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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

HITOPADEŚA Publishers : CHAUKHAMBA SANSKRIT PRATISHTHAN 38 U. A., Bungalow Road, Jawahar Nagar Post Box No. 2113 Delhi 110007 Also can be had from : CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN Chowk (Behind The Bank of Baroda Building) Post Box No. 1069 Varanasi 221001 CHAUKHAMBA SURBHARATI PRAKASHAN K. 37/117 Gopal Mandir Lane Post Box No. 1129 Varanasi 221001 CHAUKHAMBA PUBLISHING HOUSE 4697/2, Ground Floor, Street No. 21-A Ansari Road, Darya Ganj New Delhi 110002 Printed by : A. K. Lithographers, Delhi

भूमिका विदित हो कि नीति एक ऐसा शास्त्र है कि जिसको मनुष्यमात्र व्यवहार में लाता है, क्योंकि बिना इसके संसार में सुखपूर्वक निर्वाह नहीं हो सकता, और यदि नीति का अवलम्बन न किया जाय तो मनुष्य को सांसारिक अनेक घटनाओं के अनुकूल कृतकार्य होने में बड़ी कठिनता पड़े, और जो लोग नीति के जानने वाले हैं वे बड़े बड़े दुस्तर और कठिन कार्यों को सहज में शीघ्र कर लेते हैं; परन्तु नीतिहीन मनुष्य छोटे छोटे-से कार्यों में भी मुग्ध हो कर हानि उठाते हैं । नीति दो प्रकारकी है-एक धर्म, दूसरी राजनीति; और इन दोनों नीतियों के लिये भारतवर्ष प्राचीन समय से सुप्रसिद्ध है । सर्वसाधारण को राजनीति से प्रतिदिन काम पड़ता है । अत एव विदेशी विद्वानों ने भारत में आ कर नीतिविद्या सीख ली और अपने देशों में जा कर उसका अनुकरण किया और अपनी अपनी मातृ- भाषा में उसका अनुवाद कर के देश को लाभ पहुंचाया ॥ यद्यपि राजनीति के एक से एक अपूर्व ग्रंथ संस्कृत भाषा में पाये जाते हैं तथापि पण्डित विष्णुशर्मारचित पञ्चतन्त्र परम प्रसिद्ध है, क्योंकि उस ग्रंथ में नीतिकथा इस उत्तम प्रणाली से लिखी गई है कि जिसके पढ़ने में रुचि और समझने में सुगमता होती है और अन्य देशियों ने भी इसका बड़ा ही समादर किया कि अरबी, फारसी इत्यादि भाषाओं में इसका अनुवाद पाया जाता है । पण्डित नारा- यणजी ने उक्त पञ्चतन्त्र तथा अन्य अन्य नीति के ग्रन्थों से हितोपदेश नामक एक नवीन ग्रन्थ संगृहीत करके प्रकाशित किया, कि जो

पञ्चतन्त्र की अपेक्षा अत्यन्त सरल और सुगम है और विद्वानोंने हितो-

२ भूमिका पञ्चतन्त्र की अपेक्षा अत्यन्त सरल और सुगम है और विद्वानोंने हितो- पदेश को “यथा नाम तथा गुणाः” समझ कर अत्यन्त आदर दिया, यहां तक कि वर्तमान काल में भारतवर्षीय शिक्षा विभाग में इसका अधिक प्रचार हो रहा है. हितोपदेश के गुणवर्णन करने की कोई आवश्यकता नहीं है कारण उसका गौरव सब पर विदित ही है और उक्त ग्रन्थ पर कई टीकाएँ प्रकाशित होने पर भी निर्णयसागर यंत्रालय के मालिक श्रीयुत तुकाराम जावजी महाशय ने मुझ से यह अनुरोध किया कि, हितोपदेश की भाषाटीका इस रीति पर की जाय कि जिससे पाठकों की समझ में विभक्त्यर्थ के साथ आशय भली भांति आ जाय, अत एव मैं अपनी अल्प बुद्धि के अनुसार उसी रीति पर टीका करके पाठकगण को समर्पण करता हूं और विद्वानों से प्रार्थना करता हूं कि जहां कहीं भ्रम से कुछ रह गया हो उसे सुधार लेनेकी कृपाकरें. मार्ग. शु. ३ भृगौ { रामेश्वर भट्ट, संवत् १९५१. { प्रथम संस्कृताध्यापक. मु. आ. स्कू. आगरा.

