चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३६३
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३६३ हों वे वस्तु गुरु समझना, जिसमें लघु पक्ष में हो वह वस्तु हल्की समझनी चाहिये । विमर्दक (मांस को नाना प्रकार से बनाने की विधि से), नाना प्रकार के पदार्थों से मिला हुआ, पकाया, आम, क्लिन्न और भूने हुए मेद से गुरु, हृदय के लिये, प्रिय, वीर्यवर्धक और बलवान् पुरुषों के लिये हितकारी है। मलाई वाली दही को खूब मथकर इसमें दालचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, अजवायन, गुड़, अदरक, सोंठ के साथ मिलाकर तैयार की रसाला पुष्टिकारक, वृष्य, वीर्यवर्धक, स्निग्ध, बलकारक, रुचिकारक है। गुड़के साथ दही स्नेहक तृप्तिकारक,हृदय के लिये प्रिय और वातनाशक है। २७४-२७६॥ द्राक्षा-खर्जूर-कोलानां गुरु विष्टम्भि पानकम् ॥ २७७ ॥ परूषकाणां क्षौद्रस्य यच्चेक्षुविकृतिं प्रति । तेषां कट्वम्लसंयोगाः पानकानां पृथक् पृथक् ॥२७८॥ द्रव्यमानं च विज्ञाय गुणकर्माणि निर्दिशेत् । कट्वम्ल-स्वादु-लवणा लघवो रागषाडवाः ॥ २७९ ॥ मुखप्रियाश्च हृद्याश्च दीपना भक्तरोचनाः । आम्रामलकलेहाश्च बृंहणा बलवर्धनाः ॥ २८० ॥ रोचनास्तर्पणाश्चोक्ताः स्नेहमाधुर्यगौरवात् । बुद्ध्वा संयोगसंस्कारं द्रव्यमानं च तच्छ्रितम् ॥ २८१ ॥ गुणकर्माणि लेहानां तेषां तेषां तथा वदेत् । द्राक्षा, खजूर, बेर, फालसा, शहद, गन्ने का रस इनके रस में गुड़ या शर्कर डालकर बनाया हुआ शरबत, गुरु, मल-मूत्र का रोधक होता है। इन शरबतों में कटु या अम्ल वस्तुओं का योग तथा द्रव्य परिमाण जानकर रोग एवं रुचि के अनुसार पृथक् पृथक् रूप में देना चाहिये, इनके गुण कर्म पृथक् २ होजाते हैं । गुड़ के साथ आम रस को पका तेल, सोंठ आदि मिलाकर बनाया रस, वा अनार, दाल, फालसा, जामुन रसादि से बना मधुर पाक 'रागषाडव' कहाता है । वह कटु, अम्ल, स्वादु नमकीन, लघु, स्वादिष्ट, हृदय को प्रिय, अग्निदीपक और खाने में रुचिकर होता है। आम या आंवले के रस से बनाये चाटन, पुष्टिकार्क, बलवर्द्धक, रुचिकारक, तृप्तिकारक, होते हैं, क्योंकि इनमें स्नेह मधुरता और भारीपन होता है। द्रव्यों के संयोग संस्कार (पाक-विधि) और द्रव्यों की मात्रा को चाटने योग्य (लेहों)में देखकर विचार कर गुण कर्म का निश्चय करना चाहिये ॥ २७७-२८१ ॥
विद्याद्वर्गं कृतान्नानामेकाऽशतं भिषक् ॥ २८३ ॥
३६४ चरकसंहिता [ अ० २७ रक्तपित्तकफोक्लेदि शुक्तं वातानुलोमनम् ॥ २८२ ॥ कन्दमूलफलाद्यं च तद्वद्विद्यात्सवासुतम् । शिण्डाकी* चाऽऽसुतं चान्यत् कालाम्लं रोचनं लघु । विद्याद्वर्गं कृतान्नानामेकाऽशतं भिषक् ॥ २८३ ॥ शुक्त (चुक्र)—शुद्ध पात्र में गुड़, शहद, कांजी सहित मस्तु डालकर धान के ढेर में तीन शत रखने से शुक्त या चुक्र तैयार होता है । वह रक्त- पित्तनाशक, कफ को पतला करने वाला, वायु का अनुलोमक होता है । शुक्त में कन्द, मूल फल आदि डाले गये हों तो इसको 'आसुत' कहते हैं । शिण्डाकी (सिरके में काला जीरा आदि डालने से ), आसुत, कालाम्ल (देर तक रखने से जो अम्ल बन गया हो, अम्ल डालने से नहीं) वह रोचक और लघु होता है । इस ग्यारहवें कृतान्नवर्ग का वैद्य अवश्य ज्ञान करे ॥ २८२-२८३ ॥ इति कृतान्नवर्गः । अथाऽऽहारयोगिवर्गः । कषायानुरसं स्वादु सूक्ष्ममुष्णं व्यवायि च । पित्तलं बद्धविण्मूत्रं न च श्लेष्माभिवर्धनम् ॥ २८४ ॥ वातघ्नेषूत्तमं बल्यं त्वच्यं मेधाग्निवर्धनम् । तैलं संयोगसंस्कारात्सर्वरोगापहं मतम् ॥ २८५ ॥ तैलप्रयोगादजरा निर्विकारा जिताश्रमाः । आसन्नतिबलाः संख्ये दैत्याधिपतयः पुरा ॥ २८६ ॥ ऐरण्डतैलं मधुरं गुरु श्लेष्माभिवर्धनम् । वातासृग्गुल्म-हृद्रोग-जीर्ण-ज्वर-हरं परम् । कटूष्णं सार्षपं तैलं रक्तपित्तप्रदूषणम् । कफशुकानिलहरं कण्डूकोठविनाशनम् ॥ २८८ ॥ पियालतैलं मधुरं गुरु श्लेष्माभिवर्धनम् । हितमिच्छन्ति नात्यौष्ण्यात्संयोगे वातपित्तयोः ॥ २८९ ॥ सातस्यं मधुराम्लं तु विपाके कटुकं तथा । उष्णवीर्यं हितं वाते रक्तपित्तप्रकोपणम् ॥ २९० ॥ कुसुम्भतैलमुष्णं च विपाके कटुकं गुरु । विदाहि च विशेषेण सर्वरोगप्रकोपणम् ॥ २९१ ॥
- षाण्डाकी इति च पाठः ।
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३६५
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३६५ फलानां यानि चान्यानि तेषामन्याहारसंविधौ । युज्यन्ते गुणकर्मभ्यां तानि ब्रूयाद्यथाफलम् ॥ २८२ ॥ मधुरो बृंहणो वृष्यो बल्यो मज्जा तथा वसा । यथासत्त्वं तु शैत्योष्णे वसामज्झोर्विनिर्दिशेत् ॥ २८३ ॥ तिल का तैल कषाय अनुरस, स्वादु, सूक्ष्म ( स्रोतों में घुसनेवाला ) उष्ण, व्यवायी, छिद्रों में पहुंचने वाला ( शरीर में फैलनेवाला ), पित्तकारक, मल मूत्र को रोकने वाला है, परन्तु कफ को बढ़ानेवाला नहीं है । वातनाशक ओष- धियों में श्रेष्ठ, बलकारक, त्वचा के लिये हितकारी, बुद्धि, और अग्नि को बढ़ाने वाला है, संयोग एवं संस्कार करने से सब रोगों को नाश करने वाला है। प्राचीन काल में इस तेल के प्रयोग से दैत्याधिपति, बुढ़ापे से रहित, विकार- शून्य, परिश्रम सहन करनेवाले, न थकने वाले, लड़ाई में बहुत बलवान् हुए थे। ( १ ) ऐरण्ड का तेल-मधुर, गुरु, कफ को बढ़ानेवाला, वातरक्त, गुल्म, हृदय रोग, अजीर्ण और ज्वरका नाशक है । सरसो का तेल कटु, उष्ण, रक्त- पित्त को दूषित करने वाला, कफ, शुक्र और वायु को नष्ट करने वाला, कण्डू और कोठ का नाशक है। (सरसो के तेल को खाने से रक्त पित्त दूषित होते हैं, मलने से नहीं ) ( ३ ) पियाल फल ( चिरौंजी ) का तैल मधुर, गुरु, कफ को बढ़ाने वाला और बहुत गरम न होने से वात-पित्त के संम्मिलित विकारों