भारतकोश
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ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त (ब्रह्मगुप्त - शून्य, कुट्टक, बीजगणित एवं सम्पूर्ण २१ अध्याय सान्वय सटीक)

Brahmasphuta Siddhanta of Brahmagupta with Commentary

आचार्य ब्रह्मगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished737 पृष्ठ

( १५६ ) फलं¹ संक्रमणमुभयतो² बहुराशिवधे तुल³वधहृतो ज्ञेयः । सकलेष्वेवं भिन्नेषु भयतच्छेद⁴संक्रमणं ॥ १२ ॥ पंचसप्तनवैकादशराशि⁵ समाप्तानि । प्राग् मूल्यव्यत्यासो भांडप्रतिभांडिकेत्यु¹दुक्तः² । सम³परिकर्मान्यष्टानां⁴ व्यवहाराणामभिहितानि ॥ १३ ॥ कालगुणितं प्रमाणं फलभक्तं व्येकगुणाहतं¹ कालः । स्वफलयुतरूपभक्तं मूलफलैक्यं भवति मूलम् ॥ १४ ॥ कालप्रमाणघातः परकालहृतो द्विधाद्यमिश्रवधात् । अन्यार्द्धकृति²युतात्प³दमन्त्यार्द्धोनं प्रमाणफलम् ॥ १५ ॥

१२. (घ) १. फल for (फलं) २. मुयतो for (मुभयतो)
३. वधेऽल्पवध (ग) वधाऽल्पवधहृतो (कृतो) for (वधेतुलवधहृतो)
४. भन्तेषू (ग) भिन्नेषूभयतच्छेद for (भिन्नेषुभयतच्छेद)
५. राशिकानि for (राशि) (च)
(ग) ५. 'पंच' से 'समाप्तानि' तक पद यहां अंकित नहीं है ।
(च) १. फल संक्रमण for (फलं संक्रमण)
३. तुल्यवधहृतो for (तुलवधहृतो)
१३. (घ) १. भ्यंडप्रतिभ्यंडिके for (भांडप्रतिभांडिके)
२. इत्युक्त (ग) न्युक्तसमम् for (त्युक्तः)
३. समं (ग) for (सम)
४. परिकर्माण्यष्टानां (ग) परिकर्माण्यष्टनां for (परिकर्माण्यष्टानां)
(ग) ४. परिकर्माण्यष्टानां for (परिकर्माण्यष्टानां)
१४. (ग) १. हृतं (च) for (हतं)
१५. (ग) १. मन्त्यार्द्धोनम् for (मन्त्यार्द्धोन)
(च) २. कति for (कृति) ३. पदमन्त्याः द्धोन for (पदमन्त्यार्द्धोन)

( १५७ ) प्रश्नेपयोगहृतया लब्धा प्रक्षेपका गुणा लाभाः । ऊनाधिकोत्तराद्धं स्तद्यु तोनया स्वफलमूनं युतम् ॥ १६ ॥ मिश्रक व्यवहार समाप्तः पदमेकहीनमुत्तरगुणितं संयुक्तमादिनांत्यधनम् । आदि युतान्त्यधनाद्धंमध्यधनं पदगंणं गुणितम् ॥ १७ ॥ उत्तरहीनाद्विगुणादिशेषवर्गं धनोत्तराष्ट्रवधे । प्रशिनप्य पदं शेषोनं द्विगुणोत्तरं हृतं गच्छः ॥ १८ ॥ एकोत्तरमेकाद्यं यदीष्टगच्छ्क्स्य भवति संकलितम् । तद् वियुतं गच्छ गुणितं तृ हूतं संकलितम् ॥ १६ ॥

१६. (घ) १. प्रक्षेपयोगहृतया (ग) (च) for (प्रश्नेपयोगहृतया)
२. लब्ध्वा for (लब्धा) ३. प्रक्षेपका (ग) प्रक्षेपक for (प्रश्नेपका)
४. त्तरास्तद्युतो (ग) (च) for (त्तराद्धंस्तद्युतो)
५. मूनयुतम् (ग) (च) for (मूनंयुतम्)
(ग) 'मिश्रक' से 'समाप्तः' तक अंकित नहीं है ।
(च) २. प्रक्षेपका for (प्रश्नेपका)
६. व्यवहारः for (व्यवहार)
१७. (ग) १. पदगुणं for (पदगंणं) २. गणितम् for (गुणितम्)
१८. (घ) १. उत्तरहीन (ग) (च) for (उत्तरहीना)
२. शेषवर्गं (ग) (च) शेषवग्रं for (शेषवर्गं)
३. प्रक्षिप्य (ग) (च) for (प्रशिनप्य)
४. हृतं (ग) यह पद अंकित नहीं है । for (हृतं)
(ग) ५. द्विगुणोत्तरं for (द्विगुणोत्तर)
(च) ४. हृतं for (हृतं)
१९. (घ) १. यदिष्ट (ग) (च) for (यदीष्ट) २. गच्छस्य (ग) (च) for (गच्छ्क्स्य)
३. हृतं (ग) त्रिहृतं for (तूहूतं)
(ग) ४. एकोत्तमेकाद्यं for (एकोत्तरमेकाद्यं)
५. गच्छ for (गच्छ) ६. संकलितं सकलितम् for (संकलितम्)
(च) ५. वियुतगच्छ for (वियुतगच्छ) ३. त्रिहृतं for (तूहूतं) ।

