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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

५१६ चरकसंहिता [ अ० ३

वैद्य लोग गरम पानी देते हैं। ज्वर की उत्पत्ति आमाशय से होती है। आमाशय से उत्पन्न होने वाले रोगों के लिये पाचन, वमन, अपतर्पण संशमन आदि उपचार प्रायः होते हैं। इसलिये ज्वर के रोगी को पाचन कराने के लिये वैद्य लोग गरम पानी अधिकतर देते हैं। यह पीया हुआ गरम पानी वायु का अनुलोमन करता है, जाठराग्नि को बढ़ाता है, शीघ्र पच जाता है, जीर्ण हो जाता है, कफ को सुखाता है और थोड़ा भी पिया हुआ गरम पानी प्यास को शान्त करने के लिये पर्याप्त होता है। यह गरम पानी इतना लाभप्रद होने पर भी जिस ज्वर में पित्त बहुत बढ़ा हो उस में और दाह, भ्रम, प्रलाप अथवा अतिसार की अवस्था में भी नहीं देना चाहिये। गरमी से दाह, भ्रम, प्रलाप और अतिसार और अधिक बढ़ते हैं। ये रोग शीत उपचार से शान्त होते हैं ॥ ४५ ॥ भवति चात्र—शीतेनोष्णकृतान् रोगान् शमयन्ति भिषग्वििदः । ये तु शीतकृता रोगास्तेषां चोष्णं भिषग्जितम् ॥ ४६ ॥ चिकित्सक ज्ञानी लोग गरमी (उष्णता) से उत्पन्न हुए रोगों को शीत चिकित्सा से शमन करते हैं और शीत कारण से उत्पन्न रोगों को उष्ण चिकि- त्सा से शान्त करते हैं अर्थात् निदान से विपरीत चिकित्सा करते हैं ॥ ४६ ॥ एवमितरेषामपि व्याधीनां निदानविपरीतमौषधं भवति कार्यम् । यथा—अपतर्पणनिमित्तानामपि व्याधीनां नान्तरेण पूरणमस्ति शान्ति- स्तथा पूरणनिमित्तानां नान्तरेणापतर्पणमिति ॥ ४७ ॥ इस प्रकार से अन्य रोगों में भी कारण के विपरीत चिकित्सा करनी होती है। जिस प्रकार कि अपतर्पण क्रिया से उत्पन्न रोगों की शान्ति संतर्पण क्रिया के बिना नहीं होती, उसी प्रकार संतर्पणजन्य रोगों की शान्ति अपतर्पण क्रिया के बिना नहीं होती ॥ ४७ ॥ अपतर्पणमपि च त्रिविधं लङ्घनं, लङ्घनपाचनं, दोषावसेचनं चेति ॥ ४८ ॥ अपतर्पण भी तीन प्रकार का है। (१) लंघन, (२) लंघन-पाचन और (३) दोषावसेचन (दोषों का बाहर निकालना) ॥ ४८ ॥ तत्र लङ्घनमल्पबलदोषाणां, लङ्घनेन ह्यग्निमारुतवृद्ध्या वाता- तपपरीतमिवल्पमुदकमल्पदोषः प्रतोषमापद्यते ॥ ४९ ॥ इन में जब दोषों का बल अल्प हो, तब लंघन करना चाहिये। लंघन

अ० ३ ] विमानस्थानम् ५१७

अ० ३ ] विमानस्थानम् ५१७ अग्नि और वायु की वृद्धि होती है । जिस प्रकार थोड़ा पानी वायु और धूप के बढ़ने से शुष्क हो जाता है। उसी प्रकार इन की वृद्धि से अल्पबलवाला दोष शुष्क हो जाता है ॥ ४६ ॥ लङ्घनपाचनाभ्यां हि मध्यबलो दोषः सूर्यसन्तापमारुताभ्यां पांशुभस्मावकिरणैरिव चानतिबहूदकं प्रशाषमापद्यते ॥ ५० ॥ दोषों का मध्यम बल होने पर लंघन और पाचन कर्म करना चाहिये जिस प्रकार सूर्य के संताप एवं वायु द्वारा धूल और भस्म के फेंकने से साधा- रण मात्रा का पानी (बहुत अधिक राशि नहीं) सूख जाता है, उसी प्रकार लंघन और पाचन से मध्यम बलवाले दोष शान्त हो जाते हैं। (धूल और भस्म का फेंकना, पाचन क्रिया का उपलक्षक है और सूर्य का संताप और वायु लंघन क्रिया का ।) ॥ ५० ॥ बहुदोषाणां पुनर्दोषावसेचनमेव कार्यं, न ह्यभिन्ने केदारसेतौ पल्वलप्रसेकोऽस्ति, तद्वद्दोषावसेचनम् ॥ ५१ ॥ दोषों के प्रबल होने पर इन का अवसेचन (निष्कासन) ही करना चाहिये । जैसे खेत को मेढ़ की तोड़े बिना खेत के पानी को सुखा देना अस- म्भव है। मेढ़ को तोड़कर पानी निकाल देने से खेत शीघ्र सूख जाता है। इसी प्रकार वमन, विरेचन आदि से अधिक बढ़े हुए दोषों को शरीर से बाहर कर देने पर दोषों की शान्ति होती है ॥ ५१ ॥ दोषावसेचनं तु खल्वन्यद्वा भेषजं प्राप्तकालमप्यातुरस्य नैवंविध- स्य कुर्यात्, तद्यथा—अनपवादप्रतीकारस्यापरिचारकस्य वैद्यमानिनश्च- ण्डस्यासूयकस्य तीव्रधर्मारुचेरतिक्षीण-बल-मांस-शोणितस्यासाध्यरोगो- पहतस्य मुमूर्षुलिङ्गन्विस्य चेति । एवंविधं ह्यातुरमुपचरन् भिषक् पापी- यसाऽयशसा योगमृच्छतीति ॥ ५२ ॥ चिकित्सा में त्याज्य रोगी वा निम्न प्रकार के रोगी की दोषावसेचन (संशो- धन रूप) अथवा संशमनरूप चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। यथा जिससे अपवाद का प्रतिकार न हो सके, जो रोगी उपकरणों का संग्रह नहीं कर सके, ऐसे निर्धन की, जिस के पास परिचारक न हो, अपने को वैद्य मानने वाले, क्रोधी, निन्दा करने वाले, जिस का बल, मांस रक्त, बहुत क्षीण हो गया हो, असाध्य रोग से आक्रान्त, जिस में मरणोन्मुख लक्षण स्पष्ट हों, इस प्रकार के रोगी की चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। यदि इस प्रकार के रोगी की चिकित्सा वैद्य करता है तो पापमूलक-अपकीर्ति को प्राप्त होता है ॥ ५२ ॥

५१८ चरकसंहिता [ अ० ३ भवन्ति चात्र—अल्पोदकद्रुमो यस्तु प्रवातः प्रचुरातपः । ज्ञेयः स जाङ्गलो देशः स्वल्परोगतमोऽपि च ॥ ५३ ॥ प्रचुरोदकवृक्षो यो निवातो दुर्लभातपः । अनूपो बहुदोषश्च, समः साधारणो मतः १ ॥ ५४ ॥ जिस देश में पानी और वृक्ष कम हों, वायु और धूप बहुत प्रचण्ड हो वह जांगल देश जानना चाहिये । उसमें बहुत कम रोग होते हैं। जिस देश में जल और वृक्ष बहुत हों, वायु न चले और धूप भी न हो, वह अनूप देश कहाता है जिसमें वात और धूप दोनों समान हो वह देश समदेश कहाता है ॥ ५३-५४ ॥ तदात्वे चानुबन्धे वा यस्य स्यादशुभं फलम् । कर्मणस्तन्न कर्त्तव्यमेतद् बुद्धिमतां मतम् ॥ ५५ ॥ तत्काल में अथवा उत्तर काल में जिस कर्म का फल अशुभ हो, वह कर्म नहीं करना चाहिये, यह बुद्धिमानों का मत है ॥ ५५ ॥ तत्र श्लोकाः— पूर्वरूपाणि सामान्या हेतवः स्वस्वलक्षणाः । देशोद्ध्वंसस्य भैषज्यं हेतूनां मूलमेव च ॥ ५६ ॥ प्राग्विकारसमुत्पत्तिरायुषश्च क्षयक्रमः । मरणं प्रतिभूतानां कालाकालविनिश्चयः ॥ ५७ ॥ यथा चाकालमरणं यथा युक्तं च भेषजम् । सिद्धिं यात्यौषधं येषां न कुर्याद्येन हेतुना ॥ ५८ ॥ तदात्रेयोऽग्निवेशाय निखिलं सर्वमुक्तवान् । देशोद्ध्वंसनिमित्तीये विमाने मुनिसत्तमः ॥ ५६ ॥ जनपदोद्ध्वंस के पूर्वरूप, सामान्य कारण, प्रत्येक के अपने अपने लक्षण, चिकित्सा (पंच कर्म), कारणों का मूल कारण अधर्म, रोगों की प्रारम्भिक उत्पत्ति, आयु और धर्म के ह्रास का क्रम, कालमृत्यु और अकालमृत्यु, निदान और दोष, बलापेक्षित औषध, जिनकी चिकित्सा नहीं करनी, ये सब बातें इस अध्याय में मुनिश्रेष्ठ भगवान् आत्रेय ने शिष्य अग्निवेश के लिये सम्पूर्ण रूप से कह दीं ॥ ५६-५६ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने जनपदोद्ध्वंसनीय- विमानं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ १. ये दो श्लोक भी कहीं २ देखने में आते हैं।

