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हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

हिन्द स्वराज सीखेंगे। इस तरह हम एक-दूसरे से लाभ उठायेंगे और सारी दुनिया को लाभ पहुँचायेंगे, लेकिन यह तो तभी हो सकता है जब हमारे संबंध की जड़ धर्म क्षेत्र में जमे। पाठक : राष्ट्र से आप क्या कहेंगे ? हम मानते हैं कि संपादक : राष्ट्र कौन ? आपकी क़ायम की पाठक : अभी तो आप जिस अर्थ में यह शब्द काम हुई शालाएँ और अदालतें हमारे किसी में लेते हैं उसी अर्थ वाला राष्ट्र यानी जो लोग यूरोप काम की नहीं हैं। की सभ्यता में रंगे हुए हैं, वो स्वराज्य की आवाज़ उठा उनके बजाय हमारी रहे हैं। पुरानी असली संपादक : इस राष्ट्र से मैं कहूँगा कि जिस शालाएँ और अदालतें हिन्दुस्तानी को स्वराज्य की सच्ची खुमारी यानी मस्ती ही हमें चाहिए। चढ़ी होगी, वही अंग्रेजों से ऊपर की बात कह सकेगा और उनके रौब से नहीं दबेगा। सच्ची मस्ती तो उसी को चढ़ सकती है, जो ज्ञान पूर्वक समझ बूझकर यह मानता हो कि हिन्द की सभ्यता सबसे अच्छी है और यूरोप की सभ्यता चार दिन की चाँदनी है। वैसे सभ्यताएँ तो आज तक कई हो गयीं और मिट्टी में मिल गयीं, आगे भी कई होंगी और मिट्टी में मिल जाएँगी। सच्ची खुमारी उसी को हो सकती है, जो आत्मबल अनुभव करके शरीर बल से नहीं दबेगा और निडर रहेगा तथा सपने में भी तोप बल का उपयोग करने की बात नहीं सोचेगा। सच्ची खुमारी उसी हिन्दुस्तानी को रहेगी, जो आज की लाचार हालत से बहुत ऊब गया होगा और जिसने पहले से ही ज़हर का प्याला पी लिया होगा। ऐसा हिन्दुस्तानी अगर एक ही होगा तो वह भी ऊपर की बात अंग्रेजों से कहेगा और अंग्रेजों को उसकी बात सुननी पड़ेगी। ऊपर की माँग माँग नहीं है, वह हिन्दुस्तानियों के मन की दशा को बताती है। माँगने से कुछ नहीं मिलेगा, वह तो हमें खुद लेना होगा। उसे लेने की हममें ताक़त होनी चाहिए। यह ताक़त उसी में होगी : ■ जो अंग्रेजी भाषा का उपयोग लाचारी से ही करेगा। ■ जो वकील होगा तो अपनी वकालत छोड़ देगा और खुद घर में चरखा चलाकर कपड़े बुन लेगा। 145

