२६२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

शंकरने भगवान् विष्णुस्वरूप वास्तोष्पतिकी इस स्तुतिको कहा है। इसका जो प्रयत्नपूर्वक निरन्तर पाठ करता है, उसे अमरता प्राप्त हो जाती है और जो हल्कमलके मध्य निवास करनेवाले भगवान् अच्युत-विष्णुका ध्यान करता है, वह वैष्णवी सिद्धि प्राप्त करता है। यज्ञकर्मीकी पूर्णतामें आचार्यको पयस्विनी गौ तथा सुवर्ण दक्षिणामें दे, अन्य ब्राह्मणोंको भी सुवर्ण प्रदान करे। प्राजापत्य और स्विष्टकृत हवन करे। आचार्य और ऋत्विज मिलकर यजमानपर कलशके जलसे अभिषेक करें। पूर्णाहुति देकर भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे। ब्राह्मणोंकी

आज्ञा लेकर यजमान घरमें प्रवेश करे, अनन्तर ब्राह्मण-भोजन कराये। दीन, अन्ध और कृपणोंका अपनी शक्तिके अनुसार सम्मान करे। फिर अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ स्वयं भोजन करे। उस दिन भोजनमें दूध, कसैले पदार्थ, भुने हुए शाक तथा करेला आदि निषिद्ध पदार्थोंका उपयोग न करे। शाल्यन्त्र, मूली, कटहल, आम, मधु, घी, गुड़, सेंधा नमकके साथ मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू), बदरीफल, धात्रीफल एवं तिल और मरिच आदिसे बने पदार्थ भोजनमें प्रशस्त कहे गये हैं।

(अध्याय १०—१३)

कुशकण्डिका-विधान तथा अग्नि-जिह्वाओंके नाम

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! अब मैं याग-विशेषोंमें स्वगृह्याग्नि-विधि कह रहा हूँ। अपनी वेदादि शाखाके अनुकूल ही गृह्याग्नि-विधि करनी चाहिये। दूसरेकी शाखाके विधानसे याग-विशेषोंका अनुष्ठान करनेपर भयकी प्राप्ति होती है और कीर्तिका नाश होता है। पुत्र, कन्या और आगे उत्पन्न होनेवाले पुत्रादि गृह्यानामसे कहे जाते हैं। यजमानके जितने दायद होते हैं, वे सब गृह्यानामसे कहे जाते हैं। उनके संस्कार, याग और शान्तिकर्म-क्रियाओंमें अपने गृह्याग्निसे ही अनुष्ठान करना चाहिये। आचार्यद्वारा विहित कल्पको दक्षस्मृतिमें कहा गया है। आचार्य इन कर्मोंमें तीन कुशाओंका परिग्रहण करता है। जिस मन्त्रसे कुशा ग्रहण करता है, उसके ऋषि दक्ष, जगती छन्द और विष्णु देवता हैं। पृथ्वीके शोधनमें 'भूरसिः' (यजु० १३।१८) इस मन्त्रका विनियोग करे। इस मन्त्रके ऋषि सुवर्ण हैं, गायत्री और

जगती छन्द तथा सूर्य देवता हैं। अनन्तर उन तीन कुशाओंको तर्जनी तथा अँगूटसे पकड़कर ईशानकोणसे लेकर दक्षिण होते हुए ईशानकोणतक वलयाकृतितमें घुमाये तथा उनसे भूमिका मार्जन करे। यही परिसमूहन-क्रिया है। 'मा नस्तोके ०' (यजु० १६।१६) इस मन्त्रके द्वारा गोमयसे भूमिका उपलेपन करे। तदनन्तर (खैरकी लकड़ीसे बने स्पयके द्वारा) रेखाकरण करे। पूरबसे पश्चिमकी ओर तीन रेखाएँ खींचे। पहली रेखा दक्षिणकी ओर अनन्तर उत्तरकी ओर बढ़े। इसके विपरीत करनेपर अमङ्गल होता है। इसके बाद अङ्गुष्ठ तथा अनामिकासे उन तीनों रेखाओंसे मिट्टी निकाले, इसे उद्घरण कहा जाता है। इस समय 'मित्रावरुणाभ्यां' (यजु० ७।२३) इत्यादि मन्त्रोंका स्मरण करे। अनन्तर कुशपुष्पोदक अथवा पञ्चगव्य या पञ्चरत्नोदक अथवा पञ्चपल्लवोंके जलसे अभ्युक्षण (अभिस्निग्धन) करे। अनन्तर

नमो देवादिदेवाय विष्णवे शाश्वताय च । अनन्तायाप्रमेयाय नमस्ते गरुडध्वज ॥

ब्रह्मस्त्वमिमं प्रोक्तं महादेवेन भाषितम् । प्रयत्नाद् यः पठेन्नित्यममृतत्वं स गच्छति ॥

ध्यायन्ति ये नित्यमनन्तामच्युतं हृत्पद्ममध्ये स्वयमाव्यवस्थितम् ।

उपासकानां प्रभुमेकमीश्वरं ते यन्ति सिद्धिं परमां तु वैष्णवीम् ॥ (मध्यमपर्व २।१२।१५६—१६३)

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  • मध्यमपर्व, द्वितीय भाग *

२६३

कर्मसाधनभूत लौकिक स्मार्त अथवा श्रौताग्निका आनयन करे और अपने सामने स्थापित करे। इस क्रियामें 'मे गृह्णाभिः' इस मन्त्रका पाठ करे। 'ऋव्यादमग्निः' (यजुः ३५।१९) इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए लायी गयी अग्निमेंसे कुछ आग दक्षिण दिशाकी ओर फेंक दे, यह 'ऋव्यादाग्निः' कही गयी है। ऋव्यादाग्निका ग्रहण न करे। 'संसरक्षः' इस मन्त्रसे उस अग्निका आवाहन करे। तदनन्तर 'वैश्वानरः' (यजुः २६।७) इस मन्त्रसे कुण्ड आदिमें अग्नि-स्थापन करे। 'बध्नासिः' इस मन्त्रसे अग्निकी प्रदक्षिणा करे तथा अग्निदेवको नमस्कार करे। अग्निके दक्षिणमें वरण किये गये ब्रह्माको कुशके आसनपर 'ब्रह्मन् इह उपविश्यताम्' कहकर बैठाये। उस समय 'ब्रह्म जज्ञानं' (यजुः १३।३) तथा 'दोग्धी धेनुः' इन दो मन्त्रोंका पाठ करे। अग्निके उत्तरभागमें प्रणीता-पात्रको स्थापित करे। 'इमं मे वरुणः' (यजुः २१।१) इस मन्त्रसे प्रणीता-पात्रको जलसे भर दे। इसके अनन्तर कुण्डके चारों ओर कुश-परिस्तरण करे और काष्ठ (समिधा), व्रीहि, अन्न, तिल, अपूप, भुङ्गराज, फल, दही, दूध, पनस, नारिकेल, मोदक आदि यज्ञ-सम्बन्धी प्रयोज्य पदार्थोंको यथास्थान स्थापित करे। विकंकतवृक्षकी लकड़ीसे बनी खुवा तथा शमी, शमीपत्र, चरुस्थाली आदि भी स्थापित करे। प्रणीता-पात्रका स्पर्श होम-कालमें नहीं करना चाहिये। स्नान-कुम्भको यज्ञपर्यन्त स्थिर रखना चाहिये। प्रादेशमात्रके दो पवित्रक बनाकर प्रोक्षणी-पात्रमें स्थापित करे। प्रणीता-पात्रके जलसे प्रोक्षणी-पात्रमें तीन बार जल डाले। प्रोक्षणी-पात्रको बायें हाथमें रखकर मध्यमा तथा अङ्गुष्ठसे पवित्रक ग्रहण कर 'पवित्रं ते' (ऋ ९।८३।१) इस मन्त्रसे तीन बार जल छिड़के, स्थापित पदार्थोंका प्रोक्षण करे और

