इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची
इच्छानुसार सन्तान
वीरेन्द्र गुप्तः
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इच्छानुसार सन्तान
अपन (पुत्री) किता पर मधुमती अदिनाम आपके पास है
योग योगेन्द्र गुप्त
संपादन योगेन्द्र गुप्त प्रकाशन योगेन्द्र गुप्त पुस्तक की 300 पृष्ठों तक 2/10/1942 सम्बन्धित 1/10 सिक्क 1/10
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॥ओ३म्॥
सर्वांगीणु सारवांगीणु
सर्वांगीणु
सर्वांगीणु निधिः ३ भाग ३-३
इच्छानुसार सन्तान
प्रजनन (बर्थ) क्रिया पर सम्पूर्ण अधिकार आपके हाथ में
लेखक
वीरेन्द्र गुप्तः
राष्ट्रीय सम्बत् ६१
सृष्ट्याब्द १,९७,३८,१३,१०९
मानव सृष्टि एवं वेदकाल १,९६,०८,५३,१०९
दयानन्दाब्द १८५
विक्रम सम्बत् २०६५
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सर्वाधिकार सुरक्षित
प्रकाशक
वीरेन्द्र नाथ अश्विनी कुमार्
प्रकाशन मन्दिर
मण्डी चौक,
मुरादाबाद - २४४००१
प्राप्ति स्थान
इन्दिरा गुप्ता
वेद कुटि १३
राम बिहार कालोनी
जिला सहकारी बैंक के पीछे
मुरादाबाद
कई विशेष सन्दर्भों के साथ परिवर्धित
पंचम संस्करण २०००
२००८ ई.
मूल्य १३०/-
चलित वार्ता ९८९७५२८६५०
मुद्रक
भूषण कम्प्यूटर मन्दिर
६४, राजगली, मुरादाबाद - २४४००१
दूरभाष ९४१२२४७१९७
Email : vkdivya@yahoo.co.in
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विषय सूची
विचारों को लिपिबद्ध करने के प्रेरक श्रद्धेय वैद्य बुद्धासिंह जी की पुण्य स्मृति को
सादर समर्पित
पृ. 358
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शास्त्रस्य पारङ्गत्वा तु भूयोभूयस्तदभ्यसेत्। तच्छास्त्रं सबलं कुर्यान् चाधीत्य त्यजत्युनः॥
अर्थात् शास्त्र में पारंगत होकर भी बार-बार अभ्यास करता रहे। उस शास्त्र को समुन्नत करे न कि पढ़ कर फिर छोड़ दे।
एकोऽपि गुणवान् पुत्रो निर्गुणैश्च शतर्वरः। एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च ताराः सहस्रशः॥
अर्थात् सैकड़ो गुण रहित पुत्रों की अपेक्षा एक ही गुणी पुत्र श्रेष्ठ है। एक ही चन्द्रमा अन्धकार को नष्ट कर देता है, सहस्रों तारे नहीं।
प्रयत्न करना प्रत्येक मानव का कर्तव्य है, परन्तु फल देना परमेश्वर का। तभी तो यदा कदा प्रयत्न करने के पश्चात्, फल के स्थान पर अपवाद ही सामने आता है।
‘चेतावनी’ प्रकरण को सर्वप्रथम पढ़िये...
