भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
भोजप्रबन्धः ६७ दूसरे दिन दूसरा चरण लिखा देख मन्त्री ने स्वयं तीसरा चरण लिख दिया- 'यदि वह लक्ष्मी चली जाय तो फिर क्या होगा ?' अगले दिन राजा ने चौथा चरण लिख दिया---'उसके संग ही चला जायगा सब संचित धन ।' तो मुख्य मंत्री राजा के चरणों में गिर गया और बोला---'महाराज, मेरा यह अपराध क्षमा करें ।' अन्यदा धाराधीश्वरमुपरि सौधभूमौ शयानं मत्वा कश्चिद्द्विजचोरः खातपातपूर्व राज्ञः कोशगृहं प्रविश्य बहूनि विविधरत्नानि वैडूर्यादीनि हृत्वा तानि परलोकऋणानि मत्वा तत्रैव वैराग्यमापन्नो विचारयामास- 'यद्व्यङ्गाः कुष्ठिनश्चान्धाः पङ्गवश्च दरिद्रिणः । पूर्वोपार्जितपापस्य फलमश्नन्ति देहिनः' ॥ १९९ ॥ और एकवार धाराविपति को ऊपर प्रासाद में सोया जान कोई ब्राह्मण चोर सेंध लगा कर राजा के खजाने में घुस गया और बहुत से अनेक प्रकार के रत्न लहसुनिया आदि चुराकर और यह समझ कर कि यह सब परलोक में चुकाया जाने के निमित्त ऋण उसपर चढ़ गया, वैराग्य को प्राप्त हो विचारने लगा - अंगहीन, कोढ़ी, अंधे, लंगड़े और दरिद्री देहधारी प्राणी संचित पाप का फल भोगा करते हैं । ततो राजा निद्राक्षये दिव्यशयनस्थितो विविधमणिकङ्कणालङ्कृतं दयितवर्गं दर्शनीयमालोक्य गजतुरगरथपदातिसामग्रीं च चिन्तयन् राज्यसुखसन्तुष्टः प्रमोद्भरादाह- 'चेतोहरा युवतयः सुहृदोऽनुकूलाः सद्बान्धवाः प्रणयगर्भगिरश्च भृत्याः । वल्गन्ति दन्तिनिवहास्तरलास्तुरङ्गाः' इति चरणत्रयं राज्ञोक्तम् । चतुर्थचरणं राज्ञो मुखान्न निःसरति तदा चोरेण श्रुत्वा पूरितम्- 'सम्मीलने नयनयोर्नहि किञ्चिदस्ति' ॥ २०० ॥ तदनंतर नींद टूटने पर दिव्य शैया पर बैठा, अनेक विध मणि जटित कंकणों से सुसज्जित अपनी प्रिया मंडली और हाथी, घोड़े, रथ और पैदल ७ भोज०
६८ भोजप्रबन्धः सेना के वैभव को देख राज्यसुख से संतुष्ट विचार करता राजा उल्लास से परिपूर्ण हो बोला— 'मनोहर युवतियाँ, अनुकूल मित्र, अच्छे और प्रेममयी वाणी बोलने वाले बंधुगण और सेवक और चिघाड़ते हिन हिनाते हाथी और पानी दार घोड़े— (मनोहर युवति, मित्र अनुकूल, प्रणय भाषी सद बंधु, सुभृत्य, मत्तगज- राज, पवन गति अश्व—) इस प्रकार राजा श्लोक के तीन चरण कह गया, पर चतुर्थ चरण उसके मुख से न निकला तो सुनकर चोर ने पूर्ति कर दी— 'नेत्रबंद करने पर कुछ नहीं है।' (मूँदलो नयन, न कुछ अवशिष्ट)।' (मूँदहुनयन कतहूँ कछु नाहीं—गो० तुलसीदास ।) ततो ग्रथितग्रन्थो राजा चोरं वीक्ष्य तस्मै वीरवलयमदात्। ततस्त- स्कुरो वीरवलयमादाय ब्राह्मणगृहं गत्वा शयानं ब्राह्मणमुत्थाप्य तस्मै दत्त्वा प्राह—'विप्र, एतद्राज्ञः पाणिवलयं बहुमूल्यम् अल्पमूल्येन न विक्रेयम्।' ततो ब्राह्मणः पण्यवीथ्यां तद्विक्रीय दिव्यभूषणानि पट्टदु- कूलानि च जग्राह। ततो राजकीयाः केचनैनं चोरं मन्यमाना राज्ञो निवेदयन्ति। ततो राजनिकटे नीतः। तब पद्य के पूर्ण हो जाने पर राजा ने चोर को देखकर उसे वीर-कंकण दिया। वह चोर वीर कंकण लेकर एक ब्राह्मण के घर पहुँचा और सोते ब्राह्मण को जगाकर उसे कंकण देकर बोला—'विप्रवर, यह राजा के हाथ का कंगन है, यह बहुमूल्य है, थोड़े मूल्य पर न बेंचना तो ब्राह्मण ने हाट बाजार में उसे बेंचकर दिव्य आभूषण और रेशमी वस्त्र खरीद लिये। तो कुछ राज्य कर्मचारियों ने उसे चोर समझा और राजा से निवेदन किया। ब्राह्मण राजा के पास ले जाया गया। राजा पृच्छति—'विटधार्यं पटमपि नास्ति। अद्य प्रातरेव दिव्य- कुण्डलाभरणपट्टदुकूलानि कुतः ?' विप्रः प्राह— 'भेकैः कोटरशायिभिर्मृतमिव द्ममान्तर्गतं कच्छपैः पाठीनैः पृथुपङ्कपीठलुठनाद्यास्मिन् मुहुर्मूच्छितम् । तस्मिञ्छुष्कसरस्थकालजलदेनागत्य तच्चेष्टितं यत्राकुम्भनिमग्नवन्यकरिणां यूथैः पयः पीयते' ॥ २०१ ॥
भोजप्रबन्धः ६६ तुष्टो राजा तस्मै वीरवलयं चोरप्रदत्तं निश्चित्य स्वयं च लक्षं ददौ। राजा ने पूछा--'तुम्हारे पास एक अति सामान्य व्यक्ति के धारण योग्य वस्त्र तक नहीं हैं, आज प्रातः काल ही दिव्य कुंडल आभूषण और रेशमी वस्त्र कहाँ से मिल गये ?' ब्राह्मण ने कहा— जिस सरोवर में मेढ़क और कछुए धरती के भीतर मृतक के समान बिलों में सोये पड़े थे और भारी कीचड़ में तड़पती मछलियाँ मूर्च्छित हो चली थीं, एक असमय के बादल ने आकर उस सूखे ताल में ऐसा कर दिया कि आज वहाँ सिर तक डूबे वन-हस्तियों के झुण्ड जल पी रहे हैं । संतुष्ट राजा ने समझ लिया कि जो वीर कंकण चोर को दिया गया था, वह उसने इसे ही दे दिया है और स्वयम् उसे लाख मुद्राएँ दीं। —:०:— ( १४ ) विष्णु-कविः अन्यदा कोऽपि कवीश्वरो विष्ण्वाख्यो राजद्वारि समागत्य तैः प्रवेशितो राजानं दृष्ट्वा स्वस्तिपूर्वकं प्राह-- ‘धाराधीश धरामहेन्द्रगणना कौतूहलीयानयं वेधास्त्वद्गणने चकार खटिकाखण्डेन रेखां दिवि । सैवेयं त्रिदशापगा समभवत्त्वत्तुल्यभूमीधरा- भावात्तु त्यजति स्म सोऽयमवनीपीठे तुषाराचलः ॥’ राजा लोकोत्तरं श्लोकमाकर्ण्य ‘किं देयम्’ इति व्यचिन्तयत् । और वार एक विष्णु नामक कविराज राजद्वार पर पहुँचा और भीतर प्रविष्ट कराया जाने पर राजा को देख ‘स्वस्ति’-वचन-पूर्वक बोला— हे धारा के स्वामी, धरती के महान् राजाओं की गणना करने के इच्छुक ब्रह्मा ने आपकी गणना करते समय आकाश में जो खरिया से लकीर खींची, वही यह आकाश गंगा है, और आपके समान पृथ्वी पालक न पाकर जो पृथ्वी पर उसे फेंक दिया, वही यह हिमाचल है। अपूर्व श्लोक राजा सोचने लगा कि इसे क्या दूँ । तस्मिन्क्षणे तदीयकवित्वमप्रतिद्वन्द्वमाकर्ण्य सोमनाथाख्यकवेर्मुखं विच्छायमभवत् । ततः स दौष्ट्याद्राजानं प्राह—‘देव, असौ सुकवि-
१०० भोजप्रबन्धः र्भवति । परमनेन न कदापि वीक्षितास्ति राजसभा । यतो दारिद्र्य- वारिधिरयम् । अस्य च जीर्णमपि कौपीनं नास्ति ।' ततो राजा सोम- नाथं प्राह-- 'निरवद्यानि पद्यानि यद्यनाथस्य का क्षतिः । भिक्षुणा कक्षनिक्षिप्तः किमिच्छुर्नीरसो भवेत्' ॥ २०३ ॥ ततः सर्वेभ्यस्ताम्बूलं दत्त्वा राजा सभाया उदतिष्ठत् । उस क्षण जिससे प्रतिद्वन्द्विता न हो सके, ऐसी उसकी कविता सुनकर सोमनाथ नाम के कवि का मुँह उतर गया । और वह दुष्टतापूर्वक राजा से बोला--'महाराज, यह कवि तो अच्छा है, पर इसने कभी राज सभा नहीं देखी है, क्योंकि यह दरिद्रता का समुद्र है । इसके पास तो फटा-पुराना कौपीन तक नहीं है ।' तब राजा ने सोमनाथ से कहा-- यदि किसी निःसहाय का काव्य श्रेष्ठ है, तो इसमें हानि क्या है ? भिखारी की काँख में रखा गन्ना कहीं नीरस होता है ? फिर सब को पान देकर राजा सभा से उठ गया । ततः सर्वैरप्यन्योन्यमित्यभ्यधायि--'अद्य विष्णुकवेः कवित्वमाकर्ण्य सोमनाथेन सम्यग्दौष्ट्यमकारि ।' ततः समुत्थिता विद्वत्परिषत् । ततो विष्णुकविरेकं पद्यं पत्रे लिखित्वा सोमनाथकविहस्ते दत्त्वा प्रणम्य गन्तु- मारभत । 'अत्र सभायां त्वमेव चिरं नन्द ।' तब सब परस्पर कहने लगे--'आज विष्णु कवि की कविता सुनकर सोमनाथ ने बड़ी दुष्टता की ।' इसके बाद विद्वत्-सभा उठायी । तब विष्णु कवि ने एक पद्य पत्र पर लिख कर सोमनाथ कवि के हाथ में दिया और प्रणाम करके जाने लगा--'यहाँ सभा में तुम्हीं चिरकाल तक सानंद रहो ।' ततो वाचयति सोमनाथकविः-- 'एतेषु हा तरुणमारुतधूयमान- दावानलैः कवलितेषु महीरुहेषु । अम्भो न चेज्जलद मुञ्चसि मा विमुञ्च वज्रं पुनः क्षिपसि निर्दय कस्य हेतोः' ॥ २०४ ॥ ततः सोमनाथकविर्निखिलमपि पट्टदुकूलवित्त हिरण्मयीं तुरङ्गमादि- संपत्तिं कलत्रवस्त्रावशेषं दत्तवान् ।
भोजप्रबन्धः १०१ तब सोमनाथ कवि ने उसे वांचा-- प्रवल वायु के द्वारा भड़कार्या जाती दावाग्नि के ग्रास लग गये इन वृक्षों पर हे जलद, यदि तुम पानी नहीं बरसाते तो न बरसाओ, किंतु हे निर्दय, इन पर वज्र किस लिए गिराते हो ? तो सोमनाथ कवि ने पत्नी और देह वस्त्र मात्र शेष रख कर, रेशमी वस्त्र, धन, स्वर्ण और अश्व आदि संपूर्ण संपत्ति विष्णु कवि को दे डाली। ततो राजा मृगयारसप्रवृत्तो गच्छंस्तं विष्णुकविमालोक्य व्यचिन्त- यत्-मयास्मै भोजनमपि न प्रदत्तम् । मामनादृत्यायं सम्पत्तिपूर्णः स्वदेशं प्रति यास्यति । पृच्छामि । 'विष्णुकवे, कुतः सम्पत्तिः प्राप्ता ।' कविराह-- सोमनाथेन राजेन्द्र देव तद्गृहभिक्षुणा । अद्य शोच्यतमे पूर्णे मयि कल्पद्रुमायितम् ।। २०५ ।। तदनंतर आखेट के निमित्त जाते राजा ने उस विष्णु कवि को देख कर विचार किया-'मैंने तो इसे भोजन भी नहीं दिया। मेरा अनादर करके संपत्ति से भरा पूरा हो यह अपने देश चला जायेगा पूछता हूँ। हे विष्णु कवि, संपत्ति कहाँ से पा ली ?' कवि बोला-- हे राजेश्वर, महाराज, आपके घर के भिक्षुक सोमनाथ ने आज मुझ दीन तम व्यक्ति पर पूर्णतः कल्पवृक्ष की भाँति कृपा की । राजा पूर्व सभायां श्रुतस्य श्लोकस्याक्षरलक्षं ददौ। सोमनाथेन च यावद्दत्तं तावदपि सोमनाथाय दत्तवान् । सोमनाथः प्राह- 'किसलयानि कुतः कुसुमानि वा क्व च फलानि तथा वनवीरुधाम् । अयमकारणकारुणिको यदा न तरतीह पयांसि पयोधरः ॥२०६॥ राजा ने पहिले सभा में सुने श्लोक पर प्रत्यक्षर लक्ष मुद्राएँ दी और सोमनाथ ने जितना दिया था, उतना सोमनाथ को भी दिया। सोमनाथ बोला- वन के वृक्षों ने कहाँ से तो पत्ते आते और कहाँ से फूल और फल, यदि विना कारण के करुणा करने वाला यह जल धर इन्हें जल से तर न कर देता ?
