भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ एवं भृगु-शुक्र संवाद मंगलाचरण
भृगुसंहिता फलित-दर्पण फलित-प्रकाश BHRIGU-SANHITA PHALIT-DARPAN (PHALIT-PRAKASH) [जन्मकुण्डली के द्वादश भावों में स्थित नवग्रहों का जातक के जीवन पर प्रभाव, ज्योतिष के सिद्धान्त एवं ग्रह-राशि आदि के विषय में विस्तृत जानकारी सहित संसार के प्रत्येक स्त्री-पुरुष की जन्मकुण्डली के फलादेश का अत्यन्त सरलतापूर्वक ज्ञान कराने वाला सर्वोपयोगी ग्रन्थ] • मूल ग्रन्थ के लेखक भृगु ऋषि महर्षि भृगु को भारत में जन्म लिये हजारों वर्ष व्यतीत हो गए हैं, परन्तु भारत की 60,00,00,000 (साठ करोड़) धर्मप्राण जनता आज भी उनके द्वारा लिखित इस ग्रन्थ-रत्न से प्रेरणा लेती है। जिस दैवज्ञ (ज्योतिषी) के पास यह ग्रन्थ-रत्न रहेगा, लक्ष्मी उसके सदा चरण- चुम्बन करेगी। —राजेश दीक्षित देहाती पुस्तक भण्डार (Regd.) चावड़ी बाजार, दिल्ली-110006 फोन : 261030
समर्पण हिन्दी-जगत् के मूर्द्धन्य विद्वान्, तपस्वी लेखक, यशस्वी शैलीकार, अनुपम पत्रकार सहारनपुर (उ० प्र०) के गौरव पं० कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' के कर-कमलों में सादर !
ज्योतिर्विज्ञान-प्रशंसा ● यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा । तद्वद्वेदाङ्गशास्त्राणां ज्योतिषं मूर्धनि स्थितम् ॥
ज्योतिश्चक्रे तु लोकस्य सर्वस्योक्तं शुभाशुभम् । ज्योतर्ज्ञानं तु यो वेद स याति परमां गतिम् ॥
अप्रत्यक्षाणि शास्त्राणि विवादस्तेषु केवलम् । प्रत्यक्षं ज्योतिषं शास्त्रं चन्द्रार्कौ यत्र साक्षिणौ ॥
म्लेच्छा हि यवनास्तेषु सम्यक् शास्त्रमिदं स्थितम् । ऋषिवत्तेऽपि पूज्यन्ते किं पुनर्देवविद् द्विजः ॥
सूर्यो यच्छतु भूपतां द्विजपतिः प्रीति परां तन्वतां माङ्गल्यं विदधातु भूमितनयो बुद्धिं विधत्तां बुधः । गौरं गौरवमातनोतु च गुरुः शुक्रः सशुक्रार्यदः सौरिर्वैरि - विनाशनं वितनुते रोगक्षयं सैंहिकः ॥
सूर्यः शौर्यमथेन्दुरुच्चपदवीं सन्मङ्गलं मङ्गलः सद्बुद्धिं च बुधो गुरुश्च गुरुता शुक्रः सुखं शं शनिः । राहुर्बाहुबलं करोतु विपुलं केतुः कुलस्योन्नतिं नित्यं प्रीतिकराः भवन्तु भवतां सर्वे प्रसन्नाः ग्रहाः ॥
कल्याणं कमलासनः स भगवान् विष्णुः सजिष्णुः स्वयं प्रालेयाद्रिसुतापतिः सतनयो ज्ञानं च निर्विघ्नताम् । चन्द्रज्ञास्फुजिदर्कभौमधिषणच्छाया सुतैरन्वितस् : ज्योतिश्चक्रमिदं सदैव भवतामायुश्चिरं यच्छतु ॥
दो शब्द
( Preface ) • 'यत्पिण्डे तत्ब्रह्माण्डे' की कल्पना के आधार पर, आज से सहस्रों वर्ष पूर्व भारतीय मनीषियों ने अपनी अन्तर्मुखी सूक्ष्म प्रज्ञा-शक्ति द्वारा गहन पर्यवेक्षण करके यह निष्कर्ष निकाला था कि प्रत्येक वस्तु की रचना का मूलाधार सूक्ष्म 'परमाणु' हैं तथा असंख्यों परमाणुओं के समाहार-स्वरूप निर्मित मानव-शरीर का आकार आकाशीय सौर-जगत् से न केवल मिलता-जुलता ही है, अपितु आकाशचारी ग्रह- नक्षत्रों का मानव-शरीरस्थ सूक्ष्म सौर-जगत् से अन्योन्याश्रय सम्बन्ध भी रहता है और वे उस पर अपनी गतिविधियों का निरन्तर प्रभाव भी डालते रहते हैं। यही कारण है कि आकाशीय ग्रहों की स्थिति के अनुसार पृथ्वीतलवासी मनुष्य के जीवन में अहर्निश विभिन्न प्रकार के परिवर्तन आते रहते हैं। • मनुष्य जिस समय पृथ्वी पर जन्म लेता है, उस समय भचक्र (आकाश-मण्डल) में विभिन्न ग्रहों की जो स्थिति होती है, उसका प्रभाव जातक के जीवन को निरन्तर प्रभावित करता रहता है। जन्म-कुण्डली जातक के जन्म-समय में भचक्रान्तर्गत विभिन्न ग्रहों की स्थिति की ही परिचायक होती है। यदि उसका गहन अध्ययन किया जाय तो जातक के जीवन में क्षण-क्षण पर घटने वाली सभी घटनाओं का सम्यक् ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। • कहावत