पृष्ठ १२१ पर
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विषय सूची
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| भूमिका | ७ | जनक और जननी | ८१ |
| दो शब्द | १३ | ऋतुवर्णन | २४ |
| लेखक परिचय | १६ | ऋतुकाल वर्णित कर्म | ९५ |
| वंदना | १९ | रति समय वर्णित काल | ९९ |
| मनुष्य | २० | अति आवश्यक सावधानियाँ | १०१ |
| स्वास्थ्य | ३२ | रहस्य तथ्य | १०२ |
| ऋतु | ३३ | शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष का | |
| ऋतु आहार विहार | ३४ | धर्म निवारण | १०५ |
| प्रातः काल | ३६ | अति सूक्ष्म विचारों का | |
| उषः पान | ३९ | प्रभाव | १०६ |
| मलमूत्र त्याग | ४० | शुक्राणुओं का उलझा हुआ | |
| दन्त धावन | ४२ | प्रश्न | १०७ |
| नेत्र | ४३ | चन्द्रमा, वीर्य और तिथि | १११ |
| अभ्यंग | ४४ | नक्षत्र और ऋतु | ११२ |
| व्यायाम | ४४ | कन्या और पुत्र भेद रात्रियाँ | ११७ |
| स्नान | ४५ | भ्रान्ति निवारण | १२० |
| संध्या वन्दन | ४६ | चेतावनी | १२१ |
| प्राणायाम | ५३ | पुरुष और नारी का अन्तर | १२४ |
| आहार | ५७ | सोलाह कला | १२६ |
| संध्या समय | ६२ | गर्भाधान | १२९ |
| निद्रा | ६४ | गर्भ स्थित न होने के | |
| वीर्य | ६७ | कारण और उसका उपचार | १३३ |
| ब्रह्मचर्य साधन | ७४ | गर्भ स्थित न होने पर | १३५ |
| स्वप्न दोष नाशक | गर्भ धारण के तात्कालिक | ||
| चमत्कारी बूटों | ७६ | लक्षण | १३९ |
| विवाह | ७६ | गर्भ रक्षा | १३९ |
| मनोवाञ्छित संतान | ८४ | गर्भावस्था में मैथुन | १४६ |
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| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| गर्भावस्था को भावना | १४८ | कुछ अनुभव | २१० |
| गर्भ के लक्षण और वृद्धि | १५६ | गायत्री मन्त्र | २३२ |
| गर्भ में जीव पहुँचने का समय | १५९ | ||
| गर्भ में पुत्र पुत्री परीक्षा | १५९ | ||
| सन्तान का गौर वर्ण | |||
| बनाना | १६० | ||
| संस्कार | १६१ | ||
| प्रसव | १६२ | ||
| जन्म समय | १६४ | ||
| प्रसूतिका का पेट, बद्ध | |||
| जाने पर | १६७ | ||
| शिशु पालन | १६७ | ||
| स्तन पान के समय कुछ | |||
| ध्यान देने योग्य बातें | १६८ | ||
| रति समय बच्चे को स्तन | |||
| पान कराने से हानियाँ | १७० | ||
| माता का दूध कम होने पर | १७१ | ||
| माता के दूध के विकार | |||
| और शोधन | १७२ | ||
| दूध सुखाना | १७३ | ||
| दौल | १७४ | ||
| नेत्र | १७४ | ||
| भोजन | १७६ | ||
| रक्षा | १७६ | ||
| शिक्षा | १७९ | ||
| व्यवहार और कर्तव्य | १८५ | ||
| सन्तति निरोध | २०३ |
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भूमिका
भूमिका
धर्म-प्रधान एवं कर्म-प्रवीण भारत में समय-समय पर अनेक ऋषि, मुनि, कवि, विद्वान् तथा विदुषियों ने जन्म ग्रहण कर इस भूमि को अलंकृत किया है। हमारे पूर्वजों ने अपनी सतत साधना, अखण्ड निष्ठा एवं शुद्ध आस्तिकता के फलस्वरूप जिन लोक मंगलकारी अनुभवों का संचय किया उन्हें 'सर्वजन हिताय' प्रस्तुत कर न केवल भारत का, अपितु समस्त विश्व का कल्याण सम्पादित किया है। मनु को इस देश की आचार परम्परा की मान्यता एवं प्रामाणिकता पर गर्व है। उनका कहना है-
