ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त (ब्रह्मगुप्त - शून्य, कुट्टक, बीजगणित एवं सम्पूर्ण २१ अध्याय सान्वय सटीक)
Brahmasphuta Siddhanta of Brahmagupta with Commentary
आचार्य ब्रह्मगुप्त द्वारा
( २३६ ) यो जानाति^२ युगगतं कथितार्दयिमास^४ शेषकादिष्टात् । अवभाव^१ शेषतो वा तद्योगाद्वासकुदृज्ञः^३ ॥ ११ ॥ एकेष्टदिवसघटिका विनाडिका मंडलादिशेषकयोः । सदृश^१च्छेदो धृतयो^२स्तद्घात्^३ महर्गणायमतः ॥ १२ ॥ हतयो^३परस्परं यच्छेषं^४ गुणकारभागहारकयोः । तेन हतौ^२ निच्छेदौ^५ तावेव परस्परं हतयोः^१ ॥ १३ ॥ लब्धमध्येधः^३ स्थाप्यं यथेष्ट गुणकारसंगुणं शेषम्^४ । शुध्यति तथैक^१हीनं गुणकः स्थाप्यः पलं^२ चांत्यात्^५ ॥ १४ ॥
११. (घ) १. अवमाव (ग) (च) (ङ) for (अवभाव)
(ग) (वि०—इसकी श्लोक संख्या २५ है)
२. यो युगगतं for (यो जानाति युगगतं)
(च) ३. कुदृज्ञः for (कुदृज्ञः)
(ङ) (वि---श्लोक संख्या २५ है)
२. जानाति यो for (यो जानाति) ४. दधिमास for (दयिमास)
१२. (घ) १. सदृश (च) for (सदृश) २. हृतयो (च) for (धृतयो)
३. स्तद्घात for (स्तद्घात्)
(ग) यह श्लोक इस प्रति में उपलब्ध नहीं है ।
(च) ३. तद्घात् for (तद्घात्)
(ङ) श्लोक अनुपलब्ध है ।
१३. (घ) १. हृतयोः (ग) (ङ) for (हतयोः)
२. हृतौ (ग) (च) for (हतौ)
(ग) ३. हृतयोः (च) for (हतयो)
(वि०—इसकी श्लोक संख्या ६ है) (ङ)
(ङ) ३. हृतयोः for (हतयो) ४. यच्छेषं for (यच्छेषं)
५. निश्छेदौ for (निच्छेदौ)
१४. (घ) १. यथैक (च) (ङ) for (तथैक)
२. स्थाप्यपलं (ग) स्थाप्यफलं for (स्थाप्यः पलं)
(ग) ३. लब्धमध्योध for (लब्धमध्येधः) ४. शेषे for (शेषं)
५. वांत्यात् for (चांत्यात्)
(वि०—इसकी श्लोक संख्या १० है) (ङ)
(च) ५. चाप्तात् or चात्यात् for (चांत्यात्)
(ङ) ३. लब्धमघोऽधः for (लब्धमध्येधः)
( २३७ ) अग्रांत्य<sup>१</sup>मुपांत्येना<sup>६</sup> स्वाद्धों<sup>२</sup> गुणितोंत्यं<sup>७</sup> संयुतो भगणः<sup>३</sup> । छेद्भागहारेणैवं<sup>४</sup> स्थिरकटुकः<sup>५</sup> शेषम् ॥ १५ ॥ इष्टभगणादिशेषात् स्वकुटकगुणात्<sup>१</sup> स्वाभागहार<sup>२</sup> हृतात्<sup>३</sup> । शेषं द्युगणोहृत<sup>४</sup> निरपर्वत<sup>५</sup> गुणभागहारं<sup>६</sup> युतः ॥ १६ ॥ १५. (घ) १. अग्रांत (ग) (च) (ङ) for (अग्रांत्य) ३. भक्तः (ग) (च) for (भगणः) ४. निश्छेदभागहारे for (छेद्भागहारे) ५. कुट्टकः (ङ) for (कटुकः) ७. गुणितोप्त (त्प) (च) for (गुणितोंत्य) (ग) २. स्वेधों for (स्वाद्धों) ६. मुपांत्येन (ङ) for (मुपांत्येना) (वि०—इसकी श्लोक संख्या ११ है) ४. निश्छेद for (छेद) ५. कुदकः for (कटुकः) (ङ) २. स्वोर्ध्वो for (स्वाद्धों) ३. भक्तः for (भगणः) ४. निः शेष for (छेद) १६. (घ) १. कुट्टक (ङ) for (कुटक) २. गुणात्स्वभाग (ग) गुणान् स्वभाग for (गुणात्स्वाभाग) ३. हृताद् (ग) हृतान् for (हृतात्) ४. गत (ग) भगणोगत for (द्युगणोहृत) ५. निरपवर्त्त (ग) (च) (ङ) for (निरपर्वत) ६. भागहारयुतः (ग) गुणभागहारयुता for (गुणभागहारंयुतः) (ग) (वि०—इसकी श्लोक संख्या १२ है) (च) ७. दष्ट for (इष्ट) १. कुदक for (कुटक) २. गुणात्स्वभाग for (गुणात्स्वाभाग) ३. हृताद् for (हृतात्) ४. गत for (हृत) ६. गुणभागहारयुतः (ङ) for (गुणभागहारंयुतः) (ङ) २. गुणात्स्वभाग for (गुणात्स्वाभाग) ४. गत for (हृत)