अ० ४ ] विमानस्थानम् ५१६

अ० ४ ] विमानस्थानम् ५१६ चतुर्थोऽध्यायः । अथातस्त्रिविधरोगविशेषविज्ञानीयं विमानं व्याख्यास्यामः । इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब 'त्रिविधरोग-विशेष-विज्ञानीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥ त्रिविधं खलु रोगविशेषविज्ञानं भवति । तद्यथा-आप्तोपदेशः प्रत्यक्षमनुमानं चेति ॥ ३ ॥ रोग-विशेष विज्ञान तीन प्रकार का है । जैसे-( १ ) आप्त-उपदेश, ( २ ) प्रत्यक्ष और ( ३ ) अनुमान ॥ ३ ॥ तत्राऽऽप्तोपदेशो नाम—आप्तवचनम्। आप्ता ह्यवितर्क-स्मृति-विभा- गविदो निष्प्रीत्युपतापदर्शिनश्च । तेषामेवंगुणयोगाद्यद्वचनं तत्प्रमाणं, अप्रमाणं पुनर्मत्तोन्मत्त-मूर्ख-वक्तृ-दृष्टादृष्ट-वचनमिति ॥ ४॥ ( १ ) आप्तोपदेश—आप्तजनों के वचनों का नाम आप्त-उपदेश है । आप्त ही वितर्क से भिन्न अर्थात् सन्देह से रहित और स्मृति ज्ञान से युक्त साक्षात् अनुभव और विभाग अर्थात् एक देश से भिन्न सम्पूर्ण तत्त्व के जानने वाले । शास्त्र ज्ञान में संशय रहित एवं प्राणियों में प्रीति (राग) उपताप ( द्वेष ) के भावों से शून्य, रागद्वेषरहित होते हैं। इस प्रकार के गुण होने से इन आप्त पुरुषों का वचन प्रमाण हो सकता है । मत्त, उन्मत्त ( पागल ), मूर्ख आदि पुरुषों के दृष्ट¹ ( ऐहिक ) और अदृष्ट ( आमुष्मिक ) दोनों तरह के वचन अप्रमाण होते हैं ॥४॥ प्रत्यक्षं तु खलु तत्—यत्स्वयमिन्द्रियैर्मनसा चोपलभ्यते ॥ ५ ॥ प्रत्यक्ष—जो अपनी इन्द्रियों और मन से ज्ञान होता है,वह प्रत्यक्ष है ॥५॥ अनुमानं खलु—तर्को युक्त्यपेक्षः ॥ ६ ॥ अनुमान—अनुमान तर्क है जो युक्ति की अपेक्षा करता है । ( कार्य कारण सम्बन्ध या अव्यभिचरित व्याप्ति का नाम युक्ति है ) ॥६॥ त्रिविधेन खल्वनेन ज्ञानसमुदयेन पूर्वं परीक्ष्य रोगं सर्वथा सर्व- मथोत्तरकालमध्यवसानमदोषं भवति । नहि ज्ञानाक्यवेन कृत्स्ने ज्ञेये ज्ञानमुत्पद्यते ॥ ७ ॥ १. 'मूर्खरक्तदुष्टादुष्टवचनं' इति वा पाठः । मूर्ख पुरुष के दोषयुक्त और निर्दोष वचन भी प्रमाण नहीं, अथवा मूर्ख, और ( रक्त ) दोषयुक्त, ।

५२० चरकसंहिता [ अ० ४ तीन प्रकार के ज्ञान-समुदाय से प्रथम रोग की परीक्षा करके सब प्रकार से ओर सारा देखकर पीछे से पूर्ण निश्चय करके चिकित्सा करना निर्दोष होता है । ज्ञान के एक अवयव को जान लेने से ज्ञेय अर्थात् जानने योग्य वस्तु का सम्पूर्ण ज्ञान नहीं हो सकता । इसलिये वैद्य को चाहिये कि तीनों प्रमाणों से रोग को एक अंश में ही नहीं, प्रत्युत सम्पूर्ण रूप में जाने ॥७॥ त्रिविधे त्वस्मिन् ज्ञानसमुदाये पूर्वमाप्तोपदेशाज्ज्ञानम् । ततः प्रत्य- क्षानुमानाभ्यां परीक्षोपपद्यते । किं ह्यनुपदिष्टे पूर्वं प्रत्यक्षानुमानाभ्यां परीक्षमाणो विद्यात् ? तस्मात् द्विविधा परीक्षा ज्ञानवतां प्रत्यक्षमनु- मानं चेति, त्रिविधा वा सहोपदेशेन ॥ ८ ॥ इस तीन प्रकार के ज्ञान समुदाय में सब से प्रथम 'आप्तोपदेश' से ज्ञान होता है। इसके पीछे प्रत्यक्ष और अनुमान द्वारा परीक्षा होती है। यदि पूर्व आप्तोपदेश न हो तो परीक्षा करता हुआ वैद्य प्रत्यक्ष और अनुमान से क्या जानेगा ? कुछ भी नहीं । इसलिये आप्तोपदेश से प्राप्त ज्ञान वालों के लिये परीक्षा दो प्रकार की है प्रत्यक्ष और अनुमान । अथवा आप्तोपदेश को मिला कर तीन प्रकार की है—प्रत्यक्ष, अनुमान और आप्तोपदेश ॥८॥ तत्रेद्दमुपदिशन्ति बुद्धिमन्तः—रोगमेकैकमेवं प्रकोपणमेवंयोनिमेव- मात्मानमेवमधिष्ठानमेवंवेदनमेवं संस्थानमेवं वृद्धिस्थानक्षयसमन्वितमे- वमुदर्कमेवंनामानमेवंयोगं विद्यात् । तस्मिन्नियं प्रतीकारार्था प्रवृत्तिरथवा निवृत्तिरित्युपदेशाज्ज्ञायते ॥ ९ ॥ आप्तोपदेश से एक एक रोग में ऐसे प्रकोप, ऐसी योनि (प्रकृति वातादि की विषमता ), ऐसी उत्पत्ति, ऐसा स्वरूप, ऐसा अधिष्ठान (मन और शरीर), ऐसी वेदना (पीड़ा), ऐसा संस्थान (लक्षण), ऐसे २ शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, ऐसा उपद्रव (रोग के पीछे दूसरा होने वाला रोग), ऐसी दोषों की वृद्धि, स्थान और क्षय, उदर्क (उत्तर फल-साध्य-असाध्य), इस प्रकार का नाम, ऐसा योग ये सब बातें बुद्धिमान् लोग उपदेश करते हैं, उनके उपदेश से जानना चाहिये । इस प्रकार की व्याधि में इस प्रकार का प्रतिकार वा चिकित्सा है, अथवा इस रोग में असाध्य होने से निवृत्ति (चिकित्सा न करना), ये दोनों प्रकार की प्रवृत्ति और निवृत्ति भी उपदेश से ही जानी जाती हैं ॥६॥ प्रत्यक्षतस्तु खलु रोगतत्त्वं बुभुत्सुः सर्वैरिन्द्रियैः सर्वानिन्द्रियार्था- नातुर-शरीर-गतानपरीक्षेतान्यत्र रसज्ञानात्; तद्यथा,—अन्त्रकूजनं संधि- स्फोटनमङ्गुलीपर्वणां च स्वरविशेषा ये चान्येऽपि केचिच्छरीरोपगताः