है—'अदृष्ट का लेख कोई नहीं पढ़ पाता'—परन्तु जिस प्रकार दीपक के प्रकाश में तमसावृत वस्तुओं का स्वरूप दृष्टिगोचर हो उठता है, उसी प्रकार ज्योतिर्विज्ञान-रूपी दीपक का उजाला भी अदृष्टलेख-रूपी तिमिरावरण को चीर कर भूत, भविष्य एवं वर्तमानकाल में घटने वाली घटनाओं को उजागर कर देता है—इसमें कोई संदेह नहीं। • ज्योतिष-शास्त्र के विभिन्न अंगों में 'गणित' तथा 'फलित' का स्थान मुख्य है। फलित-ज्योतिष द्वारा मानव-जीवन पर पड़ने वाले आकाशीय ग्रहों की गति- विधियों के प्रभाव का विश्लेषण किया जाता है। सहस्रों वर्षों के अनुभवों तथा अन्वेषणों के आधार पर यह विद्या अब एक सुनिश्चित विज्ञान का स्वरूप ग्रहण कर चुकी है तथा प्राणिमात्र के लिए परम उपयोगी भी सिद्ध हुई है। • "जन्मकुण्डली के किस भाव में स्थित कौन-सा ग्रह जातक के जीवन पर क्या प्रभाव डालता है"—प्रस्तुत ग्रंथ में इसी विषय का संक्षिप्त विश्लेषण प्रस्तुत
१० किया गया है। ग्रहों के पारस्परिक सम्बन्ध, युति, अंश, उच्च-नीचादि स्थिति बादि अनेक ज्ञातव्य विषयों का विवरण भी इसमें संकलित है। फलित-ज्योतिष सम्बन्धी अन्य विषयों को भी स्थान देकर, इसे सर्वसाधारण के लिए अधिका- धिक उपयोगी बनाने का प्रयत्न भी किया गया है। परन्तु, इस एक ही ग्रंथ द्वारा ज्योतिष-विद्या से सर्वथा अपरिचित सामान्य व्यक्ति भी पर्याप्त लाभ उठा सकते हैं तथा किसी भी स्त्री-पुरुष की जन्मकुण्डली के ग्रहों का फलादेश ज्ञात कर सकते हैं। विषय-वस्तु को अधिकाधिक बोधगम्य बनाने की भी भरसक चेष्टा की गई है। अपने प्रयत्न में हम कहाँ तक सफल हुए हैं, इसे विज्ञ पाठक- गण स्वयं ही अनुभव कर सकेंगे। • आज से लगभग ५ वर्ष पूर्व भी हमने एक ऐसे ही ग्रंथ की रचना की थी, जिसे पाठकों का स्नेह प्राप्त हुआ था। प्रस्तुत ग्रंथ उसी परिपाटी में, अधिक बोधगम्य तथा सुगठित रूप में प्रस्तुत किया गया है। आशा है इसे भी पाठकों का स्नेह मिलेगा। ग्रंथ के प्रणयन में हमें जिन सूत्रों से सहायता मिली है, उन सबके प्रति हम हृदय से आभारी हैं। • मानव-कृति दोष-विहीन नहीं होती, अतः विज्ञ सुधीजनों ने निवेदन है कि वे इस ग्रंथ की त्रुटियों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करने की कृपा करें, ताकि इसके आगामी संस्करण में उनका निराकरण किया जा सके। कृष्णपुरी, मथुरा रामनवमी : सं० २०३२ वि० } —राजेश दीक्षित
विषय-सूची प्रथम खण्ड [आवश्यक ज्ञातव्य] क्र० सं० पृष्ठ-संख्या १. ग्रह-शान्ति के उपाय १८ २. प्रारम्भिक जानकारी १६ ३. तिथि अथवा मिति १६ ४. तिथियों के स्वामी २० ५. नक्षत्र २० ६. नक्षत्रों के स्वामी २१ ७. नक्षत्रों के चरणाक्षर २२ ८. वार २२ ६. राशि २३ १०. राशि के चरणाक्षर २४ ११. ग्रह—स्वभाव और प्रभाव २५ १२. राशि—स्वभाव और प्रभाव २७ १३. राशियों के स्वामी २६ १४. राशिशबोधक चक्र ३० १५. ग्रहों का राशि-भोग-काल ३० १६. ग्रहों की वक्री तथा अतिचारी गति ३१ १७. ग्रहों की नैसर्गिक मैत्री ३१ १८. ग्रहों के अंग ३२ १६. जन्मकुण्डली के द्वादश भाव ३३ २०. भावों की त्रिकोण, केन्द्रादि संज्ञा ३६ २१. मूल त्रिकोण ३७ २२. ग्रहों की उच्च स्थिति ३६ २३. ग्रहों की नीच स्थिति ४० २४. ग्रहों का बलाबल ४० २५. ग्रहों के पद ४२ २६. ग्रहों के ६ प्रकार के बल ४२ २७. ग्रहों की दृष्टि ४५ २८. उच्चराशिस्थ ग्रहों का फलादेश ५१ २६. मूल त्रिकोणस्थ ग्रहों का फलादेश ५३ ३०. स्वक्षेत्रस्थ ग्रहों का फलादेश ५६ ३१. मित्रक्षेत्रस्थ ग्रहों का फलादेश ५८ ३२. शत्रुक्षेत्रस्थ ग्रहों का फलादेश ६१ क्र० सं० पृष्ठ संख्या ३३. नीचराशिस्थ ग्रहों का फलादेश ६३ ३४. ग्रहों का दृष्टि-सम्बन्ध और स्थान-सम्बन्ध ६६ ३५. ग्रहों का जातक के जीवन पर प्रभाव ६७ ३६. लग्न और राशि ६७ ३७. स्थानाधिपति ७१ ३८. स्थानाधिपतियों के नाम ७१ ३६. विशिष्ट ज्ञातव्य विषय ७२ ४०. दैनिक ग्रहगोचर का प्रभाव ७६ ४१. सम्मिलित परिवार का फलादेश ७६ ४२. गलत जन्म-कुण्डली का संशोधन ७७ द्वितीय खण्ड [फलादेश] १. विभिन्न लग्नों वाली जन्म-कुण्डलियों का फलादेश जानने की विधि ८० 'मेष लग्न' २. 