हिन्द स्वराज ■ जो वकील होने के कारण अपने ज्ञान का उपयोग सिर्फ़ लोगों को समझाने और लोगों की आँखें खोलने में करेगा। ■ जो वकील होकर वादी-प्रतिवादी, मुद्दई और मुद्दालय के झगड़ों में नहीं पड़ेगा, अदालतों को छोड़ देगा और अपने अनुभव से दूसरों को अदालतें छोड़ने के लिए समझाएगा। ■ जो वकील होते हुए भी जैसे वकालत छोड़ेगा वैसे न्यायाधीशपन भी छोड़ेगा। ■ जो डॉक्टर होते हुए भी अपना पेशा छोड़ेगा और समझेगा कि लोगों की चमड़ी चोंथने के बजाय बेहतर है कि उनकी आत्मा को छुआ जाए और उसके बारे में शोध-खोज करके उन्हें तंदुरुस्त बनाया जाए। ■ जो डॉक्टर होने से समझेगा कि खुद चाहे जिस धर्म का हो, लेकिन अंग्रेजी फार्मेसियों में जीवों पर जो निर्दयता की जाती है, वैसी निर्दयता से बनी हुई दवाओं से शरीर को चंगा करने के बजाय बेहतर है कि शरीर रोगी रहे। ■ जो डॉक्टर होने पर भी खुद चरखा चलायेगा और जो लोग बीमार होंगे उन्हें उनकी बीमारी का सही कारण बताकर उसे दूर करने के लिए कहेगा, निकम्मी दवाएँ देकर उन्हें गलत लाड़ नहीं लड़ायेगा। वह तो यही समझेगा कि निकम्मी दवाएँ न लेने से बीमार की देह अगर गिर भी जाए, तो उससे दुनिया अनाथ नहीं हो जाएगी और यही मानेगा कि उसने बीमार पर सच्ची दया की है। ■ जो धनी होने पर भी धन की परवाह किये बिना अपने मन में होगा वही कहेगा और बड़े से बड़े सत्ताधीश की भी परवाह न करेगा। ■ जो धनी होने से अपना रुपया चरखे चालू करने में खरचेगा और खुद सिर्फ़ स्वदेशी माल का इस्तेमाल करके दूसरों को भी ऐसा करने के लिए बढ़ावा देगा। ■ दूसरे हर हिन्दुस्तानी की तरह जो यह समझेगा कि यह समय पश्चाताप का, प्रायश्चित्त का और शोक का है। ■ जो दूसरे हर हिन्दुस्तानी की तरह यह समझेगा कि अंग्रेजों का क़ुसूर निकालना बेकार है। हमारे क़ुसूर की वजह से वे हिन्दुस्तान में आये, हमारे क़ुसूर के कारण ही वे यहां रहते हैं और हमारा क़ुसूर दूर होगा तब वे यहाँ 146

हिन्द स्वराज्य से चले जाएँगे या बदल जाएँगे। ■ दूसरे हिन्दुस्तानियों की तरह जो यह समझेगा कि मातम के वक्त मौज- शौक नहीं हो सकते। जब तक हमें चैन नहीं है तब तक हमारा जेल में रहना या देश निकाला भोगना ही ठीक है। ■ जो दूसरे हिन्दुस्तानियों की तरह यह समझेगा कि लोगों को समझाने के बहाने जेल में न जाने की खबरदारी रखना निरा मोह है। ■ जो दूसरे हिन्दुस्तानियों की तरह यह समझेगा कि कहने से करने का असर अद्भुत होता है, हम निडर होकर जो मन में है वही कहेंगे और इस तरह कहने का जो नतीजा आये उसे सहेंगे, तभी हम अपने कहने का असर दूसरों पर डाल सकेंगे। ■ जो दूसरे हिन्दुस्तानियों की तरह यह समझेगा कि हम दुःख सहन करके ही बंधन यानी गुलामी से छूट सकेंगे। ■ जो दूसरे हिन्दुस्तानियों की तरह समझेगा कि अंग्रेजों की सभ्यता को बढ़ावा देकर हमने जो पाप किया है, उसे धो डालने के लिए अगर हमें मरने तक भी अंडेमान में रहना पड़े, तो वह कुछ ज्यादा नहीं होगा।

स्वराज्य की सच्ची खुमारी उसी को हो सकती है, जो आत्मबल अनुभव करके शरीर बल से नहीं दबेगा और निडर रहेगा तथा सपने में भी तोप बल का उपयोग करने की बात नहीं सोचेगा। सच्ची खुमारी उसी हिन्दुस्तानी को रहेगी, जो आज की लाचार हालत से बहुत ऊब गया होगा और जिसने पहले से ही जहर का प्याला पी लिया होगा।