( १५८ ) द्विगुणपदसैकगुणितं तत्तृहृतं भवति वर्गसंकलितम् । घूनसंकलितं तक्नतिरेषां समगोलकैश्चितयः ॥ २० ॥ श्रेष्ट्रीव्यवहार समाप्तः ॥ स्थूलफलं त्रिचतुर्भुजबाहुप्रतिबाहुयोगदलघातः । भुजयोगार्द्धचतुष्टयभुजो न घातातपदं सुक्ष्मम् ॥ २१ ॥ भुजकृत्यंतरभू हूंतहीनयुताभूर्द्विभाजिता बाधे । स्वाबाधावर्गोनाङ्गू ज्वर्गान्फलमवलंब ॥ २२ ॥ अविषमचतुस्रंभुजगतिभुजवधयोर्युते पदं कर्णः । कर्णाकृतिर्भूमुखयुतिदल व(प)र्गो नापदं लंब ॥ २३ ॥

२०. (घ) १. तत्रिहृतं (ग) तत् त्रिहृत for (तत्तृहृतं)
२. घन (ग) घनसंकलित for (घूनसंकलितं)
३. तत्कृति (ग) for (तक्नति.) ४. श्रेढी व्यवहारः for (श्रेष्ट्री व्यवहार)
(ग) ५. संलितम् for (संकलितम्)
४. वि० 'श्रेष्ट्री' से 'समाप्तः' तक यहाँ अंकित नहीं है ।
(च) १. तत्तृहृतं for (तत्तृहृतं) २. घनसंकलितं for (घूनसंकलितं)
३. तत्कृति for (तक्नति) ४. श्रेढी for (श्रेष्ट्री)
२१. (घ) १. सूक्ष्मम् (ग) for (सुक्ष्मम्)
(च) १. सूक्ष्मं for (सुक्ष्मम्)
२२. (घ) १. भूह्रंत (ग) भूह्वहीन for (भू हूंत)
२. मूलमवलंबः (ग) मूलमवलंब for (फलमवलंब)
(ग) ३. भूर्द्विभाजिता बाधे for (भूर्द्विभाजिता बाधे)
(च) १. भूह्रंत for (भू हूंत) २. मूलमवलंबः for (फलमवलंब)
२३. (घ) १. भुजगतिभुजगति (ग)भुजप्रतिभुजवधयो for (भुजगतिभुजवधयो)
२. भुजवधयोर्युतेः (ग) यु॑तेः for (भुजवधयोर्युते)
३. लंबः (ग) (च) for (लंब)
(ग) ४. चतुरस्र for (चतुस्रं)
(च) .२. र्युतेः for (र्युते)

( १५६ ) कर्णकृतेः कोटिकृतं¹ विशोध्य³ मूलं भुजो भुजस्य कृतिं । प्रोह्य⁴ यदं² कोटिबाहु कृतियुतिपदं कर्णः ॥ २४ ॥ कर्णयुतादुर्द्धाधरखण्डे⁴ कर्णावलंबयोगे । वास्वाबाधे स्वयुतिहृते³ द्विधा पृथक्कूर्णालंबगुणे ॥ २५ ॥ अविषमपार्श्वभुजगुणं¹कर्णो द्विगुणोवलंबकविभक्तः³ । हृदयं विषमस्यभुजः⁴ प्रतिकृति²भुजकृतियोगमूलाद्धं ॥ २६ ॥ त्रिभुजस्य बधोभुजयो⁴र्द्विगुणितलंबोद्धृतो⁵ हृदयरजः । नृ⁶चतुर्भुजहृदय द्विगुणं⁷ वहिवृत² विष्कंभः³ ॥ २७ ॥

२४. (घ) १. क्र्ति (ग) कृति for (कृतं)
२. प्रोह्य पदं कोटि: (ग) for (प्रोह्ययदं कोटि)
(ग) ३. विशोध्यं for (विशोध्य)
(च) १. क्र्ति for (कृतं)
२५. (घ) १. वा (इस पंक्ति का अंतिम शब्द 'वा' है) (ग)
२. (दूसरी पंक्ति 'स्वा—' से आरम्भ होती है) (ग)
३. हृिते (ग) हृते द्विधा पृथक् for (हृतेद्विधा पृथक्)
(ग) ४. मूर्द्धा for (दुर्द्धा)
(च) ४. दुर्द्धाधर for (दुर्द्धाधर) ३. हृते for (हृते)
२६. (घ) १. गुणः (ग) (च) for (गुणं)
२. (यहां 'कृति' शब्द मूल पाठ में नहीं है) (ग)
(ग) ३. द्विगुणावलंबक for (द्विगुणोवलंबक)
४. विषमभुज: for (विषमस्यभुजः)
(च) २. 'कृति' लुप्त
२७. (घ) १. हृदयं (ग) (च) for (हृदय)
२. वृत्तै (ग) वृत्त for (वृत)
३. विष्कंभः for (विष्कंभः)
(ग) ४. त्रजयो for (भुजयो) ५. लंबोहतो for (लंबोद्धृतो)
६. त्रि for (नृ) ७. द्विगुणितं for (द्विगुणं)
(च) २. वृत्त for (वृत)

! Then what is that mark above त्रिभुजभुजौ? Ah, that's the foot of the from line 30! is above धरखण्डे, right above त्रिभुजभुजौ! So the numbers in verse 31 are: above भूर्भूमि above उर्द्धमवलंब above लंबकयोगाद्धं

Now let's look at the footnotes for 31: ३१. (घ) वि०-यहां इस श्लोक का उत्तरार्ध लिखना लिपि कार भूल गया प्रतीत होता है, '३१' का संख्याक्रम भी नहीं मिलता । १. भूमि for (भूर्भूमि) २. लंबयोरधरे (ग) लंबकाधरं for (उर्द्धमवलंब) Wait! In १. भूमि for (...): Is that (भूर्भूमि)? Let's look at the word in parenthesis: (भुमि)? No, look at (भूमित्) or (भूर्भूमि)? Wait, in line (घ): १. भूमि for (भुमि) -> wait, it is (भुमि)! Wait, why (भुमि)? Because the text has भूमितस्तललंबो, so it says भूमि for (भुमि)? Wait, look at the