, and 'य' with 'ू'. Now look at the main text: Does it look like that? No, the main text has "न्यूनास्तप्त"! Wait, but what if the editor read it as "न्यूनास्तप्त" or "त्र्यूनास्तप्त"? Let's look at the standard verse from Bhaskara's Lilavati / Bijaganita / Brahmasphutasiddhanta / Mahabhaskariya? Wait! "बुधदिने सवितुः" - this is an astronomical problem! Wait, who wrote this? "एवं समेषु विषमेष्व..." "ऋणधनयोर्व्यस्तत्वं गुण्यप्रक्षेपयोः कार्यम्" "गुणकच्छेदः छेदो गुणको धनमृणधनं कार्यम्" "वर्गे पदं पदकृति..." "अंशक शेषा..." This is Brahmagupta's Brahmasphutasiddhanta! Chapter 18 (Kuttakadhyaya)! YES! Brahmasphutasiddhanta, Chapter 18! Let's check the verse of Brahmasphutasiddhanta: Brahmasphutasiddhanta 18.17: एवं समेषु विषमेष्वृणं धनं धनमृणं यदुक्तं तत् । ऋणधनयोर्व्यस्तत्वं गुण्यप्रक्षेपयोः कार्यम् ॥ १७ ॥ 18.18: गुणकच्छेदः छेदो
( २३६ ) त्र्यू^५नाधिमासः शेषात्^१ मूलद्ध्व्य^२धिकं विभाजितं षड्भिः । द्यूनं^६ वर्जित^३ मधिकं नवभि र्नवति^४ कदा भवति ॥ २० ॥ अवमावशेष वर्गो^४न्येको^५र्विंशति विभाजितोष्य^१धिकः । अष्टगुणो^६ दशभक्ते^२ द्वियुते^३ ष्टादशकदा भवति ॥ २१ ॥ इष्टभगणादिशेषा^४ द्युगणस्तत्कुट्टकेन संयुक्तः तच्छेद^५दिनेस्तावद्दिनवारो यावदिष्टस्य^२ ३ ॥ २२ ॥
२०. (घ) १. शेषान्मूलं (ग) for (शेषात् मूल) २. द्वयधिकं (ग) (च) for (व्यधिकं)
३. वर्गित (ग) (च) for (वर्जित) ४. न्नवतिः (ग) नवभिः for (नवतिः)
(ग) (वि०-इसकी श्लोक संख्या २८ है)
५. न्यूनाधिमास for (त्र्यूनाधिमास) ६. द्वचूनं २ for (छूनं)
(च) १. शषान्मूलं for (शेषात्मूल) २. द्वयधिकं for (व्यधिकं)
४. न्नवतिः for (नवति)
(ङ) (वि०-इसकी श्लोक संख्या २८ हैं)
५. च्यूनाधिमास for (त्र्यूनाधिमासः)
१. शेषान्मूलं for (शेषात्मूल) २. द्वयधिकं for (ध्यधिकं)
६. द्वचूनं for (छूनं) ३. वर्गित for (वर्जित)
४. नवतिः for (नवति)
२१. (घ) १. द्वयधिकः (ग) (च) (ङ) for (ध्यधिकः)
१. देशभक्तो (ग) (च) for (दशभक्तो)
३. द्वियुतोऽष्टादश (ग) (च) for (द्वियुते)
(ग) (वि०-इसकी श्लोक संख्या २६ है)
४. शेषे for (शेष) ५. व्येको for (न्येको)
६. गुणो for (गुणो)
(ङ) ५. व्येको for (न्येको)
(वि०-इसकी श्लोक संख्या २६ है)
२२. (ग) १. कुटकेन for (कुट्टकेन) २. दिष्टः for (दिष्ट)
३. स्यात् for (स्य)
(वि०-इसकी श्लोक संख्या १६ के स्थान में ६ है)
(च) १. कुदकेन for (कुट्टकेन)
(ङ) (वि०-श्लोक संख्या १६ है)
४. शेषाद् for (शेषा) ५. तच्छेद for (तच्छेद)
२. ३. यावदिष्टः स्यात् for (यावदिष्टस्य)
( २४० ) भगणाद्यमिष्टशेषं कदेंदुदिवसे खेर्गुरु दिने वा । ज्ञदिने वायः कथयंति कुदाकारं स जानाति ॥ २३ ॥ ज्ञदिने यदंशशेषं विकलाशेषं कदा न दिंदु दिने । भानोरथवा शशिनो यः कथयति कुटकज्ञः सः ॥ २४ ॥ इष्टेषुमान दिवसे द्विमासान्मून रात्रिशेषे वा । भूयस्ते यः कथयति पृथग् पृथग् वा कुदज्ञः ॥ २५ ॥
२३. (घ) १. कथति (च) for (कथयंति)
२. कुट्टाकारं (ग) कुट्टकारं for (कुदाकारं)
(ग) ३. ज्ञदिनैराशयः for (ज्ञदिनेवायः)
(वि०—इसकी श्लोकसंख्या १६ के स्थान में केवल ६ लिखी है)
(च) १. कुट्टाकारं for (कुदाकारं)
(ङ) (वि०—श्लोकसंख्या १६ है)
३. राशीन् for (वायः) २. कुट्टाकारं for (कुदाकारं)
२४. (घ) १. तर्दिदु (ग) (च) (ङ) for (नदिंदु)
२. कुट्टकज्ञः (ग) for (कुटकज्ञः)
(ग) (वि०—इसकी श्लोक संख्या १७ के स्थान में ७ है)
(च) २. कुदकज्ञः for (कुटकज्ञः)
