भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
भोजप्रबन्धः ११७ राजा तस्मै सुवर्णकलशत्रयं प्रादात् । रात में घुटने ( घुटनों के बीच सिर रखकर ), दिन में सूर्य ( धूप ) और द्विसंध्याओं ( प्रातः सायम् ) में आग ( तापकर )— इस प्रकार जानुभानु-कृशानु ( घुटना, सूरज और आग ) के द्वारा मैंने शीत व्यतीत किया । राजाने उसे तीन स्वर्णकलश दिये । ततः कवि राजानं स्तौति— 'धारयित्वा त्वयात्मानं महात्यागधनायुषा । मोचिता बलिकर्णाद्याः स्वयशोगुप्तकर्मणः' ॥ २३४ ॥ राजा तस्मै लक्षं ददौ । तब कवि ने राजा की स्तुति की— जिस का धन और आयु महान् त्याग से पूर्ण है, ऐसे आपने स्वयम् को धारण करके जिनके कीर्तिकार्य गुप्त हो चले थे उन बलि और कर्ण आदि को छुटकारा दिला दिया । ( बलि और कर्णादि के कार्यों पर अविश्वास हो चला था, भोज ने स्वदान कृत्यों से उन्हें पुनर्जीवित किया । ) राजा ने उसे लक्ष मुद्राएँ दीं । एकदा क्रीडोद्यानपाल आगत्यैकमिक्षुदण्डं राज्ञः पुरो मुमोच । तं राजा करे गृहीतवान् । ततो मयूरकविर्नितान्तं परिचयवशादात्मनि राज्ञा कृतामवज्ञां मनसि निधायेक्षुमिषेणाह— 'कान्तोऽसि नित्यमधुरोऽसि रसाकुलोऽसि किं चासि पञ्चशरकार्मुकमद्वितीयम् । इक्षो तवास्ति सकलं परमेकमूनं यत्सेवितो भजसि नीरसतां क्रमेण' ॥ २३५ ॥ राजा कविहृदयं ज्ञात्वा मयूरं सम्मानितवान् । एक बार क्रीडावाटिका के माली ने आकर एक गन्ना राजा के संमुख उपस्थित किया । राजा ने उसे हाथ में ले लिया । तो मयूर कवि ने अति परिचय के कारण राजा के द्वारा होती अपनी अवज्ञा को मन में रख कर गन्ने के व्याज से कहा—
११६ भोजप्रबन्धः तुम कमनीय हो, अत्यंत मधुर हो, रस तुझसे टपका जा रहा है, और क्या कहें कि तुम पंचशर काम के अद्वितीय धनुष हो; हे गन्ने, तुम में सब कुछ है, पर एक कमी है कि सेवित होने पर (चूसे जाने पर) धीरे-धीरे नीरसता को प्राप्त हो जाते हो। राजा ने कवि के हृदय को समझ कर कविमयूर को सम्मानित किया। ततः कदाचिद्रात्रौ सौधोपरि क्रीडापरो राजा शशाङ्कमालोक्य प्राह- 'यदेतच्चन्द्रान्तर्जलदलवलीलां वितनुते तदाचष्टे लोकः शशक इति नो मां प्रति तथा।' ततश्चाधो भूमौ सौधान्तः प्रविष्टः कश्चिच्चोर आह- 'अहं त्विन्दुं मन्ये त्वदरिविरहाक्रान्ततरुणी- कटाक्षोल्कापातव्रणकणकलङ्काङ्किततनुम्' ॥२३६॥ कभी रात में महल के ऊपर क्रीडारत राजा ने (चन्द्रमा के) शशचिह्न को देखकर कहा- 'यह जो चन्द्रमा के मध्य मेघखंड जैसी कुछ प्रतीति है, लोक उसे शशक कहता है किंतु मुझे ऐसा नहीं लगता। तो नीचे के तलमें महल के भीतर घुसा कोई चोर बोला- मैं तो समझता हूँ आपके वैरियों की विरह पीडिता तरुणियों के कटाक्षों के कारण जो उल्कापात होता है, उसी से हुए घाव के कलंक का यह चिह्न चन्द्रमा के शरीर में है। राजा तच्छ्रुत्वा प्राह--'अहो महाभाग, कस्त्वमर्धरात्रे कोशगृहमध्ये तिष्ठसि' इति। स आह-'देव, अभयं नो देहि' इति। राजा--'तथा' इति। ततो राजानं स चोरः प्रणम्य स्ववृत्तान्तमकथयत्। तुष्टो राजा चोराय दश कोटीः सुवर्णस्योन्मत्तान्गजेन्द्रांश्च ददौ। यह सुनकर राजा बोला- हे महाभाग, कोषागर के मध्य आधीरात में घुसे तुम कौन हो?' वह बोला-महाराज, मुझे अभय दीजिए।' राजा ने कहा--ठीक है।' तब राजा को प्रणाम करके चोर ने अपनी वार्ता कह डाली। संतुष्ट राजा ने चोर को सोने की दस कोटियाँ और मदमाते गजराज दिये। ततः कोषाधिकारी धर्मपत्रे लिखति-
भोजप्रबन्धः ११६ तदस्मै चोराय प्रतिनिहतमृत्युप्रतिभिये प्रभुः प्रीतः प्रादादुपरितनपादद्वयकृते। सुवर्णानां कोटीर्दश दशनकोटिक्षतगिरी- न्गजेन्द्रानप्यष्टौ मदमुदितकूजन्मधुलिहः ॥ २३७ ॥ तो कोषाधिकारीने धर्मपत्र में लिखा-- उपर्युक्त दो चरणों की रचना पर प्रसन्न हो स्वामी ने मृत्यु के आतंक से निर्भय कर चोर को सोने की दस कोटियाँ और दाँतों की नोकों से पर्वतों को तोड़ देने वाले और जिनके टपकते मदपर मोद से भरे मधुके चटोरे भौंरे भनभनाते रहते थे ऐसे आठ गजराज दिये । ततः कदाचिद्द्वारपाल आगत्य प्राह- 'देव- कौपीनावशेषो विद्वा- न्द्वारि वर्तते' इति । राजा--'प्रवेशय' इति । ततः प्रविष्टः स कविर्भोज- मालोक्याद्य मे दारिद्र्यनाशो भविष्यतीति मत्वा तुष्टो हर्षाश्रूणि मुमोच । कभी द्वारपाल आकर बोला-- 'एक कौपीनमात्र धारण किये विद्वान् द्वार पर उपस्थित है । 