अ० ४ ] विमानस्थानम् ५२१

अ० ४ ] विमानस्थानम् ५२१ शब्दाः स्युस्तान् श्रोत्रेण परीक्षेत । वर्ण-संस्थान-प्रमाण-च्छायाः शरीरप्र- कृतिविकारौ चक्षुर्वैषयिकाणि यानि चान्यानि तानि चक्षुषा परीक्षेत । प्रत्यक्ष द्वारा रोग जानने की इच्छा से वैद्य रोगी मनुष्य की इन्द्रियों के द्वारा जानने योग्य सब बातों की वह अपनी इन्द्रियों से परीक्षा करे केवल रस ज्ञान को छोड़कर । जैसे-आंतों के शब्द, अंगुली के पर्वों की सन्धियों का चट- कन, रोगी शरीर के भिन्न भिन्न स्वरों को, इनके अतिरिक्त रोगी के जन्य जो (हिचकी, श्वास आदि ) शब्द हों, उनकी श्रोत्र द्वारा परीक्षा करे । वर्ण, अंगों की बनावट, शरीर और अवयवों का माप (छोटाई, बड़ाई, स्थूलता, कृशता ), छाया (कान्ति ), शरीर के प्राकृतिक एवं वैकृतिक भावों (परिवर्तनों) को एवं चक्षु इन्द्रिय के ग्राह्य और जो यहां पर न कही बातें हों (मल, मूत्र आदि ), उनकी भी आंख से परीक्षा करनी चाहिये । रसं तु खल्वातुरशरीरगतमिन्द्रियवैषयिकमप्यनुमानादवगच्छेन्न, न ह्यस्य प्रत्यक्षेण ग्रहणमुपपद्यते, तस्मादातुरपरिप्रश्नेनैवाऽऽतुरमुखरसं विद्यात्, यूकापसर्पणेन त्वस्य शरीरवैरस्यं, मक्षिकोपसर्पणेन शरीर- माधुर्यं, लोहितपित्तसंदेहे तु किं धारिलोहितं लोहितपित्तं वेति श्वकाक- भक्षणाद्धारिलोहितमभक्षणाल्लोहितपित्तमित्यनुमातव्यं, एवमन्यानप्या- तुरशरीरगतान रसाननुमिमीत । गन्धांस्तु खलु सर्वशरीरगताना तुरस्य प्रकृतिवैकारिकान् घ्राणेन परीक्षेत । स्पर्शं च पाणिना प्रकृतिविकृति- युक्तम्-इति प्रत्यक्षतोऽनुमानैकदेशतश्च परीक्षणमुक्तम् ॥१०॥ रोगी के शरीर के रस को, इन्द्रिय का विषय होने पर भी, अनुमान द्वारा ही जानना चाहिये । क्योंकि रोगी के शरीर के रस का प्रत्यक्ष द्वारा ग्रहण नहीं हो सकता । बीमारी में मुख का स्वाद बदल जाता है, इसलिये रोगी से पूछकर ही उसके मुख का रस जानना चाहिये । यथा-शरीर पर जूं आदि के चलने से शरीर में विरसता, शरीर पर मक्खी आदि के पास भिनकने से शरीर में मधुरता समझनी चाहिये । रक्तपित्त के सन्देह में यह रक्त शुद्ध (शरीर को धारण करने वाला ) है या रक्तपित्त (पित्त से दूषित रक्त) का है तो यदि इस रक्त को कुत्ते, कौवे खा लें तो शुद्ध रक्त समझना चाहिये और यदि न खायें तो रक्तपित्त रोग से दूषित रक्त समझना चाहिये । इस प्रकार से रोगी के शरीर के अन्य रसों को भी अनुमान से जानना चाहिये । रोगी के सम्पूर्ण शरीर की प्राकृतिक एवं वैकृतिक गन्धों की परीक्षा घ्राणेन्द्रिय (नासिका) द्वारा करनी चाहिये । स्पर्श, शीत, उष्ण, खर, चिकने आदि प्राकृतिक एवं वैकृतिक स्पर्शों

५२२ चरकसंहिता [ अ० ४

को हाथ के स्पर्श से जानना चाहिये। यहाँ पर प्रत्यक्ष तथा अनुमान से एक भाग से परीक्षा कह दी ॥१०॥ इमे तु खल्वन्येऽप्येवमेव भूयोऽनुमानज्ञेया भवन्ति भावाः। तद्यथा, अग्निं जरणशक्त्या परीक्षेत, बलं व्यायामशक्त्या, श्रोत्रा- दीन् शब्दादिग्रहणेन, मनोऽर्थाव्यभिचरणेन, विज्ञानं व्यवसायेन, रजः सङ्गेन, मोहमविज्ञानेन, क्रोधमभिद्रोहेण, शोकं दैन्येन, हर्षमामोदेन, प्रीतिं तोषेण, भयं विषादेन, धैर्यमविषादेन, वीर्यमुत्थानेन, अवस्थान- मविभ्रमेण, श्रद्धामभिप्रायेण, मेधां ग्रहणेन, संज्ञां नामग्रहणेन, स्मृतिं स्मरणेन, हियमपत्रापणेन, शीलमनुशीलनेन, द्वेषं प्रतिषेधेन, उपधिमनु- बन्धेन,धृतिमलौल्येन,वश्यतां विधेयतया, वयो-भक्ति-सात्म्य-व्याधि-स- मुत्थानानि काल-देशोपशय-वेदना-विशेषेण, गूढलिङ्गं व्याधिमुपशयानु- पशयाभ्यां, दोषप्रमाणविशेषमपचारविशेषेण, आयुषः क्षयमरिष्टैः, उपस्थितश्रेयस्त्वं कल्याणाभिनिवेशेन, अमलं सत्त्वमविकारेणेति। ग्रह- ण्यास्तु मृदुदारुणत्वं स्वप्नदर्शनमभिप्रायं दृष्टेष्टसुखदुःखानि चाऽऽतुरप- रिप्रश्नेनैव विद्याद्—इति ॥ ११॥ इसके अतिरिक्त ये निम्नलिखित बातें भी अनुमान द्वारा ही जानी जाती हैं। जैसे—रोगी की परिपाक शक्ति को देखकर अग्नि ( जाठराग्नि ) को जाने। व्यायाम शक्ति से रोगी का बल, शब्द आदि विषयों के ग्रहण से कान आदि इन्द्रियों को, मन को अवधारण शक्ति से, विज्ञान को उद्योग से, संग ( आसक्ति ) से रज को, अज्ञान से मोह को, हिंसा प्रवृत्ति से क्रोध को, रोदन आदि से शोक को, गीत, वादित्र आदि से आनन्दको मुख की प्रसन्नता आदि लक्षणों से मन की प्रीति को, मुख की मलिनता आदि से भय को, अविषाद से धैर्य ( विपत्ति में भी मन की स्थिरता ) को, उत्साह से वीर्य ( कार्य करने की शक्ति ) को, अभ्रान्ति से स्थिरता को, अभिप्राय ( प्रार्थना ) से श्रद्धा को, श्लोक आदि को कण्ठ करने से मेधा को, नाम लेकर चेतना को, स्मरण शक्ति से स्मृति को, लज्जा दिलाकर लज्जा को, निरन्तर शीलन से स्वभाव को, वस्तु के प्रतिषेध से उस वस्तु में द्वेष को, आगे के परिणामसे छल व्यवहार को, मन की अचपलता से संतोष को, वैद्य की आज्ञा मानने से रोगी की वश्यता को, काल विशेष से आयु, देश से भक्ति ( इच्छा ) को, ( जैसे-यह पंजाब का रहने वाला है इसलिये इसे गेहूं में इच्छा होगी, यह बंगाल का है इसकी चावलों में रुचि होगी इत्यादि ), उपशय अर्थात्

