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ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश

Brahmacharyamrit Arthat Jeevan Sandesh

स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: गुरुकुल झज्जर संस्करण · गुरुकुल झज्जर (हरियाणा) (उद्गम)

DevanagariHindipublished26 पृष्ठ

२१ | जीवन सन्देश

सकता। जो मनुष्य अपने मन को वश में कर लेता है, वह संसार के समस्त सुखों का उपभोग करने में समर्थ होता है।

मन की चंचलता को रोकने के लिये प्राणायाम, ईश्वर-प्रार्थना और स्वाध्याय परम आवश्यक साधन हैं। जब मन पवित्र और एकाग्र हो जाता है, तब विषय-वासनाएँ स्वतः ही शान्त हो जाती हैं।

युवकों को चाहिये कि वे गन्दे उपन्यासों, अश्लील चित्रों और सिनेमा के कुप्रभाव से दूर रहें। कुसंगति से सदा बचें, क्योंकि जैसी संगति होगी, वैसा ही रंग चढ़ेगा। शुद्ध, सात्विक और पौष्टिक भोजन करें। अधिक मिर्च-मसाले और उत्तेजक पदार्थों का त्याग करें। रात्रि को शीघ्र सोयें और प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर भ्रमण व व्यायाम करें।

इस प्रकार के नियमबद्ध जीवन से स्वास्थ्य उत्तम रहता है और ब्रह्मचर्य की रक्षा सहज ही हो जाती है।

जीवन सन्देश | २२

ब्रह्मचर्य के बिना किसी भी राष्ट्र की उन्नति सम्भव नहीं है। जिस देश के युवक ब्रह्मचारी, वीर्यवान् और चरित्रवान् होंगे, वही देश संसार में सिरमौर बन सकता है। चरित्र ही मनुष्य का सच्चा धन है। यदि धन नष्ट हो गया तो कुछ नहीं गया, यदि स्वास्थ्य नष्ट हो गया तो कुछ नष्ट हुआ, परन्तु यदि चरित्र नष्ट हो गया तो सब कुछ नष्ट हो गया।

अतः आओ, हम सब मिलकर यह प्रतिज्ञा करें कि हम अपने चरित्र की रक्षा करेंगे, ब्रह्मचर्य का व्रत धारण करेंगे और अपने देश तथा समाज का मस्तक ऊँचा करेंगे।

ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः !


इति शुभम्

महाशय रणधीर सिंह जी का जन्म गान्धरा गाँव जिला रोहतक में सन् १६२६ को महाशय श्री भानी सिंह रिसालदार के यहाँ हुआ। आपके पिता श्री बडे धर्मात्मा व दानी महानुभाव थे। अपनी वीरता के कारण ही आपने सेना में रिसालदार का पद प्राप्त किया। सेना से निवृत्त होकर आए तो आपकी दान की ख्याति सुनकर लोग जिस दिन पेंशन लेने आप जाते उस दिन सैंकड़ों याचक आपके समक्ष उपस्थित होते, आप सारी पेंशन का उनको सामान खरीद कर देते जो शेष बच जाते उनको अगली पेंशन के उधार पर सामान दिलवा देते आप घर पर एक भी पैसा नहीं पहुँचा पाते। घर का खर्चा खेती-बाड़ी में चल जाता। स्वयं महाशय रणधीर जी भी पिताश्री से कम नहीं निकले। घर से दूध बेचने के बहाने ले जाते और रोहतक अस्थल बोहर डेरे में साधु सन्तों को पिलाकर वापिस आ जाते। घर का खर्च आपकी धर्मपत्नी धनकौर देवी जी अपनी कर्मठता से तथा आप भी कृषि से चलाते। आपके चार पुत्र, दो पुत्रियाँ क्रमशः राजवीर, तसवीर, सुखवीर, जगवीर, कृष्णा व दर्शना है। पिछले बीस वर्षों से लगातार दैनिक अग्निहोत्र करते हुए यज्ञमय जीवन इस परिवार का चल रहा है। इस यज्ञ ने इस परिवार को प्रत्येक दिशा में उन्नत किया है। श्री राजवीर जी उपासक के मन में एक भावना सदा रहती थी कि मैं खेतों में घर बनाकर योगियों की तरह जीवन जीऊँ वह इच्छा इनकी पूरी हुई आज घरौटी जिला रोहतक

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में गाँव से दूर नहर के किनारे इनके चवालीस एकड़ भूमि में योगियों के आश्रम सदृश इनका घर है। जिसमें नित्य दोनों समय पूरा परिवार मिलकर ब्रह्मयज्ञ तथा अग्निहोत्र करते हैं। पूर्ण वैदिक जीवन जीते हुए यह परिवार पूर्ण आनन्द को प्राप्त कर रहा है।

पुत्र-पुत्रियाँ भी पिता-पितामह के चरणचिन्हों का अनुसरण करके चल रहे हैं। माता धनकौर देवी जी ने इस पुस्तक के प्रकाशन के लिए एक लाख रुपये सात्विक दान दिया है। इसके लिए इस परिवार को कोटि-कोटि धन्यवाद तथा प्रभु से प्रार्थना है कि इस प्रकार के लाखों करोड़ों परिवार भारत में हों जिससे कि देश धर्म की उन्नति हो सके।

इस पुस्तक को पढ़कर आज की भटकती हुई युवा पीढ़ी अवश्य ही प्रेरणाप्राप्त अपने जीवन को व राष्ट्र समाज की अवश्य ही सुख पहुँचायेगी।

आचार्य बलदेव

आर्य महाविद्यालय गुरुकुल कालवा, जिला जीन्द (हरयाणा)

दूरभाष : 01686-268348

यशवन्त आर्य:

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  1. ब्रह्मचर्यामृत (जीवन सन्देश) — स्वामी ओमानन्द सरस्वती
  2. महर्षि दयानन्द का जीवन चरित्र
  3. सत्यार्थ प्रकाश (सरल व्याख्या)
  4. योग दर्शन एवं स्वास्थ्य रक्षा
  5. संस्कार विधि एवं दैनिक कर्तव्य

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