एतद्वदेशप्रसृतस्य सकाशादप्य जन्मनः।
स्वं स्वं चरित्रं शिखेरन् पृथिव्यां सर्वं मानवाः॥
'इस देश में उत्पन्न हुए ब्राह्मण से, पृथ्वी के समस्त मानव अपना चरित्र सीखें।'
भयवान् मनु की यह गर्वोक्ति मिथ्या नहीं सर्वथा सत्य है भारत ने एक सुदीर्घ समय तक आचार के सम्बन्ध में जगत् का नेतृत्व किया है। परन्तु कालक्रमेण वही भारत अवनीति के ऐसे गहरे गर्त में गिरता चला गया कि उसका वह सनातन और पुरातन स्वरूप अविश्वसनीय बनकर कल्पना प्रसृत मात्र प्रतीत होने लगा। ऐसा क्यों? कारण स्पष्ट है। हमारी वैदिक पद्धति में जिस आश्रम व्यवस्था को ऐहलौकिक सुखसिद्धि तथा पारलौकिक कल्याण का प्रभुख हेतु माना है उस आश्रम-व्यवस्था की अवहेलना ही अधोगति का कारण बनी। यद्यपि चारों आश्रमों में प्रथम आश्रम को मानव जीवन की नींव कहा है, जिसकी दृढ़ता एवं पुष्टता पर ही इस
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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जीवन भवन का सुदृढ़ एवं सुपुष्ट होना सम्भव है तथापि गृहस्थ आश्रम को सब आश्रमों में गुरु माना है। मनु महाराज का कहना है—
यथा नदी नदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम्। तथैवाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम्॥
‘जिस प्रकार सब नदी और नद समुद्र में स्थिति को प्राप्त होते हैं उसी प्रकार सभी आश्रम वाले गृहस्थ से भरण-पोषण पाने के कारण उसी पर स्थित हैं।’
जिस गृहस्थ पर अपने भरण-पोषण के साथ-साथ अन्य आश्रमियों के भरण-पोषण का भी दायित्व है उसे कितना शक्ति सम्पन्न होना चाहिये यह किसी भी मतिमान से अगोचर नहीं। वस्तुतः दुर्बल इन्द्रिय वालों को इस आश्रम में प्रवेश का अधिकार ही नहीं। जब एक गृहस्थ पर इस प्रकार भार है तो उसे अपनी शक्ति को संचित करने एवं सुरक्षित रखने का सदा ध्यान होना चाहिये। शारीरिक शक्ति मानसिक विकास तथा आत्मिक उन्नति को लिये नियत दिनचर्या एवं समुचित आहार-विहार ही एकमात्र कारण है। इस पर हमारे प्राचीन आर्य ग्रन्थों ने बड़ा बल दिया है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने चिरप्रस्तुत आश्रम व्यवस्था को पुनः जागृत करने के लिये प्राचीन गुरुकुल प्रणाली का शुभ-सन्देश देश को दिया। प्रथम आश्रम में ब्रह्मचर्य व्रत पालन पूर्वक नियत दिनचर्या का सतत अभ्यासी बालक जब गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करेगा तो वह सद्गृहस्थ सिद्ध होगा। अन्यथा गृहस्थ के पुनीत कर्तव्य से विमुख या वंचित ही बना रहेगा। इन्हीं सब बातों को दृष्टिगत रखते हुए श्री वीरेन्द्र गुप्त ने प्रस्तुत पुस्तक का प्रणयन किया है।
सुयोग्य लेखक ने अनेक ग्रन्थों का स्वाध्याय कर तथा अनुभव विद्वज्जनों का सम्पर्क ग्रहण कर जिस कठिन परिश्रम के साथ इस पुस्तक को लिखा है वह सतशः स्तुत्य है। सादी भाषा में जिन जीवनोपयोगी अनुभवों को अंकित किया है वे वस्तुतः
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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गाहस्थ जीवन को सुखमय एवं सम्पन्न बनाने वाले हैं। प्रत्येक विषय को पूर्ण रूप से स्पष्ट करने में लेखक ने अपने अनुपम कौशल का परिचय दिया है।