'मेष' लग्न का फलादेश ८२ ३. 'सूर्य' का फलादेश ८३ ४. 'चन्द्रमा' का फलादेश ८३ ५. 'मंगल' का फलादेश ८४ ६. 'बुध' का फलादेश ८४ ७. 'गुरु' का फलादेश ८५ ८. 'शुक्र' का फलादेश ८६ ६. 'शनि' का फलादेश ८६ १०. 'राहु' का फलादेश ८७ ११. 'केतु' का फलादेश ८७ १२. 'सूर्य' ८८ १३. 'चन्द्रमा' ६२ १४. 'मंगल' ६६ १५. 'बुध' १०० १६. 'गुरु' १०४ १७. 'शुक्र' १०८ १८. 'शनि' ११२ १६. 'राहु' ११६ २०. 'केतु' ११९
'वृष' लग्न 'कर्क' लग्न क्रमांक पृष्ठ-संख्या क्रमांक पृष्ठ-संख्या २१. 'वृष' लग्न का फलादेश १२३ ५९. 'कर्क' लग्न का फलादेश २०६ २२. 'सूर्य' का फलादेश १२४ ६०. 'सूर्य' का फलादेश २१० २३. 'चन्द्रमा' का फलादेश १२४ ६१. 'चन्द्रमा' का फलादेश २१० २४. 'मंगल' का फलादेश १२५ ६२. 'मंगल' का फलादेश २११ २५. 'बुध' का फलादेश १२५ ६३. 'बुध' का फलादेश २१२ २६. 'गुरु' का फलादेश १२६ ६४. 'गुरु' का फलादेश २१२ २७. 'शुक्र' का फलादेश १२६ ६५. 'शुक्र' का फलादेश २१३ २८. 'शनि' का फलादेश १२७ ६६. 'शनि' का फलादेश २१३ २९. 'राहु' का फलादेश १२८ ६७ 'राहु' का फलादेश २१४ ३०. 'केतु' का फलादेश १२८ ६८. 'केतु' का फलादेश २१५ ३१. 'सूर्य' १२९ ६९. 'सूर्य' २१५ ३२. 'चन्द्रमा' १३३ ७०. 'चन्द्रमा' २१६ ३३. 'मंगल' " ७१ 'मंगल' २२३ ३४. 'बुध' १४१ ७२. 'बुध' २२७ ३५. 'गुरु' १४५ ७३. 'गुरु' २३१ ३६. 'शुक्र' १४९ ७४. 'शुक्र' २३५ ३७ 'शनि' १५३ ७५. 'शनि' २३६ ३८. 'राहु' १५७ ७६. 'राहु' २४३ ३९. 'केतु' १६१ ७७. 'केतु' २४७ 'मिथुन' लग्न 'सिंह' लग्न ४०. 'मिथुन' लग्न का फलादेश १६६ ७८. 'सिंह' लग्न का फलादेश २५२ ४१. 'सूर्य' का फलादेश १६७ ७९. 'सूर्य' का फलादेश २५३ ४२. 'चन्द्रमा' का फलादेश १६७ ८०. 'चन्द्रमा' का फलादेश २५३ ४३. 'मंगल' का फलादेश १६८ ८१. 'मंगल' का फलादेश २५४ ४४. 'बुध' का फलादेश १६९ ८२. 'बुध' का फलादेश २५५ ४५. 'गुरु' का फलादेश १६९ ८३. 'गुरु' का फलादेश २५५ ४६. 'शुक्र' का फलादेश १७० ८४. 'शुक्र' का फलादेश २५६ ४७. 'शनि' का फलादेश १७० ८५. 'शनि' का फलादेश २५६ ४८. 'राहु' का फलादेश १७१ ८६. 'राहु' का फलादेश २५६ ४९. 'केतु' का फलादेश १७२ ८७. 'केतु' का फलादेश २५८ ५०. 'सूर्य' १७२ ८८. 'सूर्य' २५८ ५१. 'चन्द्रमा' १७६ ८९. 'चन्द्रमा' २६२ ५२. 'मंगल' १८० ९०. 'मंगल' २६६ ५३. 'बुध' १८४ ९१. 'बुध' २७० ५४. 'गुरु' १८८ ९२. 'गुरु' २७४ ५५. 'शुक्र' १९२ ९३. 'शुक्र' २७८ ५६. 'शनि' १९६ ९४. 'शनि' २८२ ५७. 'राहु' २०० ९५. 'राहु' २८६ ५८. 'केतु' २०४ ९६. 'केतु' २९०
'कन्या' लग्न | क्रमांक पृ०सं० क्रमांक पृ०सं० | १३३. 'राहु' ३७० ९७. 'कन्या' लग्न का फलादेश २६४ | १३४. 'केतु' ३७४ ९८. 'सूर्य' का फलादेश २६५ | वृश्चिक लग्न ९९. 'चन्द्रमा' का फलादेश २६५ | १३५. 'वृश्चिक' लग्न का फलादेश ३७८ १००. 'मंगल' का फलादेश २६६ | १३६. 'सूर्य' का फलादेश ३७९ १०१. 'बुध' का फलादेश २६७ | १३७. 'चन्द्रमा' का फलादेश ३८० १०२. 'गुरु' का फलादेश २६७ | १३८. 'मंगल' का फलादेश ३८० १०३. 'शुक्र' का फलादेश २६८ | १३९. 'बुध' का फलादेश ३८१ १०४. 'शनि' का फलादेश २६८ | १४०. 'गुरु' का फलादेश ३८१ १०५. 'राहु' का फलादेश २६९ | १४१. 'शुक्र' का फलादेश ३८२ १०६. 'केतु' का फलादेश ३०० | १४२. 'शनि' का फलादेश ३८२ १०७. 'सूर्य' ३०० | १४३. 'राहु' का फलादेश ३८३ १०८. 'चन्द्रमा' ३०४ | १४४. 'केतु' का फलादेश ३८४ १०९. 'मंगल' ३०८ | १४५. 'सूर्य' ३८४ ११०. 'बुध' ३१२ | १४६ 'चन्द्रमा' ३८८ १११. 'गुरु' ३१६ | १४७. 