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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पहले अध्याय में कहा है (हिताहितं सुखदुःखं०) । अग्नि में उष्णिमा और पानी में तरलता स्वाभाविक है, बनाई हुई नहीं है इसी प्रकार आयुर्वेद भी स्वाभाविक है । भाव, अर्थात् स्वभाव के अकृत अर्थात् स्वाभाविक होने से भी आयुर्वेद नित्य है । यथा-गुरु पदार्थों के उपसेवन से गुरुता बढ़ती है । और लघु पदार्थों के उपसेवन से शरीर में लघुता बढ़ती है । इसलिये आयुर्वेद भी नित्य है ॥ २६ ॥ तस्याऽऽयुर्वेदस्याङ्गान्यष्टौ । तद्यथा-कायचिकित्सा, शालाक्यं शल्यापहर्तृकं, विष-गर-वैरोधिक-प्रशमनं, भूतविद्या, कौमारभृत्यकं, रसायनानि, वाजीकरणमिति ॥ २७ ॥ इस आयुर्वेद के आठ अंग हैं । (१) काय चिकित्सा, (२) शालाक्य, (३) शल्यापहर्तृक, (४) विष-गर-वैरोधिक-प्रशमन, (५) भूतविद्या, (६) कौमार-भृत्यक, (७) रसायन और (८) वीजीकरण ये आठ अंग हैं ॥२७॥ स चाध्येतव्यो ब्राह्मण-राजन्य-वैश्यैः । तत्रानुग्रहार्थं प्राणिनां ब्राह्म- णैरात्मरक्षार्थं राजन्यैर्वृत्त्यर्थं वैश्यैः, सामान्यतो वा धर्मार्थकामपरिग्र- हार्धं सर्वैः । तत्र च यदध्यात्मविदां धर्मपथस्थापकानां धर्मप्रकाशकानां वा मातृ-पितृ-बन्धु-गुरु-जनस्य वा विकारप्रशमने प्रयत्नवान् भवति यच्चाऽऽयुर्वेदोक्तमध्यात्ममनुध्यायति वेदयत्यनुविधीयते वा सोऽप्यस्य परो धर्मः । या पुनरीश्वराणां वसुमतां वा सकाशात्सुखोपहारनिमित्ता भवत्यर्थावाप्तिरात्मरक्षणं च याच स्वपरिगृहीतानां प्राणिनामातुर्यादारक्षा- सोऽस्यार्थः । यत्पुनरस्य विद्वद्बहुग्रहणयशःशरण्यत्वं च, या च संमानशुश्रूषा, यच्चेष्टानां विषयाणामारोग्यमाधत्ते, सोऽस्य काम इति यथाप्रशनमुक्तमशेषेण ॥ २८ ॥ यह आयुर्वेद ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनों वर्णों को पढ़ना चाहिये । ब्राह्मणों को प्राणियों का भला करने के लिये, क्षत्रियों को अपनी रक्षा के लिये, वैश्यों को वृत्ति अर्थात्, जीविकोपार्जन के लिये पढ़ना चाहिये । अथवा धर्म, अर्थ, काम रूपी पुरुषार्थों के उद्देश्य से ही सब को पढ़ना चाहिये । इनमें जो तत्त्वज्ञान को जानने वाले, धर्मसंस्थापक, धर्मोपदेशक, माता, पिता, भाई बन्धु, पुरजनों के रोगों को दूर करने में प्रयत्नशील होता है और जो पढ़े हुये आयुर्वेद को दूसरों को पढ़ाता है, बतलाता है, वैसा करता है, वह इस का सर्वोत्तम धर्म है । राजाओं या रईसों, सेठों से आरोग्यता प्रदान करने पर जो धन की प्राप्ति होती है, आत्मरक्षा होती है, इसी प्रकार अपने आश्रयजीवी नौकर चाकर आदि को रोग मुक्त करता है वह इसका सर्वोत्तम अर्थ है । विद्वान् लोगों द्वारा

प्राप्त यश, कीर्ति, सब लोगों का शरण में आना, अभयप्रदाता होना, आदर सत्कार लोगों से प्राप्त होना, प्रिय विषयों में आरोग्यता का प्राप्त होना यह इसका सर्वोत्तम काम है । इस प्रकार से सब प्रश्नों का पूरा २ उत्तर देदिया ॥२८॥ अथ भिषगादित एव भिषजा प्रष्टव्योऽष्टविधं भवति । तद्यथा-तन्त्रं तन्त्रार्थं स्थानानि स्थानार्थानध्यायानध्यायर्थान् प्रश्नार्थं श्चेति । पृष्टेन चैतद्वक्तव्यमशेषेण वाक्यशो वाक्यार्थशोऽर्थावयवशश्चेति ॥ २९ ॥ वैद्य परीक्षा के लिये वैद्य से आठ प्रश्न पूछे । यथा तन्त्र, तन्त्रार्थ, स्थान स्थानों के अर्थ, अध्याय और अध्याय के अर्थ, प्रश्न और प्रश्नार्थ । पूछे जाने पर वैद्य को सम्पूर्ण रूप से वाक्य, वाक्यार्थ, अर्थावयव रूप से पूर्णतया कहना चाहिये ॥ २९ ॥ तत्राऽऽयुर्वेदः शाखा विद्या सूत्रं ज्ञानं शास्त्रं लक्षणं तन्त्रमित्य- नर्थान्तरम् ॥ ३० ॥ तन्त्रार्थः पुनः स्वलक्षणैरुपदिष्टः, स चार्थः प्रकरणैर्विभाव्यमानो भूय एव शरीर-वृत्ति-हेतु-व्याधि-कर्म-कार्य-काल-कर्तृ-करण-विधि-विनि- श्चयाइशप्रकरणः, तानि च प्रकरणानि केवलेनोपदेक्ष्यन्ते तन्त्रेण ॥३१॥ इसमें आयुर्वेद, शाखा, सूत्र, ज्ञान, शास्त्र, लक्षण व तन्त्र ये सब एकार्थ- वाची शब्द हैं । तन्त्र का अर्थ "आयुर्वेदयतीत्यायुर्वेदः” आयु-जिससे जानी जाती है वह आयुर्वेद-इस प्रकार अपने लक्षणों से कह दिया । हित अहित आयुरूप लक्षण है और यह अर्थ प्रकरण भेद से बहुत प्रकार का है । यथा शरीर (पञ्च महाभूतों का समुदायरूप होने से अवयवादि भेद से बहुत प्रकार का है ), हेतु ( असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग , प्रज्ञापराध, परिणाम ), व्याधि ( धातुवैषम्य ), कर्म ( चिकित्सा ), कार्य ( आरोग्यता ), काल (ऋतु आदि), कर्त्ता ( भिषक् ), करण ( भेषज ), विधि ( उपकल्पना विधान जिसे काल, द्रव्य और व्याधि की अपेक्षा से समझना चाहिये ) । इन प्रकरणों से ग्रन्थ सम्पूर्ण रूप से भली प्रकार सुगठित होता है । ये प्रकरण तन्त्र में सम्पूर्ण रूप से कहे जावेंगे ३०-३१ तन्त्रस्यास्याष्टौ स्थानानि । तद्यथा-श्लोक-निदान-विमान-शारीरे- न्द्रिय-चिकित्सित-कल्पसिद्धि-स्थानानि । तत्र त्रिंशदध्यायकं श्लोकस्थानं अष्टाध्यायकानि निदान-विमान-शारीरस्थानानि, द्वादशकमिन्द्रियाणां, त्रिंशकं चिकित्सितानां द्वादशके कल्पसिद्धिस्थाने इति ॥ ३२ ॥ इस तन्त्र के आठ स्थान हैं यथा-१. सूत्र ( श्लोक ) स्थान, २. निदान- स्थान, ३. विमानस्थान, ४. शारीरस्थान, ५. इन्द्रियस्थान, ६. चिकित्सास्थान,