( १६१ कर्णावलंकयुतौ^२ खंडे कर्णावलंबयोरधरे । अनुपातेन^३ तदूने^४ उर्द्धं^५ शून्यांस^१ पाटायाम्^६ ॥ ३२ ॥^७ कृतियुर^१सहशराश्योर्बाहुघातो^५ द्विसंगुणो लंबः । कृत्यन्तर^२मसदृशयो^३र्द्विगुणं द्विसमत्रिभुजम्दमिः^४ ॥ ३३ ॥ इष्टद्वयेन^१ भक्तो द्विधेष्टवर्गफलेष्टयोगाद्धै ।^२ विषमत्रिभुजस्य^३ भुजा विष्टोनफलाई योगां भूः^४ ॥ ३४ ॥ इष्टस्य भुजस्य^१ कृतिर्भक्तो नेष्टेन तद्दलं^२ कोटिः । आयनचतुरस्त्रस्य^३ क्षेत्रस्येष्टाधिका^४ कर्णः ॥ ३५ ॥

३२. (घ) (वि०- पहली पंक्ति लिपिकार लिखना भूल गया प्रतीत होता है)
१. सून्यांस (ग) तव्यांस for (शून्यांस)
(ग) २. कर्णाविलंबकयुतौ (च) for (कर्णावलकयुतौ)
३. अमुपातेन for (अनुपातेन) ४. तदूने (ङ) for (तदूने)
५. ऊर्द्ध वेस् for (उर्द्ध) ६. पारायाम् for (पाटायाम्)
(च) ७. यहां क्रमसंख्या ३१ ही अंकित है ।
(ङ) २. कर्णाविलंबकयुतौ for (कर्णावलकयुतौ)
५. ऊर्ध्वे for (उर्द्ध) १. सूच्यांस for (शून्यांस)
३३. (घ) १. कृतियुतिर (ग) (च) for (कृतियुर)
२. कृत्यंतर (ग) (ङ) for (कृत्यंतर)
३. मसदृशयो (ग) (च) (ङ) for (मसदृशयो)
४. त्रिभुज भूमिः for (त्रिभुजम्दमि)
(ग) ५. घातो (च) (ङ) for (घातो)
६. द्विद्विसमत्रिभुजभूमिः for (द्विसमत्रिभुजम्दमिः)
(च) ४. त्रिभुजभूमिः (ङ) for (त्रिभुजम्दमिः)
(ङ) १. कृतियुतिर for (कृतियुर)
३४. (घ) १. शुद्वयेन for (इष्टद्वयेन)
(ग) २. वगं: for (वर्ग) ३. विषत्रिभुजस्य for (विषमत्रिभुजस्य)
(ङ) २. वर्गः for (वर्ग) ४. योगोभूः for (योगाभूः)
३५. (घ) १. कृति (ग) (च) (ङ) for (कृति)
२. तद्दलं (ग) (ङ) for (तद्दलं) ३. आयत (च) (ङ) for (आयन)
४. चतुरस्रस्य (ग) (च) (ङ) for (चतुरस्त्रस्य)

( १६२ ) आयतकर्णौ⁵ बाहु भुज॑कृतिरिष्टेन भाजितेष्टोना । द्वि²हृता कोट्यधिकाभूर्मुख³मूलानाद्विसमचतुरस्रे⁴ ॥ ३६ ॥ कर्ण¹कृतिस्त्रिसमभूजास्त्रयश्चतुर्थो विशोध्य कोटिकृति³ । बाहुकृतेस्त्रिगुणार्या⁴ यद्यधिकोभूर्मुखं हीनः ॥ ३७ ॥ जात्यद्वयकोटिभुजाः परकर्णगुणाः भुजाश्चतुर्विषमे । अधिकोभूर्मुखमूना बाहु द्वितयं भुजावन्यौ ॥ ३८ ॥ इष्टगुणाकारगुणितो गिर्युच्छ्रयः पुरांतरमनष्टम् । द्वियुतं गुणाकरभाजितमुत्पातोऽन्यस्य समगत्योः³ ॥ ३९ ॥ व्यासव्यासार्द्धकृति¹परिधिफले व्यासंहारिके² त्रिगुणे । तद्वर्गाभ्यां³ दशभिः संगुणिताभ्यां पदे सूक्ष्मे⁴ ॥ ४० ॥

३६. (घ) १. बाहू (ङ) for (बाहु) २. हृ

( १६३ ) वृत्ते शरोने¹गुणितात्⁵ व्यासाच्च²तुराहतात्पदं जीवा । ज्यावर्गश्च³तुराहतशरभक्तः शरयुतो व्यासः ॥ ४१ ॥ ज्याव्यासकृतिविशेषा³न्मूलव्यासांतरार्द्धमिषुरल्पः । व्योसो¹ ग्रासोनगुणौ ग्रासो नैक्योद्धृतौ² बाणौ ॥ ४२ ॥ इष्टशरस्य¹ भक्ते ज्यार्द्धं कृन्ति²शरफले⁶ युतौ³ व्यासौ⁷ । शरयोः प⁸लयोरैक्यं ग्रासौ⁹ ग्रासद्यदुनं⁴ तत् ॥ ४३ ॥⁵ ४१. (घ) १. शरोत for (शरोन) २. व्यासाच्चाँतु (ग) द्वचासा for (व्यासाच्चतु) ३. ज्यावर्गस्य for (ज्यावर्गश्च) ४. तुराहह for (तुराहत) (ग) ५. गुणिता for (गुणितात्) (च) ५. गुणिताद्घासाच्च (ङ) for (गुणितात् व्यासाच्च) ४२. (घ) १. व्यासी (ग) (ङ) for (व्यासो) २. ग्रासोनैक्याघृतौ (ग) ग्रासोतैक्योद्ध ृतौ for (ग्रासोनैक्योद्धतौ) (ग) ३. विशेषा मूलं for (विशेषान्मूल) (च) २. ग्रासोनैक्योघृतौ for (ग्रासोनैक्योद्धतौ) ४३. (घ) १. शरद्वयभक्ते (ग) (च) (ङ) for (शरस्यभक्ते) २. कृतीशर (ग) (ङ) for (कृंतिशर) ३. युते (ग) (च) for (युतौ) ४. ग्रासाद्यदूनं (ग) ह्यदनंतत् for (ग्रासद्यदुनं) ५. + क्षेत्र व्यवहारः समाप्तः+ (ग) ६. पले for (फले) ७. व्यासो for (व्यासौ) ८. पलयो for (फलयो) ९. ग्रासो (ङ) for (ग्रासौ) (च) २. कृती for (कृंति) ४. ग्रामाद्यदूनं for (ग्रासद्यदुनं) (ङ) ६. युते for (फले) ३. फले for (युतौ) ४. ग्रासोनमैक्यं for (ग्रासद्यदुनं)