यद्यपि प्रस्तुत पुस्तक में अधिकतर प्राचीन विचारधारा एवं आचार पद्धति का ही विशेष रूप से उल्लेख किया है परन्तु नवीनतम विचारधारा पर भी यथास्थान उचित प्रकाश डाला है। सन्तति निरोध का प्रश्न आज की उत्तरोत्तर बढ़ती हुई जनसंख्या को रोकने के लिये महत्वपूर्ण बन गया है। इसके अनेकानेका आधुनिकतम उपाय प्रचलित हैं जिनसे संयम की भावना तो उपेक्षित हो जाती है। प्रत्युत विलासिता की भावना और बढ़ जाती है जिसके कारण हमारे बुद्धि, बल और स्वास्थ्य को अत्यन्त हानि पहुँचाती है। परन्तु इस पुस्तक के कुशल लेखक ने सन्तति निरोध के विषय पर जो शिष्ट सम्मत अपना विचार प्रस्तुत किया है वह भूरि-भूरि प्रशंसनीय है।
परमपिता परमात्मा से प्रार्थना है कि लेखक ने जिस हित भावना से इस पुस्तक को प्रकाशित किया है वह इसके अधिकाधिक प्रचार से सफल सिद्ध हो तथा नवयुवकों से निवेदन है कि वे इस पुस्तक के अध्ययन एवं मनन से अपने जीवन को तदनुरूप बनाने की सफल चेष्टा करें।
विदुषां वशवंद—
भगवत् सहाय शर्मा
(आचार्य)
पुरादाबाद
१५-५-५८
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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द्वितीय संस्करण के प्रकाशन पर
आचार्य जी का चिर आशीर्वाद
प्रत्येक देश की अपनी एक मौलिक संस्कृति होती है जिसके आधार पर ही उस देश की उन्नति एवं अवन्ति निर्भर रहती है। धर्मप्राण भारतवर्ष ने जहाँ सुसंस्कृत एवं सुव्यवस्थित वर्णश्रम पद्धति द्वारा अपना ऐहलीकिक एवं पारलौकिक जीवन समुन्नत तथा उत्कृष्ट बनाया, वही उसने प्राणी मात्र में सर्वथा श्रेष्ठ मानव के हितार्थ पुरुषार्थ चतुष्टय का विधान कर उसके अनुष्ठान पर पूरा-पूरा बल दिया। धर्मार्थ, काम, मोक्ष, रूप पुरुषार्थ चतुष्टय में धर्म को सर्व प्रथम स्थान दे उससे अनुशासित अर्थ-काम की यथावत् उपलब्धि एवं उपभुक्ति के अनन्तर मोक्ष तक पहुँचने का सरल पथ प्रशस्त बना दिया। पर इसके साथ-साथ भारत के प्राचीन मनीषियों ने यह स्पष्ट घोषणा कर दी-
ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत्॥
अर्थात् ऋषि ऋण, देव ऋण तथा पितृ ऋण, इन तीनों ऋणों को चुकाकर ही मोक्ष की ओर प्रवृत्त होना चाहिए। इन तीनों ऋणों में पितृ-ऋण से मुक्ति सुसन्तति के द्वारा ही मिलती है। कवि कुलगुरु कालिदास ने अपने प्रसिद्ध महाकाव्य रघुवंश में लिखा है- न संयतस्तस्य बभूव ऋषितुर्विसर्जयेदयं सुत-जन्म-हर्षितः। ऋणभिधानात् स्वयमेव केवलम् तदा पितृणां मुमुक्षु सन्धननात्॥
अर्थात्- प्रजा रक्षक राजा दिल्लीप के रघु-जन्म के समय कोई बन्दी न था, जिसे पुत्रोत्पत्ति के हर्ष में बन्धन मुक्त कर देता, आँपतू वह स्वयं ही पितृ-ऋण नाम के बन्धन से मुक्त हो गया, शुद्ध वंशज-सन्तति दोनों कुलों का उद्धार कर देती है, और वंश की शुद्ध उत्तम सन्तति पर आश्रित है। अतः वैयक्तिक एवं
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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सामाजिक उन्नति के लिए सन्तति का सुसंस्कृत होना परम आवश्यक है।