४०० चरकसंहिता [ अ० ३० ७. कल्पस्थान और ८. सिद्धिस्थान। इनमें श्लोकस्थान ३० अध्यायों का, निदान, विमान और शारीरस्थान, आठ २ अध्यायों के इन्द्रियस्थान बारह का चिकित्सास्थान तीस का, कल्प और सिद्धिस्थान बारह२ अध्यायों के हैं ॥३२॥ भवन्ति चात्र— द्वे त्रिंशके द्वादशकत्रयं च त्रीण्यष्टकान्येषु समाप्तिरुक्ता । श्लोकौषधारिष्ट-विकल्प-सिद्धि-निदान-मानाश्रय-संज्ञकेषु ॥३३॥ स्वे स्वे स्थाने यथास्वे च स्थानार्थ उपदेक्ष्यते । सविंशमध्यायशतं शृणु नामक्रमागतम् ॥ ३४ ॥ दीर्घञ्जीवोऽप्यपामार्गतण्डुलारग्वधादिकौ । षड्विरेकाश्रयश्चेति चतुष्को भेषजाश्रयः ॥ ३५ ॥ मात्रातस्याशितीयौ च न वेगान्धारणे तथा । इन्द्रियोपक्रमश्चेति चत्वारः स्वास्थ्यवृत्तिकाः ॥ ३६ ॥ खुड्डाकश्च चतुष्पादो महास्तिस्रैषणस्तथा । सह वातकलाक्येन विद्यान्निर्देशिकान् बुधः ॥ ३७ ॥ स्नेहनस्वेदमाध्यायौ युभौ यश्चापकल्पनः । चिकित्साप्राभृतश्चैव सर्व्वा एवापकल्पनाः ॥ ३८ ॥ कियन्तः शिरसीयंश्च त्रिशोफाष्टोदरादिकौ । रोगाध्याया महांश्चैव रोगाध्यायचतुष्टयम् ॥ ३६ ॥ अष्टौनिन्दितसंख्यातस्तथा लंबनतर्पणौ । विधिशोणितकश्चेति व्याख्यातास्तत्र योजनाः ॥ ४० ॥ यज्जःपुरुषसंख्यातो भद्रकाप्यान्नपानिकौ । विविधाशितपीतीयश्चत्वारोऽन्नविनिश्चये ॥ ४१ ॥ दशप्राणायतनिकस्तथाऽथैर्दशमूलिकः । द्वावेतौ प्राणदेहार्थौ प्रोक्तौ वैद्यगुणाश्रयौ ॥ ४२ ॥ औषधस्वस्थनिर्देशकल्पनारोगयोजनाः चतुष्काः षट् क्रमेणोक्ताः सप्तमश्चान्नपानिकः ॥ ४३ ॥ द्वौ चान्त्यौ संग्रहस्यायाविति त्रिंशत्कमर्थवत् । श्लोकस्थानं समुद्दिष्टं तन्त्रस्यास्य शिरः शुभम् ॥ ४४ ॥ चतुष्काणां महार्थानां स्थानेऽस्मिन् संग्रहः कृतः । श्लोकार्थः संग्रहार्थश्च श्लोकस्थानमतः स्मृतम् ॥ ४५ ॥ इस ग्रन्थ में तीस तीस अध्याय के सूत्र और चिकित्सास्थान हैं। बारह २

अ० ३० ] २६ सूत्रस्थानम् ४०१

अ० ३० ] २६ सूत्रस्थानम् ४०१ अध्याय के तीन अरिष्ट (इन्द्रिय), कल्प और सिद्धि स्थान, आठ-२ अध्याय के निदान, विमान और शारीर ये तीन स्थान हैं। श्लोक, औषध, अरिष्ट, विकल्प, सिद्धि, निदान, विमान और आश्रय नामक १२० अध्यायों में ग्रन्थ समाप्त हुआ है। अपने २ स्थान में यथायोग्य स्थानों का उपदेश तत्त्वार्थ सहित कहेंगे। इन १२० अध्यायों के क्रम से नाम सुनो— दीर्घञ्जीवितीय, अपामार्गतण्डुलीय, आरग्वधीय, षड्विरेचनशताश्रितीय, इन चार अध्यायों में 'औषध-चतुष्क' का निरूपण किया है। मात्राशितीय, तस्या- शितीय, नवेगानधारणीय और इन्द्रियोपक्रमणीय ये चार स्वास्थ्य-चतुष्क हैं। खुड्डाकचतुष्पाद, महाचतुष्पाद, तिस्त्रैषणीय और वातकलाकलीय ये चार निर्देश चतुष्क (कर्त्तव्य अकर्त्तव्य विषयक) हैं। स्नेहन, स्वेदन, उपकल्पनीय और चिकित्सा प्राभृतीय ये चार कल्पनाचतुष्क हैं। कियन्तःशिरसीय, त्रिशोथीय, अष्टोदरीय, महारोगाध्याय—ये चार रोगचतुष्क हैं। अष्टौनिन्दितीय लंघन-बृंहणीय सन्तर्पणीय और विधिशोणितीय ये चार योजनाचतुष्क हैं। यज्जःपुरुषीय, आत्रे- यभद्रकाप्यीय, अन्नपानीय, विविधाशितपीतीय ये चार अन्नपान-चतुष्क हैं। दश प्राणायतनीय और अर्थे-दशमहामूलीय इन पिछले दोनों अध्यायों में प्राण, ओज, धमनी और वैद्यों के गुणों का निरूपण किया है। इस प्रकार से इस सूत्रस्थान में औषध-चतुष्क, स्वास्थ्य-चतुष्क; निर्देश-चतुष्क, कल्पना-चतुष्क; रोग-चतुष्क; योजना-चतुष्क, अन्नपान-चतुष्क तथा पहले दो अध्यायों में इन अठाईस अध्यायों की सूची है। इस प्रकार से सूत्रस्थान के तीस अध्यायों में इन विषयों का वर्णन किया है। जिस प्रकार मनुष्य के सब अंगों में श्रेष्ठ मस्तिष्क है उसी प्रकार से सब ग्रन्थों में यह श्रेष्ठ है। इस सूत्र स्थान में उप- योगी चतुष्कों का संग्रह किया है। श्लोक रूप में संग्रह होने के कारण इसको 'श्लोकस्थान' कहते हैं ॥ ३३-४५ ॥ ज्वराणां रक्तपित्तस्य गुल्मानां मेहकुष्ठयोः । शोषोन्मादनिदाने च स्यादपस्मारिणां च यत् ॥ ४६ ॥ इत्यध्यायाष्टकमिदं निदानस्थानमुच्यते । ज्वर निदान, रक्तपित्त निदान, गुल्म निदान, प्रमेह निदान, कुष्ठ निदान, शोष निदान, उन्माद निदान और अपस्मार निदान—ये आठ अध्याय निदान- स्थान में हैं ॥ ४६ ॥ रसेषु त्रिविधे कुक्षौ ध्वंसे जनपदस्य च ॥ ४७ ॥ त्रिविधे रोगविज्ञाने स्रोतःस्वपि च वर्तने ।

गिजतीय—ये आठ अध्याय हैं ॥ ४७-४८ ॥

४०२ चरकसंहिता [ अ० ३० रोगानीके व्याधिरूपे रोगाणां च भिषग्जिते ॥ ४८ ॥ अष्टौ विमानान्युक्तानि मानार्थानि महर्षिणा । विमान स्थान में रस विमान, त्रिविधकुक्षीय, जनपदोद्ध्वंसनीय, त्रिवि- धरोग-विशेषविज्ञानीय, स्रोतोविमान, रोगानीक, व्याधिरूपीय और रोगभिष- गिजतीय—ये आठ अध्याय हैं ॥ ४७-४८ ॥ कतिधापुरुषीयं च गोत्रेणातुल्यमेव च ॥ ४९ ॥ खुड्डीका महती चैव गर्भावक्रान्तिरुच्यते । पुरुषस्य शरीरस्य विचयौ द्वौ विनिश्चितौ ॥ ५० ॥ शरीरसंख्या सूत्रं च जातेरष्टमसमुच्यते । इत्युद्दिष्टानि मुनिना शारीराण्यत्रिसूनुना ॥ ५१ ॥ शारीर स्थान में कतिधापुरुषीय, अतुल्यगोत्रीय, खुड्डीकागर्भावक्रान्ति, पुरुष- विचय, शारीरविचय, शरीरसंख्या और जातिसूत्रीय ये आठ अध्याय हैं ॥ ४९-५१॥ वर्णस्वरीयः पुष्पाह्वयस्तृतीयः परिमर्षणः । तथैव चेन्द्रियानीकः पूर्वरूपिक एव च ॥ ५२ ॥ कतमानिशरीरीयः पन्नरूपोऽप्यवाक्शिराः । यस्य श्यावनििमत्तश्च सद्योमरण एव च ॥ ५३ ॥ अणुज्योतिरिति ख्यातस्तथा गोमयचूर्णवान् । द्वादशाध्यायकं स्थानमिन्द्रियाणां प्रकीर्तितम् ॥ ५४ ॥ वर्णस्वरीय, पुष्पितक, परिमर्षणीय, इन्द्रियानीक, पूर्वरूपीय, कतमानि शरीराणि, पन्नरूपीय, अवाक्शिरसीय, यस्यश्यावनििमत्तीय, सद्योमरणीय, अणु- ज्योतीय और गोमयचूर्णीय ये बारह अध्याय इन्द्रियस्थान में हैं ॥ ५२-५४ ॥ अभयामलकीयं च प्राणकामीयमेव च । करप्रचितिकं वेदसमुत्थानं रसायनम् ॥ ५५ ॥ संयोगशरमूलीयमासक्तक्षीरिकं तथा । माषपर्णभृतीयं च पुमाञ्जातबलादिकम् ॥ ५६ ॥ चतुष्कद्वयमप्येतदध्यायद्वयमुच्यते ॥ रसायनमिति ज्ञेयं वाजीकरणमेव च ॥ ५७ ॥ ज्वराणां रक्तपित्तस्य गुल्मानां मेहकुष्ठयोः । शोषोन्मादेऽप्यपस्मार-क्षत-शोफोदराशसाम् ॥ ५८ ॥ ग्रहणीपाण्डुरोगाणां श्वासकासातिसारिणाम् । छर्दिर्वीसर्पतृष्णानां विषमद्यविकारिणाम् ॥ ५९ ॥