(ङ) (वि०—क्रमसंख्या १७ है)
१. कुट्टकज्ञः for (कुटकज्ञः)
२५. (घ) १. मासन्मून for (मासान्मून)
२. पृथगपृथग्वा (ग) पृथक् पृथग् वा स for (पृथग् पृथग वा)
३. कुद्दज्ञः (ग) for (कुदज्ञः)
(ग) (वि०—इसकी श्लोक संख्या २६ है)
१. न्यून for (न्मून)
४. दिवसेष्वधिमास for (दिवसे द्विमास)
(च) १. मासन्मून for (मासान्मून) २. पृथगपृथग्वा for (पृथग् पृथगवा)
(ङ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या २६ है)
४. दिवसेष्वधि for (दिवसे द्वि) १. मासन्मून for (मासान्मून)
५. रात्र शेषे for (रात्रिशेषे) २. पृथक् for (पृथग्)
२. पृथग् वा for (पृथग वा) ३. स कुट्टज्ञः for (कुदज्ञः)
( २४१ ) निच्छेदैर्⁴ भागहाराद्राश्यादि कला¹नाहताद्भु³ङ्क्तात् । भगणकलाभिर्लब्धं² मंडलशेषं दिनगणोऽस्मात्⁵ ॥ २६ ॥ एवं राश्यंश³ कला⁴शेषाण्यहर्गणः¹ प्राग्वत् । नष्टस्थानेष्विष्टानं⁵ कान्⁶ कृत्वोक्त⁷ वच्छेषशम्² ॥ २७ ॥ यो राश्यादीन् द्रष्ट्वा⁵ मध्यस्येष्टस्य कथयति द्युगुणम्¹ । ध्व्याधि²ग्रहयोगाद् ग्रहांतराद्वा³ स कुट्टज्ञः⁴ ॥ २८ ॥
२६. (घ) १. कलादिनाहताङ्गुक्तात् (ग) कलादिना हृताद्भुक्तात् for (कलानाहता-
ङ्गुक्तात्)
(ग) (वि० - इसकी श्लोक संख्या २१ है ।) २. (लब्धं भमंडल for (लब्धं मंडल)
(च) १. कलादिनाहताङ्गुक्तात् for (कलानाहताङ्गुक्तात्)
(ङ) (वि० - इसकी क्रम संख्या २१ है
४. निश्छेद for (निच्छेद) १. कलादिना for (कलाना)
३. हताद्भुक्तात् for (हताङ्गुक्तात्)
५. दिनगणोऽस्मात् for (दिनगणोस्मात्)
२७. (घ) १. हर्गणः for (हर्गणः) २. छेषम् for (छेषपम्)
(ग) (वि-इसकी श्लोक संख्या २२ है ।) ३. कलाविकला (ङ) for (कला)
४. शेषादहर्गणः (ङ) for (शेषाण्यहर्गणः)
(च) २. वच्छेषं for (वच्छेषशम्) १. हर्जणः for (हर्गणः)
(ङ) (वि० इसकी क्रम संख्या २२ है)
५. नष्टस्येष्टविष्टान् for (नष्टस्थानेष्विष्टानं)
६. तान् for (कान्) ७. कृत्वा भक्त्वोक्त for (कृत्वोक्त)
२. वच्छेषम् for (वच्छेषशम्)
२८. (घ) १. द्युगणम् (ग) (च) (ङ) for (द्युगुणम्)
२. द्वयादि for (ध्व्याधि) (ग) द्वयादिग्रहसंयोगात् for (ध्व्याधिग्रहयोगाद्)
३. गुहांततराद् (ग) ग्रहांतराद्वा for (ग्रहांतराद्वा)
४. कुट्टकज्ञः (ग) for (कुट्टज्ञः)
(ग) (वि-इसकी श्लोक संख्या २० है परंतु लिखी हुई १० है ।)
५. दृष्ट्वा (च) (ङ) for (द्रष्ट्वा)
(च) २. द्वयादिग्रह for (ध्व्याधिग्रह) ४. कुदज्ञः for (कुट्टज्ञः)
(ङ) (वि०-इसकी क्रम संख्या २० है)
२. द्वयादिग्रह संयोगात् for (ध्व्याधिग्रहयोगाद्)
४. कुदृज्ञः for (कुट्टज्ञः)
( २४२ ) येन गुणे¹ शेषयुते² छेदः³ शुध्यति हृत⁴ स्वगुणकेन । तद्भुक्तं⁵ शेषं फलमेव शेषाद् ग्रहद्युगुणैः⁶ ॥ २६ ॥ राश्यंशकला विकला शेषात्कथितादभीष्टतोनष्टात् । यः साध्यद्युपरिमानं¹ समध्यमा⁴ कुट्टकज्ञः² स ॥ ३० ॥ इति श्री कुट्टक प्रकरणम्⁵
२६. (घ) १. गुण (ग) गुणः for (गुणे) २. युतच्छेद (ग) हृताच्छेदः for (युते छेदः)
३. गणैः (ग) गणौ for (गुणैः)
(ग) (वि०—इसकी श्लोक संख्या २४ है) ४. हृदः for (हृत)
५. न तदुक्तं for (तद्भुक्तं) ६. फलमेवं for (फलमेव)
(च) १. गुणों शेषयुतां for (गुणे शेषयुते)
४. हृतः for (हृत) ३. द्युगणैः for (द्युगुणैः)
(ङ) १. (वि०—इसकी क्रम संख्या २४ है)
१. गुणः for (गुणे) २. युतश्छेदः for (युते छेदः)
४. हृतः for (हृत) ७. शेषाद्ग्रह for (शेषाद्ग्रह)
३. द्युगणौ for द्युगुणैः)
३०. (घ) १. त्युपरिमान् (ग) त्युपरिधमान् for (द्युपरिमान्)