प्रोक्षणी-पात्रको प्रणीता-पात्रके दक्षिण-भागमें यथास्थान रख दे। प्रादेशमात्रके अन्तरमें आज्यस्थाली रखे। घीको अग्निमें तपाये, घीमेंसे अपद्रव्योंका निरसन करे। इसके बाद पर्यग्निकरण करे। एक जलते हुए आगके अंगारेको लेकर आज्यस्थाली और चरुस्थालीके ऊपर भ्रमण कराये। इस समय 'कुलायिनी' (यजुः १४।२) इस मन्त्रका पाठ करे। अनन्तर खुवाको दायें हाथमें ग्रहण कर अग्निपर तपाये। सम्मार्जन-कुशाओंसे खुवाको मूलसे अग्रभागकी ओर सम्माजित करे। इसके बाद प्रणीताके जलसे तीन बार प्रोक्षण करे। पुनः खुवाको आगपर तपाये और प्रोक्षणीके उत्तरकी ओर रख दे। आज्यपात्रको सामने रख ले। पवित्रीसे घीका तीन बार उत्प्लवन कर ले। पवित्रीसे ईशानसे आरम्भकर दक्षिणावर्त होते हुए ईशानपर्यन्त पर्युक्षण करे। अनन्तर अग्निदेवका इस प्रकार ध्यान करे—'अग्नि देवताका रक्त वर्ण है, उनके तीन मुख हैं, वे अपने बायें हाथमें कमण्डलु तथा दाहिने हाथमें खुवा ग्रहण किये हुए हैं।' ध्यानके अनन्तर खुवा लेकर हवन करे।

इस प्रकार स्वगृह्योक्त विधिके द्वारा ब्रह्मा तथा ऋत्विजोंका वरण करना चाहिये। कुशकण्डिका-कर्म करके अग्निका पूजन करे। आधार, आज्यभाग, महाव्याहृति, प्रायश्चित्त, प्राजापत्य तथा स्वष्टकृत् हवन करे। प्रजापति और इन्द्रके निमित्त दी गयी आहुतियाँ आधारसंज्ञक हैं। अग्नि और सोमके निमित्त दी जानेवाली आहुतियाँ आज्यभाग कहलाती हैं। 'भूर्भुवः स्वः'—ये तीन महाव्याहृतियाँ हैं। 'अयाश्रग्ने' इत्यादि पाँच मन्त्र प्रायश्चित्त-संज्ञक हैं। एक प्राजापत्य आहुति तथा एक स्वष्टकृत् आहुति—इस प्रकार होममें चौदह आहुतियाँ नित्य-संज्ञक हैं। इस प्रकार चतुर्दश आहुत्यात्मक हवन कर कर्म-निमित्तक देवताको उद्देश्यकर प्रधान

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२६४

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

हवन करना चाहिये। अग्निकी सात जिह्वाएँ कही गयी हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—(१) हिरण्या, (२) कनका, (३) रक्ता, (४) आरक्ता, (५) सुप्रभा,

(६) बहुरूपा तथा (७) सती। इन जिह्वा-देवियोंके ध्यान करनेसे सम्पूर्ण फलकी प्राप्ति होती है।

(अध्याय १४—१६)

अधिवासनकर्म एवं यज्ञकर्ममें उपयोग्य उत्तम ब्राह्मण तथा धर्मदेवताका स्वरूप

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! देव-प्रतिष्ठाके पहले दिन देवताओंका अधिवासन करना चाहिये और विधिके अनुसार अधिवासनके पदार्थ—धान्य आदिकी प्रतिष्ठा कर यूप आदिको भी स्थापित कर लेना चाहिये। कलशके ऊपर गणेशजीकी स्थापना कर दिक्पाल और ग्रहोंका पूजन करना चाहिये। तड़ाग तथा उद्यानकी प्रतिष्ठामें प्रधानरूपसे ब्रह्माकी, शान्ति-यागमें तथा प्रपायागमें वरुणकी, शैव-प्रतिष्ठामें शिवकी और सोम, सूर्य तथा विष्णु एवं अन्य देवताओंका भी पाद्य-अर्घ्य आदिसे अर्चन करना चाहिये। 'द्वुपदादिव' (यजु० २०।२०) इस मन्त्रसे पहले प्रतिमाको स्नान कराये। स्नानके अनन्तर मन्त्रोंद्वारा गन्ध, फूल, फल, दूर्वा, सिंदूर, चन्दन, सुगन्धित तैल, पुष्प, धूप, दीप, अक्षत, वस्त्र आदि उपचारोंसे पूजन करे। मण्डपके अंदर प्रधान देवताका आवाहन करे और उसीमें अधिवासन करे। सुरक्षा-कर्मियोंद्वारा उस स्थानकी सुरक्षा करवाये। तदनन्तर आचार्य, यजमान और ऋत्विक् मधुर पदार्थोंका भोजन करें। बिना अधिवासन-कर्म सम्पन्न किये देव प्रतिष्ठाका कोई फल नहीं होता। नित्य, नैमित्तिक, अथवा काम्य कर्मोंमें विधिके अनुसार कुण्ड-मण्डपकी रचना कर हवनकार्य करना चाहिये।