में उत्तम है ( ४ ) अलसी का तेल-मधुर, अम्ल, विपाक में कटु, उष्णवीर्य वात- रोग में हितकारी, रक्त और पित्त को कुपित करने वाला है । ( ५ ) सनिये का तेल-गरम, विपाक में कटु, गुरु, विदाही और सब रोगों को ( दोषों को ) कुपित करने वाला है । जिन फलों से अन्य तैल तैयार किये जाते हैं, उन तैलों के गुण उन्हीं फलों के अनुसार समझने चाहिये । चिरायता तिक्तक, अतिमुक्तक, बिभीतक ( बहेड़ा ) ना रियल, बेर, अख- रोट, जीवन्ती, पियाल ( चिरौंजी ) कुसुंदार, सूर्यवल्ली, त्रपुस, ऐरावारू, ककरि कूष्माण्ड आदि के तेल मधुर, मधुरवीर्य, मधुर विपाक वाले, वात पित्त को शान्त करने वाले, शीतवीर्य, मार्गशोधक, मलमूत्रकारक, अग्निवर्धक होते हैं ( सुश्रुत ) मज्जा और वसा, मधुर रस, पुष्टिकारक, शुक्रवर्धक, बलकारक होता है। इनकी शीतता और उष्णता प्राणियों के अनुसार समझनी चाहिये। जिस प्राणी का मांस उष्ण है उसकी मज्जा भी उष्ण, जिसका मांस शीत उस प्राणी की मज्जा भी शीत समझनी चाहिये ॥ २८४-२६३ ॥ अस्नेहं दीपनं वृष्यमुष्णं वातकफापहम् ॥ २६४ ॥ विपाकेमधुरं हृद्यं रोचनं विश्वभेषजम् ॥
श्लेष्मला मधुरा चार्द्रा गुर्वी स्निग्धा च पिप्पली । सा शुष्का कफवातघ्नी कटूष्णा वृष्यसंमता ॥ २९५ ॥ नात्यर्थमुष्णं मरिचमवृष्यं लघुरोचनम् । छेदित्वाच्छोषणत्वाच्च दीपनं कफवातजित् ॥ २९६ ॥ वातश्लेष्मविबन्धघ्नं कटूष्णं दीपनं लघु । हिङ्गु शूलप्रशमनं विद्यात्पाचनरोचनम् ॥ २९७ ॥ रोचनं दीपनं वृष्यं चक्षुष्यमविदाहि च । त्रिदोषघ्नं समधुरं सैन्धवं लवणोत्तमम् ॥ २९८ ॥ सौक्ष्म्यादौष्ण्याल्लघुत्वाच्च सौगन्ध्याच्च रुचिप्रदम् । सौवर्चलं विबन्धघ्नं हृद्यमुद्गारशोधि च ॥ २९९ ॥ तैक्ष्ण्यादौष्ण्याद् व्यवायित्वाद्दीपनं शूलनाशनम् । ऊर्ध्वं चाधश्च वातानामानुलोम्यकरं बिडम् ॥ ३०० ॥ सतिक्तं कटु सक्षारं तीक्ष्णमुत्क्लेदि चौद्भिदम् । न काललवणे गन्धः सोवर्चलगुणाश्च ते ॥ ३०१ ॥ सामुद्रकं समधुरं, सतिक्तं कटु पांशुजम् । रोचनं लवणं सर्वं पाकि संस्र्यनिलापहम् ॥ ३०२ ॥ हृत्पाण्डु-ग्रहणी-दोष-प्लीहानाह-गलग्रहान् । कासं कफजमर्शांसि यावशूको व्यपोहति ॥ ३०३ ॥ तीक्ष्णोष्णो लघुरूक्षश्च क्लेदी पक्ता विदारणः । दाहनो दीपनश्छेत्ता सर्वः क्षारोऽग्निसंन्निभः ॥ ३०४ ॥ कारव्यः कुञ्चिकाऽजाजी यवानी धान्यतुम्बरु । रोचनं दीपनं वात-कफ-दौर्गन्ध्य-नाशनम् ॥ ३०५ ॥ आहारयोगिनां भक्तिनिश्चयो न तु विद्यते । समाप्तो द्वादशश्चायं वर्ग आहारयोगिनाम् ॥ ३०६ ॥ सोंठ—थोड़ी स्निग्ध, अग्निदीपक, वीर्यवर्धक, गरम, वातकफनाशक, विपाक में मधुर, हृदय के लिये हितकारी, रुचिप्रिय होती है। हरी पिप्पली-कफ- कारक, मधुर, गुरु और स्निग्ध होती है। सूखी पिप्पली कफ वातनाशक कटु, उष्ण, वीर्यवर्धक है। काली मरिच सूखी-बहुत गरम नहीं, वीर्य को न बढ़ाने वाली, लघु, रुचिकारक, छेदन करने वाली, कफ आदि को उखाड़ने वाली और शोषक होने से अग्निदीपक एवं कफ-वातनाशक है। और हरी अवस्था में स्वादु गुरु, कफवर्धक होती है। हींग वायु-कफ विबन्धनाशक, कटु, उष्ण, अग्निदीपक, लघु, शूलनाशक, पाचक और रुचिकर है। सेन्धा नमक—रुचि-
अ० २७] सूत्रस्थानम् ३६७
अ० २७] सूत्रस्थानम् ३६७ कारक, अग्निवर्धक, हृद्य, आँखों के लिये हितकारी, अविदाही, त्रिदोषनाशक, कुछ मधुर और सब नमकों में श्रेष्ठ है। सौवर्चल नमक (संचल नमक)—सूक्ष्म, उष्ण, कटु होने से तथा सुगन्धि होने से रुचिदायक, विबन्धनाशक, हृद्य, उद्गार (डकार) को शोधन करने वाला है। विड (काला नमक)—तीक्ष्ण, उष्ण और व्यवायी (शरीर में फैलने वाला होने से) अग्निदीपक, शूलनाशक, एवं वायु को ऊपर या नीचे, अधोमार्ग दोनों से अनुलोमन करने वाला है। उद्भिद् नमक-तिक्त, कटु, क्षारयुक्त, तीक्ष्ण उत्क्लेदि अर्थात् वमन की रुचि करने वाला है। काले लवण के गुण संचल नमक के समान हैं, परन्तु इस में संचल के समान गन्ध नहीं होती। समुद्र के पानी से तैयार किया नमक मधुर है। पांशुज (सज्जी) जिससे धोबी कपड़ा धोते हैं, ऐसी मिट्टी से तैयार किया नमक कटु और तिक्त होता है। सब प्रकार के नमक रुचिकारक, अन्न या व्रण को पकाने वाले; संस्री और वात- नाशक हैं। जौ-क्षार—हृदय, पाण्डु, ग्रहणी रोग, प्लीहा, आनाह, गलरोग, कफजन्य कास और अर्शरोग को नष्ट करते हैं। सब प्रकार के क्षार (टंकण, सज्जी, पापड़ खार आदि) तीक्ष्ण, उष्ण, लघु, रूक्ष, क्लेदि, अन्न और व्रण को पकाने वाले, पके हुए व्रण को फाड़ने वाले, जलाने वाले, अग्निवर्द्धक, कफ आदि का छेदन करने वाले अग्नि के समान गुण वाले (उष्ण) होते हैं। कारवी (काला जीरा,) कुंचीका (मोटा जीरा) ये रुचिकर अग्नि-दीपक, वात, कफ, दुर्गन्ध को नाश करने वाले हैं। खान पान में किन किन द्रव्यों का व्यवहार होता है या होना चाहिये इसका निश्चय करना कठिन है, कोई एक नियम नहीं बन सकता, क्योंकि प्रत्येक मनुष्य की रुचि भिन्न भिन्न है। यह बारहवां आहारयोगी द्रव्यों का वर्ग भी समाप्त हुआ ॥ २४४-३०६ ॥ इत्याहारयोगिवर्गः । शूकधान्यं शमीधान्यं समातीतं प्रशस्यते । पुराणं प्रायशो रूक्षं प्रायेणाभिनवं गुरु ॥ ३०७ ॥ यद्यदागच्छति क्षिप्रं तत्तल्लघुतरं स्मृतम् । निस्तुषं युक्तिसृष्टं तु सुप्यं लघु विपच्यते ॥ ३०८ ॥ शूकधान्य (चावल, गेहूँ आदि), शमीधान्य (मूंग, मसूर, उड़द आदि) ये एक साल पुराने प्रशस्त हैं। प्रायः करके पुराने धान्य रूक्ष होते हैं।