५. वि०—मूल में 'इति श्री' पद नहीं है ।
२. कुट्टकज्ञः (ग) for (कुट्टकज्ञः स)
(ग) (वि—इसकी श्लोक संख्या २३ है)
३. विकलांशशेषात् for (विकलाशेषात्)
४. समध्यमान् for (समध्यमा)
(च) १. साध्यत्युपरिमान् for (साध्यद्युपरिमान्)
४. समध्यमात् for (समध्यमा) ५. 'इति श्री' लुप्त
६. कुदक for (कुट्टक)
(ङ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या २३ है)
७. नष्टान् for (नष्टात्) १. साध्यत्युपरितनान् for (साध्यद्युपरिमान्)
४. समध्यमान् for (समध्यमा)
२. कुट्टकज्ञः for (कुट्टकज्ञः) ५. 'इति - से—णाम्' तक सब लुप्त ।
( २४३ ) <sup>५</sup> <sup>१</sup> <sup>६</sup> अथ धनर्ण श्रुत्यानां संकलना <sup>८</sup>धनयोर्धनमृणयोर्<sup>७</sup>धनर्णयोरन्तरं <sup>२</sup>समैक्य<sup>६</sup>खं । <sup>३</sup>वर्गाँक्य<sup>१०</sup>मृणं धनशून्ययोः <sup>४</sup>दूनं शून्ययोः शून्यम् ॥ ३१ ॥ <sup>१</sup>ऋणमधिकाद् विशोध्यं धनं धनाहृणमृणादधिकमूनात् । व्यस्तं तदन्तरं <sup>२</sup>वा <sup>४</sup>ऋणं <sup>३</sup>धनं न मृण भवति ॥ ३२ ॥ ३१. (घ) १. शून्यानां for (श्रुत्यानां) २. समैक्यं (ग) for (समैक्य) ३. खर्णैक्य (ग) स्वर्णैक्यमृण for (वर्गाँक्यमृणं) ४. द्धूनं (ग) for (दूनं) (ग) (वि०—इसकी श्लोक संख्या ३० है) ५. 'अथ' से 'संकलना' तक लुप्त है। ६. स्वं for (खं) (च) ५. अथधनर्ण्य for (अथधनर्ण) १. शून्यानां संकलनाः for (श्रुत्यानां सकलना) ७. धनर्ण्ययो for (धनर्णयो) २. समैक्यं for (समैक्य) ३. खवर्णैक्य for (वर्गाँक्य) ४. द्धूनं for (दूनं) (ङ) १. शून्यानां for (श्रुत्यानां) ४. “दूनं” लुप्त ६. सङ्कलनम् for (संकलना) ८. +मृण+ २. समैक्यं for (समैक्य) ३. ऋणमैक्यं च for (वर्गाँक्य) १०. धनमृण for (मृणं) ३२. (घ) १. ऊन (ग) (च) (ङ) for (ऋण) २. खाहृणं (ग) (च) for (वा ऋणं) ३. 'ण' को लिखना भूल गया (ग) (वि०—इसकी श्लोक संख्या ३१ है) ४. धनं धनमृणं भवति for (धनं न मृणभवति) (च) ३. नमृभति for (न मृणभवति) (ङ) २. स्याहृणं for (वा ऋणं) ३. धनमृणं for (नमृण)
( २४४ ) शून्यविहीनमृणमृणं धनं धनं भवति शून्यमाकाशम् । शोध्ये यदा धनमृणादणं धद्धात्तदश्रेय्यम् ॥ ३३ ॥ प्रत्युत्पन्नः ऋणमृणधनयोर्घाति धनमृणयोर्धनं वधोधनं भवति । शून्यण्योः स्वधनयोः खशून्ययोर्वा वध शून्यम् ॥ ३४ ॥ ३३. (घ) १. दृणं (ग) (च) (ङ) for (दणं) २. धनाद्धा (ग) (ङ) for (धद्धा) ३. क्षेप्यम् (ग) तदा क्षेप्यम् for (तदश्रेय्यम्) (वि०— इसकी क्रमसंख्या ३४ लिखी है) (ग) ४. विहिन for विहीन ५. शोध्यं (च) (ङ) for (शोध्ये) (वि०— इसकी संख्या ३२ है) (च) २. ध्ट्वा for (धद्धा) ३. तदक्षेप्यं for (तदश्रेय्यम्) (वि०— यहां क्रमसंख्या ३४ अंकित है) [L
( २४५ ) धनभक्तं धनमृणहृतं मृणं धन भवति खंखभक्तम् । खंभक्तमृणे धनधनमृणधनेन हतमृणमृणं भवति ॥ ३५ ॥ खोद्धृतमृणधनं वा तच्छेद खमृणधन विभक्तं वा । धनमृणधनयोर्वर्गः खं खस्यपदं कृतियत्तत ॥ ३६ ॥ योगोन्तर युतहीनो द्विहतः संक्रमणमंतरविभक्तम् । वर्गान्तरमंतर युतहीनं द्विहतं विषमकर्म ॥ ३७ ॥ ३५. (ख) (वि०—इस श्लोक की दूसरी पंक्ति का आरंभिक 'ख' पहली पंक्ति का अंतिम शब्द है) १. हतमृणं (ग) (ङ) (च) for (हतंमृणं) २. धनं (ग) (च) (ङ) for (धन) ३. मृणं (ग) (च) (ङ) for (मृण) ४. हृत (ग) (च) (ङ) for (हत) (वि०—इसका संख्याक्रम ३६ लिखा है) (ग) ५. भक्तं खम् । यहां 'खं' पहली पंक्ति का अंतिम पद है। दूसरी पंक्ति 'भक्त' से आरम्भ होती है। इसकी क्रमसंख्या ३४ है । (ङ) ६. मृणेन (ङ) for (भक्तमृणे) ७. 