( १६४ ) क्षेत्रव्यव²क्षेत्रफलं वेधगुणं समखातफलहृतं⁵ त्रिभिः³ शून्या⁴ । मुखतुल्यतुल्यभुजैक्यानेकाग्रहृतानि⁶ समरस्त्रः⁷ ॥ ४४ ॥ मुखतुलयुतिः¹ दलगुणितं² वेधगुणं व्यासहारिकं³ गणितम् । मुखतलगुणैक्यार्द्धं⁴ वेधेन गणितमौच्चम्⁵ ॥ ४५ ॥ उद्रगणिताद्विशोध्य² व्यवहारफलं³त्रिभिर्भजेच्छेषम्¹ । लब्धं व्यवहारफले प्रक्षिप्य फलं भवति सूक्ष्मं ॥ ४६ ॥

४४. (घ) १. +अथ खातः+ २. ('क्षेत्र व्यव'—यहाँ लुप्त है) २. (ग) +क्षेत्रव्यवहारः+
३. हृतं (ग) for (हृतं) ४. शून्याः (ग) सूच्याः for (शून्या)
५. मुषतुल (ग) मुखतुल (च) for (मुखतुल्य)
६. न्येका (ग) न्यैकाग्र for (नेकाग्र)
७. समरज्जुः (ग) (ङ) for (समरस्त्रः)
(ग) ८. फलं (च) (ङ) for (फल)
(च) २. क्षेत्रे व्यवहारः समाप्तः, अथ खातः for (क्षेत्रव्यव)
४. शून्याः for (शून्या) ६. न्येकाग्रहृतानि for (नेकाग्रहृतानि)
७. समरत्नः for (समरस्त्रः)
(ङ) २. 'क्षेत्रव्यव' लुप्त ४. सूच्याः for (शून्या)
५. मुखतलतुल्य for (मुखतुल्यतुल्य)
४५. (घ) १. तल (ग) मुखतलयुति (च) for (मुखतुलयुतिः)
२. गणितं (ङ) for (गुणितं)
३. व्यावहारिकं (ग) (च) (ङ) for (व्यासहारिकं)
४. गणितैक्यार्द्धं (ग) मुखवगतैक्यार्द्धं for (गुणैक्यार्द्धं)
५. मौद्रम् (ड्रम्) (ग) मौत्र for (मौच्चम्)
(ग) ६. गुणम् for (गणित)
(च) १. मुखतलयुति for (मुखतुलयुतिः)
४. गणितैक्यार्द्धं (ङ) for (गुणैक्यार्द्धं) ५. मौध्रम् for (मौच्चम्)
(ङ) १. मुखतलयुति for (मुखतुलयुतिः)
६. +स्याद्+ ५ मौत्रम् for (मौच्चम्)
४६. (घ) १. छेषम् (ग) च्छेषम् for (छेषम्)
(ग) २. औंद्र for (उद्र)
(च) २. तुद्र for (उद्र) १. छेषं for (छेषम्)
(ङ) २. औत्र for (उद्र) ३. भजेत् त्रिभिः शेषम् for (त्रिभिर्भजेच्छेषम्)
४. भवति फलं सूक्ष्मम् for (फलंभवतिसूक्ष्मम्)

४. अध्याय १६-२१: शङ्कु-च्छाया, छन्दो-गणित, गोलाध्याय, यन्त्राधिकार एवं उपसंहार

( १६५ ) ¹खाते व्यवहारश्चतुर्थः आकृतिफलमौ²व्याहतमग्रतलैक्यार्द्धमौच्च्य²दैर्घ्य³गुणम्⁴ । घनगुणित⁵मिष्टकाघनफलेन हृत⁶मिष्टकागणितम् ॥ ४७ ॥ ⁷चितिव्यवहारः समाप्तः ॥ विस्तारायां¹मांगुलघातो मार्गा²हतो द्विवेदहृतः³ । किष्कं⁴ गुलं⁵ग्निलब्धं तत्पणवतिर्भवति कर्मैः⁶ ॥ ४८ ॥

४७. (घ) १. ख्याव्यवहार (ग) श्री खातव्यवहारश्चतुर्थः for (खातव्यवहारश्चतुर्थः)
२. मौन्य (ग) मौव्य for (मौच्च्य)
३. दैघ्य for (दैर्घ्य) ४. गुणाः (च) for (गुणम्)
५. गणित (ग) (च) (ङ) for (गुणित) ६. हृत (ग) (च) (ङ) for (हृतं)
(ग) ७. चितव्यवहारः for (चितिव्यवहारः)
(च) १. ख्याव्यवहारश्चतुर्थः for (खातव्यवहारश्चतुर्थः)
(ङ) १. “खात—चतुर्थः” लुप्त ७. मौच्च्याहत for (मौव्याहत)
२. मौच्च्य for (मौच्च्य) ७. इति चितिब्यवहारः for (चितिव्यवहारः समाप्तः)
४८. (घ) १. विस्तराया for (विस्तारायां)
२. मागहितो (ग) मागृहितो for (मार्गाहतो)
३. द्विवेहृतः (ग) द्विवेदहृतः (च) (ङ) for (द्विवेदहृतः)
४. किष्कं (ग) (च) for (किष्कं)
५. गुलानि (ग) (च) (ङ) for (गुलग्नि) ६. कर्म्मः (ग) for (कर्मैः)
(ग) ७. विस्तारायामंगुल for (विस्तारायांमांगुल)
(च) ७. विस्ताराया for (विस्तारायां) ६. कर्मे (ङ) for (कर्मैः)
(ङ) ७. विस्तारायामाङ्गुल for (विस्तारायांमांगुल)
८. षण्णवति for (पणवति)