प्रथम भाग-मित्रलाभ

कहानियोंकी अनुक्रमणिका पृष्ठ. प्रथम भाग-मित्रलाभ प्रस्ताविका ... ... ... १ काक, कछुआ, मृग और चूहेका उपाख्यान ... ... १२ बूढ़े बाघ और मुसाफिरकी कहानी १४ मृग, काक और गीदड़की कहानी ... ... ... ३० अंधा गिद्ध, बिलाव और चिड़ि- योंकी कहानी ... ... ३१ चूड़ाकर्ण संन्यासी और एक धनिक हिरण्यक नाम चूहेकी कहानी ... ... ... ४८ चंदनदास बूढ़ा बनिया और उसकी जवान स्त्री लीलावतीकी कहानी ... ... ... ४९ भैरवनामक शिकारी, मृग, शूकर, सांप और गीदड़की कहानी ६३ तुंगबल नामक राजकुमार और जवान बनियेकी स्त्री लावण्यवती और उसके पति चारुदत्तकी कहानी ... ... ... ७३ धूर्त गीदड़ और हाथिकी कहानी ७५ दूसरा भाग-सुहृद्भेद वर्धमान नामक वैश्य, संजीवक नाम पृष्ठ. वृषभ, पिंगल नामक सिंह, दमनक और करटक नामक २ गीदड़ोंका उपाख्यान ... ८४ अनधिकृत चेष्टा करनेवाले बंदरकी मृत्युकी कहानी ... ... ९३ कर्पूरपट नाम धोबी, उसकी जवान स्त्री, गधा और कुत्तेकी कहानी ... ... ९४ दुर्दान्त नाम सिंह, एक चूहा और दधिकर्ण नामक बिला- वकी कहानी ... ... १११ बंदर, घंटा, और कराला नाम कुटनीकी कहानी... ... ११५ कंदर्पकेतु नामक संन्यासी, एक बनिया, ग्वाला और उसकी व्यभिचारिणी स्त्री और दूती नायनकी कहानी... ... १२२ एक ग्वाला, उसकी व्यभि- चारिणी स्त्री, कोतवाल और उसके बेटेकी कहानी ... कौएका जोड़ा और काले साँपकी कहानी ... ... १३१ दुर्दान्त नामक सिंह और एक बूढ़े गीदड़की कहानी ... १३८

कहानी ... ...

४ पृष्ठ. टिटहरीके जोड़े और समुद्रकी कहानी ... ... ... १४१ तीसरा भाग-विग्रह हिरण्यगर्भ नामक राजहंस, चित्र- वर्ण नामक मोर और उनके मंत्री आदिका उपाख्यान १५५ पक्षी और बन्दरोंकी कहानी १५७ बाघंबर ओढा हुआ धोबीका गधा और खेतवालेकी कहानी १५९ हाथियोंका झुंड और बूढ़े शशककी कहानी ... ... १६१ हंस, कौआ और एक मुसाफिर- की कहानी ... ... १६७ काक, मुसाफिर और एक ग्वालेकी कहानी ... ... ... १६८ एक बढई, उसकी व्यभिचारिणी स्त्री और यारकी कहानी १६९ नीलमें रंगे हुए एक गीदड़की मृत्युकी कहानी ... ... १८० राजकुमार और उसके पुत्रके बलिदानकी कहानी ... १९२ एक क्षत्रिय, नाई और भिखारीकी कहानी ... १९८ चौथा भाग-संधि हंस और मोरके मेलके लिए कहानी ... ... ... २१४ पृष्ठ. दो हंस, और उनका स्नेही कछुएकी कहानी ... ... २१५ दूरदर्शी दो मच्छ और यद्भ- विष्य मच्छकी कहानी ... २१६ एक बनिया उसकी व्यभि- चारिणी स्त्री और यारकी कहानी ... ... ... २१७ बगुले, सांप, और, नेवलेकी कहानी ... ... ... २१९ महातप नामक संन्यासी और एक चूहेकी कहानी ... २२२ बूढ़े बगुले, केंकड़े और मछलि- योंकी कहानी ... ... २२४ देवशर्मा नामक ब्राह्मण और कुम्हारकी कहानी ... २२६ सुन्द उपसुन्द नामक दो दैत्योंकी कहानी ... ... २२८ एक ब्राह्मण, बकरा और तीन धूर्तोंकी कहानी ... ... २३७ मदोत्कट नामक सिंह और सेवकों कहानी ... ... २३८ भूखा साँप और मेंड़कोंकी कहानी ... ... ... २४२ माधव ब्राह्मण, उसका बालक, नेवला और साँपकी कहानी २५२