'मंगल' ३९२ ११२. 'शुक्र' ३२० | १४८. 'बुध' ३९६ ११३. 'शनि' ३२४ | १४९. 'गुरु' ४०० ११४. 'राहु' ३२८ | १५०. 'शुक्र' ४०४ ११५. 'केतु' ३३२ | १५१. 'शनि' ४०८ | १५२. 'राहु' ४१२ | १५३. 'केतु' ४१६ तुला लग्न | 'धनु' लग्न ११६. 'तुला' लग्न का फलादेश ३३६ | १५४. 'धनु' लग्न का फलादेश ४२१ ११७. 'सूर्य' का फलादेश ३३७ | १५५. 'सूर्य' का फलादेश ४२२ ११८. 'चन्द्रमा' का फलादेश ३३७ | १५६. 'चन्द्रमा' का फलादेश ४२२ ११९. 'मंगल' का फलादेश ३३८ | १५७. 'मंगल' का फलादेश ४२३ १२०. 'बुध' का फलादेश ३३८ | १५८. 'बुध' का फलादेश ४२४ १२१. 'गुरु' का फलादेश ३३९ | १५९. 'गुरु' का फलादेश ४२४ १२२. 'शुक्र' का फलादेश ३४० | १६०. 'शुक्र' का फलादेश ४२५ १२३. 'शनि' का फलादेश ३४० | १६१. 'शनि' का फलादेश ४२५ १२४. 'राहु' का फलादेश ३४१ | १६२. 'राहु' का फलादेश ४२६ १२५. 'केतु' का फलादेश ३४१ | १६३. 'केतु' का फलादेश ४२७ १२६ 'सूर्य' ३४२ | १६४. 'सूर्य' ४२७ १२७. 'चन्द्रमा' ३४६ | १६५. 'चन्द्रमा' ४३१ १२८. 'मंगल' ३५० | १६६. 'मंगल' ४३५ १२९. 'बुध' ३५४ | १६७. 'बुध' ४३६ १३०. 'गुरु' ३५८ | १६८. 'गुरु' ४४३ १३१. 'शुक्र' ३६२ | १३२. 'शनि' ३६६ |
क्रमांक पृ०स० क्रमांक पृ०स० १६९. 'शुक्र' ४४७ २०६. 'गुरु' ५२७ १७०. 'शनि' ४५१ २०७. 'शुक्र' ५३१ १७१. 'राहु' ४५५ २०८. 'शनि' ५३५ १७२. 'केतु' ४५६ २०९. 'राहु' ५३६ २१०. 'केतु' ५४३ मकर लग्न 'मीन' लग्न १७३. 'मकर' लग्न का फलादेश ४६३ १७४. 'सूर्य' का फलादेश ४६४ २११. 'मीन' लग्न का फलादेश ५४८ १७५. 'चन्द्रमा' का फलादेश ४६४ २१२. 'सूर्य' का फलादेश ५४९ १७६. 'मंगल' का फलादेश ४६५ २१३. 'चन्द्रमा' का फलादेश ५४९ १७७. 'बुध' का फलादेश ४६६ २१४. 'मंगल' का फलादेश ५५० १७८. गुरु का फलादेश ४६६ २१५. 'बुध' का फलादेश
हम भारतवासी उन ऋषियों, मुनियों तथा आचार्यों के चिर-ऋणी हैं, जिन्होंने अपने तप, त्याग से दीर्घायु प्राप्त करके सैकड़ों वर्षों से शोध- स्वरूप ऐसे ग्रन्थों की रचना की जिन्हें आज तक विश्व का कोई भी मानव (वैज्ञानिक) असत्य सिद्ध नहीं कर पाया।
गाँवों तथा नगरों से दूर, घोर जंगलों के मध्य, तपश्चर्या में लीन, साधु- महात्माओं के आगे वन्य हिंसक जन्तु भी नत हो जाते हैं, उन्हीं ने आत्मिक प्रेरणास्वरूप सर्वजन - हिताय ऐसे महाग्रन्थों की रचना की है।
हस्तलिखित, असली, प्राचीन भृगुसंहिता फलित प्रकाश [कुण्डली चक्र:] वृष २ | मेष १ | मीन १२ मिथुन ३ | कर्क ४ | मकर १० | कुंभ ११ सिंह ५ | कन्या ६ | तुला ७ | वृश्चिक ८ | धनु ९ 1 प्रथम खण्ड [ आवश्यक ज्ञातव्य ]
ग्रह-शान्ति के उपाय यदि कोई ग्रह किसी जातक के लिए अशुभ हो तो उसकी शान्ति के लिए निम्नलिखित वस्तुओं का दान करके, उस ग्रह के मन्त्र का जप करना चाहिए— (१) सूर्य—माणिक्य, तांबा, लाल चन्दन, लाल वस्त्र, गेहूँ, गुड़, लाल कमल, गाय। (२) चन्द्र—मोती, चाँदी, कपूर, श्वेतवस्त्र, चावलों से भरी बांस की पिटारी, जल- पूर्ण घट, गाय, शंख। (३) मंगल—प्रवाल, लाल रंग का वस्त्र, स्वर्ण, लाल रंग का बैल, मसूर, ताँबा, गेहूँ तथा कनेर के फूल। (४) बुध—पन्ना, स्वर्ण, घृत, पीतवस्त्र, नीलवस्त्र, कांसी, मूंगा, हाथी दाँत। (५) गुरु—पुखराज, स्वर्ण, पीतवस्त्र, हल्दी, पीले रंग का अन्न, नमक, घोड़ा। (६) शुक्र—हीरा, स्वर्ण, चित्र-विचित्र रंग का वस्त्र, चावल, गाय, घृत, सुगन्धित वस्तुएँ तथा श्वेत रंग का घोड़ा। (७) शनि—नीलम, लोहा, काले तिल, बैल, कृष्णवस्त्र, स्वर्ण, नीले रंग का कम्बल, काले रंग की गाय, उड़द तथा भैंस। (८) राहु—गोमेद, स्वर्ण, कृष्णवस्त्र, कम्बल, तलवार, तिल का तेल तथा घोड़ा। (९) केतु—वैदूर्य, कस्तूरी, स्वर्ण, कम्बल, तिल का तेल, शस्त्र तथा बकरा।
