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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

दोहावली ७७ जटायुका भाग्य दोहा प्रभुहि बिलोकत गोद गत सिय हित घायल नीचु। तुलसी पाई गीधपति मुकुति मनोहर मीचु ॥१२२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि गृध्रराज जटायुको धन्य हैं, जो सीताके [छुड़ाने] के लिये घायल हुए और नीच शरीर होनेपर भी प्रभुकी गोदमें उनके मधुर मुखारविन्दको निरखते हुए ही मनोहर मृत्यु और मुक्ति प्राप्त की ॥१२२॥ बिरत करम रत भगत मुनि सिद्ध ऊँच अरु नीचु। तुलसी सकल सिहात सुनि गीधराज की मीचु ॥१२३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि गृध्रराजकी (इस प्रकार- की दुर्लभ) मृत्युका समाचार सुनकर विरक्त, कर्मयोगी, भक्त, ज्ञानी, मुनि, सिद्ध, ऊँच और नीच—सभी उनकी ईर्ष्या करने लगे (सबने चाहा कि हमें भी ऐसी ही मृत्यु मिले ॥१२३॥ मुए मरत मरिहैं सकल घरी पहरके बीचु। लही न काहूँ आजु लौं गीधराज की मीचु ॥१२४॥ भावार्थ—आजतक कितने मर गये, वर्तमानमें कितने मर रहे हैं और भविष्यमें घड़ी-पहरके अन्तरसे सभी मरेंगे ही; परंतु आजतक जटायुकी-सी सुन्दर मौत किसीने नहीं पायी ॥१२४॥ मुएँ मुकुत जीवत मुकुत मुकुत मुकुत हूँ बीचु। तुलसी सबही तें अधिक गीधराजकी मीचु ॥१२५॥ भावार्थ—कोई मरनेपर मुक्त होता है, कोई जीता ही मुक्त (जीवन्मुक्त) हो जाता है; मुक्त-मुक्तमें भी भेद होता है। तुलसी- CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

७८ दोहावली दासजी कहते हैं, इन सभी मुक्तियोंसे बढ़कर गृध्रराजकी मृत्यु हुई ॥२२५॥ रघुबर बिकल बिहंग लखि सो बिलोकि दोउ बीर । सिय सुधि कहि सिय राम कहि देह तजी अति धीर ॥२२६॥ भावार्थ—श्रीरघुनाथजीने [पीड़ासे] व्याकुल [घायल] जटायु- को देखा, उस धीरबुद्धि जटायुने भी दोनों भाइयोंको [नेत्र भरकर] देखा [देखते ही पीड़ामुक्त होकर] उन्हें सीताजीका समाचार सुनाकर, 'सीताराम', 'सीताराम' कहते हुए [और भगवान्को देखते हुए ही उनकी गोदमें] शरीर छोड़ दिया ॥२२६॥ दसरथ तें दसगुन भगति सहित तासु करि काजु । सोचत बंधु समेत प्रभु कृपासिंधु रघुराजु ॥२२७॥ भावार्थ—कृपाके समुद्र श्रीरघुनाथजीने अपने पिता दशरथजीसे दसगुनी भक्तिसहित उसका मृतकसंस्कार किया और भाई लक्ष्मणजी- सहित उसकी मृत्युके लिये शोक करने लगे ॥२२७॥ रामकृपाकी महत्ता केवट निसिचर बिहग मृग किए साधु सनमानि । तुलसी रघुबर की कृपा सकल सुमंगल खानि ॥२२८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरघुनाथजीकी कृपा सब सुमङ्गलोंकी खान है; उस रामकृपाने केवट, राक्षस (विभीषण), पक्षी (जटायु) और पशुओं (बंदर-भालु आदि) को भी सम्मान देकर साधु बना दिया ॥२२८॥ हनुमत्स्मरणकी महत्ता मंजुल मंगल मोदमय मूरति मारुत पूत । सकल सिद्धि कर कमल तल सुमिरत रघुबर दूत ॥२२९॥