ब्राह्मणो! यज्ञकार्यमें अनुष्ठानके प्रमाणसे आठ होता, आठ द्वारपाल और आठ याजक ब्राह्मण होने चाहिये। ये सभी ब्राह्मण शुद्ध, पवित्र तथा उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न वेदमन्त्रोंमें पारङ्गत होने चाहिये। एक जप करनेवाले जापकका भी वरण करना चाहिये। ब्राह्मणोंकी गन्ध, माल्य, वस्त्र तथा

दक्षिणा आदिके द्वारा विधिके अनुसार पूजा करनी चाहिये। उत्तम सर्वलक्षणसम्पन्न तथा विद्वान् ब्राह्मण न मिलनेपर किये गये यज्ञका उत्तम फल प्राप्त नहीं होता। ब्राह्मण वरणके समय गोत्र और नामका निर्देश करे। तुलापुरुषके दानमें, स्वर्णपर्वतके दानमें, वृषोत्सर्गमें एवं कन्यादानमें गोत्रके साथ प्रवरका भी उच्चारण करना चाहिये। मृत भार्यावाला, कृपण, शूद्रके घरमें निवास करनेवाला, बौना, वृषलीपति, बन्धुद्वेषी, गुरुद्वेषी, स्त्रीद्वेषी, हीनाङ्ग, अधिकाङ्ग, भग्नदन्त, दाम्भिक, प्रतिग्राही, कुनखी, व्यभिचारी, कुष्ठी, निद्रालु, व्यसनी, अदीक्षित, महाव्रणी, अपुत्र तथा केवल अपना ही भरण-पोषण करनेवाला—ये सब यज्ञके पात्र नहीं हैं। ब्राह्मणोंके वरण एवं पूजनके मन्त्रोंके भाव इस प्रकार हैं—आचार्यदेव! आप ब्रह्मकी मूर्ति हैं। इस संसारसे मेरी रक्षा करें। गुरो! आपके प्रसादसे ही यह यज्ञ करनेका सुअवसर मुझे प्राप्त हुआ है। चिरकालतक मेरी कीर्ति बनी रहे। आप मुझपर प्रसन्न होवें, जिससे मैं यह कार्य सिद्ध कर सकूँ। आप सब भूतोंके आदि हैं, संसाररूपी समुद्रसे पार करानेवाले हैं। ज्ञानरूपी अमृतके आप आचार्य हैं। आप यजुर्वेदस्वरूप हैं, आपको नमस्कार हैं। ऋत्विग्गणो! आप षडङ्ग वेदोंके ज्ञाता हैं, आप हमारे लिये मोक्षप्रद हों। मण्डलमें प्रवेश करके उन ब्राह्मणोंको अपने-अपने स्थानोंपर क्रमशः आदरसे बैठाये। वेदीके पश्चिम भागमें आचार्यको बैठाये, कुण्डके अग्र-भागमें ब्रह्माको बैठाये। होता, द्वारपाल आदिको भी यथास्थान आसन दे। यजमान उन आचार्य आदिको सम्बोधित कर प्रार्थना करे कि

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  • मध्यमपर्व, द्वितीय भाग *

२६५

आप सब नारायणस्वरूप हैं। मेरे यज्ञको सफल बनायें। यजुर्वेदके तत्त्वार्थको जाननेवाले ब्रह्मरूप आचार्य! आपको प्रणाम है। आप सम्पूर्ण यज्ञकर्मके साक्षीभूत हैं। ऋग्वेदार्थको जाननेवाले इन्द्ररूप ब्रह्मन्! आपको नमस्कार है। इस यज्ञकर्मकी सिद्धिके लिये ज्ञानरूपी मङ्गलमूर्ति भगवान् शिवको नमस्कार है। आप सभी दिशाओं-विदिशाओंसे इस यज्ञकी रक्षा करें। दिक्पालरूपी ब्राह्मणोंको नमस्कार है।

व्रत, देवार्चन तथा यागादि कर्म संकल्पपूर्वक करने चाहिये। काम संकल्पमूलक और यज्ञ संकल्पसम्भूत हैं। संकल्पके बिना जो धर्माचरण करता है, वह कोई फल नहीं प्राप्त कर सकता।

गङ्गा, सूर्य, चन्द्र, द्यौ, भूमि, रात्रि, दिन, सूर्य, सोम, यम, काल, पञ्च महाभूत—ये सब शुभाशुभ-कर्मके साक्षी हैं१। अतएव विचारवान् मनुष्यको अशुभ कर्मोंसे विरत हो धर्मका आचरण करना चाहिये। धर्मदेव शुभ शरीरवाले एवं श्वेत वस्त्र धारण करते हैं। वृषस्वरूप ये धर्मदेव अपने दोनों हाथोंमें वरद और अभय-मुद्रा धारण किये हैं। ये सभी प्राणियोंको सुख देते हैं और सज्जनोंके लिये एकमात्र मोक्षके कारण हैं। इस प्रकारके स्वरूपवाले भगवान् धर्मदेव सत्पुरुषोंके लिये कल्याणकारी हों तथा सदा सबकी रक्षा करें२। (अध्याय १७-१८)

प्रतिष्ठा-मुहूर्त एवं जलाशय आदिकी प्रतिष्ठा-विधि

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! ऋषियोंने देवता आदिकी प्रतिष्ठामें माघ, फाल्गुन आदि छः मास नियत किये हैं। जबतक भगवान् विष्णु शयन नहीं करते, तबतक प्रतिष्ठा आदि कार्य करने चाहिये। शुक्र, गुरु, बुध तथा सोम—ये चार बार शुभ हैं। जिस लगनमें शुभ ग्रह स्थित हों एवं शुभ ग्रहोंकी दृष्टि पड़ती हो, उस लगनमें प्रतिष्ठा करनी चाहिये। तिथियोंमें द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी, सप्तमी, दशमी, त्रयोदशी तथा पूर्णिमा तिथियाँ उत्तम हैं। प्राण-प्रतिष्ठा एवं जलाशय आदि कार्य प्रशस्त शुभ मुहूर्तमें ही करने चाहिये। देवप्रतिष्ठा और बड़े यागोंमें सोलह हाथका एवं चार द्वारोंसे युक्त मण्डपका निर्माण करके उसके दिशा-विदिशाओंमें शुभ्र ध्वजारें फहरानी चाहिये। पाकड़, गूलर, पीपल तथा बरगदके तोरण चारों द्वारोंपर पूर्वादि क्रममें बनाये। मण्डपको मालाओं आदिसे अलंकृत करे। दिक्पालोंकी पताकाएँ