त्रिंशच्चिकित्सितान्युक्त्वाऽन्यतः कल्पाम् परं शृणु ।

द्विव्रणीयं त्रिमर्मीयमूरुस्तम्भिकमेव च । वातरोगे वातरक्ते योनिव्यापदि चैव यत् ॥ ६० ॥ त्रिंशच्चिकित्सितान्युक्त्वाऽन्यतः कल्पाम् परं शृणु । अभयामलकीय, प्राणकामीय, करप्रचितीय, आयुर्वेदसमुत्थानीय, संयोग- शरमूलीय, आसिक्तक्षीरीय, माषपर्ण, पुमाञ्जातबलादिक इन भिन्न २ आठ प्रकरणों के दो अध्याय हैं । इनमें पहिले चार प्रकरणों में रसायनाध्याय और दूसरे चार में वाजीकरणाध्याय कहा है । इसके पीछे ज्वरचिकित्सा, रक्तपित्त- चिकित्सा, गुल्म-चिकित्सा, प्रमेह-चिकित्सा कुष्ठ, शोष, उन्माद, अपस्मार, उरःक्षत, शोफ, उदर, अर्श, ग्रहणी, पाण्डुरोग, श्वास, कास, अतीसार, छर्दि, वीसर्प, तृष्णा, विषरोग, मद्यरोग, द्विव्रणीय, त्रिमर्मीय, ऊरुस्तम्भ, वातव्याधि, वात- रक्त इस प्रकार से कुल मिलाकर चिकित्सा स्थान में तीस अध्याय हैं ॥५५-६०॥ फलजीमूतकेक्ष्वाकु-कल्पो धामार्गवस्य च ॥ ६१ ॥ पञ्चमो वत्सकस्योक्तः षष्ठश्च कृतवेधने । श्यामात्रिवृतयोः कल्पस्तथैव चतुरङ्गुले ॥ ६२ ॥ तिल्वकस्य सुधायाश्च सप्तलाशङ्खिनीषु च । दन्तीद्रवन्त्योः कल्पश्च द्वादशोऽयं समाप्यते ॥ ६३ ॥ मदनफलकल्प जीमूतककल्प, ईक्ष्वाकुकल्प, धामार्गवकल्प, वत्सक- कल्प, कृतवेधनकल्प, श्यामात्रिवृत्कल्प, महावृक्षकल्प, सप्तलाशंखिनीकल्प, और दन्ती-द्रवन्तीकल्प ये बारह अध्याय कल्पस्थान में हैं ॥ ६१-६३ ॥ कल्पना पञ्चकर्माख्या बस्तिमूत्रा तथैव च । स्नेहव्यापदिकी सिद्धिर्नेत्रव्यापदिकी तथा ॥ ६४ ॥ सिद्धिः शोधनयोश्चैव बस्तिसिद्धिस्तथैव च । प्रासृती मर्मसंख्याता सिद्धिर्बस्त्याश्रया च या ॥ ६५ ॥ फलमात्रा तथा सिद्धिः सिद्धिश्चोत्तरसंज्ञिता । सिद्धयो द्वादशैवैतास्तन्त्रं चासु समाप्यते ॥ ६६ ॥ सिद्धिस्थान, कल्पसिद्धि, पंचकर्मीय सिद्धि, बस्तिसूत्रीय सिद्धि, स्नेहव्याप- दिक सिद्धि, नेत्रव्यापदिक सिद्धि, वमनविरेचन-व्यापत्सिद्धि, बस्तिव्यापदिक सिद्धि, प्रसृतयोगिकसिद्धि, त्रिमर्मीय सिद्धि, बस्ति सिद्धि, फलमात्र सिद्धि, और उत्तर सिद्धि—ये बारह अध्याय सिद्धि स्थान में हैं। इस प्रकार से यह ग्रन्थ समाप्त होता है ॥ ६४-६६ ॥ स्वे स्वे स्थाने तथाऽध्याये चाध्यायार्थः प्रवक्ष्यते । तं ब्रूयात्सर्वतः सर्वं यथास्वं ह्यर्थसंग्रहात् ॥ ६७ ॥

४०४ चरकसंहिता [ अ० ३० प्रत्येक अध्याय में वर्णित विषयों का निरूपण संग्रह रूप से प्रत्येक अध्याय के अन्त में दे दिया है और जो मुख्य विषय आया है, उसको स्थान २ पर संक्षिप्त रूप से फिर कह दिया है। इसलिये एक अध्याय का वर्णन जो यत्र तत्र आया है, वह सब वर्णन उसी एक अध्याय का समझना चाहिये ॥ ६७ ॥ पृच्छा तन्त्राद्यथाङ्गानां विधिना प्रश्न उच्यते । प्रश्नार्थे युक्तिमांस्तत्र तन्त्रेणैवार्थनिश्चयः ॥ ६८ ॥ निरुक्तं तन्त्रणातन्त्रं स्थानमर्थप्रतिष्ठया । अधिकृत्यार्थमध्यायानामसंज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६९॥ इति सर्वं यथाप्रश्नमष्टकं संप्रकाशितम् । कात्स्न्येन चोक्तस्तन्त्रस्य संग्रहः सुविनिश्चितः ॥ ७० ॥ ग्रन्थ के प्रारम्भ करने में सामान्य विशेष रूप से अथवा पूर्वापरविरोध से रहित जो विचार करना है उसका नाम 'प्रश्न' और विचार पूर्वक किये हुए प्रश्न का शास्त्र के आधार से युक्तिपूर्वक जो निर्णय है उसका नाम 'प्रश्नार्थ' है। जिसमें अनेक विषय एक साथ में एकत्र किये गये हों उसका नाम 'तन्त्र' है। तन्त्र अर्थात् शास्त्र में मुख्य मुख्य विषयों में से एक एक भाग को जो पृथक् पृथक् लेकर प्रतिपादन किया है उसका नाम 'अध्याय' है (जैसे-दीर्घे- जीवितीय, अपामार्गतण्डुलीय इत्यादि प्रत्येक विषय के अनुक्रम में निर्दिष्ट भाग का नाम अध्याय है)। इस प्रकार तन्त्र, तन्त्रार्थ, स्थान स्थानार्थ आदि जो आठ प्रश्न किये उनका उत्तर दे दिया है। यह सम्पूर्ण ग्रन्थ का संक्षेप है ॥ ६८-७० ॥ सन्ति पाङ्गविकोत्पाताः संक्षोभं जनयन्ति ये । वर्तकानामिबोत्पाताः सहसैवाविभाविताः ॥ ७१ ॥ तस्मात्तान् पूर्वसंजल्पे सर्वत्राष्टकमादिशेत् । परावरपरीक्षार्थं तत्र शास्त्रविदां बलम् ॥ ७२ ॥ शब्दमात्रेण तन्त्रस्य केवलस्यैकदेशिकाः । भ्रमन्त्यल्पबलास्तन्त्रे ज्याशब्देनैव वर्तकाः ॥ ७३ ॥ पशुः पशूनां दौर्बल्यात्कश्चिन्मध्ये वृकायते । ससत्त्वं वृकमासाद्य प्रकृतिं भजते पशुः ॥ ७४ ॥ तद्वदज्ञोऽज्ञमध्यस्थः कश्चिन्मौखर्यसाधनः । स्थापयत्याप्तमात्मानमाप्तं त्वासाद्य भिद्यते ॥ ७५ ॥ वस्त्रमूर्ढ इवोर्णाभिरबुद्धिरबहुश्रुतः । किं व वक्ष्यति संजल्पे कुण्डभेदी जडो यथा ॥ ७६ ॥