'राजाने कहा--'प्रविष्ट कराओ ।' तब प्रविष्ट हो वह कवि भोजराज को देख यह मानकर कि आज मेरी दरिद्रता का नाश होगा, प्रसन्नता के आँसू गिराने लगा । राजा तमालोक्य प्राह-'कवे, किं रोदिषि' इति । ततः कविराह- 'राजन्, आकर्णय मद्गृहस्थितिम् । अये लाजाउच्चैः पथि वचनमाकर्ण्य गृहिणी शिशोः कर्णौ यत्नात्सुपिहितवती दीनवदना । मयि क्षीणोपाये यदकृत दृशावश्रुबहुले तदन्तः शल्यं मे त्वमसि पुनरुद्धर्तुमुचितः ॥ २३८ ॥ राजा 'शिव शिव कृष्ण कृष्ण इत्युदीर्य्यन्प्रत्यक्षरंलक्षं दत्त्वा प्राह- 'सुकवे त्वरितं गच्छ गेहम् । त्वद्गृहिणी खिन्नाभूत्' इति । राजा ने उसे देखकर कहा-'हे कवि, रोते क्यों हो ?' तो कवि बोला--'महाराज, मेरे घर की दशा सुनें-- 'खीलें लो खीलें' मार्ग में उच्च स्वर में कहे जाते इन वचनों को सुन कर दीनमुखी हो मेरी घरनी ने बच्चे के कानों को प्रयत्नपूर्वक भली भांति
१२२ भोजप्रबन्धः पुनरपि पठति कविः- केचिन्मूलाकुलाशाः कतिचिदपि पुनः स्कन्धसम्बन्धभाज- श्छायां केचित्प्रपन्नाः प्रपदमपि परे पल्लवानुञ्जयन्ति। अन्ये पुष्पाणि पाणौ दधति तदपरे गन्धमात्रस्य पात्रं वाग्वल्ल्याः किन्तु मूढाः फलमहह नहि द्रष्टुमप्युत्सहन्ते ॥२४३॥ कवि ने फिर पढ़ा- कुछ लोग वृक्ष की जड़ के लिए व्याकुल रहते हैं, कुछ तने को लेना चाहते हैं; कुछ छाया का ही ग्रहण करते हैं, कुछ पत्तों को तोड़ लेते हैं; कुछ अन्य फूलों को हाथों में धारण कर लेते हैं और कुछ गंधमात्र के पात्र बनते हैं; किंतु, हाय, ये मूर्ख वाणी रूपी वल्लरी के फलों को देखने के लिए भी उत्साहित नहीं होते । एतदाकर्ण्य बाणः प्राह- परिच्छन्नस्वादोऽमृतगुडमधुक्षौद्रपयसां कदाचिच्चाभ्यासाद्व्रजति ननु वैरस्यमधिकम्। प्रियाविम्बोष्ठे वा रुचिरकविवाक्येऽप्यनवधि- र्नवानन्दः कोऽपि स्फुरति तु रसोऽसौ निरुपमः ॥२४४॥ ततो राजा लक्षं दत्तवान् । यह सुनकर बाण ने कहा- अमृत, गुड़, मधु, छुहारे और दूध का स्वाद एक तो स्पष्ट नहीं है दूसरे वार-वार प्रयोग से कभी-कभी पर्याप्त विरस भी हो जाता है; किंतु प्रिया के विम्बोष्ठ और रमणीय कवि वचन में एक असीम नवीन आनंद है, उससे तो एक निरुपमेय रस का स्फुरण होता है । तो राजा ने लाख मुद्राएँ दीं । ---:०:--- (११) कालिदासभवभूत्योः स्पर्धा ततः कदाचित्सिंहासनमलङ्कुर्वाणे श्रीभोजे द्वारपाल आगत्य प्राह- 'देव, वाराणसीदेशादागतः कोऽपि भवभूतिर्नाम कविर्द्वारि तिष्ठति'
इति। राजा प्राह—'प्रवेशय' इति। ततः प्रविष्टः सोऽपि सभामगात्। ततः सभ्याः सर्वे तदागमनेन तुष्टा अभवन्। राजा च भवभूतिं प्रेक्ष्य प्रणमति स्म। स च 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा तदाज्ञयोपविष्टः। एक बार श्रीभोज के सिंहासन को सुशोभित करने पर द्वारपाल ने आकर कहा—'देव, वाराणसी देश से आया एक भवभूति नामक कवि द्वार पर उपस्थित है।' राजा ने कहा—'प्रविष्ट कराओ।' सो प्रविष्ट होने पर वह भी सभा में पहुँचा। तब सभी सभासद् उसके आने से संतुष्ट हुए। राजा ने भवभूति को देख कर प्रणाम किया। वह 'स्वस्ति' कहकर उसकी आज्ञा से बैठ गया। भवभूतिः प्राह—'देव, नानीयन्ते मधुनि मधुपाः पारिजातप्रसूनै- र्नाभ्यर्थ्यन्ते तुहिनरुचिनश्चन्द्रिकायां चकोराः। अस्मद्वाङ्माधुरीमधुरसापद्यपूर्वावताराः सोल्लासाः स्युः स्वयमिह बुधाः किं मुधाभ्यर्थनाभिः॥२४५॥ भवभूति ने कहा—महाराज, भौंरे मधु पर पारिजात (कल्प वृक्ष) के फूलों द्वारा नहीं लाये जाते; शीतल कांति चंद्रमाकी चाँदनी के निमित्त चकोरों की अभ्यर्थना नहीं की जाती (ये स्वयं ही आकृष्ट होते हैं।) इसी प्रकार मेरी वाणी की माधुरी के मिठास को प्राप्त कर पहिले से यहाँ पधारे विद्वज्जन स्वयं ही उल्लसित हो जायेंगे—व्यर्थ अभ्यर्थना करने से क्या लाभ ? नास्माकं शिविका न कापि कटकाचालङ्क्रियासत्क्रिया नोत्तुङ्कस्तुरगो न कश्चिदनुगो नैवाम्बरं सुन्दरम्। किन्तु क्ष्मातलवर्त्यशेषविदुषां साहित्यविद्याजुषां चेतस्तोषकरी शिरोनतिकरी विद्या नवद्यास्ति नः॥२४६॥ हमारे पास न तो पालकी है, न सत्कार के लिए सुसज्जित मुलायम बिछौना; न ऊँचा घोड़ा है, न कोई अनुचर और न सुन्दरवस्त्र; किंतु धरती पर विद्यमान समस्त साहित्यविद्या के ज्ञाता विद्वानों के चित्त को सन्तुष्ट करने वाली और उनके शिर को विनत करने वाली श्रेष्ठ विद्या है।