जो धान्य बोने पर जल्दी उग आता है (जैसे ग्रीष्म ऋतु के साठी चावल ) वह हल्का होता है और मूंग आदि दाल की वस्तुओं को सुस्वेदित करके छिलका उतारकर थोड़ा भून लिया जावे तो ये लघु हो जाते हैं ॥ ३०७-३०८ ॥ मृतं कृशातिमेद्यं च वृद्धं बालं विषैर्हतम् । अगोचरमृतं व्याडसूदितं मांसमुत्सृजेत् ॥ ३०९ ॥ अतोऽन्यथा हितं मांसं बृंहणं बलवर्धनम् । प्रीणनः सर्वधातूनां हृद्यो मांसरसः परम् ॥ ३१० ॥ शुष्यतां व्याधिमुक्तानां कृशानां क्षीणरेतसाम् । बलवर्णार्थिनां चैव रसं विद्याद्यथाऽमृतम् ॥ ३११ ॥ सर्वरोगप्रशमनं यथास्वं विहितं रसम् । विद्यात्स्वयं बलकरं वयोबुद्धीन्द्रियायुषाम् ॥ ३१२ ॥ व्यायामनित्याः स्स्रीनित्या मद्यनित्याश्च ये नराः । नित्यं मांसरसाहारा नाऽऽतुराः स्युन दुर्बलाः ॥ ३१३ ॥ त्याज्य मांस— मरा हुआ, कृश दुर्बल प्राणी का, बहुत चर्बी वाला, बूढ़े पशु का, बालक का, विष द्वारा मारा, अगोचरमृत अर्थात् अपने स्वाभाविक स्थान को छोड़कर दूसरे प्रदेश में पले ( जलीय देश के प्राणी को मरुस्थल में पोषण करने पर ), व्याड अर्थात् व्याघ्र या सांप आदि हिंसक पशुओं से मारे हुए पशु का मांस त्याज्य है। इससे विपरीत प्रकार का मांस हितकारी, शरीर का पोषक, बलकारक है। मांस रस, पुष्टिदायक, सब प्राणियों के लिये हितकारी, हृदय को प्रिय होता है। सूखते हुए, कृश होते हुए, रोग से उठे हुए, निर्बल, शुक्र जिनका क्षीण हो गया है, बल या कान्ति को चाहने वाले पुरुषों के लिये मांस रस अमृत के समान है। मांस रस सब रोगों को शान्त करने वाला है, स्वर के लिये उत्तम, आयुवर्धन, बुद्धि और इन्द्रियों के लिये हितकारी एवं बलकारक है। जो पुरुष नित्य प्रति व्यायाम करते, स्त्री संग करते, शराब पीते हैं और नित्य प्रति मांस रस का सेवन करते हैं, वे न रोगी होते और न निर्बल होते हैं ॥ ३०९-३१३ ॥ कृमिवातातपहृतं शुष्कं जीर्णमनातर्वम् । शाकं निःस्नेहसिद्धं च वर्ज्यं यच्चापरिस्रुतम् ॥ ३१४ ॥ पुराणमामं संक्लिष्टं कृमिव्याडहिमातपैः । अदेशकालजं क्लिन्नं यत्स्यात्तच्छमसाधु तत् ॥ ३१५ ॥
- उन्माद रोग में मांस का निषेध है—यथा 'उन्मादे पिशुतामिक्षाशी चा'
अ० २७ ] २४ सूत्रस्थानम् [ ३४५
अ० २७ ] २४ सूत्रस्थानम् [ ३४५ हरितानां यथाशाकं निर्देशः साध्वसाधुषु । मद्याम्बुगोरसादीनां स्वे स्वे वर्गे विनिश्चयः ॥ ३१६ ॥ त्याज्य शाक—कृमि, वात, धूप से मरा (सूखा), शुष्क, पुराना, ऋतु में उत्पन्न नहीं हुआ, और जो शाक बिना स्नेह (घी या तेल) के तैयार किया गया हो और जिसका कि भांप कर पानी न निकाल दिया गया हो, वह शाक त्याज्य है । जो फल पुराना, (बहुत पका), कच्चा, सड़ा, कृमि सर्प या हिंसक पशु से खाया हुआ हो, बर्फ या धूप से खराब हो, भले देश में उत्पन्न न हुआ, क्लिन्न (सड़ा) हो वह फल उत्तम नहीं। पकाने की विधि को छोड़कर हरित- वर्ग को शाकों की भांति समझना चाहिये । अर्थात् इनमें पानी का निचोड़ना, घी आदि में संस्कारित करना नहीं है। मद्य, जल, दूध आदि के अच्छे-बुरे का निश्चय इनके अपने अपने वर्ग में कर दिया है ॥ ३१४-३१६ ॥ यदाहारगुणैः पानं विपरीतं तदिष्यते । अन्नानुपानं धातूनां दृष्टं यन्न विरोधि च ॥ ३१७ ॥ आसवानां समुद्दिष्टा अशीतिश्चतुरोत्तरा । जलं पेयमपेयं च परीक्ष्यानुपिबेद्धितम् ॥ ३१८॥ स्निग्धोष्णं मारुते शस्तं पित्ते मधुरशीतलम् । कफेऽनुपानं रूक्षोष्णं, क्षये मांसरसः परम् ॥ ३१९ ॥ उपवासाध्व-भाष्य-स्त्री मारुतातप-कर्मभिः । श्रान्तानामनुपानार्थं पयः पथ्यं यथाऽमृतम् ॥ ३२० ॥ सुरा कृशानां पुष्ट्यर्थमनुपानं प्रशस्यते । कार्श्यार्थं स्थूलदेहानामनुशस्तं मधूदकम् ॥ ३२१ ॥ अल्पाग्नीनामनिद्राणां तन्द्रा-शोक-भय-क्लमैः । मद्यमांसाचितानां च मद्यमेवानुशस्यते ॥ ३२२॥ अथानुपानकर्म प्रवक्ष्यामि-अनुपानं तर्पयति, प्रीणयति, ऊर्जयति, पर्याप्तिमभिनिर्वर्तयति, भुक्तमवसादयति, अन्नसंघातं भिनत्ति, मार्दव- मापायति, क्लेदयति, जरयति, सुखपरिणामितामाशुव्यवायितां चाऽऽ- हारस्योपजनयतीति ॥३२३॥ अनुपान—जो पेय पदार्थ आहार गुण के विपरीत (यथा-उष्ण आहार के पीछे शीत अनुपान*) तथा जो धातुओं का विरोधी न हो अपितु साम्य करने
- अनु-पश्चात्-भोजनात् इत्यर्थः, पानं जलादिपानम् ।। दाह के पीछे मधुर, दूध वा खीर के पीछे कांजी (खट्टा) अनुपान न देवें, इसलिये कि धातुओं का विरोधी न हो ।
वाला हो, वह अनुपान प्रशस्त है। 'यज्जःपुरुषीय' अध्याय में चौरासी प्रकार के आसव कहे हैं। जल पीना हितकारी है, या नहीं इसका विचार करके हितकारी जल पीना चाहिये। वायुदोष में स्निग्ध और उष्ण; पित्तविकार में मधुर और शीतल; कफ में रूक्ष एवं उष्ण तथा क्षय में रस का अनुपान श्रेष्ठ है। उपवास से, मार्ग चलने से ऊँचे या बहुत बोलने से स्त्रीसंग, वायु, धूप या पंच कर्मों के कारण जो थके हुए हों, उनको अनुपान देने के लिये दूध अमृत के समान पथ्य, हितकारी है। मोटे शरीर वालों को पतला बनाने के लिये पानी में शहद मिलाकर देना उत्तम है। जिनको मन्दाग्नि हो, नींद न आती हो, तन्द्रा, शोक, भय, श्रम से थके, मद्य मास सेवन करने वालों के लिये मद्य अनुपान ही श्रेष्ठ है। अनुपान के कर्म (गुण) कहते हैं—अनुपान शरीर का तर्पण करता है, शरीर को और जीवन को पुष्ट करता है, तेज बढ़ाता है, खाये हुए भोजन से मिलकर शरीर में मिल जाता है, खाये हुए को पचाता है, मिले हुए अन्न को तोड़ता, पृथक् पृथक् करता है। शरीर में कोमलता है, आहार को क्लिन्न करता, पचाता और सुख पूर्वक पचाकर शीघ्र शरीर में व्याप्त कर देता है ॥ ३२३॥ भवति चात्र—अनुपानं हितं युक्तं तर्पयत्याशु मानवम् । सुखं पचति चाऽऽहारमायुषे च बलाय च ॥ ३२४ ॥ योग्य हितकारी अनुपान मनुष्य को शीघ्र तर्पण कर देता है। भोजन को सुखपूर्वक पचाता है और आयु एवं बल को बढ़ाता है ॥ ३२४ ॥ नोर्ध्वाङ्गमारुताविष्टा न हिक्का-श्वास-कासिनः । न गीत-भाष्याध्ययन-प्रसक्ता नोरसि क्षताः ॥ ३२५ ॥ पिबेयुरुदकं भुक्त्वा, तद्धि कण्ठोरसि स्थितम् । स्नेहमाहारजं हत्वा भूयो दोषाय कल्पते ॥ ३२६ ॥ अनुपानैकदेशोऽयमुक्तः प्रायोपयोगिकः । द्रव्यं तु न हि निर्दिष्टुं शक्यं कार्त्स्न्येन नामभिः ॥ ३२७ ॥ यथा नानौषधं किंचिद्देशजानां वचो यथा । द्रव्यं तत्तत्तथा वाच्यमनुक्तमिह यद्भवेत् ॥ ३२८ ॥ किनको अनुपान नहीं करना चाहिये—कण्ठ, छाती, शिर, (ऊर्ध्वांग) में जब वायु का जोर हो, जिनको हिचकी, श्वास, कास रोग हों, गीत, भाषण, अध्ययन में जो लगे रहते हों, जिनकी छाती में चोट लगी हो इनको भोजन