दोहावली ७९ भावार्थ—श्रीरामजीके दूत वायुपुत्र श्रीहनुमान्‌जी मनोहर मङ्गल और आनन्दकी मूर्ति हैं। उनका स्मरण करते ही समस्त सिद्धियाँ करतलगत (सुलभ) हो जाती हैं ॥ २२९ ॥ धीर बीर रघुबीर प्रिय सुमिरि समीर कुमारु । अगम सुगम सब काज करु करतल सिद्धि बिचारु ॥२३०॥ भावार्थ—धीर, वीर श्रीरघुवीरके प्यारे पवनकुमार श्रीहनुमान्- जीका स्मरण करके चाहे जैसे दुर्लभ या सुलभ सब काम करो; निश्चय रक्खो कि उनकी सफलता तुम्हारे हाथमें ही रक्खी है ॥२३०॥ सुख मुद मंगल कुमुद बिधु सुगुन सरोरुह भानु । करहु काज सब सिद्धि सुभ आनि हिएँ हनुमान ॥२३१॥ भावार्थ—सुख, आनन्द और मङ्गलरूपी कुमुदिनीके खिलानेके लिये चन्द्रमाके सदृश और सुन्दर गुणरूपी कमलोंको विकसित करनेके लिये सूर्यके समान श्रीहनुमानजीका हृदयमें ध्यान करके कार्य आरम्भ करो; फिर सब शुभ और सिद्ध ही होगा ॥ २३१ ॥ सकल काज सुभ समउ भल सगुन सुमंगल जानु । कीरति बिजय बिभूति भलि हियँ हनुमानहि आनु ॥२३२॥ भावार्थ—श्रीहनुमानजीका हृदयमें ध्यान करो और यह निश्चय समझ लो कि तुम्हारे सभी कार्य शुभ होंगे, दिन अच्छे आवेंगे, सभी सद्गुण, सुमङ्गल, कीर्ति, विजय और विमल विभूतिकी प्राप्ति होगी ॥ २३२ ॥ सूर सिरोमनि साहसी सुमति समीर कुमार । सुमिरत सब सुख संपदा मुद मंगल दातार ॥२३३॥ भावार्थ—शूरोंके शिरोमणि, साहसी, सुबुद्धिमान् श्रीपवनकुमार

८० दोहावली स्मरण करते ही स्मरण करनेवालेको सब सुख, सम्पत्ति, आनन्द और मङ्गल देनेवाले हैं ॥ २३३ ॥ बाहुपीड़ाकी शान्तिके लिये प्रार्थना तुलसी तनु सर सुख जलज भुज रुज गज बरजोर । दलत दयानिधि देखिऐ कपि केसरी किसोर* ॥२३४॥ भावार्थ—हे दयानिधान हनुमान्‌जी ! देखिये, तुलसीदासके शरीररूपी सरोवरके सुखरूपी कमलको यह भुजाका रोगरूप हाथी बलपूर्वक नष्ट कर रहा है। [इससे मुझको बचाइये; क्योंकि] आप केसरीनन्दन हैं (सिंहका* बच्चा ही मतवाले हाथीको परास्त कर सकता है) ॥ २३४ ॥ भुज तरु कोटर रोग अहि बरबस कियो प्रबेस । बिहगराज बाहन तुरत काढ़िअ मिटै कलेस ॥२३५॥ भावार्थ—मेरी भुजा पेड़के कोटरके समान है, उसमें रोगरूपी सर्प जबर्दस्ती घुस गया है। हे गरुड़वाहन हरि ! उसे आप शीघ्र निकाल डालिये, जिससे मेरा कष्ट दूर हो ॥ २३५ ॥ बाहु बिटप सुख बिहँग थलु लगी कुपीर कुआगि । रामकृपा जल सींचिऐ बेगि दीन हित लागि ॥२३६॥ भावार्थ—मेरा भुजारूपी वृक्ष सुखरूपी पक्षीका निवासस्थान था, उसमें दुष्ट रोगरूपी बुरी आग लग गयी है। हे हनुमान्‌जी ! शीघ्र ही इस दीनके भलेके लिये श्रीरामकृपारूपी जल सींचकर उस आगको बुझा दीजिये (क्योंकि रामकृपा आपके ही अधीन है) ॥ २३६ ॥ *तुलसीदासजीकी बाँहमें रोग हो गया था, श्रीहनुमान्‌जीकी स्तुतिसे वह अच्छा हो गया था। ये दोहे उसी प्रसङ्गके कहे जाते हैं। *केसरी हनुमान्‌जीके पिताका नाम था और केसरी सिंहको भी कहते हैं।

दोहावली ८१ काशीमहिमा सोरठा मुक्ति जन्म महि जानि ग्यान खानि अघ हानिकर। जहँ बस संभु भवानि सो कासी सेइअ कस न ॥२३७॥ भावार्थ—जहाँ भगवान् श्रीशिवजी और माता पार्वतीजी रहते हैं; उस काशीको पापोंको नष्ट करनेवाली, ज्ञानकी खान और मुक्तिको उत्पन्न करनेवाली जानकर क्यों न उसका सेवन किया जाय?॥२३७॥ शंकरमहिमा जरत सकल सुर वृंद बिषम गरल जेहिं पान किय। तेहि न भजसि मन मंद को कृपालु संकर सरिस ॥२३८॥ भावार्थ—जिस भयंकर विष [की ज्वाला] से सारे देवतागण जल रहे थे, उसको जिन्होंने स्वयं पान कर लिया, रे मन्द मन ! तू उन श्रीशिवजीको क्यों नहीं भजता ? उनके समान कृपालु [और] कौन है? ॥२३८॥ शंकरजीसे प्रार्थना दोहा बासर ढासनि के ढका रजनीं चहुँ दिसि चोर। संकर निज पुर राखिए चितै सुलोचन कोर ॥२३९॥ भावार्थ—दिनमें तो मुझे ठगोंके धक्के खाने पड़ते हैं और रातको मुझे चारों ओरसे चोर सताते हैं, अतएव हे शंकरजी ! कृपादृष्टि- की कोरसे मेरी ओर देखकर अपनी काशीपुरीमें इनसे मेरी रक्षा कीजिये ॥२३९॥