'धन' यह पद लुप्त है (ङ) ८. मृणधनं भवति for (मृणमृणं) (च) १. यहां क्रमसंख्या '३६' अंकित है। ३६. (घ) १. वाः for (वा) (वि०—इसका संख्याक्रम ३७ लिखा है) (ग) २. कृतियत्कृत् for (कृतियत्तत्) (वि०—इसकी श्लोक संख्या ३५ है) (च) ३. (वि०—यहाँ क्रमसंख्या ३७ अंकित है) (ङ) ४. मृणं for (मृण) ५. तच्छेदं for (तच्छेद) ६. ऋणधनयो for (धनमृणधनयो) ७. स्वं खं for (खं) २. र्यत्तत् for (यत्तत्) ३७. (घ) १. हृतः (ग) (च) (ङ) for (हतः) २. वर्गान्तिर (ग) (च) (ङ) for (वर्गान्तर) ३. हृतं (ग) (च) (ङ) for (हतं) ४. कर्म्मः (ग) (च) for (कर्म) (वि०—इसका संख्याक्रम ३८ लिखा है) (ग) ५. युतहिनो for (युतहीनो) (वि०—इसकी श्लोक संख्या ३६ है) (च) ६. (वि०—यहां क्रमसंख्या ३८ अंकित है) (ङ) ७. +वा+
( २४६ ) कराणां¹लंबस्तत्कृति रिष्टहृतेष्टेन⁴ संयुतोऽल्पोभूः⁵ । अधिको द्विहतो² बाहु³ संक्षेप्यावद्धधो⁶ वर्गः ॥ ३८ ॥ इष्टोद्धृत कराणी¹ पदक्रतियुति³रिष्टगुणितांतरकृतिर्वा गुण्यः² । स्तिर्यगधोधो⁴ गुणकः समसद्गुणः⁵ सहितः ॥ ३६ ॥ सेष्टार्णच्छेदगुणो³ भाज्यच्छेदौ⁴ पृथक् युतावसकृत् । छेदकगत हृतो¹र्द्धो भाज्यो वर्गः समद्विवधः² ॥ ४० ॥
३८. (घ) १. करणी (ग) (ङ) for (कराणां)
२. हृत्तो (ग) (च) for (हतो) ३. बाहू (ग) बाहुः (ङ) for बाहु
(वि०—इसका संख्याक्रम ३६ है ।)
(ग) ४. हृते (च) for (हृते) ५. संयुताल्पोभूः for (संयुतोऽल्पोभूः)
६. संक्षेप्या यद्वधो for (संक्षेप्यावद्धधो)
(च) १. करणी for (कराणां) ७. (यहां क्रमसंख्या ४६ अंकित है)
(ङ) ५. संयुताल्पा भूः for (संयुतोऽल्पोभूः) ६. संक्षेप्पो यद्वधो for (संक्षेप्यावद्धधो)
३६. (घ) १. करणी (ग) (च) (ङ) for (कराणी)
२. 'गुण्य' यह पद दूसरी पंक्ति के आरम्भ में है (ग)
(वि०—इसका संख्याक्रम ४० है)
(ग) ३. पदयुतिक्रति for (पदक्रतियुति) २. गुणास्ति for (गुण्यः)
४. गुणक (ङ) for (गुणकः) ५. समस्तद्गुण सहितः ॥ ३८ ॥ for
(समसद्गुणः सहितः ॥ ३६ ॥)
(च) २. वर्गण्य for (वर्गण्यः) ६. (यहां क्रमसंख्या ४० अंकित है)
(ङ) ३. पदयुतिक्रति for (पदक्रतियुति) २. 'गुण्यः' दूसरी पंक्ति का आरम्भिक पद ।
५. समस्तद्गुणः for (समसद्गुणः)
४०. (घ) १. हृत्तो (ग) (च) (ङ) for (हृतो)
२. समद्विवधः (ग) समिद्विविधः for (समद्विवधः)
(वि०—इसका संख्याक्रम ४१ है)
(ग) ३. गुणौ for (गुणो) ४. पृथक् for (पृथक्) ५. वा भाज्यो (ङ) for (र्द्धोभाज्यो)
(वि०—इसकी क्रमसंख्या ३६ है) (ङ)
(च) ३. सेष्टर्ण्यच्छेदगुणो for (सेष्टार्णच्छेदगुणो) ६. भाद्यच्छेदौ for (भाज्यच्छेदौ)
५. द्वौभाद्यो for (र्द्धोभाज्यो) २ समद्विवधः for (समद्विवधः)
७. (वि०—यहां क्रमसंख्या ४१ अंकित है)
(ङ) ३. च्छेदगुणौ for (च्छेदगुणो) ७. युजावसकृत् for (युतावसकृत्)
२. समद्विवधः for (समद्विवधः)
( २४७ ) इष्टकरन्यूनोनाया^१ रूपकृतेः^४ पदयुतोनरूपार्द्धं^५ । प्रथमे^२ रूपाण्यन्यहिना^३ द्वितीयं करण्यसकृत् ॥ ४१ ॥ अव्यक्तवर्गधनवर्गवर्ग^१ पंचगत^२षड्गतादीनाम्^३ । तुल्यानां संकलित^४ व्यवकलिते^५ पृथगतुल्यानाम्^६ ॥ ४२ ॥^७ सहश द्विवधो^२ वर्ग्याद्यादिवधस्तद्गतोऽन्यरूपवधः^३ । अन्योन्य^४वर्गघातो भावितकः पूर्ववच्छ्लेषम्^६ ॥ ४३ ॥^५
४१. (घ) १. करण्यूनाया (ग) (च) (ङ) for (करन्यूनोनाया)
२. प्रथमं (ग) (ङ) for (प्रथमे) ३. द्विना (ग) द्वितिय for (हिना)