गृहस्थ आश्रम, जो सब आश्रमों का भरण-पोषण आदि के द्वारा गुरु माना गया है, उसकी सफलता सन्तानोपलब्धि होने पर ही मानी जाती है अतः सभी सदगृहस्थ सन्तान प्राप्ति के लिए परम उत्सुक रहते हैं और उसकी प्राप्ति होने पर अपने आपको धन्य एवं कृतार्थ समझते हैं। यद्यपि यह भावना गृहस्थ मात्र में पायी जाती है, पर तदर्थ उत्तम आचार-विचार की क्षमता सबमें नहीं होती और बिना उत्तम आचार-विचार के सन्तति का उत्तम बनना नितान्त असम्भव है। मानव समाज में कुछ ऐसे व्यक्ति पाये जाते हैं जो अपने सत्संस्कार-प्रेरित स्वाध्याय जन्म अनुभवों से सभी को लाभान्वित बनाने की तन-मन से सदा चेष्टा करते हैं।
हमारे परम प्रिय श्री वीरेन्द्र गुप्तः जी इसी प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं। आपको आर्य परिवार में जन्म के कारण स्वाध्याय प्रवृत्ति दाय रूप में समुपगत हुई है और आपने अपने स्वाध्याय-जन्म अनुभवों को पुस्तक रूप देकर सभी का हित सम्पादित किया है। अतः आप इस प्रयास के लिए सर्वथा स्तुय्य हैं। आज पाठकों के समक्ष 'इच्छानुसार-सन्तानोत्पत्ति' का द्वितीय संस्करण 'इच्छानुसार सन्तान' के रूप में प्रस्तुत है। प्रथम संस्करण को सहृदय विज्ञ-वर्ग ने सादर ग्रहण करते हुए, उसकी उपादेयता प्रमाणित कर, अपने सदाशय एवं उदाराशय का जो परिचय दिया वह भूरि-भूरि सराहना के योग्य है, क्योंकि उन्हीं के उदाराशय के कारण हमारे गुप्तःजी उस पुस्तक का द्वितीय संस्करण प्रकाशित करने के लिये त्वतः बाध्य हुए, जिसके फलस्वरूप यह संस्करण पूर्व संस्करण की अपेक्षा अनेक परिष्करण एवं संवर्धन के साथ पाठकों की सेवा में उपस्थित है।
इस संस्करण में कतिपय नवीन उपयोगी परिवर्धन दृष्टिगत गते हैं। नक्षत्रों, ऋतुओं एवं अयनों का गर्भस्थिति पर जो प्रभाव पड़ता है उसका अत्यन्त मार्मिकता के साथ शास्त्र सम्मत विवेचन इच्छानुसार सन्तान
१२
वीरेन्द्र गुप्तः
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किया गया है। सम रत्नि और विषम रत्नि के गर्भाधान से पुत्र एवं पुत्री का जन्म, सर्व सम्मत होते हुए भी कभी-कभी रजोवीर्य के न्यूनोधिक्य के कारण पूर्वोक्त सिद्धान्त को अपवाद रूप में दृष्ट होता रहता है, इस पर भी कुशल लेखक ने पर्याप्त प्रकाश डाला है। पर अपवाद पर ही केवल दृष्टि न रखकर शास्त्रीय सिद्धान्त का ही पालन करना सर्वथा श्रेयकर है।
प्रस्तुत पुस्तक के अतिरिक्त हमारे प्रिय गुप्तः जी ने और भी अनेक पुस्तकें लिखकर प्रकाशित की हैं जो आर्य सिद्धान्तों से सर्वात्मना ओत-प्रोत तथा एक दूसरे की पूरक हैं। जीवन के आरम्भिक काल में इस प्रकार की पुस्तक-रचना वास्तव में लेखक की पुनीत संस्कृति की ही परिणति है, क्योंकि—
‘प्रथमे वयसि यः शान्तः स शान्त इति मेमतिः
शुद्धात् जीवन के आरम्भ में जो शान्ति की चर्चा चलावे वही वस्तुतः सच्चा शान्ति मार्गी है।
परम पिता परमात्मा से प्रार्थना है कि हमारे उदीयमान युवक लेखक को ऐसी शक्ति, धृति और सत्प्रतिभा प्राप्त हो जिससे आप अपनी इस दिशा में सर्व हित सम्पादनार्थ उत्तरोत्तर अग्र बनते रहें तथा अपने कार्य में सदा कृत कार्य होते रहें।
इत्योभशम्
विदुषां त्रिधेमः—
भगवत् सहाय शर्मा
(आचार्य)
पुरादाबाद
इच्छानुसार सन्तान
१२
वीरेन्द्र गुप्तः