करके यानी अनुपान रूप में नहीं पीना चाहिये । इस अवस्था में पिया पानी कण्ठ, छाती ( आमाशय ) में स्थित आहारजन्य स्नेह को दूषित करके नाना प्रकार के रोग उत्पन्न करता है । प्रायः उपयोग में आने वाले आहार, खान-पान का कुछ भाग यहाँ पर कह दिया है । खानपान के सब द्रव्यो का नाम से कथन करना सम्भव नहीं है, जिस प्रकार की कोई भी औषध रहित वनस्पति नहीं, जिस प्रकार देश वाले उसे जैसा गुणकारी या हानि कारक कहते हों, उसके अनुसार यहां पर न कहे हुए द्रव्य को समझना चाहिये । गुणज्ञान के विषय में और भी कहते हैं ॥३२८॥ चरः शरीरावयवाः स्वभावो धातवः क्रिया । लिङ्गं प्रमाणं संस्कारो मात्राचात्र परीक्ष्यते ॥ ३२९ ॥ चरोऽनूप-जलाकाश-धन्वाद्यो भक्ष्यसंविधिः । जलजानूपजांश्चैव जलानूपचराश्च ये ॥ ३३० ॥ गुरुभक्ष्याश्च ये सत्त्वाः सर्वे ते गुरवः स्मृताः । लघुभक्ष्यास्तु लघवो धन्वजाधन्वचारिणः ॥ ३३१ ॥ शरीरावयवाः सक्थि-शिर-स्कन्धाद्यस्तथा । सक्थिमांसाद् गुरुः स्कन्धस्ततः क्रोडस्ततः शिरः ॥ ३३२ ॥ वृषणौ चर्ममेढ्रं च श्रोणी वृक्कौ यकृद् गुदम् । मांसाद् गुरुतरं विद्याद्यथास्वं मध्यमस्थि च ॥ ३३३ ॥ स्वभावाल्लघवौ मुद्गास्तथा लावकपिञ्जलाः । स्वभावाद् गुरवो माषा वराहमहिषास्तथा ॥ ३३४ ॥ धातूनां शोणिताद्यानां गुरुं विद्याद्यथोत्तरम् । अलसेभ्यो विशिष्यन्ते प्राणिनो ये बहुक्रियाः ॥ ३३५ ॥ गौरवं लिङ्गसामान्ये पुंसां स्त्रीणां च लाघवम् । महाप्रमाणा गुरवः स्वजातौ लघवोडन्यथा ॥ ३३६ ॥ चर ( जिस स्थान पर विचरता है ), शरीरावयव ( शरीर का अंग ), स्वभाव ( प्रकृति ), धातु ( रस, रक्तादि धातु ), क्रिया, लिंग, प्रमाण, संस्कार, मात्रा ये बातें गुरु लघु विचार करने में देखनी चाहिये । चर, गति रूपचर और भक्ष्य रूप चर भेद से दो प्रकार के हैं । इनमें गति रूप चर आनूप अर्थात् जलबहुल प्रदेश में विचरने वाले, आकाश में, धन्व देश में तथा जल आनूप दोनों देशों में विचरने वाले हैं । भक्ष्य रूप चर गुरु, शीतल पदार्थ
३७२ चरकसंहिता [ अ० २७ खाते हैं ऐसे दोनों प्रकार के प्राणी गुरु होते हैं। धन्व प्रदेश में उत्पन्न या धन्व (रेतीले) देश में विचरने वाले तथा लघु भोजन करने वाले प्राणी लघु होते हैं। जांघ, शिर, स्कन्ध आदि शरीर के अवयव हैं। इनमें जंघा से स्कन्ध, स्कन्ध से क्रोड़ और क्रोड़ से शिर, का मांस गुरु होता है। शिर से वृषण और वृषण से इनका चर्म, फिर शिश्न, फिर श्रोणी भाग, फिर वृक्क (गुर्दे) और फिर यकृत्, उसके पीछे गुर्दा और पीछे मध्यास्थि (मज्जा या अस्थि के ऊपर का मांस) गुरु होता है। स्वभाव या प्रकृति से मूंग, बटेर कपिंजल लघु होते हैं और उड़द, सूअर, भैंस ये गुरु होते हैं। धातुओं में रक्त मांस, और मेद ये क्रमशः उत्तरोत्तर गुरु होते जाते हैं। जो प्राणी बहुत चेष्टाशील होते हैं, वे आलसी स्वभाव वाले प्राणियों से भिन्न अर्थात् लघु होते हैं (आलसी प्राणी गुरु होते हैं) लिंग की दृष्टि से नर गुरु और मादा पशु लघु होते हैं, (पशुओ में यह नियम है, परन्तु पक्षियों में नर लघु होता है।) अपनी जाति में बड़े शरीर वाले गुरु और छोटे शरीर के प्राणी लघु होते हैं ॥ ३२६-३३६ ॥ गुरुणां लाघवं विद्यात्संस्कारात्सविपर्ययम् । व्रीहेर्लाजा यथा च स्युः सक्तूनां सिद्धपिण्डिकाः ॥ ३३७ ॥ अल्पादाने गुरूणां च लघूनां चातिसेवने । मात्राकारणमुद्दिष्टं द्रव्याणां गुरुलाघवे ॥ ३३८ ॥ गुरूणामल्पमादेयं लघूनां तृप्तिरिष्यते । मात्रां द्रव्याण्यपेक्षन्ते मात्रा चाग्निमपेक्षते ॥ ३३९ ॥ बलमारोग्यमायुश्च प्राणाश्चाग्नौ प्रतिष्ठिताः । अन्नपानेन्धनैश्चाग्निर्दीप्यते शाम्यतेऽन्यथा १ ॥ ३४० ॥ गुरुलाघवचिन्तेयं प्रायेणाल्पबलान् प्रति । मन्दक्रियाननारोग्यान् सुकुमारान् सुखोचितान् ॥ ३४१ ॥ दीप्ताग्नयः खराहाराः कर्मनित्या महादराः । ये नराः प्रति ताँश्चिन्त्यं नावश्यं गुरुलाघवम् ॥ ३४२ ॥ संस्कार द्वारा गुरु पदार्थ लघु और लघु पदार्थ गुरु बन जाते हैं। जैसे व्रीहि (धान्य) स्वभाव से गुरु हैं, परन्तु लाजा के रूप में लघु बन जाते हैं और सत्तू स्वभाव से लघु होने पर भी उनकी आग से पकाई पिण्डिकायें १. ज्वल्यति व्येति चाम्यथा इति वा पाठः ।
अ० २७] सूत्रस्थानम् २७३
अ० २७] सूत्रस्थानम् २७३
गुरु होजाती हैं। गुरु पदार्थों को थोड़ा और लघु पदार्थों को अधिक सेवन करने से वे गुरु हो जाते हैं। इसलिये गुरु लघुता के निश्चय करने में भी मात्रा कारण है। गुरु पदार्थों को थोड़ा लेना और लघु पदार्थों को तृप्तिपूर्वक खाना चाहिये जिससे पेट फूल न जाय, श्वास चढ़ने न लगे। द्रव्य, मात्रा अर्थात् परिमाण की अपेक्षा करते हैं और मात्रा अग्नि की अपेक्षा करती है। बल, आरोग्यता, आयु और प्राण अग्नि पर आश्रित हैं—अग्नि के अधीन हैं। अन्न पान (खान, पान) रूपी इन्धन से अग्नि प्रदीप्त होती है, और खान पान के न मिलने से वह बुझ जाती है, शान्त होजाती है। जो पुरुष अल्प बल वाले हों, मन्द क्रिया, मन्द-चेष्टावाले, अनारोग्य, रोगी, सुकुमार अर्थात् नाजुक प्रकृति, के आराम का जीवन व्यतीत करने वाले हैं उनके विषय में गुरु-लघु का विचार करना चाहिये। जिनकी अग्नि प्रबल हो, जो कठिन आहार को भी पचा सकते हों, नित्य मेहनत करने वाले, बड़े पेट वाले, जिनकी अग्नि बढ़ी हुई हो उनके विषय में गुरु-लघु का विचार करने की आवश्यकता नहीं है ॥ ३३७-३४२ ॥ द्विसाभिर्जुहुयान्नित्यमन्तराग्निं समाहितः । अन्नपानसमिद्भिर्ना मात्राकालौ विचारयन् ॥ ३४३ ॥ आहिताग्निः सदा पथ्यान्यन्तराग्नौ जुहोति यः । दिवसे दिवसे ब्रह्म जपत्यथ ददाति च ॥ ३४४ ॥ नरं निःश्रेयसे युक्तं सात्म्यज्ञं पानभोजने । भजन्ते नाऽऽमयाः केचिद्भाविनोऽप्यन्तरादृते ॥ ३४५ ॥ षट्त्रिंशतं सहस्राणि रात्रीणां हितभोजनः । जीवत्यनातुरो जन्तुर्जितात्मा संमतः सताम् ॥ ३४६ ॥ मनुष्य को चाहिये कि मात्रा और काल का विचार करके, हितकारी खान- पान रूपी समिधाओं से अन्तराग्नि में नित्यप्रति संयमित चित्त से हवन करे। जो आहिताग्नि हवन करने वाला नित्य प्रति दोनों समय अन्तराग्नि में हितकारी अन्न की आहुति देकर ब्रह्म (ओंकार) का जप करता है और यथाशक्ति दान करता है, जिसको खान-पान सम्बन्धी सात्म्य का ज्ञान होता है, ऐसे पुण्यवान् पुरुष को कारण के बिना कभी भी रोग नहीं होते। इसी प्रकार संचित धर्म के प्रभाव से जन्मान्तर में भी रोग नहीं होते। हितकर आहार करने वाला व्यक्ति ३६००० रात्रि (१०० वर्ष) पर्य्यन्त नीरोगी, जितेन्द्रिय, और सज्जनों से पूजित होकर निवास करता है ॥ ३४३-३४६ ॥
लौकिकं कर्म यद्वृत्तौ स्वर्गौ यच्च वैदिकम् ॥ ३४८ ॥
१७४ चरकसंहिता [ अ० २८ भवन्तश्चात्र— प्राणाः प्राणभृतामन्नमन्नं लोकोऽभिधावति । वर्णः प्रसादः सौस्वर्यं जीवितं प्रतिभा सुखम् ॥ ३४७ ॥ तुष्टिः पुष्टिर्बलं मेधा सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् । लौकिकं कर्म यद्वृत्तौ स्वर्गौ यच्च वैदिकम् ॥ ३४८ ॥ कर्मापवर्गे यच्चोक्तं तच्चाप्यन्ने प्रतिष्ठितम् । अन्न, सब प्राणियों का प्राण है, सारा संसार इसी अन्न की याचना करता है (पेट के लिये आदमी सब कुछ करता है)। अन्न में ही वर्ण, शरीर की प्रसन्नता, सुस्वरता, जीवन, प्रतिभा, सुख, तुष्टि, हर्ष, पोषण, बल, मेधा, ये सब बातें स्थिर हैं। सांसारिक कर्म, तथा स्वर्ग प्राप्ति में यज्ञादि जो वैदिक मोक्षदायक यज्ञ, तप आदि कर्म हैं, वे सब अन्न में प्रतिष्ठित हैं ॥ ३४७-३४८ ॥ तत्र श्लोकः—अन्नपानगुणाः साम्या वर्गा द्वादश निश्चिताः ॥ ३४९ ॥ सगुणान्यनुपानानि गुरुलाघवसंग्रहः । अन्नपानविधावुक्तं तत्परीक्ष्यं विशेषतः ॥ ३५० ॥ इस अन्नपान नामक अध्याय में, अन्न-पान के गुण, बारह वर्गों में कह दिये हैं। अनुपान के गुण, गुरु एवं लघु विषय का निरूपण किया है, इस विधि को विचार कर प्रयोग करना चाहिये ॥ ३४९-३५० ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने अन्नपानविधिर्नाम सप्तविंशतितमोऽध्यायः ॥ २७ ॥
अष्टाविंशोऽध्यायः अथातो विविधाशितपीतीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब से 'विविधाशित-पीतीय' अध्याय का व्याख्यान करेंगे । जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विविधमशित-पीत-लीढ-खादितं जन्तोर्हितमन्तरग्निसन्धुक्षितबलेन यथास्वेनोष्मणा सम्यग्विपाच्यमानं कालवदनवस्थितसर्वधातुपाकमनु- पहतसर्वधातूष्ममारुतस्रोतस् केवलं शरीरमुपचय-बल-वर्ण-सुखायुषा योजयति, शरीरधातूनूर्जयति । धातवो हि धात्वाहाराः प्रकृतिमनु- वर्तन्ते ॥ ३ ॥
अ० २८ ] सूत्रस्थानम् ३७५
अ० २८ ] सूत्रस्थानम् ३७५
मनुष्य का खाया, पीया, चाटा या चबाकर हाथों से खाया भोजन, नाना
प्रकार का हितकारी पदार्थ, जाठराग्नि के प्रदीप्त बल के कारण, तथा पृथ्वी,
जल, तेज, वायु और आकाश इन पांच महाभूतों की अपनी-अपनी गरमी से
(पृथ्वी आदि के गुण वाले) आहार द्रव्यों का पाचन होता है । इस प्रकार से
पचा हुआ अन्न काल की भांति नित्य निरन्तर गति करता हुआ, सब धातुओं
के निरन्तर पाक होने से जिस शरीर में क्षीणता उत्पन्न होरही है उस शरीर की
तथा जिस शरीर में सब धातुओं की गरमी बनी हुई है, और वायुवह स्रोत
जिस शरीर में उपस्थित हैं, ऐसे सम्पूर्ण शरीर को वृद्धि करने के साथ साथ
बल, वर्ण, सुख और आयु देता है, तथा शरीर के धातुओं को तेज प्रदान
करता है । धातु ही जिनका भोजन है ऐसे रसादि धातु नित्य प्रति क्षीण होते
हुए लाये हुए भोजन रूपी धातु को लाकर स्वस्थ अवस्था में रहते हैं ॥ ३ ॥
तत्राऽऽहारप्रसादाख्यो रसः किट्टं च मलाख्यमभिनिर्वर्तते; किट्टात्
स्वेद-मूत्र-पुरीष-वात-पित्त-श्लेष्माणः कर्णाक्षि-नासिकास्य-लोम-कूप-प्रज-
नन-मलाः केश-श्मश्रु-लोम-नखादयश्चावयवाः पुष्यन्ति। पुष्यन्ति त्वाहार-
रसात् रस-रुधिर-मांस-मेदोऽस्थि-मज्ज-शुक्रौजंसि पञ्चेन्द्रियद्रव्याणि धा-
तुप्रसादसंज्ञकानि शरीर-सन्धि-बन्ध-पिच्छादयश्चावयवाः ते सर्वे एव धा-
तवोमलाख्याः प्रसादाख्याश्च रसमलाभ्यां पुष्यन्तः स्वं मानमनुवर्तन्ते
यथावयः शरीरम्। एवं रसमलौ स्वप्रमाणावस्थितौ आश्रयस्य सम
धातोर्धातुसाम्यमनुवर्तयतः; निमित्ततस्तु क्षीणवृद्धानां प्रसादाख्यानां
धातूनां वृद्धिक्षयाभ्यामाहारमूलाभ्यां रसः साम्यमुत्पादयत्यारोग्याय,
किट्टं च मलानामेवमेव। स्वमानातिरिक्ताः पुनरुत्सर्गिणः शीतोष्णपर्य-
यगुणैश्चोपचर्यमाणा मलाः शरीरधातुसाम्यकराः समुपलभ्यन्ते। तेषां
तु मलप्रसादाख्यानां धातूनां स्रोतांस्ययनमुखानि; तानि यथाविभागेन
यथास्वं धातूनापूरयन्ति। एवमिदं शरीरमशित-पीत-लीढ-खादित-
प्रभवम्, अशित-पीत-लीढ-खादित-प्रभवाश्चास्मिन् शरीरे व्याधयो
भवन्ति; हिताहितोपयोगविशेषास्त्वत्र शुभाशुभविशेषकरा भव-
न्तीति ॥ ४ ॥
इस आहार से तीन वस्तुएं बनती हैं एक प्रसाद रूपी रस, २. किट्ट, आहार