(वि०—इसका संख्याक्रम ४२ है)
(ग) ४. रूपकृतेः (ङ) for (रूपकृतैः) ५. यूतो for (युतो)
६. 'द्वितीयं' लुप्त है
(वि०—इसकी श्लोक संख्या ४० है)
(च) ३. रूपाण्यन्यद्विना for (रूपाण्यन्यहिना)
(वि०—यहां क्रमसंख्या ४२ अंकित है)
(ङ) १. प्यूनाया for (न्यूनाया) ३. त्ततो for (हिना)
४२. (घ) (वि०—इसका संख्याक्रम ४३ है ।)
(ग) १. घनवर्ग (ङ) for (घनवर्ग) २. यहां एक 'वर्ग' लुप्त है ।
३. गतः for (गत) ४. संकलिते for (सङ्कलित)
५. 'व्यवकलिते' लुप्त है
६. प्रथग for (पृथग)
(वि०—इसकी श्लोक संख्या ४१ है)
(च) ७. (वि०—यहां क्रमसंख्या ४३ अंकित है)
(ङ) (वि०—क्रमसंख्या ४१ है)
४३. (घ) (वि०—इसका संख्याक्रम ४४ है)
१. वर्ण (ग) (ङ) for (वर्ग)
(ग) २. द्विधो for (द्विवधो) ३. न्यवधः for (ऽन्यरूपवधः)
४. सन्योन्य for (अन्योन्य)
(वि०—इसकी श्लोकसंख्या ४२ है)
(च) १. वर्ण्य for (वर्ग)
५. (वि०—यहां क्रमसंख्या ४४ अंकित है)
(ङ) ३. ऽन्यजातिवधः for (ऽन्यरूपवधः) ६. पूर्ववच्छेषम् for (पूर्ववच्छ्लेषम्)
'इति धनर्णादीनां सङ्कलित व्यवकलितादि'
( २५० ) मंडलशेषाद्यु¹नान्मूलं व्येकं दशाधृतं² द्वियुतम् । मंडलशेषं व्येकं³ भानोर्ज्ञेदिने कदा भवति ॥ ५० ॥⁴ अधिमास शेषपादा न्यूनाद्वर्गो¹धिमासशेषसमः² । अवमावशेषतो³ वा⁴ वमवशेषसमः कदा भवति ॥ ५१ ॥५ आद्याद्वर्णादिन्यान् व्यस्तान्⁸प्रोह्याद्यमान⁶माद्यहूतात्⁷ । सदृशा² छेदान् सकृत्³ द्वौ व्यस्तौ⁴ उदकोबप्पू⁵ ॥ ५२ ॥
५०. (घ) (वि०— इसकी क्रमसंख्या ५१ है)
१. द्व्यू (ग) द्युनामूलं for (द्युनान्मूलं)
२. हृतं (ग) हतं for (धृतं) ३. व्येकं (ग) (ङ) for (व्येक)
(ग) . (वि०— इसकी श्लोक संख्या ४६ है)
(च) १. द्व्यूनान् for (द्युनान्) २. हतं for (धृतं)
४. (वि०— इसकी क्रमसंख्या ५१ अंकित है)
(ङ) १. द्व्यूनान्मूलं for (द्युनान्मूलं) २. दशाहतं for (दशाधृतं)
५१. (ग) (वि०— इसकी क्रमसंख्या ५२ है)
(ग) १. न्यूनाद्वर्गा for (न्यूनाद्वर्गो) २. यमः for (समः)
६. अमावशेततो for (अवमावशेषतो) ४. 'व' लुप्त है (ङ)
(वि०— इसकी श्लोक संख्या ५० है)
(च) १. द्वर्गोऽधिमासशेषः for (द्वर्गोधिमासशेष)
५. (वि०— क्रमसंख्या ५२ अंकित है)
(ङ) ६. पादात् for (पादा) १. न्यूनाद्वर्गो for (न्यूनाद्वर्गो)
१. हूतात् (च) for हूतात्) २. सहस (ग) सदृशा for (सदृशा)
३. नसकृत (ग) for (नसकृत्)
४. कुटको (ग) (ङ) for (उदको) ५. बहुषु (ग) (ङ) for (बप्पू)
(वि०— इसकी श्लोक संख्या ५३ है)
(ग) (वि०— इसकी श्लोक संख्या ५१ है)
६. मद्य for (माद्य) ६. तत् for (तात्)
(च) २. सहस for (सदृशा) ३. नसकृत् for (नुसकृत्)
५. बप्पु for (वप्पू) (वि०— यहां श्लोक संख्या ५३ अंकित है)
(ङ) शीर्षक + इदानीमनेकवर्णसमीकरणमाह +
८. वर्णान् for (व्यस्तान्) २. सदृश for (सदृशा)
१. हृतम् for (हूतात्) ३. च्छेदावसकृद्द्वौ for (छेदान् सकृत्द्वौ)
( २५१ ) गत⁵भगणयुता द्युगुणा¹ तद्²द्वेष्युता³ तदैवययुताद्वा⁶ । तद्योगाद्वा द्युगुणो यः कथयति कुट्टकज्ञः सः ॥ ५३ ॥ ⁸ गतभगणोना द्युना¹ गणातच्छेषो² ना तदैवयहीनाद्वा⁵ । तद्विवराद्वा⁴ द्विगुणं⁶ यः कथयति कुट्टकज्ञः सः ॥ ५४ ॥ ⁷
५३. (घ) १. गणात्त (ग) द्युगुणात् for (द्युगुणा)
२. छेष (ग) for (तद्द्वेष) २. तदैक्य (ग) for (तदैवय)
४. गणां for (गुणो)
(वि०—इसकी क्रमसंख्या ५४ लिखी है)
५. गतभंगयुतात् for (गतभगणयुता)
६. संयुक्तात् (ङ) for (युताद्वा) ७. तद्योगाद्द्युगुणं for (तद्योगाद्वाद्युगुणो)
८.