८२ दोहावली अपनी बीसीँ आपुहीं पुरिहिँ लगाए हाथ । केहि बिधि बिनती बिस्व की करौं बिस्व के नाथ ॥२४०॥ भावार्थ—हे विश्वनाथजी! आपने अपनी 'बीसी'* में स्वयं अपनी पुरीमें कार्य आरम्भ कर दिया (संहारलीला शुरू कर दी), फिर मैं विश्वकी ओरसे किस प्रकार आपसे [उसकी रक्षाके लिये] विनय करूँ? ॥२४०॥ भगवल्लीलाकी दुर्ज्ञेयता और करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु । अति विचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु ॥२४१॥ भावार्थ—अपराध करे कोई और और उसके फलका भोग पावे कोई और ही। भगवान्‌की लीला अति विचित्र है, उसे जानने योग्य जगत्‌में कौन है (अर्थात् कोई नहीं) ॥२४१॥ प्रेममें प्रपंच बाधक है प्रेम सरीर प्रपंच रुज उपजी अधिक उपाधि । तुलसी भली सुबैदई बेगि बाँधिए ब्याधि ॥२४२॥ भावार्थ—प्रेमरूपी शरीरमें यदि विषयासक्तिका रोग लग जाता है तो बड़ी भारी पीड़ा उत्पन्न हो जाती है। तुलसीदासजी कहते हैं कि अच्छी वैद्यता इसीमें है कि व्याधि को तुरंत रोक दिया जाय (यानी विषयासक्ति आने ही न दे) ॥२४२॥ अभिमान ही बन्धनका मूल है हम हमार आचार बड़ भूरि भार धरि सीस । हठि सठ परबस परत जिमि कीर कोल कृमि कीस ॥२४३॥ *विंशति—बीसी एक ग्रहदशा होती है। रुद्रकी बीसीमें संहार ही अधिक हुआ करता है। कहते हैं एक बार तुलसीदासजीके समयमें काशीमें बड़ी भारी महामारी फैल गयी थी। यह दोहा उसी समयका बतलाया जाता है।

दोहावली ८३ भावार्थ—'हम बड़े हैं और हमारा आचार श्रेष्ठ है' ऐसे अभिमान- का भारी बोझ सिरपर रखकर मूर्खलोग तोते, रेशमके कीड़े और बंदरकी तरह बलात्कारसे पराधीन हो जाते हैं* ॥२४३॥ जीव और दर्पणके प्रतिबिम्बकी समानता केहिं मग प्रबिसति जाति केहिं कहु दरपन में छाँहँ । तुलसी ज्यों जग जीव गति करी जीव के नाहँ ॥२४४॥ भावार्थ—भला बतलाओ तो दर्पणमें छाया किस रास्तेसे घुसती है और किस रास्तेसे निकल जाती है ? 'तुलसीदासजी कहते हैं कि जीवोंके नाथ परमात्माने संसारमें जीवोंकी भी ऐसी ही चाल बनायी है (कौन किस रास्तेसे कहाँसे आता है और किस मार्गसे कहाँ चला जाता है, इस बातको कोई नहीं बतला सकता) ॥२४४॥ भगवन्मायाकी दुर्ज्ञेयता सुखसागर सुख नींद बस सपने सब करतार । माया मायानाथ की को जग जाननिहार ॥२४५॥ भावार्थ—सुखसागर परमात्मा ही जीवके रूपमें सुखकी नींद सो रहे हैं और स्वप्नवत् सब काम कर रहे हैं। मायाके स्वामीकी इस मायाको जाननेवाला जगत्में कौन है ? ॥२४५॥ *तोता फिरनेवाली लकड़ी पर बैठकर लकड़ी घूमते ही उलट जाता है और पंजोंसे लकड़ीको पकड़े रखकर अपनेको बँधा मानता है और पकड़ा जाता है । रेशमका कीड़ा आप ही कोश बनाकर उसमें बंध जाता है और मारा जाता है। इसी प्रकार बंदर छोटे मुँहकी हँड़ियामें चनेके लोभसे हाथ डालकर चने मुट्ठीमें भरकर मुट्ठी बंद कर लेता है, चनोंके लालचसे मुट्ठी खोलता नहीं और फलस्वरूप पकड़ा जाता है ।