१२६ भोजप्रबन्धः चंद्रमंडल (मुख) खिन्न हो गया; माला से ग्रथित अंधकार बिखर गया (पुष्पमाल से युक्त केशराशि बिखर गयी); पहिले खिलते केतक-पुष्प की कोर की लीला करने वाली सुंदर मुसकान शांत हो गयी, कुंडलों का नृत्य समाप्त हो गया, कुवलयों का जोड़ा (दोनों नेत्र) मुंद गया और प्रवालों (ओष्ठों) से सी-सी करना बंद हो गया--तत्पश्चात् न जाने क्या हुआ ? राजा कालिदासं प्राह--'सुकवे, भवभूतिना सह साम्यं तव न वक्तव्यम्।' भवभूतिराह--'देव, किमिति वारयसि।' राजा--'सर्व- प्रकारेण कविरसि।' ततो बाणः प्राह--'राजन्, भवभूतिः कविश्चेत् कालिदासः किं वक्तव्यः राजा--'बाणकवे, कालिदासः कविर्न। किन्तु पार्वत्याः कश्चिदवनौ पुरुषावतार एव।' ततो भवभूतिराह--'देव, किमत्र प्राशस्त्यं भाति।' राजा प्राह--'भवभूते, किमु वक्तव्यं प्राशस्त्यं कालि- दासश्लोके। यतः 'केतकशिखालीलायितं सुस्मितम्' इति पठितम्।' ततो भवभूतिराह--'देव, पक्षपातेन वदसि' इति। ततः कालिदासः प्राह--'देव अपख्यातिर्मा भूत्। भुवनेश्वरीदेवालयं गत्वा तत्सन्निधौ तां पुरस्कृत्य घटे संशोधनीय त्वया।' राजा ने कालिदास से कहा--'हे सुकवि, भवभूति के साथ तुम्हारी समता अवचनीय है।' भवभूति ने कहा--'महाराज, क्यों निवारण करते हैं?' राजा--'तुम सब प्रकार से कवि हो।' तो बाण ने कहा--'राजन्, यदि भवभूति कवि है, तो कालिदास को क्या कहा जाय ?' राजा--'कवि बाण, कालिदास कवि नहीं है, अपितु धरती पर पार्वती का एक पुरुषावतार ही है।' तो भवभूति ने कहा--'महाराज, इसमें प्रशंसनीय क्या प्रतीत होता है?' राजा ने कहा--'भवभूति, कालिदास के श्लोक की प्रशंसनीयता के विषय में कहना क्या? क्या कहा है--'केतक-पुष्प की कोर की लीला करने वाली सुंदर मुसकान' ! तो भवभूति ने कहा--'महाराज, पक्षपात पूर्ण कहते हैं?' तो कालिदास ने कहा--'महाराज, अपकीर्ति न हो। भुवनेश्वरी देवी के मंदिर में जाकर उसके निकट कविता को रखकर आप घट द्वारा परीक्षण करें।' ततो भोजः सर्वकविवृन्दपरिवृतः सन्भुवनेश्वरीदेवालयं प्राप्य तत्र तत्सन्निधौ भवभूतिहस्ते घटं दत्त्वा श्लोकद्वयं च तुल्यपत्रद्वये लिखित्वा
भोजप्रबन्धः १२७ तुलायां सुमोच । ततो भवभूतिभागे लघुत्वोद्भूतामीषदुन्नतिं ज्ञात्वा देवी भक्तपराधीना सदसि तत्परिभवो मा भूदिति स्वावतंसकह्लारमकरन्दं वामकरनखाग्रेण गृहीत्वा भवभूतिपत्रे चिक्षेप । तो फिर समस्त कवि मंडली के साथ भोज भुवनेश्वरी देवी के मंदिर पहुँचे और उनके सान्निध्य में भवभूति के हाथ में घट देकर और दोनों श्लोक दो समान पत्रों पर लिखकर तराजू में रख दिये । तब फिर भवभूति वाले भाग को हलकेपन के कारण कुछ ऊँचा उठा देख भक्त के अधीन देवी ने यह विचार कर कि मेरे भक्त भवभूति की सभा में अप्रतिष्ठा न हो, अपने कर्ण फूल के कमल की मकरंद बायें हाथ के नख की कोर से लेकर भवभूति के (श्लोक वाले) पत्र में डाल दीं । ततः कालिदासः प्राह- 'अहो मे सौभाग्यं मम च भवभूतेश्च भणितं घटायामारोप्य प्रतिफलति तस्यां लघिमनि । गिरां देवी सद्यः श्रुतिकलितकह्लारकलिका- मधूलीमाधुर्यं क्षिपति परिपूर्त्यै भगवती' ॥ २४३ ॥ तो कालिदास ने कहा-- अहा, मेरा सौभाग्य है कि मेरी और भवभूति की काव्योक्ति को तुला में रखने पर भवभूति की उक्ति में जब हलकापन आने लगा तो उसकी पूर्ति के लिए भगवती वाग्देवी ने तुरंत कान में पहिनी कमल कली के मकरंद के माधुर्य को रख दिया । ततः कालिदासपाद्योः पतति भवभूतिः । राजानं च विशेषज्ञं मनुते स्म । ततो राजा भवभूतिकवये शतं मत्तगजान्ददौ । तब भवभूति कालिदास के पैरों पड़ गये और राजा को विशेषज्ञ मान लिया । तो राजा ने भवभूति कवि को सौ मतवाले हाथी दिये । ---:०:--- (२०) दानस्य कतिपयकथाः अन्यदा राजा धारानगरे रात्रावेकाकी विचरन्काञ्चन स्वैरिणीं सङ्केतं गच्छन्तीं दृष्ट्वा पप्रच्छ—'देवि, का त्वम्। एकाकिनी मध्यरात्रौ क्व गच्छसि' इति ।
[Page 128] भोजप्रबन्धः