अ० ३० ] सूत्रस्थानम् ४०५

अ० ३० ] सूत्रस्थानम् ४०५ कुछ ऐसे भी मनुष्य हैं जो शास्त्र के थोड़े से भाग को पढ़कर विद्वानोंमें उत्पात करते हैं। सहसा उड़कर जिस प्रकार बटेर पक्षी उत्पात करने लगते हैं, उसी प्रकार ये अर्धपठित वैद्य भी उत्पात किया करते हैं। इसलिये प्रथम जल्प (वाद-विवाद में) तन्त्र, तन्त्रार्थ आदि आठ प्रश्नों को पूछना चाहिये। अपने से श्रेष्ठ या हीन की परीक्षा करने के लिये यही आठ प्रश्न असली शास्त्र को जानने वालों के बल हैं। थोड़े बल वाले, जिन्होंने शास्त्र का कुछ थोड़ा सा भाग ही देखा होता है वे इन प्रश्नों से इस प्रकार से भाग खड़े होते हैं जिस प्रकार धनुष की डोरी की टंकार से बटेरें भाग जाते हैं। जैसे कोई पशु निर्बल पशुओं में अपने को भेड़िया मानकर बोलने लगता है, परन्तु जब कोई बलवान् पशु सामने आ जाता है, तब वह पुनः अपने असली रूप में आजाता है, वह जो होता है वही बन जाता है। इसी प्रकार अपने मुख से प्रशंसा करने वाला मूर्ख मूर्खों में बैठकर अपना पाण्डित्य दिखाने लगता है, परन्तु जब कोई पण्डित विद्वान् सामने आखड़ा होता है, तब यह अबुद्धि मूढ़, अवहुश्रुत, कुण्डभेदी (दुष्ट- अध्योनि ), जड़ मूर्ख, वाद प्रतिवाद में क्या कहेगा ? कुछ भी नहीं। जिस प्रकार मकड़ी के जाल में फंसा कीड़ा कुछ नहीं कर सकता उसी प्रकार यह मूढ़ भी विद्वान् के सामने कुछ नहीं कर सकता ॥ ७१-७६ ॥ सद्वृत्तन विगृह्णीयाद्द्विषत्यल्पश्रुतैरपि । हन्यात्प्रश्नाष्टकेनादावितरांस्त्वात्ममानिनः ॥ ७७ ॥ दम्भिनो मुखरा ह्यज्ञाः प्रभूताबद्धभाषिणः । प्रायः प्रायेण सुमुखाः सन्तो युक्ताल्पभाषिणः ॥ ७८ ॥ तत्त्वज्ञानप्रकाशार्थमहङ्कारमनाश्रिताः । परन्तु जो निरभिमानी सच्चे वैद्य हों वे यदि थोड़े भी पढ़े लिखे हों तो भी उनके साथ शिष्टाचार, सम्मानपूर्वक बरतना चाहिये और जो आत्माभि- मानी हों उनको इन आठ प्रश्नों से परास्त करना चाहिये। ऐसे पुरुष प्रायः दम्भी, अपनी मुख से अपनी श्लाघा करने वाले, मूर्ख, बहुत एवं असम्बद्ध, प्रसंगरहित बोलने वाले होते हैं और जो अच्छे विद्वान् होते हैं वे थोड़ा और उचित प्रसंग में ही बोलते हैं, वे तत्त्वज्ञान का प्रकाश करने के लिये बोलते हैं और अहंकार का आश्रय नहीं लेते हैं ॥ ७७-७८ ॥ स्वल्पाधाराञ्छमुखरान्मर्षयेन्न विवादिनः ॥ ७९ ॥ परो भूतेष्वनुक्रोशस्तत्त्वज्ञाने परा दया । येषां तेषामसद्वादनिग्रहे निरता मतिः ॥ ८० ॥

४०६ चरकसंहिता [ अ० ३० परन्तु जो अपने तत्त्वज्ञान को दिखाने के लिये अहंकार के कारण आये हों, जो थोड़े पढ़े हों, उन मूर्ख आत्मप्रशंसकों की कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। जिनकी प्राणीमात्र पर कृपा और तत्त्वज्ञान में दया है उनकी असद्- वाद के रोकने में सदा मति रहती है। क्योकि इस प्रकार न करने से असद् वैद्यों को उत्तेजन मिलकर संसार का अपकार होता है। इसलिये इनको निग्रह करने में सदा तत्पर रहना चाहिये ॥ ७६-८० ॥ असत्पक्षाश्रितवार्तिर्दम्भपारुष्यसाधनाः । भवन्त्यनाप्ताः स्वे तन्त्रे प्रायः परविकत्थकाः ॥ ८१ ॥ तान् कालपाशसदृशान्वर्जयेच्छास्त्रदूषकान् । प्रशम-ज्ञान-विज्ञान-पूर्णाः सेव्या भिषक्तमाः ॥ ८२ ॥ खोटे ( असत् ) पक्ष को लेकर विवाद करना, मुझको समय नहीं है, फिर पूछना ऐसा बहाना करने वाले, पूछने पर शिर दुखता है, दाम्भिक, पूछने पर गुस्से या जोर से उत्तर दे और दूसरों की व्यर्थ निन्दा करने वाले अपने तन्त्र में अनभिज्ञ होते हैं। इस प्रकार के शास्त्र को बदनाम करने वालों को मृत्यु के फांसों के समान दूर से ही छोड़ देना चाहिये। जो शान्त, ज्ञान-विज्ञान से परिपूर्ण हों ऐसे उत्तम वैद्यों की सेवा करनी चाहिये ॥ ८१-८२ ॥ समग्रं दुःखमायत्तमविज्ञाने द्वयाश्रयम् । सुखं समग्रं विज्ञाने विमले च प्रतिष्ठितम् ॥ ८३ ॥ इदमेवमुदारार्थमज्ञानार्थप्रकाशकम् । शास्त्रं दृष्टिप्रनष्टानां यथैवाऽऽदित्यमण्डलम् ॥ ८४ ॥ इति । सब प्रकार के दुःखों का कारण शारीरिक और मानसिक ज्ञान का अभाव है। शरीर और मन सम्बन्धी ज्ञान न होने से सब रोग होते हैं। इन दोनों के विशुद्ध ज्ञान से सम्पूर्ण सुख-आरोग्य मिलता है। यह शास्त्र अति गम्भीर, दोनों लोकों में हितकारी अर्थ को बतलाता है, तथा अज्ञात वस्तु को प्रकाशित करता है, परन्तु जिस प्रकार नेत्रहीन पुरुष चमकते हुए सूर्य का कुछ भी उपयोग नहीं कर सकता, इसी प्रकार शास्त्रहीन व्यक्तियों के लिये यह कुछ काम नहीं दे सकता ॥ ८३-८४ ॥ तत्र श्लोकाः- अर्थे दश महामूलाः संज्ञा चैषां यथा कृता । अयनान्ताः षडर्थाश्च रूपं वेदविदां च यत् ॥ ८५ ॥ सप्तप्रश्नाष्टकश्चैव परिप्रश्नः सनिर्णयः । यथा वाच्यं यदर्थं च यद्विद्याच्चैकदेशिकः ॥ ८६ ॥

अ० ३० ] सूत्रस्थानम् ४०७

अ० ३० ] सूत्रस्थानम् ४०७ अर्थे दशमहामूले सर्वमेतत्प्रकाशितम् । संग्रहश्चायमध्यायस्तन्त्रस्यास्यैव केवलः ॥ ८७ ॥ यथा सुमनसां सूत्रं संग्रहार्थं विधीयते । संग्रहार्थं तथाऽर्थानामृषिणा संग्रहः कृतः ॥ ८८ ॥ हृदय से सम्बन्धित दस धमनियां, 'महामूला' इस संज्ञा होने के कारण, आयुवर्द्धक, छः उत्तम उपाय, आयुर्वेद का स्वरूप, सात व आठ प्रश्न विशेष, वाक्यांश, अर्थौघ, निर्णय और अधूरे वैद्य, इतने विषयों का निरूपण इस 'अर्थे दशमहामूलीय' अध्याय में किया है । इस ग्रन्थ में वर्णित सब विषयों का संक्षिप्त निरूपण भी इस अध्याय में किया है । जिस प्रकार कि फूलों की माला को गूंथने के लिये सूत्र की आवश्यकता होती है उसी प्रकार सब विषयों का संग्रह करने के लिये ऋषि ने यह सूत्र (सूत्रस्थान) बनाया है ॥ ८५-८८ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने अर्थे दशमहामूलीयो नाम त्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ३० ॥ अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इयताऽवधिना सर्वं सूत्रस्थानं समाप्यते ॥ इति सूत्रस्थानं समाप्तम् ।