हितोपदेशके श्लोकोंमें वर्णित विषयोंका विवरण

हितोपदेशके श्लोकोंमें वर्णित विषयोंका विवरण पृष्ठ. श्लोक मंगलाचरण १ हितोपदेशकी प्रशंसा " २ विद्याकी प्रशंसा २, ३, ९ ४, ३८-४०-७ शास्त्रकी प्रशंसा ३ १० यौवन, धन, प्रभुता और } अज्ञानताकी निन्दा } " ११ कुपुत्रकी निन्दा ५, ६, ८६ { प्र. १२ से २४ तक { सु. ७ संसारके छः सुख ५ २० धर्मकी प्रशंसा ६ २५, २६ प्रारब्धकी मुख्यता { ७, ८, { प्र. २८, २९, ३३ { १९, २८, २९ { मि. २१, ५०, ५१, ५२ उद्योगकी प्रशंसा ७, ८ ३०, ३१, ३२ से ३७ तक प्रारब्धकी प्रशंसा ३२ सत्संगकी प्रशंसा ९-११ ४१ से ४७ तक धर्मके आठ मार्ग १६ मि. ८ दानकी सफलता १६, १७ ११, १६ आत्माकी रक्षा १६ १२ पण्डितका लक्षण १७, ६५ १४, १७० स्वभावकी उत्कर्षता १८, ८१ मि. १७ वि. ५८ विश्वासकी अकर्तव्यता १९, ४२ १९, ८७ स्वभावकी मुख्य परीक्षा १९ २० वृद्धोंके वचनका ग्रहण २० २३ संसारके छः दुःख २० २५

पृष्ठ श्लोक

६ पृष्ठ श्लोक लोभकी निन्दा २०,२१ २६,२७,२८ अग्रगण्यताकी निन्दा २१ २९ बन्धुकी प्रशंसा तथा लक्षण २२,३८,२४२ मि. ३१, ७३ सं. ६१ महात्माओंके स्व- { २२,७० ३२,१९२ भावकी प्रशंसा { त्यागनेके योग्य छः दोष २३ ३४ समूहकी प्रशंसा २३ ३५,३६ सच्चे मित्रकी प्रशंसा २४,८० मि. ३८, २०९, २१० पुण्यात्माका लक्षण २४ ३९ शुभाशुभ कर्मका फल २५ ४०,४१ आत्माकी मुख्य रक्षा २६ ४२ प्राणोंकी मुख्य रक्षा २६ ४३ पराये अर्थ धन-जीवनका त्याग २६,१९५ मि. ४४, वि. १०० यशकी मुख्यता २७ ४७,४८ शरीर और गुणका अंतर २७ ४९ अनेक मित्र करनेकी मुख्यता २९ ५३ समानके साथ समानकी प्रीति ३० ५४,५५ अपरिचितको आश्रय न देना ३१ ५६ केवल जातियताको सोच कर } ३३ ५८ अनादर करनेकी निन्दा } अतिथिका सत्कार ३३,३४,४८ मि. ५९ से ६३ तक, १०७,१०८ स्वर्ग जानेमें मुख्यता ३५ ६४ धर्मकी मुख्यता ३५ ६५ उदरके लिये पातकनिन्दा ३५ ६८ अल्पगुणीकी प्रशंसा ३६ ६९ व्यवहारसे मित्र और शत्रु का ज्ञान ३७ ७१ मित्र, शूर, भार्या और } ३८ ७२ बांधवकी परीक्षा }

७ पृष्ठ श्लोक विपत्ति और मृत्युके } ३८,३९,४३ ७४,७६,९१ पास होनेका लक्षण } कुमित्रका त्याग ३९ ७७ विश्वासघात ३९ ७८ विश्वासघातीकी निन्दा ४० ७९ दुर्जनकी निन्दा { ४०,४३,१३८ { मि. ८०,८१,८२,८९,सु. १३७ { १४७,१४८,१६८ { से १३९ तक. १६४,१६५, वि. २३ पापपुण्यके फल मिलनेका समय ४१ ८३ सज्जनोंके स्थिर चित्तकी प्रशंसा ४२ ८५,८६ मार्जार, भैंसा, मेड़, काक और क्षुद्र } ४२ ८७ मनुष्य इनके विश्वासकी अकर्तव्यता } शत्रुसे मेल करनेका त्याग ४३ ८८ दुर्जन और सज्जनका अन्तर ४३ ९२ संगतिका कारण ४४ ९३ सज्जन और दुर्जनका आकार ४४ ९४ श्रेष्ठ मित्रके गुण ४४ ९६ मिष्ट भाषणकी प्रशंसा ४५ ९७ मित्रके दूषण ४५ ९८ महात्मा और दुरात्माका लक्षण ४५ १००,१०१ बुद्धिमान्‌की प्रशंसा ४६ १०२ परोपदेशमें चतुरता ४७ १०३ दुष्ट देशमें निवासकी निन्दा ४७ १०४,१०५,१०६ वृद्ध पतिकी निन्दा ५० ११० से ११३ तक. स्त्रियोंकी निन्दा और दूषण { ५१-५३ { मि. ११४ से १२२ तक. { १२८-१३० { सु. ११५ से ११९ तक. धनकी प्रशंसा } ५३-५५,८५,८६,८७, | मि. १२३ से १२९ तक. } ११८ { सु. २,३,८,९,१०,९३ बुद्धिमान्‌के लिये नव गुप्तमंत्र ५५ १३०,१३१