८४ दोहावली

जीवकी तीन दशाएँ

जीव सीव सम सुख सयन सपनेँ कछु करतूति । जागत दीन मलीन सोइ बिकल बिषाद बिभूति ॥२४६॥ भावार्थ—जीव सुखसे सोनेके समय (सुषुप्तिमें) शिव (परमात्मा) के समान है, स्वप्नमें कुछ कार्य करता है (अनेक प्रकारकी सृष्टि रचता है) और जागतेमें (जाग्रदवस्थामें) वही दीन-मलीन हो जाता है और विषाद (अनेक प्रकारके शोक) की सम्पत्ति (सामग्री) से व्याकुल रहता है ॥२४६॥

सृष्टि स्वप्नवत् है

सपने होइ भिखारि नृपु रंकु नाकपति होइ । जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ ॥२४७॥ भावार्थ—स्वप्नमें राजा भिखारी हो जाता है और कंगाल इन्द्र हो जाता है। परंतु जागनेपर लाभ या हानि कुछ भी नहीं होती। वैसे ही इस विषयरूप संसारको भी हृदयसे [स्वप्नवत्] देखो ॥२४७॥

हमारी मृत्यु प्रतिक्षण हो रही है

तुलसी देखत अनुभवत सुनत न समुझत नीच । चपरि चपेटे देत नित केस गहें कर मीच ॥२४८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि रे नीच ! हाथोंसे तेरी चोटी पकड़कर मृत्यु नित्य ही झपटकर तेरे चपत जमा रही है। यह दशा देखकर, सुनकर और अनुभव करके भी तू नहीं समझता [प्रतिक्षण शरीरका क्षय हो रहा है, यह देखते-सुनते हुए भी जीव अपनी मौतको भुलाकर विषय-सेवनमें ही लगा रहता है। उसीको चेतावनी देते हैं] ॥२४८॥

दोहावली ८५ कालकी करतूत करम खरी कर मोह थल अंक चराचर जाल । हनत गुनत गनि गुनि हनत जगत ज्योतिषी काल ॥२४९॥ भावार्थ—जगत्में कालरूपी ज्योतिषी हाथमें कर्मरूपी खड़िया लेकर मोहरूपी पट्टीपर चराचर जीवरूपी अङ्कोंको मिटाता है, हिसाब लगाता है, फिर गिन-गिनकर मिटाता है ॥ २४९ ॥ इन्द्रियोंकी सार्थकता कहिबे कहँ रसना रची सुनिबे कहँ किए कान । धरिबे कहँ चित हित सहित परमारथहि सुजान ॥२५०॥ भावार्थ—चतुर परमात्माने परमार्थ (भगवच्चर्चा) कहनेके लिये जीभ बनायी, भगवद्गुणानुवाद सुननेके लिये कान रचे और प्रेमसहित भगवान्‌का ध्यान धरनेके लिये चित्त बनाया ॥ २५० ॥ सगुणके बिना निर्गुणका निरूपण असम्भव है ग्यान कहै अग्यान बिनु तम बिनु कहै प्रकास । निरगुन कहै जो सगुन बिनु सो गुरु तुलसीदास ॥२५१॥ भावार्थ—जो अज्ञानका कथन किये बिना ज्ञानका प्रवचन करे, अन्धकारका ज्ञान कराये बिना ही प्रकाशका स्वरूप बतला दे और सगुणको समझाये बिना ही निर्गुणका निरूपण कर दे, तुलसीदासजी कहते हैं कि वह मेरा गुरु है (तात्पर्य यह है कि अज्ञानके बिना ज्ञान, अन्धकारके बिना प्रकाश और सगुणके बिना निर्गुणकी सिद्धि नहीं हो सकती; निर्गुण कहते ही सगुणकी सिद्धि हो जाती है। अतएव जो सगुणोपासना छोड़कर निर्गुणोपासना करना चाहते हैं, उनको यथार्थ निर्गुणतत्त्वका ज्ञान होना बहुत ही कठिन है) ॥ २५१ ॥

