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कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

कबीरकृष्णगीता ।

१४७

कबीर वचन ।

कहैं कबीर सुनहु त्रिय देवा । सब मिल करहु साधुकी सेवा ॥ जगमहैं वैष्णव भेष मम दासा । प्रेमवस भये ताके पास ॥ सत रज तम जिव सबहैं मेरा । अभष पंथ राक्षस जिव चेरा ॥ वीज वंस तेहि रहे न कोई । मीन गऊ वध जत जिव खोई ॥ सतगुणको सो भाव बखानी । रज तम तज सतपंथ चल्लानी ॥ सत्य दया पर आतम पूजा । सदुरु साथ चरण मन बूझा ॥ सकल देव मिल निरगुण नामा । कबीर अंस तन रमता रामा ॥ सबसे प्रेम क्षमा धीरज तन । अपने जानत न दुखवैं काहु मन ॥ कौनहु जीव जंतु न दुखवैं । समष्टी निज सबपर भावे ॥ काहूके तन मांस न खाई । मीन मास मद निकट न जाई ॥ वृत्त मिष्टान्न पान फुलवारी । यह सब सात्वकी भक्ष विचारी ॥ अभ्यागत आवे कोइ बरणा । सबकर पोषन सब मिल करना ॥ सात्वकी चाल मुक्त नर नारी । रज तम भौ सब भ्रम संसारी ॥ भक्षित भाव गलतान लिय नामा । परनारी द्रव्य अपंथ कर कामा ॥ कच्छ मच्छ सकलो जिवजंता । सब जिव परा क्षमा शुभ संता ॥ तीर्थ व्रत तप त्रिगुण जोगा । बनोवास अधर्म तज भोगा ॥ भोग सात्वकी भजन सतनामा । इच्छा दशा समर्थ निहकामा ॥

कृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण पुलकित होय वाणी । सत्य कबीर तुमहिं सुख खानी ॥ हम सब कहैं तुम दीन्ह बढाई । आप दास होय सेवा लाई ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर बडेकी रीती । सब जिव पोषव सबसे प्रीती ॥

त्रिगुणका प्रभाववर्णन

१४८

कबीरकृष्णगीता ।

बमन दीनता लघुता माती । पतिव्रता सब लाब तेहि क्रांती ॥ सद्गुरु नाम कबीर अटोटा । कबीर कंथ भज कछु नहिं टोटा ॥ विष्णुवचन ।

कहे कृष्ण अज हर शुक्र व्यासा । अब सद्गुरु कहिय तथासा ॥

कबीरवचन ।

कहे कबीर तमगुणके लक्षण । दरिद्री भिखारी क्रोध यत तिक्ष्ण मारन मरन राते षट् उरमा । सत्य नाम भजे सो जिवघरमा ॥ सत्यनाम सो अम्बर काया । जगमग जीत सो अंस सुहाया ॥ अमरलोक सो अटल रहाहीं । जीव दया वद जग प्रगटाहीं ॥ असुरहिं साथ चतुर सुख साखा । रज तम भक्त असुर जग लाखा सुगुप्त मोह बस तक्षक भासा । राक्षसी भोजन पेत पिशाचा ॥ विष्णु भक्तके दोह कराहीं । शिव जोगी सिष साथे नाहीं ॥ और कहे शिव जोगी सिध्या । कलयुगद्विज मिल शिव शिष्यगिधा मीन मास मद भष गिद्ध भाना । मीन मास मद है अब खाना ॥ चोरी और करहिं बटपारी । झूठा लंपट चुगल जुवारी ॥ षट् उर मास रसके संगी । रज तम शिष कुपंथ अभंगी ॥ छीन सतगुण रज तम बहुताई । यहि जीवको ढर विचल न जाई । नहिं विचलहिं सतगुरुजेहिमाहीं । सच चीन्ह रज तम मिन डाहीं ॥ सचहिं दिन २ बाढ सवाई । गुरु साथ विमुख यम खाई ॥ दिना चार कलि श्रेष्ठ मलेच्छा । झष भखहिं गौ भखहिं अभक्षा ॥ जहँ लग अवगुण रज तम जानो । सतगुण रज तम चाल बखानो ॥ रज तम आधार ते वैष्णव नाहीं । वैष्णव सतकबीर सतगुणमाहीं हमरे दासहिं जो कोइ मनिहै । तेहि सुख होय यम नहिं दहिहै ॥