१०२ भोजप्रबन्धः ततो विष्णुकविः सोमनाथदत्तेन राज्ञा दत्तेन च तुष्टवान् । तदा सीमन्तकविः प्राह— ‘वहति भुवनश्रेणीं शेषः फणाफलकस्थितां कमठपतिना मध्ये पृष्ठं सदा स च धार्यते । तमपि कुरुते क्रोडाधीनं पयोनिधिरादरा- दहह महतां निःसीमानश्चरित्रविभूतयः’ ॥ २०७ ॥ विष्णु कवि सोमनाथ और राजा द्वारा दिये हुए से संतुष्ट हुआ तो सीमंत कवि ने कहा— शेषनाग अपने फन के ऊपर रख कर, भुवन धारिणी धरणी का भार धारण करता है, कच्छपराज अपनी पीठ पर शेषनाग को धारता है, उसको जलनिधि सादर अपने गोद में रख लेता है । अहाहा, महज्जनों के चरित्र का ऐश्वर्य असीम होता है । —:०:— ( १५ ) समाप्तेऽपि कोशे राज्ञा दानम् कदाचित्सौधतले राजानमेत्य भृत्यः प्राह—‘देव, अखिलेष्वपि कोशेषु यद्वित्तजातमस्ति तत्सर्वं देवेन कविभ्यो दत्तम् । परन्तु कोशगृहे धनलेशोपि नास्ति । कोऽपि कविः प्रत्यहं द्वारि तिष्ठति । इतः परं कवि- र्विद्वान् वा कोऽपि राज्ञे न प्राप्य इति मुख्यामात्येन देवसन्निधौ विज्ञाप- नीयमित्युक्तम् ।’ एक बार प्रासाद के नीचे राजा के पास आकर सेवक ने कहा—‘महा- राज, संपूर्ण कोशों में जो भी धन था, वह सब कवियों को दे दिया गया, कोषागार में अब धन का लेश भी नहीं है । प्रति दिन कोई न कोई कवि द्वार पर आ जाता है । अब से आगे कोई कवि या विद्वान् महाराज से न मिल पाये—मुख्य मंत्री जी ने आप से यह निवेदन करने को कहा है ।’ राजा कोशस्थं सर्वं दत्तमिति जानन्नपि प्राह—‘अद्य द्वारस्थं कविं प्रवेशय ।’ ततो विद्वानागत्य ‘स्वस्ति’ इति वदन् प्राह-- ‘नभसि निरवलम्बे सीदता दीर्घकालं त्वदभिमुखविसृष्टोत्तानचञ्चुपुटेन ।
भोजप्रबन्धः १०३ जलधरजलधारा दूरतस्तावदास्तां ध्वनिरपि मधुरस्ते न श्रुतश्चातकेन' ॥ राजा तदाकर्ण्य 'धिग्जीवितं यदिद्वांसः कवयश्च द्वारमागत्य सीदन्ति' इति तस्मै विप्राय सर्वाण्याभरणान्युत्तार्य ददौ । कोश में जो था, वह सब दे दिया गया-यह जानता हुआ भी राजा बोला-'आज द्वार पर आये कवि को प्रविष्ट करा दो तब विद्वान ने आकर 'स्वस्ति' यह उच्चारण करते हुए कहा- हे जलधर, निराधार आकाश में बहुत समय तक कष्ट उठाते, तुम्हारी ओर ऊपर को चोंच उठाये चातक ने तुम्हारी मधुर ध्वनि भी नहीं सुनी, जलधारा तो दूर रही । यह सुनकर राजा ने सोचा कि उस जीवन को धिक्कार है कि द्वार पर आकर विद्वान् और कवि कष्ट भोगते हैं- और सब आभूषण उतार कर उस ब्राह्मण को दे दिये । ततो राजा कोशाधिकारिणमाहूयाह- 'भाण्डारिक, मुञ्जराज्यस्य तथा मे पूर्वेषां च ये कोशाः सन्ति तेषां मध्ये रत्नपूर्णाः कलशाः कुत्र ।' ततः काश्मीरदेशान्मुचुकुन्दकविरागत्य 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा प्राह- 'त्वद्यशोजलधौ भोज निमज्जनभयादिव । सूर्येन्दुबिम्बमिषतो धत्ते कुम्भद्वयं नभः' ॥ २०९ ॥ राजा तस्मै प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ । इस के पश्चात् राजाने कोशाधिकारी को बुला कर कहा-'भंडारीजी मुंजराज के और मेरे पूर्व पुरुषों के जो कोश हैं, उनके बीच रत्नों से भरे कलश थे, वे कहाँ हैं ? तभी कश्मीर देश से मुचुकुंद कवि आकर और 'स्वस्ति' कह कर बोला- हे भोज, तुम्हारी यशरूपी समुद्र में डूब जाने के डर से आकाश मानो सूर्य और चंद्र के बिंब के व्याज से दो घड़े धारे हुए हैं। राजा ने उसे प्रत्येक अक्षर पर लक्ष मुद्राएँ दीं । पुनः कविराह- 'आसन्क्षीर्णानि यावन्ति चातकाश्रूणि तेऽम्बुद । तावन्तोऽपि त्वयोदार न मुक्ता जलबिन्दवः' ॥ २१० ॥
१०४ भोजप्रबन्धः ततः स राजा तस्मै शतंतुरगानपि ददौ । ततो भाण्डारिको लिखति- 'मुचुकुन्दाय कवये जात्यानश्वाञ्शतं ददौ । भोजः प्रदत्तलक्षोऽपि तेनासौ याचितः पुनः' ॥ २११ ॥ कवि ने फिर कहा- हे जलधर, चातक ने तेरे लिए जितने आंसू गिराये, हे उदार, तूने उतने भी जलबिंदु नहीं गिराये । तो राजाने उसे सौ घोड़े भी दे दिये । तब भंडारी ने लिखा-- भोज ने यद्यपि लाख मुद्राएँ दीं, तथापि उसने पुनः याचना की तो मुचुकुंद कवि को राजाने सौ अच्छी जाति के घोड़े दिये । ततो राजा सर्वानपि वेश्म प्रेषयित्वान्तर्गच्छति । ततो राज्ञश्चामरग्रा- हिणी प्राह- 'राजन्मुञ्जकुलप्रदीप सकलक्ष्मापालचूडामणे युक्तं सञ्चरणं तवादद्भुतमणिच्छत्रेण रात्रावपि । मा भूत्त्वद्वदनावलोकनवशाद्व्रीडाभिनम्रः शशी मा भूच्चेयमरुन्धती भगवती दुःशीलताभाजनम्' ॥ २१२ ॥ राज तस्यै प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ । तदनंतर राजा सब को घर भेजकर महल में जाने लगा तो राजा की चँवर डुलाने वाली ने कहा- हे मुंज के कुलदीपक, समस्त नृपालों की चूडास्थित मणि समान श्रेष्ठ भोजराज, रात में भी इस प्रकार अद्भुत मणिच्छत्र लगाकर आपका चलना युक्ति पूर्ण ही है क्योंकि आपके मुख को देख लेने के कारण कहीं चंद्रमा लज्जा से अवनत न हो जाय और भगवती अरुंधती ( नक्षत्र-रूप में स्थित ) दुःशीलता की पात्र न हो जायें । राजा ने उसे प्रत्यक्षर लक्ष मुद्राएँ दे दीं । अन्यदा कुण्डिननगराद्गोपालो नाम कविरागत्य स्वस्तिपूर्वकं प्राह- 'त्वच्चित्ते भोज निर्यातं द्वयं तृणकणायते । क्रोधे विरोधिनां सैन्यं प्रसादे कनकोच्चयः' ॥ २१३ ॥
भोजप्रबन्धः १०५ राजा श्रुत्वापि तुष्टो न दास्यति । राजपुरुषैः सह चर्चां कुर्वाण- स्तिष्ठति । ततः कविर्व्यचिन्तयत्--'किमु राजा नाश्रावि' । दूसरे दिन कुंडिन नगर से गोपाल नामक कवि आया और 'स्वस्ति' कहकर बोला- हे भोज, आपके चित्त में आकर दो वस्तुएँ तृण और कण के समान हो जाती हैं--क्रोध आने पर विरोधियों की सेना (तृण तुल्य) और प्रसन्न होने पर सुवर्ण का ढेर (कण के समान) । यह सुनकर संतुष्ट हो कर भी राजा ने कुछ दिया नहीं, राजपुरुषों के साथ चर्चा करता रहा । तो कवि सोचने लगा-क्या राजा ने नहीं सुना ?' ततः क्षणेन समुन्नतमैवावलोक्य राजानं कविराह-- 'हे पाथोद् यथोन्नतं हि भवता दिग्व्यावृता सर्वतो मन्ये धीर तथा करिष्यसि खलु क्षीराब्धितुल्यं सरः । किन्त्वेष क्षमते नहि क्षणमपि ग्रीष्मोष्मणा व्याकुलः पाठीनादिगणस्त्वदेकशरणस्तद्वर्ष तावत्कियत् ॥ २१४ ॥ राजा कविहृदयं विज्ञाय 'गोपालकवे' दारिद्र्याग्निना नितान्तं दग्धोऽसि ।' इति वदन् षोडशमणीननर्घ्यान् षोडशदन्तीन्द्रांश्च ददौ । तदनंतर क्षण में राजा के ऊपर मुँह उठाते ही देख कर कवि बोला--- हे जलद, आपने जैसे उमड़ कर दिशा को सब ओर से ढक लिया है उससे मैं समझता हूँ कि हे धीर आप सरोवर को क्षीरसमुद्र की भाँति बना देंगे, परंतु ग्रीष्म ऋतु की गरमी से व्याकुल ये मछलियाँ आदि प्राणी क्षण भर का विलंब भी नहीं सह पा रहे हैं, आप ही इनकी एक शरणस्थली हैं; तो कुछ बरसिए । राजा ने कवि के हृदय का मर्म समझा और यह कहते हुए कि गोपाल कवि, तुम दरिद्रता की आग से पूर्णतया दग्ध हो गये हो--, सोलह अमोल मणियाँ और सोलह गजराज उसे दिये । --:०:--
१०६ भोजप्रबन्धः ( १६ ) प्रभूतदानस्य कतिपयकथाः एकदा राजा धारानगरे विचरन्क्वचिच्छिवालये प्रसुप्तं पुरुषद्वय- मपश्यत् । तयोरेको विगतनिद्रो वक्ति—'अहो, ममास्तरासन्न एव कस्त्वं प्रसुप्तोऽसि जागर्षि नो वा ।' एक बार धारानगर में विचरण करते हुए राजा ने किसी शिवालय में सोते दो पुरुषों को देखा । उनमें जागकर एक ने कहा--'मेरे बिछौने के निकट स्थित तुम कौन हो, सोते हो या जागते हो ?' ततस्त्वपर आह--'विप्र, प्रणतोऽस्मि । अहमपि ब्राह्मणपुत्रस्त्वामत्र प्रथमरात्रौ शयानं वीक्ष्य प्रदीप्ते च प्रदीपे कमण्डलूपवीतादिभिर्ब्राह्मणं ज्ञात्वा भवदास्तरासन्न इवाहं प्रसुप्तः । इदानीं त्वद्गिरमाकर्ण्य प्रबुद्धोऽस्मि ।' तो दूसरा बोला—'हे ब्राह्मण, प्रणाम करता हूँ । मैं भी ब्राह्मण का बेटा हूँ; आपको यहाँ पहिली रात में ही सोया देखा और जलते दीपक में कमंडलु और यज्ञोपवीत आदि देख आपको ब्राह्मण समझ कर आपके विस्तर के ही निकट मैं भी सो गया । इस समय आपकी वाणी सुनकर जागा हूँ ।' प्रथमः प्राह—'वत्स, यदि त्वं प्रणतोऽसि ततो दीर्घायुर्भव । वद कुत आगम्यते, किं ते नाम, अत्र च किं कार्यम् ।' पहिला बोला—'वत्स, तुम प्रणाम करते हो तो दीर्घायु होओ । कहो, कहाँ से आते हो, तुम्हारा क्या नाम है और यहाँ क्या काम है ?' द्वितीयः प्राह— विप्र, भास्कर इति मे नाम । पश्चिमसमुद्रतीरे प्रभास-तीर्थे समीपे वसतिर्मम । तत्र भोजस्य वितरणं बहुभिर्व्यावर्णितम् । ततो याचितुमहमागतः । त्वं मम वृद्धत्वात्पितृकल्पोऽसि । त्वमपि सुपरि- चयं वद् ।' दूसरे ने कहा—'ब्राह्मण, मेरा नाम भास्कर है । पश्चिमी समुद्र के किनारे प्रभास तीर्थ के निकट मेरा निवासस्थान है । वहाँ भोज के दान करने के संबंध में अनेक लोगों ने वर्णन किया । सो मैं याचना करने आया हूँ । आप वृद्ध होने के कारण पिता समान हैं । आप भी अपना परिचय दीजिए ।'