( १६६ ) शाकादिषु शाल्मल्यां¹ शतद्वयं जीवके⁴ शतं विंशं शालैः⁵ । सरलादिषु² सर्वविहङ्गरुसु³ चतुः षष्टिः ६ ॥ ४६ ॥ क्रवच व्यवहार समाप्तः । नवमं¹ सूकिषु² दशमस्थूलेष्वेकादशो भवत्यणुषु । परिधेर्वेध⁴परिधिः षडंशवर्गो³ हतो गणितम् ॥ ५० ॥ द्विचतुः सत्र्यंशगुणोमित्यंतर¹ बाह्यकोणगः । परिधिः² प्राग्वत्कृत्वा गणितं तद् गणितं स्वगुणकारहूतं³ ॥ ५१ ॥ राशिव्यवहारः⁴ समाप्तः ।

४६. (घ) १. शालाल्पांश for (शाल्मल्यांश)
२. सरलादिषुशतं सर्व (ग) for (सरलादिषुसर्व)
३. विदारूपु (ग) विवहारुषु for (विहङ्गरुसु)
(ग) ४. बीजकेन for (जीवके)
५. यहां 'विंशं' पर श्लोकार्थ समाप्त करके 'शाल' से दूसरी पंक्ति आरम्भ है।
(ङ) ६. क्रकचव्यवहारः (च) for (क्रवचव्यवहार)
(च) ५. वीशंशालः for (विशंशालः) २. +शतं+
३. विदारुषु for (विहङ्गरुसु)
(ङ) ५. विंशं for (विशंशालः) २. ३. शतमथाविदारुषु for (सर्वविहङ्गरुषु)
६. लुप्त।
५०. (घ) १. नवमं शूकिषु (ग) नवमः सूकिषु for (नवमसूकिषु)
२. दशमः (ग) (ङ) for (दशम) ३. वर्गाह्तो (ग) वग्राहतो for (वर्गोह्तो)
(ग) ४. परिधेर्वेधः (च) (ङ) for (परिधेर्वेधः)
(च) १. नवमंशूकिषु for (नवमसूकिषु) ३. वर्गाह्तो (ङ) for (वर्गोह्तो)
(ङ) १. नवमः शूकिषु for (नवमसूकिषु) ५. परिधेः for (परिधिः)
५१. (घ) १. भित्त्यंतर (ग) (च) for (मित्यंतर)
२. परिधिः (यह शब्द पहली पंक्ति का अन्तिम शब्द है) (ङ)
३. हृतम् (ग) (च) (ङ) for (हूतं)
(ङ) १. मित्यन्तर् for (मित्यंतर)
४. इति राशिव्यवहारः for (राशिव्यवहारः समाप्तः)

( १६७ ) छायांतरसैकहृतं द्युदलं प्रागपरयो र्द्युगतशेषम् । दिनगतं शेषांशहृतं द्युदलं छायांतरव्येकम् ॥ ५२ ॥ दीपतलशंकुतलयोरंतरमिष्टप्रमाणशंकुगुणम् । दीपशिखोच्चा शंकुं विशोध्य शेषोद्धृतं छाया ॥ ५३ ॥ छायाग्रांतरगुणिता छाया छायांतरेण भक्ता भूः । भूः शंकुगुणा छाया विभाजिता दीप शिखौच्यम् ॥ ५४ ॥ छाया व्यवहार समाप्तः गुणकार खण्डतुल्यो गुण्यौ गोमूत्रिकाकृतौ गुणितः । सहितः प्रत्युत्पन्नो गुणकारभेदतुल्यो वा ॥ ५५ ॥

५२. (घ) १. +अथछाया+ (आरंभिक प्रकरण का नाम)
२. छायानरसैकहृतं (ग) (ङ) for (छायांतरसैकहृतं)
३. द्युगतशेषम् (ङ) (ग) र्धुगशेषम् for (द्युगतशेषम्)
४. दिनगत (ग) (च) (ङ) for (दिनगतं)
५. हृतं (ग) (च) (ङ) for (हूतं)
६. छायानरव्येकम् (ग) छायामराव्येकम् for (छायांतरव्येकम्)
(च) १. +अथछाया+ ७. हृतं for (हूतं)
३. र्धुगतशेषं for (द्युगतशेषम्)
(ङ) १. छायानरव्येकम् for (छायांतरव्येकम्)
५३. (घ) १. शंकु (ग) च्यं छं कुं for शंकुं २. दोषोद्धृतं for (शेषोद्धृतं)
(ग) ३. दीपशिखौ (च) for (दीपशिखो)
(च) १. व्याछंकुं for (च्याशंकुं)
(ङ) ३. शिखोच्च्याच्छंकुं for (शिखोच्चाशंकुं)
५४. (घ) १. दीपक (च) for (दीप)
(ग) २. भक्ता (अतिरिक्त अंकित) ३. छायाव्यबहारः for (छायाव्यवहार)
(ङ) १. दीपशिखयौच्यम् for (दीपशिखौच्यम्)
५५ (घ) १. स्वंज for (खण्ड) २. ण्गुण्यो (ग) गरणो for (गुण्यौ)
३. कृतो (ग) (ङ) for (क्रतो)
४. प्रत्युत्पन्नौ (ग) प्रत्युत्पन्नो for (प्रत्युत्पन्नो)
(ग) ५. गणितः for (गुणितः)
(ङ) २. गुण्यो for (गुण्यौ)