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८ पृष्ठ श्लोक मनस्वीकी प्रशंसा ५५,५६ १३२ से १३५ तक. निर्धनताकी निन्दा ५६,५७,११८ मि. १३६ से १३८, सु. ९३ याचनाकी निन्दा ५७ १३९ पुरुषविडंबना ५८ १४० पुरुषके जीवनमें मरण } और मरणमें विश्राम } ५८ १४१ लोभकी निन्दा ५८ १४२ असंतोषकी निन्दा ५८ १४३ संतोषकी प्रशंसा ५८,५९ १४४,१४५,१४८ निराशाकी प्रशंसा ५९ १४६ मनुष्यके जीवनकी प्रशंसा ५९ १४७ धर्म, सुख, स्नेह आदिका निर्णय ५९ १४९ चतुरताकी प्रशंसा ६० १५० मनुष्यके लिये मुख्य त्याग ६० १५१ पराधीनताकी निन्दा ६० १५२ धनहीन जीवनकी निन्दा ६० १५३ संसाररूपी वृक्षके दो फल ६१ १५४ धर्मकी प्रशंसा ६१ १५५ दानकी प्रशंसा ६१,८६,८७ मि. १५६ सु. ८,१०,११,१२ कृपणकी निन्दा ६१,६२ १५७ से १६२ तक. संसारमें दुर्लभ वस्तु ६३ १६३ मृत्युके निमित्तकारण ६३ १६५ धनवान्के धनका निर्णय ६४,६५ १६८,१६९ उद्योगी पुरुषकी प्रशंसा ६५-६७ १७१ से १७६ तक. स्थानभ्रष्ट होनेकी निन्दा ६६ १७३ सुखदुःखका भोग ६७ १७७ लक्ष्मीका निवास ६७ १७८ वीरपुरुषकी प्रशंसा ६७ १७९

९ पृष्ठ श्लोक धनवान् हो कर निर्धनताकी घमंड ६८ १८० किंचित् काल भोगने योग्य वस्तु ६८ १८१ ईश्वरके आधीन जीविका ६८ १८२,१८३ धनकी निन्दा ६८,६९ १८४ से.१८९ तक. तृष्णाके त्यागकी प्रशंसा ७० १९० सज्जनकी प्रशंसा ७० १९३ दानी मनुष्यकी प्रशंसा ७० १९४ चार प्रकारके मित्र ७२ १९५ मैत्रीकी प्रशंसा ७३ १९६ स्त्रियोंके भृकुटीरूपी } बाणोंसे धैर्यका नाश } ७३ १९८ स्त्रियोंके दोष ७४ १९९ पतिव्रताका लक्षण ७४ २००,२०१ राजाकी प्रशंसा { ७६,७७,११० { मि. २०३ से २०६ तक. सु. ८१, { २१५,२१२,२४० { ८२ वि. १४४, १४५ सं. ५८ दुःखमें दुःखका होना ७९ २०८ उत्पत्तिका अवश्य नाश ८० २१२ मित्रकी प्रशंसा ८०,८१ २१३,२१४ निश्चित कार्य पर दृढ़ता ८२ २१५ उन्नतिके विघ्न ८५ ४,५ पुत्रनिन्दा ८६ ७ धन, बल, शास्त्र आदिकी सफलता ८६ ९ उद्यमकी प्रशंसा ८७,८८ १३,१४,१५ आयुकी बलवानता ८८,८९ १६,१७,१८ सेवाकी निन्दा ९०,९१,९२ २० से २७ तक. सेवाकी प्रशंसा ९२,९५,९६ २८,२९,३४,३५ स्वामीसेवककी निन्दा ९५ ३२

१० पृष्ठ श्लोक परोपकारके खातर जीनेका फल ९६,९७,९८ ३६ से ४४ तक. मूर्खकी निन्दा ९९,१०१ ४५,५२. कर्मकी प्रशंसा ९९,१०० ४६ से ५० पण्डितका लक्षण १०१,१०३ ५१,६२ सेवाकी रीति १०१ ५४,५५ राजाके गृहयोग्य मनुष्य १०२ ५६ कायर पुरुषका लक्षण १०२ ५७ राजा, स्त्री और बेलका निकट आश्रय करना १०२ ५८ स्नेहयुक्तके चिह्न १०३ ५९,६० विरक्तके चिह्न १०३ ६१ कुअवसरके वचनकी निन्दा १०४ ६३ राजाके बिना आज्ञा
कार्यकी कर्तव्यता } १०४ ६४ गुणकी प्रशंसा तथा रक्षा १०४ ६५ राजाको तृण आदिकी आवश्यकता १०५ ६६ मणि और कांचका भेद १०६ ६८ मनुष्यकी उत्साहहीनता १०६ ६९ भृत्य तथा आभरणके
योग्य स्थान आदि } १०६,१०७ ७१,७२,७३ अवज्ञाकी निन्दा १०८ ७७,७८ आपत्तिरूपी कसौटी पर
संबंधियोंकी परीक्षा } १०९ ८० छोटे शत्रुके लिये समानघातक ११२ ८४ विना शस्त्र मृत्यु ११३ ८५ मतिप्रशंसा ११३,३१ ८६,१२२ बड़ोंका समान पर बल ११४ ८७,८८ सेवकप्रशंसा ११७ ९०,९१,९२