उनके वर्णोंके अनुसार बनवानी चाहिये। मध्यमें नीलवर्णकी पताका लगानी चाहिये। ध्वज-दण्ड यदि दस हाथका हो तो पताका पाँच हाथकी बनवानी चाहिये। मण्डपके द्वारोंपर कदली-स्तम्भ रखना चाहिये तथा मण्डपको सुसज्जित करना चाहिये। मण्डपके मध्यमें एवं कोणोंमें वेदियोंकी रचना करनी चाहिये। योनि और मेखलामण्डित कुण्डका तथा वेदीपर सर्वतोभद्र-चक्रका निर्माण करना चाहिये। कुण्डके ईशान-भागमें कलशकी स्थापना कर उसे माला आदिसे अलंकृत करना चाहिये।

यजमान पञ्चदेव एवं यज्ञेश्वर नारायणको नमस्कार कर प्रतिष्ठा आदि क्रियाका संकल्प करके ब्राह्मणोंसे इस प्रकार अनुज्ञा प्राप्त करे—‘मैं इस पुण्य देशमें शास्त्रोक्त-विधिसे जलाशय आदिकी प्रतिष्ठा करूँगा। आप सभी मुझे इसके लिये आज्ञा प्रदान करें।’ ऐसा कहकर मातृ-श्राद्ध एवं वृद्धि-श्राद्ध सम्पन्न

१-गङ्गा चादित्यचन्द्रौ च द्यौर्भूमौ रात्रिवासरी ॥

सूर्यः सोमो यमः कालो महाभूतानि पञ्च च। एते शुभाशुभस्थेह कर्मणो नव साक्षिणः ॥ (मध्यमपर्व २।१८।४३-४४)

२-धर्मः शुभ्रवपुः सिताम्बधरः कार्याध्वंदेशे वृषो हस्ताभ्यामभयं वरं च सततं रूपं परं यो दधत्।

सर्वप्राणिसुखावहः कृतधियां मोक्षकहेतुः सदा सोऽयं पातु जगन्ति चैव सततं भूयात् सतां भूतये ॥ (मध्यमपर्व २।१८।४६)

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२६६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

करे। भेरी आदिके मङ्गलमय वाद्योंके साथ मण्डपमें षोडशाक्षर 'हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।' आदि मन्त्र लिखे एवं इन्द्रादि दिकपाल देवताओं तथा उनके आयुधों आदिका भी यथास्थान चित्रण करे। फिर आचार्य और ब्रह्माका वरण करे। वरणके अनन्तर आचार्य तथा ब्रह्मा यजमानसे प्रसन्न हो उसके सर्वविध कल्याणकी कामना करके 'स्वस्ति' ऐसा कहे। अनन्तर सपत्नीक यजमानको सर्वौषधियोंसे 'आपो हि घ्ना' (यजु० ११।५०) इस मन्त्रद्वारा ब्रह्मा, ऋत्विक् आदि स्नान करायें। यव, गोधूम, नीवार, तिल, साँवा, शालि, प्रियंगु और व्रीहि—ये आठ सर्वौषधि कहे गये हैं। आचार्यादिद्वारा अनुज्ञात सपत्नीक यजमान शुक्ल वस्त्र तथा चन्दन आदि धारणकर पुरोहितको आगेकर मङ्गल-घोषके साथ पुत्र-पौत्रादिसहित पश्चिमद्वारसे यज्ञ-मण्डपमें प्रवेश करे। वहाँ वेदीकी प्रदक्षिणा कर नमस्कार करे। ब्राह्मणकी आज्ञाके अनुसार यजमान निश्चित आसनपर बैठे। ब्राह्मणलोग स्वस्तिवाचन करें। अनन्तर यजमान पाँच देवोंका पूजन करे। फिर सरसों आदिसे विघ्नकर्ता भूतोंका अपसर्पण कराये। यजमान अपने बैठनेके आसनका पुष्प-चन्दनसे अर्चन करे। अनन्तर भूमिका हाथसे स्पर्शकर इस प्रकार कहे—'पृथ्वीमाता! तुमने लोकोंको धारण किया है और तुम्हें विष्णुने धारण किया है। तुम मुझे धारण करो और मेरे आसनको पवित्र करो*।' फिर सूर्यको अर्घ्य देकर गुरुको हाथ जोड़कर प्रणाम करे। हृदयकमलमें इष्ट देवताका ध्यान कर तीन प्राणायाम करे। ईशान दिशामें कलशके ऊपर विघ्नराज गणेशजीकी गन्ध, पुष्प, वस्त्र तथा विविध नैवेद्य आदिसे 'गणानां त्वा' (यजु० २३।१९) मन्त्रसे पूजन करे। अनन्तर 'आ ब्रह्मन्' (यजु० २२।२२) इस मन्त्रसे ब्रह्माजीकी, 'तद्विष्णोः' (यजु० ६।५) इस मन्त्रसे भगवान्

विष्णुकी पूजा करे। फिर वेदीके चारों ओर सभी देवताओंको स्व-स्व स्थानपर स्थापित कर उनका पूजन करे। इसके बाद 'राजाधिराजाय प्रसह्य' इस मन्त्रसे भूशुद्धि कर श्वेत पद्यासनपर विराजमान, शुद्धस्फटिक तथा शङ्खु, कुन्द एवं इन्दुके समान उज्ज्वल वर्ण, किरीट-कुण्डलधारी, श्वेत कमल, श्वेत माला और श्वेत वस्त्रसे अलंकृत, श्वेत गन्धसे अनुलिस, हाथमें पाश लिये हुए, सिद्ध गन्धर्वों तथा देवताओंसे स्तूयमान, नागलोककी शोभारूप, मकर, ग्राह, कूर्म आदि नाना जलचरोंसे आवृत, जलशायी भगवान् वरुणदेवका ध्यान करे। ध्यानके अनन्तर पञ्चाङ्गन्यास कर मूलमन्त्रका जप करे तथा उस जलसे आसन, यज्ञ-सामग्री आदिका प्रोक्षण करे। फिर भगवान् सूर्यको अर्घ्य दे। अनन्तर ईशानकोणमें भगवान् गणेश, अग्निकोणमें गुरुपादुका तथा अन्य देवताओंका यथाक्रम पूजन करे। मण्डलके मध्यमें शक्ति, सागर, अनन्त, पृथ्वी, आधारशक्ति, कूर्म, सुमेरु तथा मन्दर और पञ्चतत्त्वोंका साङ्गोपाङ्ग पूजन करे। पूर्व दिशामें कलशके ऊपर श्वेत अक्षत और पुष्प लेकर भगवान् वरुणदेवका आवाहन करे। वरुणको आठ मुद्रा दिखाये। गायत्रीसे स्नान कराये तथा पाद्य, अर्घ्य, पुष्पाञ्जलि आदि उपचारोंसे वरुणका पूजन करे। ग्रहों, लोकपालों, दस दिकपालों तथा पीठपर ब्रह्मा, शिव, गणेश और पृथ्वीका गन्ध, चन्दन आदिसे पूजन करे। पीठके ईशानादि कोणोंमें कमला, अम्बिका, विश्वकर्मा, सरस्वती तथा पूर्वदि द्वारोंमें उनचास मरुद्गणोंका पूजन करे। पीठके बाहर पिशाच, राक्षस, भूत, बेताल आदिकी पूजा करे। कलशपर सूर्यादि नवग्रहोंका आवाहन एवं ध्यानकर पाद्य, अर्घ्य, गन्ध, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य तथा बलि आदिद्वारा मन्त्रपूर्वक उनकी पूजा करे और उनकी पताकाएँ उन्हें निवेदित करे।