( २५२ ) अंशक शेषेण युता स्त्रित्प्ता शेषात्र तदंतरादथवा । भानोर्ज्ञदिने द्युगुणं यः कथयति कुटकज्ञः सः ॥ ५५ ॥ अंशक शेष त्रियुतं लिप्ता शेषं कदा रवेर्ज्ञ दिने षट् । सप्ताष्टोन वा कुर्वन्नावत्सराद्गणकः ॥ ५६ ॥ अंशसम मंशके कलासमं वा कला कदा शेषम् । दिवसकरस्येष्ट दिने कुर्वन्नावत्सराद्गणकः ॥ ५७ ॥
५५. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ५६ है)
१. लिप्ता (ग) (च) for (स्त्रिप्ता) ३. द्युगणं (च) (ङ) for (द्युगुणं)
२. शेषात्तदंतरा (ग) (च) for (शेषात्रतदंतरा)
४. कुट्टकज्ञ (ग) कुट्टकज्ञः for (कुटकज्ञः)
(ग) ५. हता for (युता) (वि०—इसकी श्लोक संख्या ५५ है)
(च) ४. कुदफ्ज्ञः for (कुटकज्ञः) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ५६ अंकित है)
(ङ) ५. युतात् for (युता) लिप्ता for (स्त्रिप्ता)
२. शेषात् for (शेषात्र)
५६. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ५७ है) १. नं वा (ग) नावां for (नवा)
(ग) २. शेषं (ङ) for (शेष)
३. 'षट्' दूसरी पंक्ति का प्रथम पद है (ङ)
४. सप्ताष्टौ for (सप्ताष्टो)
(वि०—इसकी श्लोकसंख्या ५६ है)
(च) १. सप्ताष्टोनं for (सप्ताष्टोन)
५. (वि०—इसकी क्रमसंख्या ५७ अंकित है)
(ङ) १. नव वा for (न वा) ४. सप्ताष्टौ for (सप्ताष्टो)
५७. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ५८ है)
१. मंशशकज्ञा for (मंशके) २. कदा (ग) for (कला)
६. कला (ग) for (कदा) ४. दिवसस्येष्ट for (दिवसकरस्येष्ट)
५. त्सराद्गणकः for (त्सराद्गणकः)
(ग) ६. अंशयुगमंशशेषं for (अंशसममंशके) ७. कलासमांश for (कलासमं)
(वि०—इसकी क्रमसंख्या ५८ है, संख्या ५७ अंकित करना भूल गया)
(च) १. मंशशे for (मंशके) २. ३. कदा कलाशेषं for (कलाकदाशेषम्)
४. दिवसस्येष्ट दिने for (दिवसकरस्येष्ट दिने)
५. स्वराद्गणकः for (सराद्गणकः)
(ङ) १. मंशशेषं for (मंशके) ३. 'कदा' लुप्त
धिको (ग) अल्पेधिकल्पः for (अल्पाधिकोधिकल्पे)Wait! Look at the word inside the parenthesis at the end of line 14: Is it(अल्पाधिकोधिकल्पे)or(अल्पाधिकोधिकोल्पे)? Let's read the characters in (अल्पाधिकोधिकल्पे): अ, ल्पा, धि, क, ो, धि, क, ो, ल्पे ? Wait, look at the third-to-last character: Is there a 'को' or just 'क'? Wait! Look at verse line 7: अल्पाधिकेधिकोल्पेक्षेपौWait! Main text has: अल्पाधिकेधिकोल्पे... Wait, let's look at note 2 in line 14:२. अल्पधिकोऽधिको (ग) अल्पेधिकल्पः for (अल्पाधिकोधिकोल्पे)Wait, in line 14, look at the word:अ ल्पा धि के धि को ल्पे क्षे प्तौ- wait, in line 14:(अल्पाधिकोधिकोल्पे)or(अल्पाधिकोधिकल्पे)? Wait, look at line 20: २. अल्पेऽधिकोऽधिकेऽ
( २५४ ) भानोराय शवधा² त्रिचतुर्गुणितान्वशोध्यराश्यंशात्³ । नवर्ति¹ दृष्ट्वा सूर्य⁴ कुर्वन्नावत्सराद्गणकः⁵ ॥ ६१ ॥ भावितके³ तद्घातो विनष्ट¹ वर्णेन तत्प्रमाणानि । ऋत्वेष्टानि² तदाहत वर्णाक्यं⁴ भवति रूपाणि⁵ ॥ ६२ ॥ वर्णप्रमाणभावितघातो⁴ भवतीष्ट¹वर्णासंख्यैवम्² । सिध्यति विनापि भावितसमकरणात्³ किंकृतं तदतः⁵ ॥ ६३ ॥ मूलं¹ द्विधेष्ठ³ ⁶वर्गगुण²गुणादियुत⁷विहीनाच्च⁸ । आद्यवधो³ गुणक गुणः संहात्पवातेन⁴ पमंत्यम्⁵ ॥ ६४¹⁰ ॥
६१. (घ) (वि० इस श्लोक की क्रमसंख्या ६२ है) १. नवर्ति (ग) नर्ति for (नवर्ति)
(ग) २. वधात्रि (ङ) for (वधात्रि) ३. राश्यंशान् for (राश्यंशात्)
(च) १. नर्वति for (नवर्ति) ४. दृष्ट्वा (ङ) for (दृष्टवा)
५. (वि०—यहां क्रमसंख्या ६२ अंकित है) (ङ) १. नर्वति for (नवर्ति)
६२. (घ) (वि०—इसकी श्लोकसंख्या ६३ है) १. विनष्टे (च) for (विनष्ट)
२. कृतवेष्टानि (ग) (च) (ङ) for (ऋत्वेष्टानि)
(ग) ३. भाविक यद्धातो for (भावितके तद्घातो)
(च) ५. (वि०—इसकी क्रमसंख्या ६३ अंकित है)
(ङ) ६. यद्घातो for (तद्घातो)
६३. (घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ६४ है)
(ग) १. भवतीष्ट for (भवतीष्ट) २. संख्यैक्यम् for (संख्यैवम्) ३. काम for (सम)
(च) ४. घातो for (घातो) ५. (वि० इसकी क्रमसंख्या ६४ अंकित है)
६४. (घ) (वि०—इस श्लोक की क्रम संख्या ६५ है)
१. मूलं (ग) for (मूल) २. वर्गाद्गुण (ग) वर्गात् गुणक for (वर्गगुण)
३. आद्य (ग) (च) (ङ) for (आद्यवधो)
४. सहांत्यघातेन (ग) संहृत्य घातेन for (संहात्पवातेन)
५. पमंत्यम् (ग) मन्त्यम् for (पमंत्यम्)
(ग) ३. द्विधेष्ठ for (द्विधेष्ट) ७. गुणादिष्टयुत for (गुणादियुत)
८. विहिनाच्च for (विहीनाच्च) ६. गुण for (गुणः)
(च) २. वर्गाद्गुण for (वर्गगुण) ४. सहांत्यघातेन for (संहांत्यवातेन)
५. पमंत्ययं for (पमंत्यम्) १०. (वि०—इसकी क्रम संख्या ६५ अंकित है)
(ङ) श्री —+ अथ वर्ग प्रकृतिः +
२. वर्गाद् गुणक for (वर्गगुण) ७. गुणादिष्ट for (गुणादि)
४. सहान्त्यघातेन for (संहांत्यवातेन) ५. कृतमन्त्यम् for (पमंत्यम्)
curve: it's 'व्ये', not 'त्ये'!