( १६८ ) गुण्यो राशिर्गुणाकारराशिनैष्टे¹धिकोनकेन गुणः । गुण्यै³ष्टवधो न यतो² गुणके⁴भ्यधिकोनके कार्यः ॥ ५६ ॥ छेदेनैष्ट युतोनेनां² संभाज्यादन⁴ष्टमिष्टगुणम् । प्रकृतिस्थच्छेदहूतं³ लब्ध्वा⁵युतहीनकमनष्टम् ॥ ५७ ॥ गुणा¹च्छेदफलवधो गुणकहतो³ गुण्यभाजितो गुणकः । छेदो धृतः⁴ फलं गुण्यगुणवधः फलहूतः² छेदः ॥ ५८ ॥ गुण्य¹गुणकारयोः⁶ छेदलब्धयो⁷ द्वयो² द्वयोर्नाशः । तेषां दश्यो³ व्यस्तौ⁴ कृत्वा तस्थानयो रिष्टौ⁸ ॥ ५६ ॥

५६. (घ) १. राशिनेष्टा (ग) (च) (ङ) for (राशिनैष्ट)
२. युतो (ग) (च) (ङ) for (यतो)
(ग) ३. गुण्यष्ट for (गुण्यैष्ट) ४. गुणिकेभ्य for (गुणकेभ्य)
(च) ३. गुणोष्ट for (गुण्यैष्ट)
(ङ) ४. गुणकेऽभ्यधिको for (गुणकेभ्यधिको)
५७. (घ) १. छेदो नष्टयुतो for (छेदेनेष्टयुतो)
२. नेनाप्तं (ग) (च) (ङ) for (नेनासं)
३. हृतं (ग) (च) (ङ) for (हूतं)
(ग) ४. दिनष्ट for (दनष्ट) ५. लब्ध्वायूतकम् for (लब्ध्वायुतं)
(ङ) ५. लब्ध्या for (लब्ध्वा)
५८. (घ) १. गुण्य (ग) (ङ) for (गुण)
२. फलहृतः (ग) फलहृत (च) for (फलहूतः)
(ग) ३. हृतो for (हतो)
(ङ) ३. गुणकहृतो for (गुणकहतो) ४. दृतः for (धृतः)
२. फलहूतश्छेदः for (फलहूतः छेदः)
५६ (घ) १. गुणागुण for (गुण्यगुण)
१. द्वियोर्द्वयोर्नाशः (गं) वा द्वयोर्द्वयोर्नाशः for (द्वयोद्वयोर्नाशः)
(ग) ३. दृश्यो (च) for (दश्यो) ४. व्यस्तो for (व्यस्तौ)
(च) १. विसर्ग लुप्त २. द्वंयोर्द्वयोर्नाशः for (द्वयोद्वयोर्नाशः)
५. तस्यानयौ for (तस्थानयौ)
(ङ) ६. कारयोश्छेद for (कारयोः छेद) ७. लब्धयोर्यदि द्वयो for (लब्धयोद्वयो)
२. द्वयोर्द्वयो for (द्वयो द्वयो) ३. दृश्यौ for (दश्यो)
८. श्चेष्टौ for (रिष्टौ)

( १६६ ) गुण्यं गुणकारं वा गुणये³ छेदेन भागहरस्य¹ । गुण्यगुणकारराश्यो⁴ छेदगुणो⁵ भागहरश्च² ॥ ६० ॥ छेदस्य¹ छेदरूपं कृत्वा न्यदूक्तवत्सर्वम् । अपवर्त्यो² तुल्यो³ न छेदगुणौ⁴ छेदगुण्यौ⁶ वा ॥ ६१ ॥ स्वविकलषष्ट्यंशगुणं⁴ सकलस्त्र्यंशोद्धतो¹ विकलवर्गः⁵ । प्रश्नेप्यः² सकलकृतौ वर्गघातौ³ द्वित्रितुल्यवधौ ॥ ६२ ॥ राशेखनं¹ द्विगुण² बहुतरगुणमूनकृतियुतं³ वर्गः । राशेरिष्टयुतोनाद्धः कृतिवेष्टकृतियुक्तः⁵ ॥ ६३ ॥

६०. (घ) १. भागहारस्य (ग) (च) (ङ) for (भागहरस्य)
२. भागहारश्च (ङ) for (भागहरश्च)
(ग) ३. गुणयो for (गुणये)
(च) २. भागहारश्च for (भागहरश्च)
(ङ) ३. गुणयेच्छेदेन for (गुणयेछेदेन) ४. राश्योश्छेद for (राश्योच्छेद)
६१. (घ) १. अच्छेदस्य छेदं (ग) for (छेदस्य छेदरूपं)
२. अपवत्यौ for (अपवर्त्यौ) ३. तुल्येन (ग) for (तुल्योन)
४. छेदगुणौ (ग) for (छदगुणौ)
(ग) ५. दुक्तवत्सर्वम् (ङ) for (दूक्तवत्सर्वम्) ६. छेदगुप्यो वा for (छेदगुण्यौ वा)
(च) ५. न्युदुक्तवत् for (न्यदूक्तवत्) २. अपवर्त्त्यौ for (अपवर्त्यौ)
४. छेदगुणौ for (छदगुणौ)
(ङ) १. अच्छेदस्य for (छेदस्य)
३, ४, ६. छेदगुणौ तुल्येनेष्टेन for (तुल्यो न छदगुणौ छेद)
६२. (घ) १. सकलस्त्रिंशोद्धृतो (ग) सकलस्त्रिशोद्धृतो for (सकलस्त्र्यंशोद्धतो)
२. प्रक्षेप्यः (ग) (च) (ङ) for (प्रश्नेप्यः)
३. वर्गघनौ (ग) वग्रेघनौ for (वर्गघातौ)
(ग) ४. वश्यंशगुणः for (षष्ट्यंशगुणं) ५. वग्रेः for (वर्गः)
(च) १. सकलस्त्रिशो हृतो for (सकलस्त्र्यंशोद्धतो)
(ङ) ६. गुणः for (गुणं) १. सकलास्त्रिंशोद्धतो for (सकलस्त्र्यंशोद्धतो)
३. वर्गघनौ for (वर्गघातौ)
६३. (घ) १. रूनं (ग) (च) (ङ) for (खनं) २. वेंष्ट (ग) (च) for (वेष्ट)
(ग) ३. कृवि for (कृति) ४. बुतं वग्रेः for (युतं वर्गः)
५. र्युक्तः for (युक्तः)
(च) ३. क्रति for (कृति