निदानस्थानम्

निदानस्थानम् प्रथमोऽध्यायः अथातो ज्वरनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब इसके आगे ज्वरनिदान का व्याख्यान करेंगे जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था२ ॥ १-२ ॥ इह खलु हेतुर्निमित्तमायतनं कर्ता कारणं प्रत्ययः समुत्थानं निदान- मित्यनर्थान्तरम् । तत्तिविधं-असात्म्येन्द्रियार्थसंयोगः, प्रज्ञापराधः परिणामश्चेति ॥ ३ ॥ निदान के पर्य्याय—इस निदान स्थान में हेतु, निमित्त, आयतन, कर्त्ता कारण, प्रत्यय, समुत्थान ये निदान शब्द के पर्यायवाची शब्द हैं । निदान अर्थात् रोगों की उत्पत्ति का कारण तीन प्रकार का है, १. असात्म्येन्द्रियार्थ- संयोग, २. प्रज्ञापराध ( बुद्धि का दोष ) और ३. परिणाम ( काल ) ॥ ३ ॥ अतस्त्रिविधिविकल्पा व्याधयः प्रादुर्भवन्त्याग्नेय-सौम्य-वायव्याः । द्विविधाश्चापरे राजसास्तामसाश्च । तत्र व्याधिरामयो गद आतङ्को यक्ष्मा ज्वरो विकारो रोग इत्यनर्थान्तरम् ॥ ४ ॥ इसलिये रोग भी तीन प्रकार के ही होते हैं । १. आग्नेय ( पित्तजन्य ) २. सौम्य ( कफजन्य ), और ३. वायव्य ( वायुजन्य ) । ये शारीरिक रोग के १. जिससे रोग जाना जाय उसका नाम 'निदान' है । 'निश्चित्य दीयते प्रतिपाद्यते व्याधिरनेनेति निदानम्' ॥ जेज्जट ॥ २. संक्षेप में लिंग को निर्देश करने वाला सूत्रस्थान कहने के पश्चात् हेतु और लिंग को बतलाने वाला 'निदानस्थान' कहते हैं । क्योंकि हेतु और लिंग को जानकर की हुई चिकित्सा फलवती होती है । हेतु सन्निकृष्ट, विप्रकृष्ट, व्यभिचार और प्रधान भेद से चार प्रकार का है । विस्तार के लिये मधुकोष देखिये ।

तस्योपलब्धिर्निदान-पूर्वरूप-लिङ्गोपशय-संप्राप्तितः ॥५॥

भेद हैं। मानसिक रोग भी दो प्रकार के हैं। १. राजस (रजोगुण से उत्पन्न हुए), और २. तामस, (तमोगुण से उत्पन्न हुए)। रोग के पर्याय—व्याधि, आमय, गद, आतंक, यक्ष्मा, ज्वर, विकार और रोग ये सब शब्द एक ही अर्थ (रोग) को कहते हैं ॥ ४ ॥ तस्योपलब्धिर्निदान-पूर्वरूप-लिङ्गोपशय-संप्राप्तितः ॥५॥ निदान पंचक अर्थात् रोगज्ञान के पांच उपाय—१. निदान २. पूर्वरूप, ३. लिंग (रूप), ४. उपशय और ५. सम्प्राप्ति, इन पांच उपायों से रोग पहिचाना जाता है ॥ ५ ॥ तत्र निदानं कारणमित्युक्तमग्रे पूर्वरूपं प्रागुत्पत्तिलक्षणं व्याधेः । रोगों के कारण को निदान कहते हैं, यह पहिले कह चुके हैं। रोग के उत्पन्न होने से पूर्व जो लक्षण उत्पन्न होते हैं, उनको 'पूर्वरूप' कहते हैं। (जैसे जंभाई का आना, अंगों का टूटना, शिर का दुखना आदि ये ज्वर के पूर्वरूप हैं।) रोग के आगे चलनेवाले लक्षण पूर्वरूप हैं। जैसे राजा के आने की सूचना राजा के आगे चलने वाले लोगों से मिल जाती है। प्रादुर्भूतलक्षणं पुनर्लिङ्गं, तत्र लिङ्गमाकृतिर्लक्षणं चिह्नं संस्थानं व्यञ्जनं रूपमित्यनर्थान्तरमस्मिन्नर्थे । रोग के उत्पन्न होने पर जो लक्षण स्पष्ट होते हैं, जिन लक्षणों से रोग का भान होने लगता है, उनको लिंग कहते हैं। इसके लिंग, आकृति, लक्षण, चिह्न, संस्थान, व्यञ्जन और रूप ये सब पर्यायवाची हैं। उपशयः पुनर्हेतुव्याधिविपरीतानां विपरीतार्थकारिणां चौषधा- हारविहाराणामुपयोगः सुखानुबन्धः । उपशय—हेतुविपरीत, व्याधि-विपरीत और विपरीतार्थकारी, औषध, आहार और विहार का सुखोत्पत्ति के लिये सेवन करना 'उपशय' १ है। १. उपशय द्वारा गूढ़ लिंगों, चिन्हों वाली व्याधि की परीक्षा की जाती है। जैसे 'मलेरिया' और 'कालाज़ार' रोग में। इनमें मलेरिया कुनीन से चला जाता है, परन्तु कालाज़ार नहीं जाता। इसका विवरण नीचे लिखे प्रकार से जानें। औषध—जैसे शीत कफ ज्वर में सोंठ हेतुविपरीत { अन्न—जैसे श्रम-वातजन्य ज्वर में मांस रस और चावल । विहार—जैसे दिन में सोने से उत्पन्न कफ ज्वर में रात को जागना ।

४१० चरकसंहिता [ अ० १ संप्राप्तिर्जातिरागतिरित्थन्त्वन्तरं व्याधेः। सा संख्या-प्राधान्य-विधि- विकल्प-बल-काल-विशेषैर्भिद्यते । संख्या तावद्यथा—अष्टौ ज्वराः, पञ्च गुल्माः, सप्त कुष्ठान्येवमादिः। प्राधान्यं पुनर्दोषाणां तरतमाभ्यां योगेनोप- लभ्यते । तत्र द्वयोस्तरस्त्रिषु तम इति । विधिर्नाम द्विविधा व्याधयो निजागन्तुभेदेन, त्रिविधास्त्रिदोषभेदेन, चतुर्विधाः साध्यासाध्य-मृदुदा- रुण-भेदेन । समवेतानां पुनर्दोषाणामंशांश-बल-विकल्पोऽस्मिन्नर्थे । बल- कालविशेषः पुनर्व्याधीनामृतवहोरान्त्राऽऽहार-काल-विधि-विनियतो भवति । तस्माद् व्याधीन् भिषगनुपहतसत्त्वबुद्धिर्हेत्वादिभिर्भावैर्यथा- वदनुबुध्येत ॥ ६ ॥ इत्यर्थसंग्रहो निदानस्थानस्योद्दिष्टो भवति, तं विस्तरेण भूयस्तरम- तोऽनुव्याख्यास्यामः ॥ ७ ॥ व्याधि की सम्प्राप्ति, जाति और आगति ये तीनों शब्द एक ही अर्थ के व्याधिविपरीत ⎧ औषध-जैसे अतिसार में पाठा स्तम्भन । ⎨ अन्न-जैसे अतिसार में मसूर । ⎩ विहार-जैसे उदावर्त्त में प्रवाहण । हेतु- ⎧ औषध-जैसे वातजन्य शोथ में दशमूल । व्याधिविपरीत ⎨ अन्न-जैसे शीत ज्वर में ज्वरनाशक यवागू । ⎩ विहार-जैसे दिन में सोने से उत्पन्न तन्द्रा में रात्रिजागरण । हेतु- ⎧ औषध-जैसे पित्तजन्य शोथ में गरम उपनाह ( पुल्टिस ) विपरीतार्थकारी ⎨ अन्न-जैसे पित्तजन्य शोथ में विदाही अन्न । ⎩ विहार-जैसे वातोन्माद में भय बतलाना । व्याधि- ⎧ औषध-जैसे छर्दि में मैनफल से वमन कराना । विपरीतार्थकारी ⎨ अन्न-जैसे अतिसार में दूध से विरेचन । ⎩ विहार-जैसे छर्दि में प्रवाहण । हेतु-व्याधि- ⎧ औषध-जैसे अग्नि से जलने पर अगुरुका लेप । विपरीतार्थकारी ⎨ अन्न-जैसे मदात्यय रोग में मद्यपान । ⎩ विहार-जैसे भ्रमजनित मूरुवात में पानी में तैरना ।