अनुकूलता से सात्म्य को, वेदना-विशेष से व्याधि के समुत्थान को, उपशय (शान्ति) और अनुपशय (निदान) द्वारा गूढ़लिंग वाले रोग को, जिस रोगके लक्षण छिपे हों (जैसे विद्रधि और गुल्म के भेद), उपचार विशेष (प्रकोपनके न्यूनाधिक होने से) दोषों के प्रमाण विशेष (न्यूनाधिक) को अरिष्ट लक्षणोंसे, आयु के क्षय को हितोपसेवन से, निकटवर्त्ती आरोग्यता के लक्षणों को अविकार (काम, क्रोधादि से रहित मानसिक विकारों) से निर्मल चित्त को जाने । ग्रहणी (अग्नि का स्थान, जठर) के मृदु दारुण भेद को रोगी के हित- अहित स्वप्न दर्शन से, भोजनादि में अभिप्राय (इच्छा) को, द्विष्ट, अप्रिय और इष्ट, प्रिय इनमें सुख और दुःख को रोगी के प्रश्नों से ही जान ले ॥ ११ ॥ भवन्ति चात्र—आप्तोपदेशेन प्रत्यक्षकरणेन च । अनुमानेन च व्याधीन् सम्यग्विद्याद्विचक्षणः ॥ १२ ॥ सर्वथा सर्वमालोच्य यथासंभवमर्थवित् । अथाध्यवस्येत्तत्त्वे च कार्ये च तदनन्तरम् ॥ १३ ॥ कार्यतत्त्वविशेषज्ञः प्रतिपत्तौ न मुह्यति । अमूढः फलमाप्नोति यदमोहनिमित्तजम् ॥ १४ ॥ ज्ञानबुद्धिप्रदीपेन यो नाऽऽविशति तत्त्ववित् । आतुरस्यान्तरात्मानं न स रोगांश्चिकित्सति ॥ १५ ॥ चतुर व्यक्ति आप्तोपदेश, प्रत्यक्ष और अनुमान द्वारा रोगों की परीक्षा करे। अर्थवित् यथासम्भव सब रोगों की सब प्रकार से (तीनों प्रकार से) परीक्षा कर के निश्चय करे, इसके पीछे चिकित्सा कार्य करे । कार्यतत्त्व को जाननेवाला भिषक् रोग के चिकित्सा-कार्य में कभी भी मोह को प्राप्त नहीं होता । प्रमादरहित होकर ही मोह रहित होकर किये अनुष्ठान से उत्पन्न फल को प्राप्त करता है। जो योगवित् (प्रयोगों को जानने वाला) भिषक् (वैद्य) ज्ञान, बुद्धि रूपी प्रदीप की सहायता से रोगी के अन्दर तक नहीं पहुंचता (रोगी की सम्पूर्ण बातों को नहीं जानता), वह रोगोंकी चिकित्सा नहीं कर सकता ॥१२-१५॥ तत्र श्लोकौ—सर्वरोगविशेषाणां त्रिविधं ज्ञानसंग्रहम् । यथा चोपविशन्त्याप्ताः प्रत्यक्षं गृह्यते यथा ॥ १६ ॥ ये यथा चानुमानेन ज्ञेयास्तांश्चाप्युदारधीः । भावांश्चिरोगविज्ञाने विमानं मुनिरुक्तवान् ॥ १७ ॥ उपसंहार—सब रोगों का तीन प्रमाणों में संक्षेप, आप्तोपदेश द्वारा जो जो बातें जानी जाती हैं, प्रत्यक्ष द्वारा जो ग्रहण किया जाता है और जो बातें अनु-

५२४ चरकसंहिता [ अ० ५ मान द्वारा जानी जाती हैं इन सब बातों का उदार बुद्धि भगवान् आत्रेय ने इस 'त्रिरोग विज्ञानीय' अध्याय में व्याख्यान कर दिया ॥ १६-१७ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने त्रिविधरोग- विशेषविज्ञानीयविमानं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ पञ्चमोऽध्यायः। अथातः स्रोतोविमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ जीवन के आधारभूत प्राणवह आदि स्रोतों के ज्ञान के लिये 'स्रोतोविमान' नाम अध्याय की व्याख्या करते हैं। ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥१-२॥ यावन्तः पुरुषे मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्त एवास्मिन् स्रोतसां प्रकारविशेषाः, सर्वभावा हि पुरुषे नान्तरेण स्रोतांस्यभिनिर्वर्तन्ते क्षयं वाऽप्यधिगच्छन्ति । स्रोतांसि खलु परिणाममापद्यमानानां धातूनाम- भिवाहीनि भवन्त्ययनार्थेन ॥ ३ ॥ इस पुरुष के शरीर में जितने प्रकार के मूर्तरूप ( स्थूल ) भाव विशेष ( पदार्थ विशेष ) हैं, उतने ही इस शरीर में स्रोतों के प्रकार ( विशेष भेद ) हैं। पुरुष में सब भाव स्रोतों के बिना नहीं बढ़ते और न स्रोतों के बिना क्षय को प्राप्त होते हैं। ये स्रोत परिपाक हुए धातुओं को ( मल और प्रसाद रूप में ) ले जाने के लिये होते हैं ॥ ३ ॥ अपि चैके स्रोतसामेव समुदयं पुरुषमिच्छन्ति, सर्वगतत्वात्सर्व- सरत्वाच्च दोषप्रकोपणप्रशमनानाम्, न त्वेतदेवम्। यस्य च हि स्रोतांसि यच्च वहन्ति यच्चावहन्ति यत्र चावस्थितानि, सर्वं तदन्यत्तेभ्यः ॥ ४ ॥ कुछ आचार्य स्रोतों के समुदाय को ही 'पुरुष' नाम देते हैं। क्योंकि स्रोत सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त हैं। दोषों के जो प्रकोपक ( अपथ्य ) हैं और जो शमन ( पथ्य ) हैं, वे सब स्रोतों द्वारा ही सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होते हैं। परन्तु ऐसा मानना ठीक नहीं है। क्योंकि जिसके स्रोत जिस वस्तु का वहन करते हैं, जिस प्रकार से अवहन करते हैं, शरीर के जिस प्रदेश में ये स्रोत स्थित हैं, यह सब इन स्रोतों से पृथक् हैं, वे स्रोत नहीं हैं। इस लिये पुरुष स्रोतों का समुदाय रूप नहीं है ॥ ४ ॥

अ० ५ ] विमानस्थानम् ५२५

अ० ५ ] विमानस्थानम् ५२५ अतिबहुत्वात्तु खलु केचिदपरिसंख्येयान्यचक्षते स्रोतांसि, परि- संख्येयानि पुनरन्ये ॥ ५ ॥ स्रोतों के बहुत अधिक होने से कुछ आचार्य इन स्रोतों को असंख्य मानते हैं । दूसरे आचार्य इन को गणना के योग्य मानते हैं ॥ ५ ॥ तेषां तु खलु स्रोतसां यथास्थूलं कतिचित्प्रकारान्मूलतश्च प्रकोप- विज्ञानतश्चानुव्याख्यास्यामः, भविष्यन्त्यलमनुक्तार्थज्ञानाय ज्ञानवतां विज्ञानाय चाज्ञानवताम् । तद्यथा- प्राणोदकान्न-रस-रुधिर-मांस-मेदोऽस्थि- मज्ज-शुक्र-मूत्र-पुरीष-स्वेदवहानि, वातपित्तश्लेष्मणां पुनः सर्वशरीरचराणां सर्वस्रोतांस्ययनभूतानि, तद्वदतीन्द्रियाणां पुनः सत्त्वादीनां केवलं चेत- नावच्छरीरमयनभूतमधिष्ठानभूतं च । तदतत्स्रोतसां प्रकृतिभूतत्वान्न विकारैरुपसृज्यते शरीरम् ॥ ६ ॥ इन सांतों में जो स्थूल ( गणना के योग्य ) हैं, उन के कुछ भेदों की मूल से, प्रकोप-विज्ञान ( और उपशमन ) से भी व्याख्या करेंगे सांतों की इतनी व्याख्या बुद्धिमान् ज्ञानवान् वैद्यों के लिये अनुक्त, सूक्ष्म स्रोतों का ज्ञान कराने और अज्ञानी, अनुमान और युक्ति से हीन पुरुषों के लिये सामान्य रूप में सांतों का ज्ञान कराने के लिये पर्याप्त होगी । यथा- प्राणवह, जलवह, अन्नवह, रसवह, रुधिरवह, मांसवह, मेदवह, अस्थिवह, मज्जावह, शुक्रवह, मूत्रवह, पुरीषवह और स्वेदवह ये तेरह प्रकार के स्रोत हैं । वात, पित्त, कफ ये सम्पूर्ण शरीर में फैले हुए हैं, इस लिये इन को ले जानेवाले सब स्रोत हैं । इसी प्रकार अतीन्द्रिय ( इन्द्रियों से अग्राह्य ) सत्त्व आदि ( मन आदि ) पदार्थों का चेतना युक्त यह सम्पूर्ण शरीर मार्ग तथा आश्रय है । स्रोत शरीर के धातुओं को ले जानेवाले हैं, इसलिये सांतों के प्रकृति में स्थित रहने से यह शरीर विकारों अर्थात् रोगों से आक्रान्त नहीं होता सांतों के विकृत होने पर शरीर भी रोगी हो जाता है ॥६॥ तत्र प्राणवहानां स्रोतसां हृदयं मूलं महास्रोतश्च, प्रदुष्टानां खल्वे- षामिदं विशेषविज्ञानं भवति, अतिसृष्टमतिबद्धं कुपितमल्पाल्पमभी- क्ष्णं वा सशब्दशूलमुच्छ्वसन्तं दृष्ट्वा प्राणवहान्यस्य स्रोतांसि प्रदुष्टा- नीति विद्यात् ॥ ७ ॥ इन से प्राणवह स्रोतों का मूल ( प्रभाव स्थान ) हृदय और महा सांत (कोष्ठ भी) है। इन प्राणवह सांतों के दुष्ट होने पर ये लक्षण होते हैं। जैसे-प्राण का अतिसर्पण ( प्रश्वास का दीर्घ होना ), अतिबद्ध ( रुक रुक कर श्वास का