सत्य भक्ति तथा योग भोगका वर्णन

कबीरकृष्णगीता ।

१४९

एक २ रोम वैष्णव सतोगुण । रज तम देवी पंथहै दुर्जन ॥ यह सब तन वैष्णव तन दूजा । रज तम देवी पंथ अरुझा ॥ जो नहिं संतहि माने भाई । झूठहिं थाप नरकमें जाई ॥ जन्मे घरे सो क्रीतम झूठा । अजर स्वास जिव संतन दूठा ॥ सत्यकबीर अजर अविनाशी । सत्यकबीर जो करे हुलासी ॥ दुलह कबीर अमर सुखरासी । दुलहिन जीव अमरघरवासी ॥ देह धरे भौ जिव चकलागा । खसम विसार जार मन वागा ॥ धगरा मनमत त्रिगुण निरंजन । खसम कबीर काल सिरभंजन ॥ जै जै स्वामी सत्य कबीर । स्तुति करें त्रिय देव सो धीर ॥ तीनों कहे हम तरे तुव दाय। मुक्त परवाना कबीर सिरवाया ॥ अगले हंसन वाट चिन्हाई । सर्व शास्त्र दाय। फरमाई ॥

कृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण यह निश्चय जानी । मुक्ति कबीर चरण लपटानी ॥ कबीरवचन ।

कहैं कबीर सुनो सब कोई । सांची भक्ति विना गत खोई ॥ सांच भक्ति गुरु साध विश्वास। भैरों भूत देवी यमफांसा ॥ कहैं कबीर सुन वृषभ सवारी । प्रच्छेहु प्रथम सो लेहु निरवारी ॥ सब योनिन तत गुण क्रीत विवरण । पांचतीन एक मिलनर जोहतन पिंडज चार तत्त नभ त्यागी । और सकल नभहि ते लागी ॥ अबूज तीनते पृथ्वी वाई । उषमज दोय तत्त तेज औवाई ॥ एक तत्त अंकुर दलको थेका । पांच तत्त नर शब्द विवेका ॥ चार खान रचि त्रिगुण अछंगी । एक जीव तनका चित्रभंगी ॥ जोग भोग दोउ रोग समाना । नाम भक्त चहुँ युग निरवाना ॥

विशदका स्वरूप कथन

१५०

कबीरकृष्णगीता ।

पांच तीन बस तन अघखानी । सट्टरु सेव हंस पिल जानी ॥ तन विदेह विन घरको भवन है । पांच तत्त यन कहांसोरंगहै ॥ यथयम कहेउं पंच सैल ततुरंगा । सुन भूलेहु तुम खाहु बहु भंगा ॥ योगी सोहंग तन सिंगी बजावे । सहज आसन तन विभूत रभावे ॥ हटताई दिब्बी अमीगत ठपना । सबे विगाना सट्टरु अपना ॥ चावल प्रीत चेतन दिल दाला । ब्रह्म अगिन कमल परजाला ॥ निरगुण नाम निमक सो सब रस। तेज पात विश्वास सो अदरख ॥ प्रेम सुचित सो घीव जीवन । काया क्षीर यथे कोई गुरुजन ॥ पारस पान प्रसाद चढाये । अमी नीर कबीर पियाये ॥ दया दही गऊ घृत सुच दूधा । खोवा काम क्रोध घर सोधा ॥ गरस प्रसाद विरान सुरत सेवक । शुभ आशिष देहिं गुरुदेवक ॥ अजर अमर घर वर मिल आशिष । पिया रूपरस जगमें अतिसुन ॥ पिष हिय पैठि सेवककेरा । जन्म मरनका करे नवेरा ॥ भया निवेरा सो कस हूवा । पांच पचीस त्रिगुन तन जूवा ॥ अजर अमर अविचल सो काया । अमर लोक सबे सुख पाया ॥ कहैं कबीर छूटेउ सब संसा । तरे इकोतर पिछले वंसा ॥ सट्टरु शरण हाथिगत पुरुषा । खसम कबीरहिं लखेन न सुरखा ॥ कहैं कबीर तन भुवन चतुर्दश । चौदह संग चालक जीव सर्वसा ॥ चौदह संग जब बाहर होई । सत कहे सट्टरु शरण समोई ॥ अजरलोक पगु अधर बखाना । निज पगु अरध चितल परजाना ॥ तीन लोक उरध तेह ताको । लोक तलातल जंघ अस्थापो ॥ लोक माहिं तल इंदुकी वारी । मलस्थान रसातल खारी ॥ कटि पताललोक विस्तारा । सान दीप नभ अधर उचारा ॥