  • पृथिव्यं त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता ॥

त्वं च धारय मां नित्यं पवित्रभासनं कुरु। (मध्यमपर्व २।२०।२३-२४)

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  • मध्यमपर्व, द्वितीय भाग *

२६७

विधिपूर्वक सभी देवताओंका पूजन कर शतरुद्रियका पाठ करना चाहिये। हवन करनेके समय वारुणसूक्त, रात्रिसूक्त, रौद्रसूक्त, पवमानसूक्त, पुरुषसूक्त, शाक्तसूक्त, अग्निसूक्त, सौरसूक्त, ज्येष्ठसाम, वामदेवसाम, रथन्तरसाम तथा रक्षोच्च आदि सूक्तोंका पाठ करना चाहिये। अपने गृह्योक्त-विधिसे कुण्डोंमें अग्नि प्रदीप्त कर हवन करना चाहिये। जिस देवका यज्ञ होता है अथवा जिस देवताकी प्रतिष्ठा हो उसे प्रथम आहुतियाँ देनी चाहिये। अनन्तर तिल, आज्य, पायस, पत्र, पुष्प, अक्षत तथा समिधा आदिसे अन्य देवताओंके मन्त्रोंसे उन्हें आहुतियाँ देनी चाहिये।

पञ्चदिवसात्मक प्रतिष्ठायागमें प्रथम दिन देवताओंका आवाहन एवं स्थापन करना चाहिये। दूसरे दिन पूजन और हवन, तीसरे दिन बलि-प्रदान, चौथे दिन चतुर्थीकर्म और पाँचवें दिन नीराजन करना चाहिये। नित्यकर्म करनेके अनन्तर ही नैमित्तिक कर्म करने चाहिये। इसीसे कर्मफलकी प्राप्ति होती है।

दूसरे दिन प्रातःकाल सर्वप्रथम प्रतिष्ठाप्य देवताका सर्वोषधिमिश्रित जलसे ब्राह्मणोंद्वारा वेदमन्त्रोंके पाठपूर्वक महास्नान तथा मन्त्राभिषेक कराये, तदनन्तर चन्दन आदिसे उसे अनुलिप्त करे। तत्पश्चात् आचार्य आदिकी पूजा कर उन्हें अलंकृत कर गोदान करे। फिर मङ्गल-घोषपूर्वक तालाबमें जल छोड़नेके लिये संकल्प करे। इसके बाद उस तालाबके जलमें नागयुक्त वरुण, मकर, कच्छप आदिकी अलंकृत प्रतिमाएँ छोड़े। वरुणदेवकी विशेषरूपसे पूजा कर उन्हें अर्घ्य निवेदित करे। पुनः उसी तालाबके जल, सप्तमृत्तिका-मिश्रित जल, तीर्थजल, पञ्चामृत, कुशोदक तथा पुष्पजल आदिसे वरुणदेवको स्नान कराकर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि प्रदान

करे। सभी देवताओंको बलि प्रदान करे। मङ्गलघोषके साथ नीराजन कर प्रदक्षिणा करे। एक वेदीपर भगवान् वरुण तथा पुष्करिणीदेवीकी यथाशक्ति स्वर्ण आदिकी प्रतिमा बनाकर भगवान् वरुणदेवके साथ देवी पुष्करिणीका विवाह कराकर उन्हें वरुणदेवके लिये निवेदित कर दे। एक काष्ठका यूप जो यजमानकी ऊँचाईके बराबर हो, उसे अलंकृत कर तडागके ईशान दिशामें मन्त्रपूर्वक गाड़कर स्थिर कर दे। प्रासादके ईशानकोणमें, प्रपाके दक्षिण भागमें तथा आवासके मध्यमें यूप गाड़ना चाहिये। इसके अनन्तर दिव्यालोंको बलि प्रदान करे। ब्राह्मणोंको भोजन एवं दक्षिणा प्रदान करे।

उस तडागके जलके मध्यमें 'जलमातृभ्यो नमः' ऐसा कहकर जलमातृकाओंका पूजन करे और मातृकाओंसे प्रार्थना करे कि मातृका देवियो! तीनों लोकोंके चराचर प्राणियोंकी संतुसिके लिये यह जल मेरे द्वारा छोड़ा गया है, यह जल संसारके लिये आनन्ददायक हो। इस जलाशयकी आपलोग रक्षा करें। ऐसी ही मङ्गल-प्रार्थना भगवान् वरुणदेवसे भी करे। अनन्तर वरुणदेवको बिम्ब, पद्म तथा नागमुद्राएँ दिखाये। ब्राह्मणोंको उस जलाशयका जल भी दक्षिणाके रूपमें प्रदान करे। अनन्तर तर्पण कर अग्निकी प्रार्थना करे। स्वयं भी उस जलका पान करे। पितरोंको अर्घ्य प्रदान करे। अनन्तर पुनः वरुणदेवकी प्रार्थना कर, जलाशयकी प्रदक्षिणा करे। फिर ब्राह्मणोंद्वारा वेद-ध्वनियोंके उच्चारणपूर्वक यजमान अपने घरमें प्रवेश करे और ब्राह्मणों, दीनों, अन्धों, कृपणों तथा कृमारिकाओंको भोजन कराकर संतुष्ट करे एवं भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे।

(अध्याय १९-२१)