अ० १] निदानस्थानम् ४५१

अ० १] निदानस्थानम् ४५१ वाचक हैं। १ यह सम्प्राप्ति १. संख्या, २. प्राधान्य, ३. विधि, ४. विकल्प और ५. बलकाल भेद से पांच प्रकार की है। (१) संख्यासम्प्राप्ति—प्रत्येक रोग के भेदों की गणना का नाम संख्या- सम्प्राप्ति है। जैसे आठ प्रकार के ज्वर, पांच प्रकार के गुल्म, सात प्रकार के कुष्ठ इत्यादि। (२) प्राधान्य-सम्प्राप्ति दोषों के अधिकतर व अधिकतम (तारतम्य) से रोगों की प्रधानता व अप्रधानता होती है। (वृद्ध पित्त, वृद्धतर वायु और वृद्ध- तम कफ, यह एक प्रकार का सन्निपात है।) दो दोषों में एक दोष बढ़ा हो तो अधिकतर, तीन दोषों में एक दोष बढ़ा हो तो 'अधिकतम' समझना चाहिये। २ (३) विधि-सम्प्राप्ति—व्याधि भेद से विधिरूप सम्प्राप्ति होती है। निज अर्थात् शारीरिक और आगन्तुज भेद से व्याधि दो प्रकार का है। वात आदि दोष भेद से तीन प्रकार का, और साध्य, असाध्य, मृदु और दारुण भेद से चार प्रकार का है। (४) विकल्प-सम्प्राप्ति—जिस समय वात आदि दोष दो या तीन मिलते हैं, उस समय अंशांश बल की कल्पना (विवेचना) को विकल्प-सम्प्राप्ति कहते हैं। यथा—वायु के प्रकुपित होने पर भी कभी तो वात का शीत अंश बलवान् होता है, कभी लघु अंश और कभी रूक्ष अंश एवं कभी लघु और रूक्ष दोनों अंश बलवान् होते हैं। (५) बलकालसम्प्राप्ति—ऋतु, दिन, रात, आहार और काल भेद से रोग के बलकाल में अन्तर पड़ जाता है। जैसे ऋतु और कफज्वर का वसन्त, अहोरात्र कफज्वर का पूर्वाह्न और प्रदोष, आहार-कफज्वर का भुक्तमात्रकाल। स्वस्थचित्त एवं बुद्धिमान् वैद्य (धैर्य एवं शान्ति तथा बुद्धि से) हेतु पूर्वरूप आदि से रोगों की यथार्थ परीक्षा करे। यह निदानस्थान का संक्षेप में वर्णन कर दिया, अब इसी का विस्तार से वर्णन करते हैं ॥६-७॥ तत्र प्रथमत एव तावदाज्ञाँक्षोभाभिद्रोह-कोप-प्रभवानष्टौ व्याधी- न्निदानपूर्वेण क्रमेणानुव्याख्यास्यामः, तथा सूत्रसंग्रहमात्रं चिकि- १. कुछ लोग रोगोत्पत्ति के अन्तिम कारण से उत्पन्न कर्म को सम्प्राप्ति कहते हैं। यथा-'स यदा प्रकुपितः प्रविश्याऽऽमाशयम्' यहां से लेकर 'तदा ज्वर- मभिनिर्वर्तयति' तक ज्वर की सम्प्राप्ति कही है। २. माधव-निदान में स्वतन्त्रता और परतन्त्रता को लक्ष्य में रखकर रोग की प्रधानता या अप्रधानता की परीक्षा की है।

४१२ चरकसंहिता [अ० १ त्सायाः। चिकित्सितेषु चोत्तरकालं यथोद्दिष्टं यथोपचितविकाराननुव्या- ख्यास्यामः ॥८॥ इनमें प्रथम निदान क्रम से क्षोभ, अभिद्रोह, कोप आदि से उत्पन्न आठ रोगों का वर्णन निदान स्थान में करेंगे, इसके पीछे संक्षेप से चिकित्सासूत्र कहेंगे। इसके अनन्तर सब रोगों का सविस्तर वर्णन चिकित्सास्थान में किया जायगा ॥ ८ ॥ इह तु ज्वर एवाऽऽदौ विकाराणामुपदिश्यते, तत्प्रथमत्वाच्छारी- राणाम् । अथ खल्वष्टाभ्यो ज्वरः संजायते मनुष्याणाम् । तद्यथा वातात् पित्तात् कफात् वातपित्ताभ्यां, वातकफाभ्यां, पित्तश्लेष्मभ्यां, वात- पित्तश्लेष्मभ्यः, आगन्तोरष्टमात्कारणात् । तस्य निदान-पूर्वरूप-लिङ्गो- पशय-संप्राप्ति-विशेषांनुपदेक्ष्यामः ॥ ९ ॥ ज्वर निदान—सब रोगों में प्रथम ज्वर का ही वर्णन करते हैं। क्योकि शारीरिक रोगों में सब से मुख्य ज्वर है । मनुष्यों को ज्वर आठ कारणों से होता है । १. वात से, २. पित्त से, ३. कफ से, ४. वात-पित्त से, ५. पित्त-कफ से, ६. वात-कफ से, ७. वात-कफ और पित्त ( सन्निपात ) से और ८. आगन्तुज कारण से । अब ज्वर के निदान, पूर्वरूप, लिंग, उपशय और सम्प्राप्ति का विस्तार से वर्णन करते हैं ॥ ९ ॥ तद्यथा--रूक्ष-लघु-शीत-व्यायाम-वमन-विरेचनाऽऽस्थापन-शिरोविरे- चनातिंयोग-वेगसंधारणानशनाभिघात-व्यवायोद्वेग-शोक-शोणिताभिषेक- जागरण-विषम-शरीर-न्यासेभ्योऽतिसेवितेभ्यो वायुः प्रकोपमापद्यते । वात प्रकोप के कारण—रूक्ष, लघु, शीत, व्यायाम, वमन, विरेचन, आस्थापन इनके अतियोग से, मल-मूत्र आदि के उपस्थित वेग को रोकने से, उपवास से, चोट लगने से, स्त्रीसंग, उद्वेग, शोक, और रक्त के अधिक निकलने से, रात्रि-जागरण से, विषम रीति से शरीर के अवयवों को रखने से, इन कारणों के अतिसेवन से वायु प्रकुपित होती है । स यदा प्रकुपितः प्रविश्याऽऽमाशयमूष्मणः स्थानमूष्मणा सह मिश्री- भूत आद्यमाहारपरिणामधातुं रसनामानमन्ववेत्य रसस्वेदवहानि च स्रोतांसि च पिधायाग्निमुपहत्य पक्तिस्थानादूष्माणं बहिर्निरस्य केवलं शरीरमनुप्रपद्यते, तदा ज्वरमभिनिर्वर्तयति । तस्येमानि लिङ्गानि भवन्ति ॥