प्रारंभिक जानकारी जन्मकुण्डलीस्थ ग्रहों का फलादेश जानने से पूर्व ज्योतिष-विषयक प्रारम्भिक जानकारी, यथा—तिथि, वार, नक्षत्र, राशि, ग्रहों का पारस्परिक सम्बन्ध आदि का ज्ञान होना अत्यावश्यक है। अस्तु, इस प्रथम-खण्ड में उन्ही सब प्रारम्भिक, परन्तु अत्यावश्यक ज्ञातव्य विषयों का उल्लेख किया जा रहा है, जिन्हें जाने बिना ज्योतिष विद्या के क्षेत्र में प्रवेश ही नहीं मिल सकता। तिथि अथवा मितौ भारतीय ज्योतिष में चन्द्रमा की एक 'कला' को 'तिथि' कहते हैं। सामान्य बोलचाल की भाषा में तिथि को ही 'मिती' के नाम से पुकारा जाता है। विक्रम-सम्वत्सर का प्रारम्भ चैत्र शुक्ला प्रतिपदा से होता है तथा अन्त चैत्र कृष्णपक्ष की अमावस्या को होता है। जिस रात्रि में चन्द्रमा बिल्कुल दिखाई नहीं देता, वह तिथि कृष्णपक्ष की 'अमावस्या' कही जाती है। कृष्णपक्ष की अमावस्या के दूसरे दिन से शुक्लपक्ष की प्रतिपदा आरम्भ होती है। जिन पन्द्रह दिनों में चन्द्रमा प्रतिदिन आकाश में थोड़ा-थोड़ा बढ़ना आरंभ होता है तथा पन्द्रहवें दिन अपने पूर्णरूप में दिखाई देता है, उसे 'शुक्लपक्ष' कहते हैं तथा बाद के जिन पन्द्रह दिनों में चन्द्रमा आकाश में प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा करके घटने लगता है तथा पन्द्रवें दिन बिल्कुल दिखाई नहीं देता, उसे 'कृष्णपक्ष' कहते हैं। इस प्रकार प्रत्येक महीने में पन्द्रह-पन्द्रह दिन के दो पक्ष हुआ करते हैं—(१) शुक्ल- पक्ष और (२) कृष्णपक्ष। पक्ष को आम बोलचाल की भाषा में 'पखवाड़ा' कहा जाता है। यद्यपि नवीन संवत्सर का प्रारम्भ चैत्र मास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से होता है, परन्तु प्रत्येक मास (महीने) का प्रारम्भ कृष्णपक्ष से ही माना जाता है अर्थात् प्रत्येक महीने का पहला आधा भाग कृष्णपक्ष का और दूसरा आधा भाग शुक्लपक्ष का होता है।
२० शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से जो पन्द्रह दिन की पन्द्रह तिथियाँ होती हैं, उन्हें क्रमशः (१) प्रतिपदा, (२) द्वितीया, (३) तृतीया, (४) चतुर्थी, (५) पंचमी, (६) षष्ठी, (७) सप्तमी, (८) अष्टमी, (६) नवमी, (१०) दशमी, (११) एकादशी, (१२) द्वादशी, (१३) त्रयोदशी, (१४) चतुर्दशी, तथा (१५) पूर्णिमा के नाम से अभिहित किया जाता है। इसके बाद कृष्णपक्ष की तिथियों को भी प्रतिपदा से चतुर्दशी तक इन्हीं नामों से पुकारा जाता है परन्तु कृष्णपक्ष की अन्तिम अर्थात् पन्द्रहवीं तिथि को 'अमावस्या' कहा जाता है। दोनों पक्षों की प्रतिपदा से चतुर्दशी तक की तिथियों को क्रमशः १, २, ३, ४ आदि अंकों में लिखा जाता है, परन्तु पूर्णिमा को १५ तथा अमावस्या तिथि को ३०, अंक के रूप में लिखा जाता है।
तिथियों के स्वामी
विभिन्न देवताओं को विभिन्न तिथियों का स्वामी माना गया है। किस तिथि का स्वामी कौन-सा देवता होता है, इसे नीचे बताया गया है। जिस तिथि के स्वामी का जैसा स्वभाव है, वही स्वभाव उस तिथि का तथा उस तिथि में जन्म लेने वाले व्यक्ति का भी समझना चाहिए—
| तिथि | स्वामी | तिथि | स्वामी |
|---|---|---|---|
| प्रतिपदा | अग्नि | नवमी | दुर्गा |
| द्वितीया | ब्रह्मा | दशमी | काल |
| तृतीया | गौरी | एकादशी | विश्वेदेवा |
| चतुर्थी | गणेश | द्वादशी | विष्णु |
| पंचमी | शेषनाग | त्रयोदशी | कामदेव |
| षष्ठी | कार्तिकेय | चतुर्दशी | शिव |
| सप्तमी | सूर्य | पूर्णिमा | चन्द्रमा |
| अष्टमी | शिव | अमावस्या | पितर |
नक्षत्र
ज्योतिषियों ने सम्पूर्ण आकाश-मण्डल को २७ भागों में विभक्त कर, प्रत्येक भाग को एक-एक 'नक्षत्र' की संज्ञा दी है। अर्थात् जिस प्रकार पृथ्वी पर स्थान की दूरी को किलोमीटर आदि में नापा जाता है, उसी प्रकार आकाश में एक स्थान से दूसरे स्थान की दूरी को नक्षत्रों के माध्यम से नापा जाता है। जिस प्रकार पृथ्वी पर नापने की दूरी में किलोमीटर के अन्तर्गत मीटर, सेण्टीमीटर आदि होते हैं, उसी प्रकार प्रत्येक नक्षत्र को भी ४ चरण तथा ६० अंशों में विभाजित किया गया है। नक्षत्रों के 'अंश' को 'घटी' नाम से भी सम्बोधित किया जाता है।