५२६ चरकसंहिता [ अ० ५ चलना), प्रकुपित (बहुत तेजी से चलना), थोड़ा थोड़ा चलना, अभीक्ष्ण (बार- बार रुक रुक कर आना), शब्दशूल अर्थात् वेदनायुक्त शब्द के साथ, श्वास लेते हुए रोगी को देखकर प्राणवह-स्रोत दुष्ट हुए हैं यह समझना चाहिये ॥७॥ उदकवहानां स्रोतसां तालुमूलं क्लोम च। प्रदुष्टानां खल्वेषामिदं विशेषविज्ञानं भवति, तद्यथा—जिह्वा-ताल्वोष्ठ-कण्ठ-क्लोम-शोषं पिपासां चातिप्रवृद्धां दृष्ट्वा भिषगुदकवहान्यस्य स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात् ॥८॥ उदकवह स्रोतों का मूल तालु और क्लोम (पित्ताशय) है। इन उदक- वह स्रोतों के दुष्ट होने पर ये लक्षण होते हैं। यथा—जिह्वा, तालु, ओष्ठ, कण्ठ क्लोम का सूख जाना, प्यास का बहुत अधिक लगना ये लक्षण देखकर उदक- वह-स्रोत विकृत हुए हैं यह समझना चाहिये ॥८॥ अन्नवहानां स्रोतसामामाशयो मूलं वामं च पार्श्वम्। प्रदुष्टानां तु खल्वेषामिदं विशेषविज्ञानं भवति, तद्यथा—अनन्नाभिलषणमरोचका- विपाकौ छर्दि च दृष्ट्वाऽन्नवहानि स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात् ॥ ६ ॥ अन्नवह स्रोतों का मूल आमाशय और वाम पार्श्व है। इन के दुष्ट होने पर ये लक्षण होते हैं। यथा—अन्न की रुचि का न होना, अरुचि, अविपाक, वमन। इन लक्षणों को देखकर अन्नवह स्रोत विकृत हुए यह समझना चाहिये ॥ ९ ॥ रसवहानां स्रोतसां हृदयं मूलं दश च धमन्यः। शोणितवहानां स्रोतसां यकृन्मूलं प्लीहा च। मांसवहानां च स्रोतसां स्नायु मूलं त्वक्च मेदोवहानां स्रोतसां वृक्कौ मूलं वपावहनं च। अस्थिवहानां स्रोतसां मेदो मूलं जघनं च। मज्जावहानां स्रोतसामस्थीनि मूलं संधयश्च। शुक्रवहानां स्रोतसां वृषणो मूलं शेफश्च। प्रदुष्टानां तु खल्वेषां रसा- दिस्रोतसां विज्ञानान्युक्तानि विविधाशितपीतीयेऽध्याये। यान्येव हि धातूनां प्रदोषविज्ञानानि तान्येव यथास्वं धातुस्रोतसाम् ॥ १० ॥ रसवह स्रोतों का मूल हृदय और हृदय से सम्बद्ध दस धमनियां हैं। शोणित (रक्त) वह स्रोतों का मूल यकृत् और प्लीहा है। मांसवह स्रोतों का मूल स्नायु और त्वचा है। मेदोवह स्रोतों का मूल दो वृक्क (दो मांसपिण्ड एक दक्षिण पार्श्व में स्थित और दूसरा वाम पार्श्व में १. क्लोम को सुश्रुत में 'पिपासा-स्थान' माना है। क्लोम का स्थान गले में जरा नीचे की ओर दक्षिण पार्श्व में मना है। जिसको आज कल 'तिलक' या (कण्ठकूप) कहते हैं। वैद्य श्री हरिप्रपन्न ने 'क्लोम याथातथ्यम्' नाम एक पुस्तक लिखी है उस में पित्ताशय को यह नाम दिया है।

अ० ५ ] विमानस्थानम् ५२७

अ० ५ ] विमानस्थानम् ५२७ वृक्क ) और वपावह है । अस्थिवह स्रोतों का मूल मेद और जघन है । मज्जा- वह स्रोतों का मूल अस्थियां और सन्धियां हैं । शुक्रवह स्रोतों का मूल दोनों अण्डकोश और लिङ्ग-इन्द्रिय हैं । विविधाशितपीतीय अध्याय में रसादि धातुओं के दुष्ट होने से उत्पन्न होने वाले रोगों को कह दिया है । ये ही इन रसवह आदि स्रोतों के दुष्ट होने के लक्षण हैं । जो दूषित हुए धातुओं के लक्षण हैं वे ही दुष्ट हुए धातुवह स्रोतों के भी लक्षण होते हैं ॥१०॥ मूत्रवहानां स्रोतसां बस्तिर्मूलं वङ्क्षणौ च । खल्वेषामिदं विशेष- विज्ञानं भवति । तद्यथा अतिसृष्टमतिबद्धं कुपितमल्पल्पमभीक्ष्णं वा बहलं सशूलं मूत्रयन्तं दृष्ट्वा मूत्रवहान्यस्य स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात् ॥ ११ ॥ मूत्रवह स्रोतो का मूल बस्ति ( मूत्राशय ) और वंक्षण ( वृक्क ) हैं । इन के दूषित होने पर ये लक्षण होते हैं । जैसे-मूत्र का अधिक आना, रुक २ कर आना, बार बार आना, थोड़ा थोड़ा आना, मात्रा में अधिक ( गाढ़ा ), दर्द के साथ आना । ये लक्षण देखकर मूत्रवह स्रोत दुष्ट हुए समझने चाहिये ॥११॥ पुरीषवहानां स्रोतसां पक्वाशयो मूलं स्थूलगुदञ्च । प्रदुष्टानां खल्वेषामिदं विशेषविज्ञानं भवति । तद्यथा-कृच्छ्रेणाल्पल्पं सशूल- मतिद्रवं कुथितमतिग्रथितमतिबहु चोपविशन्तं दृष्ट्वा पुरीषवहान्यस्य स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात् ॥ १२ ॥ पुरीषवह स्रोतो का मूल पक्वाशय, स्थूलांत्र और गुदा है। इन के दूषित होने पर ये लक्षण होते हैं । तथा-कठिनाई से थोड़ा थोड़ा, शब्द और वेदना के साथ, बहुत पतला ( पानी जैसा ), बहुत कठिन, मात्रा में मल का बहुत अधिक आना, इन लक्षणों को देखकर पुरीषवह-स्रोत दुष्ट हुए हैं यह समझना चाहिये ॥ १२ ॥ स्वेदवहानां स्रोतसां मेदो मूलं रोमकूपाश्च । प्रदुष्टानां खल्वेषा- मिदं विशेषविज्ञानं भवति, तद्यथा-अस्वेदनमतिस्वेदनं पारुष्यमति- श्लक्ष्णतामङ्गस्य परिदाहं लोमहर्षं च दृष्ट्वा स्वेदवहान्यस्य स्रोतांसि प्रदुष्टानीति विद्यात् ॥ १३ ॥ स्वेदवह स्रोतों का मूल मेद और लोमकूप हैं। इन के दूषित होने पर ये लक्षण होते हैं। जैसे-पसीने का न आना या बहुत आना, त्वचा में कठोरता या बहुत चिकनास, अङ्गों में दाह और शरीर में रोमांच होना । इन लक्षणों को देखकर स्वेदवह-स्रोत दुष्ट हुए हैं यह समझना चाहिये ॥ १३ ॥