॥ मध्यमपर्व, द्वितीय भाग सम्पूर्ण ॥

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

मध्यमपर्व

(तृतीय भाग) उद्यान-प्रतिष्ठा-विधि

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! उद्यान आदिकी प्रतिष्ठामें जो कुछ विशेष विधि है, अब उसे बता रहा हूँ, आपलोग सुनें। सर्वप्रथम एक चौकोर मण्डलकी रचना कर उसपर अष्टदल कमल बनाये। मण्डलके ईशानकोणमें कलशकी स्थापना कर उसपर भगवान् गणनाथ और वरुणदेवकी पूजा करे। तदनन्तर मध्यम कलशमें सूर्यादि ग्रहोंका पूजन करे। फिर पश्चिमादि द्वारदेशोंमें ब्रह्मा और अनन्त तथा मध्यमें वरुणकी पूजा करे। जलपूरित कलशमें भगवान् वरुणका आवाहन करते हुए कहे—‘वरुणदेव! मैं आपका आवाहन करता हूँ। विभो! आप हमें स्वर्ग प्रदान करें।’ तदनन्तर पूर्वभागमें मन्दरगिरिकी स्थापना कर तोरणपर विष्वक्सेनकी पूजा करे और कर्णिका-देशमें भगवान् वासुदेवका पूजन करे। भगवान् वासुदेव शुद्ध स्फटिकके सदृश हैं। वे अपने चारों हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए हैं। उनके वक्षःस्थलपर श्रीवत्स-चिह्न और कौस्तुभमणि सुशोभित है तथा मस्तक सुन्दर मुकुटसे अलंकृत है। उनके दक्षिण भागमें भगवती कमला, वाम भागमें पुष्टिदेवी विराजमान हैं। सुर, असुर, सिद्ध, किन्नर, यक्ष आदि उनकी स्तुति करते हैं। ‘विष्णो रराटः’ (यजु० ५।२१) इस मन्त्रसे भगवान् विष्णुकी पूजा करे। उनके साथमें संकर्वणादि-व्यूह और विमला आदि शक्तियोंकी धूप, दीप आदि उपचारोंसे अर्चना कर प्रार्थना करे। उनके सामने घीका दीप जलाये और गुगुलका धूप प्रदान कर घृतमिश्रित खीरका नैवेद्य लगाये। कर्णिकाके दक्षिणकी ओर कमलके

ऊपर स्थित सोमका ध्यान करे। उनका वर्ण शुक्ल है, वे शान्तस्वरूप हैं, वे अपने हाथोंमें वरद और अभय-मुद्रा धारण किये हैं एवं केयूरादि धारण करनेके कारण अत्यन्त शोभित हैं। ‘इमं देवा’ (यजु० ९।४०) इस मन्त्रसे इनकी पूजा कर इन्हें घृतमिश्रित भातका नैवेद्य अर्पण करे। पूर्व आदि दिशाओंमें इन्द्र, जयन्त, आकाश, वरुण, अग्नि, ईशान, तत्पुरुष तथा वायुकी पूजा करे। कर्णिकाके वाम भागमें शुक्ल वर्णवाले महादेवका ‘ज्यम्बकं’ (यजु० ३।६०) इस मन्त्रसे पूजन कर नैवेद्य आदि प्रदान करे। भगवान् वासुदेवके लिये हविष्यसे आठ, सोमके लिये अट्टाईस तथा शिवके लिये दो खीरकी आहुतियाँ दे। गणेशजीको घीकी एक आहुति दे। ब्रह्मा एवं वरुणके लिये एक-एक आहुति और ग्रहों एवं दिक्पालोंके लिये विहित समिधाओं तथा घीसे एक-एक आहुतियाँ दे।

अग्निकी सात जिह्वाओं—कराली, धूमली, श्वेता, लोहिता, स्वर्णप्रभा, अतिरिक्ता और पद्मरागाको भी मन्त्रोंसे घृत एवं मधुमिश्रित हविष्यद्वारा एक-एक आहुति प्रदान करे। इसी प्रकार अग्नि, सोम, इन्द्र, पृथ्वी और अन्तरिक्षके निमित्त मधु और क्षीरयुक्त यवोंसे एक-एक आहुतियाँ प्रदान करे। फिर गन्ध-पुष्पादिसे उनकी पृथक्-पृथक् पूजा करके रुद्रसूक्त तथा सौरसूक्तका जप करे। अनन्तर यूपको भलीभाँति स्नान कराकर और उसका मार्जन कर उसे उद्यानके मध्य भागमें गाड़ दे। यूपके प्रान्त-भागमें सोम तथा वनस्पतिके लिये ध्वजाओंको लगा दे। ‘कोऽदात्कस्मा’ (यजु० ७।४८) इस

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  • मध्यमपर्व, तृतीय भाग *

२६९

मन्त्रसे वृक्षोंका कर्णवेध संस्कार करे। एक तीखी सूर्यसे वृक्षके दक्षिण तथा वाम भागके दो पत्तोंका छेदन करे। नवग्रहोंकी तुसिके लिये लडू आदिका भोग लगाये तथा बालक और कुमारियोंको मालपूआ खिलाये। रंजित सूत्रोंसे उद्यानके वृक्षोंको आवेष्टित करे। उन वृक्षोंको जलादिका प्राशन कराये और यह प्रार्थना-मन्त्र पढ़े—

वृक्षाग्रात् पतितस्यापि आरोहात् पतितस्य च। मरणे वास्ति भङ्गे वा कर्ता पापैर्न लिप्यते ॥

(मध्यमपर्व ३।१।३१)

तात्पर्य यह कि विधिपूर्वक उद्यान आदिमें लगाये गये वृक्षके ऊपरसे यदि कोई गिर जाय, गिरकर मर जाय या अस्थि टूट जाय तो उस पापका भागी वृक्ष लगानेवाला नहीं होता।

उद्यानके निमित्त पूजा आदि कर्म करानेवाले आचार्यको स्वर्ण, धान, गाय तथा दक्षिणा प्रदान कर उनकी प्रदक्षिणा करे। ऋत्विक्को भी स्वर्ण, रजत आदि दक्षिणामें दे। ब्रह्माको भी दक्षिणा देकर संतुष्ट करे एवं अन्य सदस्योंको भी प्रसन्न करे। अनन्तर यजमान स्थापित अधिकलशके जलसे स्नान करे। सूर्यास्तसे पूर्व ही पूर्णाहुति सम्पन्न करे। सम्पूर्ण कार्य पूर्णकर अपने घर जाय और विप्राके द्वारा वहाँ बल, काम, हयग्रीव, माधव, पुरुषोत्तम, वासुदेव, धनाध्यक्ष और नारायण—इन सबका विधिवत् स्मरण कर पूजन कराये और पञ्चगव्यमिश्रित दधि-भातका नैवेद्य समर्पित करे।