( १७० ) इष्टालपराशिवर्गौ युक्तोना वितरत्रिकलवर्गाभ्याम् । द्विगुणोत्तरराशिभ्याम्¹ भक्तौ³ तेनाधिकाभ्याम्² ॥ ६४ ॥ स्थानांतरेषु लब्धं येन समं² फलयुतोनकच्छेदः³ । दलित¹कृतियोगान्तरपदमितरो वा फलयुतो नः ॥ ६५ ॥ दिग्मात्रमेतदन्या⁴ ज्योत्पत्तौ कुट्टके च कथयिष्ये । संकलितादिष्टार्याः¹ षट्षष्टिर्द्वादशोऽध्यायः² ॥ ६६ ॥ इति³ ब्रह्मगुप्ते द्वादशोऽध्यायः । इति श्री ब्राह्मस्फुट सिद्धान्ते द्वादशोध्यायः ।

६४. (घ) १. द्विगुणोतर (ङ) for (द्विगुणोत्तर)
२. तेनाधिकोनाभ्याम् (ग) (च) (ङ) for (तेनाधिकाभ्याम्)
(ग) ३. भक्तो for (भक्तौ)
(च) १. द्विगुणोतर for (द्विगुणोत्तर)
६५. (घ) १. दलितः (ग) (च) (ङ) for (दलित)
(ग) २. 'समं' यहां अंकित नहीं है ।
(ङ) ३. युतोनकच्छेदः for (युतोनकच्छेदः)
६६. (घ) १. संकलितादिष्वार्याः (ग) for (संकलितादिष्टार्याः)
२. +६६+
३. यह पंक्ति इस प्रति में लुप्त है । (ग)
(ग) ४. दिग्मात्रामेतदत्य for (दिग्मात्रमेतदन्या)
(च) ३. 'इति' से 'अध्याय' तक समाप्तिसूचक वाक्य लुप्त ।
(ङ) ४. दिङ्मात्रमेतदन्यज् for (दिग्मात्रमेतदन्या)
१. दिष्वार्या for (दिष्टार्याः)

? Wait, look at the letter after र्यु: with something? No,गयात! Wait, what is that smudge above ? It's a superscript or a stray mark? Wait, look at line 8: superscriptis right below it: In line 8,is aboveवायुगगतयो! Wait! The aboveवायुगगतयोis sitting right above theवा, which is just under र्हृष्टै र्युगयात! Ah! That mark above र्युin line 7 is actually a superscriptfor line 8! Wait, no: Look at line 7:अधिमासकैः सविकलैर्हृष्टै- aboveअधिमासकैःis. Above मवमररात्रैर्वाis. In line 8: Above वायुगगतयो(aboveवा) is . Above कालतंत्रज्ञः(aboveतं) is . So that mark between line 7 and 8 is ! And what about line 7 itself: अधिमासकैः सविकलैर्हृष्टै र्युगयातमावमररात्रैर्वा ।Wait, does it have a space:सविकलैर्हृष्ट

( १७२ ) त्रिगुणः शनिरिन्दु¹नोन्येभगणलब्धैर्ग्र²हादिभिः सहितः । भौमो³ऽर्को गुरुर्दु⁵च्चं वान्य⁴भगणाः के ॥ ६ ॥ द्वित्रिगुणयो रविर्द्वोर्युति¹ कुजोन्यान्यभगणलब्धेन । राश्यादिना²धिकगुरुरूना शशि³रन्यभगणाः के ॥ ७ ॥ द्रष्टो¹द्यधिकान³श्विन्यौ दयिका⁴त्वाकरो तिथौ² मध्यात् । मध्यार्कं⁵ गुणकं⁶ गुणमिष्टं मध्यं स तंत्रज्ञः ॥ ८ ॥ पातो¹नतुल्योगमतीन् प्रतिलोममतीन् । ग्रहान् दिवसं² वारं विपरीतैः शन्याद्यैर्यो वेत्ति³ स कालतंत्रज्ञः ॥ ६ ॥ ६. (घ) १. रिन्दुनोऽन्य (ग) रिन्दूनोन्य for (रिन्दुनोन्य) २. गृंहादिभिः (ग) for (ग्रंहादिभिः) ३. भौमो हीनोर्को (ग) भौमो हीनोर्को for (भौमोऽर्को) ४. वान्यभगणाः for (वान्यभगणाः) (ग) ५. रिदूच्चं for (रिदुच्चं) (च) ३. भौमोर्को for (भौमो