५३८ चरकसंहिता [ अ० ५ स्रोतांसि सिरा धमन्यो रसायन्यो रसवाहिन्यो नाड्यः पन्थानो मार्गाः शरीरच्छिद्राणि संवृतासंवृतानि स्थानान्याशयाः क्षया निकेता- श्चेति शरीरधात्ववकाशानां लक्ष्यालक्ष्याणां नामानि भवन्ति ॥ १४ ॥ स्रोतों के पर्याय—स्रोत, सिरा, धमनी, रसायनी, रसवाहिनी, नाड़ी, पन्था मार्ग, शरीरच्छिद्र, संवृत-असंवृत, स्थान, आशय, क्षय और निकेत ये शरीर के धातुओं को ले जाने के लिये जो आंख से दीखने या न दीखने योग्य छेद हैं उन स्रोतों के नाम हैं। १४ ॥ तेषां प्रकोपात्स्थानस्थाश्चैव मार्गगाश्चैव शरीरधातवः प्रकोपमाप- द्यन्ते। इतरेषां च प्रकोपादितराणि। स्रोतांसि स्रोतांस्येव धातवश्च धातूनेव प्रदूषयन्ति प्रदुष्टाः; तेषां सर्वेषामेव वातपित्तश्लेष्माणो दूषयि- तारो भवन्ति, दोषस्वभावादिति ॥ १५ ॥ इन स्रोतों (छिद्रों) के प्रकुपित होने से आशय में स्थित, मार्ग में स्रोतों से जाने वाले शरीर के धातु भी प्रकुपित हो जाते हैं। दूसरों के प्रकोप से और भ (स्रोतस्, वातादि दोष) कुपित होकर दुष्ट हुए स्रोत अन्य स्रोतों को दूषित कर देते हैं। दुष्ट हुए धातु सब धातुओं को दूषित कर देते हैं। सब स्रोतों तथा धातुओं को दूषित करने वाले वात, पित्त, कफ ही होते हैं। क्योकि दोष स्वभाव होने से अर्थात् दूषित करना ही इनका स्वभाव है ॥ १५ ॥ भवन्ति चात्र—क्षयात्संधारणाद्रौक्ष्याद् व्यायामात्क्षुधितस्य च। प्राणवाहीनि दुष्यन्ति स्रोतांस्यन्यैश्च दारुणैः ॥ १६ ॥ औष्ण्यादामाद्भयात्पानादतिशुष्कान्नसेवनात्। अम्बुवाहीनि दुष्यन्ति तृष्णायाश्चातिपीडनात् ॥ १७ ॥ अतिमात्रस्य चाकाले चाहितस्य च भोजनात्। अन्नवाहीनि दुष्यन्ति वैगुण्यात्पावकस्य च ॥ १८ ॥ गुरुशीतमतिस्निग्धमतिमात्रं समश्नताम्। रसवाहीनि दुष्यन्ति चिन्त्यानां चातिचिन्तनात् ॥ १६ ॥ विदाहीन्यन्नपानानि स्निग्धोष्णानि द्रवाणि च। रक्तवाहीनि दुष्यन्ति भजतां चाऽऽतपानलौ ॥ २० ॥ अभिष्यन्दीनि भोज्यानि स्थूलानि च गुरूणि च। मांसवाहीनि दुष्यन्ति भुक्त्वा च स्वपतां दिवा ॥ २१ ॥ अव्यायामाद्दिवास्वप्नान्मेध्यानां चातिभक्षणात्। मेदोवाहीनि दुष्यन्ति वारुण्याश्चातिसेवनात् ॥ २२ ॥

अ० ५ ] २४ विमानस्थानम् ५२६

अ० ५ ] २४ विमानस्थानम् ५२६ व्यायामादतिसंक्षोभादस्थ्नामविविघट्टनात् । अस्थिवाहिनी दुष्यन्ति वातलानां च सेवनात् ॥ २३ ॥ उत्पेषणादत्यभिष्यन्दादभिघातात्प्रपीडनात् । मज्जवाहीनि दुष्यन्ति विरुद्धानां च सेवनात् ॥ २४ ॥ अकालयोनिगमनान्निग्रहादतिमैथुनात् । शुक्रवाहीनि दुष्यन्ति शस्त्रक्षाराग्निभिस्तथा ॥ २५ ॥ मूत्रितोदक-भक्ष्य-स्त्री-सेवनान्मूत्रनिग्रहात् । मूत्रवाहीनि दुष्यन्ति क्षीणस्याभिक्षतस्य च ॥ २६ ॥ विधारणादत्यशनादजीर्णाध्यशनात्तथा । वर्चोवाहीनि दुष्यन्ति दुर्बलाग्नेः कृशस्य च ॥ २७ ॥ व्यायामादतिसंतापाच्छीतोष्णाक्रमसेवनात् । स्वेदवाहीनि दुष्यन्ति क्रोधशोकमयैस्तथा ॥ २८ ॥ प्रकुपित होने के कारण—धातु-क्षय से, उपस्थित वेगों को रोकने से, रूक्षता से, भूख लगे होने पर व्यायाम करने से और अन्य कठिन कार्यों से प्राणवाही स्रोत कुपित होते हैं । गरमी से, आम-दोष से, भय से, बहुत पानी पीने से, शुष्क अन्न (चने आदि) के अधिक सेवन से और प्यास को ज़बर्दस्ती रोकने से उदकवाही स्रोत कुपित होते हैं । मात्रा का अतिक्रमण करके भोजन करने से, अप्राप्त या अतीत काल में भोजन करने से, अपथ्य भोजन के सेवन से और जाठराग्नि के मन्द होने से अन्नवह स्रोत कुपित होते हैं । गुरु, शीत, अतिस्निग्ध पदार्थों के बहुत अकिध सेवन करने से, चिन्ता करने योग्य वस्तुओं को बहुत अधिक चिन्ता करने से रसग्राही स्रोत दूषित होते हैं । जलन पैदा करने वाले, स्निग्ध, गरम और तरल खान-पान के सेवन और धूप और वायु का सेवन करनेवाले पुरुषों के रक्तवाही स्रोत दूषित होते हैं । दोष, धातु, मल और स्रोतों में कफ बढ़ाने वाले, स्थूल और गुरु (भारी) पदार्थ खाकर दिन में सोनेवालों के मांसवाही स्रोत दूषित होते हैं । व्यायाम के न करने से, दिन में सोने से, चर्बी वाले पशुओं के मांस (सुअर का मांस) के अधिक सेवन से, मद्य के अधिक पीने से मेदोवाही स्रोत दूषित होते हैं । अधिक व्यायाम से, अति संक्षोभ से, चोट आदि से, अस्थियों के अधिक

५३० चरकसंहिता [ अ० ५ चलाने (मोड़ने माड़ने से) से, वायु वर्धक खान-पान के सेवन से अस्थिवाही स्रोत दूषित होते हैं। उत्पेषण (पीसने) से, अभिष्यन्दी पदार्थों के अतिसेवन से, चोट से, दण्डे की चोट से तथा विरोधी अन्न-पान के सेवन से मज्जावाही स्रोत दूषित होते हैं। अकाल (निषिद्ध तिथियों में ऋतुमती आदि से) सम्भोग करने से, अयोनि (निषिद्ध योनि) में सम्भोग करने से, उपस्थित शुक्र के वेग को रोकने से, अतिमैथुन से, शस्त्र, क्षार और अग्नि से शुक्रवाही स्रोत दूषित हो जाते हैं। उपस्थित मूत्र-वेग के समय पानी, भोजन या स्त्री का सेवन करने से, क्षीण और अतिकृश व्यक्ति के मूत्रवेग को रोकने से मूत्रवाही स्रोत दूषित हो जाते हैं। मल के उपस्थित वेग को रोकने से, मन्दाग्नि और निर्बल पुरुष के अति- भोजन करने से, अजीर्ण में भोजन करने से, अध्यशन से मलवाही स्रोतः दूषित होते हैं। व्यायाम से, अति संक्षोभ से, शीत और उष्ण को बिना क्रम के सेवन करने से, क्रोध, शोक एवं भय से स्वेदवाही स्रोत दूषित होते हैं ॥ १६-२८ ॥ आहारश्च विहारश्च यः स्याद्दोषगुणैः समः। धातुभिर्विगुणश्चापि स्रोतसां स प्रदूषकः ॥ २९ ॥ जो आहार विहार और कर्म वातादि दोषों के पृथक् अथवा समष्टि रूप में गुणों के समान होता है, वह समान गुण के कारण इन को बढ़ाता है और जो धातुओं से विपरीत गुणवाला हो वह आहार-विहार स्रोतों को दूषित करता है ॥ २९ ॥ अतिप्रवृत्तिः सङ्गो वा सिराणां ग्रन्थयोऽपि वा। विमार्गगमनं वापि स्रोतसां दुष्टिलक्षणम् ॥ ३० ॥ स्रोतों के दूषित होने के सामान्य लक्षण—स्रोतों से रस आदि की अधिक प्रवृत्ति अर्थात् अधिक निकलना अथवा एकदम से रुक जाना, सिराओं में गांठ पड़ जाना, विमार्ग अर्थात् विपरीत, उल्टे मार्ग से जाने लगना, ये सब स्रोतों के दूषित होने के सामान्य लक्षण हैं ॥ ३० ॥ स्वधातुसमवर्णानि वृत्तस्थूलान्यणूनि च। स्रोतांसि दीर्घाण्याकृत्या प्रतानसदृशानि च ॥ ३१ ॥ स्रोतों के प्रकृतिसिद्ध रूप—अपने धातु के समान रंग वाले (रक्तवाही स्रोत रक्त के समान और मांसवाही स्रोत मांस के समान), वृत्त (गोल),