भाग और ३. मल। इनमें किट्ट भाग के पसीना, मूत्र, मल, वायु, पित्त,
कफ और कान, आंख, नाक, मुख, रोम, कूप और शिश्न के मल उत्पन्न
होते हैं। तथा केश, दाढ़ी, मूंछ, रोम (शरीर के बाल) और नख आदि अङ्ग-
३७६ चरकसंहिता [ अ० २८ सब पुष्ट होते हैं। आहार के प्रसाद रूपी रसभाग से, रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र, ओज तथा पृथ्वी, अ_, तेज, वायु, आकाश (ये पंच महाभूत तो इन्द्रियों को बनाने वाले हैं) अत्यन्त शुद्ध रूप में स्थित धातु, शरीर को बांधने वाली स्नायु, सिरा आदि, सन्धियां, आर्तव और दूध बनाते हैं। ये सब मल नामक धातु या प्रसाद रूप धातु रस और मल द्वारा पुष्ट होते हुए आयु के अनुसार अपने परिणाम में बनते हैं (अथवा कृश, स्थूल, छोटे, बड़े में अपने परिणाम से बनते हैं)। *
- आहार के रसादि धातु में बदलने के विषय में एक पक्ष यह है कि रस, रक्त धातु में बदलता है और रक्त, मांस में, इस प्रकार आगे परिवर्तन- होता जाता है। जिस प्रकार दही जमते हुए सम्पूर्ण दूध दही रूप में बदलता है, इसी प्रकार सम्पूर्ण रस रक्त रूप में बदल जाता है और रक्त मांस में इसी प्रकार आगे। दूसरे आचार्य इस परिवर्तन को 'केदार-कुल्यान्याय' से मानते हैं। अर्थात् खेत में बहतो पानी की धार में से प्रत्येक क्यारी अपना २ पानी ले लेती है इसी प्रकार यहां पर भी अन्न से उत्पन्न रस, रस धातु में जाकर कुछ भाग से रस बन जाता है और शेष रस भाग रक्त में जाकर रक्त के गन्ध, वर्ण से मिल कर रक्त बन जाता है और शेष रस भाग आगे मांस धातु में पहुंचता है, वहां मांस के गन्ध-वर्ण में मिलकर मांस बन जाता है, और इससे अवशिष्ट रस भाग मेद में चला जाता है, वहां भी पूर्व की भाँति क्रिया होती है। इसी प्रकार आगे २ चलता जाता है। तीसरे पक्ष वाले कहते हैं कि-अन्न रस पृथक् २ धातुमार्ग में जाकर रसादि धातुओं का पोषण करता है, यह नहीं कि इस धातु को पोषण करने वाला ही रक्त धातु में जाता है। रस आदि को पोषण करने वाले स्रोत उत्तरोत्तर सूक्ष्म मुख वाले और लम्बे हैं। इस प्रकार से रस को पोषण करने वाला भाग रसमार्ग में गमन करके रस का पोषण करता है, एवं रक्त का पोषण करने के पीछे रक्त पोषक मार्ग में जाने से रक्त का पोषण करता है, इस प्रकार रक्त का पोषण करने के पीछे मांस को पोषण करने वाला रस भाग दूर एवं सूक्ष्म मार्ग में गमन करने से मांस का पोषण करता है। इसी प्रकार आगे मेद आदि का पोषण हो जाता है। इस पक्ष में दूध आदि वृष्य वस्तुओं से उत्पन्न रस प्रभाव से शीघ्र ही शुक्र से मिलकर शुक्र का पोषण कर देता है, इसी प्रकार वृद्धावस्था में भी एक दोष के दुष्ट होने से अन्य धातु दुष्ट नहीं होते, परन्तु परिणाम पक्ष में रस-धातु के दुष्ट होने से रक्त आदि धातु भी दूषित हो जाते हैं, इसके अतिरिक्त परिणाम पक्ष में तीन चार उपवास से शरीर की मृत्यु होनी चाहिये और एक मास के दुग्धसेवन से ही सम्पूर्ण
सं० २८ ] सूत्रस्थानम् ३४७
सं० २८ ] सूत्रस्थानम् ३४७
इस प्रकार से शरीर के अपने स्वरूप में ( न अधिक और न कम परिमाण में ) स्थित होने पर धातु-साम्यावस्था में रहते हैं। प्रसाद रूप धातुओं का क्षय या वृद्धि जो निमित्त को लेकर होती है, वह आहार के कारण ही होती है, इस- लिये आहार द्वारा वृद्धि और क्षय का सात्म्य उत्पन्न होकर आरोग्यता उत्पन्न होती है इसी प्रकार किट्ट और मल भी शरीर के आरोग्य सम्पादन में सहायक होते हैं। अपने परिमाण से अधिक बढ़े हुए किट्ट और मल को बाहर निकाल कर तथा शीत से उत्पन्न मल में उष्ण, उष्ण से उत्पन्न मल में शीत परिचर्या से मल शरीर के धातुओं को समानावस्था में रखते हैं। इन मल अर्थात् प्रसाद नामक धातुओं के स्रोत गमन करने के मार्ग हैं और ये स्रोत जो जो जिन जिनके हैं उन उन धातुओं को पूर्ण करते हैं। इस प्रकार से यह सम्पूर्ण शरीर खाये, पिये, चाटे, चाले आहार रूपी रस से पूर्ण होता है। और रोग भी इस शरीर में खाये, पिये, चाटे आदि भोजन से उत्पन्न होते हैं। इसमें हित वस्तुओं का उपयोग शुभकारी और अहित वस्तुओं का उपयोग अशुभकारी होता है ॥ ४ ॥
एवं वादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—दृश्यन्ते हि भगवन् ! हितसमाख्यातमप्याहारमुपयुञ्जाना व्याधिमन्तश्चागदाश्च, तथैवाहित- समाख्यातम्, एवं दृष्टे कथं हिताहितोपयोगविशेषात्मकं शुभाशु- भविशेषमुपलभामह इति ॥ ५ ॥
तमुवाच भगवानात्रेयः—न हिताहारोपयोगिनामग्निवेश ! तन्निमित्त- व्याधयो जायन्ते, न च केवलं हिताहारोपयोगादेव सर्वं व्याधिभयमति- क्रान्तं भवति, सन्ति हि ऋतेऽप्यहिताहारोपयोगादन्या रोगप्रकृतयः, तद्यथा—कालविपर्ययः, प्रज्ञापराधः, परिणामश्च, शब्द- स्पर्श-रूप-रस- गन्धाश्चासात्म्या इति, ताश्च रोगप्रकृतयो रसान् सम्यगु- पयुञ्जानमपि पुरुषमशुभेनोपपादयन्ति, तस्माद्धिताहारोपयोगिनोऽपि दृश्यन्ते व्याधिमन्तः । अहिताहारोपयोगिनां पुनः कारणतो न सद्यो दोषवान् भवत्यपचारः, न हि सर्वाण्यपथ्यानि तुल्यदोषाणि, न च सर्वे दोषास्तुल्यबलाः, न च सर्वाणि शरीराणि व्याधिक्षमत्वे समर्थानि भवन्ति, तदेव ह्यपथ्यं देश-काल-संयोग-वीर्य-प्रमाणातिशेगाद् भूय-
शरीर शुक्रमय ही होना चाहिये और 'केदारकुल्या न्याय, वाला पक्ष तीसरे प्रश्न के समान ही है। इसमें भी वृष्य वस्तुएं प्रभाव से शीघ्र शुक्र को उत्पन्न कर देती हैं।