८६ दोहावली निर्गुणकी अपेक्षा सगुण अधिक प्रामाणिक है अंक अगुन आखर सगुन समुझिअ उभय प्रकार । खोएँ राखें आपु भल तुलसी चारु विचार ॥२५२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि निर्गुण ब्रह्म (१, २, ३) अङ्कके समान है और सगुण भगवान् अक्षर (एक, दो, तीन) के समान हैं; अब दोनों प्रकारोंको समझना चाहिये और फिर किसके न रखनेसे और किसके रखनेसे अपना कल्याण है, इस बातको भी भलीभाँति विचारना चाहिये (व्यापारी लोग हुंडीमें पहले अङ्कोंमें संख्या-जैसे १०००) लिखकर फिर अक्षरोंमें—'अखरे एक हजार' ऐसा लिख देते हैं। दोनों ही ठीक हैं, परंतु अक्षरोंमें लिख देनेसे न तो किसी तरह- का भ्रम रह सकता है और न एक शून्य घटा-बढ़ाकर कोई हजारको सौ या दस हजार ही बना सकता है। इसी प्रकार निर्गुण और सगुण दोनों सत्य हैं, एक ही दो रूपोंमें हैं; परंतु निर्गुणकी अपेक्षा सगुण अधिक प्रामाणिक है। निर्गुणमें तो किसी तरहका भ्रम भी रह सकता है परंतु सगुणमें न तो कोई भ्रम रह सकता है और न किसी प्रकारसे कोई छल ही चल सकता है।) ॥२५२॥ विषयासक्तिका नाश हुए बिना ज्ञान अधूरा है परमारथ पहिचानि मति लसति बिषयँ लपटानि । निकसि चिता तें अधजरित मानहुँ सती परानि ॥२५३॥ भावार्थ—परमार्थ (सत्य वस्तु) की पहचान हो जानेपर भी विषयोंमें लिपटी हुई बुद्धि ऐसी लगती है, मानो चितासे निकलकर भागी हुई कोई अधजली सती हो ॥२५३॥

दोहावली ८७ विषयासक्त साधुकी अपेक्षा वैराग्यवान् गृहस्थ अच्छा है सीस उघारन किन कहेउ बरजि रहे प्रिय लोग । घरहीं सती कहावती जरती नाह बियोग ॥२५४॥ भावार्थ—अधजली भागनेवाली ऐसी सतीको सिर खोलनेके लिये किसने कहा था ? प्यारे सगे-सम्बन्धी तो सब रोक रहे थे । इससे तो यही अच्छा था कि स्वामीके वियोगकी अग्निमें सदा जला करती और घर बैठी ही सती कहलाती । (तात्पर्य यह है कि साधु होकर फिर विषयोंकी ओर ललचानेसे तो घर बैठे भजन करना ही अच्छा है ।)॥२५४॥ साधुके लिये पूर्ण त्यागकी आवश्यकता खरिया खरी कपूर सब उचित न पिय तिय त्यागि । कै खरिया मोहि मेलि कै बिमल बिबेक बिराग ॥२५५॥ भावार्थ—[कहते हैं कि साधु होनेके बाद तुलसीदासजीको एक दिन उनकी स्त्री मिल गयी । स्त्रीने उनकी झोलीमें खरी (सफेद गोपीचन्दन) और कपूर आदि देखकर कहा कि] हे प्रियतम ! जब आप अपनी झोलीमें खरी और कपूर आदि सब सामान रखते हैं, तब स्त्रीका त्याग उचित नहीं है । अतएव या तो मुझको भी इस झोलीमें डाल लीजिये, अथवा विशुद्ध ज्ञान और वैराग्यको धारण कीजिये । [कहते हैं कि उसी क्षणसे तुलसीदासजीने झोली-झंडा फेंक दिया । यह दोहा वास्तवमें सभी विरक्त-वेषधारी पुरुषोंके लिये चेतावनी- स्वरूप है] ॥२५५॥

८८ दोहावली भगवत्प्रेममें आसक्ति बाधक है, गृहस्थाश्रम नहीं घर कीन्हें घर जात है घर छांड़े घर जाइ । तुलसी घर बन बीचहीं राम प्रेम पुर छाइ ॥२५६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि घर करनेसे (गृहस्थीमें रहनेसे) अपना असली घर (परलोक) नष्ट हो जाता है और घर छोड़नेसे (संन्यास ग्रहण करनेसे) यहांका घर (गृहस्थी) नष्ट होता है । अतएव तू घर और वनके बीचमें ही (अर्थात् घरहीमें गृहत्यागी- की भाँति रहकर) श्रीरामजीके प्रेमकी पुरी बसा ॥२५६॥ संतोषपूर्वक घरमें रहना ही उत्तम है दिएँ पीठि पाछें लगै सनमुख होत पराइ । तुलसी संपति छाँह ज्यों लखि दिन बैठि गँवाइ ॥२५७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि संपत्ति शरीरकी छायाके समान है। इसकी पीठ देखकर चलनेसे यह पीछे-पीछे चलती है और सामने होकर चलनेसे दूर भाग जाती है। (जो धनसे मुंह मोड़ लेता है, धनकी नदी उसके पीछे-पीछे बहती चली आती है; और जो धनके लिये सदा ललचाता रहता है, उसे सपनेमें भी पैसा नहीं मिलता ।) इस बातको समझकर घर बैठकर ही दिन बिताओ (अर्थात् संतोषसे रहो और भगवान्का भजन करो ) ॥२५७॥ विषयोंकी आशा ही दुःखका मूल है तुलसी अद्भुत देवता आसा देवी नाम । सेयें सोक समर्पई बिमुख भएँ अभिराम ॥२५८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि आशादेवी नामकी एक अद्भुत देवी है; यह सेवा करनेपर तो शोक (दुःख) देती है और इससे विमुख होनेपर सुख मिलता है ॥२५८॥