एक बार धारा नगर में एकाकी विचरण करते राजा ने एक स्वेच्छा विहारिणी को संकेत-स्थल (पूर्व निश्चित मिलन स्थान) की ओर जाती देख पूछा—'हे देवी, तुम कौन हो? आधी रात में अकेली कहाँ जा रही हो?' ततश्चतुरा स्वैरिणी सा तं रात्रौ विचरन्तं श्रीभोजं निश्चित्य प्राह— 'त्वत्तोऽपि विषमो राजन्विषमेषुः क्ष्मापते । शासनं यस्य रुद्राद्या दासखन्मूर्ध्नि कुर्वते ॥ २५४ ॥ ततस्तुष्टो राजा दोर्दण्डादादायाङ्गदं वलयं च तस्यै दत्तवान्। सा च यथास्थानं प्राप । तो वह चतुर इच्छाचारिणी यह निश्चय करके कि यह रात में विचरण करता राजा भोज है, उससे बोली— हे धरती के स्वामी राजा, विषमबाण (पंचबाण कामदेव) आपसे भी अधिक उग्र है, जिसके शासन को रुद्रादि देव दास के समान शिरोधार्य करते हैं। संतुष्ट हो राजा ने भुजदंड से बाजूबंद और कंगन उसे दिये। और वह भी अपने निश्चित स्थान को चली गयी। ततो वर्त्मनि गच्छन्क्वचिद्गृह एकाकिनीं रुदतीं नारीं दृष्ट्वा 'किम- र्थमर्धरात्रौ रोदिति। किं दुःखमेतस्याः।' इति विचारयितुमेकमङ्गरक्ष- कंप्राहेिणोत्। तदनंतर मार्ग में जाते हुए किसी घर में एक अकेली स्त्री को रोती देख—'यह आधी रात को क्यों रो रही है? इसको क्या दुःख है?—यह विचारने के लिए एक अंगरक्षक को भेजा। ततोऽङ्गरक्षकः पुनरागत्य प्राह—'देव, मया पृष्टा यदाह तच्छृणु— वृद्धोमत्पतिरेष मञ्चकगतः स्थूणावशेषं गृहं कालोऽयं जलदागमः कुशलिनो वत्सस्य वार्तापि नो । यत्नात्सञ्चिततैल बिन्दु घटिका भग्नेति, पर्याकुला दृष्ट्वा गर्भभरालसां निजवधूं श्वश्रूश्चिरं रोदिति ॥ २५५ ॥ ततः कृपावारिधिः क्षोणीपालस्तस्यै लक्षं ददौ।
भोजप्रबन्धः १२६ तो लौटकर अंगरक्षक बोला—'महाराज, मेरे पूछने पर उसने जो कहा, सो सुनिए— 'यह मचिया पर पड़ा, बूढ़ा मेरा पति है; यह मेरा घर है, जिसमें थूनी- मात्र शेष है; यह वरसाल के आने का समय है और मेरे बच्चे का कोई कुशल समाचार भी नहीं है । प्रयत्न पूर्वक संचित तेल की मटकी भी फूट गयी',—तो अत्यंत व्याकुल हो गर्भ के भार से अलसाती अपनी पुत्र-वधू को देखकर (बूढ़ी) सास बहुत देर से रो रही है । तब कृपा से सागर पृथ्वीपालक ने उसके लिए लाख मुद्राएँ दीं । अन्यदा कोङ्कणदेशवासी विप्रो राज्ञे 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा प्राह— शुक्तिद्वयपुटे भोज यशोऽब्धौ तव रोदसी । मन्ये तदुद्भवं मुक्ताफलं शीतांशुमण्डलम् ॥ २५६ ॥ राजा तस्मै लक्षं ददौ । दूसरी बार कोंकण देश का निवासी एक ब्राह्मण 'राजा का कल्याण हो,' यह कहकर बोला— हे भोज, ये आकाश और धरती तेरे यश-सागर में पड़ी सीपी के दो पुट हैं, मैं मानता हूँ कि यह शीत किरण चंद्रमंडल उसी से उत्पन्न मोती है । राजा ने उसे लाख मुद्राएँ दीं । अन्यदा काश्मीरदेशात्कोऽपि कौपीनावशेषो राजनिटकस्थकवीन्कन- कमांणिक्यपट्टदुकूललङ्कृतानवलोक्य राजानं प्राह— नो पाणौ वरकङ्कणक्वणयतो नो कर्णयोः कुण्डले क्षुभ्यत्क्षीरधिदुग्धमुग्धमहसी नो वाससी भूषणम् । दन्तस्तम्भविकासिका न शिविका नाश्वोऽपि विद्योन्नतो राजन्न्राजसभासुभाषितकलाकौशल्यमेवास्ति नः ॥ २५७ ॥ ततस्तस्मै राजा लक्षं ददौ । एक और बार काश्मीर देश से आया कोई कौपीन मात्र धारी व्यक्ति राजा के समीपवर्ती कवियों को सुवर्ण, माणिक और रेशमी वस्त्रों में सुसज्जित देखकर बोला— ६ भोज०
१३० भोजप्रबन्धः सुंदर कंगन खनकाते मेरे हाथ नहीं हैं और न मेरे कानों में कुंडल हैं; न लहराते क्षीर समुद्र के दुग्ध के समान मुग्ध करने वाली शुभ्र कांति वाले वस्त्र हैं और न आभूषण; हाथी दाँत के डंडों से निर्मित न तो पालकी ही है और न खूब ऊँचा घोड़ा;—हे राजा, राजसभा में भली भाँति व्यक्त करने की कला का चातुर्य ही मेरे पास है। तो उसे राजाने लाख मुद्राएँ दीं अन्यदा राजा रात्रौ चन्द्रमण्डलं दृष्ट्वा तदन्तस्थकलङ्क वर्णयति स्म- 'अङ्क' केऽपि शशाङ्किरे जलनिधेः पङ्क' परे मेनिरे सारङ्ग' कतिचिच्च सञ्जगदिरे भूच्छायमैच्छन्परे।' इति राजा पूर्वार्धं लिखित्वा कालिदासहस्ते ददौ। दूसरी बार राजा रात में चंद्रमंडल देखकर उसके भीतर स्थित कालिमा चिह्न का वर्णन करने लगा-- कुछ कलंक की शंका करते, कुछ कहते समुद्र की पंक; कुछ कहते यह हिरन और कुछ धरती की छाया यह अंक। राजा ने इस प्रकार श्लोक का पूर्वार्ध लिखकर कालिदास के हाथ में दे दिया। ततः स तस्मिन्नेव क्षणे उत्तरार्धं लिखति कविः— 'इन्दौ यद्दलितेन्द्रनीलशकलश्यामं दरीदृश्यते। तत्सान्द्रं निशि पीतमन्धतमसं कुक्षिस्यमाचक्ष्महे' ।। २४८ ।। राजा प्रत्यक्षरलक्षमुत्तरार्धस्य दत्तवान्। तो उस कवि ने उसी क्षण उत्तरार्ध लिख दिया— इंद्र नीलमणि-खंड दीखता जो चंदा में काला-सा, सब पिया रात में घना अँधेरा, पड़ा पेट में पाला-सा। राजा ने उत्तरार्ध के लिए प्रत्येक अक्षर पर लाख मुद्राएँ दीं। ततो राजा कालिदास-कवितापद्धतिं वीक्ष्य चमत्कृतः पुनराह- 'सखे, अकलङ्क' चन्द्रमसं व्यावर्णय' इति। तो राजा ने कालिदास की काव्य-रचना-प्रणाली को देखकर चमत्कृत हो फिर कहा—'मित्र, निष्कलंक चंद्रमा का वर्णन करो।'