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११ पृष्ठ श्लोक कोशका दूषण ११८ ९४ अधिक व्ययकी निन्दा ११८ ९५ ब्राह्मण और क्षत्रियको अ- ११९ ९६,९७ धिकारी करनेसे हानि पुराने सेवककी निन्दा ११९ ९८,९९ मंत्रीकी निन्दा { ११९,१२०,१३५, { सु. १०० से १०६ तक. १२८ १७५,१९७,१९८ १२९ वि० ३८,१०३,१०४ दंडनीय पुत्रादिको दंड देना १२१ १०७ अहंकार आदि कारणसे नष्टता १२१ १०८ राजाकी कर्तव्यता १२१ १०९ मनुष्यके कर्मको सूर्यादिका जानना १२६ ११२ चतुरकी प्रशंसा १२७ ११३ उपायकी प्रशंसा १३० १२० बिना मृत्युके मृत्यु १३१ १२१ प्रियवस्तुकी प्रशंसा १३६ १३२,१३३ राजाकी दृष्टिकी प्रशंसा १३७ १३४ सदुपदेशकी प्रशंसा १३७ १३५ राज्यभेदका मूल कारण १३७ १३६ मित्र, स्त्री आदिकी प्रशंसा १३९ १४१ राजाकी निन्दा १३९,१४५,१४६ १४२,१५८,१५९,१६० बिना विचारकी दंडकी निन्दा १३९ १४३,१४४ मंत्रका गुप्त रखना १४०,१४४ १४६,१४७,१५५ मृत्युके चार द्वार १४२ १५१ राजाके सेवककी निन्दा १४३ १५२ धन, विषय, स्त्री आदि पानेसे फल १४३ १५३ स्त्री, कृपण, राजा आदिकी निन्दा १४५ १५६ उपकार उपदेशादिकी नष्टता १४६,१४७ १६१,१६२,१६३ समान-बलमें युद्धकी योग्यता १४८ १६६

१२ पृष्ठ श्लोक वज्र और राजाके तेजकी निन्दा १४९ १६८ शूरोंके दुर्जन गुण १४९ १६९ युद्धका समय १४९ १७० संग्राममें मरनेकी प्रशंसा १४९,१५०, { सु. १७१,१७२ २१३ { वि. १४७ से १४८ तक. तेजहीन बलवान्‌की निन्दा १५० १७३ युद्ध, याचना, धनादिकी निन्दा १५० १७४ धूर्त मनुष्यकी निन्दा १५१ १७५ मृत्युकी प्रशंसा १५२ १७७ राजाओंका कर्तव्य कार्य १५२,१५३ १७८ से १८१ तक. दयालु राजा, लोभी } ब्राह्मणदिकी निन्दा } १५३ १८२ राजाओंकी नीतिकी प्रशंसा १५३ १८३ राजाकी प्रशंसा १५५,१५६ २,३ मूर्खकी निन्दा तथा लक्षण १५७,१७२ ४,३१ पराक्रमकी प्रशंसा १५९ ७ सज्जन-सेवाकी प्रशंसा १६१ १०,११,१२ हाथी, सर्प, राजा, दुर्जनसे भय १६२ १४ मंत्रीके लक्षण १६४,१६५,२०७ १६,१७,१३३,१३४ दूतके लक्षण १६३,१६६ १५,१९,२० दुर्जनके संगकी निन्दा १६६,१६७,१६८ २१,२२,२३ पतिव्रताके लिये } भर्ताकी प्रशंसा } १७०,१७१ २५ से ३० तक. पण्डित और मूर्खका लक्षण १७२ ३१ भेदियेकी प्रशंसा १७३,१७४ ३४,३५ मंत्रका गुप्त रखना } तथा प्रशंसा } १७४,१७६ ३६,३७,४२ युद्धकी असंमति १७५ ३९