दोहावली ८३

मोह-महिमा

सोई सेंवर तेइ सुवा सेवत सदा बसंत । तुलसी महिमा मोह की सुनत सराहत संत ॥२५९॥ भावार्थ—वही सेमलका पेड़ है और वही तोते हैं (बार-बार अनुभव कर चुके हैं कि इसके फलमें गूदा नहीं होता), तो भी मोह- वश वसन्त ऋतु आनेपर सदा उसीपर मँडराये रहते हैं। (चोंच मारते हैं, रुई उड़ जाती है, हाथ कुछ भी नहीं आता।) तुलसी- दासजी कहते हैं कि इस बातको सुनकर संतलोग भी मोहकी महिमाकी सराहना करते हैं ॥२५९॥

विषय-सुखकी हेयता

करत न समुझत झूठ गुन सुनत होत मति रंक । पारद प्रगट प्रपंचमय सिद्धिउ नाऊँ कलंक ॥२६०॥ भावार्थ—[बार-बार धोखा खानेपर भी] विषयी मनुष्य विषयोंके लिये चेष्टा करते हुए यह नहीं समझते कि इनमें कहीं भी सुख नहीं है; विषयोंके झूठे गुणोंको सुनते ही उनकी बुद्धिका दिवाला निकल जाता है (उनका मन विषयोंके लिये ललचा उठता है)। यह प्रपञ्चमय विषय-सुख प्रत्यक्ष पारेके समान है, जिसके सिद्ध होनेपर भी उसका नाम 'कलङ्क' ही होता है ॥२६०॥

लोभकी प्रबलता

ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार । केहि कै लोभ विडंबना कीन्हि न एहिं संसार ॥२६१॥ भावार्थ—ज्ञानी, तपस्वी, शूरवीर, कवि, पण्डित और गुणोंका धाम इस संसारमें ऐसा कौन मनुष्य है, जिसकी लोभने मिट्टी पलीद न की हो? ॥२६१॥

९० दोहावली धन और ऐश्वर्यके मद तथा कामकी व्यापकता श्रीमद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि। मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि ॥२६२॥ भावार्थ-धनके मदने किसको टेढ़ा नहीं कर दिया, प्रभुताने किसको बहरा नहीं बना दिया और मृगलोचनी (सुन्दर स्त्री) के नयन-बाण ऐसा कौन है, जिनको नहीं लगे ? ॥२६२॥ मायाकी फौज ब्यापि रहेउ संसार महँ माया कटक प्रचंड । सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाखंड ॥२६३॥ भावार्थ-मायाकी प्रचण्ड सेना संसारभरमें फैल रही है, कामादि (काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह और मत्सर) वीर इस सेनाके सेनापति हैं और दम्भ, कपट, पाखण्ड उसके योद्धा हैं ॥२६३॥ काम, क्रोध, लोभकी प्रबलता तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ । मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महूँ छोभ ॥२६४॥ भावार्थ-हे तात ! काम, क्रोध और लोभ-ये तीन दुष्ट बड़े ही बलवान् हैं, ये विज्ञानसम्पन्न मुनिके मनमें भी पलक मारते-मारते क्षोभ उत्पन्न कर देते हैं ॥२६४॥ काम, क्रोध, लोभके सहायक लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि । क्रोध कें परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि ॥२६५॥ भावार्थ-श्रेष्ठ मुनि विचारकर कहते हैं कि लोभके इच्छा और

दोहावली ९१ दम्भका बल है, कामके केवल कामिनीका बल है और क्रोधके कठोर वचनका बल है ॥२६५॥ मोहकी सेना काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि । तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि ॥२६६॥ भावार्थ-काम, क्रोध, मद और लोभ आदि मोहकी प्रबल सेना है। इनमें स्त्री जो माया की साक्षात् मूर्ति है, वह तो बहुत ही भया- नक दुःख देनेवाली है ॥२६६॥ अग्नि, समुद्र, प्रबल स्त्री और कालकी समानता काह न पावक जारि सक का न समुद्र समाइ । का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ ॥२६७॥ भावार्थ—अग्नि क्या नहीं जला सकती ? समुद्रमें कौन वस्तु नहीं डूब सकती, प्रबल होनेपर अबला कहलानेवाली स्त्री क्या नहीं कर सकती ? और जगत्में काल किसको नहीं खाता ? ॥२६७॥ स्त्री झगड़े और मृत्युकी जड़ है. जनमपत्रिका बरति कै देखहु मनहिँ बिचारि । दारुन बैरी मीचु के बीच बिराजति नारि ॥२६८॥ भावार्थ-जन्मकुण्डलीको व्यवहारमें लाकर मनमें विचारकर देखो कि स्त्री भयंकर बैरीके और मृत्युके बीचके स्थानमें विराज रही है (कुण्डलीके बाहर स्थानोंमें छठा शत्रु का और आठवां मृत्युका माना जाता है। इनके बीचमें स्त्रीका स्थान सातवाँ है। जगत्में स्त्रियोंके कारण न मालूम कितने लोगोंमें शत्रुता और कितनोंकी मृत्यु हुई है।) ॥२६८॥