■ जो दूसरे हिन्दुस्तानियों की तरह समझेगा कि कोई भी राष्ट्र दुःख सहन किये बिना ऊपर चढ़ा नहीं है। लड़ाई के मैदान में भी दुःख ही कसौटी होता है, न कि दूसरे को मारना। सत्याग्रह के बारे में भी ऐसा ही है। ■ जो दूसरे हिन्दुस्तानियों की तरह समझेगा कि यह कहना कुछ न करने के लिए एक बहाना भर है कि ‘जब सब लोग करेंगे तब हम भी करेंगे’। हमें ठीक लगता है इसलिए हम करें, जब दूसरों को ठीक लगेगा तब वे करेंगे, यही करने का सच्चा रास्ता है। अगर मैं स्वादिष्ट भोजन देखता हूँ, तो उसे खाने के लिए दूसरे की राह नहीं देखता। ऊपर कहे मुताबिक प्रयत्न करना, दुःख सहना यह स्वादिष्ट भोजन है। ऊब कर लाचारी से करना या दुःख सहना निरी बेगार है। 147

हिन्द स्वराज्य पाठक : सब ऐसा कब करेंगे और कब उसका अंत आयेगा ? संपादक : आप फिर भूलते हैं। सबकी न तो मुझे परवाह है, न आपको होनी चाहिए। 'आप अपना देख लीजिए, मैं अपना देख लूँगा' यह स्वार्थ वचन माना जाता है, लेकिन यह परमार्थ वचन भी है। मैं अपना उजालूँगा, अपना भला करूँगा, तभी दूसरे का भला कर सकूँगा। अपना कर्तव्य मैं कर लूँ, इसी में काम की सारी सिद्धियाँ समाई हुई हैं। आपको विदा करने से पहले फिर एक बार मैं यह दोहराने की इजाजत चाहता हूँ कि : ■ अपने मन का राज्य स्वराज्य है। ■ उसकी कुंजी सत्याग्रह, आत्मबल या करुणा बल है। ■ उस बल को आजमाने के लिए स्वदेशी को पूरी तरह अपनाने की ज़रूरत है। ■ हम जो करना चाहते हैं वह अंग्रेजों के लिए हमारे मन में द्वेष है इसलिए या उन्हें सजा देने के लिए नहीं करें, बल्कि इसलिए करें कि ऐसा करना हमारा कर्तव्य है। मतलब यह कि अंग्रेज अगर नमक महसूल रद्द कर दें, लिया हुआ धन वापस कर दें, सब हिन्दुस्तानियों को बड़े-बड़े ओहदे दे दें और अंग्रेजी लश्कर हटा लें, तो हम उनकी मिलों का कपड़ा पहनेंगे या अंग्रेजी भाषा काम में लायेंगे या उनके हुनर का उपयोग करेंगे सो बात नहीं है। हमें यह समझना चाहिए कि वह सब दरअसल नहीं करने जैसा है, इसलिए हम उसे नहीं करेंगे। मैंने जो कुछ कहा है वह अंग्रेजों के लिए द्वेष होने के कारण नहीं, बल्कि उनकी सभ्यता के लिए द्वेष होने के कारण कहा है। मुझे लगता है कि हमने स्वराज्य का नाम तो लिया, लेकिन उसका स्वरूप हम नहीं समझे हैं। मैंने उसे जैसा समझा है वैसा यहाँ बताने की कोशिश की है। मेरा मन गवाही देता है कि ऐसा स्वराज्य पाने के लिए मेरा यह शरीर समर्पित है। 148

भविष्य में लोग इस आधार पर हमारा मूल्यांकन नहीं करेंगे कि हम किस सिद्धांत का दावा करते हैं या कौन सा 'लेबल' धारण करते हैं या कौन से नारे लगाते हैं, हमारा मूल्यांकन वे हमारे उद्यम, त्याग, ईमानदारी और चरित्र की शुद्धता से करेंगे। वे जानना चाहेंगे कि हमने वास्तव में उनके लिए क्या किया है। लेकिन अगर आप नहीं सुनेंगे, अगर आप लोगों के मौजूदा दुःख और असंतोष से लाभ उठाकर उसे दलीय स्वार्थों के लिए बढ़ाएंगे और उसका दुरुपयोग करेंगे, तो यह दुःख और असंतोष पलट कर आपके ही सिर पर पड़ेगा और जनता से इस विश्वासघात के लिए ईश्वर भी आपको क्षमा नहीं करेगा।