भोजप्रबन्धः १३१ ततः कविः पठति— 'लक्ष्मीक्रीडातडागो रतिधवलगृहं दर्पणो दिग्वधूनां पुष्पं श्यामालतायास्त्रिभुवनजयिनो मन्मथस्यातपत्रम् । पिण्डीभूतं हरस्य स्मितममरधुनीपुण्डरीकं मृगाङ्को ज्योत्स्नापीयूषवापी नयति सितवृषस्तारकागोलकस्य' ॥ २५६ ॥ राजा पुनः प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ। तो कवि ने पढ़ा— लक्ष्मी का क्रीडा-सर चंदा या है रति का शुभ्र निवास, दिग्भामिनियों का या दर्पण, श्यामलत्ता का फूल सुहास, त्रिभुवनजयी काम का छाता, शिव की पिंड भूत मुसकान, यह मृगांक है नील गगन में सुरगंगा के कमल समान, विमल चाँदनी की अमृत से है परिपूर्ण बावड़ी यह, घूम रहा है वृषभ श्वेत ताराओं के मंडल में यह । राजा ने फिर प्रत्येक अक्षर पर लाख मुद्राएँ दीं । एकदा कश्चिद्दूरदेशादागतो वीणाकविराह— 'तर्कव्याकरणाध्वनीनधिषणो नाहं न साहित्यवि- न्नो जानामि विचित्रवाक्यरचनाचातुर्यमत्यद्भुतम् । देवी कापि विरञ्चिवल्लभसुता पाणिस्थितवीणाकल- क्वाणाभिन्नरवं तथापि किमपि ब्रूते मुखस्था मम' ॥ २६० ॥ राजा तस्मै लक्षं ददौ । एक वार दूर देश से आये किसी वीणा कवि ने कहा— तर्क, व्याकरण आदि में मेरा बुद्धि-प्रवेश नहीं है और न मैं साहित्य का वेत्ता हूँ; अद्भुत और अनोखी वाक्य-रचना के कौशल को भी मैं नहीं जानता; तो भी विधाता की प्रिय पुत्री कोई देवी अपने हाथ में ली वीणा की मनोहर ध्वनि के समान सुंदर शब्द मेरे मुख में स्थित हो बोलती है । राजा ने उसे लाख मुद्राएँ दीं । बाणस्तस्य सुललितप्रबन्धं श्रुत्वा प्राह—'देव, मातङ्गीमिव माधुरीं ध्वनिविदो नैव स्पृशन्त्युत्तमां व्युत्पत्तिं कुलकन्यकामिव रसोन्मत्ता न पश्यन्त्यमी ।
१३२ भोजप्रबन्धः कस्तूरीघनसारसौरभसुहृद्व्युत्पत्तिमाधुर्ययो- र्योगः कर्णरसायनं सुकृतिनः कस्यापि सम्पद्यते' ॥ २६१ ॥ उसकी सुंदर ललित प्रबंध-रचना को सुनकर बाण ने कहा— ध्वनि वेत्ता ( काव्य की आत्मा ध्वनि को मानने वाले ) उत्तमा माधुरी ( मधुर शब्द योजना ) को चांडाल कन्या के समान अस्पृश्य मानते हैं और ये रस के मतवाले ( रसवादी ) जैसे कोई कुलकन्या को देख भी नहीं पाता है, वैसे ही व्युत्पत्ति ( प्रस्तुति ) को नही देखते; कस्तूरी और चंदन के सुगंध के संयोग के समान व्युत्पत्ति और माधुर्य—प्रस्तुति और मधुर योजना— का कानों के रसायन ( अत्यधिक प्रिय ) सदृश योग किसी सुकृती के काव्य में हो पाता है। अन्यदा राजा सीतां प्रति प्राह—'देवि, प्रभातं व्यावर्णय' इति । सीता प्राह— 'विरलविरलाः स्थूलास्ताराः कलाविव सज्जना मन इव मुनेः सर्वत्रैव प्रसन्नमभून्नभः । अपसरति च ध्वान्तं चित्तात्सतामिव दुर्जनो व्रजति च निशा क्षिप्रं लक्ष्मीरनुद्यमिनामिव' ॥ २६२ ॥ एक अन्य वार राजा ने सीता से कहा--'हे देवि, प्रभात का वर्णन करो ।' सीता ने कहा-- जैसे कलियुग में सज्जन विरल हैं, वैसे ही बड़े तारे कहीं-कहीं हैं; जैसे मुनियों का मन सर्वत्र प्रसन्न रहता है, वैसे ही सब ओर आकाश स्वच्छ है; जैसे सज्जनों के चित्त से दुष्ट व्यक्ति निकल जाता है, वैसे ही अंधकार जा रहा है और रात शीघ्रता पूर्वक उसी प्रकार जा रही है, जैसे उद्यमहीन व्यक्तियों की लक्ष्मी चली जाती है । राजा लक्षं दत्त्वा कालिदासं प्राह--'सखे सुकवे, त्वमपि प्रभातं व्यावर्णय' इति । राजा ने लाख मुद्राएँ सीता को देकर कालिदास से कहा—'सुकवि मित्र, तुम भी प्रभात का वर्णन करो।' कालिदासः--
भोजप्रबन्धः १३३ 'अभूत्प्राची पिङ्गा रसपतिरिवापश्य कनकं गतच्छायश्चन्द्रो बुधजन इव ग्राम्यसदसि । क्षणात्क्षीणास्तारा नृपतय इवानुद्यमपरा न दीपा राजन्ते द्रविणरहितानामिव गुणाः' ॥ २६३ ॥ राजा तस्मै प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ । कालिदास—जैसे सोने के योग से रसराज पारद पीला हो जाता है, वैसे ही पूर्व दिशा पीली पड़ गयी; जैसे गँवारों की सभा में विद्वान श्रीहीन हो जाता है, वैसे ही चंद्रमा शोभाहीन हो गया; जैसे अनुद्योगी राजा क्षीण हो जाते हैं, वैसे ही इस क्षण तारे क्षीण हो गये; और जैसे धनहीन व्यक्तियों के गुण प्रतिष्ठित नहीं हो पाते, वैसे ही दीपक अब शोभित नहीं हैं। राजा ने कालिदास को प्रत्येक अक्षर पर लाख मुद्राएँ दीं । अन्यदा द्वारपाल आगत्य प्राह—'देव, कापि मालाकारपत्नी द्वारि तिष्ठति' इति । राजाह—'प्रवेशय' इति । ततः प्रवेशिता सा च नमस्कृत्य पठति— 'समुन्नतघनस्तनस्तबकचुम्बितुम्बीफल- क्वणन्मधुरवीणाया विबुधलोकलोलभ्रुवा । त्वदीयमुपगीयते हरकिरीटकोटिस्फुर- त्तुषारकरकन्दलीकिरणपूरगौरं यशः' ॥ २६४ ॥ राजा 'अहो महती पदपद्धतिः' इति तस्याः प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ । अन्य बार द्वारपाल आकर बोला—'महाराज, कोई मालिन द्वार पर उपस्थित है।' राजा ने कहा—'प्रविष्ट कराओ।' तो प्रविष्ट हो उसने नमस्कार कर पढ़ा— देवलोक की चंचल भ्रूकुटि वाली सुंदरियाँ अत्युन्नत और सघन स्तन- गुच्छों का चुंबन करते तूँबों से युक्त मधुर स्वर देने वाली वीणाओं पर शिव के मुकुटाग्र भाग पर चमकते हिमकर चंद्रमा की किरणों के प्रवाह के समान गौर आपके यश का गान किया करती हैं। राजाने विचारा 'अहा, इसकी पद योजना शैली श्रेष्ठ है'—और उसे प्रत्येक अक्षर पर लाख मुद्राएँ दीं।
१३४ भोजप्रबन्धः अन्यदा रात्रौ राजा धारानगरे विचरन्कस्यचिद्गृहे कामपि कामि- नीमूलूखलपरायणां ददर्श । राजा तां तरुणीं पूर्णचन्द्राननां सुकुमाराङ्गीं विलोक्य तत्करस्थं मुसलं प्राह--'हे मुसल, एतस्याः करपल्लवस्पर्शनापि त्वयि किसलयं नासीत् । तर्हि सर्वथा काष्ठमेव त्वम्' इति । ततो राजा एकं चरणं पठति स्म- 'मुसल किसलयं ते तत्क्षणाद्यन्न जातम् । और कभी रात मे धारा नगर में विचरते राजा ने किसी घर में किसी कामिनी को ऊखल में कूटते देखा । उस तरुणी के पूर्ण चंद्रमा के समान मुख और सुकुमार अंगों को देखकर राजा ने उसके हाथ के मूसल से कहा--'हे मूसल, इसके कर पल्लव के स्पर्श से भी यदि तुझ में कोंपल नहीं फूटी तो तू सब प्रकार से काठ ही है।' तो राजा ने एक पद पढ़ा-- मूसल, तुझ में यदि फूटी नहीं कोंपल...। ततो राजा प्रातः सभायां समागतं कालिदासं वीक्ष्य 'मुसल किसलयं ते तत्क्षणाद्यन्न जातम्' इति पठित्वा 'सुकवे, त्वं चरणत्रयं पठ' इत्युवाच । तदनंतर प्रातः काल सभा में आये कालिदास को देखकर राजा ने 'मूसल, तुझमें यदि फूटी नहीं कोंपल...' यह पढ़कर उससे कहा 'हे सुकवि, अब तीन शेष पद तुम पढ़ो।' ततः कालिदासः प्राह-- जगति विदितमेतत्काष्ठमेवासि नूनं तदपि च किल सत्यं कानने वर्धितोऽसि । नवकुवलयनेत्रीपाणिसङ्गोत्सवेऽस्मि- न्मुसल किसलयं ते तत्क्षणाद्यन्न जातम् ॥ २६५ ॥ ततो राजा चरणत्रयस्य प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ । तो कालिदास ने कहा-- निश्चय तू काठ है, जानता है यह सारा जग, यह भी फिर सच है कि जंगल में पला है तू, पाणि-संग पाकर भी नवलकमलनयना का मूसल, तुझ में यदि फूटी नहीं कोंपल ! तो राजा ने तीन पदों पर प्रति अक्षर लाख मुद्राएं दीं।
भोजप्रबन्धः १३५ ( २१ ) देवजयहरिशर्मणोः स्पर्धा अन्यदा राजा दीर्घकालं जलकेलिं विधाय परिश्रान्तस्तत्तीरस्थव- टविटपिच्छायायां निषण्णः । तत्र कश्चित्कविरागत्य प्राह— 'छन्नं सैन्यरजोभरेण भवतः श्रीभोजदेव क्षमा- रक्षाद्दक्षिण दक्षिणक्षितिपत्तिः प्रेक्ष्यान्तरिक्षं क्षणात् । निःशङ्को निरपत्रपो निरगुनो निर्बान्धवो निःसुहृन्- निःस्त्रीको निरपत्यको निरनुजो निर्हाटको निर्गतः ॥२६६॥ और एक वार बहुत समय तक जल क्रीडा करके थका राजा सरोवर के तटवर्ती वृक्ष की छाया में बैठा था । वहाँ कोई कवि आकर बोला— क्षमा और रक्षा करने में एक सम श्री भोजदेव, आपकी सेना से उड़ी धूल से ढके नभ को देखकर दक्षिण की धरती का स्वामी शंका त्याग, लज्जा त्याग, अनुचरहीन, बंधुहीन, मित्र और पत्नी हीन, संतति और भ्रातृ हीन, छोड़कर सोना, धन, संपत्ति शीघ्रतया भाग गया । किञ्च— अकाण्डधृतमानसव्यवसितोत्सवैः सारसै- रकाण्डपटुताण्डवैश्चापि शिखण्डिनां मण्डलैः । दिशः समवलोकिताः सरसनिर्भरप्रोलस- द्भवत्पृथुवरूथिनीरजनिभूरजः श्यामलाः ॥ २६७ ॥ ततो राजा लक्षद्वयं ददौ । और क्या कहूँ ?—मानस में सारस अकारण ही (वर्षा आयी समझ) उत्सव मनाने लगे; अकारण ही (मेघागम समझ) मयूर मंडली ने नृत्य चातुरी दिखानी आरब्ध कर दी;—हुआ यह कि उत्साह और उल्लास से परिपूर्ण आपकी विशाल सेना के संचरण से धूलि उड़ने के कारण रात-सी प्रतीति कराती दिशाएँ श्यामल दीखने लगीं । तो राजा ने दो लाख मुद्राएँ दीं । तदानीमेव तस्य शाखायामेकं काकं रटन्तं प्रेक्ष्य कोकिलं चान्य- शाखायां कूजन्तं वीक्ष्य देवजयनामा कविराह— 'नो चारु चरणौ न चापि चतुरा चञ्चूर्न वाच्यं वचो नो लीलाचतुरा गतिर्न च शुचिः पक्षग्रहोऽयं तव ।