९२ दोहावली उद्बोधन दीपसिखा सम जुबति तन मन जनि होसि पतंग। भजहि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग ॥२६९॥ भावार्थ—युवती स्त्रियोंका [ सुन्दर ] शरीर दीपककी लौके समान है, मन ! तू उसमें पतंग मत बन [ नहीं तो भस्म हो जायगा ]। काम और मदको त्यागकर श्रीरामका भजन कर और सदा सत्सङ्ग कर ॥२६९॥ गृहासक्ति श्रीरघुनाथजीके स्वरूपकेज्ञानमें बाधक है काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप। ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे भव कूप ॥२७०॥ भावार्थ—जो काम, क्रोध, मद और लोभके परायण हैं और जो दुःखरूप गृहमें ही आसक्त हैं, वे संसाररूपी कुएँमें पड़े हुए मूढ़ श्रीरघुनाथजीको कैसे जान सकते हैं ? ॥२७०॥ काम-क्रोधादि एक-एक अनर्थकारक हैं, फिर सबकी तो बात ही क्या ? ग्रह ग्रहीत पुनि बातबस तेहि पुनि बीछी मार। तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार ॥२७१॥ भावार्थ—जिसे कुग्रह लगे हों [अथवा जो पिशाचग्रस्त हो] फिर जो वायुरोगसे पीड़ित हो और उसीको फिर बिच्छू डंक मार दे, ऐसे तीन प्रकारसे पागल बने हुएको ऊपरसे शराब पिला दी जाय तो कहिये, यह कैसा इलाज है? ॥२७१॥

दोहावली ९३ किसके मनको शान्ति नहीं मिलती ? ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम । भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम ॥२७२॥ भावार्थ—जो मनुष्य मोहके वशीभूत होकर भूतप्राणियोंके द्रोहमें तत्पर है, श्रीरामसे विमुख है और भोगोंमें आसक्त हो रहा है; उसको क्या स्वप्नमें भी [दैवी] सम्पत्ति, शुभ शकुन या चित्तकी शान्ति प्राप्त हो सकती है ? ॥२७२॥ ज्ञानमार्गकी कठिनता कहत कठिन समुझत कठिन साधत कठिन बिबेक । होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक ॥२७३॥ भावार्थ—ज्ञान कहने (समझाने) में कठिन है, समझनेमें कठिन है और साधन करनेमें भी कठिन है। यदि 'घुणाक्षर' न्यायसे* कहीं ज्ञान प्राप्त भी हो जाय तो फिर भी उस [के बचाये रखने] में अनेकों विघ्न आते रहते हैं। (तात्पर्य यह है कि कहीं गुरुकृपासे परोक्ष ज्ञान हो ही जाता है, तो फिर भी अपरोक्षतक पहुँचनेमें बहुत-सी बाधाएँ आती हैं) ॥२७३॥ भगवद्भजनके अतिरिक्त और सब प्रयत्न व्यर्थ हैं खल प्रबोध जग सोध मन को निरोध कुल सोध । करहिं ते फोटक पचि मरहिं सपनेहुँ सुख न सुबोध॥२७४॥ *काठमें जब घुन लग जाता है और उसे काटता है, तब उसमें कई तरहकी रेखाएँ बन जाती हैं। संयोगसे कोई रेखा अक्षर-जैसी बन जाय तो उसे 'घुणाक्षर' कहते हैं। इसी प्रकार बिना प्रयत्नके संयोगवश कोई घटना हो जाय तो उसे 'घुणाक्षर-न्याय' कहते हैं।