पृष्ठ श्लोक

१३ पृष्ठ श्लोक साम, दान, भेदसे शत्रु का वशीकरण १७५ ४०. बिना युद्ध शूरता १७६ ४१ नीतिप्रशंसा १७६, १७७, १९१ ४३, ४८, ९७ बुद्धिमान्का लक्षण १७६, २१७ वि. ४४, सं. ६ कार्यसिद्धिका विघ्न १७६ ४५ उपायज्ञाताकी प्रशंसा १७७ ४९ बलीके साथ युद्धका त्याग १७७ वि. ४६, ४७ दुर्गकी प्रशंसा १७८ ५०, ५१ दुर्गके लक्षण १७८, १७९ ५२ से ५५ तक. लवण रसकी प्रशंसा १७९ ५६ सभा, वृद्ध, धर्म, सत्यका निर्णय १८३ ६१ दूतकी प्रशंसा १८२, १८३ ४९, ६०, ६२, ६३ असंतुष्ट ब्राह्मण, संतुष्ट राजा } १८४ ६४ और गणिका आदिकी निन्दा } विग्रहका समय १८५, १८६ ६५ से ६८ तक. युद्धमें जानेकी तथा } १८६, १८७, १८८ ६९ से ८२ तक. लड़नेकी रीति } सेनाके हाथीकी प्रशंसा १८८ ८३ अश्वप्रशंसा १८८ ८४, ८५ युद्धकी चतुरता तथा सेनाका कार्य १८९ ८६ सेनाकी प्रशंसा १८९ ८७ बलहीन सेनाकी निन्दा १८९ ८९. राजासे स्नेह छूटनेका लक्षण १८९ ९० राजाको विजय पानेकी रीति १८९-१९० ९१ से ९५ तक उदार, शूर तथा दाताका लक्षण १९७ १०२ शत्रु की सहजमें मृत्यु १९९ वि. १०७ शत्रु की सेनाके नाशका } २००, २०१ वि. १०८ से ११४ उपाय तथा उपदेश }

१४ पृष्ठ श्लोक राजाका दूषण २०१ वि. ११५ आवश्यक उपदेश २०२,२०३ वि. ११६ से ११९ तक. देवता गुरु आदि पर कोप न करना २०३ वि. १२० स्वास्थ्यमें पांडित्य २०४ वि. १२१ बुद्धिमान् और बुद्धिहीनमें भेद २०४ १२२ व्ययकी प्रशंसा २०५ १२३,१२४,१२५ शूरकी प्रशंसा २०६ १२६,१२७ राजाके महागुण २०६,२०७ १२९ से १३२ तक. दुर्गाश्रयप्रशंसा २०८ १३५ युद्धमें राजाकी अग्रगण्यता २०८ १३६ दुर्गके दोष २०९ १३७ दुर्गके जयके उपाय २०९ १३८ युद्धमें यथावसर कर्तव्य २१० १३९ स्वामी मंत्रीकी आपसमें प्रशंसा २१० १४० समरमें उत्साह २११ १४१,१४२ राज्यके छः अंग २११ १४३ भाग्यकी निन्दा २१५ २ कर्मका दोष २१५ ३ मित्रोपदेशप्रशंसा २१५ ४ उपाय तथा अपायका विचार २१९ ८ शत्रुके विश्वासकी निन्दा २२१ ९ सेवकके उपकारकी न मन्तव्यता २२१ १० विचारहीनको उपदेश २२२ ११ नीचको उच्चपद देनेकी निन्दा २२२ १२ अधिक लोभकी निन्दा २२३ १३ मित्र और शत्रु का लक्षण २२४ १४ अप्राप्त चिंताकी निन्दा २२५ १५

१५ पृष्ठ श्लोक कुमार्गी राजाके मंत्रीकी निन्दा २२७ १६ राजाको मंत्रीका अवलंबन २२७ १७ समानके साथभी मेलका उपदेश २२८ १९ ब्राह्मण क्षत्रिय आदिकी पूज्यता २२९ २० मेल करनेके योग्य ७ मनुष्य २२९ २१ संधि (मेल) की प्रशंसा २३०,२३१ २२ से २८ तक. संधि करनेके लिये \Bigg} २३२,२३३,२३४ ३४ से ४७ अयोग्य २० पुरुष अयोग्य पुरुषोंके साथ \Bigg} युद्ध न करनेका २३२,२३३,२३४ ३४ से ४७ तक. कारण तथा फल नीतिज्ञनकी प्रशंसा २३४ ४८ राजाका चक्रवर्ती होनेका उपाय २३५ ४९ विश्वास दे कर फँसाना २३६ ५१ अपने समान दुर्जनको भी \Bigg} २३६ ५२ सत्यवादी जाननेसे हानि सज्जनको दुष्टोंके वचनसे \Bigg} २३७ ५३ बुद्धिकी भ्रष्टता क्षुधापीडितका कर्तव्य २३९ ५४ धर्महीन पुरुषका लक्षण २३९ ५५ अभयप्रदानकी प्रशंसा २४० ५६ शरणागतके रक्षाकी प्रशंसा २४० ५७ कार्य पड़ने पर शत्रुको मित्र मानना २४१,२४२ ५९,६० संसारकी अनित्यता \Bigg} २४३-२४६ ६२ से ८२ तक. आदिका वर्णन रागियोंको वनका दोष और \Bigg} २४७ ८४,८५ विरक्तताका उपदेश जलसे अन्तरात्माका शुद्ध न होना २४८ ८६ २.