Yes, "अंत्यपदकृतिव्येका"!
And footnote says:
२. व्यैका (च) (ङ) for (व्येको) - wait, why does footnote say for (व्येको)?
Wait, look at footnote 2:
२. व्यैका (च) (ङ) for (व्येको) or for (व्येका)?
Wait, in line (च):
७. व्यैका for (व्येका)!
In (ग):
२. व्यैका (च) (ङ) for (व्येको) - wait, is the last letter inside parenthesis 'व्येका'?
Look at (व्येको): is it (व्येका)?
Wait, the main text definitely has "व्येका": अंत्यपदकृतिव्येका.
Let's check the apparatus lines:
(blank or decorative line)
Wait, the decorative line is a wavy border:
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
Then: ६५. (घ) (वि०-इस श्लोक की क्रम संख्या ६६ है) १. वज्रवधैक्यं (ग) वज्रमधैक्यं for (वज्ञावाधैक्यं) २. हृते (ग) तुहृते for
( २५६ ) चतुरुनैन्यपद कृताञ्येकयुतेवधदलं पृथग्वे२कम् । व्येकाध्व्यह्तमंत्यं पदवधगुण मन्यदाद्यहृ५दम् ॥ ६८ ॥ १ वर्गं३ गुणकः४ क्षेप; केनचिदुद्धत युतोन५ को दलितः । प्रथमो॑त्ये६ मूलमन्यो गुणरपदोऽद्भु७त प्रथमम् ॥ ६९ ॥२ गुणके५ वर्गच्छिन्ने६ छेदपदे यो धृतपदं१ प्रथमवर्गः२।३ क्षेत्रे४ क्षेपे तन्मूले छेदपद गुणिते ॥ ७० ॥७
६८. (घ) (वि०-इसकी श्लोक संख्या ६६ है) १. त्र्येक for (श्रोक)
२. पृथग् (ग) for (पृथग्) (च) ३. ध्याह (ग) (ङ) for (ध्व्यह)
(ग) ४. चतुरूनोंत्यपदक्रतित्येकयुते for (चतुरुनैन्यपदकृता श्रोकयुते)
५. मन्याद्याद्यपदम् for (मन्यदाद्यपदम्)
(च) १. त्र्येकयुते for (श्रोकयुते) ३. च्छाहत for (ध्व्यहत)
(ङ) ७. कृती for (कृता) १. त्र्येकयुते for (श्रोकयुते)
२. पृथग्यन्येकम् for (पृथग्वे कम्) ५. माद्यमान्त्य for (मन्यदाद्य)
६९. (घ) (वि०-क्रम संख्या ७० है) १. गुणकार (ग) (ङ) for (गुणर)
२. पदोद्धूतः प्रथमम् (ग) धृतप्रथमः for (पदोद्भुत प्रथमम्)
(ग) ३. वर्गेण for (वर्ग) ४ गुणके (च) (ङ) for (गुणकः)
५. दुद्धतो नितोदलतः for (दुद्ध तयुतोनको दलितः)
६. प्रथर्मोत्ये (ङ) for (प्रथर्मोत्ये)
(च) २. पदोद्धूतः for (पदोद्भूत) ७. (वि०-क्रम संख्या ७० अंकित है)
(ङ) ७. युतोनितोदलितः for (युतोनको दलितः)
२. पदोद्धृतः प्रथमः for (पदोद्भुत प्रथमम्)
७०. (घ) (वि०-इसकी क्रमसंख्या ७१ है)
१. घृतं for (घृतपदं) २. प्रथमं for (प्रथम)
३. 'वर्ग' (यह शब्द दूसरी पंक्ति का आरंभिक पद है) ४. छिन्ने for (क्षेत्रे)
(च) ६. वर्गच्छोन्ने for (वर्गच्छिन्ने) १. द्वतपदं for (घृतपदं)
३. वर्ग for (वर्गः) ४. छेन्ने for (क्षेत्रे)
७. (वि०-यहाँ क्रम संख्या ७१ अंकित है)
(ङ) 'वर्गच्छिन्ने गुणके प्रथमं तन्मूलभाजितं भवति ।
वर्गच्छिन्ने क्षेपे तत्पदगुणिते तदा मूले ॥ ७० ॥
for
गुणके वर्गच्छिन्ने छेदपदे यो धृतपदं प्रथमवर्गः।
क्षेत्रे क्षेपे तन्मूले छेद पद गुणिते ॥ ७० ॥
(line 11): ६. सैकं for (सैक)
Look at that ६: it is open at the top-left, curves down, loops at the bottom and curves up to the right.
Now look at line : the digit in १९०२:
It has a closed loop on the left, curving up and then down to the right: that is precisely ९!
Wait, look at it: yes, it is ९! So the year is १९०२!
1902 AD is when Sudhakara Dvivedi's edition was printed in Benares!
"यह श्लोक १९०२ में बनारस से मुद्रित प्रति में ७८ संख्या पर है"
Wait, let's re-examine that digit:
Could someone read it as १६०२? At first glance, a modern reader might mistake it for ६, but it's clearly १९०२ (1902)!
Wait, let's look closely at १९०२:
Top loop on the left, stroke goes up, then loops down to the right. Yes, that is 100% Devanagari ९.
Let's check the line markers and match the layout line by line.
Line 1: ( २५७ )
Line 2: शशिलिप्ता शेषकृतिर्द्विनवति गुणिता अशिति गुणितं वा ।