९४ दोहावली भावार्थ—जो लोग दुष्टोंको ज्ञानका उपदेश देना, संसारका सुधार करना, मनका निरोध करना और कुलको शुद्ध करना चाहते हैं, वे व्यर्थ ही परिश्रम करते हुए मर जाते हैं; उन्हें स्वप्नमें भी सुख या सुन्दर ज्ञान नहीं मिलता। [अतएव इन सब कार्योंके पीछे न पड़कर संतोषपूर्वक श्रीभगवान्‌का भजन करना चाहिये] ॥२७४॥ संतोषकी महिमा सोरठा कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु । चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ ॥२७५॥ भावार्थ—स्वाभाविक संतोषके बिना क्या कोई शान्ति पा सकता है? चाहे करोड़ों प्रकारसे जतन करते-करते कोई मर जाय, परंतु जलके बिना सूखी जमीनपर क्या कभी नाव चल सकती है? ॥२७५॥ मायाकी प्रबलता और उसके तरनेका उपाय सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल । अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि ॥२७६॥ भावार्थ—जिसे भगवान्‌की प्रबल माया मोहित न कर दे ऐसा देवता, मनुष्य अथवा मुनि कोई भी नहीं है। यों मनमें विचारकर उस महामायाके स्वामी (प्रेरक) श्रीरामका भजन करना चाहिये ॥२७६॥ गोस्वामीजीकी अनन्यता दोहा एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास । एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास ॥२७७॥

दोहावली १५ भावार्थ—एक ही भरोसा है, एक ही बल है, एक ही आशा है और एक ही विश्वास है। एक रामरूपी श्यामघन (मेघ) के लिये ही तुलसीदास चातक बना हुआ है ॥२७७॥ प्रेमकी अनन्यताके लिये चातकका उदाहरण जौं घन बरषै समय सिर जौं भरि जनम उदास । तुलसी या चित चातकहि तऊ तिहारी आस ॥२७८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि हे रामरूपी मेघ ! चाहे तुम ठीक समयपर बरसो (कृपाकी दृष्टि करो) चाहे जन्मभर उदासीन रहो—कभी न बरसो, परंतु इस चित्तरूपी चातकको तो तुम्हारी ही आशा है ॥२७८॥ चातक तुलसीके मतें स्वातिहुँ पिएँ न पानि । प्रेम तृषा बाढ़ति भली घटें घटैगी आनि ॥२७९॥ भावार्थ—हे चातक ! तुलसीदासके मतसे तो तू स्वाति नक्षत्रमें बरसा हुआ जल भी न पीना ! क्योंकि प्रेमकी प्यासका बढ़ते रहना ही अच्छा है; घटनेसे तो प्रेमकी निष्ठा ही घट जायगी ॥२७९॥ रटत रटत रसना लटी तृषा सूखि गे अंग । तुलसी चातक प्रेम को नित नूतन रुचि रंग ॥२८०॥ भावार्थ—अपने प्यारे मेघका नाम रटते-रटते चातककी जीभ लट गयी और प्यासके मारे सब अङ्ग सूख गये। तुलसीदासजी कहते हैं कि तो भी चातकके प्रेमका रंग तो नित्य नया और सुन्दर ही होता जाता है ॥२८०॥ चढ़त न चातक चित कबहुँ प्रिय पयोद के दोष । तुलसी प्रेम पयोधि की ताते नाप न जोख ॥२८१॥

९६ दोहावली भावार्थ—चातकके चित्तमें अपने प्रियतम मेघका दोष कभी आता ही नहीं। तुलसीदासजी कहते हैं कि इसीलिये प्रेमके अथाह समुद्रका कोई माप-तौल नहीं हो सकता (उसका थाह नहीं लगाया जा सकता) ॥२८१॥ बरषि परुष पाहन पयद पंख करौ टुक टूक। तुलसी परी न चाहिऐ चतुर चातकहि चूक ॥२८२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि मेघ (बादल) कठोर ओले बरसाकर भले ही चातककी पांखोंके टुकड़े-टुकड़े कर दे, पर प्रेमके प्रणमें चतुर चातकको अपने प्रेमका प्रण निबाहनेमें कभी भूल नहीं करनी चाहिये ॥२८२॥ उपल बरषि गरजत तरजि डारत कुलिस कठोर। चितव कि चातक मेघ तजि कबहुँ दूसरी ओर ॥२८३॥ भावार्थ—मेघ कड़क-कड़ककर गर्जता हुआ ओले बरसाता है और कठोर बिजली भी गिरा देता है; इतनेपर भी प्रेमी पपीहा मेघको छोड़कर क्या कभी किसी दूसरी ओर ताकता है ? ॥२८३॥ पबि पाहन दामिनि गरज झरि झकोर खरि खीझि। रोष न प्रीतम दोष लखि तुलसी रागहि रीझि ॥२८४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि मेघ बिजली गिराकर, ओले बरसाकर, बिजली चमकाकर, कड़क-कड़ककर, वर्षाकी झड़ी लगा- कर और आंधीके झकोरे देकर अपना बड़ा भारी रोष प्रकट करता है; परंतु चातकको अपने प्रियतमका दोष देखकर क्रोध नहीं होता (उसे दोष दीखता ही नहीं), बल्कि इसमें भी वह अपने प्रति मेघका अनुराग देखकर उसपर रीझ जाता है ॥२८४॥