१३६ भोजप्रबन्धः क्रूरक्वेङ्कृतिनिर्व्हरां गिरमिह स्थाने वृथैवोद्गिर- न्मूर्ख ध्वाङ्क्ष न लज्जसेऽप्यसदृशं पाण्डित्यमुन्नाटयन्' ॥२६८॥ उसी समय उस वृक्ष की ( जिसके नीचे भोज विश्राम कर रहे थे ) एक शाखा पर काँउ-काँउ करते कौए और दूसरी डाली पर कूकती कोयल को देखकर देवजय नामक कवि ने कहा— न तो तेरे सुंदर पैर हैं और न चोंच; न मधुरी वाणी है, न लीला- मनोरम गति और न पावन पंख ही। अरे मूर्ख काक, इस स्थान पर केवल कर्कश काँउ-काँउ-भरी वाणी व्यर्थ उच्चारते और बेतुकी पंडिताई का नाट्य करते तुझे लज्जा नहीं आती ? तत एतां देवजयकविना काकमिषेण विरचितां स्वगर्हणां मन्यमान- स्तत्स्पर्द्धालुर्हरिशर्मा नाम कविः कोपेनेर्ष्यापूर्वं प्राह— 'तुल्यवर्णाच्छदः कृष्णः कोकिलैः सह सङ्गतः । केन व्याख्यायते काकः स्वयं यदि न भाषते' ॥ २६६ ॥ तब देवजय कवि द्वारा काक के व्याज से रचित इस ( पद योजना ) से अपना अपमान मानता हुआ उससे स्पर्धा करनेवाला हरिशर्मा नाम का कवि ईर्ष्या पूर्वक क्रोध से बोला— एक जैसे रंग और पंखों वाले, कोकिल कुल की संगति में रहनेवाले काले कौए को कौन पहिचान पाता यदि वह स्वयं न बोलता ? ततो राजा तयोर्हरिशर्मदेवजययोरन्योन्यवैरं ज्ञात्वा मिथ आलिङ्गना- द्विवस्त्रालङ्कारादिदानेन च मित्रत्वं व्यधात् । तो राजा ने हरिशर्मा और देवजय नामक उन कवियों का परस्पर वैर जानकर दोनों को गले मिलवा कर और वस्तु आभूषणादि देकर उनमें मित्रता करा दी । —:०:— ( २२ ) विदुषां काशीगमनम् अन्यदा राजा यानमारुह्य गच्छन्वत्र्मनि कञ्चित्तपोनिधिं दृष्ट्वा तं प्राह- 'भवादृशानां दर्शनं भाग्यायत्तम् । भवतां क्व स्थितिः । भोजनार्थं के वा प्रार्थ्यन्ते' इति ।
भोजप्रबन्धः १३७ एक वार राजा ने यान पर चढ़कर जाते हुए मार्ग में किसी तपस्वी को देखकर उससे कहा--'आप जैसे तपस्वियों का दर्शन भाग्याधीन होता है । आपका ठांव कहाँ है और भोजन के निमित्त आप किनसे प्रार्थना करते हैं ? ततः स राजवचनमाकर्ण्य तपोनिधिराह-- 'फलं स्वेच्छालभ्यं प्रतिवनमखेदं क्षितिरुहां पयः स्थाने स्थाने शिशिरमधुरं पुण्यसरिताम् । मृदुस्पर्शा शय्या सुललितलतापल्लवमयी सहन्ते सन्तापं तदपि धनिनां द्वारि कृपणाः ॥ २७० ॥ राजन्, वयं कमपि नाभ्यर्थयामः, न गृह्णीमश्च' इति । राजा तुष्टो नमति । राजा के वचन सुनकर उस तपोधन ने कहा-- 'बिना कष्ट ही वृक्षों के फल वन-वन स्वेच्छा से मिल जाते; शीतल, मधुर पुण्य नदियों का ठांव-ठांव जल हम पा जाते; लता-पल्लवों की मृदु कोमल चिकनी शय्या पर सोते हैं, कृपण व्यक्ति धनियों के द्वारे तो भी ताप-तप्त होते हैं । हे राजा, न हम किसी से प्रार्थना करते हैं, न लेते हैं।' तुष्ट हो राजा ने प्रणाम किया । तत उत्तरदेशादागत्य कश्चिद्राजानं 'स्वस्ति' इत्याह । तं च राजा पृच्छति--'विद्वन्, कुत्र ते स्थितिः' इति । तदनंतर उत्तर देश से एक विद्वान ने आकर राजा से 'स्वस्ति' कहा । राजा ने उससे पूछा--'हे विद्वान्, तुम्हारा स्थान कहाँ है ?' विद्वानाह-- 'यत्राम्बु निन्दत्यमृतमन्त्यजाश्च सुरेश्वरान् । चिन्तामणिं च पाषाणास्तत्र नो वसतिः प्रभो' । २७१ ॥ विद्वान् बोला-- जहाँ का जल अमृत से श्रेष्ठ, देवराजों-से अंत्यज दास; दिव्य चिन्तामणिसे पाषाण, वहीं है देव, हमारा वास ।
१३८ भोजप्रबन्धः तदा राजा लक्षं दत्त्वा प्राह--'काशीदेशे का विशेषवार्ता' इति । स आह- 'देव, इदानीं काचिदद्भुतवार्ता तत्र लोकमुखेन श्रुता-देवा दुः- खेन दीनाः' इति । राजा--'देवानां कुतो दुःखं विद्वन्।' तो राजा ने लाख मुद्राएँ देकर कहा-'काशी देश का क्या विशेष समाचार है ?' वह बोला--'महाराज, वहाँ लोगों के मुँह से इन दिनों विचित्र बात सुनी गयी है कि-देवगण दुःख से दीन हैं।' राजा ने कहा-'हे विद्वान, देवों को कहाँ से दुःख ?' स चाह-- निवासः क्वाद्य नो दत्तो भोजेन कनकाचलः। इति व्यग्रधियो देवा भोज वार्तेति नूतना' ॥ २७२ ॥ ततो राजा कुतूहलोक्त्या तुष्टः संस्तस्मै पुनर्लक्षं ददौ। वह बोला--'महाराज, यही तो नयी बात है। देवगण, व्यग्र हो विचार रहे हैं कि राजा भोज ने स्वर्ण गिरि सुमेरु का दान कर दिया, आज हम रहेंगे कहाँ ?' तो राजा ने इस कुतूहल पूर्ण उक्ति पर संतुष्ट हो उसे पुनः लाख मुद्राएँ दीं। ततो द्वारपालः प्राह--'देव, श्रीशैलादागतः कश्चिद्विद्वान्ब्रह्मचर्यनिष्ठो द्वारि वर्तते' इति । राजा-'प्रवेशय' इत्याह। तत आगत्य ब्रह्मचारी 'चिरं- जीव' इति वदति। राजा तं पृच्छति--'ब्रह्मन्, बाल्य एव कलिकालाननु- रूपं किं नामव्रतं ते । अन्वहमुपवासेन कृशोऽसि । कस्यचिद्ब्राह्मणस्य कन्यां तुभ्यं दापयिष्यामि, त्वं चेद्गृहस्थधर्ममङ्गीकरिष्यसि' इति । तदनंतर द्वारपाल ने कहा--'महाराज, श्री शैल से आया कोई ब्रह्मचर्य व्रतधारी विद्वान् द्वार पर उपस्थित है।' राजा ने कहा--'प्रविष्ट कराओ।' तब ब्रह्मचारी ने आकर कहा-चिरकाल जिओ।' राजा ने उससे पूछा- 'हे ब्रह्मचारिन्, बाल्यावस्था में ही कलिकाल के असदृश यह तुम्हारा कैसा व्रत है ? प्रतिदिन के उपवास से दुर्बल हो गये हो । यदि तुम गृहस्थ धर्म स्वीकारो तो किसी ब्राह्मण की कन्या से तुम्हारा विवाह करा दूँ।'
भोजप्रबन्धः १३६ ब्रह्मचारी प्राह- 'देव, त्वमीश्वरः। त्वया किमसाध्यम्। सारङ्गाः सुहृदो गृहं गिरिगुहा शान्तिः प्रिया गेहिनी वृत्तिर्वन्यलताफलैर्निवसनं श्रेष्ठं तरूणां त्वचः। तद्ध्यानामृतपूरमग्नमनसां येषामियं निर्वृति- स्तेषामिन्दुकलावतंसयमिनां मोक्षेऽपि नो न स्पृहा'॥ २७३॥ ब्रह्मचारी बोला-'महाराज, आप समर्थ हैं, आप से क्या असाध्य है? - 'हिरन-चातकादि पशु-पक्षी मित्र हैं, पर्वत की गुफा घर है, शांति प्रिय घरनी है, वन-लताओं के फल आहार हैं और वृक्षों की छाल ही निःशेष वस्त्र हैं। उनके ध्यान रूपी अमृत प्रवाह में जिनका मन मग्न रहता है और जिनका जीवन व्यापार इसी प्रकार चलता है, उन चंद्रकला के धारी शिव के व्रतधारियों को मोक्ष की भी कामना नहीं रहती।' राजोत्थाय पादयोः पतति। आह च- 'ब्रह्मन्, मया किं कर्तव्यम्' इति। स आह- 'देव, वयं काशीं जिगमिषवः। तत्त एवं विधेहि। ये त्वत्सद्मने पण्डितवरास्तान्सर्वानपि सपत्नीकान्काशीं प्रति प्रेषय। ततोऽहं गोष्ठीतृप्तः काशीं गमिष्यामि' इति। राजा तथा चक्रे। राजा उठकर पैरों पड़ा और बोला-'ब्रह्मचारिन्, मुझे क्या करने को कहते हैं? उसने कहा-'महाराज, हम काशी जाना चाहते हैं; सो ऐसा करो। तुम्हारे भवन में जो अच्छे पंडित हैं, उन सबको भी सपत्नीक काशी भेज दो। तो मैं उनकी संगति में तृप्त होता काशी पहुँच जाऊँगा।' राजा ने वैसे कर दिया। ततः सर्वे पण्डितवरास्तदाज्ञया प्रस्थिताः। कालिदास एको न गच्छति स्म। तदा राजा कालिदासं प्राह-सुकवे, त्वं कुतो न गतोऽसि' इति। ततः कालिदासो राजानं प्राह-देव, सर्वज्ञोऽसि। ते यान्ति तीर्थेषु बुधा ये शम्भोर्दूरवर्तिनः। यस्य गौरीश्वरश्चित्ते तीर्थं भोज परं हि सः'॥ २७४॥ तब सब पंडितवर राजा की आज्ञा से चले गये, एक कालिदास नहीं गया। तो राजा ने कालिदास से कहा-'हे सुकवि, तुम क्यों नहीं गये?' तो कालिदास ने राजा से कहा-'देव, आप सर्वज्ञाता हैं।
१४० भोजप्रबन्धः तीर्थ वे बुधजन जाते हैं, जो शिव से दूर रहते हैं। हे भोज, गौरी पति शिव जिसके चित्त में विराजित है, वही परम तीर्थ है।' ततो विद्वत्सु काशीं गतेषु राजा कदाचित्सभायां कालिदासं पृच्छति स्म—'कालिदास, अद्य किमपि श्रुतं किं त्वया' इति । स आह— 'मेरौ मन्दरकन्दरासु हिमवत्सानौ महेन्द्राचले. कैलासस्य शिलातलेषु मलयप्राग्भारभागेष्वपि । सह्याद्रावपि तेषु तेषु बहुशो भोज श्रुतं ते मया लोकालोकविचारचारणगणैरुद्गीयमानं यशः' ॥ २७५ ॥ ततश्चमत्कृतो राजा प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ। तत्पश्चात् विद्वानों के काशी चले जाने पर एक दिन सभा में राजा ने कालिदास से पूछा--'कालिदास, आज तुमने कुछ सुना ?' उसने कहा- सुमेरु पर, मंदराचल की कंदराओं में, हिमालय के शिखरों पर, महेंद्र पर्वत पर, कैलास के शिलातलों पर, मलयाचल की ऊँची चोटियों और सह्याद्रि पर भी सर्वत्र गम्य और अगम्य स्थलों पर विचरण करते चारणों द्वारा हे भोज, मैंने बहुत बार तुम्हारा यश सुना ! चमत्कृत हो राजा ने प्रत्येक अक्षर पर लाख मुद्राएँ दीं। --:-- ( २३ ) शोकतप्तो राजा ततः कदाचिद्राजा विद्वद्वृन्दं निर्गतं कालिदासं चानवरतवेश्या लम्पटं ज्ञात्वा व्यचिन्तयत्--'अहह, बाणमयूरप्रभृतयो मदीयामाज्ञां व्यदधुः । अयं च वेश्यालम्पटतया ममाज्ञां नाद्रियते । किं कुर्मः' इति ततो राजा सावज्ञं कालिदासमपश्यत् । तत्पश्चात् विद्वन्मंडली को काशी गया और कालिदास को निरंतर वेश्याव्यसनी जानकर राजा ने सोचा--'अरे, बाणं, मयूर आदि ने मेरी आज्ञा का पालन किया और इस (कालिदास) ने वेश्याव्यसनी होने से मेरी आज्ञा का आदर नहीं किया। क्या किया जाय ?' तब राजा कालिदास कं अवज्ञा पूर्वक देखने लगा ।