बल आदि देवताओंकी पूजा करनेके पश्चात् दक्षिणकी ओर 'स्योना पृथिवी' (यजु० ३५।२१) इस मन्त्रसे पृथ्वीदेवीका पूजन करे। मधुमिश्रित पायसात्रका नैवेद्य अर्पित करे। पृथ्वीदेवी शुद्ध

काञ्चन वर्णकी आभासे युक्त हैं। हाथमें वरद और अभयमुद्रा धारण किये हुए हैं। सम्पूर्ण अलंकारोंसे अलंकृत हैं। घरके वाम भागमें विश्वकर्माका यजन करे। 'विश्वकर्मन्' (ऋ० १०।८१।६) यह मन्त्र उनके पूजनमें विनियुक्त है। भगवान् विश्वकर्माका वर्ण शुद्ध स्फटिकके समान है, ये शूल और टंकको धारण करनेवाले हैं तथा शान्तस्वरूप हैं। इन्हें मधु और पिष्टककी बलि दे। अनन्तर कौष्माण्डसूक्त तथा पुरुषसूक्तका पाठ करे। इसी पृथ्वी-होम-कर्ममें मधु और पायस-युक्त हविष्यसे आठ आहुतियाँ दे तथा अन्य देवताओंको एक-एक आहुति दे।

उद्यानके चारों ओर अथवा बीच-बीचमें उद्यानकी रक्षाके लिये मेड़ोंका निर्माण करे, जिन्हें धर्मसेतु कहा जाता है। उद्यानकी दृढ़ताके लिये विशेष प्रबन्ध करे। धर्मसेतुका निर्माण कर उनसे इस प्रकार प्रार्थना करे—

पिच्छले पतितानां च उच्छ्रितेनाङ्गसंगतः ॥ प्रतिष्ठिते धर्मसेतौ धर्मो मे स्यान्न पातकम्। ये चात्र प्राणिनः सन्ति रक्षां कुर्वन्ति सेतवः। वेदागमेन यत्पुण्यं यथैव हि समर्पितम् ॥

(मध्यमपर्व ३।१।४४-४६)

तात्पर्य यह कि यदि कोई व्यक्ति इस धर्मसेतु (मेड़)-पर चलते समय गिर जाय, फिसल जाय तो इस धर्मसेतुके निर्माणका कोई पाप मुझे न लगे। क्योंकि इस धर्मसेतुका निर्माण मैंने धर्मकी अभिवृद्धिके लिये ही किया है। इस स्थानपर आनेवाले प्राणियोंकी ये धर्मसेतु रक्षा करते हैं। वेदाध्ययन आदिसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह पुण्य इस धर्म-सेतुके निर्माण करनेपर प्राप्त होता है। (अध्याय १)

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२७०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

गोचर-भूमिके उत्सर्ग तथा लघु उद्यानोंकी प्रतिष्ठा-विधि

[भारतमें पहले सभी ग्राम-नगरोंकी सभी दिशाओंमें कुछ दूरतक गोचर-भूमि रहती थी। उसमें गाये स्वच्छन्द-रूपसे चरती थीं और वह भूमि सर्वसामान्यके भी घूमने-फिरनेके उपयोगमें आती थी। छोटे-छोटे बालक भी उसमें क्रीड़ा करते थे। यह प्रथा अभी कुछ दिनों पहलेतक थी, पर अब वह सर्वथा लुप्त हो गयी है, इससे गो-धनकी बड़ी हानि हुई है। जिसका फल प्रकृति अनावृष्टि, भीषण महर्घता (महँगरी), दुष्कालकी स्थिति, भूकम्प, महायुद्ध और सर्वत्र निर्दोष लोगोंकी हत्याके रूपमें परोक्ष तथा प्रत्यक्ष-रूपसे दे रही है। इसकी निवृत्तिका एकमात्र समाधान है प्राचीन पुराणोक्त सदाचार, गो-सेवा और आस्तिकतापूर्ण आध्यात्मिक दृष्टिका पुनः अनुसंधान और अनुसरण करना। भला, आजकी दशासे, जहाँ किसीको भी किसी भी स्थितिमें तनिक भी शान्ति नहीं है, इससे अधिक और चिन्ताकी बात क्या हो सकती है। इस दृष्टिसे यह अध्याय विशेष महत्त्वका है और सभी पाठकोंको अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक अपने-अपने ग्राम-नगरोंके चतुर्दिक गोचरका या गो-प्रचार-भूमिका उत्सर्ग कर गो-संरक्षणमें हाथ बँटाना चाहिये।—सम्पादक]

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! अब मैं गोचर-भूमिके विषयमें बता रहा हूँ, आप सुनें। गोचर-भूमिके उत्सर्ग-कर्ममें सर्वप्रथम लक्ष्मीके साथ भगवान् विष्णुकी विधिके अनुसार पूजा करनी चाहिये। इसी तरह ब्रह्मा, रुद्र, करालिका, वराह, सोम, सूर्य और महादेवजीका क्रमशः विविध उपचारोंसे पूजन करे। हवन-कर्ममें लक्ष्मीनारायणको तीन-तीन आहुतियाँ घीसे दे। क्षेत्रपालोंको मधुमिश्रित एक-एक लाजाहुति दे। गोचरभूमिका उत्सर्ग करके विधानके अनुसार यूपकी स्थापना करे तथा उसकी अर्चना करे। वह यूप तीन हाथका ऊँचा और नागफणोंसे युक्त होना चाहिये। उसे एक हाथसे भूमिके मध्यमें गाड़ना चाहिये। अनन्तर 'विश्वेषा' (ऋ० १०।२।६) इस मन्त्रका उच्चारण करे और 'नागाधिपतये नमः', 'अच्युताय नमः' तथा 'भीमाय नमः' कहकर यूपके लिये लाजा निवेदित करे। 'मधि गृह्णाभ्य' (यजु० १३।१) इस मन्त्रसे रुद्रमूर्तिस्वरूप उस यूपकी पञ्चोपचार-पूजा करे। आचार्यको अन्न, वस्त्र और दक्षिणा दे तथा होता एवं अन्य ऋत्विजोंको भी अभीष्ट दक्षिणा दे। इसके बाद उस गोचरभूमिमें रत्न छोड़कर इस मन्त्रको पढ़ते हुए गोचरभूमिका उत्सर्ग कर दे—

शिवलोकस्तथा गावः सर्वदेवसुपूजिताः ॥ गोभ्य एषा मया भूमिः सम्प्रदत्ता शुभाधिन।

(मध्यमपर्व ३।२।१२-१३)