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१६ पृष्ठ श्लोक मनुष्यके लिये सुख २४८ ८८ सत्संग और रतिका उपदेश २४९ ८९,९० वृथा स्वयं गर्जनाकी निन्दा २५० ९१ एक साथ शत्रुसे युद्धकी निन्दा २५१ ९२ बातके भेदको बिना जाने ⎫ क्रोधकी अकर्तव्यता ⎭ २५१ ९३ शीघ्र नहीं किये कार्यकी नष्टता २५२ ९४ राजाको सुखके अर्थ ⎫ ६ विषयोंका त्याग ⎭ २५३ ९५ मंत्रीके मुख्य गुण २५३ ९६ कार्य एकाएक करनेसे हानि २५३ ९७ कार्यसाधनकी प्रशंसा २५३ ९८ अभिमानीकी सर्वदा अप्रसन्नता २५४ ९९ पुरुषोंका कर्मके फलसे निश्चय करना २५४ १०० दुर्जनसे वंचितका सुजनमें ⎫ अविश्वास करना ⎭ २५५ १०१,१०२ लोभी, अभिमानी, मूर्ख, पण्डित ⎫ स्त्रीपुत्रादिको वश करनेका उपाय ⎭ २५६ १०३,१०४ संधिका उपदेश २५६ १०५ १६ प्रकारकी संधियां ⎫ और उनके लक्षण ⎭ २५७-२६० १०६ से १२६ तक. धर्मकी दृढता २६० १२७,१२८ सज्जनके संग मेलका उपदेश २६० १२९ सत्यकी प्रशंसा २६० १३० आशीर्वाद २६१ १३१,१३२,१३३

हितोपदेशः भाषानुवादसमलंकृतः ꩜ प्र स्ता वि का सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादात्तस्य धूर्जटेः । जाह्नवीफेनलेखेव यन्मूर्ध्नि शशिनः कला ॥ १ ॥ जिन्होंके ललाटपर चन्द्रमाकी कला गंगाजीके फेनकी रेखाके समान शोभाय- मान है उन चन्द्रशेखर महादेवजीकी कृपासे साधुजनोंका मनोरथ सिद्ध होय ॥ १ ॥ श्रुतो हितोपदेशोऽयं पाटवं संस्कृतोक्तिषु । वाचां सर्वत्र वैचित्र्यं नीतिविद्यां ददाति च ॥ २ ॥ यह हितोपदेश नामक ग्रंथ सुना हुआ ( सुननेसे ) संस्कृतके बोलने-चालनेमें चतुरताको, सब विषयोंमें वाक्योंकी विचित्रताको और नीतिविद्याको देता है ॥ २ ॥ अजरामरवत् प्राज्ञो विद्यामर्थं च चिन्तयेत् । गृहीत इव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत् ॥ ३ ॥ बुद्धिमान् मनुष्य अपनेको कभी बूढ़ा न होऊँगा और कभी न मरूँगा ऐसा जानकर विद्या और धनसंचय का विचार करे, मृत्युने चोटीको आ पकड़ा है ऐसा सोच कर धर्म करे ॥ ३ ॥ सर्वद्रव्येषु विद्यैव द्रव्यमाहुरनुत्तमम् । अहार्यत्वादनर्घ्यत्वादक्षयत्वाच्च सर्वदा ॥ ४ ॥ पण्डित लोग सब कालमें ( कभी ) चौरादिकोंसे नहीं चुराये जानेसे, अनमोल होनेसे और कभी क्षय न होनेसे, सब पदार्थोंमेंसे उत्तम पदार्थ विद्याकोही कहते हैं ॥ ४ ॥