भोजप्रबन्धः १०७ स आह—'वत्स, शाकल्य इति मे नाम। मयैकशिलानगर्या आगम्यते भोजं प्रति द्रविणाशया । वत्स, त्वयानुक्तमपि दुःखं त्वयि ज्ञायते कीदृशं तद्वद ।' उसने कहा--'बच्चे, मेरा नाम शाकल्य है। मैं एक-शिला नगरी से द्रव्य की आशा से भोज के पास आया हूँ। बेटे, तुमने कहा नहीं हैं, फिर भी तुम दुःखी हो, यह ज्ञात हो रहा है; वह दुःख कैसा है ? कहो।' ततो भास्करः प्राह--'तात, किं ब्रवीमि दुःखम् । क्षुत्क्षामाः शिशवः शवा इव भृशं मन्दाशया बान्धवा लिप्ता झर्झरघर्धरी जतुलवैर्नो मां तथा बाधते। गेहिन्या त्रुटितांशुकं घटयितुं कृत्वा सकाकुस्मितं कुप्यन्ती प्रतिवेश्म लोकगृहिणी सूचि यथा याचिता' ॥२१५॥ राजा श्रुत्वा सर्वाभरणान्युत्तार्य तस्मै दत्त्वा प्राह—'भास्कर, सीदन्त्यतीव ते बालाः । झटिति देशं याहि ।' तो भास्कर बोला--'तात, क्या कहूँ अपना दुःख-- भूख से क्षीण बच्चे शव के समान हो गये हैं, भाई-बंधु पर्याप्त निम्न विचार के हैं। लाख के टुकड़े से जोड़ी हुई फूटी गागर मुझे उतना कष्ट नहीं देती, जितना कि फटा कपड़ा सिलने के लिए मेरी घरनी के द्वारा सूई माँगे जाने पर बनावटी रूप से मुस्कुरा कर घर-घर में क्रुद्ध होती लोगों की घरनियाँ । यह सुनकर सब आभूषण उतार उसे देकर राजा ने कहा--'भास्कर, तुम्हारे बच्चे बड़ा कष्ट पा रहे हैं। झट अपने देश को चले जाओ।' ततः शाकल्यः प्राह-- अत्युद्धृता वसुमती दलितोऽरिवर्गः क्रोडीकृता बलवता बलिराजलक्ष्मीः । एकत्र जन्मनि कृतं यदनेन यूना जन्मत्रये तदकरोत्पुरुषः पुराणः ॥ २१६ ॥ ततो राजा शाकल्याय लक्षत्रयं दत्तवान् । तब शाकल्य ने कहा--
१०८ भोजप्रबन्धः वसुमती धरती का उद्धार किया, शत्रुओं को दल डाला और वली राजाओं की लक्ष्मी को अपनी गोद में ला धरा, —सो इस बलवान् युक्त (भोजराज) ने एक ही जन्म में वह सब कर डाला, जो पुराण पुरुष विष्णु ने तीन जन्म में किया । (वाराहावतार में धरती का उद्धार, रामादि अवतार में शत्रु- नाश और वामनावतार में बलिराज का राज्य हरण) । तो राजा ने शाकल्य को तीन लाख मुद्राएँ दीं । अन्यदा राजा मृगयारसेन विचरंस्तत्र पुरः समागतहरिण्यां वाणेन विद्धायामपि वित्ताशया कोऽपि कविराह— 'श्रीभोजे मृगयां गतेऽपि सहसा चापे समारोपिते- ऽप्याकर्णान्तगतेऽपि मुष्टिगलिते बाणेऽङ्गलग्नेऽपि च । स्थानान्नैव पलायितं न चलितं नोत्कम्पितं नोत्प्लुतं मृग्या मद्वशगं करोति दयितं कामोऽयमित्याशया' ॥ २१७ ॥ राजा तस्मै लक्षत्रयं प्रयच्छति । एक और वार आखेट के लिए विचरण करते राजा ने संमुख आ पड़ी हिरनी को वाण से बींध दिया, तो वहां धन की आशा से एक कवि ने कहा— आखेट को गये श्रीभोजराज ने झट से धनुष पर वाण चढ़ाया, कान तक खींचा और मुट्ठी से निकल कर वह बाण अंग में जा लगा, किंतु इतना सब होते भी हिरनी न तो स्थान छोड़ कर भागी, न चली, न कांपी, न कूदी— वह यही आशा करती रही कि यह कामदेव मेरे स्वामी को मेरे वश में कर रहा है । राजा ने उसे तीन लाख दिये । अन्यदा सिंहासनमलङ्कुर्वाणे श्रीभोजनृपतौ द्वारपाल आगत्याह- 'देव, जाह्नवीतीरवासिनी काचन वृद्धब्राह्मणी विदुषी द्वारि तिष्ठति' । राजा—'प्रवेशय ।' आगच्छन्तीं राजा प्रणमति । सा तं 'चिरं जीव' इत्युक्त्वाह— 'भोजप्रतापाग्निरपूर्व एष जागर्ति भूभृत्कटकस्थलीषु । यस्मिन्प्रविष्टे रिपुपार्थिवानां तृणानि रोहन्ति गृहाङ्गणेपु' ॥ २१८ ॥
राजा तस्यै रत्नपूर्णं कलशं प्रयच्छति । ततो लिखति भाण्डारिकः- 'भोजेन कलशो दत्तः सुवर्णमणिसम्भृतः । प्रतापस्तुतितुष्टेन वृद्धायै राजसंसदि' ॥ २१६ ॥ दूसरी बार श्री भोजराज के सिंहासन को सुशोभित करते समय द्वार- पाल ने आकर कहा—'देव, जाह्नवी गंगा के तट पर रहने वाली एक विदुषी बूढ़ी, ब्राह्मणी द्वार पर है।' राजा ने कहा—'प्रविष्ट करो।' उसे आती देख राजा ने प्रणाम किया और वह 'बहुत दिन जीते रहो', यह कहकर बोली— राजाओं के सैन्यस्थलों में एक अनोखी भोज के प्रताप की अग्नि जल रही है, जिसमें प्रविष्ट होने पर शत्रु राजाओं के घर के आंगनों में तृण उग आते हैं। राजा ने उसे रत्नों से भरा कलसा दिया। तो भंडारी ने लिखा— राज संसद में अपने प्रताप की प्रशंसा करने पर संतुष्ट हुए भोज ने वृद्धा को स्वर्ण और मणि से पूर्ण कलश दिया। अन्यदा दूरदेशादागतः कश्चिच्चोरो राजानं प्राह—'देव, सिंहलदेशे मया काचन चामुण्डालये राजकन्या दृष्टा, मालवदेशदेवस्य महिमानं बहुधा श्रुतं त्वमपि वदेति पप्रच्छ । मया च तस्या देवगुणा व्यावर्णितः। सा चात्यन्ततोषाच्चन्दनतरोर्निरुपमं गर्भखण्डं दत्त्वा यथास्थानं प्रपेदे । देवगुणाभिवर्णनप्राप्तं तदेतद्गृहाण । एतत्प्रसृत- परिमलभरेण भृङ्गा भुजङ्गाश्च समायान्ति।' राजा तद्गृहीत्वा तुष्टस्तस्मै लक्षं दत्तवान् । एक वार दूर देश से आया कोई चोर राजा से बोला—'महाराज, मैंने सिंहल देश में भगवती चामुंडा के मन्दिर में एक राज-कन्या देखी। उसने मुझसे कहा कि मैंने मालव देश के राजा की बहुत महिमा सुनी है, तू भी बता। मैंने उसके संमुख महाराज के गुणों का वर्णन किया। वह अत्यन्त संतुष्ट हो चन्दन वृक्ष के मध्य भाग का एक अनुपम खंड मुझे देकर यथा- स्थान चली गयी। महाराज के गुणों का वर्णन करने से प्राप्त यह चंदन खंड महाराज स्वीकारें। इसकी सुगंध के प्रसार से भौंरे और सर्प आ जाते हैं।' राजा उसे लेकर संतुष्ट हो चोर को लाख मुद्राएं दी। ततो दामोदरकविस्तन्मिषेण राजानं स्तौति—
११० भोजप्रबन्धः 'श्रीमच्चन्दनवृक्ष सन्ति बहवस्ते शाखिनः कानने येषां सौरभमात्रकं निवसति प्रायेण पुष्पश्रिया । प्रत्यङ्गं सुकृतेन तेन शुचिना ख्याताः प्रसिद्धात्मना योऽसौ गन्धगुणस्त्वया प्रकटितः क्वासौविह प्रेक्ष्यते' । राजा स्वस्तुतिं बुद्ध्वा लक्षं ददौ । तब दामोदर कवि ने चंदन खंड के ब्याज से राजा की स्तुति की— हे शोभावान् चंदन वृक्ष, जंगल में ऐसे बहुत से वृक्ष हैं, जिनकी कुसुमश्री में ही सुगंध रहा करती है, परन्तु यह जो स्वयं प्रसिद्ध पवित्र पुण्यकृत्य के कारण विख्यात सुगंध रूपी गुण अपने प्रत्येक अङ्ग से तुमने प्रकट किया है, वह अन्य वृक्षों में कहाँ दीखता है ? राजा ने अपनी प्रशंसा को समझ कर ( दामोदर कवि को ) लाख मुद्राएँ दीं । ततो द्वारपाल आगत्य प्राह--'देव, काचित्सूत्रधारी स्त्री द्वारि वर्तते ।' राजा--'प्रवेशय ।' ततः सागत्य राजानं प्रणिपत्याह- 'वलिः पातालनिलयोऽधः कृतश्चित्रमत्र किम् । अधः कृतो दिविस्थोऽपि चित्रं कल्पद्रुमस्त्वया' ॥ २२१ ॥ राजा तस्यै प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ । तदनंतर द्वारपाल आकर बोला--'महाराज, कोई सूतवाली स्त्री द्वार पर विद्यमान है । राजा ने प्रविष्ट कराने की आज्ञा दी । तब वह आकर राजा को प्रणाम करके बोली- महाराज, आपने ( दान वर के दानी ) पाताल वासी बलि को नीचे कर दिया, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं ( वह तो स्वयं नीचे बसे लोक पाताल का निवासी है ही ); आश्चर्य की बात यह है कि अपने तो ऊपर के लोक स्वर्ग में स्थित कल्पवृक्ष को भी नीचा कर दिया । राजा ने उसे प्रत्येक अक्षर पर लक्ष मुद्राएँ दीं । ततः कदाचिन्मृगयापरिश्रान्तो राजा क्वचित्सहकारतरोरधस्ता- त्तिष्ठति स्म । तत्र मल्लिनाथाख्यः कविरागत्य प्राह-- 'शाखाशतशतवितताः सन्ति कियन्तो न कानने तरवः । परिमलभरमिलदलिकुलदलितदलाः शाखिनो विरलाः' ॥२२२॥
ततो राजा तस्मै हस्तवलयं ददौ। फिर कभी आखेट करने से थका राजा कहीं चाम्र वृक्ष के नीचे बैठा था। वहाँ मल्लिनाथ नामक कवि आकर बोला— जंगल में शत-शत शाखाओं में फैले न जाने कितने वृक्ष हैं, परन्तु सुगंध भार से आकृष्ट भ्रमरों के समूह द्वारा जिसके पत्ते छलनी कर दिये गये हैं, ऐसे वृक्ष विरल हैं। राजा ने उसे हाथ का कंगन दे दिया। तत्रैवासीने राज्ञि कोऽपि विद्वानागत्य 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा प्राह— 'राजन्, काशीदेशमारभ्य तीर्थयात्रया परिभ्राम्यते दक्षिणदेशवासिना मया।' राजा—'भवदृशानां तीर्थवासिनां दर्शनात्कृतार्थोऽस्मि।' स आह--'वयं मान्त्रिकाश्च।' राजा--'विप्रेषु सर्वे सम्भाव्यते।' राजा पुनः प्राह-'विप्र, मन्त्रविद्यया यथा परलोके फलप्राप्तिः तथा किमि- हलोकेऽप्यस्ति।' राजा वहीं बैठे थे कि कोई विद्वान् आ गया और 'स्वस्ति' कह कर बोला- 'राजन् मैं दक्षिण देश का निवासी हूँ, काशी देश से तीर्थयात्रा आरम्भ करके परिभ्रमण कर रहा हूँ।' राजा ने कहा-'आप जैसे तीर्थ-वासियों के दर्शन से कृतार्थ हूँ।' वह बोला--'हम मंत्रविद्या-ज्ञानी भी हैं।' राजा-- 'ब्राह्मणों में सबकी संभावना है।' और फिर राजा ने कहा- 'विप्र, मंत्रविद्या से जैसे परलोक में फल मिलता है, वैसे क्या इस लोक में भी मिलता है?' विप्रः--'राजन्, सरस्वतीचरणाराधनाद्विद्यावाप्तिर्विश्वविदिता। परं धनावाप्तिर्भाग्याधीना। गुणाः खलु गुणा एव न गुणा भूतिहेतवः । धनसञ्चयकर्तॄणि भाग्यानि पृथगेव हि ॥ २२३ ॥ देव, विद्यागुणा एव लोकानां प्रतिष्ठायै भवन्ति । न तु केवलं सम्पदः। देव, आत्मायत्ते गुणग्रामे नैर्गुण्यं वचनीयता । दैवायत्तेषु वित्तेषु पुंसां का नाम वाच्यता ॥ २२४ ॥