'शिवलोकस्वरूप यह गोचरभूमि, गोलोक तथा गौएँ सभी देवताओंद्वारा पूजित हैं, इसलिये कल्याणकी कामनासे मैंने यह भूमि गौओंके लिये प्रदान कर दी है।'

इस प्रकार जो समाहित-चित्त होकर गौओंके लिये गोचरभूमि समर्पित करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकमें पूजित होता है। गोचरभूमिमें जितनी संख्यामें तृण, गुल्म उगते हैं, उतने हजारों वर्षतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। गोचरभूमिकी सीमा भी निश्चित करनी चाहिये। उस भूमिकी रक्षाके लिये पूर्वमें वृक्षोंका रोपण करे। दक्षिणमें सेतु (मेड़) बनाये। पश्चिममें कँटीले वृक्ष लगाये और उत्तरमें कूपका निर्माण करे। ऐसा करनेसे कोई भी गोचरभूमिकी सीमाका लङ्घन नहीं कर सकेगा। उस भूमिको जलधारा और घाससे परिपूर्ण करे। नगर या ग्रामके दक्षिण दिशामें गोचरभूमि छोड़नी चाहिये। जो व्यक्ति किसी अन्य प्रयोजनसे गोचरभूमिको जोतता, खोदता या नष्ट करता है, वह अपने कुलोंको पातकी बनाता है और अनेक ब्रह्म-हत्याओंसे आक्रान्त हो जाता है।

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  • मध्यमपर्व, तृतीय भाग *

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जो भलीभाँति दक्षिणाके साथ गोचर्म-भूमिका* दान करता है, वह उस भूमिमें जितने तृण हैं, उतने समयतक स्वर्ग और विष्णुलोकसे च्युत नहीं होता। गोचरभूमि छोड़नेके बाद ब्राह्मणोंको संतुष्ट करे। वृषोत्सर्गमें जो भूमि-दान करता है, वह प्रेतयोनिको प्राप्त नहीं होता। गोचर-भूमिके उत्सर्गके समय जो मण्डप बनाया जाता है, उसमें भगवान् वासुदेव और सूर्यका पूजन तथा तिल, गुड़की आठ-आठ आहुतियोंसे हवन करना चाहिये। 'देहि मे०' (यजु० ३।५०) इस मन्त्रसे मण्डपके ऊपर चार शुक्ल घट स्थापित करे। अनन्तर सौर-सूक्त और वैष्णव-सूक्तका पाठ करे। आठ वटपत्रोंपर आठ दिक्पाल देवताओंके चित्र या प्रतिमा बनाकर उन्हें पूर्वदि आठ दिशाओंमें स्थापित करे और पूर्वदि दिशाओंके अधिपतियों—इन्द्र, अग्नि, यम, निर्वृति आदिसे गोचरभूमिकी रक्षाके लिये प्रार्थना करे। प्रार्थनाके बाद चारों वर्णोंकी, मृग एवं पक्षियोंकी अवस्थितिके लिये विशेषरूपसे भगवान् वासुदेवकी प्रसन्नताके लिये गोचरभूमिका उत्सर्जन करना चाहिये। गोचरभूमिके नष्ट-भ्रष्ट हो जानेपर, घासके जीर्ण हो जानेपर तथा पुनः घास उगानेके लिये पूर्ववत् प्रतिष्ठा करनी चाहिये, जिससे गोचरभूमि अक्षय बनी रहे। प्रतिष्ठाकार्यके निमित्त भूमिके खोदने आदिमें कोई जीव-जन्तु मर जाय तो उससे मुझे पाप न लगे, प्रत्युत धर्म ही हो और इस गोचरभूमिमें निवास करनेवाले मनुष्यों, पशु-पक्षियों, जीव-जन्तुओंका आपके अनुग्रहसे निरन्तर कल्याण हो ऐसी भगवान्से प्रार्थना करनी चाहिये। अनन्तर

गोचरभूमिको त्रिगुणित पवित्र धागेद्वारा सात बार आवेष्टित कर दे। आवेष्टनके समय 'सुत्रामार्ण पृथिवीं०' (ऋ० १०।६३।१०) इस ऋचाका पाठ करे। अनन्तर आचार्यको दक्षिणा दे। मण्डपमें ब्राह्मणोंको भोजन कराये। दीन, अन्ध एवं कृपणोंको संतुष्ट करे। इसके बाद मङ्गल-ध्वनिके साथ अपने घरमें प्रवेश करे। इसी प्रकार तालाब, कुआँ, कूप आदिकी भी प्रतिष्ठा करनी चाहिये, विशेषरूपसे उसमें वरुणदेवकी और नागोंकी पूजा करनी चाहिये।

ब्राह्मणो! अब मैं छोटे एवं साधारण उद्यानोंकी प्रतिष्ठाके विषयमें बता रहा हूँ। इसमें मण्डल नहीं बनाना चाहिये। बल्कि शुभ स्थानमें दो हाथके स्थाण्डिलपर कलश स्थापित करना चाहिये। उसपर भगवान् विष्णु और सोमकी अर्चना करनी चाहिये। केवल आचार्यका वरण करे। सूत्रसे वृक्षोंको आवेष्टित कर पुष्प-मालाओंसे अलंकृत करे। अनन्तर जलधारासे वृक्षोंको सींचे। पाँच ब्राह्मणोंको भोजन कराये। वृक्षोंका कर्णवेध संस्कार करे और संकल्पपूर्वक उनका उत्सर्जन कर दे। मध्य देशमें यूप स्थापित करे और दिशा-विदिशाओं तथा मध्य देशमें कदली-वृक्षका रोपण करे एवं विधानपूर्वक घीसे होम करे। फिर स्विष्टकृत हवन कर पूर्णाहुति दे। वृक्षके मूलमें धर्म, पृथ्वी, दिशा, दिक्पाल और यक्षकी पूजा करे तथा आचार्यको संतुष्ट करे। दक्षिणामें गाय दे। सब कार्य विधानके अनुसार परिपूर्ण कर भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे।

(अध्याय २-३)

  • गर्वां शतं वृषश्वेको यत्र तिष्ठत्ययन्त्रितः । तद्गोचर्मिति विख्यातं दत्तं सर्वाधनाशनम् ॥

जिस गोचरभूमिमें सौ गायें और एक बैल स्वतन्त्र रूपसे विचरण करते हों, वह भूमि गोचर्म-भूमि कहलाती है। ऐसी भूमिका दान करनेसे सभी पापोंका नाश होता है। अन्य बृहस्पति, वृद्धहारीत, शातातप आदि स्मृतियोंके मतसे प्रायः ३,००० हाथ लम्बी-चौड़ी भूमिकी संज्ञा गोचर्म है।

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