स्थूल और अणु (सूक्ष्म), दीर्घ और लता के समान फैले (कोई गोल, कोई लम्बे, कोई स्थूल और कोई सूक्ष्म) होते हैं ॥ ३१ ॥ प्राणोदकान्नवाहानां दुष्टानां श्वासिकी क्रिया। कार्या तृष्णोपशमनी तथैवाऽऽमप्रदोषिकी ॥ ३२ ॥ विविधाशितपीतीये रसादीनां यदौषधम्। रसादिस्रोतसां कुर्यात्तच्चथास्वमुपक्रमम्॥ ३३ ॥ मूत्र-विट्-स्वेद-वाहानां चिकित्सा मौत्रकृच्छ्रिकी। तथाऽतिसारिकी कार्या तथा ज्वरचिकित्सिकी॥ ३४॥ इति। प्राण, उदक और अन्नवाही स्रोतों के दुष्ट होने पर क्रम से श्वासिकी (अर्थात् हिक्का कास रोग में ही), श्वास को सुधारने वाली, तृष्णा-रोग नाशक और आम-दोषनाशक चिकित्सा करनी चाहिये। प्राणवाही स्रोतों में श्वासिकी उदकवाही में तृष्णाशमन और अन्नवाही में आम-प्रदोष नाशक चिकित्सा करनी चाहिये। 'विविधाशितपीतीय' अध्याय में रस से लेकर शुक्र तक दूषित धातुओं की जो चिकित्सा कही है, वही रसवह आदि दुष्ट स्रोतों की भी समझनी चाहिये। उनकी उसी प्रकार चिकित्सा करनी चाहिये। मूत्रवाही, मलवाही और स्वेदवाही स्रोतों के दूषित होने पर क्रमशः मूत्रकृच्छ्र रोग की, अतिसार रोग की तथा ज्वर की चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ३२-३४॥ तत्र श्लोकाः-त्रयोदशानां मूलानि स्रोतसां दृष्टिलक्षणम्। सामान्यं नाम पर्यायाः कोपनानि परस्परम् ॥ ३५॥ दोषहेतुः पृथक्त्वेन भेषजोद्देश एव च। स्रोतोविमाने निर्दिष्टस्तथा चाऽऽदौ विनिश्चयः ॥ ३६॥ केवलं विदितं यस्य शरीरं सर्वभावतः। शारीराः सर्वरोगाश्च स कर्मसु न मुह्यति ॥ ३७ ॥ तेरह प्रकार के स्रोतों के मूल, प्रत्येक के दूषित लक्षण, सब स्रोतों के सामान्य दूषित लक्षण, नाम, पर्याय, परस्पर कोपन, दोष का कारण, पृथक् २ औषध और उपक्रम ये सब बातें इस स्रोतो-विमान अध्याय में भगवान् आत्रेय ने कह दी हैं। जो भिषक् सम्पूर्ण शरीर के स्रोतों आदि को भली प्रकार जानता है और जिस को शारीरिक और मानसिक सब प्रकार के रोग ज्ञात हैं, वह चिकित्सा में कभी मोह को प्राप्त नहीं होता ॥ ३५-३७॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने स्रोतोविमानं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

५३२ चरकसंहिता [ अ० ६ षष्ठोऽध्यायः। अथातो रोगानीकं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः॥ २ ॥ अब इसके आगे 'रोगानीक' नामक विमान का व्याख्यान करेंगे। जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥२॥ द्वे रोगानीके भवतः प्रभावभेदेन साध्यं चासाध्यं च, द्वे रोगानीके बलभेदेन मृदु च दारुणं च, द्वे रोगानीकेऽधिष्ठानभेदेन—मनोऽधिष्ठानं शरीराधिष्ठानं च, द्वे रोगानीके निमित्तभेदेन स्वधातुवैषम्यनिमित्तं चाऽऽगन्तुनिमित्तं च, द्वे रोगानीके आशयभेदेन—आमाशयसमुत्थं च पक्वाशयसमुत्थं च। एवमेतत्प्रभाव-बलाधिष्ठान-निमित्ताशय-भेदाद् द्वैधं सङ्गेदप्रकृत्यन्तरेण भिद्यमानमथवा संधीयमानं स्यादेकत्वं वा बहुत्वं वा। एकत्वं तावदेकमेव रोगानीकं दुःखसामान्यात्, बहुत्वं तु दश रोगानीकानि प्रभावभेदादिना भवन्ति। बहुत्वमपि संख्येयं स्यादसं- ख्येयं वा स्यात्। तत्र संख्येयं तावद्यथोक्तमष्टोदरीये। अपरिसंख्येयं पुन- र्यथा महारोगाध्याये, रुग्वर्णसमुत्थानादीनामसंख्येयत्वात् ॥ ३ ॥ प्रभाव के भेद से रोगों के समूह दो प्रकार के हैं, (१) साध्य और (२) असाध्य। बल के भेद से रोग समूह दो प्रकार के हैं (१) मृदु (अल्पबल) और (२) दारुण (महाबल)। अधिष्ठान अर्थात् आश्रय के भेद से रोग दो प्रकार के हैं (१) मानस, मन जिनका अधिष्ठान है और शारीरिक जिनका शरीर अधिष्ठान है। कारण के भेद से रोग दो प्रकार के हैं, (१) धातुओं (वात, पित्त, कफ) की विष- मता से होने वाले और (२) आगन्तुक कारण से होने वाले। आमाशय के भेद से रोग दो प्रकार के हैं। (१) आमाशय से उत्पन्न होने वाले और (२) पक्वा- शय से उत्पन्न होने वाले। (आमाशय पित्त और कफ का स्थान है और पक्वाशय वायु का स्थान है।) इस प्रकार प्रभाव, बल, अधिष्ठान, निमित्त और आश्रय के भेद से रोग दो प्रकार के होने पर भी प्रकृति आदि भेदों के कारण अनेक प्रकार के हो जाते हैं। रोग का रूप एक प्रकार का ही है। रुजा, दुःख, पीड़ा यह सब प्रकार के रोगों में सामान्य धर्म है। रोग बहुत हैं, क्योंकि प्रभाव, बल आदि के भेद से रोग बहुत प्रकार के हो जाते हैं। यह बहुत होना भी दो प्रकार का है। संख्येय अर्थात् गिनने के योग्य एवं असंख्येय अर्थात् गणना के अयोग्य । गिनने के योग्य जैसे अष्टोदरीय रोगाध्याय में

अ० ६ ] विमानस्थानम् ५३३

अ० ६ ] विमानस्थानम् ५३३ रोगों की गणना की है। असंख्य जैसे महारोगाध्याय में रुक्, वर्ण समुत्थान आदि के कारण असंख्य हो जाते हैं ॥३॥ न च संख्येयाग्रेषु भेदप्रकृत्यन्तगीयेषु विगीतिरित्‍यतो दोषवती स्या- दत्र काचित्प्रतिज्ञा, न चाविगीतिरित्‍यतः स्याद्दोषवती। भेत्ता हि भेद्यमन्यथा भिनत्ति, अन्यथा पुरुषस्तावद्भिन्नं भेदप्रकृत्यन्तरेण भिन्द- न् भेदसंख्याविशेषमापादयत्यनेकधा, नच पूर्वं भेदाप्रमुपहन्ति। स- मानायामपि खलु भेदप्रकृतौ प्रकृतानुप्रयोगान्तरमपेक्ष्यम्। सन्ति ह्यर्थान्तराणि समानशब्दाभिहितानि। सन्ति चानर्थान्तराणि पर्याय- शब्दाभिहितानि। समानो हि रोगशब्दो दोषेषु च व्याधिषु च, दोषा ह्यपि रोगशब्दमातङ्कशब्दं यक्ष्मशब्दं दोषप्रकृतिशब्दं विकारशब्दं च लभन्ते। व्याधयश्च रोगशब्दमातङ्कशब्दं यक्ष्मशब्दं दोषप्रकृतिशब्दं विकारशब्दं च लभन्ते। तत्र दोषेषु चैव व्याधिषु च रोगशब्दः समानः, शेषेषु तु विशेषवान् ॥४॥ तत्र व्याधयोऽपरिसंख्येया भवन्ति, अतिबहुत्वात्। दोषास्तु खलु परिसंख्येयाः, अनतिबहुत्वात्। तस्माद्यथाचित्रं विकारा उदाहरणार्थ- मनवशेषेण च दोषा व्याख्यास्यन्ते। एक ही रोग में संख्येयत्व और असंख्येयत्व ये दोनों विरुद्ध बातें किस प्रकार हो सकती हैं ? प्रकृति भेद के कारण (ज्वर, अतिसार आदि भेद से) गिने जाने योग्य रोगों में एक और अनेक भेद का कथन परस्पर विरुद्ध दोष- युक्त नहीं है। यदि ऐसा विपरीत भाव न हो तो इतने से कोई कथन दोषरहित भी नहीं होता। भेद दर्शाने वाला पुरुष भेद्य रोग के अन्य रूप से भेद करता है। पहिले अन्य प्रकार (एक दूसरे ही रूप से) से भेद किये होते हैं। पहिले एक ही भेद-प्रकृति से एक रूप से विभक्त किये हुए रोग को पीछे प्रकृति-भेद से विभाग करके अनेक (असंख्य) भेद कर लेता है। इस प्रकार असंख्य भेद करने पर भी वह प्रथम किये हुए भेदों का लोप नहीं करता, वह तो बने ही रहते हैं। भेद-प्रकृति में समान होने पर भी प्रकृत अर्थात् समान शब्द से कहने के बाद अन्य रूप से वर्णन करना भी अपेक्षित है। क्योंकि समान शब्द से कहने के जाने वाले भी अनेक पदार्थ हैं और नाना पर्याय शब्दों से कहे जाने वाले एक एक पदार्थ भी अनेक हैं। अर्थात् एक शब्द अनेकार्थवाचक है, और भिन्न भिन्न शब्द एक ही अर्थ को कहते हैं। जैसे-रोग शब्द व्याधि और दोष के लिये प्रयुक्त होता है। दोषों को रोग, आतंक, यक्ष्म, दोष, प्रकृति, विकार आदि