समुद्रमिव दुर्धर्षं नृपं भाग्यमतः परम् ॥ ५ ॥

२ हितोपदेशः [ प्रस्ताविका ५- संयोजयति विद्यैव नीचगापि नरं सरित् । समुद्रमिव दुर्धर्षं नृपं भाग्यमतः परम् ॥ ५ ॥ जैसे नीच अर्थात् तुच्छ तृणादिसे मिलनेवाली नदी उस तृणादिकको अथाह समुद्रसे जा मिलाती है, उसी प्रकार विद्याभी नीच पुरुषको प्राप्त (वश) होकर राजासे जा मिलाती है, फिर सौभाग्य का उदय कराती है ॥ ५ ॥ विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् । पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम् ॥ ६ ॥ विद्या मनुष्यको नम्रता देती है और नम्रतासे योग्यता, योग्यतासे धन, धनसे धर्म, फिर धर्मसे सुख पाता है ॥ ६ ॥ विद्या शस्त्रस्य शास्त्रस्य द्वे विद्ये प्रतिपत्तये । आद्या हास्याय वृद्धत्वे द्वितीयाद्रियते सदा ॥ ७ ॥ शस्त्रविद्या और शास्त्रविद्या ये दोनों आदर करानेवाली हैं परंतु पहली अर्थात् शस्त्रविद्या बुढ़ापेमें “पुरुषार्थ न होनेसे” हँसी कराती है और दूसरी अर्थात् शास्त्रविद्या सदैव आदर कराती है ॥ ७ ॥ यन्नवे भाजने लग्नः संस्कारो नान्यथा भवेत् । कथाच्छलेन बालानां नीतिस्तदिह कथ्यते ॥ ८ ॥ जैसे मृत्तिकाके कोरे बर्तनमें जिस वस्तुका संस्कार पहले होजाता है और पीछे वह उसमेंसे नहीं जाता है; उसी प्रकार मैं इस हितोपदेश ग्रन्थमें कथाके बहानेसे बालकों के लिये नीति कहता हूँ ॥ ८ ॥ मित्रलाभः सुहृद्भेदो विग्रहः संधिरेव च । पञ्चतन्त्रात्तथाऽन्यस्माद्ग्रन्थादाकृष्य लिख्यते ॥ ९ ॥ पंचतन्त्र तथा अन्य अन्य नीतिशास्त्रके ग्रन्थोंसे आशय लेकर, १ मित्रलाभ, २ सुहृद्भेद, ३ विग्रह और ४ सन्धि, ये चार भाग बनाये जाते हैं ॥ ९ ॥ अस्ति भागीरथीतीरे पाटलिपुत्रनामधेयं नगरम् । तत्र सर्व- १ यहां मनुष्य और तृणकी, विद्या और नदीकी, समुद्र और राजाकी समानता है. २ बालकोंका बचपन कोरे बर्तनके समान है. यदि इसमें कहानियोंके बहानेसे विद्याका संस्कार हो जाय तो वे जन्मपर्यंत शास्त्रसे विमुख न होंगे।

केनापि पठ्यमानं श्लोकद्वयं शुश्राव—

-१३ ] अनधीत पुत्रोंके लिये राजाकी चिंता ३ स्वामिगुणोपेतः सुदर्शनो नाम नरपतिरासीत् । स भूपतिरेकदा केनापि पठ्यमानं श्लोकद्वयं शुश्राव— गंगाजीके किनारेपर पटना नामका एक नगर है, वहाँ राजाके संपूर्ण गुणोंसे शोभायमान, सुदर्शन नामका एक राजा रहता था. एक समय उस राजाने किसीको पढ़ते हुए, ये दो श्लोक सुने— “अनेकसंशयोच्छेदि परोक्षार्थस्य दर्शकम् । सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः ॥ १० ॥ “अनेक सन्देहोंको दूर करनेवाला और छिपे हुए अर्थको दिखाने वाला शास्त्र, सबका नेत्र है, ज्ञानरूपी जिसके पास वह शास्त्र नेत्र नहीं है वह अन्धा है ॥१०॥ यौवनं धनसंपत्तिः प्रभुत्वमविवेकता । एकैकमप्यनर्थाय, किमु यत्र चतुष्टयम् ?” ॥ ११ ॥ यौवन, धन, प्रभुता और अविचारता, इनमेंसे एक एक भी हो तो अन- र्थके करने वाली है और जिसमें ये चारों होय वहांका क्या ठीक है ?” ॥११॥ इत्याकर्ण्यात्मनः पुत्राणामनधिगतशास्त्राणां नित्यमुन्मार्ग- गामिनां शास्त्राननुष्ठानेनोद्विग्नमनाः स राजा चिन्तयामास— इन दोनो श्लोकोंको सुनकर, वह राजा, शास्त्रको न पढ़नेवाले, तथा प्रतिदिन कुमार्गमें चलने वाले, अपने लड़कोंके, शास्त्र न पढनेसे मन व्याकुल होकर सोचने लगा— ‘कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान्न धार्मिकः । काणेन चक्षुषा किं वा, चक्षुःपीडैव केवलम् ॥ १२ ॥ जो न पण्डित है और न धर्मशील है, ऐसा पुत्र उत्पन्न हुआ किस कामका ? जैसे काणी आंखसे क्या सरता है ? केवल आँखकोही पीड़ा है ॥ १२ ॥ अजात-मृत-मूर्खाणां वरमाद्यौ न चान्तिमः । सकृद्दुःखकरावाद्यावन्तिमस्तु पदे पदे ॥ १३ ॥ उत्पन्न नहिं हुआ, तथा होकर मर गया और मूर्ख, इन तीनोंमेंसे पहले २ दो अच्छे हैं और अन्तिम(मूर्ख) अच्छा नहीं, क्योंकि पहले दोनों एकही १ शूरता, वीरता, दया और शील आदि. २ उत्पन्न नहीं हुआ और होकर मर गया.