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दो शब्द
दो शब्द
कहते हैं— श्रीकृष्ण जैसी सन्तान को जन्म देने के लिए माता-पिता को वसुदेव-देवकी बनने की आवश्यकता है और यह तब हो सकता है जब उनको बनाने वाले माता-पिता भी वैसे ही गुणों वाले हों।
यह बातें अपने को अकर्मण्य और कर्महीन बना देने की हैं। वसुदेव-देवकी को क्या परमात्मा ने कोई विशेष शक्ति प्रदान की थी जिससे उन्होंने कृष्ण को जन्म दिया? और अब हमारे में वह शक्ति नहीं जिससे हम श्री कृष्ण जैसे को जन्म दे सकें? हमें वास्तविकता को विचारना होगा।
वास्तव में वसुदेव-देवकी इच्छानुसार सन्तान को जन्म देने विज्ञान के पूर्ण ज्ञाता थे, यही उनकी विशेष शक्ति थी। इस विज्ञान को आप भी समझ सकते हैं। यदि सन्तान के जन्म में इसी प्रकार की सावधानी बरत कर आचरण किया जाय तो आपकी सन्तानभी महापुरुषों की कोटि में गिनी जा सकती है।
मुझ से कई महानुभावों ने कहा— “आपने अपनी पुस्तक में उत्तम सन्तति निर्माण के जो साधन दिये हैं वास्तव में वह ठीक ही होंगे, परन्तु यह सब बातें सत्यगुण की हैं। कलियुग में इन बातों को मानकर कैसे चल सकते हैं।”
प्रिय पाठक गण वास्तविकता भी यही है और व्यवहारिक रूप में यह दाख रहा है. परन्तु उत्तम सन्तान तप द्वारा ही प्राप्त होती है, उसे भी समझना चाहिए। पूर्ण ब्रह्मचर्य, उत्तम विवाह, शुद्ध भोजन, मासिक धर्म, ऋतु स्नान एवं गर्भ स्थापन के समय की भावना, सोलह कला, तिथी, वार, नक्षत्र, गर्भ स्थिति में भोजन, दिनचर्या आदि सभी की जानकारी आवश्यक है।
इच्छानुसार सन्तान
१३
वीरेन्द्र गुप्ता:
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यदि यह मान भी लिया जाय कि आप सभी साधन नहीं अपना सकते तो भी जितने अंश में आप अपनायेंगे उतने ही अंश में अपनी सन्तान में उत्तमता की वृद्धि आपको प्राप्त होगी। जरा सोच कर देखिये कि इसका फल अगली पीढ़ी में और अधिक अच्छा प्राप्त होगा, तब आप स्वयं सोचेंगे कि महामानव या महापुरुष को जन्म देना सम्भव है।
जिस प्रकार नसीरी के डन्डे पर एक के बाद दूसरे पर चढ़ते हुए ऊपर चढ़ जाते हैं उसी प्रकार देश की सन्तति भी प्रत्येक पीढ़ी में उत्तरोत्तर उत्कृष्टता को प्राप्त होती जायगी। परन्तु जब आप ही अपनी सन्तान को उत्तम बनाने में किसी भी अंश में अग्रसर नहीं होंगे तो फिर देश की सन्तति कैसे उत्कृष्टता को प्राप्त करेगी। इसलिए, 'हे देश भक्तों! मातृ भूमि के सच्चे सपुतों! अकर्मण्यता को त्याग कर कर्मवान् बनते हुए सर्वांश में नहीं तो किसी भी अंश में सन्तति सुधार की ओर अग्रसर हो। सर्वांश की दुहाई देते हुए कुछ भी न करने वालों की अपेक्षा सफलता के पथ पर किसी भी अंश में बढ़ने वाले श्रेष्ठ होते हैं।
जिस प्रकरण में किसी औषधि के उपयोग की आवश्यकता समझी गई है उसे उस प्रकरण में अधिकत कर दिया है, साथ में औषधि निर्माण एवं प्रयोग विधि को भी अधिकत कर दिया है। किसी किसी स्थान पर निर्मित औषधि के प्रयोग की बात आई है। वह निर्मित औषधियाँ आपको 'गुरुकुल कांगड़ी फार्मसी हरिद्वार' से तथा उनकी नगर शाखाओं से प्राप्त हो सकती हैं।