अ० १ ] निदानस्थानम् ४११

अ० १ ] निदानस्थानम् ४११ सम्प्राप्ति—उपरोक्त कारणों से कुपित हुआ वायु उष्णिमा के स्थान आमा- शय में पहुंच जाता है। वहां उष्णिमा के साथ मिलता है। फिर अन्न के पाचन से उत्पन्न 'रस' नाम के धातु का आश्रय लेता है। इस धातु का आश्रय लेकर वायु रसवह और स्वेदवह स्रोतों को बन्द कर देता है, जठराग्नि को मन्द कर देता है और आमाशय से पाचकाग्नि को बाहर निकाल कर सम्पूर्ण शरीर में फैला देता है, इस लिये ज्वर उत्पन्न होता है। इस वातज्वर के निम्न लिखित लक्षण होते हैं ॥ तद्यथा-विषमारम्भविसर्गित्वम्, ऊष्मणो वैषम्यं, तीव्रतनुभावान- वस्थानानि ज्वरस्य, जरणान्ते दिवसान्ते निशान्ते धर्मान्ते वा ज्वराभ्या- गमनमभिवृद्धिर्वा ज्वरस्य। विशेषेण परुषारुणवर्णत्वं नख-नयन-वदन- मूत्र-पुरीष-त्वचामत्यर्थं कृशीभावश्च, अनेकविधोपमाश्चलाचलाश्च वेदना- स्तषां तेषामङ्गावयवानां, तद्यथा-पादयोः सुप्तता, पिण्डिकयोद्वेष्टनं, जानुनोः केवलानां च सन्धीनां विश्लेषनमूर्वोः सादः, कटि-पार्श्व-पृष्ठ-स्कन्ध- बाह्वंसोरसां च भग्न-रुग्ण-मृदित-मथित-चटितावपीडितावन्नग्नत्वमिव, हन्वोश्चाप्रसिद्धिः, स्वनश्च कर्णयोः, शङ्खयोर्निस्तोदः, कषायास्यताऽऽस्य- वैरस्यं वा, मुख-तालु-कण्ठ-शोषः, पिपासा, हृदयग्रहः, शुष्कच्छर्दिः, शुष्ककासः, क्षवथूद्गारविनिग्रहोऽन्नरसखेदः, प्रसेकारोचकाविपाकाः, विषाद-विजृम्भा-विनाम-वेपथु-श्रम-भ्रम-प्रलाप-जागरण-रोमहर्ष-दन्तह- र्षास्तथोष्णाभिप्रायता, निदानांक्तानामनुपशयो विपरीतोपशयश्चेति वात- ज्वरस्य लिङ्गानि स्युः ॥ १० ॥ वातज्वर के लक्षण - जैसे ज्वर के चढ़ने या उतरने के समय का नियम न होना, शरीर में उष्णिमा का नियम न होना, ज्वर की तीव्रता या कम होने की प्रतीति में अस्थिरता, अन्न के पचन होने के समय, सायंकाल में, अथवा वर्षा ऋतु के प्रारम्भ में ज्वर का आना, अथवा ज्वर में वृद्धि होना; विशेषतः नख, आंख, मूत्र, मल, और त्वचा का बहुत कठिन और काला-लाल रंग पड़ना, मलमूत्र का अवरोध, (नख-त्वचा आदि का फटना ), भिन्न-भिन्न अंगो में नाना प्रकार की चल और अचल ( गतिशील या स्थिर ) पीड़ाओं का होना। जैसे-दोनों पांवों में सो जाने की सी प्रतीति, पिण्डलियों में ऐंठन, घुटने एवं सम्पूर्ण सन्धियों में टूटने और गीले कपड़े से ढांपे होने की भांति की दर्द जंघाओं में शिथिलता; कमर, पार्श्व-पीठ-स्कन्ध-बाहु और छाती में टूटने के समान, फटने के समान, मर्दन करने के समान, चटकने के समान,

४१४ चरकसंहिता [ अ० १ अवपीडन अर्थात् दबाने के समान और सूइयां चुभने के समान वेदनायें होती हैं। हनुग्रह (जबड़े का न खुलना), कानों में आवाज़ (कर्णनाद) कान एवं शंख प्रदेश (कनपटी) में वेदना, मुख का कषाय स्वाद, मुख में विरसता, मुख, तालु, कण्ठ का पुन: २ सूखना; प्यास का अधिक लगना, दिल या छाती का जकड़ना, रुक जाना, सूखी उबकाई, वमन होने पर वमन में किसी पदार्थ का बाहर न निकलना, सूखी खांसी, छींक और डकार का बन्द हो जाना; सब अवसरों में अनिच्छा (अथवा अन्न रस का वमन); मुख से पानी का बहना; अरुचि, भोजन की अनिच्छा, अविपाक (भोजन का न पचना), विषाद, जम्भाईयां आना, अंगों का मुड़ना-तुड़ना, अंगड़ाईं आना, कम्पन, प्रलाप, जागरण (नींद का न आना), रोमों का भर-भरा आना (दान्तों का स्तम्भ हो जाना) गरम वस्तुओं को चाह; एवं वातज्वर के निदा- नभूत वस्तुओं का सेवन अनुकूल न आना तथा निदान (रूक्ष लघु, शीतादि गुणों) के विपरीत गुणों वाले पदार्थों को अनुकूल आना ये सब वातज्वर के लक्षण हैं ॥ १० ॥ उष्णाम्ल-लवण-क्षार-कटुकाजीर्ण-भोजनेभ्योऽतिसेवितेभ्यस्तथाऽति- तीक्ष्णातपाग्नि-सन्ताप-श्रम-क्रोध-विषमाहारेभ्यश्च पित्तं प्रकोपमापद्यते । पित्त प्रकोप के कारण—उष्ण, खट्टा, नमकीन, क्षार, कटु और अजीर्ण- कारक पदार्थों के अतिसेवन से; तथा अतितीक्ष्ण, बहुत धूप, अग्निसन्ताप, श्रम, क्रोध, विषम भोजन के सेवन से पित्त प्रकुपित होता है । तद्यदा प्रकुपितमामाशयादूष्माणमुपसृज्याऽऽद्यमाहारपरिणामधातुं रसनामानमन्ववेत्य रसस्वेदवहानि स्रोतांसि पिधाय द्रवत्वादग्निमुप- हत्य पक्तिस्थानादूष्माणं बहिर्निरस्य प्रपीडयत्केवलं शरीरमनुप्रपद्यते तदा ज्वरमभिनिर्वर्तयति; तस्येमानि लिङ्गानि भवन्ति । पित्तज्वर की सम्प्राप्ति-यह प्रकुपित हुवा पित्त आमाशय में स्थित उष्णिमा से मिलकर, अन्न के पाचन से उत्पन्न प्रसाद नामक रस से मिलकर रसवह और स्वेदवह स्रोतों को बन्द कर देता है और पित्त द्रव होने से अग्निको मन्द करता है, इसलिये पक्वाशय से उष्णिमा को बाहर निकाल देता है, तब पित्त सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर शरीर को पीड़ित करता है। इस प्रकार से ज्वर को उत्पन्न करता है। पित्त ज्वर के लक्षण ये होते हैं ॥ तद्यथा-युगपदेव केवले शरीरे ज्वरस्याभ्यागमनमभिवृद्धिश्च भुक्तस्य विदाहकाले मध्यन्दिनेऽर्धरात्रे शरदि वा बिशेषेण, कटुकास्यता

अ० १ ] निदानस्थानम् ४१५

अ० १ ] निदानस्थानम् ४१५ घ्राण-मुख-कण्ठोष्ठ-तालु-पाकः, ऊष्मा, तृष्णा, भ्रमः, मदः, मूर्च्छा, पित्तच्छ- र्दनमतीसारोऽन्नद्वेषः, सदनं, संस्वेदः, प्रलापः, रक्तकोठाभिनिर्वृत्तिः शरीरे, हरितहारिद्रत्वं नख-नयन-वदन-मूत्र-पुरीष-त्वचामत्यर्थमुष्णत्वस्ती- व्रभावोऽतिमात्रं दाहः, शीताभिप्रायता, निदानोक्तानामनुपशयो, विप- रीतोपशयश्चेति पित्तज्वरलिङ्गानि भवन्ति ॥ ११ ॥ पित्त-ज्वर के लक्षण—यथा—सम्पूर्ण शरीर में एक साथ ( सहसा ) ज्वर का चढ़ना, अथवा ज्वर का बढ़ना; भोजन के पचने के समय, मध्यान्ह में, आधी रात में, शरद् ऋतु में, विशेष करके ज्वर बढ़ता है; मुख में कड़वापन; नासिका, मुख, कण्ठ, ओष्ठ, तालु का पकना; गरमी, प्यास का लगना, भ्रम, मद, मूर्च्छा, पित्त का वमन, अतिसार, अन्न में अनिच्छा, पसीना आना, प्रलाप, शरीर पर लाल लाल धब्बे वा चक्के, फुन्सियां निकलना, नख-आंख-मुख-मूत्र- मल-त्वचा इन का रंग हरा या हल्दी के समान हो जाना; गरमी बहुत बढ़ जाना, बहुत अधिक जलन होना, शीत वस्तुओं की चाह रहना और पित्त ज्वर के कारण रूप पदार्थों का अनुकूल न आना एवं विपरीत गुण वाले पदार्थों- का अनुकूल आना ये पित्तज्वर के लक्षण हैं ॥ ११ ॥ स्निग्ध-गुरु-मधुर-पिच्छिल-शीताम्ल-लवण-दिवास्वप्र-हर्षाऽव्यायामे- भ्योऽतिसेवितेभ्यः श्लेष्मा प्रकोपमापद्यते । कफ प्रकोप के कारण—चिकनास, मीठे, भारी, शीतल, पिच्छिल, खट्टे नमकीन पदार्थों के अतिसेवन से, दिन में सोने से, हर्ष वा आनन्द के अति सेवन तथा व्यायाम के न करने से कफ प्रकुपित होता है । स यदा प्रकुपितः प्रविश्याऽऽमाशयमूष्मणा सह मिश्रीभूयाऽऽममाहा- रपरिणामधातुं रसनामानमन्ववेत्य रसस्वेदवहानि स्रोतांसि पिधाया- ग्निमुपहत्य पक्तिस्थानादूष्माणं बहिर्निरस्य प्रपीडयन् केवलं शरीरमनु- प्रपद्यते, तदा ज्वरमभिनिर्वर्तयति; तस्येमानि लिङ्गानि भवन्ति । कफज्वर की सम्प्राप्ति—कुपित कफ आमाशय में जाकर उष्णिमा के साथ मिलकर, अन्न के परिणाम भूत रस नामक धातु से मिल कर, रसवह और स्वेदवह स्रोतों को बन्द करके अग्नि को मन्द कर देता है । पक्वाशय से अग्नि को बाहर निकाल कर सम्पूर्ण शरीर को पीड़ित करता है । इस प्रकार से कफ ज्वर को उत्पन्न करता है । कफ ज्वर के लक्षण ये होते हैं । तद्यथा—युगपदेव केवले शरीरे ज्वरस्याभ्यागमनमभिवृद्धिर्वा । भुक्तमात्रे पूर्वाह्ने पूर्वरात्रे वसन्तकाले वा विशेषेण गुरुगात्रत्वमनन्ना-