चरकसंहिता [अ० २८ स्तरमप्यल्पं संपद्यते, स एव दोषः संसृष्टस्तेनैवैकदेशेनावस्थाने गम्भीरस्तनुप्र- तश्चिरस्थितः प्राणाायतनसमुत्थो मर्मोपघाती वा भूयान् कष्टतमः क्षिप्र- कारितमश्च संपद्यते, शरीराणि चातिस्थूलाण्यतिकृशाण्यनिविष्टमांसशो- णितास्थीनि दुर्बलान्यसात्म्याहारोपचितान्यल्पाहाराण्यल्पसत्त्वानि वा भवन्त्यव्याधिसहानि, विपरीतानि पुनर्ब्याधिसहानि, एभ्यश्चैवापथ्या- हार-दोष-शरीर-विशेषेभ्यो व्याधयो मृदवो दारुणाः क्षिप्रासमुत्थाश्चिर- कारिणश्च भवन्ति। अत एव च वात-पित्त-श्लेष्माणः स्थानविशेषे प्रकु- पिता व्याधिविशेषानभिनिर्वर्तयन्त्यग्निवेश ! ॥ ६ ॥ इस प्रकार से कहते हुए आत्रेय ऋषि को अग्निवेश बोले-'हे भगवान् । संसार में देखने में आता है, कि जो मनुष्य हितकारी आहार का उपभोग करते हैं, वे रोगी दिखाई देते हैं और अहितकारी भोजन करने वाले भी नीरोग दीखते हैं। अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा-हे अग्निवेश ! जो मनुष्य हितकारी अन्न खाते हैं उनको इनके कारण से उत्पन्न होने वाले रोग नहीं होते और न केवल हित आहार का उपसेवन ही सब रोगों से बचा सकता। अहित आहार को छोड़कर कुछ दूसरी भी रोग की प्रकृति है । यथा काल विपर्यय (ऋतुओं का परिवर्तन ), प्रज्ञापराध और परिणाम, शब्द स्पर्श, रूप, रस, गन्ध का असात्म्य ( अतियोग, मिथ्यायोग, या अयोग ) होना । ये रोग के कारण आहार रसों का सम्यक् प्रकार से उपयोग करने पर भी पुरुष में अशुभ लक्षण उत्पन्न कर देते हैं । इसलिये हितकारी आहार को सेवन करने वाले भी रोगी दिखाई देते हैं । इसी प्रकार जो व्यक्ति अहित आहार का उपसेवन करते हैं, उनमें रोगों के ये कारण जल्दी दोषयुक्त नहीं होते । क्योंकि सम्पूर्ण अपथ्य समान दोषकारक नहीं हैं और सब दोष समान बल वाले भी नहीं हैं और सारे शरीर रोग को सहन करने में समर्थ नहीं होते । इसलिये अपथ्य देश चावल पित्तकारक हैं, यही आनूप देश के योग से अधिक अपथ्य कारक हो जाता है, काल (शरत्काल में अपथ्य बलवान् और हेमन्त में निर्बल ), संयोग दही राब के साथ बलवान् और शहद के साथ निर्बल ), वीर्य (संस्कार वा उष्ण करने से अपथ्यतम और शीत से अपथ्य ), प्रमाण अर्थात् मात्रा के अतियोग से अपथ्यतम और हीन बल से निर्बल बन जाते हैं। इसी प्रकार बहुत से कारणों के मिलने से, विरुद्ध चिकित्सा होने से गम्भीर¹ आधयो में, शरीर के बहुत अन्दर प्रवेश कर जाने से १. त्वङ्मांसाद्यवमुख्यानं गम्भीरं स्वन्तराश्रयम् ।
अ० २८] सूत्रस्थानम् ३७३
यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
अ० २८] सूत्रस्थानम् ३७३ तथा शरीर में चिरकाल से जड़पकड जाने पर, शंख आदि दृढ प्राणाशयों में स्थित होने से, मर्मस्थानों को पीड़ित करने से बहुत दुःख देने के कारण असाध्य होने से, शीघ्र विकार उत्पन्न करने से अपथ्य बलवान् बन जाता है। इसी प्रकार बहुत मोटा, बहुत कृश, जिनके मांस, रक्त, अस्थि, ढीले, निर्बल हो गये हों जो विषम शरीर वाले हैं, जो असात्म्य आहार को सेवन करने वाले, थोड़ा खाने वाले, अल्प सत्त्व वाले शरीर रोगों को सहन नहीं कर सकते। इनके विप- रीत गुणों वाले शरीर व्याधि को सहन कर सकते हैं। इसलिये अपथ्य आहार, दोष शरीर की विशेषता से रोग मृदु, दारुण, शीघ्र होने वाले, अथवा देर में होने वाले होते हैं। इसलिये हे अग्निवेश ! वात, पित्त, कफ विशेष स्थानों में कुपित होकर भिन्न-भिन्न प्रकार के रोगों को उत्पन्न करते हैं ॥ ५-६ ॥ तत्र रसादिषु स्थानेषु प्रकुपितानां दोषाणां यस्मिन् यस्मिन् स्थाने ये ये व्याधयः संभवन्ति तांस्तान् यथावदनुव्याख्यास्यामः ॥ ७ ॥ अश्रद्धा चारुचिश्चास्य वैरस्यमरसज्ञता । हृल्लासो गौरवं तन्द्रा साङ्गमर्दो ज्वरस्तमः ॥ ८ ॥ पाण्डुत्वं स्रोतसां रोधः क्लैब्यं सादः कृशाङ्गता । नाशोऽग्नेरयथाकालं वलयः पलितानि च ॥ ९ ॥ रसप्रदोषजा रोगा, वक्ष्यन्ते रक्तदोषजाः । कुष्ठ-वीसर्ष-पिडका रक्तपित्तमसृग्दरः ॥ १० ॥ गुदमेढ्रास्यपाकश्च प्लीहा गुल्मोऽथ विद्रधी । नीलिका कामला व्यङ्गः पिप्लवस्तिलकालकाः ॥ ११ ॥ दद्रुश्चर्मदलं श्वित्रं पामा कोठास्रमण्डलम् । रक्तप्रदोषाज्जायन्ते, शृणु मांसप्रदोषजान् ॥ १२ ॥ अधिमांसार्बुदं कील-गल-शालूक-शुण्डिकाः । पूतिमांसालजी-गण्ड-गण्डमालोपजिह्विकाः ॥ १३ ॥ विद्यान्मांसाश्रयान्, मेदःसंश्रयांस्तु प्रचक्ष्महे । निन्दितानि प्रमेहाणां पूर्वरूपाणि यानि च ॥ १४ ॥ अध्यस्थि-दन्त-दन्तास्थि-भेदशूलं विवर्णता । केश-लोम-नख-श्मश्रु-दोषाश्चास्थिप्रकोपजाः ॥ १५ ॥ रुक् पर्वणां भ्रमो मूर्च्छा दर्शनं तमसो मताः । अरुषां स्थूलमूलानां पर्वजानां च दर्शनम् ॥ १६ ॥ मज्जप्रदोषजाच्छुक्रस्य दोषात्क्लैब्यमहर्षणम् ।
३८० चरकसंहिता [ सू० २८ रोगिणं वा क्लीबमल्पायुर्बिरूपं वा प्रजायते ॥ १७ ॥ न वा संजायते गर्भः पतति प्रस्रवत्यपि । शुक्रं हि दुष्टं सापत्यं सदारं बाधते नरम् ॥ १८ ॥ इनमें रस आदि स्थानों में कुपित वात आदि दोष, जिस जिस स्थान पर जो जो रोग उत्पन्न करते हैं उन उन रोगों को कहते हैं—अश्रद्धा, भोजन में श्रद्धा न होना, अरुचि ( भोजन में अरुचि, अनिच्छा ), भारीपन, तन्द्रा, शरीर में पीड़ा, ज्वर, तम, अन्धकार, पाण्डु वर्ण स्रोतों का अवरोध, नपुंसकता, साद ( शिथिलता ) शरीर की निर्बलता, अग्नि ( जाठराग्नि ) का नाश, बिना समय के झुर्रियां और बालों का श्वेत होना ये रसजन्य रोग हैं । रक्तजन्य रोग कहते हैं-कुष्ठ, वीसर्प, पिडकायें, रक्तपित्त, रक्तप्रदर, गुद- पाक, शिश्न का पकना, प्लीहा, गुल्म, विद्रधि नीलिका, व्यंग ( झाई ), कामला, पिप्लुव, तिल के आकार के मस्से, दाद, चर्मदल श्वित्र, पामा, कोठ, रक्तमण्डल ( लाल लाल चक्के ) ये रक्तजन्य रोग हैं । मांसजन्य रोग कहते हैं-अधिमांस, अर्बुद, कील, गलशालूक, ( गले में शोथ होने से बढ़ा हुआ मांस ) गलशुण्डिका, पूतिमांस, अलजी, गलगण्ड, गण्डमाला, उपजिह्विका, ये मांसजन्य रोग हैं । मेदजन्य रोग-कहते हैं प्रमेह के निन्दित पूर्वरूप ( बालों