२१ नक्षत्रों के नाम क्रमशः निम्नानुसार हैं— | १ अश्विनी | ८ पुष्य | १५ स्वाति | २२ श्रवण | | २ भरणी | ९ अश्लेषा | १६ विशाखा | २३ धनिष्ठा | | ३ कृत्तिका | १० मघा | १७ अनुराधा | २४ शतभिषा | | ४ रोहिणी | ११ पूर्वाफाल्गुनी | १८ ज्येष्ठा | २५ पूर्वाभाद्रपद | | ५ मृगशिरा | १२ उत्तराफाल्गुनी | १९ मूल | २६ उत्तराभाद्रपद | | ६ आर्द्रा | १३ हस्त | २० पूर्वाषाढ़ा | २७ रेवती | | ७ पुनर्वसु | १४ चित्रा | २१ उत्तराषाढ़ा | | उत्तराषाढ़ा की अन्तिम १५ घटी तथा श्रवण नक्षत्र की पहली ४ घड़ी— इस प्रकार कुल १९ घड़ी का एक नक्षत्र 'अभिजित्' भी माना जाता है। 'अभिजित्' सहित नक्षत्रों की कुल संख्या २८ हो जाती है। २८ नक्षत्रों के क्रम में अभिजित २२वाँ नक्षत्र माना जाता है उसके बाद श्रवण से रेवती पर्यन्त क्रमशः २३ से २८ तक की संख्या वाले नक्षत्र माने जाते हैं। नक्षत्रों के स्वामी पूर्वोक्त २८ नक्षत्रों के स्वामी २८ विभिन्न देवता माने गये हैं। जिस देवता का जो स्वभाव है, उसी के अनुरूप नक्षत्र तथा उस नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक का स्वभाव भी माना जाता है। विभिन्न नक्षत्रों के स्वामी निम्नानुसार हैं—
| नक्षत्र | स्वामी | नक्षत्र | स्वामी |
|---|---|---|---|
| १ अश्विनी | अश्विनीकुमार | १५ स्वाति | पवन |
| २ भरणी | काल | १६ विशाखा | शक्राग्नि |
| ३ कृत्तिका | अग्नि | १७ अनुराधा | मित्र |
| ४ रोहिणी | ब्रह्मा | १८ ज्येष्ठा | इन्द्र |
| ५ मृगशिरा | चन्द्रमा | १९ मूल | निर्ऋति |
| ६ आर्द्रा | रुद्र | २० पूर्वाषाढ़ा | जल |
| ७ पुनर्वसु | अदिति | २१ उत्तराषाढ़ा | विश्वेदेवा |
| ८ पुष्य | बृहस्पति | २२ अभिजित् | ब्रह्मा |
| ९ अश्लेषा | सर्प | २३ श्रवण | विष्णु |
| १० मघा | पितर | २४ धनिष्ठा | वसु |
| ११ पूर्वाफाल्गुनी | भग | २५ शतभिषा | वरुण |
| १२ उत्तराफाल्गुनी | अर्यमा | २६ पूर्वाभाद्रपद | अजैकपाद |
| १३ हस्त | सूर्य | २७ उत्तराभाद्रपद | अहिर्बुध्न्य |
| १४ चित्रा | विश्वकर्मा | २८ रेवती | पूषा |
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नक्षत्रों के चरणाक्षर
ऊपर बताया जा चुका है कि प्रत्येक नक्षत्र को ४ चरण तथा ६० अंशों में विभाजित किया गया है। ज्योतिषियों के प्रत्येक नक्षत्र के प्रत्येक चरण का एक-एक 'अक्षर' भी निर्धारित किया है। जिस नक्षत्र के जिस चरण के लिए जो अक्षर निश्चित है, उसका उल्लेख नीचे किया गया है। जो मनुष्य जिस नक्षत्र के जिस चरण के भोग-काल में जन्म लेता है, उसका नाम उसी चरणाक्षर के आधार पर रखा जाता है। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति का जन्म अश्विनी नक्षत्र के तीसरे चरण में हुआ हो तो उसका नाम का आदि अक्षर 'चो' होगा और उसी के आधार पर उसका नाम 'चोवसिंह', 'चोइथराम' आदि रखा जाएगा। किस नक्षत्र के किस चरण के लिए कौनसा अक्षर नियत है, इसे निम्नानुसार समझ लें।
| नक्षत्र नाम | चरणाक्षर: प्रथम | चरणाक्षर: द्वितीय | चरणाक्षर: तृतीय | चरणाक्षर: चतुर्थ | नक्षत्र नाम | चरणाक्षर: प्रथम | चरणाक्षर: द्वितीय | चरणाक्षर: तृतीय | चरणाक्षर: चतुर्थ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १. अश्विनी | चू | चे | चो | ला | १५. स्वाति | रू | रे | रो | ता |
| २. भरणी | ली | लू | ले | लो | १६. विशाखा | ती | तू | ते | तो |
| ३. कृत्तिका | आ | ई | उ | ए | १७. अनुराधा | ना | नी | नू | ने |