५३४ चरकसंहिता [ अ० ६

शब्दों से कहा जाता है। व्याधियां भी रोग, आतंक, यक्ष्म, दोष-प्रकृति और विकार शब्दों से कही जाती हैं। इस प्रकार से दोषों और व्याधियों में रोग-शब्द सामान्य रूप से प्रयुक्त होता है। शेष ज्वरादि में विशेष अर्थ को कहता है। इनमें व्याधियां असंख्य हैं। क्योंकि ये बहुत अधिक हैं। दोष परिसंख्येय (गण- ना के योग्य परिमित) हैं। क्योंकि ये बहुत अधिक नहीं हैं। इसलिये रोग के असंख्य होने से, उदाहरण के लिये कुछ थोड़े से विकारों को सम्पूर्ण रूप में और गिनने के योग्य होने से दोषों को सम्पूर्ण रूप से कहेंगे ॥ ४ ॥ रजस्तमश्च मानसौ दोषौ । तयोर्विकाराः काम-क्रोध-लोभ-मोहेर्ष्या- मान-मद-शोक-चित्तोद्वेग-भय-हर्षादयः। वातपित्तश्लेष्माणस्तु खलु शारी- रा दोषाः, तेषामपि च विकारा ज्वरातीसार-शोथ-शोष-श्वास-मेह-कुष्ठा- दय इति । दोषाश्च केवला व्याख्याताः, विकारैकदेशश्च ॥ ५ ॥ रज और तम ये दो मानस दोष हैं। इन रज और तम के विकार काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, मान, मद, शोक, चिन्ता, उद्वेग, भय हर्ष अतिसार शोथ, शोष, मेह, कुष्ठ आदि हैं। इस प्रकार से सम्पूर्ण रूप में और विकार एकांश में कह दिये हैं ॥ ५ ॥ तत्र तु खल्वेषां द्वयानामपि दोषाणां त्रिविधं प्रकोपणम्; तद्यथा- असात्म्येन्द्रियार्थसंयोगः, प्रज्ञापराधः, परिणामश्चेति । प्रकुपितास्तु खलु प्रकोपणविशेषाद् दृश्यविशेषाच्च विकारविशेषानभिनिर्वर्तयन्त्यपरिसंख्ये- यान् । ते विकाराः परस्परमनुवर्तमानाः कदाचिदनुबध्नन्ति कामादयो ज्वरादयश्च । नियतस्त्वनुबन्धो रजस्तमसोः परस्परम् । न ह्यरजस्कं तमः प्रवर्तते ॥ ६ ॥ इन दोनों प्रकार के (मानसिक और शारीरिक) दोषों के कुपित होने के कारण तीन प्रकार के हैं। ( १ ) असात्म्येन्द्रियार्थ-संयोग ( २ ) प्रज्ञापराध और ( ३ ) परिणाम । ये कुपित हुए दोष प्रकोपन भेद से, और दूष्य (शरीर के धातुओं) के भेद से असंख्य रोगों को उत्पन्न करते हैं। ये उत्पन्न होकर कभी परस्पर एक दूसरे विकारों से मिल जाते हैं (शारीरिक रोग मानसिक रोगों से और मानसिक विकार शारीरिक विकारों से)। जैसे काम आदि मानसिक विकार, ज्वर आदि शारीरिक विकारों से मिल जाते हैं। रज और तम का परस्पर सम्बन्ध नियत (सदा स्थिर) बना रहता है। क्योंकि तम रज के बिना नहीं रह सकता, किन्तु सदा रज के साथ मिला रहता है ॥६॥ प्रायः शरीरदोषाणामेकाधिष्ठानीयानां संनिपातः संसर्गो वा समानगुणत्वात् । दोषा हि दूषणैः समानाः ॥ ७ ॥

प्रायः वात आदि शारीरिक दोषों के एक स्थान में रहने से परस्पर मेल हो जाता है। तीनों दोषों के मिलने से सन्निपात और दो दोषों के मिलने से संसर्ग होता है। कारण की भिन्नता होने पर भी इन में जो परस्पर संसर्ग होता है वह इसलिये होता है कि दोष दूषित करने वाले कारणों के समान गुण वाले हैं। अर्थात् दोषों में दूषित करने वाले कारणों के समान गुण हैं ॥ ७ ॥ तत्रानुबन्ध्याद्यनुबन्धविशेषः, -स्वतन्त्रो व्यक्तलिङ्गो यथोक्तसमुत्थान- प्रशमो भवत्यनुबन्ध्यः, तद्विपरीतलक्षणस्त्वनुबन्धः। १अनुबन्ध्य- (अनुबन्ध) लक्षणसमन्वितास्तत्र यदि दोषा भवन्ति तत् त्रिकं संनि- पातमाचक्षते, द्वयं वा संसर्गम् । अनुबन्ध-२विशेषकृतस्तु बहुविधो दोषभेदः। एवमेष संज्ञाप्रकृतो भिषजां दोषेषु चैव व्याधिषु च नाना- प्रकृतिविशेष्यूहः ॥ ८ ॥ अधिष्ठान (आश्रय) और निदान की समानता होने पर भी अनुबन्ध्य और अनुबन्ध के कारण इन में भेद होता है। अनुबन्ध्य का लक्षण - जो स्वतन्त्र (स्वतः प्रधान), स्पष्ट लक्षणोंवाला, अपने ही कारण से उत्पन्न होने वाला तथा अपनी ही चिकित्सा से शान्त होने वाला हो, उसको अनुबन्ध्य कहते हैं। इस के विपरीत लक्षणोंवाला (परतंत्र, अस्पष्ट चिह्न, पृथक् निदान एवं चिकित्सा वाला) अनुबन्ध होता है। यदि अनुबन्ध्य के रूप से तीनों दोष मिले हों तो इसे सन्निपात और दो दोष मिले हों तो इस को 'संसर्ग' कहते हैं। अनुबन्ध के रूप में मिले हुए दोषों के बहुत भेद हो जाते हैं। इस प्रकार से दोषों में (अनुबन्ध्य और अनुबन्ध के भेद से) और रोगों से (प्रकोपन आदि के भेद से) वैद्योंने (सन्निपात, संसर्गादि से ज्वर अतिसार आदि) नाना प्रकार की संज्ञाएं की हैं ॥ ८ ॥ अग्निषु तु शारीरेषु चतुर्विधो बलभेदेन भवति। तद्यथा-तीक्ष्णो मन्दः समा विषम इति। तत्र तीक्ष्णोऽग्निः सर्वापचारसहः तद्विपरी- तलक्षणो मन्दः। समस्तु खल्वपचारतो विकृतिमापद्यतेऽनपचारतस्तु प्रकृताववतिष्ठते, समलक्षणविपरीतलक्षणस्तु विषमः । इत्येते चतुर्विधा भवन्त्यग्नयश्चतुर्विधानामेव पुरुषाणाम् ॥ ६ ॥ बल के भेद के कारण शरीरस्थ अग्नि चार प्रकार का है। जैसे-तीक्ष्ण मन्द, सम और विषम। इन में तीक्ष्ण अग्नि सब प्रकार के अपचारों को सहन करता है। वह विषम आहार को भी शीघ्र जीर्ण कर देता है। तीक्ष्ण अग्नि से विपरीत लक्षणों वाले अग्नि को मन्द-अग्नि कहते हैं। सम अग्नि यथासमय १ 'अनुबन्ध्य लक्षण सम०', २. 'अनुबन्ध्यानुबन्धविशेष०' इति च पाठ भेदो।