की जटिलता, आदि अथवा अति स्थूल पुरुष के आयु ह्रास आदि आठ रूप) ये रोग हैं अथवा अतिस्थूलता से उत्पन्न आयु का ह्रास आदि रोग मेद जन्य है । अस्थि के नीचे दूसरी अस्थि आना, अधिद्न्त, दन्तभेद, दांत दुखना, अस्थियों में शूल, केश, रोम, नख और दाढ़ी मूंछ के रंग का परिवर्तन होना ये अस्थिजन्य रोग हैं । जोड़ों में दर्द, चक्कर, आना, मूर्छा, आँखों के सामने अंधेरा आना, व्रण, शिर में छोटी-छोटी फुन्सियां छोटे-छोटे जोड़ों में गांठें पड़ जाना ये मज्जाजन्य रोग हैं । शुक्र के दोष से नपुंसकता, अहर्षण ( ध्वज के खड़े होने पर भी मैथुन में अशक्ति ), संतान रोगी, नपुंसक या थोड़ी आयु वाली, विरूप, उत्पन्न हो, अथवा गर्भ नहीं रहता, रहने पर गिर जाता है या तीन मास से पूर्व ही बह जाता है । दूषित शुक्र, बच्चे और स्त्री दोनों को तकलीफ देता है ॥ १७-१८ ॥ इन्द्रियाणि समाश्रित्य प्रकुप्यन्ति यदा मलाः । उपघातोपघाताभ्यां योजयन्तीन्द्रियाणि ते ॥ १९ ॥ स्नायौ शिराकण्डरयोर्दुष्टाः क्लिश्नन्ति मानवम् ।
अ० २८ ] सूत्रस्थानम् ३८१
अ० २८ ] सूत्रस्थानम् ३८१ स्तम्भ-सङ्कोच-खल्लीभिर्ग्रन्थि-स्फुरण-सुप्तिभिः ॥ २० ॥ मलानाश्रित्य कुपिता भेद-शोष-प्रदूषणम् । दोषा मलानां कुर्वन्ति सङ्गोत्सर्गमतीव च ॥ २१ ॥ विविधादशितात्पीताद्धिताल्लीढात्खादितात् । भवन्त्येते मनुष्याणां विकारा य उदाहृताः ॥ २२ ॥ तेषामिच्छन्ननुत्पत्तिं सेवेत मतिमान् सदा । हितान्येवाशितादीनि न स्युस्तज्जास्तथाऽऽमयाः ॥ २३ ॥ जिस समय अपथ्य आहार के कारण मल कुपित होकर इन्द्रियों में स्थित होते हैं, उस समय ये मल इन्द्रियों का नाश या इन्द्रियों को पीड़ित करने लगते हैं। ये मल वायु, शिरा, कण्डराओं में कुपित होकर मनुष्य को बहुत कष्ट पहुं- चाते हैं। इससे स्तम्भ, जड़ता, संकोच सिकुड़ना, खल्ली हाथ पांव का मुड़ जाना, ग्रन्थि (स्नायु आदि में गांठ), स्फुरण, धमन, और संज्ञानाश उत्पन्न होता है। जिस समय वात आदि दोष मलों का आश्रय लेकर कुपित होते हैं, उस समय मल का भेद (अतीसार) तथा मलों को सुखाना अथवा मलों के रंग को विकृत करना या मलों का अवरोध अथवा अतिप्रवृत्ति उत्पन्न कर देते हैं। जो रोग यहां पर लिखे हैं, वे नाना प्रकार के खान, पान, चाटन, खाद्य रूप आहार द्वारा मनुष्यों में उत्पन्न होते हैं। ये रोग उत्पन्न न हों, इस इच्छा से मनुष्य सदा हितकारक आहार का सेवन करे, जिससे कि आहारजन्य रोग न होवें ॥ १६-२३ ॥ रसजानां विकाराणां सर्वं लङ्घनमौषधम् । विधिशोणितेकेऽध्याये रक्तजानां भिषग्जितम् ॥ २४ ॥ मांसजानां तु संशुद्धिः शस्त्रक्षाराग्निकर्म च । अष्टौनिन्दितेकेऽध्याये मेदोजानां चिकित्सितम् ॥ २५ ॥ अस्थ्याश्रयाणां व्याधीनां पञ्चकर्माणि भेषजम् । बस्तयः क्षीरसपोंषि तिक्तकोपहितानि च ॥ २६ ॥ मज्ज-शुक्र-समुत्थानामौषधं स्वादुतिक्तकम् । अन्नं व्यवायव्यायामौ शुद्धिः काले च मात्रया ॥ २७ ॥ शान्तिरिन्द्रियजानां तु त्रिमर्मीये प्रवक्ष्यते । स्नाय्वादिजानां प्रशमो वक्ष्यते वातरोगिके ॥ २८ ॥ न वेगान्धारणेऽध्याये चिकित्सासंग्रहः कृतः । मलजानां विकाराणां सिद्धिरुक्ता क्वचित्क्वचित् ॥ २९ ॥
३८२ चरकसंहिता [अ० २८ रसजन्य सब विकारों की चिकित्सा लंघन अर्थात् उपवास है। रक्तजन्य रोगों की चिकित्सा विधिशोणित अध्याय में कहेंगे। मांसजन्य रोगों की चिकित्सा शस्त्र, क्षार और अग्नि कर्म से होती है। मेदोजन्य रोगों की चिकित्सा 'अष्टोनि- न्दित' अध्याय में कह दी है। अस्थियों में आश्रित रोगों की चिकित्सा पंचकर्म, एवं तिक्त वस्तुओं से तथा दूध एवं घृत से सिद्ध बस्तियां (विशेष) चिकित्सा हैं। मज्जा और शुक्र से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा स्वादु, तिक्त अन्न, व्यवाय, (स्त्री-संग) व्यायाम और समय पर मात्रानुसार वमन आदि से शुद्धि है। इन्द्रियजन्य रोगों की चिकित्सा 'त्रिमर्मीय' अध्याय में कहेंगे। स्नायु आदि से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा वातरोगाधिकार में कहेंगे। मलजन्य रोगों की चिकित्सा 'न वेगान्धारणीय' अध्याय में कह दी और कहीं २ (अतिसार, ग्रहणी आदि में) आगे भी कहेंगे ॥ २४-२६ ॥ व्यायामादूष्मणस्तैक्ष्ण्याद्धितस्यानवचारणात् । कोष्ठाच्छाखां मला यान्ति द्रुतत्वान्मारुतस्य च ॥ ३० ॥ तत्रस्थाश्च विलम्बन्ते कदाचिच्च समीरिताः । नादेशकाले कुप्यन्ति भूयो हेतुप्रतीक्षिणः ॥ ३१ ॥ निम्न कारणों से दोष शाखाओं में पहुंच जाते हैं, यथा व्यायाम से उत्पन्न क्षोभ से कोष्ठ को छोड़कर मल शाखा में आ जाते हैं। अग्नि के तीक्ष्ण होने से पिघले हुए दोष शाखा में आ जाते हैं। हितकारी वस्तु के अति सेवन से बहुत बढ़े हुए दोष पानी के पूर की भांति अपने स्थान पर भरकर दूसरे स्थान पर पहुंच जाते हैं। वायु के गतिशील होने से वायु द्वारा दूसरे स्थान पर पहुँच जाते हैं। वहां शाखा आदि में पहुंचकर रोग उत्पन्न करने में विलम्ब करते हैं। क्योंकि निर्बल दोष किसी प्रबल दोष की प्रेरणा के बिना कुपित नहीं हो सकते। इसलिये उचितस्थान पर और उचित काल में ही कुपित होते हैं। वे निर्बल दोष और कारण की प्रतीक्षा करते रहते हैं। बलवान् दोष दूसरे प्रेरक कारण की बाट नहीं देखते। शाखाओं से दोष कोष्ठ में किस प्रकार जाते हैं यह कहते हैं ॥ ३०-३१ ॥ वृद्ध्याभिष्यन्दनात् पाकात्स्त्रोतोमुखविशोधनात् । शाखां मुक्त्वा मलाः कोष्ठं यान्ति वायोश्च निग्रहात् ॥ ३२ ॥ दोषों के बढ़ने से, (अभिष्यन्द से बहने से सरल, होने से) दोष के पकने से, स्रोतों के मुख खुल जाने से अवरोध हटने से; तथा फेंकने वाली वायु के रुक जाने से ये स्थित दोष कोष्ठ में आजाते हैं ॥ ३२ ॥