| ४. रोहिणी | ओ | वा | वी | वू | १८. ज्येष्ठा | नो | या | यी | यू |
| ५. मृगशिरा | वे | वो | का | की | १९. मूल | ये | यो | भा | भी |
| ६. आर्द्रा | कु | घ | ङ | छ | २०. पूर्वाषाढ़ा | भू | धा | फा | ढा |
| ७. पुनर्वसु | के | को | हा | ही | २१. उत्तराषाढ़ा | भे | भो | जा | जी |
| ८. पुष्य | हू | हे | हो | डा | २२. अभिजित् | जू | जे | जो | खा |
| ९. अश्लेषा | डी | डू | डे | डो | २३. श्रवण | खी | खू | खे | खो |
| १०. मघा | मा | मी | मू | मे | २४. धनिष्ठा | गा | गी | गू | गे |
| ११. पू. फाल्गुनी | मो | टा | टी | टू | २५. शतभिषा | गो | सा | सी | सू |
| १२. उ. फाल्गुनी | टे | टो | पा | पी | २६. पू. भाद्रपद | से | सो | दा | दी |
| १३. हस्त | पू | ष | ण | ठ | २७. उ. भाद्रपद | दू | थ | झ | ञ |
| १४. चित्रा | पे | पो | रा | री | २८. रेवती | दे | दो | चा | ची |
वार
भारतीय ज्योतिष के अनुसार आकाश-मण्डल में मुख्य ग्रहों की संख्या ७ है। वे ग्रह हैं—(१) शनि, (२) बृहस्पति, (३) मंगल, (४) रवि, (५) शुक्र, (६) बुध और (७) चन्द्रमा। इन ग्रहों की अवस्थिति क्रमशः एक दूसरे से नीचे है। अर्थात् शनि की कक्षा सबसे ऊपर तथा चन्द्रमा की कक्षा सबसे नीचे है। एक दिन-रात २४ घंटे का होता है। ज्योतिष में एक घंटे के समय के लिए 'होरा' शब्द प्रचलित है। यह 'होरा' शब्द 'अहोरात्र' शब्द का संक्षिप्त रूप है अर्थात्
२३ 'अहोरात्र' शब्द में से 'अहो' का अन्तिम अक्षर 'हो' तथा 'रात्र' का यादि अक्षर 'रा' लेकर 'होरा' शब्द का निर्माण हुआ है। इस तरह 'होरा' शब्द को घण्टे का पर्याय- वाची भी कहा जा सकता है। सृष्टि के प्रारंभ में सर्वप्रथम सूर्य दिखाई दिया, अतः पहली 'होरा' का स्वामी 'सूर्य' को माना गया तथा सृष्टि के पहले दिन का नामकरण किया गया—'रविवार' अर्थात् सूर्यवार। तत्पश्चात् अगली प्रत्येक होरा पर अन्य एक-एक ग्रह का अधिकार माना गया। फलतः एक दूसरे के समीपी क्रम में दूसरी होरा का स्वामी शुक्र, तीसरी का बुध, चौथी का चन्द्रमा, पाँचवीं का शनि, छठी का वृहस्पति तथा सातवीं का मंगल हुआ । इसी क्रम के पुनरावर्त्तन के फलस्वरूप पहले दिन की चौबीसवीं अर्थात् अन्तिम होरा बुध के स्वामित्व पर समाप्त हुई, तब दूसरे दिन की पहली होरा का स्वामी चन्द्रमा हुआ, अतः उस दिन का नाम रखा गया—सोमवार अर्थात् चन्द्रवार। इसी क्रमानुसार तीसरे दिन की पहली होरा का स्वामी 'मंगल', चौथे दिन का बुध, पाँचवें दिन का वृहस्पति, छठे दिन का शुक्र तथा सातवें दिन की पहली होरा का स्वामी शनि हुआ। फलतः सृष्टि के पहले वारों का क्रम हुआ—(१) रविवार, (२) सोमवार, (३) मंगलवार, (४) बुधवार, (५) गुरुवार, (६) शुक्रवार और (७) शनिवार । आठवें दिन फिर पहली होरा का स्वामी सूर्य हुआ । इसी क्रम से अगले दिनों की पहली होरा के स्वामी पूर्ववत् ग्रह होते चले आ रहे हैं। अस्तु उन सात वारों का चक्र निरन्तर चल रहा है। सात दिनों के इस समूह को ही 'सप्ताह' कहा जाता है। प्रत्येक वार का स्वामी उसी का अधिपति ग्रह होता है। गुरु, सोम, बुध तथा शुक्र—इन चार वारों को 'सौम्य' तथा मंगल, रवि एवं शनि—इन तीन वारों को 'क्रूर' संज्ञक माना गया है। जिस वार के स्वामी का जैसा स्वभाव है, वही स्वभाव उस वार का तथा उस वार में जन्म लेने वाले जातक का भी माना जाता है। राशि जिस प्रकार सम्पूर्ण खमण्डल को २७ या २८ नक्षत्रों में बांटा गया है, उसी प्रकार उसे १२ राशि, १०८ भाग यथा ३६० अंशों में भी बाँटा गया है। बारह राशियों के नाम इस प्रकार हैं— १- मेष ४- कर्क ७- तुला १०. मकर २- वृष ५- सिंह ८- वृश्चिक ११- कुम्भ ३- मिथुन ६- कन्या ९. धनु १२- मीन अस्तु, खमण्डल अर्थात् भ-चक्र के ३० अंश अथवा ९ भागों की एक राशि होती है। पहले बताया जा चुका है कि एक-एक नक्षत्र को चार-चार भागों में बाँटा