( १७३ ) व्यतीपातं³वैधृतबृहस्पतिवर्षस्वोच्चनीचपरिवर्तनात्¹। द्विग्रहयोगांश्च² युगे यो वेत्ति स कालतंत्रज्ञः⁴॥ १० ॥ सावनमासाब्दाधिप होरेशानिष्ठमध्यसंयोगात् । इष्टगुणितेर्युतोनो दिष्टान्यो वेत्ति गणकः सः ॥ ११ ॥ युगरविदिवसैर्गुणितां¹ गताधिमासाः स्वशेषसंयुक्ता² । भक्ता युगाधिमासैः फलं युगादेर्गता दिवसाः ॥ १२ ॥ गुणितानि चन्द्रदिवसैर्गतावमानि¹ स्वशेषसहितानि । विभजेद्युगावमैः फलमनष्टमधिमासकैर्गुणि²तम् ॥ १३ ॥ हूतं¹मिंदु⁵दिनैर्लब्धा²धिमासदिवसैर्विहीन³कमनष्टम् । युगयातदिनान्यधि⁴मासदिनगोष्टग्रहह्याद्यम॑त⁶ ॥ १४ ॥ द्युगुणैंदु¹दिवसघातात्² कुदिनाप्तमधो³युगादिमासगणम्⁴ । युगश

( १७४ ) गुणमधिमासकशेषं युगकुदिनै खमशेषमधिमासैः । तद्युतिरिन्दु¹दिनहृता²धिमासशेषं³ स्फुटं भवति ॥ १६ ॥ कुदिनगताधिकमासक¹घातः स्पष्टाधिमासशेषयुतः भक्तो युगाधिमासै²रहाणिः पूर्ववन्मध्याः³ ॥ १७ ॥ भूदिनगता इवमवधः¹ शेषयुक्तो युगावमविभक्तः । लब्धं भवति द्युगुणो² युगयातो मध्यमाः³ प्राग्वत् ॥ १८ ॥ युगगंतरा¹शिमासवधाद्रविमासाप्तं दिना²कृतं सदिनम् । भूदिनगुण³शशिदिनहूत⁴पाप्त⁵महर्गणः मैकम्⁶ ॥ १६ ॥

१६. (घ) १. दित for (दिन) २. हृताधि (च) for (हृताधिमास)
(ग) ३. शेषस्फुटं for (शेषं स्फुटं)
१७. (ग) १. 'क' अंकित नहीं
२. मासरहर्गणः for (मासैरहाणिः)
३. पूर्ववत् मध्या for (पूर्ववन्मध्या)
(च) २. युगाधिमासैरहर्गणः for (युगाधिमासै रहाणिः)
१८. (ग) १. वधः स्वशेष for (वधः शेष)
२. द्युगणो (ग) (च) for (द्युगुणो)
(ग) ३. मध्यमा for (मध्यमाः)
(च) १. +स्व+
१९. (घ) १. युगगराराशि (ग) युगतराशि for (युगतराशि)
२. दिनीकृतं (ग) (च) for (दिनाकृतं)
३. गुणं for (गुण)
४. शशिदिनैर्हता (ग) शशिदिनहृत for (शशिदिनहूत)
५. माससंहर्गणः (ग) प्राप्तमहर्गणः for (पाप्तमहर्गणः)
६. सैकम् (ग) (च) for (मैकम्)
(ग) ७. मासास्त for (मासाप्तं)
(च) ५. माससंहर्गणाः for (पाप्तमहर्गणः)
४. दिनहृत for (दिनहूत)

( १७५ ) गतदिवसा पृथक् विभासक गुणिता रविदिनाप्तमासदिनैः सहिता । पृथगवमगुणा शशिदिवसाप्तोनकाकपशः ॥ २० ॥ गुणिताद्युगाधिमासैर्य्युगभूदिवसैर्हतादवमशेषात् । फलयुक्तमधिकमासकशेषं मध्यावतोऽर्केन्दू ॥ २१ ॥ अधिमासोवमशेषंयुगशशिभूहृते पृथग्लब्धे मासदिनाद्ये स्थाप्ये गतमासदिनानि चैत्राद्यैः ॥ २२ ॥ अवमावशेषलब्धा सहितानि पृथक् त्रयोदशगुणानि । अधिमास शेषलब्धा हीनानि पृथग् रविशशांकौ ॥ २३ ॥

२०. (घ) १. पृथगविमासकगुणिता (ग) पृथगधिमासकगुणिता for (पृथक् विभासक-
गुणिता)
२. सहिताः (ग) for (सहिता)
वि० यह दूसरी पंक्ति का आरंभिक शब्द है
३. पृथगवमगुणाः (ग) for (पृथग्वमगुणा)
४. द्युपणः for (कपशः)
(ग) ५. गतदिवसाः for (गतदिवसा)
६. दिवसाप्तोन······॥ २० ॥ for (दिवसाप्तोन)
(च) १. पृथगविमासक for (पृथक् विभासक)
७. मासदिनैःसहिताः for (मासदिनैः सहिता)
३. पृथग् वमगुणाः for (पृथग्वमगुणा) ४. काद्युषशः for (काकपशः)
२१. (घ) १. ऽर्केन्दुः for (ऽर्केन्दू)
(ग) २. (भू) अंकित नहीं २. हॄता for (र्हॄता)
४. फलयुक्तं मधिमासशेषं for (फलयुक्तमधिकमासकशेषं)
(च) ३. हृता for (र्हॄता) १. मध्यावतोऽर्केंदू for (मध्यावतोऽर्केन्दू)
२२. (घ) १. शेषे (ग) for (शेष)
२. भूदिनहृते (ग) भूदिनहृता for (भूहृते)
(ग) ३. मधिमासावम for (अधिमासोवम)
४. चैत्रादै for (चैत्राद्यैः)
(च) २. +दि+
२३. (घ) १. हीनातिपृथग् for (हीनानि पृथग्)
(ग) २. लब्धाः for (लब्धा) ३. सहिता for (सहितानि)
४. तयोदंश for (त्रयोदश) ५. गुणाणेनि for (गुणानि)
६. शशिकौ for (शशांकौ)