चौदह यमका वर्णन व ग्रंथसमाप्ति

कबीरकृष्णगीता ।

१५१

इंद्र सप्त दीप भुवलोके नाभी स्थानी । नामके वाम दहिने भै जानी ॥ रवर्गलोक हृदय अस्थापी । अमर लोक तन दोउ सुज दापी ॥ कंठ स्थान आहि जनलोक । हे पतलोक खिलोट विसोका ॥ कीतम सत्यलोक नर माथा । आद सतलोक अमरपुर ताका ॥ कुल अंगुष्ठ बुढ़ा पगु पाहीं । नाडि सकल सेस परवाहीं ॥ निज सुख देखहु तीनों लोका । रसना उर्ध सरम पंथ मोका ॥ रसना मृत्युलोक कोई थिर नाहीं । जिदा जग प्रगट रहाकोइ न माहीं रसना अरध पतालके सो साता । अष्ट घात पिंजरा जिवराता ॥ निराकार प्रबल मंजारा । सत्यनाम विन तेहि दै मारा ॥ अष्टंगी मंजारी खोटी । तीन लोक जिव खायसि घोटी ॥ कहै कबीर जिन सुमरो मोही । यम सिर भंजन बचायेउ बोही ॥ चौदह यम तन जीवहि घेरा । चौदह यमका करो निवेरा ॥ प्रथमहि धर्म करे यम घाता । धर्मराय यम इस मन माता ॥ दुतिय काम त्रितय यम कोधा । चौथे लोभ पंचये भ्रम सोधा ॥ छठयै यम लक्ष बुध विकारा । सतयै परधन हर सत हारा ॥ अठयै अहंकार नौमै मोहा । दसयै दस इंद्दी सुख जोहा ॥ इकादसे आप तन पोषा । अश्यागत तज खाय न मोषा ॥ द्वादसयै लेय विश्वास घाती । त्रियदस तृष्णा लोभ जमाती ॥ चतुर्दश चिंता तन बन आगी । चिंताहि डाह कोई वैरागी ॥ चिंता सोइ जो सट्टर सेवा । सट्टर सब देवनकर देवा ॥

कृष्णवचन ।

कहै कृष्ण निरने निरवारा । सत्यकबीर औ तारनहारा ॥ हम सब मगन कबीरके पाछे । हमार निवाह कबीरकृत आछे ॥

१५२

कबीरकृष्णगीता ।

चारों युग कबीर मोहि रासा । कहैं कृष्ण व्यास सत भाषा ॥ पूछहिं तारा अकाश घर स्वामी । कहैं सदुरु नखत निधायी ॥ केतिक तारा आहिं अकाश । कौन वरण तारागण भाषा ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर तारा यम रोवा । प्रबल निरंजन यम जिव हुवा ॥ उतरो याही यमकी काया । दिये छिटकाय रैन नम याया ॥ होत प्रात फिर सुन्य समाई । सात तबकके पार सो जाई ॥ सुन्य समाय रहा धर ध्याना । दिन गत बहुरि रैन प्रगटना ॥ रैन निरंजन दिवस कबीरं । सूर निरंजन शशि सत धीरं ॥ अनंत कोट उडगण तनवारा । चौदह योजन गोछ निराकार ॥ गोछ वीर जीवहिं दे सूरि । कबीरके भक्त करे भौभूरी ॥

दोहा-श्रीकृष्ण त्रिय देव मिल, स्तुति कराहिं अपार ।

सुखदेव व्यास सब विनवहीं, जै जै कबीर विचार ॥

कबीर काल सिर भंजन, और मुक्त देहिं जीव ।

विष्णु व्यास सत कहत हैं, सत्यकबीर निज पीव ।

इति श्रीकबीरकृष्णगीता समाप्ता ।

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