२४ गया है और प्रत्येक भाग के लिए एक-एक चरणाक्षर भी निश्चित किया गया है अस्तु २७ नक्षत्रों के कुल १०८ भाग अर्थात् 'चरण' हुए और एक राशि के अन्तर्गत आये ९ भाग अर्थात् नक्षत्रों के ९ चरण । इस प्रकार सवा दो नक्षत्रों की हुई एक राशि । किस राशि के अन्तर्गत कौन-कौन सा नक्षत्र समाहित है, इसे नक्षत्रों के चरणाक्षरों के आधार पर निम्नानुसार समझ लेना चाहिए—
| राशि का नाम | राशि के चरणाक्षर | |||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १. मेष | चू | चे | चो | ला | ली | लू | ले | लो |
| २. वृष | ई | ऊ | ए | ओ | वा | वी | वू | वे |
| ३. मिथुन | का | की | कू | घ | ङ | छ | के | को |
| ४. कर्क | ही | हू | हे | हो | डा | डी | डू | डे |
| ५. सिंह | मा | मी | मू | मे | मो | टा | टी | टू |
| ६. कन्या | टो | पा | पी | पू | ष | ण | ठ | पे |
| ७. तुला | रा | री | रू | रे | रो | ता | ती | तू |
| ८. वृश्चिक | तो | ना | नी | नू | ने | नो | या | यी |
| ९. धनु | ये | यो | भा | भी | भू | धा | फा | ढा |
| १०. मकर | भो | जा | जी | खी | खू | खे | खो | गा |
| ११. कुम्भ | गू | गे | गो | सा | सी | सू | से | सो |
| १२. मीन | दी | दू | थ | झ | ञ | दे | दो | चा |
| टिप्पणी—'अभिजित्' नक्षत्र के चारों चरणों—जू, जे, जो, खा—की गणना | ||||||||
| 'मकर' राशि के अन्तर्गत की जाती है। |
२५ ग्रह : उनका स्वभाव और प्रभाव आकाशमण्डलस्थ असंख्य ज्योतिष्पिण्डों में से जो पिण्ड पृथ्वी स्थित सभी जड़- चेतन पदार्थों को अपने प्रभाव से प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं, उनकी गणना ग्रहों में की जाती है। प्राचीन भारतीय-ज्योतिष में ऐसे ग्रहों की कुल संख्या ७ बताई गई है। वे हैं—१. सूर्य, २. चन्द्र, ३. मंगल, ४. बुध, ५. बृहस्पति, ६. शुक्र और ७. शनि। परवर्ती ज्योतिषियों ने अपने अनुसन्धानों के बल पर यह सिद्ध किया कि भूमण्डल की दोनों ओर पड़ने वाली छाया भी ग्रहों जैसी ही प्रभावशालिनी है, अतः उन्होंने 'राहु', 'केतु' नामक दो अन्य छायाग्रहों की कल्पना करके ग्रहों की कुल संख्या ९ कर दी। आधुनिक काल के पाश्चात्य ज्योतिषियों ने आकाशमण्डल में ३ अन्य ग्रहों की भी खोज की है। वे हैं—(१) हर्षल, (२) नेपच्यून और (३) प्लूटो। ये सभी ग्रह पूर्वोक्त ७ ग्रहों से भी अत्यधिक ऊँचाई पर स्थित हैं। इस प्रकार कुल ग्रहों की संख्या १२ हो जाती है। परन्तु भारतीय-ज्योतिष में अभी तक पाश्चात्य ज्योतिषों द्वारा नवीन-आविष्कृत तीन ग्रहों को स्थान नहीं दिया गया है। अतः उसमें छायाग्रह राहु-केतु सहित केवल ९ ग्रहों का ही उल्लेख मिलता है। चन्द्र, बृहस्पति तथा शुक्र इन तीन ग्रहों को शुभ ग्रह माना जाता है। बुध को नपुंसक ग्रह माना गया है, यह जिस ग्रह के साथ बैठता है, उस जैसा ही प्रभाव देता है। सूर्य, मंगल तथा शनि क्रूर ग्रह कहे गये हैं। राहु-केतु की गणना भी क्रूर ग्रहों में की जाती है। परन्तु कुछ विद्वानों के मतानुसार 'केतु' को भी शुभ ग्रह माना जाता है। उक्त ९ ग्रहों में कौनसा ग्रह किस स्वभाव, बल तथा प्रभाव वाला है तथा उसके द्वारा किन विषयों का विशेष रूप से विचार करना चाहिए, इसे निम्नानुसार समझ लें— (१) सूर्य—यह ग्रह 'पाप' संज्ञक, पूर्व दिशा का स्वामी, पुरुष जाति, रक्त- वर्ण एवं पित्त प्रकृति का है। स्नायु, मेरुदण्ड, नेत्र, हृदय आदि अवयवों पर इसका विशेष प्रभाव होता है। इसके द्वारा आत्मा आरोग्य, स्वभाव, पिता, राज्य, देवालय, शोक, अपमान, कलह तथा रोग—अतिसार, क्षय, मंदाग्नि, मानसिक रोग, नेत्र विकार आदि के सम्बन्ध में विचार करना चाहिए। यह लग्न से सप्तम स्थान में बली एवं मकर से ६ राशियों तक चेष्टा-बली होता है।