प्रस्तुत पुस्तक में उत्तमोत्तम सन्तति निर्माण के सभी साधनों को पूर्ण विवेचनात्मक दृष्टि और विस्तार से समझाया गया है। यदि फिर भी कोई बात समझ में न आये या कोई शंका हो तो, उसे समझने के लिए पत्र लिखें, साथ में उत्तर के लिए टिकट भेजें। पत्र हिन्दी भाषा में तथा पूर्ण पते सहित लिखें।
इच्छानुसार सन्तान
१४
वीरेन्द्र गुप्तः
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हमारे पास कई पाठकों के पत्र पुस्तक के नाम पर पुनः विचार करके पुस्तक के नाम में संशोधन करने के लिए आये हैं। हमने पहले से ही पुस्तक का नाम बहुत सोच विचार कर रखा है। पुस्तक का नाम 'यथा नाम तथा गुण' की संगति के अनुरूप ही है। परन्तु हमने पाठकों की भावना का आदर करते हुए पुस्तक के नाम में कुछ संशोधन कर दिया है जो कि मूल नाम 'इच्छानुसार सन्तानोत्पत्ति' है उसके स्थान पर 'इच्छानुसार सन्तान' कर दिया है।
इसके लिखने में जिन ग्रन्थों का सहयोग लिया है उन सभी ग्रन्थों के उल्लेख यथा स्थान अंकित किये गये हैं। जिन ग्रन्थों के स्वाध्याय से प्रेरित होकर तथा इस विषय की पुस्तक का अभाव अनुभव करके लिपि-बद्ध किया है उन सभी ग्रन्थकारों का आभारी हूँ।
आर्य जगत के सुविख्यात विद्वान् आचार्य श्री भगवत् सहाय जी ने भूमिका लिखकर इसकी शोभा को द्विगुणित कर दिया है। आर्य पुरोहित वेद पाठी श्री पं. गोपीनाथ जी तथा मास्टर सुमेर सिंह जी ने विशेष सहयोग तथा अनुकूल सामग्री के संग्रह में योगदान कर मेरा हाथ बटाया है।
मैं उक्त सभी महानुभावों का हृदय से आभारी हूँ। यदि भारतीय जनता सन्तति सुधार में कुछ भी पग उठायेगी, तभी मैं अपने प्रयास को सफल समझूँगा।
वीरेन्द्र गुप्तः
इच्छानुसार सन्तान
१५
वीरेन्द्र गुप्तः
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लेखक परिचय
लेखक परिचय
नाम - वीरेन्द्र गुप्त:
जन्म - श्रावण शुक्ल ६, संवत् १९८४, बुद्धवार,
३ अगस्त, १९२७ ई॰, मुरादाबाद
गृहस्वामिनी - श्रीमती राजेश्वरी देवी
सम्प्रति - व्यवसाय
सम्मान :-
१- १४ सितम्बर, १९८२ राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति, मुरादाबाद।
२- ३ अक्टूबर, १९८२ आर्य समाज मण्डी बांस, मुरादाबाद।
३- १४ सितम्बर, १९८८ श्री यशपाल सिंह स्मृति साहित्य शोध पीठ, मुरादाबाद।
४- ३० सितम्बर, १९८८ अहिवरण सम्मान, पुरालेखन केन्द्र, मुरादाबाद।
५- २ जनवरी, १९९२ साहू शिवशक्ति शरण कोठीवाल स्मारक समिति, मुरादाबाद द्वारा साहित्य सम्मान।
६- ७ जनवरी, १९९६ अभिनन्दन समिति द्वारा नागरिक अभिनन्दन एवं अभिनन्दन ग्रंथ भेंट तथा सामूहिक अभिनन्दन पत्र।
७- ६ मार्च १९९९ अखिल भारतीय माथुर वैश्य महासभा द्वारा राष्ट्रीय आधिदेशन ग्वालियर में (साहित्य) समाज शिरोमणी सम्मान।
८- ९ मई १९९९ विराट आर्य सम्मेलन पश्चिमी उत्तर प्रदेश मेरठ (आर्य शिरोमणी) सम्मान।
९- २६ जनवरी २००० माथुर वैश्य मण्डल, मुरादाबाद द्वारा (साहित्यिक शताब्दी पुरुष) सम्मान।
१०- २५ फरवरी २००० (अमृत महोत्सव) के अवसर पर संस्कार भारती, मुरादाबाद द्वारा अभिनन्दन।
११- १५ सितम्बर २००० (राष्ट्रीय हिन्दी सेवा सहस्राब्दी सम्मान) सहस्राब्दी
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्त:
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