४१६ चरकसंहिता [ अ० १ मिलाषः, श्लेष्मप्रसेको, मुखस्य च माधुर्यं, हृल्लासो, हृदयोपलेपस्ति- मितत्वं, छर्दिर्मेन्दूग्निता, निद्राधिक्यं, स्तम्भस्तन्द्रा, श्वासः, कासः, प्रतिश्यायः, शैत्यं, शैत्यं च नख-नयन-वदन-मूत्र-पुरीष-त्वचामत्यर्थं, शीत- पिडकाश्च भृशमङ्गेभ्य उत्तिष्ठन्ति, उष्णाभिप्रायता, निदानोक्तानाम- नुपशयो विपरीतोपशयश्चेति श्लेष्मज्वरलिङ्गानि भवन्ति ॥ १२ ॥ कफज्वर के लक्षण—यथा—सम्पूर्ण शरीर में ज्वर एक साथ आता है, या बढ़ता है। भोजन करने के समय (या खा चुकने पर ही) पूर्वाह्न में, रात्रि के प्रथम भाग में, या वसन्त ऋतु में ज्वर का वेग बढ़ा होता है ↓ शरीर में भारीपन, भोजन में अरुचि, मुख से लार बहना, मुख में मिठास, वमन की रुचि, बेचैनी, हृदय का रुकना, हृदय (आमाशय) प्रदेश पर कफ का लगा रहना, आलस्य (तन्द्रा), वमन, अग्नि का मन्द होना, नींद का अधिक आना, जड़ता सुस्ती, खांसी, श्वास, जुकाम, शीत लगना, नख, आंख, मुख, मूत्र, मल और त्वचा में सफेदी; शरीर पर बहुतसी पिडिकाओं, फुन्सियों का निकल आना, इन पिडकाओं का स्पर्श शीतल होता है। उष्ण पदार्थों की चाह रहती है, कफज्वर के कारण वाले पदार्थों का अनुकूल न आना और विपरीत गुण वाले पदार्थों का अनुकूल आना होता है। ये कफज्वर के लक्षण हैं ॥१२॥ विषमाशनादनशनादन्नपरिवर्त्तादृतुव्यापत्तेरसात्म्यगन्धोपघ्राणाद् विषोपहतस्योदकस्य चोपयोगाद् गरेभ्यो गिरीणां चोपश्लेषात् स्नेह-स्वेद- वमन-विरेचनाऽऽस्थापनानुवासन-शिरोविरेचनानामयथावत्प्रयोगात् मि- थ्यासंसर्जनाद्वा स्त्रीणां च विषमप्रजननात् प्रजातानां च मिथ्योपचाराद्य- थोक्तानां च हेतूनां मिश्रीभावाद्यथानिदानं द्वन्द्वनामन्यतमः सर्वे वा त्रयो दोषा युगपत्प्रकोपमापद्यन्ते, ते प्रकुपितास्तयैवाऽऽनुपूर्व्या ज्वरम- भिनिर्वर्तयन्ति । तीन दोषों के प्रकोप के कारण ज्वर—विषम भोजन से, भोजन के न करने से, ऋतु के बदलने से, ऋतु के विकृत (अतियोग, मिथ्यायोग) होने से; प्रति- कूल-गंधयुक्त पदार्थों के सूंघने से; विषयुक्त पानी के उपयोग से; संयोगजन्य विष के दोष से; पर्वतों के पास में रहने से; स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन, और शिरोविरेचन के अयोग्य प्रयोग से स्त्रियों के विषम प्रसव करने से; बालक की उत्पत्ति के पीछे मिथ्या परिचर्या से; और पूर्व कहे हुए वात, पित्त, कफ इन दोषों के परस्पर मिश्रण से दो दोष या तीनों दोष एक साथ प्रकुपित हो जाते हैं। औषधिकी गन्ध से ज्वर होता है—यथा "हाई फीवर"।

अ० १] २७ निदानस्थानम् ४१७

अ० १] २७ निदानस्थानम् ४१७

तत्र यथोक्तानां ज्वरलिङ्गानां मिश्रीभावविशेषदर्शनाद् द्वन्द्विक- मन्यतमं ज्वरं सान्निपातिकं वा विद्यात् ॥ १३ ॥ संसर्गज व सान्निपातिक ज्वर—इस प्रकार से दो दोष या तीन दोष साथ मिलकर अनुक्रम से-कफ-वातज, कफ-पित्तज और कफ-वात-पित्तज ज्वर को उत्पन्न करते हैं। द्वन्द्वज ज्वर में दो दोष कुपित होकर दोनों दोषों के लक्षण उत्पन्न करते हैं, इसी प्रकार तीनों दोषों से उत्पन्न ज्वर में तीनों दोषों के लक्षण होते हैं। इन लक्षणों को देखकर दो या तीन दोषों से उत्पन्न ज्वरों को जानना चाहिये ॥ १३ ॥ अभिघाताभिषङ्गाभिचाराभिशापेभ्य आगन्तुर्हि व्यथापूर्वो ज्व- रोऽष्टमो भवति । आगन्तुज ज्वर—अभिघात (चोट आदि के लगना ), अभिषंग (काम आदि वेग ), अभिचार ( अथर्वमन्त्र आदि से ज्वर पैदा करना ), अभिशाप ( गुरु, सिद्ध आदि पुरुषों का शाप ), इन मुख्य चार कारणों से व्यथापूर्वक आगन्तुज ज्वर उत्पन्न होता है। यह ज्वर आठवां प्रकार का है। स किंचित्कालमागन्तुः केवलॊ भूत्वा पश्चाद् दोषैरनुबध्यते । तत्राभिघातजो वायुना दुष्टशोणिताधिष्ठानेन, अभिषङ्गः पुनर्व्वातपि- त्ताभ्यां, अभिचाराभिशापजौ तु सन्निपातेनानुबध्येते । स सप्तविधाज्ज्व- राद्विशिष्टलिङ्गोपक्रमसमुत्थानत्वाद्विशिष्टो वेदितव्यः, कर्मणा साधारणेन चोपकर्म्यत इत्यष्टविधा ज्वरप्रकृतिरुक्ता ॥ १४ ॥ आगन्तुज ज्वर की सम्प्राप्ति—आगन्तुज ज्वर उत्पन्न होकर कुछ काल ( सात दिन वा तीन दिन ) तक रहता है, फिर वात आदि दोष के साथ मिल जाता है। अभिघातज ज्वर में प्रथम चोट आदि से ज्वर उत्पन्न होता है, पीछे से दोष उत्पन्न होता है। इस ज्वर में वायु दूषित रक्त के साथ मिलकर इसका आश्रय करके रहता है। अभिसंगज ज्वर वात-पित्त का आश्रय करता है। अभिचार और अभिशाप से उत्पन्न ज्वर तीनों दोषों का आश्रय करके रहते हैं। आगन्तुज ज्वर के लक्षण, चिकित्सा और इसका निदान, दूसरे वात आदि दोषों से उत्पन्न सात प्रकार के ज्वर से सर्वथा भिन्न प्रकार के हैं, अर्थात् दैवव्यपाश्रय बलि मंगल आदि तथा युक्ति व्यपाश्रय चिकित्सा करनी चाहिये। इसका साधारण कर्म, सब प्रकार के ज्वरों में सामान्यतः एक ही

१. 'व्यथापूर्वः' आगन्तुज ज्वर में व्यथा ही पूर्वरूप है। इन में प्रथम ज्वर होकर फिर दोषों का सम्बन्ध होता है।