११२ भोजप्रबन्धः देव, मन्त्राराधनेनाप्रतिहता शक्तिः स्यात्। देव, एवं कुतूहलं यस्य। मया यस्य शिरसि करो निधीयते; स सरस्वतीप्रसादेनास्खलितविद्याप्र- सारः स्यात्।' राजा प्राह--'सुमते, महती देवताशक्तिः।' विप्र बोला---'राजन्, सरस्वती के चरणों की आराधना से विद्या की प्राप्ति होती है, यह संसार-प्रसिद्ध है, परन्तु धन की प्राप्ति भाग्य के अधीन है। गुण गुण ही होते हैं, गुण संपत्ति के कारण नहीं होते, जो धन-संचय कराते हैं, वे भाग्य भिन्न ही होते हैं। महाराज, विद्या गुण ही लोगों की प्रतिष्ठा के निमित्त होते हैं, केवल संपदा नहीं। महाराज, गुण समूह ( मनुष्य के ) अपने अधीन होता है, तो निर्गुण रह जाना निंदा योग्य है, परन्तु धन तो दैवाधीन है, उसमें पुरुषों का क्या दोष ? महाराज, मंत्राराधन से अशेष शक्ति प्राप्त होती है। देव, उसका यह चमत्कार है कि मैं जिसके सिर पर हाथ रख दूँ, सरस्वती के प्रसाद से उसके विद्या का प्रसार निर्बाध हो जायेगा।' राजा ने कहा--'हे बुद्धिशाली, दैवत की शक्ति बड़ी होती है।' ततो राजा कामपि दासीमाकार्य विप्रं प्राह-'द्विजवर, अस्या वेश्यायाः शिरसि करं निधेहि।' विप्रस्तस्याः शिरसि करं निधाय तं प्राह--'देवि, यद्राज्ञाज्ञापयति तद्वद। ततो दासी प्राह 'देव, अहमद्य समस्तवाङ्मयजातं हस्तामलकवत्पश्यामि। देव, आदिश किं वर्णयामि। तत्पश्चात् किसी दासी को बुलाकर ब्राह्मण से कहा--'ब्राह्मण-श्रेष्ठ, इस वेश्या के सिर पर हाथ धरो।' ब्राह्मण ने उसके सिर पर हाथ धर कर कहा--'देवि, राजा जिसकी आज्ञा दें, उसका वर्णन करो।' तो दासी बोली--'महाराज, आज मैं संपूर्ण वाङ्मय को हथेली पर रखे आंवले तुल्य देख रही हूँ। आज्ञा दें महाराज, किसका वर्णन करूँ?' ततो राजा पुरः खड्गं वीक्ष्य प्राह--'खड्गं मे व्यावर्णय' इति दासी प्राह-- 'धाराधरस्त्वदसिरेष नरेन्द्र चित्रं वर्षन्ति वैरिवनिताजनलोचनानि
भोजप्रबन्धः ११३ कोशेन सन्ततमसङ्गतिराहवेऽस्य दारिद्र्यमभ्युदयति प्रतिपार्थिवानाम्' ॥ २२५॥ राजा तस्यै रत्नकलशाननर्घ्यान्पञ्च ददौ। तो राजा ने संमुख रखी तलवार को देखकर कहा—मेरे कृपाण का वर्णन कर।' दासी ने कहा--- 'हे नरराज, आपका यह कृपाण एक विचित्र बादल है जो कि शत्रु-स्त्रियों के नेत्रों से जल वरसाता है ( यह घिर कर स्वयं नहीं वरसता ) और युद्ध में इसकी कोश से असंगति ( मियान से बाहर रहना ) निरन्तर शत्रु राजाओं की दरिद्रता की उन्नति करती है। राजा ने उसे पाँच अमोल रत्नकलश दिये। ततस्तस्मिन्द्वारे कुतश्चित्पञ्च कवयः समाजग्मुः। तानवलोक्येषद्विच्छाय- मुखं राजानं दृष्ट्वा महेश्वरकविर्वृक्षमिषेणाह— 'किं जातोऽसि चतुष्पथे घनतरच्छायोऽसि किं छायया छन्नश्चेत्फलितोऽसि किं फलभरैः पूर्णोऽसि किं संनतः। हे सद्वृक्ष सहस्व सम्प्रति चिरं शाखाशिखाकर्षण- क्षोभामोठनभञ्जनानि जनतः स्वैरेव दुश्चेष्टितैः' ॥ २२६ ॥ ततो राजा तस्मै लक्षं ददौ। तब उसी समय कहीं से पाँच कवि आ गये। उन्हे देख कर राजा का मुख कुछ उदास हो गया, ऐसे राजा को देख वृक्ष के ब्याज से महेश्वर कवि ने कहा-- तुम उत्पन्न हुए तो चौराहे पर क्यों ? घनी छाया वाले हुए तो छाया से ढककर फले क्यो ? और फलों से परिपूर्ण हुए तो झुके क्यों ? हे भले वृक्ष, अब अपनी ही इन दुश्चेष्टाओं के कारण लोगों से डाली, फुनगियों का खींचा जाना और क्षोभ में भर कर उनका तोंड़ा-मरोड़ा जाना चिरकाल तक सहो। तो राजाने उसे लाख मुद्राएँ दीं। ततस्ते द्विजवराः पृथक्पृथगाशीर्वचनमुदीर्य यथाक्रमं राजाज्ञया कम्बले उपविश्य मङ्गलं चक्रुः। तत एकः पठति— ८ भोज०
११४ भोजप्रबन्धः 'कूर्मः पाताल गङ्गापयसि विहरतां तत्तटीरूढमुस्ता- मादत्तामादिपोत्री शिथिलयतु फणामण्डलं कुण्डलीन्द्रः। दिङ्मातङ्गा मृणालीकवलनां कुर्वतांपर्वतेन्द्राः सर्वे स्वैरं चरन्तु त्वयि वहति विभो भोज देवीं धरित्रीम्' ॥२२७॥ राजा चमत्कृतस्तस्मै शताश्वान्ददौ । ततो भाण्डारिको लिखति- 'क्रीडोद्याने नरेन्द्रेण शतमश्वा मनोजवाः। प्रदत्ताः कामदेवाय सहकारतरोरधः' ॥ २२८ ॥ तदनंतर वे ब्राह्मण अलग-अलग आशीर्वाद कहकर क्रमानुसार राजा की आज्ञासे कंबल पर बैठ कर मंगल पाठ करने लगे । तब एक ने पढ़ाः- हे प्रभु भोजराज, धरती का बोझ आप के उठा लेने पर ( अब ) कच्छप पाताल गंगा में विहार करे, उसके किनारे पर उगे मोथे को आदि वाराह ग्रहण करे, शेषनाग फणमंडल को शिथिल कर ले, दिङ्नाग (दिशाओं को धारण करने वाले हाथी) कमल, नालों की जुगाली करें और सब पर्वत स्वच्छंदतापूर्वक विचरण करें। (भोज के पृथ्वी वहन करलेने से सब मुक्त हैं।) चमत्कृत हो राजा ने उसे सौ घोड़े दिये । तो भंडारी ने लिखा- राजा ने क्रीडा-वाटिका में आम्रवृक्षके नीचे मन के समान वेगवाले सौ घोड़े कामदेव को दिये। ───:०:─── ( १७ ) भोजस्य दर्पभङ्ग : ततः कदाचिद्भोजो विचारयति स्म - 'मत्सदृशो वदान्यः कोऽपि नास्ति' इति। तद्गर्वं विदित्वा मुख्यामात्यो विक्रमार्कस्य पुण्यपत्रं भोजाय प्रदर्शयामास । भोजस्तत्र पत्रे किञ्चित्प्रस्तावमपश्यत् । तथाहि—विक्र- मार्कः पिपासया प्राह— स्वच्छं सज्जनचित्तवल्लघुतरं दीनार्तिवच्छीतलं पुत्रालिङ्गनवत्तथैव मधुरं तद्बाल्यसञ्जल्पवत् । एलोशीर लवङ्ग चन्दनलसत्कर्पूरकस्तूरिका जातीपाटलिकेतकैः सुरभितं पानीयमानीयताम्' ॥ २२६ ॥
भोजप्रबन्धः १२७ तत्पश्चात् एक बार भोज के मन में आया कि मेरे समान अभिलषित प्रदान करने वाला कोई नहीं है। उसके घमंड को समझ कर मुख्य मन्त्री ने विक्रमादित्य का पुण्यपत्र भोज को दिखाया। भोजने उस पत्र में एक प्रस्ताव देखा। उसमें था- प्यास लगने के कारण विक्रमादित्य ने कहा- सज्जनों के चित्त के समान स्वच्छ, दीनों के कष्ट के समान हल्का, पुत्र के आलिंगन के समान शीतल, और बच्चे की अटपटी बोली के तुल्य मीठा, इलायची, खस, लौंग, चन्दन से युक्त कपूर, कस्तूरी, चमेली, गुलाब, के- तकी से सुवासित पेय लाओ। ततो मागधः प्राह-- 'वक्त्राम्भोजं सरस्वत्यधिवसति सदा शोण एवाधरस्ते बाहुः काकुत्स्थवीर्यस्मृतिकरणपटुर्द्दक्षिणस्ते समुद्रः। वाहिन्यः पार्श्वमेताः कथमपि भवतो नैव मुञ्चन्त्यभीक्ष्णं स्वच्छे चित्ते कुतोऽभूत्कथय नरपते तेऽम्बुपानाभिलाषः' ॥२३०॥ तो मागध ने कहा- आपके मुख कमल में सरस्वती वाग् देवी के रूप में नदी सरस्वती निवास करती है, आपका शोण अर्थात् लाल अधर शोण नद ही है, आपका दक्षिण बाहु ककुत्स्थ वंशी श्री राम के पराक्रम का स्मरण कराने में दक्ष (राम के बाहु समान बलिष्ठ) दक्षिण समुद्र है और ये वाहिनी-सेनाएँ आपके नैकट्य को वाहिनी नदियों के तुल्य कभी छोड़ती ही नहीं है और आपका चित्त स्वच्छ है, तो हे नरराज आपको जल-पान की इच्छा कहाँ से हो गयी? ततो विक्रमार्कः प्राह। तथाहि- 'अष्टौ हाटककोटयस्त्रिनवतिर्मुक्ताफलानां तुलाः पञ्चाशन्मधुगन्धमत्तमधुपाः क्रोधोद्धताः सिन्धुराः। अश्वानामयुतं प्रपञ्चचतुरं वाराङ्गनानां शतं दत्तं पाण्ड्यनृपेण यौतकमिदं वैतालिकायार्प्यताम्' ॥२३१॥ ततो भोजः प्रथमत एतादृद्भुतं विक्रमार्कचरित्रं दृष्ट्वा निजगर्वं तत्याज। तब विक्रमादित्य ने कहा-
११६ भोजप्रबन्धः आठ स्वर्ण कोटियाँ, तिरानवे तौल मोती, मधु की गंध से मतवाले भ्रमरों के (ऊपर घिर कर भनभनाते) कारण क्रोध से उद्धत पचास हाथी, दस सहस्र घोड़ों, छल-प्रपंच करने में चतुर सौ वारांगनाएँ और पाण्ड्यदेश राजा ने जो यौतुक दिया है, वह सब इस मागध वैतालिक को दे दो। तो भोज ने पहिले से ही आश्चर्यमय विक्रमादित्य के चरित्र को देख कर अपना अभिमान छोड़ दिया। —:०:— (१८) विपुलदानस्य कतिपयकथाः ततः कदाचिद्धारानगरे रात्रौ विचरन् राजा कंचन देवालये शीतालुं ब्राह्मणमित्थं पठन्तमवलोक्य स्थितः— 'शीतेनाध्युषितस्य माघजलवच्चिन्तार्णवे मज्जतः शान्ताग्नेः स्फुटिताधरस्य धमतः क्षुत्क्षामकुक्षेर्मम । निद्रा क्वाप्यवमानितेव दयिता सन्त्यज्य दूरं गता सत्पात्रप्रतिपादितेव कमला नो हीयते शर्वरी' ॥ २३२ ॥ इति श्रुत्वा राजा प्रातस्तमाहूय पप्रच्छ—'विप्र, पूर्वेद्यू रात्रौ त्वया दारुणः शीतभारः कथं सोढः ।' एक बार धारानगर में रात्रि में विचरण करता राजा किसी देवमंदिर में शीत से व्याकुल ब्राह्मण को इस प्रकार पढ़ते देख रुक गया— शीत से आक्रान्त माघमास के जल के समान चिंता के समुद्र में डूबते बुझ चली आग को शीत से फटे ओठों से फूँकते, भूख से सूखे पेटवाले मुझ अपमानित प्रिया की भाँति छोड़ कर नींद चली गयी है; और जैसे सुयोग्य व्यक्ति की संचित लक्ष्मी का क्षय नहीं होता, वैसे ही रात का क्षय नहीं हो रहा है। यह सुनकर सबेरे राजा ने उसे बुलाकर पूछा—'ब्राह्मण, गत रात्रि में तुमने कठोर शीत के भार को कैसे सहा ?' विप्र आह— 'रात्रौ जानुर्दिवा भानुः कृशानुः सन्ध्ययोर्द्वयोः । एवं शीतं मया नीतं जानुभानुकृशानुभिः' ॥ २३३ ॥